मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 2.परमेश्वर की इच्छा को खोजना और यथासंभव सत्य का अभ्यास करना

जैसे ही लोग अपने कर्तव्यों को पूरा करने में उतावले हो जाते हैं, वे नहीं जानते कि कैसे इसका अनुभव किया जाए; जैसे ही वे कामों में व्यस्त हो जाते हैं, उनकी आध्यात्मिक स्थितियाँ आकुल हो जाती हैं; वे एक सामान्य स्थिति को बनाकर नहीं रख पाते। ऐसा कैसे हो सकता है? यदि आप को थोड़ा कार्य करने दिया जाए, आप अपरम्परागत और स्वच्छंद हो जाते हैं, परमेश्वर के निकट होने की जगह उनसे दूर होते जाते हैं। इससे पता चलता है कि लोग नहीं जानते कि अनुभूति कैसे की जाए। चाहे आप कुछ भी करें, आप को पहले यह समझ लेना चाहिए कि आप इसे क्यों कर रहे हैं, और उस कार्य की प्रकृति क्या है। यदि वह बात अपने कर्तव्य को पूरा करने की श्रेणी में आती है, तो आपको यह चिन्तन करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मैं किस तरह अपने कर्तव्य को सही ढंग से कर सकता हूँ ताकि मैं इसे लापरवाही या बेमन से न करूं? यह वह बात है जिसमें आपको परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और यह खोजना है कि परमेश्वर को हम कैसे प्रसन्न करें। ये वो तरीके हैं जिनके द्वारा हम विविध कार्यों को करते समय परमेश्वर के करीब हो सकते हैं; यह कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप नहीं, यह किया जाता है परमेश्वर की इच्छा को खोजकर सत्य के अनुसार अभ्यास करने की खातिर। अगर आप ‘परमेश्वर का धन्यवाद, परमेश्वर का धन्यवाद’ ऐसा कहते रहते हैं बिना कुछ भी किये, और जब आप हकीकत में कुछ करते हैं तब अपनी मनमानी करते हैं, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कार्य रह जाता है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी भी चीज़ पर कार्य करते समय आपको यह सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर क्या चाहते हैं? विभिन्न मामलों के द्वारा आप परमेश्वर के करीब हों, परमेश्वर के करीब होकर आप परमेश्वर से वे नियम और तथ्य पाना चाहें जिनके लिए कार्य किए जाएँ, आप परमेश्वर की इच्छा की अपने अंतर्मन में तलाश करें और चाहे कुछ भी करें, आप परमेश्वर का त्याग न करें। ऐसा व्यक्ति ही वह है जो सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है। पर जब कोई बात लोगों के साथ होती है, चाहे वास्तविक परिस्थिति कैसी भी हो, उन्हें लगता है कि वे यह या वह कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दिल में नहीं होते हैं, और वे अपने स्वयं के इरादों के अनुसार इसे करते हैं। भले ही उनके कार्य का दौर उपयुक्त हो या नहीं, या वह सच्चाई के अनुरूप हो या नहीं, वे केवल अपनी गर्दन उठा कर अपने निजी इरादों के अनुसार कार्य कर डालते हैं। ऐसा आम तौर पर लगता है कि परमेश्वर उनके दिल में हैं, लेकिन जब वे काम करते हैं, तो वस्तुतः भगवान उनके दिल में नहीं होते हैं। कुछ लोग कहते हैं: “मैं अपने कामों में परमेश्वर के निकट नहीं बढ़ सकता हूँ ; अतीत में मैं धार्मिक अनुष्ठानों को करने का आदी था, और मैंने परमेश्वर के करीब आना चाहा, लेकिन इसका कुछ परिणाम नहीं हुआ; मैं उनके पास नहीं जा सका।” इस तरह के व्यक्ति के दिल में परमेश्वर नहीं हैं, बल्कि वह स्वयं ही अपने दिल में है, और वह सच्चाई को अपने कार्यों में लागू नहीं कर सकता है। सच्चाई के अनुसार काम न करने का अर्थ है आप अपनी इच्छा के अनुसार काम कर रहे हैं, और अपनी इच्छा के आधार पर काम करने का अर्थ है परमेश्वर को त्याग देना; अर्थात, परमेश्वर आपके दिल में नहीं हैं। लोगों को अपनी मानवीय सोच अच्छी और सही लगती है, और वे ऐसे दिखते हैं मानो वे सच का कोई खास उल्लंघन नहीं कर रहे हैं। लोगों को लगता है कि इस तरह वे सच्चाई पर अमल कर रहे हैं, उन्हें लगता है कि ऐसा करना परमेश्वर के अधीन होना है। दरअसल, लोग वास्तव में परमेश्वर की तलाश और इस बारे में परमेश्वर से प्रार्थना नहीं कर रहे हैं। वे परमेश्वर की इच्छा को पूरी करने के लिए अच्छी तरह से प्रयास नहीं कर रहे हैं, न ही परमेश्वर की आवश्यकताओं के अनुसार इसे करने की कोशिश करते हैं। उनके पास यह सच्ची स्थिति नहीं है, और उनके पास ऐसी लगन नहीं है। यही सबसे बड़ी गलती है जो लोग अपने अभ्यास में करते हैं, क्योंकि आप परमेश्वर पर विश्वास तो करते हैं, परन्तु परमेश्वर आपके दिल में नहीं हैं। यह पाप कैसे नहीं है? यह कैसे अपने आप को धोखा देना नहीं है? इस तरीके से विश्वास रखने से कौन सी बात बनेगी? परमेश्वर में विश्वास करने का व्यावहारिक महत्व कहाँ है?

परमेश्वर आपके किसी कार्य से विशेष रूप से बहुत असंतुष्ट थे; यदि आप इस कार्य को करने के दौरान सोचते: परमेश्वर को यह कैसा लगेगा अगर यह उनके सामने लाया जाता है? यदि वे इस मामले के बारे में जानें तो क्या वे प्रसन्न होंगे या कुपित? क्या भगवान इससे घृणा करेंगे? पर आपने यह सब खोज नहीं की, क्या आपने की? भले ही लोगों ने आपको याद दिलाया हो, पर आपने तब भी सोचा कि यह मामला कोई बड़ी बात नहीं, और यह सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करता, यह कोई पाप नहीं। परिणाम यह हुआ कि आपने इसे बर्बाद कर दिया और भगवान को उकसाया, बहुत क्रुद्ध किया, यहां तक ​​कि आप उनकी निगाह में घृणा के योग्य हो गए। चीजों को अच्छी तरह सोच-परख लो, ताकि आप उन पर पछतावा न करें; यही है वह बात जिस पर आपको अमल करना चाहिए। अगर आपने पहले मामले की अच्छी तरह से खोज-बीन और जांच कर ली होती, तो इस मामले पर क्या आपका कुछ नियंत्रण न बना रहता? हालांकि कभी-कभी लोगों की परिस्थितियां अच्छी नहीं होती, अगर वे ईश्वर की उपस्थिति में जो कुछ भी करने की ज़रूरत होती है उसका गंभीरता से निरीक्षण करें, तो कोई बड़ी गलतियां न होंगी। सत्य के अभ्यास में लोगों का गलतियों से दूर रहना मुश्किल है। जब आप काम करते हों, यदि आप सत्य के अनुसार उसे करना तो जानते हैं, लेकिन आप उसे सच्चाई के अनुसार पूरा नहीं करते हैं, तो समस्या यह है कि आप सच्चाई के प्रेमी नहीं हैं। एक व्यक्ति जो सच्चाई का प्रेमी नहीं है, स्वभाव में नहीं बदला जाएगा। यदि आप परमेश्वर की इच्छा को सही ढंग से नहीं समझ सकते और कैसे अभ्यास करें यह नहीं जानते, तो आपको दूसरों के साथ संवाद करना चाहिए। यदि कोई भी व्यक्ति मामले को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाए, तो आपको उस समय जो सबसे उचित लगे वह उपाय करना चाहिए; लेकिन यदि आप अंततः यह पता लगाते हैं कि इस तरह से इसे पूरा करने में कोई त्रुटि है, तो आपको इसे तुरंत ठीक करना चाहिए, और परमेश्वर इस त्रुटि को पाप के रूप में नहीं गिनेंगे। क्योंकि आपका इरादा इस मामले को व्यवहार में लागू करने के समय सही था, और आप सच्चाई के अनुसार अभ्यास कर रहे थे, केवल आप इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पाए थे, और इससे आपके कार्यों में कुछ त्रुटियां रह गईं; यह एक लघु परिस्थिति है। लेकिन बहुत से लोग अपने स्वयं के दो हाथों के बल पर ही काम करते हैं और यह करने के लिए अपने स्वयं के मन पर ही भरोसा करते हैं, और वे शायद ही कभी चिंतन करते हों: क्या इस तरह से अभ्यास करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? अगर मैं ऐसा करूं तो क्या भगवान प्रसन्न होंगे? अगर मैं ऐसा करूं तो क्या भगवान मुझ पर भरोसा करेंगे? क्या मैं सच्चाई को व्यवहार में लाऊँगा यदि मैं ऐसा करूं? यदि परमेश्वर यह सुनते हैं, तो क्या वे कह पाएँगे: “यह मामला सही और उचित रूप से किया गया है! इसे निभाए रखो!”? क्या आप इस तरह से सब कुछ गंभीरता से जांच सकते हैं? क्या आप हर बात में सावधानी बरतने में सक्षम हैं? या आपको इस बात पर विचार करना चाहिए कि आप जिस तरीके से यह कर रहे हैं, क्या उसे परमेश्वर तुच्छ मानते हैं, जिस तरह से आप इसे कर रहे हैं वह हर अन्य व्यक्ति को कैसा लगता है, क्या आप इसे स्वयं की इच्छा के आधार पर या मात्र अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कर रहे हैं । .... आपको इसमें बहुत अधिक विचार करना होगा, कई प्रश्न पूछने होंगे, और अधिक तलाश करनी होगी, और तब त्रुटियां छोटी, और छोटी होती जाएंगी। इस तरह से करने करने से यह साबित हो जाता है कि आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसे सच्चाई की तलाश है, और आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जो ईश्वर का सम्मान करते हैं, क्योंकि आप सत्य की अपेक्षित दिशा के अनुसार काम कर रहे हैं।

यदि किसी का कर्म सत्य से हट जाता है, तो वह नास्तिक के समान ही है। यह उस प्रकार का व्यक्ति है जो अपने दिल में परमेश्वर से रहित है, जो भगवान को छोड़ देता है, और इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के परिवार में पारिश्रमिक पाते एक कर्मचारी की तरह है जो अपने स्वामी के लिए काम करता है और थोड़ा मेहनताना पाता है, और फिर वह चला जाता है। यह वह व्यक्ति कतई नहीं है जो ईश्वर में विश्वास करता है। क्या इससे पहले इसका उल्लेख नहीं हुआ, “भगवान की मंजूरी पाने के लिए आप क्या कर सकते हैं”? यह बात पहले कही गई है, ना? परमेश्वर से अनुमोदन पाना वह पहली बात है जिसके बारे में आपको सोचना और काम करना चाहिए; यह आपके अभ्यास में सिद्धांत हो और इसकी गुंजाइश हो। आपको पहले क्यों यह तय करना चाहिए कि आप सत्य के अनुरूप कार्य कर रहे हैं या नहीं, उसका कारण यह है कि यदि यह सत्य के अनुरूप है, तो यह निश्चय ही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप भी है। ऐसा नहीं है कि आपको यह तय करना चाहिए कि कोई बात सही है या गलत है, या यह कि हर किसी की रूचि के अनुसार यह है या नहीं, या यह आपकी अपनी इच्छाओं के अनुसार है या नहीं। बल्कि, यह तय करना है कि क्या यह सत्य के अनुरूप है, क्या यह चर्च के कार्य और हितों को लाभ पहुंचाता है। यदि आप इन पहलुओं पर विचार करते हैं, तो आप कार्यों को करते समय परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप अधिकाधिक होंगे। यदि आप इन पहलुओं पर विचार नहीं करते हैं और चीजों को करते समय केवल अपनी इच्छा-शक्ति पर भरोसा करते हैं, तो यह निश्चित है कि आप उन्हें गलत तरीके से ही करेंगे, क्योंकि मनुष्य की इच्छा सत्य नहीं है और यकीनन परमेश्वर के अनुरूप नहीं। यदि आप परमेश्वर द्वारा अनुमोदित होना चाहते हैं, तो आपको सत्य के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, न कि अपने स्वयं के इरादों के अनुसार। कुछ लोग बंद दरवाजों के पीछे छिपकर गलत काम करते हैं या कुछ निजी हरकतें करते हैं। उन कामों के किए जाने के बाद, उनके भाइयों और बहनों का यह कहना होगा कि उन्होंने जो किया वह सही न था, पर वे उन्हें इस तरह से नहीं मान पाएंगे। उन्हें लगता है कि यह एक व्यक्तिगत मामला है और इसमें चर्च के काम का कोई सरोकार नहीं है, इसका आर्थिक तौर पर चर्च के साथ कुछ लेना-देना नहीं है और इसमें चर्च के लोग भी शामिल नहीं, इसलिए इसकी गणना सत्य के उल्लंघन करने के रूप में नहीं की जा सकती और परमेश्वर को इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। कुछ चीजें आपको ऐसी प्रतीत हो सकती हैं कि वे निजी मामले हैं और उनका किसी सिद्धांत या सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है। परन्तु, भाइयों और बहनों के नज़रिए से, जब आप ऐसा करते हैं तब ऐसा लगता है कि आप बहुत स्वार्थी हैं और आप परमेश्वर के परिवार के काम और परमेश्वर के परिवार को यह कैसे प्रभावित करेगा, इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं, और आप केवल अपने खुद के लाभ पर विचार कर रहे हैं। यह बात पहले से ही संतों की व्यवस्था से जुड़ी हुई है और इसमें मानव प्रकृति के मुद्दे पहले से जुड़े हुए हैं। आप जो कर रहे हैं वह चर्च के हितों को शामिल नहीं करता है और इसमें सत्य शामिल नहीं है, लेकिन आप जो कर रहे हैं वह मानव प्रकृति के नैतिक नियमों का उल्लंघन करता है और अंत में, यह सत्य के अनुरूप नहीं है। चाहे आप कुछ भी कर रहे हों, चाहे कोई मामला कितना भी बड़ा हो, और चाहे आप परमेश्वर के परिवार में अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हों या नहीं, चाहे वह आपकी निजी बात हो, आपको इस बात पर विचार करना ही चाहिए कि यह मामला परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है या नहीं, क्या ऐसा काम किसी ऐसे व्यक्ति को करना चाहिए जिसमें मानवता हो, और जो आप कर रहे हैं, वह परमेश्वर को खुश करेगा या नहीं। आपको इन चीज़ों के बारे में सोचने की ज़रूरत है। यदि आप ऐसा करते हैं, तो आप एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसे सत्य की तलाश है और जो वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करता है। यदि आप हर बात और हर सच्चाई से इस तरह से पेश आते हैं, तो आप अपने स्वभाव को बदलने में सक्षम होंगे। कुछ लोगों को लगता है कि वे कुछ निजी कार्य कर रहे हैं, इसलिए वे सत्य की उपेक्षा करते हैं, यह सोचते हुए: यह एक व्यक्तिगत मामला है, और मैं जैसा चाहूँ वैसा करूँ। वे इसे किसी भी तरह से कर डालते हैं जो उन्हें खुशी दे, और जो कुछ भी उनके लिए फायदेमंद हो; वे इस तरफ ज़रा-सा भी ध्यान नहीं देते कि यह कैसे परमेश्वर के परिवार को प्रभावित करता है और वे यह भी नहीं सोचते हैं कि यह संतों के आदेश के अनुसार है या नहीं। अंत में, जब वह मामला समाप्त हो जाता है, तो वे अपने भीतर अस्पष्ट और आकुल हो जाते हैं; वे आकुल तो होते हैं लेकिन उन्हें नहीं पता होता कि यह सब कैसे हुआ। क्या यह एक योग्य प्रतिशोध नहीं है? यदि आप ऐसी चीजें करते हैं जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं हैं, तो आपने परमेश्वर को नाराज़ किया है। यदि लोगों को सच्चाई में रूचि नहीं है, और अक्सर अपनी इच्छा के आधार पर काम करते हैं, तो वे अक्सर परमेश्वर को रुष्ट या अपमानित करेंगे। इस तरह का व्यक्ति आम तौर पर उसके कर्मों में परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं किया जाता और अगर वे वापस नहीं लौट आते हैं, तो वे सज़ा से दूर नहीं होंगे।