मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 1. अपनी प्रकृति को समझना और सत्य को व्यवहार में शामिल करना

1. लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को पूरी तरह से नहीं समझ पाते हैं

आप वर्तमान में अपनी स्वयं की कुछ परेशानियों के बारे में जानते हैं, आप उन भ्रष्टाचार के बारे में जानते हैं जो आमतौर पर आसानी से होते हैं, और उन चीजों को जानते हैं जिन्हें करना आपके लिए आसान है; हालांकि, सबसे अधिक कठिन चीज होती है अपने आप को नियंत्रित कर पाना। आप नहीं जानते कि कब क्या करेंगे और कौन सी गम्भीर चीज़ आप करेंगे। शायद ऐसी कोई चीज हो जिसके बारे में आपको लगता होगा कि आप वैसा कभी नहीं करेंगे, लेकिन किसी निश्चित समय या परिस्थिति में वह घटित हो जाता है; आपने वास्तव में ऐसा किया और कहा। ये अप्रत्याशित चीजें वो चीजें हैं जिन्हें लोग नियंत्रित करने में सक्षम नहीं होते हैं; यह कैसे हो सकता है? ऐसा इसलिए है क्योंकि आजकल लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों के सार को पूरी तरह समझ नहीं पाते हैं; वे वास्तव में स्वयं अपने सार को कई प्रमुख मायनों में नहीं समझते हैं या गहराई से पहचान नहीं पाते हैं; इसलिए उनके लिए सत्य को व्यवहार में लाना बहुत श्रमसाध्य होता है। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति अपनी कथनी और करनी में बहुत चालाक और बेईमान हो, तो जब आप उससे पूछेंगे कि उसकी सबसे बड़ी कमियां कौन-कौन सी हैं तो वह क्या कहेगा? वह कहेगा: “मैं थोड़ा चालाक हूँ।” वह बस इतना कहेगा कि वह थोड़ा चालाक है, परंतु यह नहीं कहेगा कि उसकी प्रकृति में ही चालाकी है और यह नहीं कहेगा कि वह एक चालाक व्यक्ति है। वह अपनी स्वयं की प्रकृति को उतनी गहराई से नहीं देखता है, वह उसे उतने सूक्ष्म रूप से या अच्छी तरह नहीं देखता जैसा अन्य लोग देखते हैं। जैसा अन्य लोग देखते हैं, यह व्यक्ति बहुत चालाक और धूर्त है; जो भी शब्द वह बोलता है उसमें झूठ होता है, उसके वचन और कार्य कभी भी ईमानदार नहीं होते हैं, परंतु वह नहीं देख पाता कि यह कितना गंभीर है। भले ही वह अगर थोड़ा पहचान ले, यह केवल सतही पहचान ही होगी। इसलिए वह जब भी बोलता और काम करता है, वह हमेशा अपनी प्रकृति के बारे में कुछ न कुछ प्रकट करता है, फिर भी वह उसके बारे में अनजान है। वह सोचता है कि वह जो कर रहा है उसमें वह ईमानदारी बरत रहा है और वह सत्य के अनुसार काम कर रहा है। वास्तव में, दर्शकों के नजरिए से, यह व्यक्ति बहुत धूर्त और चालाक है; वह अभी भी अपने वचनों और कर्मों में बेईमान है। कहने का अर्थ यह है कि लोग जैसे स्वयं की प्रकृतियों को समझते हैं और ईश्वर ने जिस तरह से मानवीय प्रकृति को प्रकट किया है उनके बीच हमेशा ही बहुत बड़ी विसंगति रहती है। परमेश्वर क्या प्रकट करते हैं वह गलत नहीं है, बल्कि मानवजाति की अपनी प्रकृति की समझ में भारी कमी है। लोगों को स्वयं की मौलिक या पर्याप्त समझ नहीं है, लेकिन वे अपनी ऊर्जा अपने कार्यों और बाहरी अभिव्यक्तियों पर केंद्रित और समर्पित करते हैं। भले ही कोई कभी कभार स्वयं को समझने के बारे में कुछ कहे, यह बहुत अधिक गंभीर नहीं होगा। कोई कभी भी नहीं सोचता है कि इस तरह की चीज करने या किसी चीज को विशेष स्वरूप में प्रकट करने के लिए वे इस तरह के व्यक्ति हैं या उनकी प्रकृति इस तरह की है। परमेश्वर ने मनुष्य की प्रकृति और सत्व को प्रकट किया है, परंतु मनुष्य समझता है कि उनका काम करने का तरीका और बोलने का तरीका दोषपूर्ण और खराब है; इसलिए लोगों के लिए सत्य को व्यवहार में शामिल करना बहुत श्रमसाध्य कार्य होता है। लोग सोचते हैं कि उनकी गलतियाँ बस क्षणिक अभिव्यक्ति हैं, जो उनके सावधान नहीं रहने पर प्रकट हो जाती हैं, बजाय यह मानने के कि यह उनकी प्रकृति का प्रकटीकरण है। लोग जो स्वयं को इस तरह से समझते हैं वे सत्य को व्यवहार में शामिल करने में सक्षम नहीं होते हैं, क्योंकि वे सत्य को सत्य की तरह स्वीकार नहीं करते हैं और सत्य के लिए लालायित नहीं रहते हैं; इसलिए, सत्य को व्यवहार में लाते समय, तो वे यन्त्रवत् ढंग से नियमों का पालन करते हैं। लोग अपनी स्वयं की प्रकृतियों को अत्यधिक भ्रष्ट के रूप नहीं देख पाते हैं, और मानते हैं कि वे नष्ट होने या दंडित होने के कगार तक नहीं पहुँचे हैं। उन्हें लगता है कि कभी-कभी झूठ बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, और वे पहले की अपेक्षा बहुत बेहतर हैं; लेकिन वास्तव में, मानकों के अनुसार, एक बहुत बड़ा अंतर है, क्योंकि लोगों के केवल कुछ व्यवहार ऐसे हैं जो बाहर सत्य का उल्लंघन नहीं करते हैं, परंतु वास्तव में वे सत्य को व्यवहार में नहीं लाते हैं।

2. अपनी स्वयं की प्रकृति को समझना और चीजों को अतिशय में करने से स्वयं को नियंत्रित करना

कार्य बदल देने का मतलब यह नहीं है कि लोगों की प्रकृतियाँ बदल गई हैं। यह सब बताने का कारण यह है कि कार्य लोगों के पुराने स्वरूप को मूल रूप से नहीं बदलते हैं या लोगों की प्रकृतियों को नहीं बदलते हैं। केवल अपनी प्रकृतियों को समझ लेने के बाद ही लोग नियमों का बस पालन करने की बजाय गहराई से अभ्यास कर सकते हैं। आज कल लोग सत्य को व्यवहार में लाने के लिए वांछित स्तर तक नहीं पहुँच पाते हैं; वे सत्य की आवश्यकताओं को संपूर्णता में पूरा नहीं करते हैं। लोग केवल कुछ ही सत्य को व्यवहार में लाते हैं, सत्य के कुछ ही हिस्सों को व्यवहार में लाते हैं। वे केवल कुछ विशेष परिस्थितियों और विशेष परिवेशों में ही सत्य को व्यवहार में लाते हैं। वे प्रत्येक परिवेश और प्रत्येक संदर्भ में सत्य को व्यवहार में नहीं लाते हैं। कभी-कभार जब कोई व्यक्ति खुश हो या बढ़िया स्थिति में हो, या जब सभी लोग एक साथ समागम में हों और वह अंदर से अधिक सहजता का अनुभव कर रहा हो, तो वह कुछ समय के लिए कुछ चीजें सत्य के अनुसार करेगा और कुछ उचित टिप्पणियाँ करेगा; लेकिन जब वही व्यक्ति नकारात्मक लोगों या पीछे छूट गए लोगों के साथ होगा तो, वह थोड़ा उदास होगा और अच्छे ढंग से व्यवहार नहीं करेगा। यही वह जगह है जहाँ लोग सत्य को व्यवहार में शामिल करने के लिए एक दृढ़ रवैया नहीं अपनाते हैं। बल्कि, यह अभ्यास अनियत और अस्थायी मूड और परिवशों के प्रभाव में किया जाता है; यह इसलिए भी है कि आपको अपनी स्वयं की स्थिति और प्रकृति की समझ नहीं है। इसलिए, कभी-कभी आप कुछ ऐसा करते हैं जिसकी अपेक्षा आपने कभी नहीं की होगी। क्या आप लोग मुझ पर विश्वास करते हैं? आप लोग केवल कुछ स्थितियों को समझते हैं और आपको स्वयं अपनी प्रकृति की समझ नहीं है; इसलिए, आप गारंटी नहीं दे पाएंगे कि भविष्य में आप क्या करेंगे, अर्थात्, आपका पूर्ण नियंत्रण नहीं होगा। कभी-कभी, आप किसी परिस्थिति में सत्य को व्यवहार में ला पाते हैं मानो आप थोड़े बदल गए हैं, लेकिन दूसरे परिवेश में आप सत्य को व्यवहार में नहीं लाते हैं। आप स्वयं की सहायता नहीं कर सकते। आप ऐसा इस बार नहीं करते हैं, लेकिन थोड़ी देर बाद ही यह कर बैठते हैं और भीतर जो कुछ भी है मौजूद ही रहता है। इससे यह साबित होता है कि आप अभी भी इस मामले को पूरी तरह से नहीं देखते हैं या गहराई से समझ नहीं पाए हैं, और आप गहराई से अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझ नहीं पाते हैं और अंततः आप गलत ही करेंगे। सामान्य परिस्थितियों में, अगर आप अपनी प्रकृति को पूरी तरह समझने में सक्षम होते और उससे घृणा करते, तो फिर आप स्वयं को नियंत्रित कर पाते और सत्य को व्यवहार में ला पाते।

3. उन लोगों का सार जो सत्य को व्यवहार में नहीं लाते हैं सत्य के प्रति अज्ञानता है

आज कल, लोग सत्य को व्यवहार में शामिल करने के लिए बहुत ध्यान नहीं देते हैं, वे केवल समागम में साथ आने पर ध्यान देते हैं और केवल अपने मन की दशा को संतुष्ट करते हैं ताकि वे असुविधाजनक या नकारात्मक न महसूस करें। वे अपने दिमाग को सत्य के अभ्यास में लगाने पर विचार नहीं करते हैं। यह मायने नहीं रखता कि यह आपकी उस समय कितनी सहायता करता है, मामला गुजर जाने के बाद, यह कोई वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं करता क्योंकि आपने केवल सत्य को समझने या सुनने पर ही ध्यान दिया, परंतु सत्य को व्यवहार में शामिल करने पर ध्यान नहीं दिया। आप लोगों में से किसने इसका सार निकाला है कि किस स्थिति में कौन से सत्य को व्यवहार में लाना चाहिए? किसी ने नहीं! सारांश कैसे तैयार किया जा सकता है? सारांश को तैयार करने के लिए व्यक्तिगत अनुभव होने चाहिए; केवल सतही भाषण से काम नहीं चलेगा। यह लोगों का सबसे कठिन क्षेत्र है—सत्य को व्यवहार में शामिल करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। सत्य को व्यवहार में शामिल करने में सक्षम होने का वास्ता निजी उद्यम से है; कुछ लोग सुसमाचार फैलाने के लिए स्वयं को सत्य से लैस करते हैं, और कुछ लोग चर्च की सहायता करने के लिए ऐसा करते हैं, परंतु वे यह सब सत्य को व्यवहार में शामिल करने के लिए और स्वयं को बदलने के लिए नहीं करते हैं। वे लोग जो इन चीजों पर ध्यान देते हैं उन्हें सत्य को व्यवहार में शामिल करने में कठिनाई होती है। यह भी लोगों के लिए कठिनाई का क्षेत्र ही है।

4. सत्य को व्यवहार में शामिल करना बाहरी कार्यों तक रूक जाता है

कुछ लोग कहते हैं: मुझे लगता है अब मैं कुछ सत्य को व्यवहार में शामिल करने में सक्षम हूँ, ऐसा नहीं है कि मैं जरा भी सत्य को व्यवहार में नहीं ला सकता हूँ। कुछ परिवेशों में, मैं चीजों को सत्य के अनुसार कर सकता हूँ, इसका मतलब है कि मेरी गिनती ऐसे व्यक्ति में हो जो सत्य को व्यवहार में लाते हैं और मेरी गिनती ऐसे व्यक्ति में हो जो सच्चा है। वास्तव में, पूर्व की अवस्थाओं की तुलना में, या उस पहली बार की तुलना में जब आपने सबसे पहले परमेश्वर में विश्वास किया था, थोड़ा बहुत बदलाव आया है। अतीत में, आप कुछ नहीं समझते थे, और आप नहीं जानते थे कि सत्य क्या है या भ्रष्ट स्वभाव क्या है। अब आप कुछ-कुछ जानने लगे हैं और आप कुछ बढ़िया व्यवहार कर पाने में सक्षम हो गए हैं, लेकिन यह रुपांतरण का बहुत छोटा हिस्सा है; यह वास्तव में आपके स्वभाव का रुपांतरण नहीं है क्योंकि आप अपनी प्रकृति की उन्नत और गहन सच्चाइयों का पालन नहीं करते हैं। अगर कुछ रुपांतरण हुआ है, तो यह आपके अतीत के विपरीत है और यह रुपांतरण आपकी मानवता का केवल एक छोटा रुपांतरण है। हालांकि, जब इसकी तुलना सत्य की सर्वोच्च अवस्था से की जाती है, तो आप लक्ष्य से बहुत दूर नजर आते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आप सत्य को व्यवहार में शामिल करने के मामले में लक्ष्य से दूर हैं।

कभी-कभी जब लोग इस प्रकार की स्थितियों में होते हैं वे नहीं जान पाते हैं कि चल क्या रहा है: मैं नकारात्मक नहीं हूं और उत्साही हूँ, परंतु जब बात सत्य को व्यवहार में शामिल करने की हो और सत्य को समझने की हो, तो मुझे लगता है कि मेरे लिए कोई रास्ता नहीं है और यह कि मुझे इस पहलू में कोई दिलचस्पी नहीं है। यह कैसे हो सकता है? कभी-कभी आप इस स्थिति को बहुत स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते हैं और सतही तौर पर ऐसा वैसा करने के लिए मजबूर होते हैं, मगर आपकी वास्तविक कठिनाइयाँ अनसुलझी रह जाती हैं। आप महसूस करते हैं: मैंने यह किया है और अब समर्पित हो गया हूँ; फिर भी मैं इतना आश्वस्त क्यों महसूस नहीं करता? यह इसलिए क्योंकि आपके आचरण और कर्म आपके अच्छे इरादों पर आधारित हैं; वे परिश्रम से किए जाते हैं, परंतु आपने परमेश्वर की इच्छा के अनुसरण का प्रयास नहीं किया है और आपने सत्य की आवश्यकताओं के अनुसार चीजों को नहीं किया है। आप इतने से दूर हैं, जिसके परिणास्वरूप आप हमेशा परमेश्वर की आवश्यकताओं से दूर महसूस कर रहे हैं और यह कि आप आश्वस्त नहीं हैं और अनजाने में नकारात्मक हो जाते हैं। निजी इच्छाएँ और परिश्रम सत्य की आवश्यकताओं से बहुत अलग हैं; वे अपनी प्रकृति के संबंध में अलग हैं। लोगों के बाहरी कर्म सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं, और कार्य पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुसार नहीं किए जाते हैं; बल्कि सत्य ही ईश्वर की इच्छा की सही अभिव्यक्ति है। कुछ लोग जो सुसमाचार का प्रचार प्रसार करते हैं वे महसूस करते हैं कि वे निष्क्रिय नहीं हैं और वे आश्चर्य करते हैं: आप कैसे कह सकते हैं कि मैं सत्य को व्यवहार में नहीं लाता हूँ? अब मैं आपसे पूछता हूँ: आपके हृदय में कितना सत्य है? जब से आप सुसमाचार का प्रचार-प्रसार रहे हैं, तब से आपने सत्य के अनुसार कितने काम किए हैं? क्या आपका हृदय परमेश्वर की इच्छा को समझता है? आप यह भी नहीं कह सकते कि आप केवल काम कर रहे हैं या सत्य को व्यवहार में ला रहे हैं, क्योंकि आप परमेश्वर को संतुष्ट करने और परमेश्वर को खुश करने के लिए केवल अपने व्यवहार पर जोर दे रहे हैं, परंतु आप “परमेश्वर को संतुष्ट करने और सत्य को स्वीकार करने के लिए सभी कामों में परमेश्वर की इच्छा को तलाशने” में दृढ़ निश्चय के साथ परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान नहीं करते हैं। अगर आप कहते है कि आप सत्य को व्यवहार में ला रहे हैं, तो फिर इस दौरान आपके स्वभाव में कितना परिवर्तन हुआ है? ईश्वर के प्रति आपका प्रेम कितना अधिक बढ़ा? ये उपाय यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि आप सत्य को व्यवहार में ला रहे हैं या नहीं।