सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है

केवल सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति अपने स्वभाव में बदलाव ला सकता है : यह एक ऐसी बात है, जिसे लोगों को अच्छी तरह से जानना-बूझना चाहिए, और समझना चाहिए। अगर तुम्हें सत्य की पर्याप्त समझ नहीं है, तो तुम आसानी से फिसल जाओगे और मार्ग से भटक जाओगे। यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात की खोज करनी चाहिए कि सत्य के अनुरूप जीने के लिए किस तरह व्यवहार करना चाहिए, और इस बात का पता लगाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर क्या दोष मौजूद है, जो इसका उल्लंघन करता है; तुम्हें इन चीजों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि वह सत्य के अनुरूप है या नहीं और उसका कोई मूल्य और अर्थ है या नहीं। तुम वे काम कर सकते हो जो सत्य के अनुरूप हों, लेकिन तुम वो काम नहीं कर सकते जो सत्य के अनुरूप न हों। जहाँ तक उन चीजों का संबंध है, जिन्हें तुम कर भी सकते हो और नहीं भी कर सकते, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए। अन्यथा यदि तुम कुछ समय के लिए उन चीजों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें जल्दी से जाने दो। यह वह सिद्धांत है, जिसका अनुसरण तुम्हें अपने हर काम में करना चाहिए। कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं : सत्य की तलाश करना और उसे व्यवहार में लाना इतना ज्यादा मुश्किल क्यों है—मानो तुम धारा के विरुद्ध नाव खे रहे हो और अगर तुमने आगे की ओर नाव खेना बंद कर दिया, तो पीछे बह जाओगे? फिर भी, बुरी या निरर्थक चीजें करना वास्तव में बहुत आसान क्यों है—नाव को धारा के साथ खेने जितना आसान? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। शैतान की प्रकृति ने मनुष्यों के भीतर एक प्रमुख भूमिका ग्रहण कर ली है, और वह एक प्रतिरोधी शक्ति है। परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की प्रकृति वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसी चीजें आसानी से कर सकते हैं, जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती हैं, और सकारात्मक कार्य करना उनके लिए स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। यह पूरी तरह से मनुष्य के प्रकृति सार से तय होता है। जब तुम वास्तव में सत्य को समझ जाते हो और उसे अपने भीतर से प्यार करना शुरू कर देते हो, तो तुम उन चीजों को करना आसान पाओगे, जो सत्य के अनुरूप हैं। तुम सामान्य ढंग से अपना कर्तव्य निभाओगे और सत्य का अभ्यास करोगे—वह भी सहजता से और आनंद से, और तुम महसूस करोगे कि कोई नकारात्मक चीज करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सत्य ने तुम्हारे दिल में एक प्रमुख भूमिका ले ली है। अगर तुम वाकई मानव-जीवन का सत्य समझते हो, तो तुम्हारे पास अनुसरण के लिए एक मार्ग होगा कि तुम्हें किस तरह का व्यक्ति होना चाहिए, कैसे ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए जो निष्कपट और सत्यनिष्ठ हो, ऐसा व्यक्ति जो ईमानदार हो; साथ ही, तुम्हें ऐसा व्यक्ति कैसे बनना चाहिए जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उसकी सेवा करता हो। और एक बार जब तुम इन सत्यों को समझ जाओगे, तो तुम फिर कभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले बुरे कार्य करने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम कभी एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी की भूमिका निभाओगे। भले ही शैतान तुम्हें गुमराह करने की कोशिश करे या कोई बुरा व्यक्ति तुम्हें उकसाए, तुम बुराई नहीं करोगे या परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करोगे; चाहे कोई भी तुम्हें गुमराह करने या भड़काने की कोशिश करे, तुम बुराई नहीं करोगे। यदि लोग सत्य प्राप्त कर लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो वे बुराई से नफरत करने और नकारात्मक चीजों से घृणा महसूस करने में सक्षम हो जाएँगे और उनके लिए बुराई करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके जीवन-स्वभाव बदल गए हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

अगर अपने हृदय में तुम वास्तव में सत्य को समझते हो तो तुम जान लोगे कि सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना है और तुम स्वाभाविक रूप से सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू कर दोगे। अगर तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह उचित है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, तो पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा—ऐसी स्थिति में तुम्हारे परमेश्वर को धोखा देने की संभावना घटती जाएगी। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम न चाहते हुए भी यह करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकारी और दंभी स्वभाव होगा, तो तुम्हें परमेश्वर का प्रतिरोध न करने को कहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि तुम खुद को नियंत्रित नहीं कर पाओगे—यह तुम्हारे लिए अनैच्छिक होगा। तुम ऐसा जानबूझकर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे अनदेखा कर दोगे; वे तुम्हें खुद की बड़ाई करने की ओर ले जाएँगे और उनके कारण तुम हर मोड़ पर खुद का दिखावा करोगे; वे तुम्हें दूसरों को नीची नजर से देखने के लिए मजबूर करेंगे और तुम्हारे दिल में तुम्हें छोड़कर और किसी को नहीं रहने देंगे; वे तुम्हारे दिल से परमेश्वर का स्थान छीन लेंगे और अंततः तुम्हें परमेश्वर के स्थान पर बैठने और यह माँग करने के लिए मजबूर करेंगे कि लोग तुम्हारे प्रति समर्पण करें, वे तुमसे अपने ही विचारों, ख्यालों और धारणाओं को सत्य मानकर पूजा करवाएँगे। लोग अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन इतनी बुराई करते हैं! बुरे कर्म करने की समस्या के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति को सुधारना होगा। स्वभाव में बदलाव लाए बिना, इस समस्या का बुनियादी समाधान हासिल करना संभव नहीं होगा। जब तुम्हें परमेश्वर की कुछ समझ होगी, जब तुम अपनी भ्रष्टता को देख सकोगे, अहंकार और दंभ की कुरूपता और घिनौनेपन को पहचान सकोगे, तब तुम जुगुप्सा, घृणा और व्यथा को महसूस करोगे। तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सचेत होकर कुछ चीजें कर पाओगे और फिर तुम्हें सुकून महसूस होगा। तुम सचेत होकर परमेश्वर के वचन पढ़ने, उसका उत्कर्ष करने, परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होगे और अपने दिल में तुम खुशी महसूस करोगे। तुम सचेत होकर अपने आपको बेनकाब करोगे, अपनी खुद की कुरूपता को उजागर करोगे और ऐसा करके तुम अंदर से अच्छा महसूस करोगे और तुम्हारी मनोदशा बेहतर हो जाएगी। अपने स्वभाव में बदलाव लाने के प्रयास करने का पहला चरण परमेश्वर के वचनों को समझने का प्रयास करना और सत्य में प्रवेश करना है। सत्य को समझकर ही तुम चीजों का भेद पहचान सकते हो; चीजों का भेद पहचानने से ही तुम चीजों की असलियत देख सकते हो; चीजों की असलियत देखकर ही तुम खुद को सचमुच जान सकते हो; जब तुम खुद को सचमुच जान लोगे केवल तभी तुम देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो, सत्य को अभ्यास में ला सकते हो और धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो। इस तरह कदम-दर-कदम तुम परमेश्वर में अपने विश्वास के सही मार्ग पर चल पड़ोगे। यह इस पर निर्भर करता है कि सत्य का अनुसरण करने के प्रति व्यक्ति का संकल्प कैसा है। यदि किसी में वास्तव में संकल्प है तो छह महीने या एक साल के बाद वे सही रास्ते पर आने शुरू हो जाएँगे। तीन या पाँच वर्षों के भीतर, वे परिणाम देख लेंगे और महसूस करेंगे कि वे जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, और सत्य के अभ्यास पर कभी ध्यान नहीं देते, तो दस या बीस साल विश्वास करने पर भी उन्हें किसी बदलाव का अनुभव नहीं होगा। अंत में, यहाँ तक कि वे सोचेंगे कि यही परमेश्वर में आस्था रखना है; वे सोचेंगे कि यह बहुत हद तक वैसा ही है जैसे वे पहले धर्मनिरपेक्ष दुनिया में रहते थे, और जीवित रहना अर्थहीन है। यह वास्तव में दिखाता है कि सत्य के बिना जीवन खोखला है। वे कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन उनमें अभी भी सांत्वना की कमी होगी और वे अशांत महसूस करेंगे। यदि लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ जानकारी है, वे जानते हैं कि एक सार्थक जीवन कैसे जीना है, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कुछ चीजें कर सकते हैं, तो वे महसूस करेंगे कि यही वास्तविक जीवन है, केवल इसी तरह से जीने से उनके जीवन का अर्थ है, और केवल इसी तरह से जीने से लोग परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, उसे प्रतिफल दे सकते हैं और सहजता महसूस कर सकते हैं। यदि वे सजगतापूर्वक परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, अपने खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं और इस प्रकार परमेश्वर के इरादों के प्रति समर्पित और विचारशील हो सकते हैं—यदि वे इन सभी चीजों को सजगतापूर्वक करने में सक्षम हैं—तो वे सत्य को सटीक रूप से और सही मायनों में अभ्यास में लाने में सक्षम होंगे। यह पहले की तरह नहीं है, जब लोग केवल कल्पनाओं पर निर्भर रहते थे और विनियमों का पालन करते थे और सोचते थे कि यह सत्य का अभ्यास करना है। वास्तव में, सबसे ज्यादा थकाऊ है कल्पनाओं पर निर्भर रहना और विनियमों का पालन करना और सत्य की समझ के बिना और सिद्धांतों के बिना काम करना; और इससे भी ज्यादा थकाने वाला है बिना लक्ष्य के आँख मूँदकर काम करना। जब तुम सत्य समझ लेते हो, तो तुम किन्हीं भी लोगों, घटनाओं या चीजों से बाधित नहीं होगे। तुम सिद्धांतों के साथ और सुकून और आनंद के साथ काम करोगे। तुम्हें ऐसा नहीं लगेगा कि तुम बहुत अधिक प्रयास कर रहे हो, न ही तुम्हें लगेगा कि तुम बहुत अधिक कष्ट सह रहे हो। यदि तुम्हारी दशा इस प्रकार की है, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसमें सत्य और मानवता है और ऐसे व्यक्ति हो जिसका स्वभाव बदल गया है।

जीवन अनुभव की प्रक्रिया में, चाहे कुछ भी घटित हो जाए, तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार मामले पर गहराई से विचार करना चाहिए और यह जानना चाहिए कि कार्य करने का कौन-सा तरीका पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है; इस प्रकार तुम उन चीजों को एक तरफ रख सकोगे जो तुम्हारी अपनी इच्छा से आती हैं। एक बार जब तुम जान जाते हो कि परमेश्वर के इरादों के अनुसार कैसे कार्य करना है, तो तुम उसी तरह से काम करोगे—तुम्हें ऐसा लगेगा जैसे सब कुछ स्वाभाविक रूप से हो रहा है और बहुत तनावमुक्त और सुकून महसूस होगा। सत्य समझने वाले लोग इसी ढंग से काम करते हैं। तुम लोगों को दिखा सकोगे कि तुमने अपने कर्तव्य निर्वहन में सच में नतीजे हासिल किए हैं, तुम जिस तरह से काम करते हो उसमें सच में सिद्धांत होते हैं, तुम्हारा जीवन स्वभाव वास्तव में बदल गया है और तुमने परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए कई अच्छे काम किए हैं। यह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य समझता है और निश्चित रूप से उसमें मनुष्य की छवि है। यकीनन तुमने परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से यह प्रभाव हासिल किया होगा। जब कोई सही मायनों में सत्य समझ लेता है, तो वह अपनी विभिन्न दशाओं का भेद पहचानने में सक्षम होगा, वह जटिल मामलों को स्पष्ट रूप से देख पाएगा और यह जान जाएगा कि कैसे सही तरीके से अभ्यास करना है। यदि कोई व्यक्ति सत्य नहीं समझता और अपनी खुद की दशा का भेद नहीं पहचान सकता, तो भले ही वह खुद के खिलाफ विद्रोह करना चाहे, वह नहीं जानता कि किसके खिलाफ विद्रोह करना है या कैसे विद्रोह करना है; भले ही वह अपनी इच्छा को छोड़ना चाहे, वह नहीं जानता कि इसमें क्या गलत है, वह अभी भी यही सोचता है कि उसकी अपनी इच्छा सत्य के बहुत अधिक अनुरूप है और शायद वह अपनी इच्छा को पवित्र आत्मा का प्रबोधन भी मानता है। तो फिर ऐसा व्यक्ति अपनी इच्छा को कैसे छोड़ सकता है? वह निश्चित रूप से ऐसा नहीं कर पाएगा और वह देह के खिलाफ विद्रोह करे, इसका तो सवाल ही नहीं पैदा होता। इसलिए, जब तुम्हें सत्य की समझ नहीं होती, तो तुम अपनी इच्छा से आई चीजों को, मानवीय धारणाओं के अनुरूप चीजों को, और मानवीय दयालुता, प्रेम, पीड़ा और त्याग को आसानी से सही और सत्य के अनुसार समझने की गलती कर सकते हो। तो फिर तुम इन मानवीय चीजों से विद्रोह कैसे कर सकते हो? तुम्हें सत्य की समझ नहीं है, तुम नहीं जानते कि सत्य का अभ्यास करने का क्या अर्थ होता है। तुम पूरी तरह अंधेरे में हो और उलझन की दशा में हो, इसलिए तुम वही कर सकते हो जो तुम्हें अच्छा लगता है; नतीजतन तुम्हारे कुछ क्रियाकलापों में विकृति आ जाती है। तुम्हारे कुछ क्रियाकलाप विनियमों के अनुसार हैं, कुछ उत्साह से किए जाते हैं और कुछ ठीक शैतान की बाधाओं से आते हैं। जो लोग सत्य नहीं समझते, वे ऐसे ही होते हैं। जब वे काम करते हैं, तो वे या तो एक तरफ या दूसरी तरफ भटक जाते हैं, उनमें हमेशा भटकाव होता है और भले ही वे सिद्धांतों को समझना चाहें, वे जरा भी सटीक नहीं होते। जो लोग सत्य नहीं समझते, वे चीजों को गैर-विश्वासियों की तरह ही बेतुके ढंग से समझते हैं। वे सत्य का अभ्यास कैसे कर सकते हैं? समस्याओं का समाधान कैसे कर सकते हैं? सत्य समझना कोई सरल बात नहीं है। किसी की काबिलियत कम हो या ज्यादा, जीवन भर के अनुभव के बाद भी, उनमें सत्य की समझ सीमित होती है, और परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ भी सीमित ही होती है। जो लोग अपेक्षाकृत अनुभवी होते हैं वे कुछ सत्य समझते हैं, वे ज्यादातर ऐसे काम नहीं करते जो परमेश्वर के प्रतिरोधी हों और बिल्कुल बुरे काम नहीं करते। उनके लिए अपनी इच्छा की मिलावट के बिना कार्य करना असंभव है। चूँकि मनुष्यों की सोच सामान्य होती है और जरूरी नहीं कि उनके विचार हमेशा परमेश्वर के वचन के अनुरूप ही हों, तो उनकी अपनी इच्छा की मिलावट होना अपरिहार्य है। महत्वपूर्ण है उन सभी चीजों का भेद पहचानने की क्षमता होना जो अपनी इच्छा से आती हैं और परमेश्वर के वचन, सत्य और पवित्र आत्मा के प्रबोधन के विरुद्ध होती हैं। इसके लिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को समझने में मेहनत करनी पड़ेगी; जब तुम सत्य समझ लोगे, केवल तब ही तुममें विवेक होगा और तभी तुम यह सुनिश्चित कर पाओगे कि तुम बुरे कार्य नहीं करोगे।

अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करने में, तुम्हें स्वयं की समझ में एक निश्चित गहराई तक पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए, जिससे तुम उन शैतानी विषों का पता लगा सको जो तुम्हारी प्रकृति के भीतर बसी हैं। तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर की अवहेलना करने का क्या मतलब है, साथ-ही-साथ परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने का क्या अर्थ है, और तुम्हें यह सीखना चाहिए कि सभी मामलों में सत्य के अनुरूप आचरण कैसे करना है। तुम्हें परमेश्वर के इरादों और मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं के बारे में भी कुछ समझ प्राप्त करनी चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष जमीर और विवेक से युक्त होना चाहिए, तुम्हें डींगें नहीं हाँकनी चाहिए और परमेश्वर से धोखा नहीं करना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर का विरोध करने वाली बातें अब नहीं करनी चाहिए। इस तरह, तुमने अपना स्वभाव बदल लिया होगा। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं, उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है और वे जिन तरीकों से परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं, वे धीरे-धीरे कम हो जाते हैं। इसके अलावा, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में, उन्हें अब यह आवश्यकता नहीं होती कि दूसरे उनकी चिंता करें, और न ही पवित्र आत्मा को हमेशा उन पर अनुशासनात्मक कार्य करने की आवश्यकता होती है। वे मूल रूप से परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं, चीजों पर उनके विचार सत्य के अनुरूप होते हैं और उनके पास परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं होती है, न ही उसके प्रति कोई असंयमित इच्छा होती है। यह सब परमेश्वर से सुसंगत होने के बराबर है। मान लो कि कोई तुम्हें एक काम सौंपता है। तुम्हें इसकी आवश्यकता नहीं है कि कोई तुम्हारा प्रबंधन करे, तुम्हारी निगरानी करे। तुम परमेश्वर के वचन और प्रार्थना से ही यह काम पूरा कर सकते हो। इस कार्य के दौरान, तुम यह सुनिश्चित कर सकते हो कि तुम लापरवाह, अहंकारी या आत्मतुष्ट नहीं हो, तुम अंतिम निर्णय की माँग नहीं करते और यह कि तुम किसी और को बाधित नहीं करते। तुम प्रेम के साथ दूसरों की मदद करने में सक्षम हो, तुम आपूर्ति और लाभ प्राप्त करने में उनकी मदद करते हो और तुम परमेश्वर में विश्वास करने के सही मार्ग पर प्रवेश करने के लिए उनकी अगुआई कर सकते हो। इसके अलावा, इस कार्य के दौरान तुम रुतबे के लिए या अपने खुद के हितों की खातिर साजिश नहीं रचते; तुम रुतबे के फायदों में लिप्त नहीं होते; तुम अपने लिए नहीं बोलते; और चाहे कोई तुम्हारे साथ कैसा भी व्यवहार करे, तुम अपने प्रति उसके व्यवहार को सही ढंग से सँभालने में सक्षम हो। इसका मतलब है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास अपेक्षाकृत आध्यात्मिक कद है। यह आसान बात नहीं है कि कोई व्यक्ति कुछ कार्य अपने कंधे पर ले और परमेश्वर के चुने हुए लोगों को उसके वचनों की वास्तविकता में लेकर आए। सत्य वास्तविकता के बिना ऐसा नहीं किया जा सकता। ऐसे बहुत-से लोग हैं जो काम करने में अपनी खूबियों पर भरोसा करते हैं, जो पूरी तरह से विफल हो जाते हैं। जिनके पास सत्य नहीं होता है वे लोग बिल्कुल भी भरोसेमंद नहीं होते हैं, और अगर उन्होंने अपने स्वभाव नहीं बदले हैं, तो उन पर और भी भरोसा नहीं कर सकते। अभी तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना है? अगर कोई तुम्हारी खुशामद करता है, तो तुम्हें उसके साथ किस तरह से पेश आना चाहिए? अगर कोई तुम्हारे बारे में अलग राय रखता है या तुम्हें आलोचना की नजर से देखता है, तो तुम उसके साथ निष्पक्ष और उचित तरीके से कैसे पेश आओगे? क्या तुम अपनी भावनाओं पर निर्भर रहे बिना, पूरी तरह से परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार लोगों को बढ़ा और उन्हें चुन सकते हो? क्या तुम अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद के साथ ये चीजें करने में वाकई सक्षम हो? अगर किसी जगह पर कई सालों तक काम करने के बाद भी ज्यादातर लोग तुम्हारे बारे में अच्छा आकलन नहीं कर पाते हैं, तो इसका मतलब है कि तुम अपना कर्तव्य मानक के अनुरूप नहीं निभाते हो और तुम परमेश्वर के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त नहीं हो। अगर तुम जो कुछ भी करते हो उसे ज्यादातर लोग अच्छा और उचित होना मानते हैं, तो तुम मूलतः इस्तेमाल के लायक हो। अगर तुम्हारे पास सत्य नहीं है, तो तुम्हारे लिए उस अवस्था तक पहुँचना मुमकिन नहीं है जहाँ तुम परमेश्वर के इस्तेमाल के लिए उपयुक्त हो; उपयुक्त बनने के लिए तुम्हें सत्य हासिल करना ही चाहिए।

जीवन का अनुसरण करने में, तुम्‍हें दो बातों पर जरूर ध्‍यान देना चाहिए : पहली, परमेश्वर के वचनों के भीतर के सत्य को समझना; दूसरी, परमेश्वर के वचनों के भीतर स्‍वयं को समझना। ये दो बातें सबसे बुनियादी हैं। परमेश्वर के वचनों के बाहर कोई जीवन या सत्य नहीं है। अगर तुम परमेश्वर के वचन के भीतर सत्य नहीं खोजते हो, तो फिर तुम उसे खोजने कहाँ जा सकते हो? दुनिया में सत्य कहाँ है? क्या दुनिया भर के अखबार और मीडिया परमेश्वर के वचनों की रिपोर्ट करते हैं? क्या दुनिया भर के राजनीतिक दल परमेश्वर की गवाही देते हैं? क्या दुनिया के किसी भी देश में खुले तौर पर परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना साध्य कार्य है? बिल्कुल नहीं। यही वजह है कि दुनिया में कोई सत्य नहीं है, संसार में बस राक्षस, शैतान का राज है, और इसी वजह से दुनिया अँधेरी और बुरी है। ऐसी कौन-सी जगह है, जहाँ लेशमात्र भी सत्य मौजूद है? परमेश्वर के वचनों में सत्य समझने का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है : परमेश्वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, अपनी सच्ची समझ होना और उसके वचनों के भीतर मानव के अस्तित्‍व का अर्थ खोजना, और सत्य के अन्य पहलुओं को जानना। समस्‍त सत्य परमेश्वर के वचनों के भीतर ही है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जब तक कि परमेश्वर के वचनों के जरिए प्रवेश न किया जाए। केवल परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके और उनका अभ्यास करके ही तुम सत्य की समझ प्राप्त कर सकते हो, और सही मायनों में सत्य समझने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों को समझना। यह सबसे बुनियादी बात है। कुछ लोग कार्य और प्रचार करते हैं, लेकिन सतही तौर पर परमेश्वर के वचन पर सहभागिता करते नजर आने के बावजूद, वे उसके वचनों के मात्र शाब्दिक अर्थ पर चर्चा कर रहे होते हैं, जिसमें किसी भी बहुत महत्वपूर्ण चीज का उल्लेख नहीं किया जाता। उनके उपदेश किसी भाषाई पाठ्य-पुस्तक की शिक्षा की तरह होते हैं—एक-एक चीज और एक-एक पहलू को सिलसिलेवार तरीके से व्यवस्थित किया गया होता है, और जब वे बोल लेते हैं तो हर कोई उनका स्तुति-गान करता है और कहता है : “इस व्यक्ति के पास वास्तविकता है। इसने कितने अच्छे ढंग से और कितने विस्तार से उपदेश दिया।” ऐसे लोग उपदेश देने का काम पूरा करने के बाद, दूसरों से अपने उपदेशों को संकलित करके कलीसिया के भीतर भेज देने के लिए कहते हैं। ऐसा करते हुए वे दूसरों को गुमराह करने लगते हैं। वे अपने उपदेश में परमेश्वर के वचनों के उद्धरण देते हैं, और ऊपर से ऐसा दिखता है मानो उनके उपदेश सत्य के अनुरूप हैं, लेकिन वे चीजों को संदर्भ के बाहर लेकर जाते हैं और ऐसी अस्वाभाविक व्याख्या करते हैं जो सिद्धांतों के खिलाफ जाती है। अधिक सावधानीपूर्वक भेद पहचानने के साथ, तुम्हें पता चलेगा कि वे कुछ और नहीं बल्कि शब्द और धर्म-सिद्धांत हैं, मानवीय कल्पनाएँ और धारणाएँ हैं, साथ-ही-साथ ऐसे विचार हैं जो परमेश्वर के बारे में फैसला देते हैं। क्या इस तरह की संगति और उपदेश परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी पैदा करना नहीं है? यह ऐसी सेवा है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। एक विवेक युक्त इंसान को एक हद और सीमा के दायरे में रहकर बोलना चाहिए—उन्हें पता होना चाहिए कि उन्हें किस तरह के शब्द बोलने चाहिए, कौन-से शब्द उनके कर्तव्य निर्वहन से संबंधित हैं, और किस तरह के वचन केवल परमेश्वर द्वारा बोले जा सकते हैं। मनुष्य को परमेश्वर की जगह खड़े होकर बोलना नहीं चाहिए। कोई इसकी थाह नहीं पा सकता कि परमेश्वर कैसे काम करता है, तो फिर कोई परमेश्वर के बारे में फैसला कैसे दे सकता है? परमेश्वर के बारे में फैसला देने की योग्यता मनुष्य में नहीं है। कोई भी अनुचित काम करने से बचने के लिए इस बात को समझ लेना चाहिए। एक समझदार इंसान के रूप में, तुम्हें अपनी जगह पता होनी चाहिए, तुम्हें कहने के लिए सही बातें मालूम होनी चाहिए, और तुम्हें ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए जो तुम्हें नहीं कहना चाहिए। अगर परमेश्वर ने पहले तुमसे कुछ कहा भी हो, तब भी तुम्हें इसे दूसरों के सामने नहीं दोहराना चाहिए। अगर तुममें आस्था है, अगर तुम यह मानते हो कि परमेश्वर का वचन सत्य है, तो तुम्हें इस पर अमल करना चाहिए। इसके बारे में यूँ ही बात करने से कोई लाभ नहीं होता। क्या हमेशा ऐसी चाह रखना अहंकार नहीं कि दूसरे तुम्हारी ही बात सुनें, जो तुम कहो उसी को मानें? परमेश्वर के मामलों में, अगर तुम उन्हें नहीं समझते, तो बस तुम उन्हें नहीं समझते। उन्हें समझने या सब कुछ जानने का नाटक मत करो—यह बेहद घिनौना है! तुम हमेशा परमेश्वर की जगह खड़े होना और दिखावा करना चाहते हो, मानो तुम सब कुछ समझते हो, लोगों की नजरों में बने रहना चाहते हो। तुम यह या वह काम करते हुए परमेश्वर का झंडा लहराने की इच्छा भी रखते हो। क्या यह सामान्य इंसान का विवेक है? क्या यह सत्य पर अमल करना है? क्या तुम परमेश्वर के विचार जानते हो? क्या तुम्हारे पास परमेश्वर की बुद्धि है? लोग खुद ही सत्य नहीं समझते हैं—इससे युक्त होने की तो बात ही दूर रही। वे परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते, न ही वे परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते हैं। फिर भी वे परमेश्वर का झंडा लहराते हुए बोलना और काम करना चाहते हैं। सभी लोगों में यह महत्वाकांक्षा होती है, जो सबसे अधिक शर्मनाक और अनुचित बात है।

अब, दुनिया भर से लोग सच्चे मार्ग की खोज करने आ रहे हैं, तो तुम्हें परमेश्वर के लिए कैसे गवाही देनी चाहिए? अगर तुम्हारे पास कोई विवेक नहीं है, तुम अहंकारी, दंभी, मनमौजी हो और निरंकुश दौड़ते हो, तो क्या तुम परमेश्वर की अवहेलना कर उसका तिरस्कार नहीं कर रहे हो? यह अपना कर्तव्य निभाना नहीं है, और परमेश्वर के लिए गवाही देना तो और भी नहीं है। वास्तव में यह अपनी शैतानी छवि दिखाना है। जिन लोगों को सच में जीत लिया गया है उन्हें यह सीखना चाहिए कि ईमानदारी से कैसे बात करें या थोड़ी वास्तविक गवाही कैसे दें। अपने जीवन अनुभव को साझा करना किसी भी और चीज से बेहतर है। बड़े-बड़े सिद्धांत बघारना और उनकी बातें करना—इसका क्या काम है? बरसों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव करके भी लोगों का व्यवहार अभी तक सुधरा नहीं है। अपनी पहचान के आधार पर लोग परमेश्वर के लिए गवाही देने लायक नहीं हैं। विवेकहीन और अहंकारी लोग फिर भी परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहते हैं—क्या तुम परमेश्वर का अपमान और निंदा नहीं कर रहे हो? तुम परमेश्वर को नहीं समझते। इसके अलावा, तुम्हारा स्वभाव अभी भी परमेश्वर की अवहेलना करता है। क्या तुम्हारी गवाही में एक घृणास्पद स्वाद नहीं है? इसलिए, मनुष्य परमेश्वर के लिए गवाही देने लायक नहीं है। अगर कोई कहता है : “चीन की मुख्यभूमि में परमेश्वर के कार्य के बारे में क्या तुम हमें गवाही दे सकते हो?” और तुम कहते हो : “हमने बरसों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है, इसलिए मेरा मानना है कि हम परमेश्वर के लिए गवाही देने की योग्यता रखते हैं,” क्या यह एक समस्या नहीं है? एक बार फिर, यह अनुचित है। मनुष्य परमेश्वर के लिए गवाही देने लायक नहीं है। तुम्हें बस यह कहना चाहिए : “हम परमेश्वर के लिए गवाही देने के योग्य नहीं हैं। फिर भी परमेश्वर ने हमें बचाया और हम पर अनुग्रह किया है। हमें थोड़ा अनुग्रह हासिल हुआ है और हमने परमेश्वर के कुछ कार्य का अनुभव किया है। इसलिए हम संगति में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन हमें वाकई परमेश्वर के लिए गवाही देने वाला नहीं माना जा सकता। हम केवल अपने अनुभवों की बात कर सकते हैं।” अगर तुम इस बारे में संगति करो कि परमेश्वर ने तुम्हें कैसे जीता, उस समय तुमने किस तरह की भ्रष्टता प्रकट की थी, तुम कितने अहंकारी थे, तुम्हें जीत लिए जाने के बाद आखिर में किस तरह के परिणाम सामने आए, और तुमने किस तरह के संकल्प लिए। वास्तव में, परमेश्वर के लिए गवाही देने की खातिर असली अनुभवों की बातें करना परमेश्वर के इरादे के सबसे अधिक अनुरूप है, और यही परमेश्वर की अपेक्षा है। परमेश्वर की गवाही देने के लिए दम भरने की इच्छा करना भारी भूल है—तुम विवेकहीन भी हो और अहंकारी भी। तुम्हें यह कहना चाहिए : “मैं अपने कुछ अनुभवों की बात करूँगा, लेकिन मैं अभी भी परमेश्वर की गवाही देने में पीछे रह जाता हूँ। मैं पहले कुछ बातों पर संगति करूँगा। परमेश्वर ने चीन में देहधारण क्यों किया? तुम लोग शायद इस बात को नहीं समझते। हमने इसे परमेश्वर के कार्य से समझा है। हम चीनी, वहाँ पैदा हुए जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे बैठा है, हम एक गंदी जगह में बड़े हुए हैं। शैतान ने हमें सबसे अधिक गहराई तक भ्रष्ट किया है, हम सबसे अधिक झूठ बोलते हैं, हमारी मानवता सबसे कम है, हममें चरित्र सबसे निम्न है, मानवता जैसी चीज तो लेशमात्र भी नहीं है। अन्य सभी देशों और इलाकों में मौजूद परमेश्वर के चुने हुए लोगों की तुलना में हम सबसे निम्न हैं, हम सबसे अधिक गंदे और भ्रष्ट लोग हैं। यही वजह है कि हम परमेश्वर के लिए गवाही देने लायक नहीं हैं, फिर भी हम परमेश्वर के महान उद्धार में लाए गए हैं और हमने परमेश्वर का महान प्रेम प्राप्त किया है, इसलिए हमें अपनी व्यक्तिगत अनुभवजन्य गवाहियों की बात करनी चाहिए। हम परमेश्वर के अनुग्रह को दबा नहीं सकते।” इस तरह की बातें करना अधिक उचित है। परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाने के बाद, मनुष्यों में कम-से-कम इतना विवेक तो होना ही चाहिए कि वे बिल्कुल भी अहंकारपूर्वक बात न करें। उन्हें “जमीन पर पड़े गोबर” का स्थान लेना चाहिए और कुछ ऐसी बातें कहनी चाहिए जो वास्तविक और ईमानदार हों—यह सबसे अच्छा होगा। विशेष रूप से परमेश्वर की गवाही देते समय, यदि तुम सचमुच दिल से निकली कुछ बातें कह सको और कुछ वास्तविक और ईमानदार बातें कह सको, जिसमें कोई खोखली या बड़ी-बड़ी बातें न हों और कोई झूठ या धोखा न हो, तो तुम्हारा स्वभाव सचमुच थोड़ा बदल गया होगा; परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाने के बाद तुममें यही बदलाव आना चाहिए। अगर तुममें इतना भी विवेक नहीं हो सकता, तो तुम्हारे अंदर मनुष्य की छवि बिल्कुल भी नहीं है। भविष्य में जब सभी राष्ट्रों और क्षेत्रों में परमेश्वर के चुने गए लोग परमेश्वर के समक्ष लौट चुके होंगे, और उसके वचनों के जरिये जीत लिए गए होंगे, तब अगर परमेश्वर के गुणगान में किसी विशाल सभा में तुम फिर से अहंकारपूर्वक कार्य करने लगते हो, लगातार डींगें हाँकते हो और दिखावा करते हो, तो तुम्हें पूरी तरह से रद्दी में डालकर हटा दिया जाएगा। लोगों को हमेशा उचित तरीके से व्यवहार करना चाहिए, अपनी पहचान और रुतबे को स्पष्ट रूप से देखना चाहिए और अपने पुराने ढर्रे पर वापस नहीं लौटना चाहिए। मानव का अहंकार और दंभ शैतान की विशिष्ट छवि बनाते हैं। अपने इस पहलू को बदले बगैर, तुममें कभी भी मनुष्य की छवि नहीं हो सकती और हमेशा शैतान का चेहरा धारण किए रहोगे। अहंकार और दंभ का समाधान करना सबसे कठिन चीज है; और अपने अहंकार और दंभ का जरा-सा ज्ञान होने पर तुम पूर्ण परिवर्तन हासिल नहीं कर पाओगे; तुम्हें अभी भी शोधन से गुजरने के बहुत-से कष्ट सहने होंगे। न्याय, ताड़ना और काट-छाँट का सामना किए बिना, तुम लंबे समय में अभी भी खतरे में रहोगे और आसानी से अपने पुराने ढर्रे पर लौट जाओगे। भविष्य में, जब सभी राष्ट्रों और क्षेत्रों से परमेश्वर के चुने हुए लोग उसके कार्य को स्वीकार करेंगे और कहेंगे : “हमें बहुत पहले ही यह खुलासा कर दिया गया था कि परमेश्वर ने चीन में विजेताओं का एक समूह प्राप्त कर लिया है,” जब तुम लोग यह सुनोगे, तो तुम अपने मन में सोच सकते हो : “हमारे पास शेखी बघारने के लिए कुछ नहीं है, सब कुछ परमेश्वर के अनुग्रह से दिया गया है। हम विजेता कहलाने के लायक नहीं हैं।” लेकिन समय के साथ, जब तुम खुद को कुछ अनुभवजन्य समझ साझा करने में सक्षम देखना शुरू करते हो और तुम देखते हो कि तुम्हारे पास थोड़ी वास्तविकता है, तो तुम गहराई से विचार करोगे : “यहाँ तक कि अन्य देशों के लोगों को भी पवित्र आत्मा से प्रकाशन प्राप्त हुए हैं और वे कहते हैं कि परमेश्वर ने चीन में विजेताओं का एक समूह बनाया है, इसलिए यह हमें विजेता बनाता है।” तुम अपने दिलों में मौन रूप से इससे सहमत होगे और इसे स्वीकार करोगे और फिर बाद में तुम बिना किसी संकोच के बढ़ोगे और सार्वजनिक रूप से इसे स्वीकार करोगे। प्रशंसा का सामना करने पर मनुष्य के पाँव जमीन पर नहीं रहते; रुतबे की परीक्षा में डाले जाने पर वे झुक जाते हैं। यदि हमेशा तुम्हारी प्रशंसा की जाती है, तो तुम बड़े खतरे में हो; तुम्हारे विफल होने और गिरने की संभावना है। जिन लोगों का स्वभाव नहीं बदला है, वे आखिर में अडिग नहीं रह सकते।

भ्रष्ट मानवजाति के लिए समाधान करने वाली सबसे कठिन समस्या है अपने पुराने ढर्रे पर लौट जाना। इसे रोकने के लिए लोगों को पहले इससे अवगत होना चाहिए कि उन्होंने अभी तक सत्य प्राप्त नहीं किया है, उनके जीवन-स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है, और यह कि भले ही वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, पर वे अभी भी शैतान की सत्ता में रह रहे हैं, और उन्हें बचाया नहीं गया है; वे किसी भी समय परमेश्वर से विश्वासघात कर सकते हैं और उसे छोड़ सकते हैं। यदि उनके हृदय में संकट का यह भाव हो—यदि, जैसा कि लोग अक्सर कहते हैं, वे शांति के समय खतरे के लिए तैयार रहें—तो वे कुछ हद तक अपने आपको काबू में रख पाएँगे, और अगर उनके साथ कुछ घटित हो भी जाए, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना करेंगे और उस पर निर्भर रहेंगे, और अपने पुराने ढर्रे में लौट जाने से बच पाएँगे। तुम्हें स्पष्ट देखना चाहिए कि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदला है, परमेश्वर से विश्वासघात करने की प्रकृति अभी भी तुममें गहराई तक जड़ें जमाए हुए है और वह निकाली नहीं गई है, तुम अब भी परमेश्वर को धोखा देने के जोखिम में हो, और तुम्हारे बरबादी की ओर जाने और नष्ट किए जाने की संभावना निरंतर बनी हुई है। यह वास्तविक है; इसलिए तुम लोगों को सावधान रहना चाहिए। तीन सबसे महत्वपूर्ण बातें हैं, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए : पहली, तुम अभी भी परमेश्वर को नहीं जानते; दूसरी, तुम्हारे स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया है; और तीसरी, तुमने अभी तक सच्चे मनुष्य की छवि को नहीं जिया है। ये तीनों चीजें तथ्यों के अनुरूप हैं, ये वास्तविक हैं, और तुम्हें इनके बारे में स्पष्ट होना चाहिए। एक व्यक्ति के रूप में तुम्हें आत्म-जागरूक होना चाहिए। यदि तुममें सचमुच देह के खिलाफ विद्रोह करने और दोबारा अपने पुराने ढर्रे पर नहीं लौटने का संकल्प है, तो तुम्हें अपना नीति-वाक्य चुनना चाहिए : उदाहरण के लिए, “मैं जमीन पर पड़ा गोबर हूँ,” या “मैं प्रकृति से दानव हूँ,” या “मैं अक्सर पुराने ढर्रे पर चल पड़ता हूँ,” या “मैं हमेशा बड़े खतरे में हूँ।” इनमें से कोई भी तुम्हारा व्यक्तिगत नीति-वाक्य बनने के लिए उपयुक्त है, और यदि तुम जब कभी भी इसकी जरूरत होने पर इसे याद करोगे, तो यह तुम्हारी मदद करेगा। इसे कुछ और बार मन में दोहराते रहो, आत्म-चिंतन करो, और तुम कम गलतियाँ करोगे या गलतियाँ करना बंद कर दोगे। बहरहाल, सबसे महत्वपूर्ण बात है परमेश्वर के और अधिक वचन पढ़ना, सत्य को समझना, अपनी प्रकृति को जानना और अपने भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकना। तभी तुम सुरक्षित रहोगे। दूसरी चीज यह है कि कभी भी “परमेश्वर के गवाह” का स्थान न लो और कभी खुद को परमेश्वर के गवाह मत कहो। तुम केवल निजी अनुभव के बारे में बात कर सकते हो। तुम इस बारे में बात कर सकते हो कि परमेश्वर ने तुम लोगों को कैसे बचाया, इस बारे में संगति कर सकते हो कि परमेश्वर ने तुम लोगों को कैसे जीता, और यह बता सकते हो कि उसने तुम लोगों पर कौन-सा अनुग्रह किया। यह कभी मत भूलो कि तुम लोग सबसे अधिक भ्रष्ट हो, तुम गोबर और कचरा हो और यह कि अब तुम अंत के दिनों का परमेश्वर का कार्य स्वीकार कर पा रहे हो, तो यह पूरी तरह से इसलिए है क्योंकि उसके द्वारा तुम्हें ऊँचा उठाया गया है। इसकी वजह केवल यही है कि तुम लोग सबसे भ्रष्ट और सबसे गंदे हो, इसलिए तुम्हें देहधारी परमेश्वर ने बचाया है, और उसने तुम पर इतना बड़ा अनुग्रह किया है। इसलिए तुम लोगों में शेखी बघारने के लिए कुछ भी नहीं है; तुम केवल परमेश्वर के उद्धार के लिए उसे धन्यवाद दे सकते हो। परमेश्वर के अनुग्रह को मत भूलो। तुम लोगों का उद्धार विशुद्ध रूप से परमेश्वर के अनुग्रह के कारण हुआ है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि तुम लोग सबसे अधिक भाग्यशाली हो? तुम सबसे भाग्यशाली इसलिए नहीं हो क्योंकि तुम्हारे पास कुछ विशेष खूबियाँ हैं या अच्छे गुण हैं—तुम लोग केवल इसलिए भाग्यशाली हो क्योंकि तुम्हारा जन्म चीन में हुआ है, तुम शैतान द्वारा सबसे अधिक भ्रष्ट किए गए हो और तुम सबसे अधिक घिनौने लोग हो। परमेश्वर ने अपनी प्रबंधन योजना के अनुसार, पहले उस देश में, जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे बैठा है, सबसे अधिक घिनौने और सर्वाधिक भ्रष्ट मनुष्यों को बचाया; पहले मॉडलों या नमूनों का एक समूह बनाया। यही वजह है कि उसने तुम सबको चुना है; तुम सब वे लोग हो जिन्हें परमेश्वर ने पूर्व-नियत किया और चुना था। अगर परमेश्वर ने यह योजना नहीं बनाई होती, तो तुम लोग हमेशा के लिए नरक का दुःख भोगते। इसलिए, मैं कहता हूँ कि तुम लोग सबसे अधिक भाग्यशाली हो। बहरहाल, तुम लोगों के लिए गर्व करने वाली कोई बात नहीं है और तुम लोग यकीनन शेखी नहीं बघार सकते।

परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव करना तुम्हारे लिए उन्नति और सच्चे अनुभव लाता है—इसलिए तुम्हें परमेश्वर की गवाही देनी चाहिए। परमेश्वर की गवाही देते समय तुम्हें मुख्य रूप से इस बारे में बात करनी चाहिए कि परमेश्वर किस तरह लोगों का न्याय करता है और कैसे उन्हें ताड़ना देता है और वह लोगों का शोधन करने और उनके स्वभाव बदलने के लिए किन परीक्षणों का उपयोग करता है। तुम्हें इस बारे में भी बात करनी चाहिए कि तुमने अपने अनुभवों में कितनी भ्रष्टता प्रकट की, तुमने परमेश्वर के बारे में कितनी धारणाएँ विकसित कीं और परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए तुमने क्या-क्या चीजें कीं; साथ ही, तुम आखिरकार परमेश्वर द्वारा कैसे जीते गए, तुमने परमेश्वर के कार्य का क्या वास्तविक ज्ञान हासिल कर लिया है और तुम्हें परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करने के लिए कैसे उसकी गवाही देनी चाहिए। तुम लोगों को सरल शब्दों में बोलते हुए इन शब्दों में ठोस तत्व डालना चाहिए। खोखले सिद्धांतों के बारे में बातें मत करो। कुछ वास्तविक कहो, कुछ ऐसा जो दिल से निकला हो। केवल इस तरीके से परमेश्वर के लिए गवाही देना ही सही है। दिखावा करने के प्रयास में गहन लगने वाले, खोखले सिद्धांत मत तैयार करो; ऐसा करने से तुम काफी घमंडी और विवेकहीन दिखोगे। तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव से असली चीजों के बारे में ज्यादा बोलना चाहिए और दिल से अधिक बोलना चाहिए; यह दूसरों के लिए सबसे अधिक लाभकारी होता है और उन्हें यह सबसे उपयुक्त भी लगता है। तुम ऐसे लोग हुआ करते थे जो परमेश्वर का सबसे अधिक प्रतिरोध करते थे, जो उसके प्रति समर्पण करने के लिए सबसे कम प्रवृत्त होते थे, लेकिन अब तुम जीत लिए गए हो—इस बात को कभी मत भूलो। इन बातों पर तुम्हें और अधिक चिंतन और विचार करना चाहिए। एक बार जब लोग इसे साफ तौर पर समझ जाएँगे तो वे जान जाएँगे कि गवाही कैसे देनी है; अन्यथा वे ऐसे शर्मनाक कृत्य करने लगेंगे जिनमें कोई विवेक नहीं होगा, जो कि परमेश्वर के लिए गवाही देना नहीं, बल्कि उसे शर्मिंदा करना है। सच्चे अनुभवों और सत्य की समझ के बिना, परमेश्वर के लिए गवाही देना संभव नहीं है; परमेश्वर में जिन लोगों का विश्वास भ्रमित और उलझन भरा होता है, वे कभी भी परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते।

बसंत ऋतु 1999

पिछला: मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

अगला: सही मार्ग चुनना परमेश्वर में विश्‍वास का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें