591 परमेश्वर के भवन में अपनी निष्ठा अर्पित करो

I

तलाश में रहती हैं अ‍पने शिकार की सदा,

हर तरह की दुष्ट आत्मायें धरती पर,

रहती हैं आरामगाह की खोज में –

इंसानों को निगल जाने की फ़िराक में।

पहले जैसा बर्ताव न करना,

किसी भी हालत में,

परमेश्वर के सामने कुछ करना

और उसकी पीठ पीछे कुछ और करना।

यही बर्ताव रखा अगर,

तो पा न सकोगे छुटकारा कभी।

क्या कितनी ही बार परमेश्वर ने कहे नहीं हैं

तुमसे ऐसे वचन?

परमेश्वर-जन!

रहोगे उसकी देखभाल और सुरक्षा में तुम।

आवारा या लापरवाह न बनो तुम!

परमेश्वर-जन!

उसके घर में अर्पित करो अपनी वफ़ादारी तुम।

हैवान की धूर्तता को अपनी वफ़ादारी से ही

नकार सकते हो तुम।


II

चूँकि इंसानी प्रकृति सुधरती नहीं है,

तुम लोगों की ख़ातिर ही इसे याद दिलाया है

परमेश्वर ने बार-बार।

सुनिश्चित करने नियति तुम्हारी,

ये सब कहता है परमेश्वर बार-बार।

चाहिये शैतान को बस –

गन्दी और दूषित जगह एक।

छुटकारे के अवसर जितने कम होंगे,

उतने ही ज़्यादा तुम लम्पट बनोगे,

संयम जितना कम होगा तुम्हारा,

मैली रूहें उतनी ही हमला करेंगी तुम पर।

फँस गये इन हालात में अगर एक बार तुम,

तो खोखली बात बन जायेगी वफ़ादारी तुम्हारी,

खा जायेंगे हैवान संकल्प तुम्हारा,

बदल जायेगा नाफ़रमानी और शैतान की

चालबाज़ी में संकल्प तुम्हारा।

तुम डालोगे रुकावट परमेश्वर के काम में,

देगा मौत की सज़ा तुम्हें वो।

संगीन हैं हालात फिर भी,

सचमुच परवाह नहीं है किसी को।

परमेश्वर-जन!

रहोगे उसकी देखभाल और सुरक्षा में तुम।

आवारा या लापरवाह न बनो तुम!

परमेश्वर-जन!

उसके घर में अर्पित करो अपनी वफ़ादारी तुम।

हैवान की धूर्तता को अपनी वफ़ादारी से ही

नकार सकते हो तुम।


III

क्या हुआ था याद नहीं रखेगा परमेश्वर,

मगर क्या तुम उसकी प्रतीक्षा करोगे,

तुम्हारे प्रति वो दयालु हो जाये,

अगली बार फिर तुम्हें माफ़ी मिल जाये?

इंसान बहुत बार परमेश्वर का विरोधी हुआ है,

मगर रखता नहीं अपने दिल में कुछ भी वो,

क्योंकि कद इंसान का सचमुच छोटा बहुत है,

इसलिये इंसान से परमेश्वर को ज़्यादा अपेक्षा नहीं है।

इंसान से परमेश्वर बस यही उम्मीद करता है,

संयम बरते और न बनाये आवारा ख़ुद को।

क्या इतना आज्ञापालन भी तुम लोगों के

लिये मुमकिन नहीं है?

परमेश्वर-जन!

रहोगे उसकी देखभाल और सुरक्षा में तुम।

आवारा या लापरवाह न बनो तुम!

परमेश्वर-जन!

उसके घर में अर्पित करो अपनी वफ़ादारी तुम।

हैवान की धूर्तता को अपनी वफ़ादारी से ही

नकार सकते हो तुम।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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