667 मनुष्य परमेश्वर के अच्छे इरादों को नहीं समझ पाता है

1 लोग प्रायः परमेश्वर द्वारा परीक्षाओं के बारे में चिंता करते हैं और भयभीत होते हैं, फिर भी हर समय वे शैतान के फंदे में जीवन बिताते रहते हैं, और उस ख़तरनाक इलाके में जीवन जीते रहते हैं जिसमें उन पर शैतान के द्वारा आक्रमण और उनका शोषण किया जाता है—मगर वे भय को नहीं जानते हैं, और अविचलित रहते हैं। क्या चल रहा है? परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास केवल उन चीज़ों तक ही सीमित रहता है जिन्हें वह देख सकता है। उसे मनुष्य के लिए परमेश्वर के प्रेम और चिंता की, या मनुष्य के प्रति उसकी सहृदयता और सोच-विचार की जरा सी भी समझ नहीं है। बल्कि उसमें परमेश्वर द्वारा परीक्षाओं, न्याय और ताड़ना, तथा प्रताप और कोप के बारे में थोड़ी सी घबराहट के अलावा, मनुष्य के पास परमेश्वर के भले इरादों की जरा सी भी समझ नहीं है।

2 परीक्षाओं का उल्लेख होने पर, लोगों को लगता है मानो कि परमेश्वर के पास छिपे हुए इरादे हैं, और कुछ तो, इस बात से अनभिज्ञ कि परमेश्वर वास्तव में उनके साथ क्या करेगा, यहाँ तक विश्वास करते हैं कि परमेश्वर दुष्ट मंसूबों को आश्रय देता है; इस प्रकार, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति आज्ञाकारिता के बारे में चीखने-चिल्लाने के साथ-साथ, वे मनुष्य के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता और मनुष्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को रोकने और उनका विरोध करने के लिए जो कुछ कर सकते हैं करते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि यदि वे सतर्क नहीं हुए तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा गुमराह कर दिया जाएगा, यह कि यदि वे अपने भाग्य पर पकड़ नहीं बनाए रखते हैं तो जो कुछ भी उनके पास है वह परमेश्वर के द्वारा लिया जा सकता है, और उनके जीवन को भी समाप्त किया जा सकता है।

3 मनुष्य शैतान के खेमे में है, परन्तु वह शैतान के द्वारा दुर्व्यवहार किए जाने के बारे में कभी चिंता नहीं करता है, और शैतान के द्वारा उसके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है परन्तु वह शैतान के द्वारा बन्दी बनाए जाने की कभी चिंता नहीं करता है। वह कहता रहता है कि वह परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करता है, मगर उसने परमेश्वर में कभी भरोसा नहीं किया है या यह विश्वास नहीं किया है कि परमेश्वर सचमुच में मनुष्य को शैतान के पंजों से बचाएगा। यदि, अय्यूब के समान, मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में समर्थ है, और अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को परमेश्वर के हाथों में सौंप सकता है, तो क्या मनुष्य का अंत अय्यूब के समान ही नहीं होगा—परमेश्वर के आशीषों की प्राप्ति? यदि मनुष्य परमेश्वर के शासन को स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ है, तो वहाँ खोने के लिए क्या है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से रूपांतरित

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