297 इंसान वो नहीं रहा जैसा परमेश्वर चाहता है

हज़ारों बरस लगे हैं इंसान को

वहाँ पहुँचने में जहाँ वो आज है।

बहुत पहले मगर पतन हो चुका है उस इंसान का,

मूल रूप से जैसा परमेश्वर ने उसे बनाया था।


I

परमेश्वर के अस्तित्व में भरोसा नहीं इंसान को,

न स्वागत करता वो उसके आगमन का।

बेमन से मानता है वो उसके अनुरोध को,

साझा नहीं करता उससे ज़िंदगी के ग़म और ख़ुशियों को सच में।

चूँकि अगम्य मानते हैं लोग परमेश्वर को,

मजबूरन मुस्कराते हैं देखकर उसे,

ख़ुशामदी रवैया अपनाते हैं उसके लिये,

क्योंकि लोग न परमेश्वर के काम को जानते हैं न उसकी इच्छा को।

मानवता नहीं वो जो चाहता है परमेश्वर।

"मानवता" शब्द का हकदार नहीं इंसान।

ऐसा नीच है इंसान जिसे बंदी बनाए हुए है शैतान,

चलती-फिरती लाश है वो जिसमें रहता है शैतान।


II

ईमानदारी से कहेगा परमेश्वर, वक्त आने पर,

आराधना करता है जो उसकी,

"उससे कम तकलीफ़ें उठाएगा वो

जितनी तकलीफ़ें उठानी पड़ेंगी तुम लोगों को।"

चूँकि अय्यूब या फ़रीसियों से आस्था कम है तुम्हारी,

इसलिये, जब आग का दिन आएगा,

भयानक होंगे कष्ट तुम्हारे उन फ़रीसियों, अगुवाओं से ज़्यादा,

विरोध किया था मूसा का जिन्होंने और,

तबाही के वक्त सदोम से भी ज़्यादा।

मानवता नहीं वो जो चाहता है परमेश्वर।

"मानवता" शब्द का हकदार नहीं इंसान।

ऐसा नीच है इंसान जिसे बंदी बनाए हुए है शैतान,

चलती-फिरती लाश है वो जिसमें रहता है शैतान।

मानवता नहीं वो जो चाहता है परमेश्वर।

"मानवता" शब्द का हकदार नहीं इंसान।

ऐसा नीच है इंसान जिसे बंदी बनाए हुए है शैतान,

चलती-फिरती लाश है वो जिसमें रहता है शैतान।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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