67. थोड़ी इंसानियत के साथ जीना यकीनन बढ़िया होता है

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "अपनी 6000-वर्षीय प्रबंधन योजना के समापन से पहले—इससे पहले कि वे मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी का अंत स्पष्ट करें—पृथ्वी पर परमेश्वर का कार्य उद्धार के लिए है, यह सब उन लोगों को पूरी तरह से पूर्ण बनाने, और उन्हें अपने प्रभुत्व के प्रति समर्पण में लाने के उद्देश्य है जो उसे प्रेम करते हैं। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर लोगों को कैसे बचाता है, यह सब उन्हें उनके पुराने शैतानी स्वभाव से अलग करके किया जाता है; अर्थात्, वह उनसे जीवन की तलाश करवाने के द्वारा उन्हें बचाता है। यदि वे जीवन की तलाश नहीं करते हैं, तो उनके पास परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने का कोई रास्ता नहीं होगा। ... अतीत में, उद्धार का उसका साधन परम प्रेम और करुणा दिखाना रहा था, इतनी कि उसने संपूर्ण मानवजाति के बदले में अपना सर्वस्व शैतान को दे दिया। आज अतीत के जैसा कुछ नहीं है: आज, तुम लोगों का उद्धार, स्वभाव के अनुसार प्रत्येक के वर्गीकरण के दौरान, अंतिम दिनों के समय में होता है; तुम लोगों के उद्धार का साधन प्रेम या करुणा नहीं है, बल्कि ताड़ना और न्याय है ताकि मनुष्य को अधिक अच्छी तरह बचाया जा सके। इस प्रकार, तुम लोगों को जो भी प्राप्त होता है वह ताड़ना, न्याय और निष्ठुर मार है, लेकिन जान लें कि इस निर्दय मार में थोड़ा सा भी दण्ड नहीं है, जान लें कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरे वचन कितने कठोर हैं, तुम लोगों पर जो पड़ता है वह कुछ वचन ही है जो तुम लोगों को अत्यंत निर्दय प्रतीत होता है, और जान लें, कि इस बात की परवाह किए बिना कि मेरा क्रोध कितना अधिक है, तुम लोगों पर जो पड़ता है वे फिर भी शिक्षण के वचन हैं, और तुम लोगों को नुकसान पहुँचाना, या तुम लोगों को मार डालना मेरा आशय नहीं है। क्या यह सब सत्य नहीं है? जान लें कि आज, चाहे वह धर्मी न्याय हो या निष्ठुर शुद्धिकरण, सभी उद्धार के लिए है। इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे आज स्वभाव के अनुसार प्रत्येक का वर्गीकरण है, या मनुष्य की श्रेणियाँ सामने लायी गई हैं, परमेश्वर के सभी कथन और कार्य उन लोगों को बचाने के लिए हैं जो परमेश्वर से प्यार करते हैं। धर्मी न्याय मनुष्य को शुद्ध करने के उद्देश्य से है, निर्दय शुद्धिकरण मनुष्य का परिमार्जन करने के उद्देश्य से है, कठोर वचन या ताड़ना सब शुद्ध करने के उद्देश्य से और उद्धार के लिए हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को हैसियत के आशीषों को अलग रखना चाहिए और मनुष्य के उद्धार के लिए परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए')।

पिछले साल कलीसिया एक फ़िल्म बनाने की तैयारी कर रही थी, तो भाई-बहनों ने निर्देशक का काम मुझे सौंपने की सिफारिश की। यह सुन कर मैं रोमांचित हो गयी और मुझे लगा कि उन्होंने मेरी सिफारिश की है, तो ज़रूर उन्होंने मेरी क्षमता और प्रतिभा को देखा होगा। वरना वे मेरा चुनाव क्यों करते? यह सोच कर कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ, मैं खुद को ऊंचा समझने लगी। फ़िल्म बनाने के तरीके सीखने के लिए मैंने कड़ी मेहनत की, और धीरे-धीरे उस हुनर के कुछ हिस्सों पर मेरी पकड़ मज़बूत हो गयी। मुझे याद है, जब पहली बार मैंने वो काम शुरू किया था, तो मुझे थोड़ी घबराहट हुई थी, मगर परमेश्वर से निरंतर प्रार्थना करने के बाद धीरे-धीरे मेरा मन शांत हो गया, और मैं काम शुरू कर सकी। और फिर, भाई-बहनों ने मेरी योजनाओं को अपनाना शुरू कर दिया। ख़ास तौर से अपने निर्देशन वाले पहले दृश्य का, जो फिल्मांकन मैंने किया था, उसे सबने पसंद किया और अगुआ ने कहा कि मैं एक निर्देशक बनने के काबिल हूँ। मेरे दिल में गर्व की लहरें उफन रही थीं, मुझे लगा मैं इस काम में बहुत अच्छी हूँ और मैं परमेश्वर के घर में एक ज़रूरी प्रतिभा हूँ। मुझे लगने लगा जैसे मेरे सिर पर कोई मुकुट रखा है, और मैं हर तरफ सिर ऊंचा कर के चलने लगी। मुझे लगा कि काम शुरू करते ही ऐसी शानदार तारीफ़ इसलिए हो रही है क्योंकि मैं वाकई सक्षम हूँ, और थोड़ा ज़्यादा अभ्यास करके, मैं यकीनन बहुत काबिल हो जाऊंगी। उसके बाद से भाई-बहनों के साथ काम करते समय, मैं पहले की तरह संकोची नहीं रहती थी, बल्कि आत्मविश्वास के साथ बात करती, और अपना सिर ऊंचा किये रहती। मैं यह भी चाहती थी कि हर चीज़ में मेरा ही फैसला अंतिम हो, किसी दूसरे को मैं कुछ नहीं समझती थी। जैसे ही कोई मेरी योजना पर सवाल उठाता या कोई दूसरा सुझाव देता, मैं नहीं मानती थी, अधीर हो जाती थी और उन्हें नीची नज़र से देखती थी। मुझे लगता मैं हर मामले में उनसे आगे हूँ, उन्हें बिना किसी हंगामे के मेरा कहा मानना चाहिए। मेरी नज़र में, वे सिर्फ छोटी-मोटी बातें उठा रहे थे, जो चर्चा के योग्य ही नहीं थीं। तो मैं उनको चुप कराने के लिए हमेशा पूछती, "क्या यह सिद्धांत का सवाल है?" एक बार, मुख्य पात्र बहन झांग ने वो पोशाकें मुझे दिखायीं जो उसने पसंद की थीं। मैंने सोचा, "तुम्हारी पसंद इतनी ख़राब क्यों है?" मैंने उससे जबरन सारी नयी पोशाकें पसंद करवायीं। मैंने उसकी पसंद की बहुत-सी पोशाकों को नामंज़ूर कर दिया। मेरे मन में यह विचार समाया हुआ था कि निर्देशक मैं हूँ, तो मेरी समझ ही सही है और इन सबको मेरी बात सुननी चाहिए। भाई-बहन मेरे कारण बेबस महसूस करने लगे और अब उनमें कोई सुझाव देने की इच्छा नहीं थी। यह देख कर मुझे वाकई बुरा लगा, लेकिन फिर मैंने सोचा, मुझे हमारे काम का ही ख्याल है, और मैं इस बारे में बहुत अलग-थलग नहीं रह सकती। इसलिए, मैंने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उस दौरान मेरे अगुआ ने मुझसे सहभागिता की और मुझे यह कह कर उजागर किया कि मैं बहुत घमंडी हूँ और लोगों पर काबू करना चाहती हूँ, उन्होंने मुझसे दूसरों पर नज़रें गड़ाने के बजाय खुद पर गौर करने और अपनी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए सत्य का अभ्यास करने को कहा। लेकिन तब मुझे अपनी खुद की प्रकृति की कोई समझ नहीं थी। मुझे लगा मैं अपने काम में सचमुच ज़िम्मेदार हूँ। मैं बस वैसी ही विद्रोही, ज़िद्दी बनी जीती रही, मैं अब भाई-बहनों के साथ ठीक से काम नहीं कर पा रही थी। समय के साथ, हमारे काम में समस्याएँ सिर उठाती रहीं, जिनसे हमारी तरक्की में रुकावट पैदा हुई।

एक दिन, मैंने एक ऐसे निर्देशक के बारे में सुना जिसे घमंडी होने, सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ होने, और भाई-बहनों को बेबस करने के कारण निकाल दिया गया था। इससे मेरे मन में थोड़ा डर पैदा हो गया। मुझे पता था कि मैं ठीक उस निर्देशक जैसा बर्ताव कर रही थी। मैंने अंदाज़ा लगाया कि परमेश्वर मुझे चेतावनी दे रहे हैं, इसलिए मैंने फैसला किया कि अब मैं पहले की तरह रोब नहीं जमा सकती। इसके बजाय मुझे खुद को काबू में रखना होगा, ज़्यादा विनम्रता से बोलना होगा, और दूसरों को काम के बारे में अच्छे ढंग से बता कर उनसे चर्चा करनी होगी। लेकिन मुझे अभी भी अपनी खुद की प्रकृति के बारे में कोई समझ नहीं थी, इसलिए मैं इसे सुलझाने के लिए सत्य को नहीं खोज रही थी।

कुछ समय बाद, हमारी टीम की तरक्की बहुत धीमी होने के कारण, अगुआ ने मेरे साथ काम करने के लिए बहन लियू की व्यवस्था की। पहले–पहल मैं इसे मंज़ूर ही नहीं कर पायी। मैंने सोचा कि अगुआ को ज़रूर मेरी काबिलियत पर शक है, लेकिन चूंकि इसकी व्यवस्था की जा चुकी थी, इसलिए इच्छा न होने पर भी मैंने मान लिया। उसके बाद से काम की चर्चाओं के दौरान, मैंने पाया कि अगुआ हमेशा बहन लियू की सलाह लिया करते थे। इस बात पर मैं वाकई बेचैन थी और मुझे लगा कि अगुआ मेरे बारे में ऊंची राय नहीं रखते। मुझे बहन लियू से चिढ़ हो गयी। बल्कि इससे भी ज़्यादा, मेरे मन में बहन लियू के प्रति विरोध था। मैं उसे मंज़ूर नहीं कर पा रही थी। इसलिए जब कभी हम अपने काम की चर्चा करते, मैं तेवर चढ़ाये वहां चुपचाप बैठी रहती। एक बार, उसने टीम के काम में कुछ समस्याएं देखीं और फिर सुझाव दिये जिन्हें हमारे सब भाई-बहनों ने सचमुच पसंद किया, मगर मुझे एक भी सुझाव मंज़ूर नहीं था। मैंने उसके एक भी सुझाव को सुनने से मना कर दिया। जब सब लोगों ने मेरी राय जाननी चाही, तो मैंने अपना गुस्सा दबा कर कहा: "कुछ भी।" अगुआ ने तब यह कह कर मेरा निपटान किया कि मैं परमेश्वर के घर के काम को कायम नहीं रख रही हूँ। मुझे सचमुच बुरा लगा, मैं जानती थी कि चाहे जो भी हो, परमेश्वर के घर के काम में, मैं अपनी हताशा ज़ाहिर नहीं कर सकती। लेकिन मैं इसे दबा नहीं पायी। मैंने सोचा, "अगर आप हर समय बहन लियू की ही बात सुनती रहेंगी, तो चर्चा को रह क्या गया है?" मैं सोचती रही कि हर बात में मैं ही सही हूँ, इसलिए काम के बारे में हुई अगली कुछ चर्चाओं में मैं अपनी राय से चिपकी रही और बहन लियू के सुझाव उचित होने पर भी मैं सहमत नहीं हुई। मुझे लगा वह दिखावा कर रही है। एक बार उसने एक ख़ास कलाकार की सिफारिश की, तो मैंने उस कलाकार से जुड़े बहुत-सारे मुद्दे उठा दिये और उसके सुझाव को नामंज़ूर कर दिया। मैं उसकी बात सुनना ही नहीं चाहती थी। सारे काम की कर्ता-धर्ता मैं खुद बनना चाहती थी। बहन लियू मेरे कारण बेबस महसूस कर रही थी और फिर उसने सुझाव देना बंद कर दिया। उस दौरान, चूंकि मैं एक घमंडी, दंभी स्वभाव में जी रही थी और सत्य को नहीं खोज रही थी, इसलिए मेरी आत्मा धीरे-धीरे अंधेरों में समा गयी। मैं हर रोज़ उदास महसूस करने लगी, लगता जैसे परमेश्वर खुद को मुझसे छुपा रहे हैं। मेरे पास परमेश्वर से प्रार्थना में कहने को कुछ भी नहीं था और जब मैं परमेश्वर के वचन पढ़ती, तो मैं उनको समझ नहीं पाती थी। मेरा दिमाग़ खाली था, मैं अपने काम में कमसमझ थी। किसी भी समस्या पर ध्यान नहीं जा रहा था। मैं बेचैनी में जीते हुए महसूस करती रही मानो कुछ तो होने वाला है।

कुछ दिन बाद, हमारी अगुआ हमारे साथ एक सभा करने आयीं। उन्होंने मेरे स्वभाव को उजागर किया और कहा कि मैं बहुत घमंडी हूँ, बहुत निरंकुश हूँ, काम में मनमानी करती हूँ और मैंने वाकई हमारे काम में गड़बड़ी पैदा की है। उन्होंने मुझसे कहा कि घर जाकर कुछ गहन धार्मिक-कार्य करूं और आत्मचिंतन करूं। यह सुन कर मुझे धक्का लगा, लेकिन मैंने ईमानदारी से परमेश्वर से यह प्रार्थना की, "हे परमेश्वर, किसी भी हालात से मेरा सामना हो, मैं मानती हूँ कि यह सब आपके द्वारा नियोजित है और मैं समर्पण करना चाहती हूँ।" उस रात मैं बिल्कुल भी नहीं सो पायी। मैं सोच रही थी कि किस तरह इतने समय तक मैं फिल्म टीम में बनी रही, लेकिन कल से मैं उसका हिस्सा नहीं रहूँगी। मैं इस ख़याल को छोड़ नहीं पा रही थी और वाकई परेशान थी, अपने आंसू रोक नहीं पा रही थी। मैं अपने धार्मिक-कार्य और आत्मचिंतन के इस मौके का इस्तेमाल करना चाहती थी, ताकि जहां लड़खड़ायी थी वहीं से खुद को संभाल सकूं। लेकिन घर लौटने के बाद, मैं परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं लगा सकी, मुझे वाकई बड़ी मुश्किल हो रही थी। मैं बस इतना ही कर पा रही थी कि परमेश्वर के सामने आकर बार-बार उसे पुकारूं। मैंने कहा,"हे परमेश्वर, मैं इतने कष्ट में हूँ। मेरी मदद करो और मेरे दिल की रक्षा करो ताकि मैं इस हालत में तुम्हारी इच्छा को समझ सकूं और खुद को जान सकूं।" परमेश्वर से निरंतर प्रर्थना करने पर आखिरकार मुझे थोड़ा सुकून मिला।

कुछ भाई-बहन अगले दिन मेरा हालचाल पूछने, मुझसे सहभागिता करने और मेरी मदद करने आये और उन्होंने मेरी कुछ समस्याओं का ज़िक्र किया। मुझे याद है एक बहन ने कहा था, "निर्देशक के रूप में काम शुरू करने के बाद से तुम बहुत बदल गयी हो। तुम दूसरों को भी अलग नज़र से देखती हो और चाहती हो कि हर चीज़ में तुम्हारा ही फैसला अंतिम हो। तुम सब-कुछ अपने हाथ में रखना चाहती हो, तुम्हारे साथ काम करने का कोई तरीका ही नहीं है।" एक भाई ने कहा, "काम के बारे में चर्चाओं के दौरान तुम्हारे न होने से हमें सुकून मिलता है, लेकिन तुम्हारे आते ही हम सब परेशान हो जाते हैं, इस डर से कि तुम हमारे विचारों और योजनाओं को नामंज़ूर कर दोगी।" उनके मुंह से निकला हर शब्द मेरे दिल में खंजर की तरह चुभ रहा था। उनसे रूबरू होकर मैं शर्मिंदा थी और मुझे बहुत बुरा लग रहा था। अपनी पूरी ज़िंदगी में, एक इंसान के रूप में मैंने कभी इतना विफल महसूस नहीं किया था। मैं इतनी बुरी हो गयी थी कि भाई-बहन मेरे पास आने की हिम्मत नहीं करते थे, और मुझे देख कर डरते थे। मैंने सोचा, "क्या मैं अब भी एक सही इंसान हूँ? मैं इतनी संवेदनाहीन कैसे हो सकती थी?" मुझे कभी इस बात का एहसास नहीं था कि मेरा घमंडी स्वभाव दूसरों को बेबस कर उन्हें इतना नुकसान पहुंचा सकता था। मुझे मालूम था कि मैं घमंडी हूँ और अगुआ मेरे साथ इस बारे में अक्सर सहभागिता करती थीं, मगर मैंने उस बात को कभी अहमियत नहीं दी। इसके बजाय, मैंने सोचा कि मेरा घमंड मेरे बहुत सक्षम होने का नतीजा है। गुणी और ऊंची क्षमता वाला कौन-सा इंसान अहंकारी नहीं होता? इसीलिए मैंने इससे छुटकारे के लिए कभी भी सत्य की खोज नहीं की। लेकिन भाई-बहनों की मदद और सहभागिता से आखिरकार मेरे दिल को सुकून मिला और मैं शांति के साथ अपने बर्ताव पर गौर कर सकी।

आत्मचिंतन करते वक्त, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े, जो मैं अभी साझा करना चाहती हूँ। परमेश्वर कहते हैं, "अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुममें अहंकार और दंभ हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं!" ("मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही तू अपने स्वभाव में परिवर्तन को प्राप्त कर सकता है')। "अहंकार मनुष्‍य के भ्रष्‍ट स्‍वभाव की जड़ है। लोग जितने ही ज्‍़यादा अहंकारी होते हैं, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि वे परमेश्‍वर का प्रतिरोध करेंगे। यह समस्‍या कितनी गम्‍भीर है? अहंकारी स्‍वभाव के लोग न केवल बाकी सभी को अपने से नीचा मानते हैं, बल्कि, सबसे बुरा यह है कि वे परमेश्‍वर को भी हेय दृष्टि से देखते हैं। भले ही कुछ लोग, बाहरी तौर पर, परमेश्‍वर में विश्‍वास करते और उसका अनुसरण करते दिखायी दें, तब भी वे उसे परमेश्‍वर क़तई नहीं मानते। उन्‍हें हमेशा लगता है कि उनके पास सत्‍य है और वे अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचते हैं। यही अहंकारी स्वभाव का सार और जड़ है और इसका स्रोत शैतान में है। इसलिए, अहंकार की समस्‍या का समाधान अनिवार्य है। यह भावना कि मैं दूसरों से बेहतर हूँ–एक तुच्‍छ मसला है। महत्‍वपूर्ण बात यह है कि एक व्‍यक्ति का अहंकारी स्‍वभाव उसको परमेश्‍वर के प्रति, उसके विधान और उसकी व्‍यवस्‍था के प्रति समर्पण करने से रोकता है; इस तरह का व्‍यक्ति हमेशा दूसरों पर सत्‍ता स्‍थापित करने की ख़ातिर परमेश्‍वर से होड़ करने की ओर प्रवृत्‍त होता है। इस तरह का व्‍यक्ति परमेश्‍वर में तनिक भी श्रद्धा नहीं रखता, परमेश्‍वर से प्रेम करना या उसके प्रति समर्पण करना तो दूर की बात है" (परमेश्‍वर की संगति)। मैंने परमेश्वर के वचनों से यह जाना कि मेरा घमंड और दंभ मुझसे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करवा रहे थे। एक निर्देशक के रूप में काम करते हुए, जब मुझे थोड़ी सफलता मिली तो मैंने सोचा यह मेरी खुद की कड़ी मेहनत का नतीजा है, मैं दूसरों से बेहतर हूँ। मैंने दूसरों की उपेक्षा करना शुरू कर दिया, और ज़िद के साथ घमंड करती रही, यही चाहती रही कि हर चीज़ में मेरा ही फैसला अंतिम हो। जब मैं अपने काम में परिणाम हासिल नहीं कर सकी तो मैंने कभी इस बात पर गौर नहीं किया कि कहीं समस्या मेरे साथ तो नहीं, बल्कि अपने भाई-बहनों को ही निशाना बनाने लगी। मैंने दूसरों को नीचा दिखाने के इरादे से उनका निपटान किया और उन्हें खरी-खोटी सुनायी। मैंने घमंड और दंभ की वजह से हर किसी को नीची नज़र से देखा। मैं किसी भी दूसरे की काबिलियत को देख नहीं पायी, और सोचा कि बस मेरी योजनाएं ही सबसे बढ़िया हैं। मैं हर मोड़ पर सभी के सुझावों को नामंज़ूर कर देती, और सब पर रोब चलाने की कोशिश करती। अपने घमंड और दंभ के कारण मैं खुद को जान नहीं पायी, कई बार अपनी काँट-छाँट और निपटान के बाद भी मैंने इसे स्वीकार नहीं किया या आत्मचिंतन नहीं किया। मुझमें एक खोजी का दिल था ही नहीं। जब मेरे काम की तरक्की धीमी हो गयी और यह स्पष्ट हो गया कि मैं काम को नहीं संभाल पा रही हूँ, तब भी मैं दूसरों के साथ काम नहीं करना चाहती थी या अपने काम में उनकी दखलंदाज़ी नहीं चाहती थी। मुझे लगा कि इससे मेरे अधिकार पर असर पड़ेगा और मेरी शोहरत और पद को खतरा होगा। मैं सर्वेसर्वा होना चाहती थी, और चाहती थी कि मेरा ही फैसला अंतिम हो। क्या मैं परमेश्वर के विरोध के मार्ग पर नहीं चल रही थी? जब बहन लियू को उसके काम में थोड़ी सफलता मिली जिससे मेरे पद को खतरा पैदा हुआ, तब मुझे पता था कि वह सही है और उसके सुझाव से परमेश्वर के घर के कार्य को फ़ायदा होगा, लेकिन मैंने उसे स्वीकार नहीं किया। इसके बदले, मैं मीन-मेख निकालने में लग गयी, और जब मैंने देखा कि हमारे भाई-बहन उसकी बात पर राज़ी हैं, तो मैं इसे पचा नहीं पायी, और कलीसिया के काम में अपनी भड़ास निकालने लगी। मैं अपनी शोहरत और रुतबे की रक्षा के लिए परमेश्वर के घर को नुकसान होता देखने को तैयार थी। तो परमेश्वर के लिए मेरा आदर कहाँ था? मेरी अंतरात्मा और समझदारी कहाँ थी? मैंने देखा कि मैं अपने घमंडी और दंभी शैतानी स्वभाव के अनुसार जी रही थी, भाई-बहनों पर अपनी सोच और राय थोप रही थी, मानो वही सत्य हो, मैंने हर चीज़ में लोगों को मेरी ही बात मानने को मजबूर किया। क्या यह परमेश्वर से बराबरी करने और दूसरों पर काबू करने की चाह नहीं थी? "मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं ठहराना चाहिए, और न ही अपने आपको ऊँचा ठहराना चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और परमेश्वर को ऊँचा ठहराना चाहिए" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए')। आखिरकार मैं जान गयी कि मैं खस्ता हाल में हूँ। ऐसा लग रहा था मानो मैं हर रोज़ अपना कर्तव्य निभा रही हूँ, मुझमें खुद को खपाने का जूनून सवार है, लेकिन हर प्रकार से मैं शैतानी स्वभाव ही प्रकट कर रही थी। मेरे सारे काम सत्य के विरुद्ध थे, मैं कलीसिया के काम में गड़बड़ी पैदा कर रही थी। मैं दुष्टता कर रही थी, परमेश्वर का विरोध कर रही थी, और उसके स्वभाव का अपमान कर रही थी! मैंने सोचा आखिर मैं इस हद तक कैसे पहुँच गयी। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मेरी प्रकृति घमंडी और अकड़ालू थी। मैंने कभी भी सत्य को स्वीकार नहीं किया, इसलिए मैं परमेश्वर के कोप की भागीदार बनी। मैंने देखा कि शैतान ने मुझे गहराई से भ्रष्ट कर दिया है, मुझमें सत्य की वास्तविकता बिल्कुल भी नहीं है। इतना महत्वपूर्ण काम हाथ में लेने की सामर्थ्य मुझे परमेश्वर द्वारा ऊंचा उठाए जाने के कारण मिली थी, और अपने कर्तव्य में थोड़ी सफलता पूरी तरह से पवित्र आत्मा के कार्य के कारण मिली थी, इस वजह से बिल्कुल भी नहीं कि मुझमें कोई काबिलियत थी। मैंने देखा कि जब मैं अपने काम के लिए अपनी घमंडी प्रकृति पर भरोसा करती, तब पवित्र आत्मा कार्य करना बंद कर देता और मैं कुछ भी नहीं समझ पाती या कोई हल नहीं निकाल पाती। लेकिन इसके बावजूद मुझे ठीक ही लगता था। मैं इतनी घमंडी थी कि कुछ भी समझ नहीं पा रही थी, मुझमें खुद की ज़रा भी समझ नहीं थी। यह जान लेने के बाद मैंने अपनी घमंडी प्रकृति के प्रति नाराज़गी और घृणा महसूस करना शुरू किया।

फिर मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "तुम सभी पाप और दुराचार के स्थान में रहते हो; तुम सभी दुराचारी और पापी लोग हो। आज तुम न केवल परमेश्वर को देख सकते हो, बल्कि उससे भी महत्वपूर्ण, तुम सब ने ताड़ना और न्याय को प्राप्त किया है, ऐसे गहनतम उद्धार को प्राप्त किया है, अर्थात परमेश्वर के महानतम प्रेम को प्राप्त किया है। वह जो कुछ करता है, वह तुम्हारे लिए वास्तविक प्रेम है; वह कोई बुरी मंशा नहीं रखता है। यह तुम्हारे पापों के कारण ही है कि वह तुम्हारा न्याय करता है, ताकि तुम आत्म-परीक्षण करो और यह अतिबृहत उद्धार प्राप्त करो। यह सब कुछ मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए किया जाता है। आदि से लेकर अन्त तक, मनुष्य को बचाने के लिए परमेश्वर, जितना हो सके वो सब कुछ कर रहा है, और वह निश्चय ही उस मनुष्य को पूर्णतया विनष्ट करने का इच्छुक नहीं है, जिसे उसने अपने हाथों से रचा है। अब कार्य करने के लिए वह तुम्हारे मध्य आया है; क्या यह और अधिक उद्धार नहीं है? अगर वो तुमसे नफ़रत करता, तो क्या फिर भी वो व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा संदर्शन करने के लिए इतने बड़े परिमाण का कार्य करता? वह इस प्रकार दुःख क्यों उठाए? परमेश्वर तुम सब से घृणा नहीं करता, न ही तुम्हारे प्रति कोई बुरी मंशा रखता है। तुम सब को जानना चाहिए कि परमेश्वर का प्रेम ही सबसे सच्चा प्रेम है। यह लोगों की अनाज्ञाकारिता के कारण ही है कि उसे उन्हें न्याय के द्वारा बचाना पड़ता है, अन्यथा वे बचाए नहीं जाएँगे" ("वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (4)')। मैंने परमेश्वर के वचनों को बार-बार पढ़ा। मुझे स्नेह का मीठा एहसास हुआ और मैं बहुत प्रेरित हुई। मैंने देखा कि मुझे इस प्रकार उजागर करके परमेश्वर मुझे निकम्मा नहीं ठहरा रहा था या हटा नहीं रहा था, वह जान-बूझ कर मेरे लिए मुश्किल खड़ी नहीं कर रहा था। ऐसा वह वाकई मेरे उद्धार के लिए कर रहा था। मेरी प्रकृति इतनी घमंडी और कठोर है और परमेश्वर को मेरी ज़रूरत का पता है। अपने कर्तव्य का अवसर गँवा कर और भाई-बहनों द्वारा काँट-छाँट और निपटान से गुज़र कर, मुझे अपने घमंडी स्वभाव का पता चला. मैं जिस रास्ते पर चल रही थी उस पर गौर कर सकी और परमेश्वर के आगे सच्चाई से प्रायश्चित कर सकी ताकि मैं अब उसके खिलाफ विद्रोह कर उसका विरोध न करूं। हालांकि इस प्रक्रिया से गुज़रने पर मुझे पीड़ा और नकारात्मकता का अनुभव हुआ, उस प्रकार के न्याय और ताड़ना के बिना मेरे सुन्न पड़े दिल को जगाया नहीं जा सकता था। मैं अपने बर्ताव पर गौर नहीं कर पाती या परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को जान नहीं पाती। मैं सच्चाई से परमेश्वर के आगे प्रायश्चित नहीं कर पाती, बल्कि उससे बराबरी और उसका विरोध करती रहती, आखिरकार उसके स्वभाव का अपमान करती और दंड पाती। आखिरकार मैंने खुद महसूस किया कि परमेश्वर के वचनों का न्याय और प्रकाशन मेरी रक्षा के लिए था और उसका सबसे सच्चा प्रेम था। यह जान लेने के बाद मैंने परमेश्वर का बड़ा आभार माना और महसूस किया कि मुझे भविष्य में सत्य का ईमानदारी से अनुसरण करना चाहिए, ताकि मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्याग कर इंसानियत के साथ जी सकूं।

उसके बाद से मैं लगातार प्रार्थना करती रही और खोज करती रही। मैंने सोचा कि मैं अपने घमंडी स्वभाव के साथ जीना और परमेश्वर का विरोध करना कैसे बंद करूं। खोज करते वक्त मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े: "अहंकारी प्रकृति तुम्‍हें हठीला बना देती है। जब लोगों में इस तरह का हठीला स्‍वभाव होता है, तो क्या वे दुराग्रही होने की ओर उन्‍मुख नहीं हो जाते? तब तुम अपने दुराग्रह से मुक्ति कैसे पा सकते हो? जब तुम्‍हारे मन में कोई विचार होता है, तुम उसे प्रकट करते हो और कहते हो कि तुम इस मसले पर क्‍या सोचते हो और क्‍या विश्‍वास करते हो, और फिर, तुम हर किसी से इसके बारे में बात करते हो। सबसे पहले, तुम अपने दृष्टिकोण पर रोशनी डाल सकते हो और सत्‍य को जानने की कोशिश कर सकते हो; इस दुराग्रही स्‍वभाव पर विजय पाने के लिए उठाया जाने वाला पहला क़दम है। दूसरा क़दम तब होता है जब दूसरे लोग अपनी असहमतियों को व्‍यक्‍त करते हैं—ऐसे में दुराग्रही होने से बचने के लिए तुम किस तरह का अभ्यास कर सकते हो? सबसे पहले तुम्हारी a विनम्र होनी चाहिए, जिसे तुम सही समझते हो उसे एक ओर रख दो, और हर किसी को संगति की गुंजाइश करने दो। भले ही तुम अपने मार्ग को सही मानते हो, तुम्‍हें उस पर ज़ोर नहीं देते रहना चाहिए। यह, सर्वप्रथम, एक तरह का सुधार है; यह सत्‍य की खोज की, स्‍वयं को नकारने की, और परमेश्‍वर की इच्‍छा पूरी करने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। जैसे ही तुम्‍हारे भीतर यह प्रवृत्ति पैदा होती है, उस समय तुम अपनी धारणा से चिपके नहीं रह जाते, तुम प्रार्थना करते हो। चूँकि तुम सही और ग़लत का भेद नहीं जानते, इसलिए तुम परमेश्‍वर को गुंजाइश देते हो कि वह इसे उजागर करे और तुम्‍हें बताये कि वह सर्वश्रेष्‍ठ और सबसे उचित कर्म क्‍या है जो किया जाना चाहिए। जैसे-जैसे इस संगति में हर कोई शामिल होता है, पवित्र आत्‍मा तुम सभी को सारी प्रबुद्धता प्रदान करता है" (परमेश्‍वर की संगति)। मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का एक रास्ता मिला। अगर मैं घमंड में न जीना चाहूँ या अपने कर्तव्य में मनमानी न करना चाहूँ, तो मेरे दिल में सत्य को खोजने की इच्छा और परमेश्वर का आदर होना चाहिए। मुझे भाई-बहनों के साथ सहयोग करना होगा और जब कोई मतभेद हो, तो मुझे खुद को नकार कर अपने अहंकार को दूर रखना होगा, परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी और सत्य को खोजना होगा। सिर्फ इसी मनोभाव के साथ मैं ज़्यादा आसानी से पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध की जा सकूंगी, और मैं अपने खुद के विचारों से चिपके रहने के लिए परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने, उसका विरोध करने और परमेश्वर के घर के कार्य को नुकसान पहुंचाने की हद तक कभी नहीं जाऊंगी। यह सब जान लेना मेरे दिल में एक रोशनी चमकने जैसा था। मैंने यह प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, अब से, मैं भाई-बहनों के साथ मिल-जुल कर काम करना चाहती हूँ, ताकि हम साथ-साथ सत्य को खोज सकें और सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य निभा सकें।"

उसके कुछ समय बाद, मेरे काम के लिए मुझे सुलेख (कैलिग्राफी) की कुछ पंक्तियाँ लिखने को कहा गया। यह सुन कर मैंने सोचा, "सुलेख के कुछ अक्षर तो कुछ भी नहीं हैं। मैंने सुलेख का अध्ययन किया है, इसलिए इसको लेकर मैं बहुत आश्वस्त हूँ।" मैंने दो-चार तरह से लिखा, तब उन्हें देखने के बाद बहन लियू ने कहा, "मेरे ख्याल से बुरा नहीं है।" मुझे उसी वक्त फिर उससे विद्वेष महसूस हुआ, मैंने सोचा, "तुम इतने अनमने ढंग से कह रही हो। क्या मेरा सुलेख इतना बुरा है? मैंने इसका अध्ययन किया है, मैं इसमें माहिर हूँ। क्या मैं इसके बारे में तुमसे ज़्यादा नहीं जानती? मुझे लगता है तुम्हें इस तरह की चीज़ की समझ नहीं है, और तुम जान-बूझ कर मीन-मेख निकाल रही हो।" लेकिन जब ये विचार मेरे दिमाग में कौंध रहे थे, मैंने अचानक महसूस किया कि मैं गलत हूँ। क्या यह फिर से घमंडी स्वभाव प्रकट करना नहीं है? मैं समय गँवाये बिना परमेश्वर के सामने प्रार्थना करने आ पहुँची: "हे परमेश्वर, मैं एक खोजी और आज्ञाकारी रवैया रखना चाहती हूँ, स्वयं को अलग रखना चाहती हूँ, और अपने कर्तव्य को अपना सब-कुछ देना चाहती हूँ।" इस मनोभाव के साथ मैंने एक और तरीके से सुलेख लिखा, बहन लियू ने उसे देखने के बाद पूछा कि क्या मैं इसे और अधिक साफ़-सुथरा बना सकती हूँ, और फिर कुछ सुझाव दिये। अनेक भाई-बहनों ने वास्तव में कहा कि यह बिल्कुल ठीक है। मैं पहले जैसी थी, उस आधार पर, अगर सोचती कि मैं सही हूँ और दूसरे लोगों को मेरी बात माननी चाहिए, तो कुछ और कहने को रहता ही नहीं, और मैं इसी सोच में और डूब जाती। लेकिन उस वक्त मेरी सोच वो नहीं थी। मैंने सोचा, "भाई-बहन हमारे कर्तव्य के बारे में सोच कर अलग-अलग दृष्टिकोण पेश कर रहे हैं। कोई भी मेरे लिए मुश्किल खड़ी करने के इरादे से ऐसा नहीं कर रहा है। ज़रूरी नहीं है कि मेरे ही विचार सही हों। अंत में, हमें फैसला करना होगा कि हमारे काम के लिए सबसे बढ़िया नतीजे किससे मिलेंगे।" इस सोच के साथ मैंने पहल करते हुए कहा: "मैं एक और विकल्प पेश करूं तो कैसा रहेगा और तब आप लोग फैसला कर सकेंगे कि कौन-सा सबसे बढ़िया है।" इस मनोभाव के साथ लिखते हुए मैं बहुत शांति और सुकून महसूस कर रही थी, नाक कटने का ख्याल तो दिल में आया ही नहीं। सुलेख लिख लेने के बाद, मैंने उनसे और सुझाव मांगे, तब भाई-बहनों ने मुझे और भी सुझाव दिये। सभी सुझाव अच्छे थे। वैसे उस वक्त मुझे लगा कि मुझमें सचमुच बहुत-सी कमियाँ हैं और भाई-बहनों के पास बहुत-से विशेष गुण हैं जो मुझमें नहीं थे। उनके अनेक विचारों और सुझावों ने मेरी कमियों की भरपाई कर दी। इसलिए हर किसी की मदद से, एक-दूसरे की कमियों की भरपाई करके हम अंत में अपने काम में ज़्यादा सफल हुए। कुछ समय तक भाई-बहनों के साथ इस तरह काम करके मुझे वाकई बड़ा सुकून महसूस होने लगा, और मैं बाकी सब लोगों के बहुत करीब महसूस करने लगी। मैं पहले की तरह न तो ढीठ या मुंहज़ोर थी, न ही घमंडी, और जब दूसरे मेरे करीब आये तो मुझसे मिलना उनके लिए मुश्किल नहीं था। मैंने यह भी पाया कि भाई-बहनों के सुझावों को स्वीकार करना उतना कठिन नहीं था, और मैं उनकी बतायी अपनी कमियों को भी सही ढंग से ले पा रही थी। वैसे कुछ चीज़ें हुईं जो मुझे ठीक नहीं लगीं और मैंने थोड़ा घमंड अवश्य दिखाया, लेकिन भाई-बहनों के याद दिलाने पर, मैं फ़ौरन परमेश्वर के सामने आ सकी। मैं स्वयं को दूर रखने, सत्य को खोजने, और सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य निभाने को तैयार थी। इन सबसे गुज़रने के बाद, मैंने जो चीज़ वाकई दिल से महसूस की, वो सच्ची खुशी की भावना थी। मैंने देखा कि आखिरकार मैं परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर पा रही हूँ, जो पहले मेरे लिए बहुत मुश्किल था। स्वयं को परे रख कर दूसरों के सुझावों को मानना पहले बहुत कठिन होता था, लेकिन अब मैं परमेश्वर के वचनों का कुछ हद तक अभ्यास कर पा रही हूँ। आखिरकार मैं अब थोड़ी इंसानियत के साथ जी सकती हूँ। मैं पहले जैसी घमंडी नहीं हूँ, मैं परमेश्वर के लिए उतनी घिनौनी नहीं हूँ, और मेरी वजह से अब पहले की तरह दूसरे लोग बेबस नहीं हो रहे हैं। जब कभी मैं इन सबके बारे में सोचती हूँ, मैं परमेश्वर का आभार मानती हूँ। अगर परमेश्वर ने मेरा निपटान और काँट-छाँट नहीं की होती, उसका न्याय और उसके वचनों का प्रकाशन नहीं मिला होता, तो न जाने मैं अब तक कितनी घमंडी या नीच बन गयी होती। आज जो थोड़ी-सी समझ और बदलाव मैंने हासिल किया है वह पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के कारण है।

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