142 मैं परमेश्वर का प्रेम सदा मन में रखूँगा

I

काम करते हुए देह में, दुख उठाए हैं, लानत सही है तुमने।

अपयश देते, उपहास करते, तुम्हारे तौर-तरीकों का दुनियावी लोग।

धार्मिक जगत तिरस्कार करता, फँसाता है तुम्हें।

पीछा करता लाल अजगर, तिरस्कार करता ये ज़माना।

सहते हो ख़ामोशी से सत्य व्यक्त करते हुए,

करते हो ये सब, क्योंकि चाहते हो बचाना तुम इंसानों को।

मासूम हो फिर भी, सहते हो लाँछन, अवज्ञा तुम।

पवित्र हो फिर भी, इंसान को बचाने, पापियों के संग रहते हो तुम।

देते हो सत्य और ज़िंदगी इंसान को, मलाल नहीं करते तुम, करते तुम।


II

वचन तुम्हारे खा-पीकर, सत्य सीखते हम,

देखते जगत की बुराई का मूल हम, मूल हम।

जानते हैं सत्य अनमोल है, अनमोल है, उठाते हैं दुख इसे पाने की ख़ातिर,

अंत के दिनों का उद्धार पाना अनुग्रह है तुम्हारा।

देते हो सत्य और ज़िंदगी इंसान को, मलाल नहीं करते तुम, करते तुम।


III

कलीसियाओं के मध्य भ्रमण करते हो, इंसान के संग तुम रहते हो।

देखकर विद्रोह हमारा, आहत और उदास होते हो।

बच्चों-सा कद हमारा, रातों की नींद उड़ाता तुम्हारी।

सब-कुछ कहा है, इंसान को बचाने की ख़ातिर मेहनत की है तुमने, तुमने।

तुम्हारे बोले वचन कानों को कटु लगें शायद,

मदद करते हैं पर ये जानने में, क्या बन गए हैं हम।

न्याय और इम्तहान तुम्हारे शुद्ध करते हैं भ्रष्टता इंसान की।

प्रेम और आशीष है न्याय तुम्हारा।

तुम्हारे वचनों के न्याय से गुज़रकर,

तुम्हारे वचनों की ताड़ना से गुज़रकर,

सीखते हैं सत्य हम, जानते हैं धार्मिक हो, पवित्र हो तुम।

बदला है थोड़ा स्वभाव पुराना,

तुम्हारे प्यार को भी महसूस करते हैं हम, महसूस करते हैं हम।

हे परमेश्वर, कितने प्यारे हो तुम।

सदा दिल में रहेंगे हमारे, जीवन-वचन तुम्हारे, वचन तुम्हारे।

याद करके अनुरोध तुम्हारा,

गवाही देते हैं हम तुम्हारे राज्य के सुसमाचार की।

अपना फ़र्ज़ निभाएँगे हम, हम,

सुंदर, श्रेष्ठ गवाही देंगे तुम्हारी हम।

अपने दिल में प्रेम करता हूँ मैं तुम्हें परमेश्वर,

सदा अपने मन में रखूँगा तुम्हारा प्रेम परमेश्वर।

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