वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

परिचय

परमेश्वर के वचनों के इस हिस्से में कुल चार अनुभाग हैं; मसीह ने उन वचनों को 1992 और 2005 के बीच व्यक्त किया था। उनमें से अधिकांश कलीसिया में आने के दौरान उसके उपदेशों और संगति के अभिलेखों पर आधारित हैं। न तो उस पाठ में कोई संशोधन किया गया है और न ही मसीह ने उन्हें बदला है। शेष मसीह की अपनी कलम से निकले लेखन का अंग है। (जब मसीह लिखता है तो बिना सोचे अबाध रूप से लिखता है; उसमें ज़रा से भी संशोधन की आवश्यकता नहीं पड़ी है, और वह सम्पूर्ण रूप से आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसमें कोई संदेह नहीं है।) हमने अलग से इनका कोई प्रबंध नहीं किया है, बल्कि उन्हें उसी मूल क्रम में रखा है जिस क्रम में वे व्यक्त किए गए थे। इस तरह हम परमेश्वर के कार्य के चरणों को देख पाएंगे जो उसने कहा था, और समझ पाएंगे कि हर चरण में वह कैसे कार्य करता है। इस क्रम से परमेश्वर के कार्य के चरणों और उसकी बुद्धि को लोग और बेहतर ढंग से समझ पाएंगे।

पहले आठ अध्याय "कलीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (I)" का "पथ" मसीह के वचनों का मात्र एक छोटा-सा भाग है जब वह इंसान के बराबर खड़ा हुआ। वे नीरस प्राय: प्रतीत होते हैं, लेकिन उनमें दरअसल परमेश्वर का प्रेम और मानव-मात्र के लिये चिंता है। इससे पूर्व परमेश्वर तीसरे स्वर्ग के परिप्रेक्ष्य से बोला, तो इंसान और परमेश्वर के मध्य बहुत अधिक दूरी हो गई और लोग परमेश्वर से अपने जीवन-पोषण का अनुरोध तो क्या करते, उसके निकट जाने तक का साहस नहीं जुटा पाए। तो, "पथ" में परमेश्वर ने लोगों से बराबरी पर आकर बात की और मार्ग की दिशा बताई ताकि इंसान और परमेश्वर का संबंध फिर से अपने मूल स्वरूप में आ सके, इंसान इस बात पर संदेह न करे कि कहीं परमेश्वर अब भी वार्ता करने की कोई विधि तो नहीं अपना रहा है, और मृत्यु की काली छाया का परीक्षण न रहे। परमेश्वर तीसरे स्वर्ग से उतरकर आया; इंसान आग के दरिया और गंधाश्म से होकर परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष आया, उसने सेवकाई की छाया को उतार फेंका, और आधिकारिक रूप से नवजात बछड़ों की तरह परमेश्वर के वचनों का बपतिस्मा स्वीकार किया। इस प्रकार परमेश्वर ने लोगों के बगल में बैठकर उनसे वार्ता की और जीवन को अधिकाधिक पुष्ट करने वाले कार्य किए। परमेश्वर का मानव रूप में उतरकर आने का मकसद है लोगों के अधिक निकट आना, परमेश्वर और इंसान के बीच की दूरी को कम करना, उनकी स्वीकृति और विश्वास हासिल करना, और उन्हें प्रेरित करना ताकि वे जीवन और परमेश्वर का अनुसरण कर सकें। अंतत:, "पथ" के आठ अध्याय परमेश्वर की ऐसी कुंजी हैं जो मानव-हृदय के द्वार खोलती हैं। यह उसकी लुभावनी औषधि है। मात्र इसी प्रकार लोग परमेश्वर की लगातार दी जाने शिक्षाओं और झिड़कियों को ध्यानपूर्वक सुन सकते हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि उसके बाद ही कार्य के इस वर्तमान चरण में परमेश्वर ने आधिकारिक तौर पर जीवन-पोषण और सत्य की अभिव्यक्ति के लिये कार्य आरंभ किया, और उसका संभाषण जारी रहा: "आस्थावानों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए" और "परमेश्वर के कार्य के चरणों पर"... क्या यह तरीका परमेश्वर की बुद्धि और उसकी ईमानदार मंशा को नहीं दर्शाता? यही है मसीह का प्रथम जीवन-पोषण, अत: अगले कुछ अनुभागों की तुलना में सत्य कुछ-कुछ उथला है। इसके पीछे का सिद्धांत बहुत सरल है: परमेश्वर इंसान की ज़रूरतों के अनुसार कार्य करता है, और एकमात्र वही है जो इंसान के लिये इतना विचारशील है और उसे प्रेम करता है।

"कार्य और प्रवेश" (1 से लेकर 10 तक) परमेश्वर के वचन हैं जो एक दूसरे नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं, अत: हमने इन दस अध्यायों से शुरुआत की और उसके बाद "कलीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (II)" को बढ़ावा दिया। उस चरण में, परमेश्वर ने अपने अनुयायियों के समूह के सामने अधिक विस्तृत अपेक्षाएं रखीं। उनमें लोगों की जीवन-शैली, उनकी अपेक्षित क्षमता आदि से जुड़ी जानकारी शामिल थीं। और चूँकि वे लोग पहले ही दृढ़ता से परमेश्वर का अनुसरण करने का मन बना चुके थे, और परमेश्वर की पहचान और उसके सार को लेकर उन्हें कोई सन्देह नहीं था, अत: परमेश्वर ने अपने अनुयायियों को आधिकारिक तौर पर अपना परिवार मानना शुरु कर दिया था और उनके साथ संगति में उसने सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक के परमेश्वर के कार्य का अन्दरूनी सत्य साझा करना शुरु कर दिया था। उसने बाइबल का सत्य भी प्रकट किया, और उन्हें परमेश्वर के देह-धारण करने के असली महत्व को समझने का अवसर भी प्रदान किया। इन वचनों से लोग परमेश्वर के सार को और उसके कार्य के सार को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं, और इसके अलावा, वे यह भी समझ सकेंगे कि लोगों ने परमेश्वर के उद्धार कार्य से जो कुछ हासिल किया है, वह उसको भी पार कर चुका है जो नबियों और प्रेरितों ने इन तमाम युगों में पाया था। परमेश्वर के वचनों की हर पँक्ति से तुम उसकी बुद्धि के प्रत्येक अंश, और उसके सूक्ष्म प्रेम तथा कुशल संरक्षण को अनुभव कर सकते हो। इन वचनों को अभिव्यक्त करने के दौरान, उसने लोगों के सामने उनके पूर्वाग्रह, त्रुटियां, ऐसी बातें जिनकी उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी, और एक-एक करके उनके भविष्य-पथ को भी उजागर किया। लोग जिस प्रेम का अनुभव करते हैं, कदाचित वह प्रेम का संकुचित भाव है! आखिर परमेश्वर इंसानों को वह सब पहले ही दे चुका है जो उन्हें चाहिए और जो कुछ भी उन्होंने मांगा है—उसने कोई कसर नहीं रखी है और न ही कोई विशेष अपेक्षा की है।

इस भाग में कुछ अध्याय विशेष उसके वचन हैं जो बाइबल के विषय में हैं। उसकी वजह यह है कि बाइबल में हज़ारों वर्षों का मानव-इतिहास दर्ज है और लोग बाइबल को इस हद तक परमेश्वर जैसा मानते हैं कि अंतिम दिनों में उन्होंने बाइबल को परमेश्वर का दर्जा दे दिया है। इस तरह की चीज़ें परमेश्वर को सचमुच पसंद नहीं आतीं। इसलिए अपने फ़ुर्सत के समय में, उसे अंदर की कहानी और बाइबल का स्रोत स्पष्ट करना पड़ा। वरना बाइबल फिर से लोगों के दिलों में परमेश्वर का स्थान ले लेती और लोग बाइबल के वचनों के आधार पर ही परमेश्वर के कार्यों की निंदा करते और उन कार्यों का आकलन करते। परमेश्वर का बाइबल के सार-तत्व, उसकी संरचना और उसकी कमियों का स्पष्टीकरण उसके अस्तित्व को नकारना बिल्कुल नहीं है, न ही बाइबल की निंदा करना है। बल्कि उसका उद्देश्य एक तर्कसंगत और उपयुक्त स्पष्टीकरण देना है, ताकि बाइबल की मौलिक छवि को पुन: स्थापित किया जा सके, और लोगों के मन में बाइबल को लेकर जो भ्रम हैं उन्हें दूर किया जा सके, ताकि उसके प्रति लोग अपना सही दृष्टिकोण बनाएं, उसकी आराधना न करें, और गुम न हो जाएं—लोग गलती से बाइबल में अपने अंध-विश्वास को, परमेश्वर में विश्वास और उसकी आराधना मान बैठते हैं, और इसकी वास्तविक पृष्ठभूमि और दुर्बल बिंदुओं का सामना करने तक का साहस नहीं जुटा पाते। एक बार सबको बाइबल के विषय में सही जानकारी हो जाए तो फिर वे बेझिझक इसे दरकिनार कर पाएंगे और पूरे साहस से परमेश्वर के नए वचनों को ग्रहण कर पाएंगे। इन अनेक अध्यायों में परमेश्वर का यही लक्ष्य है। परमेश्वर यहाँ लोगों को यह सच्चाई बताना चाहता है कि कोई भी सिद्धांत या तथ्य परमेश्वर के व्यवहारिक कार्य या वचनों का स्थान नहीं ले सकता, और न ही कोई चीज़ परमेश्वर का स्थान ले सकती है। यदि लोग बाइबल के जाल से नहीं निकल पाए तो वे कभी भी परमेश्वर के समक्ष नहीं आ पाएंगे। यदि वे परमेश्वर के समक्ष आना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसी किसी भी चीज़ को मन से निकालना पड़ेगा जो परमेश्वर का स्थान ले सकती हो—इस तरह परमेश्वर संतुष्ट हो जाएगा। हालांकि यहाँ परमेश्वर ने मात्र बाइबल को स्पष्ट किया है, लेकिन न भूलें कि बाइबल के अलावा भी ऐसी अनेक त्रुटिपूर्ण चीज़ें हैं, लोग वाकई जिनकी आराधना करते हैं, और जो चीज़ें वाकई परमेश्वर की ओर से आती हैं, उनकी आराधना नहीं करते। परमेश्वर बाइबल का उपयोग मात्र मिसाल के तौर पर करता है ताकि लोग फिर से गलत रास्ते पर बहुत दूर तक न चले जाएं और जब परमेश्वर में विश्वास और उसके वचनों को ग्रहण करने की बात आए तो वे दुविधा में पड़ जाएं।

परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए वचन उथले से गहरे होते जाते हैं। अतः जो कुछ वह कहता है वह लोगों के बाह्य व्यवहार और कृत्यों से होते हुए उनके दूषित स्वभाव तक गहराता जाता है, और वहां से लोगों की आत्माओं—उनके स्वभाव के गहनतम कोनों पर प्रकाश-बिंदु डालता है। जिस दौरान "कलीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (III)" व्यक्त किया गया था, परमेश्वर के कथन इंसान के सार और पहचान पर तथा यथार्थ मनुष्य से क्या तात्पर्य है—इन गहनतम सत्य और जीवन में लोगों के प्रवेश के विषय में अनिवार्य प्रश्नों पर बल देते हैं। हाँ, यदि पलटकर "कलीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (I)" में परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए सत्य पर विचार करें, तो तुलनात्मक रूप से, "कलीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (III)" अधिक गूढ़ हैं। इस अनुभाग का संबंध लोगों के भविष्य के पथ और लोगों को पूर्ण किए जाने के तरीके से है; इसका संबंध इंसान के आगामी गंतव्य और परमेश्वर पर वचनों तथा इंसान के ठहराव से है। (ऐसा कहा जा सकता है कि आज तक ये वचन परमेश्वर ने इंसान के स्वभाव, उसके लक्ष्य, और उसके गंतव्य के विषय में व्यक्त किए हैं जिन्हें समझना बेहद आसान है।) परमेश्वर को उम्मीद है कि इन वचनों को वे लोग पढ़ते हैं जो इंसानी पूर्वाग्रहों और कल्पनाओं से बाहर निकल आए हैं और जो परमेश्वर के प्रत्येक वचन को अपने हृदय की गहराइयों में स्पष्टता से समझ गए हैं। उसे यह भी आशा है कि वे तमाम लोग जो इन वचनों को पढ़ते हैं, वे उसके वचनों को सत्य, मार्ग और जीवन के रूप में ले सकते हैं और वे परमेश्वर को न हल्के में लेते हैं और न ही उसके साथ कपट करते हैं। यदि लोग इन वचनों को परमेश्वर का इम्तहान लेने या उसको जानने-समझने के लिए पढ़ते हैं तो फिर उनका सारा महत्व ही समाप्त हो जाता है। जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, जिनका हृदय परमेश्वर के अनुसरण पर लगा है, और जिन्हें उस पर किंचित-मात्र भी संदेह नहीं है, केवल वही उसके वचनों को आत्मसात करने के पात्र हैं।

"कलीसिया में आने पर देहधारी मनुष्य के पुत्र के वचन (IV)" अन्य प्रकार के दिव्य वचन हैं जो "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन" के पश्चात आते हैं। इस अनुभाग में ईसाई सम्प्रदाय और पंथ के तमाम लोगों के लिए परमेश्वर के उपदेश, शिक्षाएं और प्रकाशन सम्मिलित हैं, जैसे: "जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा," "वे जो मसीह से असंगत हैं वे निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं" इसमें वे अति विशिष्ट अपेक्षाएं भी शामिल हैं जो परमेश्वर इंसान से करता है, जैसे: "अपने गंतव्य की तैयारी के लिए तुम्हें सत्कर्म करने होंगे," "तीन चेतावनियाँ", "अतिक्रमण मनुष्य को नरक में ले जाएगा।" बहुत से पहलुओं की बात की जाती है जैसे हर प्रकार के लोगों के लिए प्रकाशन और न्याय तथा वचन कि परमेश्वर को कैसे जानें। ऐसा कहा जा सकता है कि यह अनुभाग इंसानों के लिए परमेश्वर के न्याय का मूल है। सबसे अविस्मरणीय बात यह है कि परमेश्वर ने अपने कार्य का पटाक्षेप करने से पूर्व, इंसानों की धोखेबाज़ी की प्रवृत्ति को उजागर कर दिया। उसका लक्ष्य है कि लोग इस तथ्य से अवगत हों और इसे उनके हृदय के गहनतम हिस्से में दफ्न कर दिया जाए। इससे कोई अंतर नहीं पडता कि आप कब से उसके अनुयायी हैं—आपका स्वभाव फिर भी परमेश्वर से कपटा करने का है। यानी लोगों के स्वभाव में ही परमेश्वर को धोखा देना है और उसकी वजह यह है कि लोगों के जीवन में पूरी तरह से परिपक्वता नहीं है, उनके स्वभाव में मात्र सापेक्षित परिवर्तन होता है। हालांकि इन दो अध्यायों, "विश्वासघात (1)" और "विश्वासघात (2)" से लोगों को आघात पहुँचता है, ये लोगों के लिए परमेश्वर की बेहद निष्ठावान और सद्भावपूर्ण चेतावनी हैं। जब लोग आत्म-तुष्ट और अहंकारी हो जाते हैं, तो इन दो अध्यायों को पढ़कर कम से कम, उनकी दुष्टता पर लगाम लगेगी और वे शांत होंगे। इन अध्यायों के ज़रिए परमेश्वर लोगों को याद दिलाता है कि तुम्हारा जीवन कितना भी परिपक्व हो, तुम्हारा अनुभव कितना भी गहरा हो, तुम्हारा आत्म-विश्वास कितना भी ऊँचा हो, और तुम चाहे कहीं भी पैदा हुए हो, कहीं भी जा रहे हो, परमेश्वर को धोखा देने की तुम्हारी प्रवृत्ति किसी भी समय और कहीं भी उभर कर आ सकती है। परमेश्वर सबको जो कहना चाहता है वो है: परमेश्वर को धोखा देना मानवीय प्रवृत्ति है। लेकिन इन दो अध्यायों को व्यक्त करने का परमेश्वर का अभिप्राय, लोगों को हटा देने या निंदित करने का बहाना ढूंढना नहीं है, बल्कि उन्हें उनकी प्रवृत्ति के प्रति और अधिक सजग करना है ताकि वे परमेश्वर का मार्गदर्शन पाने के लिए उसके सामने हर समय सतर्क रहें, उसकी उपस्थिति से वंचित रहकर ऐसे मार्ग पर न चल पड़ें कि लौट कर न आ सकें। ये दो अध्याय उन तमाम लोगों के लिए खतरे की एक घंटी है जो परमेश्वर के अनुयायी हैं। उम्मीद है कि लोग परमेश्वर के ईमानदार अभिप्राय को समझ सकेंगे। आखिरकार, ये वचन विवादातीत तथ्य हैं, तो लोग क्यों इस झंझट में पड़ते हैं कि परमेश्वर ने ये वचन कब और कैसे व्यक्त किए थे? यदि परमेश्वर इन तमाम चीज़ों को स्वयं तक सीमित रखता, और इन्हें व्यक्त करने की बजाय तब तक प्रतीक्षा करता जब तक कि लोगों को नहीं लगता कि उपयुक्त समय आ गया है, तो क्या तब तक बहुत देर नहीं हो गई होती? वो उपयुक्त समय कौनसा होता?

इन चार अध्यायों में परमेश्वर ने कई प्रकार के तरीके और नज़रिए अपनाए हैं। मिसाल के तौर पर, कभी वह व्यंग्य का प्रयोग करता है, कभी वह सीधे पोषण और उपदेशों वाला तरीका अपनाता है; कभी वह उदाहरण का प्रयोग करता है, और कभी वह कठोर फटकार लगाता है। कुल मिलाकर, कई प्रकार के तरीके हैं, मगर लक्ष्य है लोगों को उनकी अवस्था और रुचि के अनुसार समझाना। लेकिन अलग तरीकों और उसके बोलने के विषय के अनुसार उसका नज़रिया भी बदलता रहता है। मिसाल के तौर पर, कभी वह कहता है, "मैं" या "मुझे", अर्थात वह परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से लोगों से बात करता है। कभी वह अन्य पुरुष के परिप्रेक्ष्य से बात करते हुए कहता है "परमेश्वर" ये है या वो है, और अन्य अवसर पर वह इंसानी नज़रिए से बात करता है। भले ही वह किसी भी परिप्रेक्ष्य से बात करे, इससे उसका सार-तत्व नहीं बदलता। उसकी वजह ये है कि वह कैसे भी बात करे, वह व्यक्त परमेश्वर के सार-तत्व को ही करता है—यह सब सत्य होता है और यही तो मानव-मात्र को चाहिए।