सत्य को खोजने वाले सभी लोगों का हम से सम्पर्क करने का स्वागत करते हैं

वचन देह में प्रकट होता है

ठोस रंग

विषय-वस्तुएँ

फॉन्ट

फॉन्ट का आकार

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

0 खोज परिणाम

कोई परिणाम नहीं मिला

`

ग्यारहवें कथन की व्याख्या

मनुष्य की नग्न आँखों के लिए, ऐसा प्रतीत होता है कि इस अवधि में परमेश्वर के कथनों में कोई बदलाव नहीं हुआ है, जो कि इसलिए है क्योंकि लोग उस व्यवस्था को समझने में असमर्थ हैं जिसके द्वारा परमेश्वर बोलता है, और उसके वचनों के संदर्भ को नहीं समझते हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, लोग नहीं मानते कि इन वचनों में कोई नया रहस्य है; इस प्रकार, वे ऐस जीवन जीने में असमर्थ हैं जो असाधारण रूप से नए हैं, और इसके बजाय ऐसे जीवन जीते हैं जो गतिहीन और बेजान हैं। किन्तु परमेश्वर के कथनों में, हम देखते हैं कि इनमें गहरे स्तर का अर्थ है, ऐसा जो मनुष्य के लिए अथाह और अगम्य दोनों है। आज, मनुष्य के लिए परमेश्वर के ऐसे वचनों को पढ़ने के लिए पर्याप्त रूप से भाग्यशाली होना ही सभी आशीषों में सबसे बड़ा है। यदि इन वचनों को कोई भी नहीं पढ़ता, तो मनुष्य सदैव अभिमानी, दंभी, स्वयं से अनभिज्ञ, और इस बात से अनजान होता कि उसकी कितनी असफलताएँ हैं। परमेश्वर के गहन, अथाह वचनों को पढ़ने के बाद, लोग चुपके से उनकी प्रशंसा करते हैं, और उनके हृदयों में, सच्चा दृढ़ विश्वास होता है जिसमें झूठ का दाग नहीं होता; उनके हृदय खरेबन जाते हैं, न कि नकली माल। वास्तव में लोगों के हृदय में यही होता है। हर एक के हृदय में उसकी अपनी कहानी है। ऐसा लगता है मानो कि वे स्वयं से कह रहे हों: सर्वाधिक संभावना है कि यह परमेश्वर स्वयं द्वारा बोला गया था—यदि परमेश्वर नहीं, तो और कौन ऐसे वचनों को बोल सकता था? मैं उन्हें क्यों नहीं कह सकता हूँ? मैं क्यों ऐसा कार्य करने में अक्षम हूँ? ऐसा प्रतीत होता है कि देहधारी परमेश्वर जिसके बारे में परमेश्वर बोलता है सच में वास्तविक है, और परमेश्वर स्वयं है! मैं और अधिक संदेह नहीं करूँगा। अन्यथा, निश्चय ही ऐसा हो सकता है कि जब परमेश्वर का हाथ आएगा, तो पछतावे के लिए बहुत देर हो जाएगी! ... अधिकांश लोग अपने हृदय में ऐसा ही सोचते हैं। यह कहना उचित है कि, जब से परमेश्वर ने बोलना शुरू किया तब से आज तक, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के सहारे के बिना गिर गए होते। ऐसा क्यों कहा जाता है कि यह सब कार्य परमेश्वर स्वयं के द्वारा किया जाता है, और मनुष्य के द्वारा नहीं? यदि परमेश्वर कलीसिया के जीवन को सहारा देने के लिए वचनों का उपयोग नहीं करता, तो हर कोई बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाता। क्या यह परमेश्वर की सामर्थ्य नहीं है? क्या यह सच में मनुष्य की वाक्पटुता है? क्या यही मनुष्य की विलक्षण प्रतिभाएँ है? बिलकुल नहीं! विश्लेषण के बिना, किसी को नहीं पता होगा कि उसकी नसों में किस प्रकार का रक्त बह रहा है, वे इस बात से अनभिज्ञ होंगे कि उनके कितने हृदय हैं, या कितने मस्तिष्क हैं, और उन सभी को लगेगा कि वे परमेश्वर को जानते हैं। क्या वे नहीं जानते हैं कि उनके ज्ञान में अभी भी विरोध निहित है? कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर कहता है कि, "मानवजाति में प्रत्येक व्यक्ति को मेरे आत्मा के अवलोकन को स्वीकार करना चाहिए, अपने हर वचन और कार्य की बारीकी से जाँच करनी चाहिए, और इसके अलावा, मेरे चमत्कारिक कर्मों पर विचार करना चाहिए।" इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के वचन निरुद्देश्य और आधारहीन नहीं हैं। परमेश्वर ने कभी भी किसी भी मनुष्य के साथ अन्यायपूर्ण ढंग से व्यवहार नहीं किया है; यहाँ तक कि अय्यूब को भी, उसके समस्त विश्वास के होते हुए भी, क्षमा नहीं किया गया था—उसका भी विश्लेषण किया गया था, और उसे अपनी शर्म से छुपने के लिए कहीं का नहीं छोड़ा था। और आज के लोगों के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं है। इस प्रकार, परमेश्वर तत्काल पूछता है: "पृथ्वी पर राज्य के आगमन के समय तुम लोग कैसा महसूस करते हो?" परमेश्वर के प्रश्न के मायने कम हैं, किन्तु यह लोगों को व्याकुल कर देता है: हम क्या महसूस करते हैं? हम अभी भी नहीं जानते हैं कि राज्य कब आएगा, तो हम भावनाओं की बात कैसे कर सकते हैं? इससे अधिक और क्या, हमें कोई भनक नहीं है। यदि मुझे कुछ महसूस करना पड़ता, तो मैं "चकित" होता, और कुछ नहीं। वास्तव में, यह प्रश्न परमेश्वर के वचनों का उद्देश्य नहीं है। सबसे अधिक, "जब मेरे पुत्र एवं लोग मेरे सिंहासन की ओर वापिस प्रवाहित होते हैं, तो मैं महान सफेद सिंहासन के सम्मुख औपचारिक रूप से न्याय आरम्भ करता हूँ," यह अकेला वाक्य समस्त आध्यात्मिक क्षेत्र के घटनाक्रमों का सार निकालता है। कोई भी नहीं जानता है कि इस समय के दौरान परमेश्वर आध्यात्मिक क्षेत्र में क्या करना चाहता है, और जब परमेश्वर इन वचनों को कहता है तो केवल उसके बाद ही लोगों में थोड़ी सी जागृति आती है। क्योंकि परमेश्वर के कार्य के भिन्न-भिन्न कदम हैं, पूरे विश्व में परमेश्वर का कार्य भी भिन्न होता है। इस समय के दौरान, परमेश्वर मुख्यतः परमेश्वर के पुत्रों और लोगों को बचाता है, जिसका मतलब है कि, स्वर्गदूतों द्वारा चरवाही किए गए, परमेश्वर के पुत्र और लोग निपटाया और टूटा जाना स्वीकार करना शुरू करते हैं, वे आधिकारिक रूप से अपने विचारों और अवधारणाओं को दूर करना, और दुनिया के तरीकों से अलविदा कहना शुरू करते हैं; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा बोला गया "महान सफेद सिंहासन के सम्मुख न्याय" आधिकारिक रूप से आरंभ होता है। क्योंकि यह परमेश्वर का न्याय है, इसलिए परमेश्वर अपनी वाणी बोलनी ही चाहिए—और यद्यपि विषयवस्तु भिन्न होती है, फिर भी उद्देश्य हमेशा एक समान होता है। आज, जिस स्वर से परमेश्वर बोलता है उससे आँकने पर, ऐसा लगता है कि उसके वचन लोगों के एक निश्चित समूह पर निर्देशित है। वास्तव में, सबसे ज़्यादा, ये वचन समस्त मानवजाति की प्रकृति को संबोधित करते हैं। वे सीधे मनुष्य की रीढ़ की हड्डी पर लगते हैं, वे मनुष्यों की भावनाओं को नहीं छोड़ते हैं, और वे उसके सार की समग्रता को प्रकट करते हैं, कुछ भी नहीं छोड़ते हैं, कुछ भी नहीं जाने देते हैं। आज से आरंभ करके, परमेश्वर आधिकारिक रूप से मनुष्य के असली चेहरे को प्रकट करता है, और इस प्रकार "अपनी आत्मा की आवाज़ को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जारी करता है।" अंततः जो प्रभाव प्राप्त होता है वह है "मेरे वचनों के माध्यम से, मैं उनमें से सभी लोगों और चीज़ों को धो कर साफ कर दूँगा जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर हैं, ताकि भूमि अब और अधिक गंदी और व्यभिचारी नहीं हो, बल्कि एक पवित्र राज्य हो।" ये वचन राज्य का भविष्य प्रस्तुत करते हैं, जो कि पूरी तरह से मसीह के राज्य का है, ठीक जैसे कि परमेश्वर ने कहा था, "सब अच्छा फल है, सभी मेहनती किसान हैं।" स्वाभाविक रूप से, यह पूरे विश्व में घटित होगा, और सिर्फ चीन तक सीमित नहीं है।

जब परमेश्वर बोलना और कार्य करना आरंभ करता है केवल तभी लोगों को अपनी धारणाओं में उसके बारे में थोड़ा ज्ञान होता है। आरंभ में, यह ज्ञान केवल उनकी धारणाओं में ही विद्यमान होता है, किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता है, लोगों को यह महसूस होना शुरू हो जाता है कि उनके स्वयं के विचार अत्यधिक बेकार और अनुचित हैं; इस प्रकार, वे उन सब पर विश्वास करने लगते हैं जो परमेश्वर कहता है, इस हद तक कि वे "अपनी चेतना में व्यवहारिक परमेश्वर के लिए स्थान बनाते हैं।" यह केवल उनकी चेतना में है कि लोगों के पास व्यावहारिक परमेश्वर के लिए जगह है। वास्तविकता में, हालाँकि, वे परमेश्वर को नहीं जानते, और खोखले वचनों के अलावा और कुछ नहीं बोलते हैं। फिर भी अतीत की तुलना में, उन्होंने बहुत अधिक प्रगति की है—यद्यपि वे अभी भी व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं से बहुत दूर हैं। क्यों परमेश्वर हमेशा कहता है, "प्रत्येक दिन मैं लोगों के अनवरत प्रवाह के बीच चलता हूँ, और प्रत्येक दिन मैं प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कार्य करता हूँ"? परमेश्वर जितना अधिक ऐसी बातें कहता है, लोग उतना ही अधिक आज के व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं के कार्यों से उनकी तुलना कर सकते हैं, और इसलिए वे वास्तविकता में व्यावहारिक परमेश्वर को बेहतर ढंग से जान सकते हैं। क्योंकि परमेश्वर के वचनों को देह के परिप्रेक्ष्य से बोला जाता है, और मानवजाति की भाषा का उपयोग करके कहा जाता है, इसलिए लोग उन्हें भौतिक चीज़ों से माप कर परमेश्वर के वचनों की सराहना करने में सक्षम होते हैं, और फलस्वरूप एक अधिक बड़ा प्रभाव प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, बार-बार परमेश्वर लोगों के दिलों में "स्वयं" की छवि की और वास्तविकता में "स्वयं" की बात करते हैं, जिससे लोग अपने हृदय में परमेश्वर की छवि को शुद्ध करने के लिए और अधिक इच्छुक हो जाते हैं, और इस प्रकार व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं को जानने और उसके साथ संलग्न होने के इच्छुक हो जाते हैं। यह परमेश्वर के वचनों की बुद्धि है। परमेश्वर जितना अधिक ऐसी बातें कहता है, उतना ही अधिक लोगों के परमेश्वर के ज्ञान को लाभ मिलता है, और इस लिए परमेश्वर कहता है, "यदि मैं देहधारी नहीं होता, तो मनुष्य ने मुझे कभी भी नहीं जाना होता, और यहाँ तक कि उसने मुझे जान भी लिया होता, तो क्या इस प्रकार का ज्ञान अभी भी एक धारणा नहीं होता?" निस्संदेह, यदि लोगों को अपनी धारणाओं के अनुसार परमेश्वर को जानना अपेक्षित होता, तो यह उनके लिए आसान होता, वे आराम से और खुश होते, और इस प्रकार परमेश्वर हमेशा के लिए अस्पष्ट होता, और लोगों के हृदयों में व्यावहारिक नहीं होता, जिससे साबित होता कि शैतान, न कि परमेश्वर, पूरे ब्रह्मांड पर प्रभुत्व रखता है; इस प्रकार, परमेश्वर के वचन कि "मैंने अपनी सामर्थ्य वापस ले ली है" हमेशा के लिए खोखले रह जाते।

जब दिव्यता सीधे कार्य करना शुरू करती है तभी वह समय भी होता है कि राज्य आधिकारिक रूप से मनुष्य की दुनिया में उतरता है। किन्तु यहाँ जो कहा गया है वह है कि राज्य मनुष्य के बीच उतरता है, यह नहीं कि राज्य मनुष्य के बीच रूप लेता है—और इस प्रकार आज जो बोला जाता है वह राज्य का निर्माण है, और न कि यह कैसे रूप लेता है। क्यों परमेश्वर हमेशा कहता है कि "सभी चीज़ें मौन हो जाती हैं"? क्या ऐसा हो सकता है कि सभी चीजें रुक कर स्थिर हो जाती हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि बड़े-बड़े पहाड़ सचमुच मौन हो जाते हैं? तो लोगों को इस बात की कोई समझ क्यों नहीं है? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर का वचन गलत है? या परमेश्वर अतिशयोक्ति कर रहा है? क्योंकि परमेश्वर जो कुछ भी करता है वह एक निश्चित वातावरण में किया जाता है, इसलिए कोई भी इसके बारे में नहीं जानता है, या इसे अपनी स्वयं की आँखों से देखने में सक्षम नहीं है, और लोग बस इतना कर सकते हैं कि वेपरमेश्वर को बोलते हुए सुनें। क्योंकि जिस महिमा के साथ परमेश्वर कार्य करता है उसके कारण, जब परमेश्वर आता है, तो ऐसा लगता है मानो कि स्वर्ग में और पृथ्वी पर भारी परिवर्तन हुआ है; और परमेश्वर को, ऐसा प्रतीत होता है कि सभी इस क्षण को देख रहे हैं। आज, तथ्य अभी तक ज्ञात नहीं हुए हैं। लोगों ने परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ के केवल छोटे से हिस्से को ही सीखा है। सही अर्थ उस समय की प्रतीक्षा करत है जब वे अपनी धारणाओं को शुद्ध करते हैं; केवल तभी वे अवगत हो जाएँगे कि देहधारी परमेश्वर आज पृथ्वी पर और स्वर्ग में क्या कर रहा है। चीन में परमेश्वर के लोगों में न केवल बड़े लाल अजगर का जहर है। इसलिए, उनमें बड़े लाल अजगर की प्रकृति भी अधिक प्रचुर मात्रा में, और अधिक स्पष्ट रूप से, प्रकट होती है। किन्तु परमेश्वर इस बारे में प्रत्यक्ष रूप से बात नहीं करता है, बड़े लाल अजगर के जहर के बारे में मात्र थोड़ा सा उल्लेख करता है। इस तरह, वह प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के दाग़ों को उजागर नहीं करता है, जो मनुष्य की प्रगति के लिए अधिक लाभकारी है। बड़े लाल अजगर के सपोले दूसरों के सामने बड़े लाल अजगर के वंशज कहलाना पसंद नहीं करते हैं। ऐसा लगता है मानो कि "बड़ा लाल अजगर" ये शब्द उन पर शर्मिंदगी लाता है; उनमें से कोई भी इन शब्दों के बारे में बात करने को तैयार नहीं है, और इस प्रकार परमेश्वर केवल यह कहता है, "मेरे कार्य का यह चरण मुख्य रूप से तुम लोगों के ऊपर केन्द्रित है, और चीन में मेरे देहधारण के महत्व का एक पहलू है।" अधिक सटीक रूप से, परमेश्वर मुख्यतः बड़े लाल अजगर के सपोलों के मूलप्रतिनिधियों को जीतने के लिए आता है, जो कि चीन में परमेश्वर के देहधारण का महत्व है।

"जब मैं व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के बीच आता हूँ, तो स्वर्गदूत साथ-साथ चरवाही का कार्य आरम्भ कर देते हैं।" वास्तव में, इसे अक्षरशः नहीं लिया जाता है कि जब स्वर्गदूत सभी लोगों के बीच अपना कार्य शुरू करते हैं तभी परमेश्वर का आत्मा मनुष्य की दुनिया में आता है। इसके बजाय, कार्य के दो अंश—दिव्यता का कार्य और स्वर्गदूतों की चरवाही—साथ-साथ किए जाते हैं। इसके बाद, परमेश्वर स्वर्गदूतों की चरवाही के बारे में थोड़ी बात करता है। जब वह कहता है कि "सभी पुत्र और लोग न केवल परीक्षाओं और चरवाही को प्राप्त करते हैं, बल्कि अपनी स्वयं की आँखों से सभी प्रकार के दर्शनों को देखने में समर्थ भी हो जाते हैं," तो अधिकांश लोगों को "दर्शन" शब्द के बारे में बहुत सी कल्पनाएँ होती हैं। दर्शन लोगों की कल्पनाओं में अलौकिक घटनाओं को संदर्भित करता है। किन्तु कार्य की विषय-वस्तु व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं का ज्ञान बना रहता है। दर्शन वे साधन हैं जिनके द्वारा स्वर्गदूत कार्य करते हैं। वे लोगों को स्वर्गदूतों के अस्तित्व का बोध होने देते हुए, उन्हें भावनाएँ या सपने दे सकते हैं। किन्तु स्वर्गदूत मनुष्यों के लिए अदृश्य रहते हैं। जिस तरीके से वे परमेश्वर के पुत्रों और लोगों के बीच कार्य करते हैं, वह उन्हें प्रत्यक्ष रूप से प्रबुद्ध और रोशन करने के लिए है, जिसमें उनसे निपटना और उनका टूटना जुड़ा होता है। वे शायद ही कभी धर्मोपदेश देते हैं। स्वाभाविक रूप से, लोगों के बीच समागम तो अपवाद है; यही चीन के बाहर के देशों में हो रहा है। परमेश्वर के वचनों में समस्त मानवजाति की रहने की परिस्थितियों का प्रकटन सम्मिलित है—स्वाभाविक रूप से, यह मुख्य रूप से बड़े लाल अजगर के सपोलों पर निर्देशित है। समस्त मानवजाति की विभिन्न आध्यात्मिक अवस्थाओ में से, परमेश्वर उन का चयन करता है जो आदर्श के रूप में काम आने के लिए प्रतिनिधिक हैं। इस प्रकार, परमेश्वर के वचन लोगों को नग्न कर देते हैं, और उन्हें कोई शर्म नहीं आती है, या उनके पास चमकते हुए प्रकाश से छिपने का कोई समय नहीं होता है, और वे अपने ही खेल में पराजित हो जाते हैं। मनुष्य के कई व्यवहार बहुत सी कलाकृतियाँ हैं, जिन्हें परमेश्वर ने प्राचीन काल से आज तक बनाया है, और वह आज से कल तक बनाएगा। वह जो कुछ भी चित्रित करता है वह सब मनुष्य की कुरूपता है: कुछ लोग, अपनी आँखों की दृष्टि खो जाने के कारण दुःखी प्रतीत होते हुए अंधेरे में रोते हैं, कुछ हँसते हैं, कुछ को बड़ी-बड़ी लहरों के थपेड़े पड़ते हैं, कुछ लहरदार पहाड़ी सड़कों पर चलते हैं, कुछ लोग, मात्र धनुष-टंकार से चौंके हुए पक्षी की तरह, पहाड़ों में जंगली जानवरों द्वारा खाये जाने से भयभीत, काँपते हुए, विशाल बीहड़ के बीच खोज करते हैं। परमेश्वर के हाथों में, ये बहुत से बदसूरत व्यवहार मार्मिक, सजीव झाँकियाँ बन जाते हैं, उनमें से अधिकाँश देखने में बहुत भयानक होते हैं, या अन्यथा लोगों के रोंगटे खड़े करने और उन्हें व्यग्र और भ्रमित करने के लिए पर्याप्त होते हैं। परमेश्वर की नज़रों में, मनुष्य में जो कुछ भी अभिव्यक्त होता है वह केवल कुरूपता है, और भले ही यह करुणा उत्पन्न कर सकती है, फिर भी यह कुरूपता है। परमेश्वर से मनुष्य के मतभेद का बिंदुपथ यह है कि मनुष्य की कमजोरी दूसरों के प्रति दया दिखाने की उसकी प्रवृत्ति में निहित है। हालाँकि, परमेश्वर हमेशा मनुष्य के प्रति एकसा ही रहा है, जिसका अर्थ है कि उसका हमेशा एकसा दृष्टिकोण था। वह हमेशा ऐसा दयावान नहीं है जैसा कि लोग कल्पना करते हैं, एक अनुभवी माँ की तरह जिसके बच्चे हमेशा उसके मन में सबसे आगे रहते हैं। वास्तविकता में, यदि परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को जीतने के लिए कई तरीकों को काम में नहीं लाना चाहा होता, तो ऐसा हो ही नहीं सकता था कि वह स्वयं को मनुष्य की सीमाओं के अधीन करने देते हुए, इस तरह के अपमानों के प्रति आत्मसमर्पण करता। परमेश्वर की प्रकृति के अनुसार, लोग जो कुछ भी करते और कहते हैं वह सब परमेश्वर के कोप को भड़काता है, और उन्हें ताड़ित किया जाना चाहिए। परमेश्वर की नज़रों में, उनमें से एक भी मानक पर खरा नहीं उतरता है, और प्रत्येक परमेश्वर के हमलों का लक्ष्य है। चीन में परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों के कारण, और, इसके अलावा, बड़े लाल अजगर की प्रकृति के कारण, और इस कारण भी कि चीन बड़े लाल अजगर का देश है, और ऐसी भूमि है जिसमें देहधारी परमेश्वर रहता है, परमेश्वर को अपने क्रोध को निगल जाना होगा और बड़े लाल अजगर के सभी सपोलों को जीत लेना होगा; फिर भी वह बड़े लाल अजगर के सपोलों से हमेशा घृणा करता रहेगा, अर्थात् वह बड़े लाल अजगर से आने वाली सभी चीजों से हमेशा घृणा करेगा—और यह कभी भी नहीं बदलेगा।

किसी को भी कभी भी परमेश्वर के किसी भी कार्य के बारे में पता नहीं चला है, न ही उसके कार्यों को कभी भी किसी भी चीज़ के द्वारा देखा गया है। उदाहरण के लिए, जब परमेश्वर सिय्योन में वापस आया, तो इस बारे में कौन जानता था? इस प्रकार, "मैं चुपचाप मनुष्यों के बीच आता हूँ, और चुपचाप चला जाता हूँ। क्या किसी ने कभी मुझे देखा है?" जैसे वचन दर्शाते हैं कि मनुष्य में निस्संदेह आध्यात्मिक क्षेत्र की घटनाओं को स्वीकार करने के लिए योग्यताओं का अभाव है। अतीत में, सिय्योन में लौटने के दौरान, परमेश्वर ने कहा था "सूर्य तेजस्वी है, चंद्रमा चमकदार है"। क्योंकि लोग अभी भी सिय्योन में परमेश्वर की वापसी के साथ व्यस्त हैं—क्योंकि वे अभी तक इसे भूले नहीं हैं—इसलिए, लोगों की धारणाओं के अनुरूप होने के लिए, परमेश्वर "सूर्य तेजस्वी है, चंद्रमा चमकदार है" वचनों को सीधे कहता है। परिणामस्वरूप, जब लोगों की धारणाओं को परमेश्वर के वचनों से चोट पहुँचती है, तो वे देखते हैं कि परमेश्वर के कार्य बहुत चमत्कारिक हैं, और देखते हैं कि उसके वचन गहरे और अथाह हैं, और सभी के लिए अबूझनीय हैं; इसलिए, वे इस मामले को पूरी तरह से अलग रख देते हैं, और अपनी आत्माओं में थोड़ी स्पष्टता महसूस करते हैं, मानो कि परमेश्वर पहले से ही सिय्योन में लौट आया हो, और इसलिए लोग इस मामले पर अधिक ध्यान नहीं देते हैं। तब से, वे परमेश्वर के वचनों को एक हृदय और एक मन से स्वीकार करते हैं, तथा अब और झुँझलाते नहीं हैं कि परमेश्वर के सिय्योन में लौटने के बाद तबाही आएगी। केवल तभी लोगों के लिए, परमेश्वर के वचनों पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित करते हुए, और उन्हें कुछ और विचार करने की इच्छा के बिना छोड़ते हुए, परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करना आसान है।

पिछला:परिशिष्ट 1: पहला कथन

अगला:तेरहवें कथन की व्याख्या

शायद आपको पसंद आये