93 राज्य के युग में, वचन सब पूर्ण करते हैं

1

राज्य के युग में, परमेश्वर लेकर चलेगा वचनों से नवयुग में।

वो अपने काम का साधन बदलता है, नये युग में वचन से काम करता है।

हो... वचन-युग में इसी आदर्श पर वो काम करता है।

अलग पदवी से वो बोलता है देह में आकर,

कि परमेश्वर को देखे आंख से इन्सां, वचन को देह में आते,

करिश्मा उसका और उसके ज्ञान की धारा।

मानव को विजय करना, उसे पूर्ण बनाना, और हटा देना,

यही है लक्ष्य सारे काम का।

यही हैं मायने सच्चे वचन के युग में वचन से काम करने के।

2

हो... वचन से ही परमेश्वर के काम और स्वभाव की पहचान होती है।

वचन से ही इंसान अपना सार जान पाता है,

कहां जाना है, ये पहचान पाता है।

वचन-युग में वचन से परमेश्वर के काम होते हैं।

वचन से ही इंसां दूर होता है, प्रकट होता, उसका इम्तहान होता है।

वचन को देखता, सुनता है मानव, और उसके अस्तित्व को पहचानता है।

परमेश्वर के अस्तित्व, सर्वशक्तिमत्ता, बुद्धि को, वो जानता है,

परमेश्वर का प्रेमी दिल, मानव के लिए है, वो मानता है,

वो मानव को बचाना चाहता है।

वचन सीधा-सरल है,

मगर निकला परमेश्वर के मुख से है, जो देह में है,

हिला देता है, धरती को, जन्नत को,

बदलता है दिल, धारणा, स्वभाव मानव का, और दुनिया पुरानी।

3

युगों-युगों से इस तरह बस, आज का परमेश्वर कहता है,

काम करता बचाता मानव को है।

है मानव रहनुमाई में वचन की,

वचन ही राह दिखलाता, वचन पोषण भी करता है।

वचन की दुनिया में इंसान रहता है,

परमेश्वर के वचन के शाप और आशीष में इंसान रहता है।

इन्हीं वचनों से, कितने, न्याय और ताड़ना पाते हैं।

हो..... वचन और काम से इंसान बचता है,

परमेश्वर की इच्छा फलती है, पुराना जग बदलता है।

परमेश्वर ने वचन से दुनिया बनाई, और अगुवाई करता है,

वचन से जीतता है और उनको बचाता है।

और समय की पूर्णता में,

पुरानी दुनिया का अपने वचन से अंत कर देगा।

यही है आख़िरी मंज़िल, परमेश्वर की पूरी योजना की।

यही है आख़िरी मंज़िल, परमेश्वर की पूरी योजना की।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से रूपांतरित

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