469 परमेश्वर के वचनों की महत्ता

I

परमेश्वर के विश्वासियों का कम से कम बर्ताव बेहतर होना चाहिये।

है सबसे अहम परमेश्वर के वचन रखना।

चाहे कुछ हो जाए, परमेश्वर के वचन से दूर न जाना।

परमेश्वर को जानना, ख़ुश करना, होता है उसके वचन से।

तमाम पंथ, देश और सम्प्रदाय

जीते जाएँगे भविष्य में उसके वचन से।

सीधे बात करेगा परमेश्वर लोगों से,

अपने हाथों में थामेंगे लोग उसके वचन।

लोग इसके ज़रिये पूर्ण बनाए जाँएगे,

हर जगह फैलते हैं परमेश्वर के वचन।

अभ्यास करते हैं, बोलते हैं लोग परमेश्वर के वचन,

अंतर में जो रखे हैं, वो भी हैं परमेश्वर के वचन।

जिनका इस्तेमाल करता है परमेश्वर बोल सकते हैं वो उसके वचन।

बोल नहीं सकते अगर तुम, तो ज़ाहिर है इससे,

कार्य नहीं किया पवित्र आत्मा ने तुम में,

पूर्णता हासिल नहीं की है तुमने।

यही अहमियत है परमेश्वर के वचन की,

परमेश्वर के वचन की, परमेश्वर के वचन की।


II

पूर्ण बनाए जाते हैं वे, भरे हुए हैं जो

भीतर-बाहर परमेश्वर के वचन से।

गवाही देते जो, इच्छा पूरी करते जो परमेश्वर की,

हैं वे जिन्होंने अपनी वास्तविकता बनाया है परमेश्वर के वचन को।

वचन के युग में प्रवेश करना,

जाना जाता है जिसे हज़ार साल के राज्य-युग के रूप में,

है ऐसा काम किया जा रहा है पूरा जिसे।

अभ्यास करो संगति का जो कहता है परमेश्वर।

खाकर, अनुभव कर, उसके वचन तुम,

दिखा सकते हो परमेश्वर के वचन तुम।

अनुभव के वचनों के बिना,

परमेश्वर के वचनों के बिना, किसी को कायल नहीं,

नहीं कर पाओगे तुम, नहीं कर पाओगे तुम।

जिनका इस्तेमाल करता है परमेश्वर बोल सकते हैं वो उसके वचन।

बोल नहीं सकते अगर तुम, तो ज़ाहिर है इससे,

कार्य नहीं किया पवित्र आत्मा ने तुम में,

पूर्णता हासिल नहीं की है तुमने।

यही अहमियत है परमेश्वर के वचन की,

परमेश्वर के वचन की, परमेश्वर के वचन की।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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