सत्य का अनुसरण कैसे करें (15)

क्या तुम लोगों ने अपनी सभाओं में उन विषयों पर संगति की है जिन पर हम हाल में चर्चा करते रहे हैं? (हे परमेश्वर, हमने अपनी सभाओं में इन विषयों पर संगति की है।) तुम्हारी संगति का क्या परिणाम निकला? क्या तुम्हें किसी नई बात या समझ के बारे में पता चला? जिन विषयों पर हमने संगति की है क्या वे लोगों के दैनिक जीवन में मौजूद हैं? (सभी विषय मौजूद हैं। इन विषयों पर परमेश्वर की संगति को कुछ बार सुनने के बाद मैंने पाया कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे माता-पिता और हमारे परिवारों की शिक्षा ने हमें बड़ी गहराई से भ्रष्ट कर दिया है। बचपन से ही हमारे माता-पिता ने थोड़ा-थोड़ा करके ये विचार हमारे भीतर पिरो दिए हैं, जैसे कि, “एक व्यक्‍ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है।” मुझमें यह विचार पिरो दिए जाने के बाद मुझे विश्वास हो गया कि डराए-धमकाए जाने और नीची नजरों से देखे जाने से बचने के लिए, हमें बाकी सबसे बेहतर होना चाहिए और जीवन में भीड़ से अलग खड़े होना चाहिए। पहले मुझे लगता था कि हमारे माता-पिता द्वारा हमें सिखाए गए ये विचार हमारी भलाई और रक्षा के लिए हैं। कुछ बार परमेश्वर की संगति और विश्लेषण के बाद मुझे यह एहसास हो गया है कि ये विचार नकारात्मक हैं और लोगों को भ्रष्ट करने के शैतान के साधन हैं। ये हमें परमेश्वर से बहुत ज्यादा दूर कर देते हैं।) संक्षेप में कहें तो इन विषयों के बारे में संगति करना जरूरी है, है कि नहीं? (हाँ, जरूरी है।) इन विषयों पर कुछ बार संगति करने के बाद, लोग उनके परिवारों द्वारा उनमें पिरोए गए विचारों और नजरियों की गहरी समझ हासिल कर लेते हैं, और वे उन्हें ज्यादा सही ढंग से समझ लेते हैं। इन चीजों के बारे में संगति करने के बाद, क्या लोगों के अपने परिवारों और माता-पिता से रिश्तों में दूरी नहीं आ जाएगी? (नहीं, नहीं आएगी। पहले, मुझे हमेशा लगता था कि मेरे माता-पिता ने मेरे प्रति दया दिखाई है, लेकिन परमेश्वर की संगति सुनने के बाद मुझे एहसास हो गया है कि मेरे माता-पिता का उद्देश्य मुझे जन्म देना और पाल-पोस कर बड़ा करना था। इसके अलावा, बचपन से ही उन्होंने जो विचार मुझमें पिरोए थे वे मुझे भ्रष्ट कर रहे थे। यह पहचान लेने के बाद उनके साथ मेरे संबंध ज्यादा स्नेहपूर्ण नहीं हैं।) सबसे पहले तो अपने विचारों के मामले में, लोगों को अब अपने माता-पिता की जिम्मेदारियों और उन्हें पाल-पोस कर बड़ा करने में दिखाए अनुग्रह की बिल्कुल सही समझ है; वे अब उनसे पेश आने में स्नेह, गर्ममिजाजी या शारीरिक रक्त संबंधों पर भरोसा नहीं करते। इसके बजाय वे अपने परिवार और माता-पिता से तार्किक ढंग से सही नजरिये और स्थान से पेश आ सकते हैं। इस तरह लोग ये मसले सँभालने को लेकर एक अहम परिवर्तन से गुजरते हैं, और यह परिवर्तन उन्हें जीवन प्रवेश और परमेश्वर की उनसे अपेक्षाओं के संदर्भ में बड़ी लंबी छलांग लगाने देता है। इसलिए इन विषयों के बारे में संगति करना लोगों के लिए लाभकारी और जरूरी है, क्योंकि ये वो तमाम चीजें हैं जिनकी लोगों को जरूरत है और जिनका उनमें अभाव है।

पहले हमने एक व्यक्ति के परिवार द्वारा उसे दी गई शिक्षा को लेकर जिन विषयों पर संगति की थी, उनमें दूसरी कई चीजों के साथ, मुख्य रूप से स्वयं के आचरण के लक्ष्य और सिद्धांत, दुनिया से निपटने के तरीके और साधन और जीवन और अस्तित्व पर व्यक्ति के नजरिये, जीवित रहने के तरीके और नियम शामिल थे। ये सब वे विषय हैं जो लोगों के विचारानुकूलन और उनके विचारों और नजरियों से जुड़े हुए हैं। कुल मिलाकर परिवारों और माता-पिता द्वारा पिरोये गए कोई भी विचार और नजरिये सकारात्मक नहीं हैं, और इनमें से कोई भी किसी व्यक्ति को सही पथ का सच्चा मार्गदर्शन नहीं दे सकता, या जीवन पर सही नजरिया रखने में मदद नहीं कर सकता, ताकि वे सृष्टिकर्ता की मौजूदगी में एक सृजित प्राणी की जिम्मेदारियाँ और दायित्व निभाने योग्य बन सकें। माता-पिता और परिवार तुम्हें जो-कुछ भी सिखाते हैं, वह तुम्हें संसार और उसकी बुरी प्रवृत्तियों की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए होता है। इन विचारों और नजरियों से तुम्हें सिखाने का उनका प्रयोजन समाज और बुरी प्रवृत्तियों में तुम्हारे आसानी से घुल-मिल जाने और बुरी प्रवृत्तियों और विविध सामाजिक माँगों में बेहतर ढंग से ढल जाने में मदद के लिए होता है। एक ओर तो ये शिक्षाएँ तुम्हें रक्षा के खास साधन और तरीके और साथ ही समाज और लोगों के समूहों में बेहतर हैसियत, शोहरत, भौतिक आनंद और दूसरी चीजें हासिल करने के तरीके दे सकती हैं, तो दूसरी ओर तुम्हारे परिवार द्वारा तुम्हारे भीतर पिरोए गए यही विचार तुम्हें एक बुरी प्रवृत्ति से दूसरी में आगे बढ़ाते जाते हैं, जिससे तुम इस दुनिया, समाज और बुरी प्रवृत्तियों में इतना फँस जाते हो कि खुद को बाहर नहीं निकाल पाते। ये तुम्हें एक-के-बाद-एक मुसीबत में डाल देते हैं, बारंबार दुविधा में डाल देते हैं, और तुम समझ नहीं पाते कि इंसानी दुनिया का सामना कैसे करें, ऐसा सच्चा इंसान कैसे बनें जो प्रकाश में जिए, ईमानदार और दयावान हो, और जिसमें न्याय की भावना हो। इसलिए, तुम्हारे परिवार की शिक्षा तुम्हें इस दुनिया में अधिक प्रतिष्ठा, चरित्र और मानवता के साथ जीने में सक्षम नहीं बनाती। इसके बजाय इसके कारण तुम विविध पेचीदा टकरावों और संघर्षों, विविध जटिल आपसी रिश्तों के बीच जीने लगते हो, और यह तुम्हें अनगिनत सांसारिक उलझनों, बंधनों और परेशानियों में झोंक देती है। जब तुम अपने माता-पिता के सामने इन सबके बारे में अपने मन की बात रखते हो, तो वे तुम्हें यह परामर्श देने के लिए तरह-तरह की चालें चलेंगे कि लोगों के बीच जीते समय कैसे ज्यादा धूर्त, चालबाज, दुनियादार इंसान बना जाए जिसे लोग आसानी से पहचान न पाएँ, न कि वे तुम्हें सही दिशा दिखाने, इन चीजों को जाने देकर खुद को मुक्त करने, सृष्टिकर्ता के समक्ष आने और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करने, और साफ तौर पर यह पहचानने में मदद करेंगे कि लोगों की नियति और उनका सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है, और उन्हें परमेश्वर की हर अपेक्षा, उसकी संप्रभुता और आयोजनों को मानना चाहिए। यह उन लोगों की जीने की स्थिति है जिनके परिवारों ने उन्हें विविध विचारों की शिक्षा दी है। संक्षेप में कहें, तो तुम्हारे परिवार द्वारा सिखाए गए विचार, चाहे शोहरत पर जोर देते हों या लाभ पर, दूसरों से प्रतिस्पर्धा करने पर या मित्रता से रहने पर, वे चाहे जिस पर भी जोर दें, आखिरकार वे इंसानी दुनिया में जीवित रहने के तुम्हारे साधनों, तरीकों और नियमों को उस दिशा में आगे बढ़ा सकते हैं, जिससे तुम ज्यादा परिष्कृत, निर्मम, कपटी और द्वेषपूर्ण बन जाओ, बजाय इसके कि वे तुम्हें ज्यादा ईमानदार, दयालु, सच्चा बनाएँ, या इस बात की बेहतर समझ हासिल करने में तुम्हारी मदद करें कि सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं को कैसे समर्पित हों। इसलिए, तुम्हारे परिवार द्वारा दी गई शिक्षा तुम्हें सिर्फ परमेश्वर, सत्य और सकारात्मक चीजों से दूर कर सकता है, तुम्हें इस बारे में अनिश्चित बना सकता है कि इंसानों को जैसे रहना चाहिए वैसे गरिमामय ढंग से कैसे रहें। इसके अलावा, जो विचार तुमने अपने परिवार की शिक्षा से प्राप्त किए, वे तुम्हें ज्यादा-से-ज्यादा संवेदनहीन, कुंद या बोलचाल की भाषा में कहें तो मोटी चमड़ी का बना देते हैं। शुरू में, अपने सहयोगियों, सहपाठियों और मित्रों से झूठ बोलने पर तुम झेंप जाते थे, तुम्हारी धड़कन तेज हो जाती थी, और तुम्हारे जमीर को अपराध बोध होता था। वक्त के साथ ये तमाम सचेतन प्रतिक्रियाएँ धीरे-धीरे मिट जाएँगी : तुम्हारा चेहरे पर शर्म नहीं होगी, दिल तेज नहीं धड़केगा, और अब तुम्हारा जमीर तुम्हें नहीं सताएगा। जीवित रहने के लिए, तुम कोई भी साधन अपना लोगे, यहाँ तक कि अपने माता-पिता, अपने भाई-बहनों और अपने प्रिय मित्रों सहित अपने निकटतम परिजनों को धोखा तक दे दोगे। अपना जीवन सँवारने और अपना सम्मान और आनंद बढ़ाने के लिए तुम उनसे लाभ उठाने की कोशिश करोगे—यह संवेदनहीनता है। शुरुआत में, तुम्हें जरा-सा आत्मदोष महसूस हो सकता है, तुम्हारा जमीर हल्के-से काँप सकता है। वक्त के साथ, ये संवेदनाएँ गायब हो जाएँगी, और तुम खुद को आराम पहुँचाने के लिए और ज्यादा विश्वसनीय कारण इस्तेमाल करोगे, कहोगे, “लोग ऐसे ही होते हैं। इस दुनिया में तुम नर्म-दिल नहीं हो सकते। दूसरों के प्रति नर्म-दिल होना यानी खुद से क्रूर होना है। इस दुनिया में कमजोर लोग ताकतवर लोगों का शिकार बन जाते हैं। ताकतवर फलते-फूलते हैं और कमजोर तबाह हो जाते हैं, विजेता राजा बन जाते हैं और हारनेवाले अपराधी। अगर तुम कामयाब होते हो, तो कोई जाँच नहीं करेगा कि तुम कैसे कामयाब हुए, लेकिन अगर तुम नाकामयाब रहे, तो तुम्हारे पास कुछ भी नहीं बचेगा।” अंत में लोग खुद को मनाने के लिए इन विचारों और नजरियों का प्रयोग करेंगे, इन्हें हर चीज के अपने अनुसरण का आधार और बेशक उद्देश्य प्राप्ति का साधन बनाएँगे। तो फिलहाल तुम सब खुद को कहाँ पाते हो? तुम लोग संवेदनहीनता की हद तक पहुँच गए हो, या अभी नहीं? मान लो कि तुम्हें कोई व्यापार शुरू करना हो, और यह व्यापार तुम्हारे भविष्य से, तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता से, समाज में तुम्हारी शोहरत से जुड़ा हुआ हो। अगर तुम्हारे तरीके काफी कपटी हों और तुम किसी को भी धोखा दे सको, तो फिर तुम बाकी सबसे अच्छा जीवन जियोगे, तुम्हारे पास नकदी का बहुत बड़ा अंबार होगा, और अब तुम्हें किसी की इच्छा के आगे सिर झुकाने की जरूरत नहीं होगी। तब तुम क्या करोगे? क्या तुम इतने संवेदनहीन, इतने निर्मम हो जाओगे कि तुम किसी को भी धोखा दे दो और किसी से भी पैसा बना लो? (मैं शायद ऐसा करूँगा।) तुम शायद ऐसा करोगे। इसे बदलने की जरूरत है; यह मानवता में गहरे पैठा भ्रष्ट स्वभाव है। जब मानवता मौजूद नहीं होती, तो जो बच जाता है वह अपने भ्रष्ट स्वभाव और साथ ही शैतान द्वारा पिरोये गए विविध विचारों और नजरियों के अनुसार जिया हुआ जीवन होता है। जमीर, समझ और शर्म की भावना के बिना किसी व्यक्ति का जीवन महज एक खोखला ढाँचा, एक खाली बर्तन रह जाता है, और वह अपना मूल्य खो देता है। अगर तुममें अभी भी थोड़ी लज्जा बची है और झूठ बोलते, धोखा देते या दूसरों को नुकसान पहुँचाते वक्त तुम यह चुन पाते हो कि तुम ऐसा किसके साथ करोगे, तुम बस किसी को भी हानि नहीं पहुँचा देते, तो तुममें अभी भी थोड़ा जमीर और मानवता बची है। लेकिन अगर तुम बिना किसी रोक-टोक के किसी को भी नुकसान पहुँचा सकते हो तो तुम सच में पूरी तरह से एक जीता-जागता शैतान हो। अगर तुम कहते हो, “मैं अपने माता-पिता, रिश्तेदारों, मित्रों, निष्कपट लोगों और खासकर परमेश्वर के घर के अपने भाई-बहनों को धोखा नहीं दे सकता, और मैं परमेश्वर के चढ़ावों के साथ धोखा नहीं कर सकता,” तो तुममें अभी भी कुछ नैतिक सीमाएँ हैं, और तुम्हें अभी भी थोड़ा जमीर वाला इंसान माना जा सकता है। लेकिन अगर तुममें इतना थोड़ा-सा जमीर और सीमाएँ नहीं हैं, तो तुम इंसान कहलाने लायक नहीं हो। तो तुम सब किस मुकाम पर पहुँच गए हो? क्या तुम लोगों की कुछ सीमाएँ हैं? अगर तुम लोगों के पास मौका होता या तुम्हें कोई वास्तविक जरूरत होती, तो क्या तुम अपने माता-पिता, अपने भाई-बहनों और अपने निकटतम मित्रों को धोखा देते? क्या तुम अपने भाई-बहनों को धोखा देते, उनका फायदा उठाते, या परमेश्वर के चढ़ावों के साथ धोखा करते? अगर तुम्हें ऐसा मौका दिया जाता और कोई कभी पता नहीं लगा पाता, तो क्या तुम ऐसा करते? (अब ऐसा लगता है कि मैं आगे ऐसा नहीं कर सकता।) तुम अब ऐसा क्यों नहीं कर सकते? (क्योंकि मैं परमेश्वर से डरता हूँ, मेरा दिल परमेश्वर का भय मानता है, और इसलिए भी कि मेरा जमीर इसकी इजाजत नहीं देता।) तुम्हारा रवैया है कि तुम दिल से डरते हो, तुम्हारा दिल परमेश्वर का भय मानता है, और तुम्हारा जमीर इसकी इजाजत नहीं देता। चलो, दूसरों को बोलने देते हैं। क्या तुम लोगों में इसको लेकर कोई रवैया है? अगर नहीं है, अगर तुमने कभी भी इस मसले पर विचार नहीं किया, और दूसरों को यह करते हुए देख कर तुम कुछ भी महसूस नहीं करते, तो तुम खतरे में हो। अगर किसी को ऐसा करते हुए देखकर भी तुम्हें घृणा नहीं होती, इस बारे में तुम्हारा कोई रवैया नहीं है, तुम संवेदनहीन महसूस करते हो, तो तुम उनसे बिल्कुल अलग नहीं हो, और संभव है तुम उनके जैसा ही करो। लेकिन, अगर इस बारे में तुम्हारा रवैया स्पष्ट है, अगर तुम ऐसे लोगों से घृणा कर उन्हें फटकार सकते हो, तो शायद तुम ऐसे काम न करो। तो तुम लोगों का रवैया क्या है? (मेरे दिल में परमेश्वर का भय होना चाहिए। परमेश्वर के चढ़ावे पवित्र मानकर अलग रखे जाते हैं, और उनके साथ बिल्कुल छेड़छाड़ नहीं की जा सकती या उन्हें निजी उपयोग के लिए नहीं लिया जा सकता।) चढ़ावों का निजी उपयोग नहीं किया जाना चाहिए : यह दंड के डर से किया जाता है। लेकिन दूसरे मामलों का क्या? अगर तुम किसी पिरामिड योजना से जुड़े होते, तो क्या तुम अपने निकटतम मित्रों का लाभ उठा सकते थे, चिकनी-चुपड़ी बातों से उन्हें धोखा दे सकते थे, और उन्हें अपनी योजना में शामिल कर इससे फायदा और पैसा कमा सकते थ? क्या तुम अपने निकटतम मित्रों, रिश्तेदारों, अपने माता-पिता या भाई-बहनों के साथ भी यह कर सकते हो? अगर तुम्हारे लिए यह बताना मुश्किल हो, तो जब तुम कहते हो कि तुम निजी उपयोग के लिए परमेश्वर के चढ़ावे नहीं लोगे, तो शायद यह तुम्हारे लिए मुमकिन न हो, है न? किसी दूसरे को बोलने देते हैं। (एक अर्थ में, हमें इस मामले में परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को समझना चाहिए। परमेश्वर के चढ़ावों को कभी हाथ नहीं लगाना चाहिए। दूसरे अर्थ में, हमें लगता है कि ऐसा कुछ करने में मानवता नहीं है। कम-से-कम, सबसे निचली आधाररेखा यह होनी चाहिए कि उनका जमीर इसकी इजाजत दे।) तुम्हारा रवैया यह है कि ऐसे काम करने में मानवता नहीं है, और किसी को वही चीजें करनी चाहिए जिनकी इजाजत उनका जमीर देता है। क्या और कोई है? (मैं सोचता हूँ कि एक इंसान के रूप में, भले ही कोई परमेश्वर में विश्वास न रखता हो, अगर वह इस दुनिया का ऐसा इंसान है जिसमें जमीर और नैतिक आधाररेखा है, तो उसे ऐसे काम नहीं करने चाहिए जिनसे उसके खुद के परिवार को हानि हो। अब चूँकि हम परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, और कुछ सत्य समझते हैं, इसलिए अगर अब भी कोई ऐसे काम करता है जिनसे उसके भाई-बहनों और मित्रों को हानि होती है, या वह परमेश्वर के चढ़ावों के साथ धोखा करता है, तो ऐसा व्यक्ति अविश्वासी से भी बदतर है। इसके अलावा, कभी-कभी लोग कुछ विचार और ख्याल प्रकट कर सकते हैं लेकिन जब वे परमेश्वर के सार और स्वभाव के बारे में सोचते हैं, और उन्हें एहसास होता है कि आसपास कोई न भी देख रहा हो, या किसी को इन कार्यों का पता न भी चले, फिर भी परमेश्वर हर चीज की जाँच करता है, और उन्हें ऐसी चीजें करने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए—उनका दिल परमेश्वर का थोड़ा भय जरूर मानता होगा।) एक अर्थ में, इस तरह काम करना यह दर्शाता है कि लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाले दिल नहीं है; दूसरे अर्थ में, जो लोग ऐसा करने में सक्षम होते हैं, उनमें सबसे बुनियादी मानवता भी नहीं होती। ऐसा इसलिए कि एक इंसान के रूप में, भले ही तुम परमेश्वर में विश्वास न रखो, तुम्हें ऐसे काम नहीं करने चाहिए। यह वह गुण है जो एक जमीर और मानवता वाले इंसान में होना चाहिए। धोखाधड़ी, नुकसान पहुँचाना, चोरी करना वो सहज चीजें हैं जो एक नेक और सामान्य इंसान को नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर में विश्वास न रखने वाले लोग भी अपने आचरण में कुछ सीमाएँ बना कर रखते हैं, परमेश्वर में विश्वास रखने वाले और बहुत-से धर्मोपदेश सुनने वाले तुम लोगों की तो बात ही छोड़ो : अगर तुम अभी भी ऐसे काम करने में सक्षम हो, तो तुम्हें छुटकारा नहीं मिल सकता। यह ऐसा व्यक्ति है जिसमें मानवता नहीं है—एक दानव है। तुमने बहुत-से धर्मोपदेश सुने हैं, फिर भी तुम धोखाधड़ी और हेराफेरी के तमाम बुरे काम कर सकते हो—यही है गैर-विश्वासी होने का अर्थ। गैर-विश्वासी क्या है? वह ऐसा व्यक्ति है जिसे परमेश्वर के निरीक्षण पर या उसके धार्मिक होने पर विश्वास नहीं है। अगर तुम परमेश्वर के निरीक्षण पर यकीन नहीं करते, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम उसके अस्तित्व पर यकीन नहीं करते? तुम कहते हो, “परमेश्वर मेरा निरीक्षण कर रहा है, लेकिन परमेश्वर है कहाँ? मैंने उसे क्यों नहीं देखा? मैं उसे महसूस क्यों नहीं करता? मैं इतने वर्षों से लोगों के साथ धोखा और हेराफेरी करता रहा हूँ; मैं दंडित क्यों नहीं हुआ? मैं अभी भी दूसरों के मुकाबले ज्यादा आरामदेह जीवन जी रहा हूँ।” एक गैर-विश्वासी के व्यवहार का यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह है कि चाहे जितने भी सत्य पर संगति की गई हो, वे उसे पूरी तरह ठुकरा देते हैं। वे सत्य को कभी नहीं स्वीकारते, तो फिर वे क्या स्वीकारते हैं? वे उन विचारों और नजरियों को स्वीकारते हैं, जो उन्हें फायदा पहुँचाते हैं। उन्हें जिस भी चीज से फायदा होता है, उनके हितों की रक्षा होती है वे वही काम करते हैं। वे केवल तत्काल आत्म-हित में विश्वास रखते हैं, परमेश्वर के निरीक्षण में या प्रतिकार की संकल्पना में नहीं। गैर-विश्वासी होने का यही अर्थ है। एक गैर-विश्वासी के लिए परमेश्वर में विश्वास रखने का क्या अर्थ है? परमेश्वर के घर के गैर-विश्वासियों का एक लक्षण होता है : दुष्कर्म करना। लेकिन छोड़ो, हम इन लोगों के चरम अंत की चर्चा नहीं करेंगे; आओ जिस विषय पर हम संगति कर रहे थे, उस पर लौट चलें।

लोगों के परिवारों द्वारा उन्हें सिखाए और उनमें पिरोए गए विचार उन्हें परमेश्वर के समक्ष लाने के उद्देश्य से नहीं होते, न ही वे उनमें सकारात्मक विचार पिरोते हैं। इसके बजाय, वे उनमें विविध नकारात्मक विचार, नकारात्मक साधन, सिद्धांत और आचरण के तरीके पिरोते हैं, जिससे आखिरकार लोग वहाँ पहुँच जाते हैं जहाँ से वे लौट नहीं सकते। संक्षेप में कहें, तो वो तरह-तरह के विचार जो परिवार लोगों में पिरोते हैं, वे मानवता के उन आधारभूत मानकों, समझ और जमीर पर भी खरे नहीं उतरते, जो एक व्यक्ति में होने चाहिए। अगर किसी में जरा-सा भी जमीर और समझ हो, तो यही वह है जो जरा-सा बचा होता है जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जाना या नष्ट किया जाना बाकी है। उनके आचरण के बाकी साधन और तरीके उनके परिवार और यहाँ तक कि समाज से भी उन्हें मिलते हैं। इसलिए व्यक्ति के बचाए जाने से पहले, उसके परिवार द्वारा उन्हें दी गई किसी भी विचार या नजरिये की शिक्षा, चाहे वह कुछ भी हो, परमेश्वर द्वारा लोगों को दी गई शिक्षा के विपरीत होती है। वह उसे सत्य नहीं समझा सकती, न ही उसे उद्धार के पथ पर आगे बढ़ा सकती है; वह उन्हें सिर्फ विनाश के पथ पर आगे ले जाती है। इसलिए जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के घर में आता है, तो उसकी उम्र चाहे जो हो, उसने कैसी भी शिक्षा पाई हो, उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि चाहे जैसी हो, और वह अपनी हैसियत को चाहे जितनी कुलीन मानता हो, उसे बिल्कुल शुरुआत से सीखना होता है कि अपना आचरण कैसा करें, दूसरों से बातचीत कैसे करें, तरह-तरह के मामले कैसे सँभालें, और विविध लोगों और चीजों से कैसे पेश आएँ। सीखने की इस प्रक्रिया में परमेश्वर के विविध सकारात्मक सत्य-संरेखित विचारों और नजरियों और साथ ही अभ्यास और विविध मामलों को सँभालने के सिद्धांतों को पाना और समझना शामिल है। यह पूरी तरह से तुम्हारे सत्य को स्वीकार करने पर आधारित होता है। अगर तुम सत्य स्वीकार नहीं करते, तो तुम्हारे मूल विचार और नजरिये अपरिवर्तित रह जाएँगे। चूँकि तुम परमेश्वर से आने वाले सही विचारों और नजरियों को स्वीकार नहीं करते, इसलिए दुनिया से निपटने के तुम्हारे सिद्धांत, साधन और तरीके वही पुराने और अपरिवर्तित रह जाते हैं। जब लोग सकारात्मक विचार और नजरिये, सत्य और परमेश्वर की शिक्षाएँ स्वीकार करने लगते हैं, तो वे सीखने लगते हैं कि सच्चा इंसान, सामान्य इंसान और विवेक व जमीर वाला इंसान कैसे बनें। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने दस, बीस, तीस वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, और मैंने अभी तक परमेश्वर का एक भी विचार और नजरिया या उसके वचनों का कोई भी सत्य स्वीकार नहीं किया है।” यह ये दिखाने के लिए काफी है कि परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास सच्चा नहीं है, तुम अभी भी नहीं जानते कि सत्य क्या है, और तुमने अभी भी नहीं सीखा है कि आचरण कैसे करें। अगर तुम कहते हो, “जिस पल से मैंने परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू किया, उसी पल से मैंने औपचारिक रूप से मनुष्य से परमेश्वर की विविध अपेक्षाओं, और मनुष्य में जो विचार, नजरिये, सिद्धांत और कहावतें होनी चाहिए, उनके बारे में परमेश्वर की शिक्षाओं को स्वीकारना शुरू कर दिया,” तो फिर तुम परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के दिन से ही तुमने सीखना शुरू कर दिया कि सच्चा इंसान कैसे बनें, और जैसे ही तुमने सीखना शुरू किया कि सच्चा इंसान कैसे बनें, तभी से उद्धार के पथ पर चलना शुरू कर दिया। जिस पल तुम परमेश्वर से आने वाले विचारों और नजरियों को स्वीकारना शुरू कर देते हो, उसी पल तुम उद्धार के पथ पर चलना शुरू कर देते हो, क्या ऐसा नहीं है? (हाँ, ऐसा ही है।) तो, क्या तुम लोगों ने शुरू किया है? तुम शुरू कर चुके हो, क्या तुमने अभी शुरू नहीं किया, या तुमने बहुत पहले ही शुरू कर दिया था? (परिवार की शिक्षा सहित लोगों में मौजूद गलत विचारों और नजरियों के बारे में पिछले दो वर्षों से हुई परमेश्वर की संगति और विश्लेषण के जरिये मैंने आत्मचिंतन कर धीरे-धीरे अपने शैतानी फलसफों को नकारना और परमेश्वर के वचनों की ओर प्रयास करने के तरीकों पर चिंतन करना शुरू कर दिया है। मैंने पहले कभी ऐसे गहरे आत्म-निरीक्षण पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था।) यह वक्तव्य काफी वास्तविक है। तुमने सिर्फ दो वर्ष के भीतर कभी शुरू किया; सटीक वर्ष या दिन बताना सचमुच मुश्किल है, मगर जो भी हो, यह पिछले एक या दो वर्ष में हुआ। यह अपेक्षाकृत वस्तुपरक है। दूसरे लोगों का क्या? (मैंने सच में नहीं सोचा कि अपने परिवार द्वारा सिखाए गए विचारों और नजरियों को बदलने की कोशिश कैसे करूँ। हाल ही में, इस बारे में परमेश्वर की संगति सुनने के बाद, मेरे विचार धीरे-धीरे थोड़ा-बहुत बदलने लगे हैं, लेकिन मैंने इस मामले में बदलाव के प्रयास पर खास तौर पर ध्यान नहीं दिया है।) तुम्हारी चेतना ज्यादा बोधपूर्ण हुई है। अपने दैनिक जीवन में अगर तुम खोज करते हुए और अधिक गहराई में प्रवेश करना जारी रख सको, विशिष्ट मामलों में और ज्यादा सूक्ष्म और सटीक हो सको, इसमें और ज्यादा शुद्धता से प्रवेश कर सको, तो तुम बदलाव की आशा कर सकोगे। ऐसी ही बात है न? (हाँ, बिल्कुल है।) अगर तुम पुराने विचारों और नजरियों को छोड़ देने और फिर सही रवैये और नजरिये से लोगों और चीजों को देखने, आचरण और कार्य करने की आशा रखते हो, तो तुम उद्धार प्राप्त कर सकोगे। लंबी समयावधि में, तुम उद्धार प्राप्त कर सकोगे, मगर ज्यादा व्यावहारिकता से वर्तमान की बात करें, तो तुम अपना कर्तव्य निभाने, और खास तौर से एक अगुआ और कायकर्ता बनने के लिए उपयुक्त हो सकोगे; मगर यह इस पर निर्भर करेगा कि क्या तुम सत्य के प्रत्येक अंश के लिए प्रयास करने को तैयार हो, और क्या तुम सकारात्मक चीजों और सिद्धांतों से जुड़े विविध मामलों की कीमत चुकाने को तैयार हो। अगर तुम केवल अपनी चेतना में खुद को बदलना चाहते हो, मगर अपने दैनिक जीवन में सत्यों के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करते और गंभीर नहीं होते, अगर तुम्हारा दिल सकारात्मक चीजों का प्यासा नहीं है, तो यह चेतना जल्द ही फीकी पड़कर गायब हो जाएगी। मेरी संगति के प्रत्येक विषय से जुड़े प्रत्येक विचार और नजरिये को लोगों के वास्तविक जीवन से अलग नहीं किया जा सकता। यह कोई सिद्धांत या नारा नहीं है; यह तुम्हारे दैनिक जीवन में चीजों से निपटने के तुम्हारे विचारों और नजरियों के बारे में है। तुम्हारे विचार और नजरिये वह दिशा निर्धारित करते हैं, जिसकी ओर तुम कार्य करते समय झुकते हो। अगर तुम्हारे विचार और नजरिये सकारात्मक हैं, तो इन चीजों को सँभालने के तुम्हारे तरीके और सिद्धांत भी सकारात्मक होने लगेंगे, और ऐसे मामलों को सँभालने का नतीजा अपेक्षाकृत अच्छा और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होगा। लेकिन अगर तुम्हारे विचार और नजरिये सत्य और सकारात्मक चीजों के विरुद्ध हों, या इन चीजों के विपरीत हों, तो कोई चीज तुम कैसे सँभालते हो उसकी प्रेरणा नकारात्मक होगी, और उस मामले को संभालने का अंतिम परिणाम यकीनन अच्छा साबित नहीं होगा। इस मामले को सँभालने में तुम चाहे जितनी कीमत चुकाओ या जितनी भी सोच लगाओ, तुम्हारे इरादे चाहे जो हों, परमेश्वर इस परिणाम को किस तरह देखेगा? परमेश्वर इस मामले को कैसे चिह्नित करेगा? अगर परमेश्वर इस मामले को बाधाजनक, गड़बड़ी पैदा करने वाला, विध्वंसक या परमेश्वर के घर में हानि पहुँचाने वाला चिह्नित कर दे, तो तुम्हारे कार्य बुरे हैं। अगर तुम्हारे दुष्कर्म मामूली हैं, तो उनकी वजह से शायद ताड़ना, न्याय, फटकार, काट-छाँट और निपटान मिले, लेकिन अगर वे बड़े दुष्कर्म हैं, तो उनका नतीजा दंड हो सकता है। अगर तुम सत्य सिद्धांतों के आधार पर कार्य नहीं करते, और इसके बजाय अविश्वासियों के गलत विचारों और नजरियों की ओर झुक जाते हो, इन चीजों के आधार पर कार्य करते हो, तो तुम्हारे प्रयास बेकार हो जाएँगे। भले ही तुमने बड़ी कीमत चुकाई हो और बहुत अधिक प्रयास किए हों, फिर भी तुम्हारा अंतिम परिणाम बेकार ही होगा। परमेश्वर इस मामले को किस दृष्टि से देखता है? वह इसे कैसे चिह्नित करता है? वह इससे कैसे निपटता है? कम-से-कम यह होगा कि तुम्हारे कृत्य अच्छे नहीं हैं, वे परमेश्वर की गवाही नहीं देते, न ही उसका महिमामंडन करते हैं, और तुमने जो कीमत चुकाई और जो मानसिक प्रयास किए उन्हें याद नहीं रखा जाएगा; ये सब बेकार हैं। तुम समझ रहे हो? (हाँ।) तुम कुछ भी करने से पहले समय निकाल कर सावधानी से सोचो, दूसरों से ज्यादा संगति करो, कार्य करने से पहले सिद्धांतों पर स्पष्टता खोजो, और अपने स्वार्थ या आकांक्षाओं के फेर में गर्ममिजाजी से या आवेग में कार्य मत करो। परिणाम चाहे जो भी हो, अंत में तुम्हें ही झेलना होगा, परिणाम चाहे जो भी हो, परमेश्वर का एक फैसला आएगा। अगर तुम यह आशा करते हो कि तुम्हारे कार्य बेकार नहीं जाएँगे, परमेश्वर उन्हें याद रखेगा, या उससे भी बेहतर वे ऐसे नेक कार्य बन जाएँगे जिनसे परमेश्वर प्रसन्न होगा, तो तुम्हें सिद्धांतों को बार-बार खोजना चाहिए। अगर तुम्हें इन चीजों की परवाह नहीं है, तुम्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे कार्य नेक हैं या नहीं, परमेश्वर उनसे प्रसन्न है या नहीं, तुम्हें दंड पाने की परवाह नहीं है, मगर तुम सोचते हो, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, वैसे भी ये मुझे अभी न तो दिखेंगे, न ही महसूस होंगे,” अगर तुम्हारे मन में ये विचार और नजरिये हैं, तो फिर कार्य करते समय तुम्हारा दिल परमेश्वर का भय मानने वाला नहीं होगा। तुम दबंग, निरंकुश और लापरवाह होगे, तुम्हें किसी भी चीज की चिंता नहीं रहेगी, प्रतिबंध नहीं होगा। परमेश्वर का भय न मानने वाले दिल से कार्य करते समय तुम जिस दिशा में जाओगे, उसमें भटकाव बहुत संभव है। मानव प्रकृति और सहजबोध के अनुसार संभवतः अंतिम परिणाम यह होगा कि तुम्हारे कार्यों से परमेश्वर न तो प्रसन्न होगा, न ही इन्हें याद रखेगा, बल्कि वे बाधाएँ, गड़बड़ियाँ और दुष्कर्म बन जाएँगे। तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि तुम्हारा अंतिम परिणाम क्या होगा, और परमेश्वर इसके साथ कैसे पेश आएगा और इसे कैसे संभालेगा। इसलिए कुछ भी करने से पहले, कोई भी मामला सँभालने से पहले, तुम्हें आत्मचिंतन करना चाहिए कि तुम्हें क्या चाहिए, अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए कि इस मामले का अंतिम परिणाम क्या होगा, और तभी आगे बढ़ना चाहिए। तो इस मसले में कौन-सी बातें शामिल हैं? इसमें वह रवैया और सिद्धांत शामिल हैं जिनका पालन तुम कोई कार्य करते हुए करते हो। सबसे बढ़िया रवैया है कि सिद्धांतों को बार-बार खोजना, और अपना फैसला अपनी भावनाओं, पसंद, इरादों, आकांक्षाओं या तत्काल हितों के आधार पर न लेना; इसके बजाय तुम्हें बार-बार सिद्धांत खोजने चाहिए, परमेश्वर से प्रार्थना और खोज करनी चाहिए, बार-बार भाई-बहनों के समक्ष मामले लाने चाहिए, और कर्तव्य निभाने में अपने साथ काम कर रहे भाई-बहनों के साथ संगति और खोज करनी चाहिए। कार्य करने से पहले सिद्धांतों को सही से समझो; आवेग में कार्य मत करो, भ्रमित मत रहो। तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों रखते हो? तुम यह भोजन पाने, वक्त काटने, फैशन के चलन से जुड़े रहने, या अपनी आध्यात्मिक जरूरतें पूरी करने के लिए नहीं करते। तुम यह बचाए जाने के लिए करते हो। तो तुम कैसे बचाए जा सकोगे? तुम जब कोई भी काम करो, तो उसे उद्धार, परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य से जुड़ा होना चाहिए, है कि नहीं?

अपने परिवार द्वारा दी गई शिक्षा को जाने देने के विषय के बारे में हमारी पिछली संगति में स्वयं के आचरण से संबंधित नियम और विविध विचार और नजरिये शामिल थे, जो वे विचार हैं जो लोगों के परिवार द्वारा उन्हें सिखाए जाते हैं। लेकिन परिवारों द्वारा लोगों को तरह-तरह की शिक्षाएँ देने और उन पर प्रभाव डालने के अलावा और भी शिक्षाएँ होती हैं। यानी परिवार द्वारा दी गई शिक्षा में सिर्फ विचारों की शिक्षा ही नहीं, बल्कि और भी बहुत कुछ शामिल होता है। अभी हमने जो चर्चा की उसके अलावा इसमें पारंपरिक, अंधविश्वासी और धार्मिक शिक्षा भी शामिल होती है, जिसके बारे में हम अब संगति करेंगे। इन मामलों में जीवनशैलियाँ, रीति-रिवाज, आदतें और दैनिक जीवन की बारीकियाँ शामिल हैं। लोगों के दैनिक जीवन में परिवार द्वारा दी गई शिक्षा के बारे में, अब हम अपनी चर्चा को परंपरा की ओर मोड़ेंगे। परंपरा के कुछ उदाहरण क्या हैं? मिसाल के तौर पर, हो सकता है कोई परिवार दैनिक जीवन की बारीकियों से संबंधित कुछ विशेषताओं, कहावतों या प्रतिबंधों से चिपका रहता है। क्या इसमें परंपरा शामिल है? (हाँ।) परंपरा कुछ हद तक अंधविश्वास से जुड़ी हुई और संबंधित है, इसलिए हम दोनों पर एक साथ चर्चा करेंगे। परंपरा के भीतर के कुछ पहलुओं को अंधविश्वास माना जा सकता है, और अंधविश्वास में ऐसी चीजें हैं जो बहुत पारंपरिक नहीं हैं और सिर्फ अलग-अलग परिवारों या नस्ली समूहों से जुड़ी आदतें या जीने के तरीके हैं। आओ, इस पर नजर दौड़ा कर देखें कि परंपराओं और अंधविश्वासों में क्या होता है। तुम सब बहुत-सी परंपराओं और अंधविश्वासों से पहले ही परिचित हो, क्योंकि तुम्हारे दैनिक जीवन के अनेक पहलू उनसे जुड़े हुए हैं। चलो, उनमें से कुछ चीजें बताओ। (ज्योतिष, हस्तरेखा विद्या और पर्ची निकालना।) पर्ची निकालना, ज्योतिष, भविष्य बताना, हस्तरेखा विद्या, चेहरा पढ़ना, जन्म समय देखकर भविष्य बताना, और आत्मा-आह्वान बैठकें करना—इन चीजों को अंधविश्वास नहीं कहा जाता; ये सब अंधविश्वासी गतिविधियाँ हैं। अंधविश्वास इन गतिविधियों के भीतर मौजूद विशिष्ट व्याख्याएँ है। मिसाल के तौर पर, घर से बाहर जाने से पहले यह निर्धारित करने के लिए कैलेंडर देखना कि आज का दिन कौन-सी गतिविधियों के लिए शुभ है और कौन-सी के लिए अशुभ, क्या सभी गतिविधियों के लिए अशुभ है, क्या घर बदलने, शादी करने और अंत्येष्टि सभी के लिए अशुभ है, या आज का दिन सभी गतिविधियों के लिए शुभ है—यह अंधविश्वास है। समझ रहे हो? (हाँ, समझ गया।) कुछ और उदाहरण दो। (यह विश्वास कि बाईं आँख का फड़कना अच्छे भाग्य की भविष्यवाणी करता है, लेकिन दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है।) “बाईं आँख का फड़कना अच्छे भाग्य की भविष्यवाणी करता है, लेकिन दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है”—यह क्या है? (एक अंधविश्वास।) यह एक अंधविश्वास है। मैंने अभी जिन सभी चीजों का जिक्र किया, जैसे कि भविष्य बताना, पर्ची निकालना, हस्तरेखा विद्या, वगैरह अंधविश्वासी गतिविधियों में आते हैं। “बाईं आँख का फड़कना अच्छे भाग्य की भविष्यवाणी करता है, लेकिन दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है” अंधविश्वासी गतिविधि से संबंधित एक विशिष्ट कहावत है। यह एक अंधविश्वास है। ये कहावतें कहाँ से आती हैं? ये सारी मूल रूप से पुरानी पीढ़ियों से आती हैं। कुछ माता-पिता अपने बच्चों को बताते हैं, कुछ दादा-दादी, पड़दादा-पड़दादी, वगैरह-वगैरह। और भी कुछ है? (हे परमेश्वर, क्या छुट्टियों के रिवाज इसमें आते हैं?) हाँ, छुट्टियों के रिवाज भी इसमें आते हैं : कुछ परंपरा से जुड़े होते हैं, और कुछ परंपरा और अंधविश्वासी कहावतें दोनों हैं। चीन में दक्षिण से लेकर उत्तर और पूर्व से लेकर पश्चिम तक, छुट्टियों के अनगिनत रिवाज हैं। मिसाल के तौर पर दक्षिण चीन के एक विशिष्ट रिवाज पर गौर करो : चीनी नव वर्ष के दौरान लोग अक्सर चावल केक खाते हैं। यह किसका प्रतीक है? चावल केक खाने के पीछे लोगों का प्रयोजन क्या है? (वे मानते हैं कि चावल केक खाने से साल-दर-साल उनकी पदोन्नति होगी।) चावल केक खाने का प्रयोजन साल-दर-साल पदोन्नति सुनिश्चित करना है। यहाँ “पदोन्नति” शब्द “केक” के लिए चीनी शब्द का समस्वर है। तो चावल केक खाने का प्रयोजन यह सुनिश्चित करना है कि हर वर्ष तुम्हारी पदोन्नति हो। अब, क्या कोई ऐसा वर्ष था जब तुमने चावल केक नहीं खाया और तुम्हारी पदोन्नति नहीं हुई? क्या ऐसा कोई है जिसकी हर वर्ष चावल केक खाने के कारण हर वर्ष पदोन्नति होती है? क्या तुम सचमुच “पदोन्नत” हो सकते हो? लोग जानते हैं कि इससे पदोन्नति हो, यह जरूरी नहीं है, लेकिन न भी हो, तो भी यह कम-से-कम उन्हें नाकामयाबी से बचाएगा। इसलिए उन्हें यह खाना चाहिए। यह खाने से उन्हें आराम मिलता है, और न खाने से उन्हें बेचैनी होती है। यह अंधविश्वास और परंपरा है। संक्षेप में कहें, तो तुम्हारे परिवार की इन आदतों और परंपराओं ने तुम पर प्रभाव डाला है, और तुमने अनजाने ही कुछ हद तक इन परंपराओं और आदतों को स्वीकृति देकर उन्हें स्वीकार किया है; इस तरह तुमने इन परंपराओं द्वारा आगे बढ़ाए गए विचारों और नजरियों को स्वीकृति देकर उन्हें स्वीकार किया है। अपने दम पर जीना शुरू करने के बाद भी तुम इन परंपराओं और आदतों को जारी रख सकते हो। इसे नकारा नहीं जा सकता। अब चलो परंपराओं से जुड़ी कुछ कहावतों की चर्चा करें। कुछ लोग अक्सर ऐसी बातों में लगे रहते हैं : अगर कोई लंबी यात्रा पर जा रहा हो, तो वे उनके खाने के लिए कुछ मोमो बनाते हैं, और जब यात्री लौटता है, तो वे नूडल बनाते हैं। क्या यह एक परंपरा नहीं है। (हाँ।) यह एक परंपरा है, एक अलिखित रिवाज है। फिलहाल हम ऐसा करने के प्रयोजन पर चर्चा नहीं करेंगे। पहले, आओ इस कार्य के संबंध में कहे गए वक्तव्य को जाँचें। (“घर से बाहर मोमो, घर के भीतर नूडल।” या तुम यह भी कह सकते हो, “जाने के लिए मोमो, लौटने के लिए नूडल।”) “जाने के लिए मोमो, लौटने के लिए नूडल” का अर्थ क्या है? यानी, अगर आज कोई जा रहा है तो तुम्हें उसे खाने को मोमो देने चाहिए; इसकी अहमियत क्या है? मोमो एक “रैपर” यानी लपेटन में लपेटे गए होते हैं, और “रैप” शब्द का स्वर “रक्षा” के लिए चीनी शब्द के सामान लगता है। तो इसका अर्थ है उसकी जीवन की रक्षा के लिए, यह सुनिश्चित करने के लिए कि जाने के बाद उसके साथ कोई दुर्घटना न हो, रास्ते में उसकी मृत्यु न हो और वह लौट कर जरूर आए। यह एक सुरक्षित प्रस्थान दर्शाता है। “जाने के लिए मोमो, लौटने के लिए नूडल” का अर्थ है कि वे सुरक्षित वापस लौटें और उनके लिए सब-कुछ आसान हो—कमोबेश यही इसकी महत्ता है। आम तौर पर कुछ परिवार इस परंपरा का पालन करते हैं। अगर परिवार का कोई सदस्य जा रहा हो, तो वे उसके लिए मोमो बनाते हैं, और उसके लौटने पर वे उसे नूडल खिलाते हैं। तुम चाहे इस व्यंजन को खाने वाले हो या बनाने वाले, यह वर्तमान और भविष्य दोनों में सौभाग्य लाने और सभी के कल्याण के लिए किया जाता है। क्या तुम मानते हो कि यह परंपरा एक सकारात्मक चीज है और लोगों को इसे करना चाहिए और अपने जीवन में जारी रखना चाहिए? (मैं सहमत नहीं हूँ।) कुछ भाई-बहनों को जाना है, और भोजन प्रभारी उनके लिए मोमो बनाता है, तो मैं कहता हूँ, “उनके जाने का मोमो बनाने से क्या लेना-देना?” और वे कहते हैं, “अरे, जब कोई जा रहा हो, तो हमें मोमो बनाने चाहिए।” मैं जवाब देता हूँ, “उनके जाने पर तुम मोमो बनाते हो; तो अगर वे लौट आएँ तो क्या होगा?” वे कहते हैं, “लौट आने पर उन्हें नूडल खाने होंगे।” मैं कहता हूँ, “मैंने यह पहली बार सुना है। यह परंपरा कहाँ से आती है?” वे कहते हैं, “मैं जहाँ से हूँ, वहाँ ऐसा ही होता है। अगर कोई जा रहा हो, तो हम उसके लिए मोमो बनाते हैं, और उसके वापस लौटने पर हम उसे नूडल खिलाते हैं।” इसके बाद इससे मेरे दिल पर क्या छाप पड़ी? मुझे लगा, इन लोगों ने परमेश्वर में अपनी आस्था रखी है, लेकिन वे अपने कार्य परमेश्वर के वचनों के आधार पर नहीं करते। इसके बजाय वे भरोसा करते हैं परंपरा पर और उन बातों पर जो उनके पूर्वजों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाई हैं। उन्हें विश्वास है कि एक मोमो का बाहरी लपेटन इंसान की रक्षा कर सकता है, अगर किसी को कुछ हो जाए, तो यह परमेश्वर के हाथों में नहीं; यह मनुष्य के हाथों में है। उन्हें विश्वास है कि मोमो लपेटने से जाने वाला व्यक्ति सुरक्षित हो जाएगा, और अगर उन्होंने मोमो नहीं लपेटे, तो वह व्यक्ति सुरक्षित नहीं रहेगा और शायद यात्रा में कहीं मर जाए और कभी न लौटे। उनके विचारों और नजरियों में किसी का जीवन मोमो के भीतर के भरावन जैसा है, और उसका मूल्य भी मोमो के भरावन जितना ही है। उसका जीवन परमेश्वर के हाथों में नहीं है, और परमेश्वर उस व्यक्ति की नियति को नियंत्रित करने में सक्षम नहीं है। केवल एक मोमो के लपेटन का इस्तेमाल करके ही वे किसी व्यक्ति की नियति को नियंत्रित कर सकते हैं। ये कैसे लोग हैं? (गैर-विश्वासी।) वे गैर-विश्वासी हैं। कलीसिया में ऐसे बहुत-से लोग हैं। वे इसे अंधविश्वास नहीं मानते। वे इसे अपनी आदतों का हिस्सा मानते हैं, ऐसी चीज जिसे उन्हें स्वाभाविक रूप से एक सकारात्मक चीज के रूप में बनाए रखना चाहिए। वे ऐसा खुल कर करते हैं, और यूँ करते हैं जैसे कि वे उचित हैं और ऐसा करने के पीछे उनके पास एक आधार है। तुम उन्हें रोक नहीं सकते : अगर तुम उन्हें यह करने से रोकते हो, तो वे परेशान होकर कहते हैं : “मैं पका रहा हूँ न। कोई आज जा रहा है : अगर मैंने उसके लिए मोमो नहीं बनाए, तो अगर संयोग से उसकी मृत्यु हो गई, तो कौन जिम्मेदार होगा? क्या यह मेरी गलती नहीं होगी?” उन्हें यकीन है कि उनके पूर्वजों की परंपराएँ सबसे ज्यादा भरोसेमंद हैं : “अगर तुम परंपरा का पालन नहीं करते और इस प्रतिबंध का उल्लंघन करते हो, तो तुम्हारा जीवन जोखिम में होगा, और शायद इस वजह से तुम्हारी मृत्यु हो जाए।” क्या यह एक गैर-विश्वासी का दृष्टिकोण नहीं है? (हाँ, जरूर है।) ऐसे विचारों और नजरियों के लोगों के दिलों में गहराई से पैठे होने पर भी क्या वे सत्य को स्वीकार कर सकते हैं? (नहीं, वे नहीं स्वीकार सकते।) तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो, तुम कहते हो कि तुम सत्य के रूप में परमेश्वर में विश्वास रखते हो, लेकिन प्रमाण कहाँ है? तुम अपने मुँह से कहते हो, “मुझे विश्वास है कि परमेश्वर सार्वभौम है, और इंसान की नियति परमेश्वर के हाथों में है।” लेकिन किसी के जाते समय तुम जल्दी से उसके लिए मोमो बनाते हो, और तुम्हारे पास मटन खरीदने का वक्त न भी हो, तो भी तुम्हें सब्जियों के भरावन के साथ मोमो बनाने ही हैं—न बनाने का सवाल ही नहीं है। क्या ये कार्य और यह व्यवहार परमेश्वर की गवाही देते हैं? क्या इनसे परमेश्वर का गुणगान होता है? (नहीं।) साफ तौर पर नहीं। ये परमेश्वर और उसके नाम के लिए अपमानजनक हैं। तुम्हारा सत्य को स्वीकार करना या न करना एक मामूली मसला है। अहम बात यह है कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखने और उसका अनुसरण करने का दावा करते हो, लेकिन फिर भी तुम शैतान द्वारा तुम्हारे भीतर पिरोई गई परंपराओं का पालन करते हो। अपने दैनिक जीवन की इन छोटी-छोटी बातों में, तुम अपने पूर्वजों द्वारा तुम्हारे भीतर पिरोये गए विचारों और आदतों का सख्ती से पालन करते हो, और कोई उन्हें बदल नहीं सकता। क्या यह ऐसे किसी व्यक्ति का रवैया है जो सत्य को स्वीकार करता है? यह परमेश्वर के लिए अपमानजनक है; यह परमेश्वर को धोखा देना है। तुम्हारे पूर्वज कौन हैं? उनकी परंपराएँ कहाँ से आईं? ये परंपराएँ किसे दर्शाती हैं? क्या ये सत्य को दर्शाती हैं? क्या ये सकारात्मक चीजों को दर्शाती हैं? इन परंपराओं का आविष्कार किसने किया? क्या परमेश्वर ने किया? परमेश्वर लोगों को परंपराएँ वापस लाने के लिए सत्य प्रदान नहीं करता, बल्कि तमाम परंपराएँ खत्म करने के लिए करता है। लेकिन न सिर्फ तुम उनका परित्याग करने से इनकार करते हो, बल्कि उनसे ऐसे पेश आते हो मानो वे सत्य और बनाए रखने लायक सकारात्मक चीज हों। क्या यह मृत्यु की कामना नहीं है? क्या यह सत्य और परमेश्वर का खुल कर विरोध करना नहीं है? (हाँ, जरूर है।) यह खुले तौर पर परमेश्वर के खिलाफ आवाज उठा कर उसका विरोध करना है। कुछ लोग कह सकते हैं, “अगर मैं अपने भाई-बहनों के लिए मोमो या नूडल न बनाऊँ पर अपने परिवार के सदस्यों के लिए बनाऊँ तो कैसा रहेगा? जब मेरे परिवार के सदस्य जाएँगे, तो मैं उनके लिए मोमो बनाऊँगा और उनके वापस आने पर उनके लिए नूडल पकाऊँगा। क्या यह ठीक है?” क्या तुम लोगों को यह ठीक लगता है? अगर तुम यह कहोगे तो क्या होगा : “अगर मैं किसी को धोखा दूँगा तो वे मेरे भाई-बहन नहीं, बल्कि मेरे परिवार के सदस्य होंगे। क्या यह ठीक है?” क्या यह ठीक होगा? (ठीक नहीं होगा।) इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे कार्यों के परिणाम किसे भुगतने होंगे; फर्क इससे पड़ता है कि तुम किसे जी रहे हो और अपने बारे में क्या खुलासा कर रहे हो, इस बात से फर्क पड़ता है कि तुम कौन-से नजरिये बनाए रखते हो। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम किसे धोखा देते हो; फर्क इससे पड़ता है कि तुम्हारे कार्य और सिद्धांत क्या हैं, क्या ऐसा नहीं है? (हाँ, ऐसा ही है।)

कुछ ऐसे लोग हैं जो चीनी नव वर्ष के समय पंचांग देखने में अपने दिन बिताते हैं, चंद्र कैलेंडर के बारहवें महीने की 30वीं तिथि की पारंपरिक छुट्टी के दिन से शुरू कर हर दिन खाने-पीने, कपड़े पहनने और परहेज करने की हर बात में पीढ़ियों से चले आ रहे, जीवन शैली और प्रतिबंधों के पारंपरिक रिवाजों का सख्ती से पालन करते हुए अपने दिन गुजारते हैं। जो भी कहना या करना निषिद्ध हो, वे उसे कहने या करने से बचते हैं, और जो भी खाना या बोलना भाग्यशाली हो, वे वही खाते और बोलते हैं। मिसाल के तौर पर, कुछ का विश्वास है कि अगले वर्ष पदोन्नति सुनिश्चित करने के लिए उन्हें नव वर्ष के समय चावल केक खाने चाहिए। उन्हें कितने भी अहम मसले से निपटना हो, वे कितने भी व्यस्त या थके हुए हों, कर्तव्य निर्वहन को लेकर कोई खास हालात बन गए हों, या उन्हें निभाने के लिए पर्याप्त समय निकाल पा रहे हों या नहीं, लेकिन वे यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि नव वर्ष में पदोन्नति की खातिर वे चावल केक जरूर खाएँ। अगर उनके पास घर में चावल केक बनाने का वक्त नहीं है, तो वे सिर्फ सौभाग्य सुनिश्चित करने के लिए उसे खरीद भी लेते हैं। कुछ लोगों को नव वर्ष के समय मछली खानी होती है, क्योंकि यह साल-दर-साल प्रचुरता का निरूपण करती है। अगर वे एक साल मछली नहीं खाते तो मानते हैं कि अगले बारह महीने उन्हें गरीबी झेलनी पड़ेगी। अगर वे मछली नहीं खरीद पाते, तो प्रतीक चिह्न के रूप में एक लकड़ी की मछली खाने की मेज पर रख सकते हैं। वे आने वाले वर्ष में पदोन्नति और प्रचुरता दोनों पाने के लिए चावल केक और मछली खाते हैं। एक अर्थ में, वे यह इसलिए करते हैं कि उनका मौजूदा साल आसानी से गुजरे और उनका जीवन बेहतर और ज्यादा समृद्ध हो, और एक दूसरे अर्थ में वे अपने करियर में कामयाबी या अपने व्यापार से ढेरों पैसा कमाने की आशा करते हैं। यही नहीं, नव वर्ष में, वे यह भी सुनिश्चित करते हैं कि वे भाग्यशाली वाक्यांशों का प्रयोग करें। मिसाल के तौर पर, वे संख्या चार और पाँच कहने से बचते हैं, क्योंकि चीनी भाषा का “चार” सुनने में मृत्यु जैसा लगता है और “पाँच” शून्य जैसा। इसके बजाय, वे छह और आठ संख्याओं का प्रयोग करना पसंद करते हैं, जिसमें “छह” सब अच्छा रहने और “आठ” धन-दौलत कमाने को दर्शाता है। वे न सिर्फ शुभ शब्दों और वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं बल्कि कर्मचारियों, परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और मित्रों को लाल लिफाफे भी देते हैं। लाल लिफाफे देना धन-दौलत कमाने का प्रतीक माना जाता है, और वे जितने ज्यादा लाल लिफाफे बाँटते हैं, वह भविष्य में उनका उतना ही समृद्ध होना दर्शाता है। वे लाल लिफाफे सिर्फ लोगों को ही नहीं, अपने पालतू जानवरों को भी देते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि वे किसी से भी धन-दौलत कमा सकते हैं, और अगला वर्ष फलते-फूलते व्यापार और भव्य धन-दौलत से सराबोर होगा। उनके खाने से लेकर उनके हर कार्य तक, वे जो कहते हैं उससे लेकर कार्य करने के तरीके तक, सभी कुछ उन आदतों और कहावतों को जारी रखने से जुड़ा होता है जो परंपरा से उन्हें मिली हैं, और वे उन्हें श्रमसाध्य परिशुद्धता से करते हैं। भले ही उनका जीवन परिवेश या जिस समुदाय में वे रहते हैं वह बदल जाए, फिर भी ये पारंपरिक रिवाज और जीवनशैलियाँ नहीं बदल सकतीं। चूँकि ये परंपराएँ एक विशेष अर्थ लिए होती हैं, जिनमें लोगों के पूर्वजों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बताई गई सकारात्मक कहावतें और प्रतिबंधित चीजें शामिल हैं, इसलिए इनको उन्हें जारी रखना ही होगा। अगर इन परंपराओं का उल्लंघन हुआ या प्रतिबंधित चीजें की गईं, तो आने वाला वर्ष शायद अच्छा न जाए, हर जगह बाधाएँ आएँ, व्यापार मंदा हो जाए या दिवाला निकल जाए। इसीलिए इन परंपराओं को बनाए रखना बहुत अहम होता है। कुछ ऐसी परंपराएँ हैं जिनका त्योहारों के समय पालन करना जरूरी है, और साथ ही कुछ ऐसी परंपराएँ भी हैं जिनका लोगों को अपने दैनिक जीवन में पालन करना जरूरी है। मिसाल के तौर पर, बाल कटवाना—अगर कोई कैलेंडर देख कर यह जान ले कि यह दिन बाल कटवाने के लिए अशुभ है तो वह बाहर जाने की हिम्मत नहीं करता। अगर उसने कैलेंडर देखे बिना बाल कटवा लिए तो यह घर से बाहर न जाने और बाल न कटवाने के प्रतिबंधों का उल्लंघन होगा, और शायद उसे अनजान परिणाम झेलने पड़ें—इसलिए इन चीजों का पालन करना जरूरी है। वे परंपरा और अंधविश्वास दोनों से जुड़े हैं। अगर किसी को बाहर जाना हो, मगर वह कैलेंडर देख कर जान ले कि आज का पूरा दिन अशुभ है, यानी यह आराम का दिन है, विश्राम करने का, और कुछ भी करने से बचने का दिन है, यहाँ तक कि जब उसे बताया जाता है कि आज उसे बाहर जाकर सुसमाचार फैलाना है, तो उसे यह चिंता हो जाती है कि प्रतिबंध का उल्लंघन करने से न जाने क्या होगा, कहीं कोई अनहोनी न हो जाए, जैसे कि कार दुर्घटना या चोरी-डकैती। वह बाहर जाने की हिम्मत नहीं करेगा और कहेगा, “कल चलते हैं! पूर्वजों ने जो बताया हम उसकी अनदेखी नहीं कर सकते। वे कहते हैं कि हमें बाहर जाने से पहले कैलेंडर देखना चाहिए। अगर कैलेंडर के अनुसार सारी चीजें अशुभ हैं, तो हमें बाहर नहीं जाना चाहिए। फिर भी अगर तुम बाहर गए और कुछ हो गया तो तुम्हीं को भुगतना होगा। तुमसे किसने कहा कि कैलेंडर मत देखो और उसके अनुसार काम मत करो?” यह परंपरा और अंधविश्वास दोनों से जुड़ा है, है कि नहीं? (हाँ, दोनों से जुड़ा है।)

कुछ लोग कहते हैं, “मैं इस साल 24 का हो गया; यह मेरा राशि वर्ष है।” दूसरे कहते हैं, “मैं इस साल 36 का हो गया; यह मेरा राशि वर्ष है।” तुम्हें अपने राशि वर्ष में क्या करना है? (लाल चड्डी पहनो, लाल बेल्ट लगाओ।) पहले किसी ने लाल चड्डी पहनी है? किसने लाल बेल्ट लगाया है? लाल चड्डी पहन कर और लाल बेल्ट लगा कर कैसा लगा? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारा साल अच्छा बीता? क्या इनसे दुर्भाग्य दूर हुआ? (अपने राशि वर्ष में मैंने लाल मोजे पहने थे। लेकिन उस वर्ष मेरी परीक्षा के नतीजे बहुत बुरे रहे। लाल रंग पहनने से लोगों के कहे अनुसार सौभाग्य नहीं मिला।) उन्हें पहनने से तुम्हें दुर्भाग्य मिला, है न? लाल रंग न पहनने से क्या शायद तुम बेहतर कर पाए होते? (उसे पहनने या न पहनने से कोई असर नहीं हुआ।) प्रश्न के प्रति यही सही नजरिया है—कोई असर नहीं। यह एक परंपरा और एक अंधविश्वास दोनों है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि अभी तुम राशि वर्ष के विचार में विश्वास करते हो या नहीं, या तुम इस परंपरा को जारी रखना चाहते हो या नहीं, इससे जुड़े पारंपरिक विचारों और कहावतों ने लोगों के मन पर अपनी छाप छोड़ दी है। मिसाल के तौर पर, तुम्हारा राशि वर्ष आने पर तुम्हारे साथ कोई अनहोनी होती है, या ऐसे कुछ खास हालात बनते हैं जिनमें तुम्हारा वर्ष विषम और तुम्हारी कामना के विपरीत होता है, तो तुम खुद को यह सोचने से नहीं रोक सकोगे, “यह वर्ष सचमुच विषम रहा है। सोचा जाए तो यह मेरा राशि वर्ष है, और लोग कहते हैं कि अपने राशि वर्ष में तुम्हें सावधान रहना चाहिए, क्योंकि इस साल प्रतिबंधों का उल्लंघन करना आसान होता है। परंपरा के अनुसार मुझे लाल रंग पहनना चाहिए, लेकिन परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण मैं नहीं पहनता हूँ। मैं इन कहावतों में यकीन नहीं करता, लेकिन जब मैं इस वर्ष झेली चुनौतियों के बारे में सोचता हूँ, तो पाता हूँ कि चीजें आसान नहीं रही हैं। मैं इन समस्याओं से कैसे बच सकता हूँ? शायद अगला वर्ष बेहतर हो।” अनजाने ही वर्ष के दौरान जिन अनहोनियों से तुम्हारा सामना हुआ उन्हें तुम अपने पूर्वजों और परिवार द्वारा राशि वर्ष के बारे में तुम्हारे मन में बैठाई गई पारंपरिक कहावतों की शिक्षा से जोड़ देते हो। तुम इस वर्ष हुई अनहोनियों को सही ठहराने के लिए इन कहावतों का इस्तेमाल करते हो और ऐसा करते समय तुम उनके पीछे के तथ्यों और सार को किनारे कर देते हो। तुम उस रवैये को भी दरकिनार कर देते हो जो तुम्हें ऐसी स्थितियों के प्रति अपनाना चाहिए और उस सबक को भी जो तुम्हें इनसे सीखने चाहिए। तुम सहज ही इस वर्ष को एक विशेष वर्ष मानोगे, अनजाने ही इस वर्ष के दौरान हुई तमाम घटनाओं को अपने राशि वर्ष से जोड़ दोगे। तुम्हें लगेगा, “यह वर्ष मेरे लिए कुछ दुर्भाग्य लेकर आया या इसके दौरान मुझे कुछ आशीष मिले।” इन विचारों का तुम्हारे परिवार द्वारा मिली शिक्षा से एक निश्चित रिश्ता है। वे सही हों या गलत, क्या वे तुम्हारे राशि वर्ष से संबद्ध हैं? (नहीं, संबद्ध नहीं हैं।) वे संबंधित नहीं हैं। तो क्या इन मामलों पर तुम्हारे परिप्रेक्ष्य और नजरिये सही हैं? (नहीं, वे नहीं हैं।) वे सही क्यों नहीं हैं? क्या इसलिए कि तुम अपने परिवार द्वारा तुम्हारे भीतर पिरोए गए पारंपरिक विचारों से कुछ हद तक प्रभावित हुए हो? (हाँ।) तुमने इन पारंपरिक विचारों को प्राथमिकता दी और वे तुम्हारे मन पर हावी हो गए। फिर ऐसे मामले सामने आने पर, तुम्हारी तत्काल प्रतिक्रिया यह होती है कि तुम इन मामलों को इन पारंपरिक विचारों और नजरियों से देखते हो, जबकि उस परिप्रेक्ष्य को जो परमेश्वर तुममें चाहता है या उन विचारों और नजरियों को जो तुममें होने चाहिए, उन्हें दरकिनार कर देते हो। इन मामलों को देखने के तुम्हारे तरीके का अंतिम नतीजा क्या होगा? तुम्हें लगेगा कि यह वर्ष अनुकूल नहीं था, यह दुर्भाग्यपूर्ण और तुम्हारी कामनाओं के विपरीत था, और फिर तुम इन चीजों से बचने, विरोध और प्रतिरोध करने और उन्हें ठुकराने के साधन के रूप में अवसाद और नकारात्मकता को अपना लोगे। तो क्या तुम्हारे भीतर इन भावनाओं, विचारों और नजरियों के पैदा होने की वजह उन पारंपरिक विचारों से संबंधित है जो तुम्हारे भीतर तुम्हारे परिवार ने पिरोये हैं? (हाँ।) ऐसे मामलों में लोगों को क्या जाने देना चाहिए? उन्हें उस परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण को जाने देना चाहिए जिससे वे उन्हें मापते हैं। उन्हें इन मामलों को उस परिप्रेक्ष्य से नहीं देखना चाहिए कि इस वर्ष के दुर्भाग्यपूर्ण, प्रतिकूल और उनकी कामना के विपरीत होने की वजह से उनका इनसे सामना हुआ, या इस कारण से कि उन्होंने प्रतिबंधों का उल्लंघन किया या पारंपरिक प्रथाओं का पालन नहीं किया। इसके बजाय, तुम्हें हर मामले को बारी-बारी से देखना चाहिए और सबसे पहले तुम्हें कम-से-कम उन्हें एक सृजित प्राणी के नजरिये से देखना चाहिए। ये मामले अच्छे हों या बुरे, तुम्हारी कामनाओं के अनुकूल हों या विरुद्ध, इंसानी नजर में अनुकूल हों या दुर्भाग्यपूर्ण, मान लेना चाहिए कि ये परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हैं, परमेश्वर की सार्वभौमता के अधीन हैं, और परमेश्वर से आए हैं। क्या इन मामलों में ऐसा परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण अपनाने से फायदा है? (हाँ।) पहला लाभ क्या है? तुम इन मामलों को परमेश्वर से स्वीकार कर सकते हो, जिसका अर्थ है कि कुछ हद तक तुम समर्पण की मानसिकता अपना सकते हो। दूसरा लाभ यह है कि इन निराशाजनक मामलों से तुम कोई सबक सीख कर कुछ हासिल कर सकते हो। तीसरा लाभ यह है कि इन निराशाजनक मामलों से तुम अपनी कमियों और खामियों और साथ ही अपने भ्रष्ट स्वभाव को पहचान सकते हो। चौथा लाभ यह है कि इन निराशाजनक मामलों में तुम प्रायश्चित्त कर पीछे मुड़ सकते हो, अपने पिछले विचारों और नजरियों, अपनी पुरानी जीवनशैली और परमेश्वर के बारे में अपनी विविध गलतफहमियों को जाने दे सकते हो, और परमेश्वर के समक्ष वापस लौट सकते हो, समर्पण के रवैये के साथ उसके आयोजनों को स्वीकार सकते हो, भले ही वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से, उसके द्वारा तुम्हारी ताड़ना और तुम्हें अनुशासित करने या तुम्हें दंड देने से जुड़े हों। तुम इन सबके प्रति समर्पित होने, स्वर्ग और दूसरे लोगों को दोष न देने, हर चीज को अपने भीतर पारंपरिक विचारों द्वारा पिरोये गए नजरिये और दृष्टिकोण से बांधे न रखने को तैयार हो जाओगे, बल्कि इसके बजाय प्रत्येक मामले को एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से देखोगे। यह तुम्हारे लिए कई तरह से लाभकारी है। क्या ये तमाम चीजें लाभकारी नहीं हैं? (हाँ, जरूर हैं।) दूसरी ओर, अगर तुम इन मामलों को अपने परिवार द्वारा तुम्हारे भीतर पिरोये गए पारंपरिक विचारों के आधार पर देखोगे, तो तुम हर संभव कोशिश करोगे कि उनसे बचा जाए। उनसे बचने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ इन दुर्भाग्यपूर्ण चीजों, इन निराशाजनक, प्रतिकूल और अशुभ मामलों से बचने के विविध तरीके खोजना है। कोई कहता है, “छोटे दानव तुम्हें परेशान कर रहे हैं। अगर तुम लाल कपड़े पहनोगे, तो उनसे बच सकोगे। लाल कपड़े पहनना बौद्ध धर्म में तुम्हें तिलिस्मी तावीज दिए जाने जैसा है। तिलिस्मी तावीज पीले कागज का एक टुकड़ा होता है जिस पर लाल रंग में कुछ अक्षर लिखे होते हैं। तुम इसे अपने माथे पर चिपका सकते हो, अपने कपड़ों में सिल सकते हो या अपने तकिये के नीचे रख सकते हो, और यह तुम्हें इन चीजों से दूर रहने में मदद करेगा।” जब लोगों के पास अभ्यास का कोई सकारात्मक पथ नहीं होता, तो उनका एकमात्र उपाय इन कुटिल और दुष्ट पथों से मदद लेना होता है, क्योंकि कोई भी अभागा नहीं होना चाहता, दुर्भाग्य नहीं झेलना चाहता। सभी चाहते हैं कि चीजें आसान हों। यह दुनियावी मामलों का सामना करते समय भ्रष्ट मानवजाति की सहज प्रतिक्रिया होती है। तुम या तो इन मामलों से बचना चाहते हो, या उन्हें दूर करने के लिए विविध इंसानी उपायों का इस्तेमाल करना चाहते हो, क्योंकि तुम्हारे पास न तो उनके समाधान का सही पथ है, न ही उनका सामना करने के लिए सही विचार और नजरिये हैं। तुम इन चीजों को एक अविश्वासी के नजरिये से ही देख सकते हो, इसलिए तुम्हारी पहली प्रतिक्रिया उनका सामना न कर उनसे बचना है। तुम कहते हो, “चीजें मेरे लिए इतनी प्रतिकूल क्यों हैं? मैं इतना अभागा क्यों हूँ? मुझे हर दिन निपटान और काट-छाँट का सामना क्यों करना पड़ता है? मुझे हमेशा बाधा क्यों मिलती है, मैं क्यों गलतियाँ करता रहता हूँ? मेरे कार्य हमेशा क्यों उजागर किए जाते हैं? मेरे आसपास के लोग हमेशा मेरी कामनाओं के खिलाफ क्यों जाते हैं? वे मुझे निशाना क्यों बनाते हैं, मुझे नीची नजर से क्यों देखते हैं, और हर चीज मेरी इच्छा के विरुद्ध क्यों जाते हैं?” जैसे कि कुछ लोग कहते हैं, “तुम अगर दुर्भाग्यशाली हो तो ठंडा पानी भी तुम्हारे दाँतों में फँस सकता है।” क्या ठंडा पानी तुम्हारे दाँतों में फँस सकता है? क्या तुम ठंडे पानी को अपने दाँतों से चबाते हो? क्या यह बकवास नहीं है? क्या यह स्वर्ग और दूसरे लोगों को दोष देना नहीं है। (हाँ, जरूर है।) दुर्भाग्यशाली होने का क्या अर्थ होता है? क्या ऐसी चीज का वास्तव में अस्तित्व है? (नहीं, नहीं है।) इसका अस्तित्व नहीं है। अगर तुमने सचमुच समझ लिया होता कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है, सब-कुछ परमेश्वर की सार्वभौमता और व्यवस्था के अधीन है, तो तुम “दुर्भाग्यशाली” जैसे शब्द इस्तेमाल नहीं करते, और तुम मामलों से बचने की कोशिश नहीं करते। जब लोगों का अपनी इच्छा के विपरीत मामलों से सामना होता है, तो उनकी पहली प्रतिक्रिया उनसे बचने की होती है, और फिर वे उन्हें मना करते हैं। अगर वे इन मामलों को मना नहीं कर सकते, उनसे बच या छिप नहीं सकते, तो वे उनका प्रतिरोध करने लगते हैं। प्रतिरोध सिर्फ अपने विचारों में मनन करना नहीं है, या इस बारे में सोचना नहीं है; इसमें कार्य करना शामिल होता है। अकेले में लोग खुद को अच्छा दिखाने के लिए तुच्छ पैंतरेबाजी करते हैं, और ऐसे वक्तव्य देते हैं, जो उत्तेजक, उन्हें सही ठहराने वाले, आत्म-संरक्षण, स्वयं का महिमामंडन या स्वयं को अलंकृत करने वाले होते हैं, ताकि वे किसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना से प्रभावित न हों या उसमें न फंसें। एक बार कोई व्यक्ति जब प्रतिरोध करने लगता है, तो यह उसके लिए खतरनाक हो सकता है, है कि नहीं? (हाँ, हो सकता है।) मुझे बताओ, जब कोई व्यक्ति उस मुकाम पर पहुँच जाता है जहाँ वह प्रतिरोध करना शुरू कर देता है, तो क्या उसमें सामान्य मानवता का जमीर और समझ बाकी रह जाती है? वे विचारों और नजरियों से आगे बढ़कर असली कार्य में लग चुके हैं, और समझ और जमीर अब उन्हें रोक नहीं सकते। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि किसी व्यक्ति के कार्य और विचार विकसित होकर परमेश्वर का प्रतिरोध करने की वास्तविकता में बदल जाते हैं। वे अपने दिल में सिर्फ ठुकरा नहीं रहे हैं, अनिच्छुक या नाखुश नहीं है; वे अपने कार्यों और वास्तविक कृत्यों द्वारा प्रतिरोध कर रहे हैं। जब असली कार्य से प्रतिरोध की बात आती है, तो क्या मूल रूप से उस व्यक्ति का काम तमाम नहीं हो चुका है? जब परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करने, उसका प्रतिरोध और विरोध करने की वास्तविकताएँ आकार ले लेती हैं, तो अब यह उस पथ की समस्या नहीं रह गई है जिस पर लोग चल रहे हैं—इसका नतीजा पहले ही आ चुका है। क्या यह बहुत खतरनाक नहीं है? (हाँ, जरूर है।) तो एक छोटे-से, बेहद मामूली पारंपरिक सांस्कृतिक विचार, पारंपरिक विचार या अंधविश्वासी कहावत के बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह सिर्फ एक सरल जीवनशैली वाली आदत नहीं है, क्या खाएँ, क्या पहनें, या क्या बोलें या न बोलें इसका मामला नहीं है। यह परमेश्वर द्वारा आयोजित माहौल का सामना करते समय व्यक्ति द्वारा अपनाए जाने वाले रवैये की हद तक पहुँच सकता है। इसलिए ये भी ऐसे मसले हैं जिन्हें लोगों को जाने देना चाहिए।

बड़े त्योहारों के दौरान कुछ खास पारंपरिक जीवनशैलियों, विचारों और नजरियों को बनाए रखने के अलावा, लोग कुछ छोटे त्योहारों के दौरान भी उनका पालन करते हैं। मिसाल के तौर पर, चंद्र नव वर्ष के 15वें दिन वे मीठे मोमो खाते हैं। लोग मीठे मोमो क्यों खाते हैं? (इसलिए कि यह निरूपित करता है कि परिवार का पुनर्मिलन हो गया है।) परिवार का पुनर्मिलन हो गया है। क्या तुम लोगों ने पिछले कुछ वर्षों में मीठे मोमो खाए हैं? (मैंने घर में खाए हैं, कलीसिया में नहीं।) क्या अपने परिवार के साथ पुनर्मिलन अच्छा होता है? (नहीं, अच्छा नहीं होता।) क्या तुम्हारे परिवार में कोई अच्छे लोग हैं? या तो वे तुमसे पैसे माँगते हैं या उधार चुकाने को कहते हैं; तुम्हारे पास शोहरत और लाभ होता है तो वे तुम्हारी खुशामद करते हैं और कुछ हिस्सा माँगते हैं, और अगर तुम्हारे पास नहीं है, तो वे तुम्हें नीची नजर से देखते हैं। चंद्र नव वर्ष के 15वें दिन मीठे मोमो खाए जाते हैं, और साथ ही अलग-अलग तिथियों जैसे कि दूसरे चंद्र माह के दूसरे दिन, तीसरे माह के तीसरे दिन, चौथे माह के चौथे दिन, पांचवें माह के पांचवें दिन...। कुछ दूसरे रीति-रिवाज होते हैं। तरह-तरह की चीजों और उनके साथ जुड़े तरह-तरह के खाने का घालमेल है ये। ये जो चीजें अविश्वासियों और दानवों का संसार करता है, वे सभी हास्यास्पद हैं। अगर तुम त्योहार में खुशी मनाना चाहते हो, और उम्दा खाना खाना चाहते हो, तो बोलो कि तुम्हें उम्दा खाने के मजे लेने हैं, बस इतना ही। अगर तुम्हारे जीने के हालात इजाजत दें, तो तुम जो चाहे खा सकते हो। ये तमाम शगूफे बहुत हो गए, जैसे साल-दर-साल पदोन्नति के लिए चावल केक खाना, प्रचुरता के लिए मछली खाना या परिवार के पुनर्मिलन के लिए मीठे मोमो खाना। चीनी लोग चावल के मोमो भी बनाते हैं, लेकिन किस प्रयोजन से? हर वर्ष त्योहारों के दौरान कलीसिया के कुछ समर्पित व्यक्ति हर त्योहार के अनुरूप विविध चीजें खरीद लाते हैं, जैसे कि चावल के मोमो। उनमें से कुछ से मैंने पूछा, “तुम चावल के मोमो क्यों खाते हो?” वे बोले, “यह पांचवें चंद्र माह के पांचवें दिन पर पड़ने वाले ड्रैगन नाव उत्सव के लिए है।” चावल के मोमो बहुत स्वादिष्ट होते हैं, लेकिन मुझे नहीं मालूम कि इनसे कोई त्योहार क्यों जुड़ा हुआ है या लोगों के जीवन और धन-दौलत से इसका क्या रिश्ता है। मैंने कभी कोई शोध नहीं किया या इस बारे में कोई सर्वेक्षण नहीं किया, इसलिए मैं नहीं जानता। शायद यह किसी की याद में किया जाता है। लेकिन हमें उसकी याद में ये क्यों खाने चाहिए? चावल के मोमो उस व्यक्ति को देने चाहिए। जो भी उसकी स्मृति मनाना चाहता है उसे उसकी कब्र या तस्वीर के सामने ये चावल के मोमो रख देने चाहिए। ये जीवित लोगों को नहीं देने चाहिए : जीवित लोगों से उसका लेना-देना नहीं है। जीवित लोगों का उसके नाम पर ये खाना बेतुका है। इन त्योहारों का और उस दौरान क्या खाना चाहिए इसका ज्ञान अविश्वासियों से प्राप्त किया गया था : मैं खास बारीकियाँ नहीं जानता, और खास बारीकियाँ बाद में कलीसिया के लोगों के जरिये सबको बता दी गई थीं—चावल के मोमो ड्रैगन नाव उत्सव और चावल केक चंद्र नव वर्ष के दौरान खाए जाते हैं। पश्चिमी देशों में, लोग थैंक्सगिविंग दिवस पर टर्की खाते हैं : वे टर्की क्यों खाते हैं? खबरों के अनुसार वे थैंक्सगिविंग पर धन्यवाद ज्ञापन के लिए टर्की पक्षी खाते हैं—यह एक परंपरा है। पश्चिम में क्रिसमस नामक एक और छुट्टी होती है, जब लोग क्रिसमस ट्री सजाकर नए कपड़े पहनते हैं—यह भी एक परंपरा है। इस छुट्टी के दौरान पाश्चात्य लोगों को एक-दूसरे को सुखद संदेश शुभकामनाएँ और साथ ही आशीष देने होते हैं। उन्हें बुरे शब्द और अपशब्द कहने की इजाजत नहीं होती। ये सब पूर्वी संस्कृतियों की शुभ कहावतों के बराबर हैं और उनका प्रयोजन लोगों को प्रतिबंध तोड़ने से रोकना है, वरना आने वाला वर्ष उनके लिए अनुकूल नहीं होगा। थैंक्सगिविंग और क्रिसमस जैसी पश्चिमी छुट्टियों में विशेष लजीज खाना खाया जाता है और ये चीजें खाने को न्यायसंगत ठहराने के लिए कहानियाँ रची गई थीं। अंत में, मैं इन घटनाओं का सारांश प्रस्तुत करता हूँ : लोग इन स्वादिष्ट व्यंजनों का मजा लेने के बहाने ढूँढ़ते हैं, जिससे वे घर में मजे से दावत करने, तोंद बाहर निकलने तक खाने के लिए कुछ दिन छुट्टी लेने को सही ठहरा सकें। रक्तदान करने का समय आने पर नर्स कहती है, “तुम्हारा रक्त लिपिड स्तर बहुत ज्यादा है, मानक तक नहीं है, इसलिए तुम रक्तदान के लिए अयोग्य हो।” ऐसा बहुत ज्यादा मात्रा में माँस खाने से हुआ। इन पारंपरिक छुट्टियों को मनाने का मुख्य उद्देश्य उम्दा खान-पान का मजा लेना है। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में, बड़ों से बच्चों में पहुँचती है, और एक परंपरा बन जाती है। इन परंपराओं द्वारा पिरोये गए बुनियादी विचार और नजरिये और साथ ही खास अंधविश्वासी कहावतें भी बड़ों से युवा पीढ़ी में पहुँच जाती हैं।

और कौन-सी अंधविश्वासी कहावतें हैं? आँखों के फड़कने का जो जिक्र मैंने किया था क्या वह अक्सर होता है? (हाँ।) तुम कहते हो, “मेरी आँख फड़कती रहती है।” कोई पूछता है, “कौन-सी आँख फड़क रही है?” तुम जवाब देते हो, “बाईं आँख।” वह कहता है, “कोई बात नहीं। बाईं आँख का फड़कना धन-दौलत की भविष्यवाणी करता है, मगर दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है।” क्या यह सच है? तुम्हारी बाईं आँख के फड़कने पर क्या तुम अमीर हो गए? क्या तुम्हें धन प्राप्त हुआ? (नहीं।) तो क्या तुम्हारी दाईं आँख के फड़कने पर कोई विपत्ति आई? (यह भी नहीं।) क्या ऐसी कोई स्थिति आई जब तुम्हारी बाईं आँख के फड़कने पर विपत्ति आई हो, कुछ बुरा हुआ हो, या दाईं आँख के फड़कने पर कुछ अच्छा हुआ हो? क्या तुम इन चीजों में यकीन करते हो? (नहीं।) तुम इन चीजों में कैसे यकीन नहीं कर सकते? तुम्हारी आँख क्यों फड़कती है? क्या लोक संस्कृति में आँख को फड़कने से रोकने के कुछ देसी इलाज हैं? क्या कोई विधियाँ हैं? (मैंने कुछ लोगों को अपनी पलक पर सफेद रंग के कागज का टुकड़ा चिपकाते देखा है।) वे चिपकाने के लिए सफेद रंग का कागज ढूँढ़ते हैं। उनकी जो भी आँख फड़क रही हो, वे कैलेंडर या किसी छोटी-सी नोटबुक से सफेद रंग के कागज का टुकड़ा फाड़ लेते हैं और अपनी पलक पर चिपका लेते हैं—सफेद रंग छोड़ कर कोई और रंग नहीं हो सकता। सफेद कागज क्या दर्शाता है? इसके मायने हैं कि फड़कना “बेकार” है, यह संकेत देता है कि कुछ भी बुरा नहीं होने दिया जाएगा। क्या यह एक बढ़िया विधि है? बहुत बढ़िया है, है न? लेकिन क्या इसका अर्थ है कि आँख “बेकार” ही फड़क रही है? (कोई आँख की पलक पर कागज चिपकाता हो या नहीं इससे इसका कोई लेना-देना नहीं है।) क्या तुम लोग इस बात को स्पष्ट कर सकते हो? “बाईं आँख का फड़कना धन-दौलत की भविष्यवाणी करता है, मगर दाईं आँख का फड़कना विपत्ति की भविष्यवाणी करता है”—चाहे इसका अर्थ धन-दौलत हो या विपत्ति, क्या आँख फड़कने का कोई स्पष्टीकरण है? क्या ऐसी कोई स्थिति है जब तुम्हारी दाईं आँख फड़कने पर तुम्हें लगे कि कुछ बुरा होने वाला है, तुम्हें कोई पूर्वानुमान हुआ है, और थोड़ी देर बाद फड़कना बंद होने पर तुम सब-कुछ भूल जाते हो, और कई दिन बाद कुछ बुरा हो जाता है, और उस मामले को सँभालने के बाद तुम्हें अचानक याद आता है, और तुम सोचते हो, “वाह, आँख फड़कने के बारे में कहावत बिल्कुल सही है। क्यों? क्योंकि कुछ दिन पहले, मेरी दाईं आँख सचमुच फड़की थी और उसके बंद होने के बाद यह घटना घटी। ये होने के बाद से मेरी आँख नहीं फड़की है।” क्या ऐसा कभी होता है? जब तुम कोई बात नहीं समझ सकते, तो तुम कुछ कहने की हिम्मत नहीं करते, न तुम इसे नकारने की हिम्मत करते हो, न ही इसे सही मानने की; तुम इस विषय से बच नहीं सकते, तुम इसे स्पष्ट रूप से समझा नहीं सकते, लेकिन तुम्हें अभी भी लगता है कि यह संभव है। तुम कहते हो, “यह एक अंधविश्वास है, मैं इस पर यकीन नहीं कर सकता, सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है।” तुम इस पर विश्वास नहीं करते, लेकिन यह सच हो गया; यह इतना सही है, इसे कैसे समझाया जा सकता है? तुम यहाँ सत्य और सार नहीं समझते, इसलिए स्पष्ट रूप से नहीं बता सकते। तुम मुँह से इसे नकारते हो, इसे अंधविश्वास कहते हो, लेकिन अपने भीतर गहराई से तुम अब भी इससे डरते हो क्योंकि कभी-कभी यह वास्तव में सच हो जाता है। मिसाल के तौर पर, कोई किसी कार दुर्घटना में मारा जाता है। दुर्घटना से पहले, उस व्यक्ति की पत्नी की दाईं आँख बुरी तरह फड़कती रहती है : यह दिन-रात फड़कती है—आँख और कितना फड़केगी? दूसरे लोग भी उसकी आँख को फड़कते हुए देख सकते हैं। कुछ दिन बाद, उसके पति की एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है। अंत्येष्टि पूरी होने के बाद, वह बैठ कर धीरे-धीरे सोचने लगती है, “हे भगवान, उन कुछ दिनों मेरी आँख इतनी बुरी तरह से फड़क रही थी कि मैं अपने हाथ से भी उसे रोक नहीं पा रही थी। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह सच हो जाएगा।” बाद में वह इस कहावत पर यह सोच कर यकीन करने लगती है, “मेरी आँख के फड़कने पर चीजें सचमुच हो जाती हैं। जरूरी नहीं कि वे अच्छी हों या बुरी हों, मगर कुछ न कुछ होकर ही रहता है। यह एक तरह का अनुमान या पूर्वानुमान है।” क्या ऐसा कभी होता है? कुछ लोग कहते हैं, “मैं इस पर यकीन नहीं करता, यह एक अंधविश्वास है।” लेकिन यह सही वक्त पर आता है, और सचमुच बहुत सही होता है। लोक संस्कृति में जिक्र की गई चीजें आधारहीन अफवाहें नहीं हैं; अंधविश्वास परंपरा से अलग है। कुछ हद तक यह लोगों के जीवन में होता है, और यह लोगों के जीने के परिवेश और उनके जीवन में होने वाली घटनाओं को प्रभावित और नियंत्रित करता है। कुछ लोग कहते हैं, “सोचो, क्या यह अंधविश्वास न होकर परमेश्वर की ओर से मिला संकेत नहीं है? चूँकि यह अंधविश्वास नहीं है, इसलिए हमें इससे उचित ढंग से पेश आकर इसे स्वीकार करना चाहिए। यह शैतान से नहीं आता, हो सकता है यह परमेश्वर से आया हो—परमेश्वर का एक इशारा हो। हमें इसकी निंदा नहीं करनी चाहिए।” हम इस मामले को सही ढंग से कैसे देखें? यह तुम्हारी चीजें देखने की क्षमता और सत्य की तुम्हारी समझ की परीक्षा लेता है। अगर तुम यह विश्वास कर हर चीज से समान ढंग से पेश आते हो, “यह सब अंधविश्वास है, ऐसी कोई चीज नहीं है और मैं इनमें से किसी पर भी यकीन नहीं करता,” क्या यह चीजों को देखने का सही तरीका है? मिसाल के तौर पर, जब अविश्वासी घर बदलना चाहते हैं, तो घर बदलने से पहले वे अपने पंचांग में यह लिखा हुआ देखते हैं, “घर बदलने के लिए आज का दिन अशुभ है,” तो वे इस प्रतिबंध का पालन करते हैं और उस दिन घर बदलने की हिम्मत नहीं करते। वे घर बदलने से पहले ऐसा दिन तलाशते हैं जिसके लिए लिखा हो, “यह घर बदलने के लिए शुभ दिन है” या “सारे काम शुभ हैं।” नए घर में जाने के बाद, कुछ भी बुरा नहीं होता, और इससे भविष्य में उनके धन-दौलत पर भी असर नहीं पड़ता। क्या ऐसा होता है? कुछ लोग “घर बदलने के लिए अशुभ” लिखा देखते हैं, लेकिन उसमें विश्वास नहीं करते; वे फिर भी घर बदल लेते हैं। नतीजतन, नए घर में जाने के बाद कुछ गलत हो जाता है : परिवार में दुर्भाग्य छा जाता है, उनकी दौलत घट जाती है, उनके परिवार में कोई मर जाता है, और कोई दूसरा बीमार हो जाता है। तमाम चीजें, खेती-किसानी, कामकाज और व्यापार से लेकर उनके बच्चों की शिक्षा तक मुश्किल में पड़ जाती है। वे नहीं समझ पाते कि क्या हो रहा है। वे एक भविष्यवक्ता से परामर्श लेते हैं, जो कहता है, “उस वक्त तुमने एक मुख्य प्रतिबंध का उल्लंघन किया था। जिस दिन तुम नए घर में आए, वह अशुभ था, और ऐसा करके तुमने ताई सुई[क] का अपमान किया है।” यहाँ क्या हो रहा है? क्या तुम जानते हो? अगर तुम यह नहीं समझ सकते, तो तुम नहीं जानोगे कि ऐसी परिस्थिति आने पर इसे कैसे संभालना है। अगर कोई अविश्वासी कहता है, “मैं तुम्हें बता दूँ कि मैंने एक अशुभ दिन घर बदला था, नए घर आने के बाद मेरे परिवार ने दिन-ब-दिन समस्याओं का अनुभव किया, और हम और भी ज्यादा अभागे हो गए, और तब से लेकर एक भी दिन अच्छा नहीं रहा,” यह सुनकर शायद तुम्हारे दिल की धड़कन थम जाए। तुम यह सोचकर डर जाते हो, “अगर मैंने प्रतिबंधों का पालन नहीं किया तो क्या मेरे साथ भी ऐसा ही होगा?” तुम यह सोचकर इस पर बार-बार मनन करोगे, “मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, मैं नहीं डरता!” लेकिन तुम्हारे मन भी अभी भी शक बना रहता है, और तुम प्रतिबंध का उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करते।

तुम्हें इन अंधविश्वासी कहावतों को किस तरह देखना चाहिए? चलो आँख के फड़कने से बात शुरू करते हैं। क्या हम सभी जानते हैं कि आँख का फड़कना क्या होता है? लोगों को जो सबसे बुनियादी समझ है वह यह कि यह भविष्य की होनी की भविष्यवाणी करता है कि वह अच्छी होगी या बुरी। लेकिन यह अंधविश्वास है या नहीं? बताओ। (यह अंधविश्वास है।) यह अंधविश्वास है। अगला सवाल, क्या परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को इस कहावत पर विश्वास करना चाहिए? (उन्हें नहीं करना चाहिए।) उन्हें यकीन क्यों नहीं करना चाहिए? (क्योंकि हमारे भाग्य और दुर्भाग्य परमेश्वर के हाथों आयोजित होते हैं और इनका आंख के फड़कने से कोई लेना-देना नहीं है। हम जिस भी चीज का अभी सामना करते हैं वह परमेश्वर की सार्वभौमता और व्यवस्था के अधीन है, और हमें इसके प्रति समर्पित होना चाहिए।) मान लो कि एक दिन तुम्हारी आँख पूरा दिन बुरी तरह फड़कती रहती है और ऐसा अगली सुबह तक होता रहता है। बाद में कुछ हो जाता है, और तुम्हारा निपटान होता है। निपटान के बाद तुम्हारी आँख का फड़कना बंद हो जाता है, तुम क्या सोचोगे? “मेरी आँख का फड़कना इस बात का संकेत था कि मेरा निपटान होने वाला है।” क्या यह महज एक संयोग है? क्या यह अंधविश्वास है? कभी-कभी यह महज एक संयोग होता है; कभी-कभी ऐसी चीजें हो जाती हैं। क्या चल रहा है? (हे परमेश्वर, हो सकता है आँख का फड़कना सामान्य शारीरिक लय-ताल का हिस्सा हो, और इसे काट-छाँट या निपटान किए जाने से नहीं जोड़ना चाहिए।) आँख के फड़कने को इस तरह समझना चाहिए : भले ही लोग यह विश्वास करें कि एक आँख का फड़कना धन-दौलत आने का संकेत देता है, और दूसरा विपत्ति का, लेकिन अनेक रहस्यों के साथ मानव शरीर की रचना परमेश्वर ने की है। ये रहस्य कितने गहरे हैं, कौन-सी विशिष्ट बारीकियाँ इससे जुड़ी हैं, मानव शरीर में कौन-सी सहज बुद्धि, काबिलियत और संभावनाएँ हैं—इंसानों को इसका ज्ञान अपने आप नहीं होता। मानव शरीर आध्यात्मिक क्षेत्र को बूझ सकता है या नहीं, क्या इसमें वह भान होता है जिसे छठी इंद्रिय कहा जाता है—लोग नहीं जानते। क्या लोगों को मानव शरीर के इन अनजाने पहलुओं को समझने की जहमत उठानी चाहिए? (नहीं, उन्हें नहीं उठानी चाहिए।) कोई जरूरत नहीं है—लोगों को यह समझने की जरूरत नहीं है कि मानव शरीर में कौन-से रहस्य मौजूद हैं। भले ही उन्हें समझने की जरूरत न हो, फिर भी उन्हें यह बुनियादी समझ होनी चाहिए कि मानव शरीर सरल नहीं है। यह परमेश्वर द्वारा न रची गई किसी भी चीज या वस्तु से मूल रूप से अलग है, जैसे कि मेज, कुर्सी, या कंप्यूटर। इन चीजों की प्रकृति मानव शरीर की प्रकृति से बिल्कुल अलग है : इन निर्जीव वस्तुओं को आध्यात्मिक क्षेत्र का कोई बोध नहीं होता, जबकि परमेश्वर से आया सजीव मानव शरीर, जिसे परमेश्वर ने रचा है, अपने आसपास के परिवेश, वातावरण और कुछ विशेष वस्तुओं का बोध कर सकता है, और साथ ही समझ सकता है कि आसपास के माहौल और आने वाली घटनाओं के प्रति कैसी प्रतिक्रिया करे। यह सरल नहीं है—ये तमाम चीजें रहस्य हैं। मानव शरीर उन चीजों का बोध कर सकता है जो ठंडी, गर्म, सुगंधित, बदबूदार, मीठी, खट्टी और मसालेदार होती हैं, लेकिन ऐसे कुछ खास रहस्य हैं जिनके बारे में व्यक्ति की वस्तुपरक चेतना को ज्ञान नहीं होता। मनुष्य इन चीजों के बारे में नहीं जानते। तो, विशिष्ट रूप से कहा जाए, तो आँख का फड़कना किसी की तंत्रिकाओं से, छठी इंद्रिय से या आध्यात्मिक क्षेत्र की किसी चीज से संबद्ध होता है या नहीं—हम इस पर विचार नहीं करेंगे। चाहे जो हो, यह घटना होती तो है, और हम उसके होने के प्रयोजन और अर्थ की जाँच-पड़ताल नहीं करेंगे। फिर भी आँख के फड़कने को लेकर परिवार और लोक संस्कृति में कुछ खास कहावतें हैं। इन कहावतों में अंधविश्वास है या नहीं, कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि यह एक लक्षण है जो सजीव माहौल में होने वाली कुछ खास घटनाओं से पहले मानव शरीर में अभिव्यक्त होता है। क्या अभिव्यक्ति का यह रूप अंधविश्वास या परंपरा से जुड़ा है, या फिर विज्ञान से? यह ऐसी चीज है जिस पर शोध नहीं हो सकती—यह एक रहस्य है। संक्षेप में कहें, तो असल जीवन में प्राचीन काल से वर्तमान तक के हजारों वर्षों में, मानव जाति इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि किसी की आँख का फड़कना किसी-न-किसी तरह से उन घटनाओं से संबद्ध है, जो उसके आसपास होने वाली हैं। यह नाता किसी व्यक्ति के जीवन के धन-दौलत, भाग्य से संबद्ध है या किसी और पहलू से, इस पर शोध असंभव है। यह भी एक रहस्य है। इसे रहस्य क्यों माना जाता है? आध्यात्मिक क्षेत्र में, भौतिक संसार से परे अनेक चीजें शामिल होती हैं, जो तुम्हें बताई भी जाएँ तो न तुम उन्हें देख सकते हो और न महसूस कर सकते हो। इसीलिए इसे रहस्य कहा जाता है। चूँकि ये मामले रहस्य हैं, और लोग उन्हें देख या महसूस नहीं कर सकते, मगर फिर भी इंसानों में पूर्वाभास और पूर्व-ज्ञान की कुछ खास भावनाएँ जरूर होती हैं, इसलिए लोगों को इनसे कैसे निपटना चाहिए? सबसे सरल तरीका इन्हें बस नजरअंदाज करना है। मत मानो कि इनका तुम्हारे धन-दौलत या भाग्य से कुछ लेना-देना है। फिक्र मत करो कि तुम्हारी दाईं आँख के फड़कने से बुरी चीजें हो सकती हैं, और बाईं आँख के फड़कने पर यह सोच कर खुशी से मत उछलो-कूदो कि तुम अमीर बन जाओगे। इन चीजों को तुम्हें प्रभावित मत करने दो। मुख्य कारण यह है कि तुममें भविष्य को पहले ही देख पाने की काबिलियत नहीं है। सब-कुछ परमेश्वर द्वारा आयोजित और शासित होता है; होनी अच्छी होगी या बुरी, यह परमेश्वर के हाथों में है। तुम्हारा एकमात्र रवैया परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्था को समर्पित होने का होना चाहिए। भविष्यवाणियाँ या कोई बेकार का बलिदान, तैयारियां या संघर्ष मत करो। होनी तो होकर रहेगी, क्योंकि यह सब परमेश्वर के हाथों में है। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के विचारों, उसकी योजनाओं या उसने जो भी होनी तय कर रखी है, उसे बदल नहीं सकता। तुम चाहे अपनी पलक पर सफेद कागज चिपका लो, अपने हाथ से पलक को दबाओ, या विज्ञान या अंधविश्वास पर भरोसा करो, किसी से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। होनी तो होकर रहेगी, सच होगी, और तुम उसे नहीं बदल सकते, क्योंकि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है। इससे बचने की कोई भी कोशिश बेवकूफी है, बेकार का त्याग है, और जरूरी नहीं है। ऐसा करना सिर्फ यह दिखाएगा कि तुम विद्रोही और जिद्दी हो, तुममें परमेश्वर के प्रति आज्ञापालन का रवैया नहीं है। समझ रहे हो? (हाँ, समझ रहा हूँ।) तो चाहे आँख फड़कने को अंधविश्वास माना जाए या विज्ञान, तुम लोगों का रवैया यह होना चाहिए : अपनी बाईं आँख फड़कने पर खुश मत हो, और अपनी दाईं आँख फड़कने पर भयभीत, आतंकित, चिंतित, नकारने वाले या प्रतिरोधी मत बनो। तुम्हारी आँख फड़कने के बाद कुछ हो भी जाए, तो भी शांति से उसका सामना करो, क्योंकि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है। तुम्हें डरने या चिंतित होने की जरूरत नहीं है। अगर कुछ अच्छा होता है तो परमेश्वर को उसके आशीष के लिए धन्यवाद दो—यह परमेश्वर का अनुग्रह है; अगर कुछ बुरा हो जाए, तो परमेश्वर से तुम्हें रास्ता दिखाने, तुम्हारी रक्षा करने और तुम्हें प्रलोभन में न फँसने देने की प्रार्थना करो। फिर जो भी माहौल आए, परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्था को समर्पित होने में समर्थ बनो। परमेश्वर का परित्याग मत करो, उससे शिकायत मत करो, तुम पर जितनी भी बड़ी विपत्ति आए, तुम्हें जितने भी गंभीर दुर्भाग्य का अनुभव करना पड़े, परमेश्वर को दोष मत दो। परमेश्वर के आयोजन को समर्पित होने को तैयार हो जाओ। तब क्या यह मसला सुलझ नहीं जाएगा? (हाँ।) ऐसे मामलों में, लोगों को यह विचार और नजरिया रखना चाहिए : “भविष्य में चाहे जो हो, मैं तैयार हूँ, और परमेश्वर के प्रति मेरा रवैया आज्ञा मानने का है। चाहे मेरी बाईं आँख फड़के, या मेरी दाईं आँख, या दोनों आँखें एक साथ फड़कें, मैं नहीं डरता। जानता हूँ कि भविष्य में शायद कुछ हो जाए, मगर विश्वास करता हूँ कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है। यह शायद वह तरीका हो सकता है जिससे परमेश्वर मुझे किसी होनी के बारे में सूचित कर रहा हो, या यह मेरे भौतिक शरीर की सहज प्रतिक्रिया हो सकती है। चाहे जो हो, मैं तैयार हूँ, और परमेश्वर के प्रति मेरा रवैया आज्ञापालन का है। इस घटना के बाद मुझे कितनी भी हानि या नुकसान हो, मैं परमेश्वर को दोष नहीं दूँगा। मैं समर्पित होने को तैयार हूँ।” लोगों को यह रवैया अपनाना चाहिए। एक बार यह रवैया अपनाने के बाद उन्हें अब परवाह नहीं होगी कि आँखें फड़कने के बारे में उनके परिवार द्वारा उन्हें सिखाई गई कहावतें अंधविश्वास हैं या विज्ञान। वे कहते हैं, “यह अंधविश्वास हो या विज्ञान, कोई फर्क नहीं पड़ता। तुम जो भी मानते हो, वह तुम्हारा अपना मामला है। अगर तुम मुझसे अपनी पलक पर कागज का टुकड़ा चिपकाने को कहोगे, तो मैं ऐसा नहीं करूँगा। अगर फड़कना मुझे परेशान कर दे, तो मैं थोड़ी देर ऐसा कर भी लूँगा।” अगर कोई तुमसे कहे, “तुम्हारी आँख बहुत फड़फड़ा रही है, अगले कुछ दिन सावधान रहो!” क्या सावधान होने से तुम किसी भी चीज से बच सकोगे? (नहीं, होनी से बचा नहीं जा सकता।) अगर यह एक आशीष है तो यह विपत्ति नहीं हो सकती, अगर यह विपत्ति है तो तुम इसे रोक नहीं सकते; यह आशीष हो या विपत्ति, तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिए। यह वही रवैया अपनाना है जो अय्यूब ने अपनाया था। अगर तुम इसे आशीष होने पर ही स्वीकारते हो, अपनी बाईं आँख फड़कने से खुश होते हो, मगर दाईं आँख फड़कने से नाराज होकर कहते हो, “यह क्यों फड़क रही है? यह फड़कती ही रहती है, कभी नहीं रुकती! मैं अपनी दाईं आँख को फड़कने से रोकने और दुर्भाग्य को मुझसे दूर रखने के लिए श्राप दूँगा और प्रार्थना करूँगा”—यह वो रवैया नहीं है जो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले और उसका अनुसरण करने वाले व्यक्ति में होना चाहिए। परमेश्वर की इजाजत और उसके द्वारा उसका होना तय किए जाने के बिना, क्या दुर्भाग्य और दानव तुम्हारे पास आने की हिम्मत करेंगे? (नहीं।) भौतिक और आध्यात्मिक दोनों संसार परमेश्वर के नियंत्रण, सार्वभौमता और व्यवस्था के अधीन हैं। एक तुच्छ-सा दानव जो भी करना चाहे, परमेश्वर की अनुमति के बिना क्या वह तुम्हारा बाल भी बाँका करने की हिमाकत करेगा? वह हिम्मत नहीं करेगा, है ना? (नहीं, वह नहीं करेगा।) वह तुम्हें छू कर नुकसान पहुँचाना चाहता है, लेकिन अगर परमेश्वर उसे अनुमति न दे, तो वह हिम्मत नहीं करेगा। अगर परमेश्वर यह कह कर उसे अनुमति दे दे, “इसके आसपास कुछ हालात पैदा कर दो, इस पर कहर और मुश्किलें बरपा दो,” तब तुच्छ दानव खुश होकर तुम्हारे खिलाफ काम करने लगेगा। अगर तुम्हें परमेश्वर में आस्था है, और तुम अपनी गवाही में दृढ़ होकर, परमेश्वर को नकारे या धोखा दिए बिना, तुच्छ दानव को सफल न होने देकर उस पर विजय पा लेते हो, तो वह परमेश्वर के समक्ष आने पर अब तुम पर आरोप नहीं लगा पाएगा, परमेश्वर तुमसे महिमा पाएगा और वह तुच्छ दानव को कैद कर देगा। वह दानव दोबारा तुम्हें हानि पहुँचाने की हिम्मत नहीं करेगा और तुम सुरक्षित रहोगे। तुम्हारे भीतर यह सच्ची आस्था होनी चाहिए, तुम्हें यह विश्वास रखना चाहिए कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथ में है। परमेश्वर की अनुमति के बिना कोई भी बुरी या दुर्भाग्यपूर्ण चीज तुम तक नहीं पहुँचेगी। परमेश्वर लोगों को आशीष देने से ज्यादा और बहुत कुछ कर सकता है; वह तुम्हारी परीक्षा लेने और तुम्हें तपाने के लिए तरह-तरह के हालात की व्यवस्था कर सकता है, उनसे तुम्हें कुछ सबक सिखा सकता है, और वह तुम्हें ताड़ना देने और तुम्हारा न्याय करने के लिए तरह-तरह के हालात बना सकता है। कभी-कभी हो सकता है परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित परिस्थितियाँ तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप न हों और तुम्हारी कल्पनाओं के अनुरूप तो बिल्कुल न हों। लेकिन अय्यूब की यह बात मत भूलो, “क्या हम जो परमेश्‍वर के हाथ से सुख लेते हैं, दुःख न लें?” (अय्यूब 2:10)। यह परमेश्वर में तुम्हारी सच्ची आस्था का स्रोत होना चाहिए। विश्वास करो कि परमेश्वर हर चीज का नियंत्रण करता है और तुम आँख के फड़कने की मामूली बात से नहीं डरोगे, क्या यह सही नहीं है? (हाँ, सही है।)

अभी-अभी हमने आँख फड़कने से निपटने के तरीकों के बारे में संगति की। आँख का फड़कना—जो दैनिक जीवन की एक आम घटना है—इसे दूर करने के लिए लोग अक्सर इंसानी तरीके आजमाते हैं। लेकिन इन तरीकों से मनचाहे नतीजे नहीं मिलते, और आखिर होनी तो होकर रहती है, और कोई भी इससे बच नहीं सकता। चाहे अच्छी हो या बुरी, चाहे लोग इसे देखना चाहें या नहीं, जो होना है वो तो होकर ही रहेगा। इससे यह और पक्का हो जाता है कि यह चाहे व्यक्ति की नियति हो या दैनिक जीवन की तुच्छ बातें, ये सभी परमेश्वर द्वारा आयोजित और प्रबंधित होती हैं, और कोई भी इनसे बच नहीं सकता। इसलिए, बुद्धिमान लोगों को इन चीजों को सही, सकारात्मक रवैये से लेना चाहिए, इन्हें सत्य सिद्धांतों और परमेश्वर के वचनों के आधार पर देखना और दूर करना चाहिए, बजाय इसके कि बेमानी त्याग या संघर्षों के इंसानी तरीकों का सहारा लें, वरना अंत में नुकसान उन्हीं को होगा। ऐसा इसलिए कि सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के विषय में मानव जाति के पास चुनने के लिए दूसरा कोई पथ है ही नहीं। एकमात्र इसी पथ को चुनना चाहिए, इसी पर चलना चाहिए। परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को समर्पित हो जाओ, परमेश्वर द्वारा आयोजित माहौल में सबक सीखो, परमेश्वर को समर्पित होना, उसके कर्मों को समझना, खुद को समझना, और एक सृजित प्राणी को कौन-सा पथ चुन कर उस पर चलना चाहिए, यह सीखो और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अंधविश्वासों या इंसानी तरीकों से प्रतिरोध करने के बजाय, यह सीखो कि लोगों को जिस जीवन पथ पर चलना चाहिए, उस पर अच्छे ढंग से कैसे चलें।

हमने आँख फड़कने से निपटने के तरीकों पर तो अपनी संगति का समापन कर दिया है, लेकिन लोगों को अपने दैनिक जीवन में सपने देखने का मामला कैसे सँभालना चाहिए? मिसाल के तौर पर, अगर किसी रात तुम सपना देखो कि तुम्हारे दाँत गिर गए हैं, तो शायद तुम्हारी माँ पूछे, “दाँत गिरने पर खून निकला था क्या?” अगर तुम पूछो, “निकला हो तो फिर क्या होगा?” तो तुम्हारी माँ शायद तुम्हें बताए कि इसका अर्थ परिवार में किसी की मृत्यु होना, या कोई और दुर्भाग्यपूर्ण घटना होना हो सकता है। मुझे नहीं मालूम कि इस विवरण के पीछे कौन-सी खास कहावत हो सकती है, एक परिवार कुछ कहेगा, और दूसरा कुछ और। कुछ लोग कह सकते हैं कि यह किसी निकट संबंधी, जैसे कि दादा-दादी या माता-पिता की मृत्यु की भविष्यवाणी है, और दूसरे कह सकते हैं कि यह किसी मित्र की मृत्यु दर्शाता है। किसी भी स्थिति में, दाँत गिरने के बारे में सपना देखने को बुरा माना जाता है। यह बुरा है और जीवन और मृत्यु के मामलों से जुड़ा हुआ है, इसलिए लोग बहुत चिंतित हो जाते हैं। जब भी लोग दाँत गिरने के बारे में सपना देखते हैं, तो बेचैनी से उनकी नींद खुल जाती है। उन्हें एक बुनियादी आभास होता है कि दुर्भाग्य या कुछ बुरा होने वाला है, जो उन्हें व्याकुल, भयभीत और आतंकित कर देता है। वे इस भावना से चाह कर भी छुटकारा नहीं पा सकते, वे चाहते तो हैं कि ऐसे लोगों को तलाशें जो इस मामले का समाधान कर दें या इसे आसान बना दें, लेकिन उनके पास ऐसा करने का कोई तरीका नहीं होता। संक्षेप में कहें, तो वे इस सपने के वश में हो जाते हैं। खास तौर से जब सपने में उनके दाँतों से खून निकलता है तो उनकी चिंता तीव्र हो जाती है। ऐसा सपना देखने के बाद लोग अक्सर कई दिनों तक बुरी मनःस्थिति में होते हैं, परेशान रहते हैं, और नहीं जानते कि इससे कैसे निपटें। जो लोग इन चीजों से परिचित नहीं हैं, वे शायद इससे प्रभावित न हों, लेकिन जिन लोगों ने पहले ही कुछ खास विचार और नजरिये अपना रखे हैं, या इस मामले में अपने पूर्वजों से उन तक पहुँची और भी ज्यादा भयानक और सनसनीखेज कहावतें सुन चुके हैं, वे और भी ज्यादा चिंतित होने को प्रवृत्त हो जाते हैं। वे ऐसे सपने देखने से डरते हैं, और जब भी देखते हैं, जल्द ऐसी प्रार्थनाओं का सहारा लेते हैं, “हे परमेश्वर, मेरी रक्षा करो, मुझे ढाढ़स और शक्ति दो और ऐसी घटनाएँ होने से रोको। अगर यह मेरे माता-पिता को लेकर है, तो उन्हें किसी भी दुर्घटना से सुरक्षित और दूर रखो।” साफ तौर पर, ये रवैये उनके विचारों और नजरियों से या फिर पारंपरिक कहावतों से प्रभावित होते हैं। परंपरा की बात करें, तो कुछ परिवारों या लोगों के पास ऐसी चीजें दूर करने के विशेष तरीके हो सकते हैं, वे कुछ खास चीजें खा-पी सकते हैं, कुछ खास मंत्रोच्चार कर सकते हैं, या बुरे नतीजे दूर करने या उन्हें रोकने के लिए कुछ खास कदम उठा सकते हैं। लोक परंपराओं में यकीनन ऐसी प्रथाएँ हैं, लेकिन हम उनकी बात नहीं करेंगे। हम जिस बारे में संगति करेंगे वह यह है कि सपने देखने के मामले को किस तरह देखा और समझा जाए। सपने देखना देह का इंसानी सहज बोध है, या देह के जीवित रहने की घटना का अंश। बात चाहे जो हो, यह एक रहस्यमय घटना है। लोग अक्सर कहते हैं, “दिन के अपने विचार होते हैं, रात के अपने सपने।” लेकिन लोग आम तौर पर दिन में अपने दाँत खो देने जैसी चीजों के बारे में नहीं सोचते, न ही ये ऐसी चीजें हैं जिनकी लोग अपनी आकांक्षाओं में कल्पना करते हैं। कोई भी ऐसे मामलों का सामना नहीं करना चाहता, और कोई भी दिन-रात ऐसी चीजों से आसक्त नहीं होता। फिर भी, ये घटनाएँ अक्सर तब होती हैं जब लोग इनकी बहुत कम उम्मीद करते हैं। तो इसका इस कहावत से कोई लेना-देना नहीं है, “दिन के अपने विचार होते हैं, रात के अपने सपने।” यह वैसी चीज नहीं है जो इसलिए होती है कि तुम उसके बारे में सोचते हो। पश्चिम के फ्रॉयड या चीन में झोऊ के ड्यूक ने सपनों के बारे में चाहे जो भी व्याख्या की हो, या सपने आखिरकार सच हों या न हों, संक्षेप में कहें, तो सपनों का मामला मानव शरीर की कुछ अचैतन्य संवेदनाओं और जागरूकताओं से जुड़ा हुआ है, और उसके रहस्यों का एक अंश है। पश्चिम में जीवविज्ञान और स्नायुविज्ञान का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक इस पर शोध करते रहे हैं, लेकिन आखिर में वे मानव स्वप्नों के उद्गम को समझने में कामयाब नहीं हुए। वे इसे समझ नहीं सकते, तो क्या हमें इस पर शोध करने की कोशिश करनी चाहिए? (हमें नहीं करनी चाहिए।) हम क्यों न करें? (इन पर शोध करना निरर्थक है, और वैसे भी हम उन्हें नहीं समझ पाएँगे।) बात यह नहीं है कि यह निरर्थक है या हम इसे नहीं समझेंगे; हमें शोध नहीं करनी चाहिए क्योंकि इसका सत्य से संबंध नहीं है, बस इतनी-सी बात है। इसका अध्ययन कर और इसे समझ कर तुम क्या हासिल कर लोगे? क्या सत्य से इसका संबंध है? (नहीं, संबंध नहीं है।) यह बस एक घटना है जो शरीर के जीवन काल में होती है, और लोगों के जीवन में यह अक्सर होती है। लेकिन लोग इसका अर्थ नहीं जानते। यह रहस्य का एक हिस्सा है। लोगों को इस पर शोध करने या जाँचने-खोजने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसका सत्य से संबंध नहीं है, और यह उन पथों से भी जुड़ा हुआ नहीं हैं जिन पर लोग चलते हैं। चाहे तुम रात में अपने दाँत खोने का सपना देखो, चाहे तुम शानदार दावत के मजे लेने या रोलरकोस्टर पर सवार होने का सपना देखो, क्या इसका इस बात से कोई लेना-देना है कि दिन के दौरान तुम्हारा जीवन कैसा था? (नहीं, बिल्कुल नहीं है।) अगर एक रात तुम किसी से लड़ने के बारे में सपना देखते हो, तो क्या इसका अर्थ है कि दिन में तुम जरूर किसी से लड़ोगे? अगर एक रात तुम्हें सुखद, खुशनुमा सपना आता है और तुम खुशी-खुशी जाग जाते हो, तो क्या दिन में सब कुछ आसानी से, मनचाहे ढंग से होने की गारंटी होगी? क्या इसका यह अर्थ है कि दिन के दौरान तुम सत्य को समझ सकोगे और काम करते समय सत्य सिद्धांत पा सकोगे? (नहीं, यह अर्थ नहीं है।) तो सपने देखने का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है। इस पर शोध करने की जरूरत नहीं है। क्या तुम्हारे दाँतों के गिरने और खून निकलने का किसी निकट के रिश्तेदार की मृत्यु से कोई संबंध है? (नहीं, कोई संबंध नहीं है।) तुम हमेशा ऐसी अनाड़ी बातें क्यों करते हो? तुम फिर से अनाड़ी बन रहे हो, है कि नहीं? तुममें अंतर्दृष्टि नहीं है। मानव शरीर एक रहस्य है, और ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें तुम समझा नहीं सकते। क्या तुम इन सबको एक सरल-सा “नहीं” कहकर सुलझा सकते हो? अतीत में, नबियों और परमेश्वर द्वारा चुने हुए लोगों को भी पैगंबरी सपने आते थे। उन सपनों की महत्ता थी। तुम इस बात को कैसे समझा सकते हो कि लोगों के सामने चीजों का खुलासा करने के लिए परमेश्वर सपनों का प्रयोग करता था? फिर परमेश्वर ने उनके सपनों में प्रवेश कैसे किया? ये सब रहस्य हैं। लोगों को कुछ चीजें बताने, कुछ मामलों में प्रबुद्ध करने, और कुछ घटनाओं के होने से पहले ही उनका पूर्वानुमान लगाने के लिए भी परमेश्वर ने सपनों का प्रयोग किया। तुम इसे कैसे समझाओगे? क्या तुम लोग इन बातों से अनजान हो? (हाँ।) अब, यहाँ बात यह नहीं है कि तुम दैनिक जीवन की उन तमाम समझाई न जा सकने वाली घटनाओं को नकार दो जो अभेद्य रहस्यों से जुड़ी हैं, मुख्य यह है कि तुम उन्हें सही ढंग से समझो और देखो। यह इस बारे में नहीं है कि तुम ऐसी चीजों को यह कह कर निरंतर झुठला दो कि इनका अस्तित्व नहीं है, ऐसी चीज होती ही नहीं, या ये नामुमकिन हैं, बल्कि यह इस बारे में है कि तुम उनसे सही ढंग से पेश आओ। उनसे सही ढंग से पेश आने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि इन बातों को अंधविश्वासी या अतिवादी विचारों और नजरियों से न देखा जाए जैसा कि सांसारिक लोग करते हैं, न ही उन्हें उन लोगों की तरह देखना है जो नास्तिक हैं या जिनमें जरा भी आस्था नहीं है। यह तुम्हें इन दो अतियों की ओर ले जाने के लिए नहीं है, बल्कि तुम्हें दैनिक जीवन में होने वाली इन घटनाओं पर विचार करने के लिए सही स्थिति और दृष्टिकोण रखने देने के लिए है, सांसारिक लोगों या गैर-विश्वासियों वाला रवैया नहीं, बल्कि वह दृष्टिकोण रखने देने के लिए है जो परमेश्वर के एक विश्वासी को रखना चाहिए। तो तुम्हें इन मामलों में कौन-सा दृष्टिकोण रखना चाहिए? (कुछ भी हो जाए, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था को समर्पित हो जाओ, उस पर शोध मत करो।) तुम्हें इस पर शोध नहीं करना चाहिए, लेकिन क्या तुम्हें इस बारे में थोड़ी समझ होनी चाहिए? मान लो कोई कहे, “अमुक व्यक्ति ने सपना देखा कि उसके दाँत गिर गए और खून निकला, और कुछ ही दिनों बाद मैंने सुना कि उसके पिता की मृत्यु हो गई।” अगर तुम फौरन इसे नकार कर कहोगे, “नामुमकिन! यह महज अंधविश्वास है, एक संयोग है। अंधविश्वास किसी चीज में इसलिए यकीन करना है क्योंकि तुम उससे आसक्त हो; अगर तुम उससे आसक्त नहीं होते, तो वह होता ही नहीं,” क्या ऐसा कहना बेवकूफी है? (हाँ।) तो फिर तुम्हें इस मामले को किस तरह देखना चाहिए? (हमें समझना चाहिए कि भौतिक शरीर के अनेक रहस्य हैं, और दाँत गिरने और खून निकलने के बारे में सपना देखना शायद किसी दुखद घटना के होने का संकेत हो। लेकिन यह घटना घटे चाहे न घटे, हमें परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना चाहिए।) तुम लोगों ने अभी-अभी आँख फड़कने से कुछ सीखा, तो तुम्हें दाँत गिरने और खून निकलने के बारे में देखे सपने से कैसे निपटना चाहिए? तुम्हें कहना चाहिए, “यह मामला हमारी समझ से परे है। असल जीवन में, यह घटना सचमुच में होती है। हम यह तय नहीं कर सकते कि क्या यह साकार होगी या यह कोई अपशकुन है, लेकिन ऐसी बुरी चीजें असल जीवन में जरूर होती हैं। आध्यात्मिक मामले हमारी समझ से बाहर हैं, और हमें अंधाधुंध दावे करने की हिम्मत नहीं करनी चाहिए। अगर मुझे कोई ऐसा सपना आए, तो मेरा रवैया क्या होना चाहिए? सपना चाहे जो हो, मैं उससे लाचार नहीं होऊँगा। अगर यह सपना सचमुच साकार हो गया, जैसा कि लोग कहते हैं, तो मुझे मानसिक रूप से तैयार करने और ऐसा कुछ होने के बारे में बताने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद दूँगा। मैंने इस बारे में कभी नहीं सोचा है कि परिवार के किसी सदस्य या अपने माता-पिता के निधन से क्या मैं प्रभावित होऊँगा : क्या मुझे आघात पहुँचेगा, क्या मेरा कर्तव्य निर्वहन प्रभावित होगा, क्या मैं कमजोर महसूस करूँगा या परमेश्वर के खिलाफ शिकायत करूँगा—मैंने कभी भी इस बारे में नहीं सोचा है। लेकिन आज इस वाकये ने मुझे इसका इशारा दिया है, मुझे अपना वास्तविक आध्यात्मिक कद देखने दिया है। जब मैं अपने माता-पिता की मृत्यु के बारे में सोचता हूँ, तो कहीं भीतर बहुत गहरी पीड़ा महसूस होती है; मैं इससे बेबस हो जाता हूँ, अवसाद-ग्रस्त महसूस करता हूँ। एकाएक मुझे एहसास होता है कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। परमेश्वर को समर्पित होने का मेरा दिल बहुत छोटा है और उसी तरह परमेश्वर में मेरी आस्था भी कम है। मुझे लगता है कि आज से मुझे खुद को और ज्यादा सत्य से लैस करना चाहिए, परमेश्वर को समर्पित होना चाहिए, और इस मामले से विवश नहीं होना चाहिए। अगर किसी निकट संबंधी का सचमुच निधन हो जाता है, या वह चला जाता है, तो भी मैं उससे बेबस नहीं होऊँगा। मैं तैयार हूँ और मैं परमेश्वर से मार्गदर्शन करने और मेरी शक्ति बढ़ाने की विनती करता हूँ। आगे चाहे जो भी हो, मुझे अपना कर्तव्य निर्वहन चुनने का पछतावा नहीं होगा, न ही मैं तन-मन से परमेश्वर के लिए खुद को खपाना छोड़ दूँगा। मैं डटा रहूँगा, और मैं पहले की ही तरह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को स्वेच्छा से समर्पित होता रहूँगा।” इसके बाद, तुम्हें अपने दिल में अक्सर प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर से मार्गदर्शन खोजना और उससे विनती करनी चाहिए कि वह तुम्हारी शक्ति बढ़ा दे जिससे तुम अब इस मामले से विवश न रहो। चाहे किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो या न हो, तुम्हें इसके लिए अपने आध्यात्मिक कद को तैयार रखना चाहिए, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जब ऐसी घटना हो, तो तुम कमजोर न पड़ो, परमेश्वर के खिलाफ शिकायत न करो, और परमेश्वर के लिए तन-मन से खपने के अपने संकल्प और अपनी इच्छा को न बदलो। क्या तुम्हें यह रवैया नहीं अपनाना चाहिए? (हाँ।) अपने दाँत गिरने का सपना देखने जैसी बातें आने पर तुम्हें उनके अस्तित्व को नकारना नहीं चाहिए, या उन्हें दरकिनार कर उनकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए, और तुम्हें उनसे निपटने के लिए निश्चित रूप से कोई अजीबोगरीब या आत्मरक्षा के तरीके इस्तेमाल नहीं करने चाहिए। इसके बजाय तुम्हें सत्य खोजना चाहिए, परमेश्वर के आयोजनों को स्वीकार कर उसके समक्ष आना चाहिए; और निरर्थक त्याग या मूर्खतापूर्ण चुनाव नहीं करने चाहिए। जब अनाड़ी और जिद्दी लोगों का किसी ऐसी चीज से सामना होता है जिसका उन्होंने पहले अनुभव नहीं किया है और जिसे वे नहीं समझ सकते, तब वे यूँ कह सकते हैं, “ऐसी कोई चीज नहीं होती,” “यह कुछ नहीं है,” “इसका अस्तित्व नहीं है,” या “यह महज अंधविश्वास है।” परमेश्वर में विश्वास रखने वाले कुछ लोग यह भी कहते हैं, “मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, भूतों में नहीं।” या “मैं परमेश्वर में विश्वास रखता हूँ, शैतान में नहीं। शैतान है ही नहीं!” वे परमेश्वर में अपनी सच्ची आस्था साबित करने के लिए इन वक्तव्यों का प्रयोग करते हैं, और कहते हैं कि वे केवल परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, भूत-प्रेत, दुष्ट आत्माओं, आत्मा के वश में होने या आध्यात्मिक क्षेत्र के अस्तित्व में भी विश्वास नहीं रखते। क्या वे बस गैर-विश्वासी नहीं हैं? (हाँ, जरूर हैं।) वे अविश्वासियों के संसार के उन पारंपरिक विचारों की कहावतों को स्वीकार नहीं करते, न ही वे अंधविश्वास से जुड़े अंधविश्वासी स्पष्टीकरणों या किन्हीं तथ्यों को स्वीकार करते हैं। इन चीजों में विश्वास न रखने का यह अर्थ नहीं है कि ये होती नहीं हैं। फिलहाल यह तुम्हें यकीन न करने या इन चीजों से बचने या उन्हें नकारने का आग्रह करने के बारे में नहीं है। इसके बजाय यह तुम्हें इन मामलों का सामना करते समय सही विचार और नजरिये रखना, सही चुनाव करना और सही रवैया अपनाना सिखाने के बारे में है। यह तुम्हारा सच्चा आध्यात्मिक कद होगा और तुम्हें इसी जगह प्रवेश करना चाहिए। मिसाल के तौर पर, किसी को अपने सिर के बाल खो देने का सपना आता है। सपने में बाल खो देना भी अशुभ माना जाता है। उससे जुड़ी व्याख्याएँ या साकार घटनाएँ चाहे जो भी हों, संक्षेप में कहें तो लोग ऐसे सपनों के बारे में नकारात्मक व्याख्याएँ करते हैं, और मानते हैं कि यह कुछ बुरा या दुर्भाग्यपूर्ण होने का संकेत है। साधारण सपनों को छोड़कर जो किसी अहम मसले से जुड़े नहीं होते, उन विशेष सपनों की कुछ खास व्याख्याएँ होती हैं, और ये व्याख्याएँ कुछ खास घटनाओं की भविष्यवाणी करती हैं, लोगों को कुछ पूर्वानुमान, चेतावनी या पूर्वसूचना देती हैं, उन्हें जानने देती हैं कि भविष्य में क्या होने वाला है या उन्हें कुछ जागरूकता देती हैं जिससे लोग जान जाते हैं कि क्या होने वाला है ताकि वे खुद को मानसिक रूप से तैयार कर सकें। चाहे जो भी होने वाला हो, तुम्हें बचने, ठुकराने, आत्मरक्षा या प्रतिरोध का रवैया नहीं अपनाना चाहिए, या इन हालात को दूर करने के लिए इंसानी तरीकों के प्रयोग का रवैया भी नहीं अपनाना चाहिए। जब तुम्हारा ऐसी स्थितियों से सामना हो, तो तुम्हें और अधिक तत्परता से परमेश्वर के समक्ष आना चाहिए और उससे अपनी अगुआई करने की विनती करनी चाहिए, ताकि आसन्न घटनाओं के सामने तुम अपनी गवाही में दृढ़ रह सको, और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप अभ्यास कर सको, बजाय इसके कि उसे ठुकराओ और उसका प्रतिरोध करो। तुम्हें इस तरह अभ्यास करने को कहने का यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें इन चीजों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए; यह सिखाता है कि जब ऐसी घटनाएँ अनिवार्य रूप से हो जाती हैं तो तुम्हें इनका सामना करने के लिए कैसा रवैया अपनाना चाहिए, और उन्हें दूर करने के लिए कैसा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। तुम्हें यह बात समझनी चाहिए। मुझे बताओ, तुम्हें इन चीजों पर ध्यान न देने को कहा गया है, लेकिन क्या ये चीजें दैनिक जीवन में नहीं होतीं? (जरूर होती हैं।) अगर तुम कहते हो कि ये नहीं होतीं, और फिर वे सचमुच हो जाएँ, तो तुम शायद इस पर विचार कर सोचने लगो, “नहीं नहीं, मुझे यह मानना पड़ेगा, यह सच में सही हो गई!” जब ये चीजें हो जाती हैं और इस बारे में कोई पूर्व तैयारी और सही रवैया नहीं होता, तो तुम हक्का-बक्का हो जाओगे, तुम किसी तरह तैयार नहीं होगे, और नहीं जानोगे कि परमेश्वर से कैसे प्रार्थना करें या स्थिति का सामना कैसे करें, और तुम्हारे भीतर परमेश्वर में सच्ची आस्था या सच्ची आज्ञाकारिता नहीं होगी। अंत में तुम बस डर महसूस करोगे। तुम जितना ज्यादा डरोगे, उतना ही परमेश्वर की मौजूदगी खो दोगे; परमेश्वर की मौजूदगी खो देने पर तुम सिर्फ दूसरे लोगों से मदद माँग सकोगे, और तुम बचने के तमाम इंसानी तरीकों के बारे में सोचोगे। जब तुम बच कर नहीं निकल सकोगे, तो यह मानने लगोगे कि परमेश्वर अब भरोसेमंद या विश्वसनीय नहीं रहा; इसके बजाय तुम्हें लगेगा कि लोग भरोसेमंद हैं। चीजें बदतर होती जाएँगी; न सिर्फ तुम अब इसे अंधविश्वास नहीं मानोगे, बल्कि इसे एक भयंकर चीज के रूप में देखोगे, ऐसी स्थिति जो तुम्हारे नियंत्रण में नहीं है। तब शायद तुम कहो, “कोई ताज्जुब नहीं कि अविश्वासी और बौद्ध धर्म में विश्वास रखने और बुद्ध की आराधना करने के लिए अगरबत्ती जलाने वाले लोग निरंतर मंदिर जाते हैं, अगरबत्ती जलाते हैं, आशीषों के लिए प्रार्थना करते हैं, मन्नतें पूरी करते हैं, शाकाहारी हो जाते हैं और बौद्ध धर्मग्रंथों का जाप करते हैं। अब पता चला कि ये चीजें सचमुच काम करती हैं!” न सिर्फ तुममें परमेश्वर में सच्ची आस्था और आज्ञाकारिता का अभाव हो जाएगा, बल्कि इसके बजाय तुम्हारे भीतर दुष्ट आत्माओं और शैतान का डर पैदा हो जाएगा। इसके बाद, तुम कुछ हद तक उनकी आज्ञा मानने को बाध्य हो जाओगे, और कहोगे, “इन दुष्ट आत्माओं से भिड़ना नहीं चाहिए; उनमें विश्वास न करना तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है, तुम्हें उनके आसपास सावधानी से रहना चाहिए। तुम उनकी पीठ पीछे जो चाहो नहीं बोल सकते : कुछ प्रतिबंध होते हैं। इन दुष्ट आत्माओं को छेड़ना नहीं चाहिए!” तुम्हें एकाएक एहसास होगा कि इन घटनाओं के पीछे, भौतिक संसार से परे कुछ शक्तियाँ हैं जिनके होने की तुम्हें उम्मीद नहीं थी। जब तुम्हें इन चीजों का आभास होने लगता है, तो तुम्हारे दिल में भय और परमेश्वर से बचाव की भावना घर कर जाएगी और परमेश्वर में तुम्हारी आस्था घट जाएगी। तो दाँतों या बालों के गिरने के बारे में सपना देखने की बात पर तुम्हें सही रवैया अपनाना चाहिए। तुम्हारे साथ इन घटनाओं के हो जाने पर, इनसे जुड़ी विशेष व्याख्याएँ या भविष्यवाणियाँ चाहे जो हों, तुम्हें बस इतना ही करना है : विश्वास कर लो कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है, और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन करने को तैयार हो जाओ—इन तमाम चीजों का सामना होने पर तुम्हें यही रवैया अपनाना चाहिए। परमेश्वर का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के रूप में तुम्हें यह दृष्टिकोण अपना कर यह गवाही देनी चाहिए, है कि नहीं? (हाँ, बिल्कुल) यकीन करो कि ये तमाम चीजें हो सकती हैं, और सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है; तुम्हें यही रवैया बनाए रखाना चाहिए।

कुछ लोगों के लिए कुछ संख्याएँ या खास दिन निषिद्ध होते हैं। मिसाल के तौर पर, अनेक वर्षों से व्यापार में लगे हुए कुछ लोग धन-दौलत कमाने को खासी अहमियत देते हैं, इसलिए वे व्यापार में दौलत कमाने से जुड़ी संख्याओं को पसंद करते और उन्हें मूल्य देते हैं और ऐसी संख्याओं से दूर रहते हैं जो उनकी मान्यता के अनुसार उनके व्यापार में बदकिस्मती लाएँगी। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति खास तौर से संख्या 6 और 8 को तरजीह देता है, उसकी दुकान की संख्या होगी 168, और दुकान का नाम होगा “यी लू फा,” यानी बेहद अमीर होना, मैंडेरिन में जिसका उच्चारण, संख्या 1, 6 और 8,[ख] के समान होता है, जो कि चीनी लोककथाओं में भाग्यशाली संख्याएँ हैं। दूसरी ओर, संख्या 4 और 5 चीनी परंपरा में बुरे माने जाते हैं, क्योंकि 4 का अर्थ मृत्यु होता है और 5 का अर्थ होता है शून्य, अभाव, या खालीपन, जिसका निहितार्थ है कि व्यक्ति शायद अपना मूल निवेश भी वापस न पा सके, या पैसा न कमा सके। कुछ चीनी लोगों की कारों की नंबर प्लेटों पर भी सारी संख्याएँ 6 ही होती हैं। और अगर तुम संख्या 6 की कतार देखो, तो मूल रूप से यह चीनी व्यक्ति की ही होगी। कौन जाने उसने इतनी 6 संख्याओं का प्रयोग कर कितनी दौलत जमा कर रखी है? एक बार एक पार्किंग स्थल में पार्किंग की लगभग सारी जगहें भरी हुई थीं, सिर्फ एक को छोड़ कर जिसका नंबर था 64। क्या तुम जानते हो कि उस स्थान में किसी ने अपनी गाड़ी क्यों नहीं लगाई? (64 का अर्थ मृत्यु हो सकता है और इसे दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है।) 64 का अर्थ सड़क पर मौत है। तब मैं नहीं जानता था कि किसी ने उस जगह अपनी गाड़ी क्यों नहीं लगाई, लेकिन बाद में मैंने यह बात अविश्वासियों से सुनी और तब समझा। मैंडेरिन में 6 सुनने में “सड़क” जैसा लगता है, 4 “मृत्यु” जैसा और 64 “सड़क पर मृत्यु” जैसा, इसलिए लोगों ने वहाँ गाड़ी नहीं लगाई। मेरा अनुमान है कि शायद बाद में उन्होंने उस पार्किंग स्थान का नंबर बदल कर 68 कर दिया, जो मैंडेरिन में सुनने में “बहुत अमीर होने” जैसा लगता है। लोग पैसे से इतने ज्यादा आसक्त हैं कि वे पूरी तरह पैसे से ग्रस्त हो चुके हैं। क्या कोई संख्या कुछ भी बदल सकती है? इन संख्याओं के बारे में चीनी लोगों की कहावतों ने विदेशियों को भी प्रभावित कर दिया है। जब हम घर देख रहे थे, तो एक रियल एस्टेट एजेंट ने हमसे पूछा, “क्या कुछ खास संख्याएँ आपके लिए निषिद्ध हैं? मिसाल के तौर पर, अगर घर का नंबर 14 हो, तो क्या यह 4 के कारण खराब है?” मैंने कहा, “मैंने इस बारे में कभी सोचा नहीं है। मुझे इस कहावत का पता नहीं।” उसने कहा, “बहुत-से चीनी लोग घर के नंबर में संख्या 4 होने की वजह से उस पर विचार नहीं करते।” मैंने कहा, “हमारे लिए कोई भी संख्या निषिद्ध नहीं है। हम सिर्फ घर की दिशा, स्थान, रोशनी, हवादार होने, घर की संरचना, गुणवत्ता, और ऐसी ही दूसरी चीजों पर विचार करते हैं। हम संख्याओं की परवाह नहीं करते; हमारे लिए कुछ भी निषिद्ध नहीं है।” तो क्या तुम सोचते हो कि अगर अविश्वासियों के मन में कुछ विशेष संख्याओं को लेकर प्रतिबंध हो, तो जरूर कुछ बुरा होगा? (जरूरी नहीं।) हमें दक्षिण कोरिया, जापान, फिलिप्पीन्स जैसे चीन से बाहर के दूसरे देशों या कुछ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बारे में नहीं मालूम कि संख्याओं को लेकर उनकी खास सोच क्या हो सकती है। संक्षेप में कहें, तो हर देश के लोग कुछ संख्याओं को लेकर खास सोच रखते हैं। मिसाल के तौर पर, अमेरिकी लोग संख्या 6 में बिल्कुल भी रुचि नहीं रखते। पश्चिमी लोग एक खास धार्मिक संस्कृति के कारण 6 को पसंद नहीं करते, क्योंकि बाइबल की प्रकाशितवाक्य पुस्तक में जिक्र की गई संख्या 6 का अर्थ नकारात्मक है। एक संख्या 13 भी है, जिसे पश्चिमी लोग पसंद नहीं करते। बहुत-सी लिफ्टों में मंजिल की वह संख्या नहीं होती, क्योंकि वे उस संख्या को दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। दूसरी ओर, चीनी लोग मानते हैं कि 6 और 8 भाग्यशाली संख्याएँ हैं। तो फिर कौन-सी कहावत सत्य है? (कोई भी नहीं।) क्या तुम लोग कुछ विशेष संख्याओं की परवाह करते हो? क्या तुम्हारी अपनी कोई भाग्यशाली संख्या है? (नहीं, हम परवाह नहीं करते।) चलो, अच्छी बात है। दक्षिण चीनी लोग ऐसी चीजों पर खास ध्यान देते हैं जैसे संख्या भाग्यशाली है या नहीं, वे अपने किसी भी काम के लिए सही तारीख चुनते हैं, और त्योहारों के दौरान भोजन की पाबंदियों का पालन करते हैं—वे इस बात पर खास ध्यान देते हैं। लेकिन संख्याओं की बात यकीनन सभी चीजों को स्पष्ट नहीं कर सकती। कुछ संख्याओं से लोगों का दूर रहना कुछ हद तक उनके विश्वास, कल्पनाओं, विचारों और धारणाओं से जुड़ा होता है। ये सभी मूर्खतापूर्ण विचार और नजरिये हैं। अगर तम्हारे परिवार ने तुम्हारे भीतर ऐसे विचार और नजरिये पिरोये हैं, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, और उन पर यकीन नहीं करना चाहिए। ये विचार और भी ज्यादा बेतुके हैं—वे अंधविश्वास भी नहीं हैं—ये समाज के धनलोलुप लोगों की हास्यास्पद और वाहियात कहावतें हैं।

कुछ लोग राशि चिह्नों को बड़ी अहमियत देते हैं, और इस मामले से अंधविश्वास जुड़ा हुआ है। आजकल, पश्चिमी लोग भी राशि चिह्नों की बात करते हैं, तो यह मत सोचो कि सिर्फ एशियाई लोग ही इनके बारे में जानते हैं। पश्चिमी लोग भी खरगोश, बैल, चूहे और घोड़े के बारे में जानते हैं। इसके अलावा और क्या? सांप, ड्रैगन, मुर्गा, और भेड़, सही है न? मिसाल के तौर पर, पूर्वज और माता-पिता अगली पीढ़ियों तक यह विश्वास पहुँचा देते हैं कि मेष राशि चिह्न वाले लोगों का जीवन अंधकारमय होता है। अगर तुम मेष राशि के हो, तो सोच सकते हो, “मेरा जीवन अंधकारमय है, मेरा पाला हमेशा दुर्भाग्य से पड़ता है। मेरी जीवनसाथी बुरी है, मेरे बच्चे आज्ञाकारी नहीं हैं और मेरी नौकरी ठीक नहीं चल रही है। मुझे कभी तरक्की नहीं मिलती, कभी कोई बोनस नहीं मिलता। मैं हमेशा अभागा रहता हूँ। अगर मेरा एक और बच्चा हुआ तो वह मेष वर्ष में नहीं होगा। परिवार में पहले से एक सदस्य है जिसकी राशि मेष है, और जिसका जीवन बहुत अंधकारमय है; अगर मैंने मेष राशि वाले एक और को जन्म दिया, तो हम दो लोग हो जाएँगे। हम इस तरह कैसे जी सकेंगे?” तुम यह सोच कर इस मामले पर विचार करते हो, “निश्चित रूप से मैं मेष वर्ष में बच्चा नहीं कर सकता, तो मुझे किस राशि वर्ष का लक्ष्य करना चाहिए? ड्रैगन? साँप? बाघ?” अगर तुम ड्रैगन के वर्ष में पैदा हुए होते, तो क्या इसका अर्थ होता कि तुम वास्तव में ड्रैगन हो? क्या तुम सचमुच सम्राट बन सकते हो? क्या यह बकवास नहीं है? क्या तुम लोगों को ये राशि चिह्न चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, “खरगोश के राशि वर्ष और मुर्गे के राशि वर्ष में जन्मे लोगों की आपस में नहीं बनती। मैं खरगोश हूँ, तो मुझे ऐसे किसी से बातचीत नहीं करनी चाहिए जो मुर्गा हो। हमारे राशि चिह्न बेमेल हैं, और हमारी नियति में टकराव है। मेरे माता-पिता कहते हैं कि हम जैसे लोग एक-दूसरे से शादी के अनुकूल नहीं हैं और हमारी आपस में नहीं बनेगी। उनसे बहुत कम संपर्क रखना, बात न करना और मेलजोल न रखना ही बढ़िया है। हमारी नियति में टकराव है, अगर हम साथ होंगे तो मैं इनसे हार जाऊँगा और मेरा जीवन छोटा हो जाएगा, है कि नहीं? मुझे ऐसे लोगों से दूर रहने की जरूरत है।” ये लोग इन कहावतों से प्रभावित हो जाते हैं। क्या यह बेवकूफी नहीं है? (हाँ, जरूर है।) संक्षेप में कहें, तो किसी खास राशि चिह्न के किसी व्यक्ति से तुम्हारी नियति का टकराव हो या न हो, क्या यह तुम्हारे भाग्य पर सचमुच असर डालेगा? क्या यह जीवन में तुम्हारे सही पथ पर चलने को प्रभावित करेगा? (नहीं, यह नहीं करेगा।) कुछ लोग सिर्फ ऐसे ही व्यक्ति के साथ काम करने, सहभागी बनने या साथ जीने को तैयार होते हैं जो उनके राशि चिह्न के अनुकूल हों। अवचेतन मन से, वे भीतर गहराई से इन कहावतों से प्रभावित रहते हैं, और उनके पूर्वजों या माता-पिता द्वारा आगे बढ़ाई गई ये कहावतें उनके दिलों में एक निश्चित स्थान रखती हैं। देखो, पूर्वी लोग राशि चिह्नों की परवाह करते हैं, जबकि पश्चिमी लोग ज्योतिष चिह्नों की परवाह करते हैं। अब, जमाने के साथ चल रहे पूर्वी लोग भी ज्योतिष चिह्नों की बात करने लगे हैं, जैसे कि वृश्चिक, कन्या, धनुष, वगैरह-वगैरह। मिसाल के तौर पर, धनुष राशि के व्यक्ति को पता चलता है कि उसका व्यक्तित्व किस प्रकार का है, और वह किसी खास ज्योतिष चिह्न के लोगों से ही मेल-जोल रख सकता है। जब उसे पता चलता है कि किन्हीं का ज्योतिष चिह्न वही खास चिह्न है, तो वह उनसे बातचीत करने को तैयार हो जाता है, उसे लगता है कि वे बहुत अच्छे हैं और उसके मन में उनकी अच्छी छवि होती है। वह परिवार द्वारा दी गई शिक्षा की परंपराओं से भी प्रभावित है। चाहे वे पूर्वी राशि चिह्न हों या पश्चिमी ज्योतिष चिह्न, नियति में टकराव या चिह्नों के मेल का तथ्यात्मक अस्तित्व हो या न हो, और चाहे इनका तुम पर असर हो या न हो, तुम्हें समझना चाहिए कि उनको लेकर तुम्हारा नजरिया क्या हो। तुम्हें क्या समझना चाहिए? किसी व्यक्ति के जन्म का समय, उसका जन्म दशक, उसका जन्म माह और समय—ये सब उसकी नियति से संबद्ध होते हैं। भविष्यवक्ता या चेहरा पढ़ने वाले तुम्हारी नियति के बारे में चाहे जो कहें, तुम्हारा ज्योतिष चिह्न या राशि चिह्न अच्छा हो या न हो, वे चाहे जितने भी सही हों, क्या फर्क पड़ता है? इससे क्या स्पष्ट होता है? क्या यह और ज्यादा साबित नहीं करता कि तुम्हारी नियति परमेश्वर ने पहले ही व्यवस्थित कर दी है? (हाँ।) तुम्हारी शादी कैसे निभेगी, तुम कहाँ रहोगे, तुम्हारे आसपास कैसे लोग होंगे, अपने जीवन में तुम कितनी भौतिक दौलत का मजा लोगे, तुम अमीर होगे या गरीब, तुम कितने कष्ट सहोगे, तुम्हारे कितने बच्चे होंगे, तुम्हारी आर्थिक हालत कैसी होगी—ये सब पहले ही निर्धारित कर दिए गए हैं। तुम इस पर विश्वास करो या न करो, भविष्यवक्ता तुम्हारे लिए इसका हिसाब करें या न करें, यह नहीं बदलेगा। क्या ये चीजें जानना जरूरी है? कुछ लोग यह जानने को खासे उत्सुक होते हैं, “भविष्य में मेरी समृद्धि कैसी होगी? मैं गरीब रहूँगा या अमीर? क्या मैं ऐसे लोगों से मिलूँगा जिनसे मेरा फायदा हो? क्या ऐसे कुछ लोग हैं जिनकी नियति का मेरी नियति से टकराव होगा? क्या अपने जीवन में मेरा सामना कुछ विपरीत लोगों से होगा? किस उम्र में मेरी मृत्यु होगी? क्या मैं बीमारी, थकान, प्यास या भूख से मर जाऊँगा? मेरी मृत्यु किस प्रकार होगी? यह दर्दनाक होगी या शर्मिंदा करने वाली?” क्या ये चीजें जानना उपयोगी है? (नहीं।) सारांश में, इस मामले को लेकर तुम्हारे मन में बस एक चीज पक्की होनी चाहिए : सब-कुछ परमेश्वर द्वारा निर्धारित होता है। तुम्हारा राशि चिह्न या ज्योतिष चिह्न चाहे जो हो, तुम्हारे जन्म का समय और तिथि चाहे जो हो, सब-कुछ परमेश्वर द्वारा पहले ही निर्धारित है। चूँकि सब-कुछ निर्धारित है, ठीक इसीलिए अपने जीवन में जिस समृद्धि और धन-दौलत का अनुभव तुम करोगे, और साथ ही वह माहौल जिसमें तुम जियोगे, इन सबका निर्धारण परमेश्वर ने तुम्हारे पैदा होने से पहले ही कर दिया था, तुम्हें इन मामलों को अंधविश्वास या सांसारिक लोगों के नजरिये से नहीं देखना चाहिए, और दुर्भाग्यपूर्ण पलों से बचने या भाग्यशाली पलों को संरक्षित करने या बनाए रखने के ऐसे तरीके नहीं अपनाने चाहिए। तुम्हें नियति से इस तरह नहीं निपटना चाहिए। मिसाल के तौर पर, अगर तुम्हारा एक खास उम्र में किसी गंभीर रोग से ग्रस्त होना नियत है, और तुम्हारे ज्योतिष चिह्न, राशि चिह्न या जन्म के समय के आधार पर चेहरा पढ़ने वाले इस ओर तुम्हारा ध्यान खींचें, तब तुम क्या करोगे? क्या तुम भयभीत हो जाओगे, या मामले को सुलझाने का तरीका ढूँढ़ने की कोशिश करोगे? (प्रकृति को अपना काम करने दूँगा और परमेश्वर के आयोजन को समर्पित हो जाऊँगा।) लोगों को यही रवैया अपनाना चाहिए। तुम्हारी नियति में जो लिखा है या जो नहीं लिखा, यह सब परमेश्वर ने पूर्व-निर्धारित कर दिया है। तुम इसे पसंद करो या न करो, तुम इसे स्वीकार करने को तैयार हो या न हो, तुममें इसका सामना करने की क्षमता हो या न हो, किसी भी स्थिति में, सब-कुछ परमेश्वर द्वारा पहले ही निर्धारित है। तुम्हें जो रवैया अपनाए रखना चाहिए वह एक सृजित प्राणी के रूप में इन तथ्यों को स्वीकार करने का है। यह हुआ हो या न हुआ हो, तुम इसका सामना करने को तैयार हो या न हो, तुम्हें एक सृजित प्राणी के रूप में इसे स्वीकार कर इसका सामना करना चाहिए, बजाय इसके कि ज्योतिषशास्त्र, राशि चिह्नों, चेहरा पढ़ने से जुड़ी चीजों पर दूसरों से परामर्श लेने का प्रयास करो, या विविध संसाधनों की तलाश करने की कोशिश करो ताकि जान सको कि तुम्हारे भविष्य में क्या होगा और जितनी जल्दी हो सके उससे बच सको। परमेश्वर द्वारा तुम्हारे लिए व्यवस्थित भाग्य और जीवन के साथ ऐसे रवैये से पेश आना गलत है। कुछ लोगों के माता-पिता उनके लिए भविष्यवक्ता तलाशते हैं, जो उन्हें बताता है, “तुम्हारे ज्योतिष चिह्न, और साथ ही चीनी राशि चिह्न और जन्म के समय के अनुसार तुम अपने जीवन में अग्नि को नहीं आने दे सकते।” यह सुनने के बाद वे इसे याद रखते हैं और इस पर यकीन करते हैं, और बाद में यह उनके दैनिक जीवन का एक सामान्य प्रतिबंध बन जाता है। मिसाल के तौर पर, अगर किसी के नाम में अग्नि का लक्षण है, तो वे उस व्यक्ति से बातचीत नहीं करेंगे, और करेंगे भी तो उसके करीब नहीं होंगे या उससे निकट का संबंध नहीं रखेंगे। वे इससे डरेंगे और दूर रहेंगे। मिसाल के तौर पर, अगर किसी का नाम ली कैन है, तो वे मन में सोचेंगे, “‘कैन’ शब्द में एक मूल ‘अग्नि’ और एक ‘पर्वत’ है : यह बुरा है, और इसमें मूल ‘अग्नि’ है, तो मैं उससे बातचीत नहीं कर सकता—मुझे उससे दूर रहना चाहिए।” वे इस व्यक्ति से बातचीत करने से डरेंगे। जितना हो सके वे घर में रसोई चूल्हे से दूर रहेंगे, वे ऐसे भोज में नहीं जाएँगे जहाँ मोमबत्तियों की सजावट हो, वे ऐसी पार्टियों में शामिल नहीं होंगे जहाँ अलाव जले, या फायरप्लेस वाले घरों में नहीं जाएँगे, क्योंकि सभी से आग जुड़ी है। अगर वे किसी सैर-सपाटे पर जाना चाहते हैं और उन्हें पता चलता है कि किसी एक जगह ज्वालामुखी है, तो वे वहाँ नहीं जाएँगे। जब वे सुसमाचार फैलाने कहीं जाते हैं, तो वे उस व्यक्ति का उपनाम और नाम के बारे में पूछताछ करते हैं जिसे उन्हें सुसमाचार साझा करना है, और यह पक्का करते हैं कि उसके नाम में “अग्नि” का लक्षण नहीं है, लेकिन अगर वह व्यक्ति लोहार हो और घर में लोहा पिघलाकर बर्तन बनाता हो, तो वे उसके यहाँ बिल्कुल नहीं जाते। हालाँकि वे अपनी चेतना में विश्वास करते हैं कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथ में है और जानते हैं कि उन्हें नहीं डरना चाहिए, फिर भी किन्हीं निषिद्ध चीजों से सामना होने पर वे चिंतित और भयभीत होने लगते हैं, और वह प्रतिबंध तोड़ने की हिम्मत नहीं करते। वे हमेशा दुर्घटनाएँ और विपत्तियाँ होने से डरते हैं, जिन्हें वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। वे परमेश्वर में सच्ची आस्था नहीं रखते। वे आज्ञाकारी हो सकते हैं, कष्ट सह सकते हैं, और दूसरे पहलुओं में कीमत चुका सकते हैं, लेकिन यह एक ऐसा मामला है जिसे वे बर्दाश्त नहीं कर सकते। मिसाल के तौर पर, अगर कोई उन्हें बता दे, “तुम्हें अपने पूरे जीवन में कभी कोई पुल पार नहीं करना चाहिए। अगर तुमने पुल पार किया, तो दुर्घटना हो जाएगी। अगर तुम कई पुल पार करोगे तो वह और ज्यादा खतरनाक होगा और तुम्हारी जान जोखिम में पड़ जाएगी,” तो वे ये बातें याद रखेंगे, और बाद में, काम पर जाते समय, दोस्तों से मिलते समय या सभाओं में शामिल होते समय, प्रतिबंध तोड़ने के डर से वे पुलों से न जाकर लंबा रास्ता पकड़ेंगे। वे नहीं मानते कि उनकी मृत्यु जरूर इसी तरह होगी, मगर यह बात उन्हें परेशान करती रहती है। कभी-कभी, उनके पास पुल पार करने के सिवाय कोई चारा नहीं होता, और पार करने के बाद वे कहते हैं, “मैं मानता हूँ कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है। अगर परमेश्वर मुझे मरने न दे, तो मैं नहीं मरूंगा।” लेकिन, यह कहावत उनके मन को अभी भी परेशान करती रहती है और वे इसे झटक नहीं पाते। कुछ लोग कहते हैं कि पानी उनके भाग्य के विपरीत बहता है, तो वे जलधाराओं या कुँओं के पास नहीं जाते। एक बहन के घर के अहाते में एक स्विमिंग पूल था, इसलिए सभाओं के लिए वे उसके घर नहीं जाते थे, और जब उन लोगों ने यह सभा एक दूसरे मेजबान के घर रख दी जिसके यहाँ मछली की टंकी थी, तो वे वहाँ भी नहीं गए। वे पानी वाली किसी भी जगह नहीं जाते थे, पानी थमा हुआ हो या बह रहा हो, उसे नहीं छूते थे। दैनिक जीवन में, परिवार द्वारा दी गई इन बेतुकी कहावतों की शिक्षा में पारंपरिक संस्कृति और अंधविश्वास शामिल होते हैं। कुछ हद तक, ये कहावतें कुछ खास मामलों पर लोगों के नजरियों को प्रभावित करती हैं, और उनके दैनिक रीति-रिवाजों या जीवनशैली पर असर डालती हैं। यह प्रभाव कुछ हद तक लोगों के विचारों को बाँध देता है और काम करने के उनके सिद्धांतों और सही तरीकों नियंत्रित करता है।

कुछ लोग कहते हैं, “अगर ये परंपराएँ और अंधविश्वास ईसाई धर्म के बाहर के कुछ खास पारंपरिक विचारों और अंधविश्वासों से जुड़े हुए हैं, तो हमें उनकी आलोचना कर उनका त्याग कर देना चाहिए। लेकिन जब बात रूढ़िवादी धर्मों के कुछ खास विचारों, नजरियों, परंपराओं या अंधविश्वासों की हो, तो क्या लोगों को उनका त्याग नहीं करना चाहिए? क्या उन्हें हमारे दैनिक जीवन में याद करने और बनाए रखने के लिए एक छुट्टी या एक जीवनशैली के तौर पर नहीं देखना चाहिए?” (नहीं, हमें दोनों को त्यागना चाहिए, क्योंकि ये परमेश्वर की ओर से नहीं हैं।) मिसाल के तौर पर, ईसाई धर्म की सबसे बड़ी छुट्टी क्रिसमस है—क्या तुम लोगों को इसके बारे में कुछ भी मालूम है? आजकल, पूर्व के कुछ प्रमुख शहर भी क्रिसमस मनाते हैं, क्रिसमस पार्टियों का आयोजन करते हैं, और क्रिसमस पूर्वसंध्या का उत्सव मनाते हैं। क्रिसमस के अलावा ईस्टर और पासओवर भी हैं, दोनों ही प्रमुख धार्मिक छुट्टियाँ हैं। कुछ छुट्टियों में टर्की और बारबेक्यू खाए जाते हैं, जबकि दूसरी छुट्टियों में लाल-सफेद कैंडी खाई जाती है जो लोगों के लिए पापबलि के रूप में प्रभु यीशु के अनमोल रक्त का प्रतीक है, यह उन्हें पवित्र बना देता है। लाल रंग प्रभु यीशु का अनमोल रक्त दर्शाता है और सफेद रंग पवित्रता, और लोग ऐसी कैंडी खाते हैं। ईस्टर के दौरान ईस्टर अंडे खाने की भी परंपरा है। ये सभी छुट्टियाँ ईसाई धर्म से संबंधित हैं। कुछ विशेष ईसाई आदर्श प्रतीक भी हैं, जैसे कि मरियम, यीशु और क्रूस के चित्र। ये चीजें ईसाई धर्म से विकसित हुई हैं, और मेरी राय में ये भी एक प्रकार की परंपरा हैं। इन परंपराओं के पीछे जरूर कुछ अंधविश्वास होंगे। इन अंधविश्वासी कहावतों की विषयवस्तु चाहे जो हो, संक्षेप में कहें तो अगर वे सत्य, लोगों के चलने के पथ, या सृजित प्राणियों से परमेश्वर की अपेक्षाओं से जुड़ी हुई न हों, तो तुम्हें अभी जिस चीज में प्रवेश करना चाहिए उससे उनका कोई लेना-देना नहीं है, और तुम लोगों को उन्हें जाने देना चाहिए। उन्हें पवित्र और अलंघनीय नहीं मानना चाहिए, बेशक उनसे घृणा करना भी जरूरी नहीं है—बस उनसे सही ढंग से पेश आओ। क्या इन छुट्टियों का हमसे कोई लेना-देना है? (नहीं।) इनका हमसे कोई लेना-देना नहीं है। एक विदेशी ने एक बार मुझसे पूछा, “क्या आप लोग क्रिसमस मनाते हैं?” मैंने कहा, “नहीं।” “तो क्या आप लोग चीनी नव वर्ष, वसंत उत्सव मनाते हैं?” मैंने कहा, “नहीं।” “तो फिर आप लोग कौन-सी छुट्टियाँ मनाते हैं?” मैंने कहा, “हमारे यहाँ छुट्टियाँ नहीं होतीं। हमारे लिए हर दिन एक समान होता है। हम छुट्टियों की वजह से नहीं, बल्कि किसी भी दिन जो भी मन करे खा लेते हैं। मेरी कोई परंपरा नहीं है।” उसने पूछा, “क्यों?” मैंने कहा, “कोई कारण नहीं है। ऐसी जीवन शैली बहुत स्वतंत्र है, कोई बंदिशें नहीं। हम बिना किसी औपचारिकता के रहते हैं, सिर्फ नियमों का पालन करते हैं, परमेश्वर द्वारा दिए गए समय और माप के अनुसार स्वाभाविक और स्वतंत्र रूप से, बिना किसी औपचारिकता के, खाते-पीते, आराम करते, काम करते और चलते-फिरते हैं।” बेशक, एक विशेष धार्मिक वस्तु, क्रूस, के बारे में कुछ लोग मानते हैं कि यह पवित्र है। क्या क्रूस पवित्र है? क्या इसे पवित्र कहा जा सकता है? (नहीं, यह पवित्र नहीं है।) क्या मरियम का चित्र पवित्र है? (नहीं, यह पवित्र नहीं है।) क्या यीशु का चित्र पवित्र है? तुम लोग यह कहने की हिम्मत नहीं करते। यीशु का चित्र पवित्र क्यों नहीं है? क्योंकि इंसानों ने इसका चित्रांकन किया, यह परमेश्वर का सच्चा रूप नहीं है और इसका परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। यह महज एक चित्र है। मरियम के चित्र की तो बात ही क्या। कोई नहीं जानता यीशु कैसा दिखता है, इसलिए वे आँख बंद कर उसका चित्र बना देते हैं, और जब चित्र पूरा बन जाता है तो वे तुमसे कहते हैं कि इसे अपने सामने रख कर आराधना करो। उसकी आराधना करोगे तो क्या तुम मूर्ख नहीं होगे? तुम्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए। तुम्हें किसी मूर्ति, छायाचित्र या तस्वीर के सामने सिर झुकाने का औपचारिक दिखावा नहीं करना चाहिए; यह किसी वस्तु के सामने सिर झुकाने की बात नहीं है। तुम्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और अपने हृदय में उसका सम्मान करना चाहिए। लोगों को परमेश्वर के वचनों और उसके वास्तविक व्यक्तित्व के समक्ष साष्टांग दंडवत होना चाहिए, न कि क्रूस या मरियम या यीशु की छवियों के समक्ष जो सबकी सब मूर्तियाँ हैं। क्रूस परमेश्वर के कार्य के दूसरे चरण का प्रतीक मात्र है। इसका परमेश्वर के स्वभाव, सार या मनुष्य से उसकी अपेक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है। यह परमेश्वर का सार तो दूर रहा, उसकी छवि भी नहीं दर्शाता। इसलिए, क्रूस पहनना यह नहीं दर्शाता कि तुम परमेश्वर से डरते हो, या तुम्हारे पास एक सुरक्षा ताबीज है। मैंने कभी भी क्रूस का प्रतिनिधित्व नहीं किया। मेरे घर में क्रूस का एक भी प्रतीक नहीं हैं, इनमें से कुछ भी नहीं। तो जब क्रिसमस और ईस्टर न मनाने की बात आती है, तो लोग इन त्योहारों को आसानी से जाने दे सकते हैं, लेकिन अगर इससे क्रूस, मरियम और यीशु के चित्र या बाइबल भी जुड़े हुए हों, और तुम उन्हें कोई क्रूस, मरियम या यीशु का चित्र कहीं फेंक देने को कहोगे, तो वे सोचेंगे, “अरे, यह अत्यधिक निरादर है, बहुत ज्यादा निरादर। परमेश्वर से जल्द माफी माँगो, माफी माँगो...।” लोगों को लगता है कि इसके बुरे नतीजे होंगे। बेशक तुम्हें इन चीजों के साथ जानबूझकर कुछ भी विध्वंसात्मक करने की जरूरत नहीं है, न ही तुम्हारे मन में इनके लिए कोई आदर जरूरी है। ये सिर्फ वस्तुएँ हैं, और इनका परमेश्वर के सार या पहचान से कोई लेना-देना नहीं है। यह ऐसी बात है जो तुम्हें जाननी चाहिए। बेशक, जब इंसानों द्वारा तय की गई क्रिसमस और ईस्टर की छुट्टियों की बात करें, तो इनका परमेश्वर की पहचान या सार, उसके कार्य या लोगों से उसकी अपेक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं है। भले ही तुम एक सौ या दस हजार क्रिसमस मना लो, चाहे जितने भी जन्मों तक क्रिसमस या ईस्टर मना लो, यह सत्य को समझने का स्थान नहीं ले सकता। तुम्हें इनकी सराहना कर यह कहने की जरूरत नहीं है, “मुझे पश्चिम में जाना चाहिए। पश्चिमी देशों में मैं क्रिसमस मना सकता हूँ। क्रिसमस पवित्र है। क्रिसमस परमेश्वर के कार्य को याद करने का दिन है। यह वह दिन भी है जिसे हमें मनाना चाहिए। हमें उस दिन गंभीर रहना चाहिए। ईस्टर वह दिन है जो सभी का ध्यान और ज्यादा आकर्षित करता है। यह देहधारी परमेश्वर के मृतकों में से जी उठने का उत्सव है। हम सभी को साथ मिल-जुल कर आनंद और उल्लास के साथ उत्सव मना कर एक दूसरे को बधाई देनी चाहिए और इस दिन की स्मृति सदा बनाए रखनी चाहिए।” ये सब इंसानी कल्पनाएँ हैं, परमेश्वर को इनकी जरूरत नहीं। अगर परमेश्वर चाहता कि लोग ये दिन मनाएँ, तो वह तुम्हें ठीक-ठीक वर्ष, माह, दिन, घंटा, मिनट और सेकंड बता देता। अगर उसने तुम्हें ठीक वर्ष, माह और दिन नहीं बताया है, तो यह तुम्हारे लिए संकेत है कि परमेश्वर के लिए जरूरी नहीं है कि लोग ये दिन मनाएँ। अगर तुम ये दिन मनाते ही हो, तो तुम परमेश्वर के प्रतिबंधों का उल्लंघन करोगे और उसे यह रास नहीं आएगा। परमेश्वर इसे पसंद नहीं करता, मगर तुम फिर भी इसे मनाने पर जोर देते हो और दावा करते हो कि तुम परमेश्वर की आराधना करते हो। फिर परमेश्वर तुमसे और भी ज्यादा चिढ़ जाता है, और तुम मर जाने लायक हो। क्या तुम समझ रहे हो? (मैं समझता हूँ।) अगर अब तुम ये छुट्टियाँ मनाना चाहते हो, तो परमेश्वर तुम पर ध्यान नहीं देगा, और देर-सवेर, तुम्हें अपने गलत कर्मों के लिए कीमत चुकानी होगी और इसकी जिम्मेदारी उठानी होगी। इसलिए, मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारे लिए यह ज्यादा अहम है कि परमेश्वर के किसी वचन को सचमुच समझो और उसके वचनों का पालन करो, बजाय इसके कि क्रूस के सामने कई-कई बार साष्टांग दंडवत हो जाओ और सिर झुकाओ। तुम यह चाहे जितनी बार करो, बेकार है और इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कर रहे हो, उसके वचनों को स्वीकार रहे हो, या उसके द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार काम कर रहे हो। परमेश्वर इसे याद नहीं रखेगा। तो अगर तुम्हें लगता है कि क्रूस खास तौर पर पवित्र है, तो आज से तुम्हें इस विचार और नजरिये को जाने देना चाहिए, और अपने दिल की गहराइयों से, सँजोए हुए क्रूस को निकाल फेंकना चाहिए। यह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और इसकी आराधना करने का अर्थ यह नहीं है कि तुम निष्ठावान हो। इसे सँजोने, सँभालने या सारा दिन अपने कंधों पर ढो कर चलने का भी यह अर्थ नहीं है कि तुम परमेश्वर की आराधना कर रहे हो। क्रूस परमेश्वर के कार्य के एक चरण में प्रयुक्त एक औजार भर था, और इसका परमेश्वर के सार, स्वभाव या पहचान से कोई संबंध नहीं है। अगर तुम इसे परमेश्वर मानकर इसकी आराधना करने पर जोर देते हो, तो इसी बात से परमेश्वर घृणा करता है। न सिर्फ तुम्हें परमेश्वर याद नहीं रखेगा, बल्कि वह तुमसे घृणा कर तुम्हें ठुकरा देगा। अगर तुम इस पर जोर देकर कहोगे, “मैं तुम्हारी बात नहीं सुनूंगा। क्रूस पवित्र है, और मेरी नजरों में अलंघनीय है। मैं तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं करता, न स्वीकार करता हूँ कि क्रूस महत्वपूर्ण नहीं है और परमेश्वर को नहीं दर्शाता,” तो तुम जैसा चाहो वैसा करके देख सकते हो कि आखिर में तुम्हें इससे क्या मिलेगा। परमेश्वर बहुत पहले ही क्रूस से उतर चुका है। यह परमेश्वर के कार्य के एक चरण में प्रयुक्त बहुत ही मामूली औजार था। यह महज एक वस्तु है और परमेश्वर की नजरों में इसका सँभाल कर रखने जैसा कोई मूल्य नहीं है। बेशक, तुम्हें इसे सँजोने, इससे प्रेम करने या इसे आदर भाव से देखने की जरूरत नहीं है। यह गैर-जरूरी है। बाइबल को भी लोग अपने दिलों में बहुत सँजोकर रखते हैं। हालाँकि अब वे बाइबल नहीं पढ़ते, फिर भी उनके दिलों में इसका एक सुनिश्चित स्थान है। वे अभी भी बाइबल के बारे में अपने परिवार या पूर्वजों से विरासत में मिले विचारों को पूरी तरह जाने नहीं दे सकते। मिसाल के तौर पर, कभी-कभार बाइबल को किनारे रख कर तुम सोच सकते हो, “अरे, मैं क्या कर रहा हूँ? यह बाइबल है। लोगों को इसे सँजो कर रखना चाहिए! बाइबल पवित्र है और इससे यूँ उपेक्षा से पेश नहीं आना चाहिए मानो यह कोई साधारण पुस्तक हो। इस पर इतनी धूल जम गई है और किसी ने इसे साफ करने की भी जहमत नहीं उठाई। पुस्तक के कोने मुड़ गए हैं, किसी ने उन्हें सीधा तक नहीं किया।” लोगों को बाइबल से पेश आने के ऐसे विचार और नजरिये को जाने देना चाहिए जैसे कि वह पवित्र और अलंघनीय हो।

परिवार की इन परंपराओं और अंधविश्वासों जिन पर अभी-अभी हमने चर्चा की है, और साथ ही धर्म से जुड़े तरह-तरह के विचारों, नजरियों और जीवनशैलियों, और वस्तुओं जिनको लेकर लोग अंधविश्वासी हैं, या जिनकी वे सराहना करते हैं या जिन्हें सँजोते हैं, ये सभी लोगों में मन में कुछ खास गलत जीवनशैलियाँ, विचार और नजरिये बैठा देते हैं, और उनके जीवन, आजीविका और जीवित रहने में उन्हें अमूर्त रूप से गुमराह करते हैं। दैनिक जीवन में, इस तरह गुमराह होने से, लोग अनजाने ही सही चीजों, सकारात्मक विचारों और सकारात्मक मामलों को स्वीकारने की कोशिशों में बाधित होंगे, और फिर वे अनजाने ही कुछ मूर्खतापूर्ण, तर्कहीन और बचकानी हरकतें कर बैठेंगे। ठीक इसी वजह से, लोगों के लिए यह जरूरी है कि इन मामलों पर वे सही दृष्टि, सही विचार और सही नजरिये रखें। अगर कोई चीज सत्य से जुड़ी है और उसके अनुरूप है, तो तुम्हें उसे अपने जीवन और जीवित रहने हेतु पालन करने के लिए एक सिद्धांत के रूप में स्वीकार कर, उस पर अमल कर उसके प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। लेकिन अगर यह सत्य से जुड़ी हुई नहीं है, और महज परंपरा या अंधविश्वास है, या महज धर्म से आती है तो तुम्हें इसे जाने देना चाहिए। अंत में, आज जिस विषयवस्तु पर हमने संगति की, वह इस मामले में विशिष्ट है कि इसका संबंध परंपराओं, अंधविश्वासों और धर्म से जुड़ी बातों पर है, चाहे तुम उन्हें मानो या न मानो, तुमने उनका अनुभव किया हो या न किया हो, या तुम उन्हें जितनी भी मान्यता देते हो; संक्षेप में कहें, तो परंपरा और अंधविश्वास में कुछ खास कहावतें हैं जो वस्तुपरक तथ्यों के संदर्भ में मौजूद हैं, और कुछ हद तक मानवजाति के दैनिक जीवन को प्रभावित और बाधित करती हैं। तो तुम सबको इस मामले को किस दृष्टि से देखना चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, “तुम्हें इस पर यकीन करना चाहिए। अगर तुम इसकी बातों का पालन नहीं करते, तो इसके बुरे नतीजे होंगे—तब तुम क्या करोगे?” क्या तुम विश्वासियों और गैर-विश्वासियों के बीच का सबसे बड़ा फर्क जानते हो? (सबसे बड़ा फर्क यह है कि विश्वासी भरोसा करते हैं कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है, जबकि गैर-विश्वासी हमेशा खुद अपना भाग्य बदलने की कोशिश करते हैं।) एक और बात यह है कि विश्वासियों के पास परमेश्वर की मौजूदगी और रक्षा है, इसलिए असल जीवन में होने वाली तरह-तरह की अंधविश्वासी घटनाएँ उन पर असर नहीं करतीं। लेकिन गैर-विश्वासियों के पास परमेश्वर की रक्षा नहीं होती, और वे उसकी रक्षा या संप्रभुता में विश्वास नहीं करते, इसलिए वे अपने दैनिक जीवन में अस्वच्छ दानवों और दुष्ट आत्माओं के नियंत्रण में होते हैं। इसलिए उन्हें अपने हर काम में प्रतिबंधों पर ध्यान देना पड़ता है। ये प्रतिबंध कहाँ से आते हैं? क्या ये परमेश्वर से आते हैं? (नहीं, बिल्कुल नहीं।) उन्हें इन चीजों से दूर रहने की जरूरत क्यों है? उन्हें कैसे पता चलता है कि उन्हें इन चीजों से दूर रहना है? यह इसलिए होता है कि कुछ लोगों ने ये चीजें अनुभव की हैं, उनसे कुछ अनुभव पाकर कुछ सबक सीखे हैं, और फिर उन्हें लोगों के बीच फैलाया है। फिर इन अनुभवों और सबकों का बड़े पैमाने पर प्रसार किया जाता है, जिससे लोगों के बीच एक प्रवृत्ति बन जाती है, और सभी लोग उसी अनुसार जीना और काम करना शुरू कर देते हैं। यह प्रवृत्ति कैसे बनी? अगर तुम दुष्ट आत्माओं और अस्वच्छ दानवों द्वारा तय नियमों का पालन नहीं करते, तो वे तुम्हें परेशान करेंगे, बाधित करेंगे, और तुम्हारे सामान्य जीवन को अस्त-व्यस्त कर देंगे, जिससे तुम इन प्रतिबंधों के होने पर यकीन करने को मजबूर हो जाओगे, और अगर इनका उल्लंघन करोगे तो बुरे नतीजे होंगे। हजारों वर्षों में, लोगों ने अपने दैनिक जीवन में ये अनुभव इकट्ठा किए हैं, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को विरासत में पहुँचाए हैं, और यह जान पाए हैं कि कोई अदृश्य शक्ति है जो पृष्ठभूमि में उन्हें नियंत्रित कर रही है और उन्हें इसकी बात सुननी चाहिए। मिसाल के तौर पर, अगर तुम चीनी नव वर्ष के समय पटाखे नहीं जलाते, तो उस वर्ष तुम्हारा व्यापार आसानी से नहीं चलेगा। एक और उदाहरण यह है कि अगर नव वर्ष के समय तुम अगरबत्ती जलाते हो, तो पूरे वर्ष तुम्हारे लिए सब-कुछ अच्छा होगा। ये अनुभव लोगों को बताते हैं कि उन्हें अंधविश्वासों और लोक संस्कृति से आई इन कहावतों में विश्वास करना चाहिए, और पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इसी तरह जीते हैं। ये घटनाएँ लोगों को क्या बताती हैं? ये लोगों को बताती हैं कि ये बंदिशें और प्रतिबंध, ये सब वे अनुभव हैं जो लोगों ने लंबे समय में अपने जीवन में इकट्ठा किए हैं, और ये वो चीजें हैं जो लोगों को करनी ही चाहिए, क्योंकि कुछ ऐसी अदृश्य शक्तियाँ हैं, जो परदे के पीछे से सब-कुछ नियंत्रित कर रही हैं। अंत में, पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग इन नियमों का पालन करते हैं। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, उन्हें सामाजिक समुदायों में अपेक्षाकृत आसान जीवन जीने के लिए इन अंधविश्वासों और परंपराओं का पालन करना ही पड़ता है। वे शांति, आसानी और उल्लास खोजते हुए जीते हैं। तो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों को इन अंधविश्वासों और परंपराओं का पालन क्यों नहीं करना पड़ता? (क्योंकि उन्हें परमेश्वर की रक्षा प्राप्त है।) उन्हें परमेश्वर की रक्षा प्राप्त है। परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोग उसका अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर इन लोगों को अपनी मौजूदगी में और अपने घर में लाता है। परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान तुम्हें हानि पहुँचाने की हिम्मत नहीं कर सकता। तुम भले ही उसके नियमों का पालन न करो, फिर भी वह तुम्हें छू नहीं सकता। लेकिन जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते और उसका अनुसरण नहीं करते, उन्हें शैतान अपनी मर्जी से चला सकता है। लोगों को चलाने का शैतान का तरीका है तरह-तरह की कहावतें और विचित्र नियम स्थापित करना जिनका तुम्हें पालन करना होता है। अगर तुम उनका पालन नहीं करते, तो वह तुम्हें दंड देगा। मिसाल के तौर पर, अगर बारहवें चंद्र माह के 23वें दिन तुम रसोई के भगवान की आराधना नहीं करते, तो क्या इसके बुरे नतीजे नहीं होंगे? (जरूर होंगे।) बुरे नतीजे होंगे, और अविश्वासी इस रस्म को छोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकते। उस दिन, उन्हें रसोई के भगवान का मुँह बंद करने और उनके बारे में स्वर्ग में शिकायत करने से रोकने के लिए उन्हें तिल की कैंडी भी खानी पड़ती है। ये नियम और अंधविश्वासी कहावतें कैसे चलन में आईं? शैतान ही है जो ऐसी चीजें करता है जो मौखिक परंपरा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाई जाती हैं। मूल में, ये शैतान, और विविध अस्वच्छ दानवों, दुष्ट आत्माओं व दानव अगुआओं से उपजती हैं। वे ये नियम स्थापित कर इन अंधविश्वासी कहावतों और नियमों का इस्तेमाल कर लोगों को नियंत्रित करते हैं और इन्हें मानने पर मजबूर करते हैं। अगर तुम नहीं सुनते, तो वे किसी भीषण वस्तु से तुम पर प्रहार करते हैं—वे तुम्हें दंड देते हैं। कुछ लोग ये अंधविश्वासी कहावतें नहीं मानते, और उनके घर हमेशा अस्त-व्यस्त रहते हैं। जब वे अपना भविष्य जानने के लिए किसी बौद्ध मंदिर जाते हैं, तो उन्हें बताया जाता है, “बाप रे, तुमने अमुक प्रतिबंध का उल्लंघन किया है। तुम्हें अपने घर के नीचे की जमीन तोड़नी होगी, चिमनी को समायोजित करना होगा, अपने घर के पर्दे बदलने होंगे, और अपने घर के चौखट पर तिलिस्मी तावीज लगाना होगा। फिर वे छोटे दानव आसपास फटकने की हिम्मत नहीं करेंगे।” दरअसल एक बड़े दानव ने छोटे दानव को दबा दिया है, इसलिए अब वह तुम्हें परेशान नहीं करेगा। इस तरह जीवन अधिक सुकून-भरा हो जाता है। शुरू में तो इस व्यक्ति ने इस पर यकीन नहीं किया, लेकिन अब इसे देख कर वह कहता है, “अरे, सच में एक छोटा दानव था जो इतनी तकलीफ दे रहा था!” इस पर यकीन करने के सिवाय उसके पास कोई विकल्प नहीं होता। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते और इस दुनिया में गुजारा करने और जीने की कोशिश करते हैं, वे दुष्ट आत्माओं द्वारा पूरी तरह नियंत्रित होते हैं, अपने लिए चुनाव करने के किसी हक और किसी विकल्प से रहित होते हैं—उन्हें विश्वास करना ही पड़ता है। दूसरी ओर, तुममें से जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, अगर तुम इन अंधविश्वासी या पारंपरिक विचारों, नजरियों या धर्म सबंधी चीजों को पकड़े रहते हो, उनके त्योहार मनाते हो, उनकी कहावतों पर यकीन करते हो, उनकी परंपराएँ, जीवनशैलियाँ और जीवन के प्रति रवैये जारी रखते हो, और तुम्हारे जीवन में उल्लास का स्रोत इन कहावतों पर आधारित है, तो तुम एक तरह की मूक भाषा का इस्तेमाल कर परमेश्वर को बता रहे हो, “मैं तुम्हारे आयोजनों में विश्वास नहीं करता, न ही मैं उन्हें स्वीकार करना चाहता हूँ,” और तुम दुष्ट आत्माओं, अस्वच्छ दानवों और शैतान को भी मूक भाषा में बता रहे हो, “आ भी जाओ, मुझे तुम लोगों की कहावतों पर यकीन है, मैं तुम लोगों के साथ सहयोग करना चाहता हूँ।” चूँकि तुम्हारे द्वारा अपनाए गए तरह-तरह के रवैये, और तुम्हारे विचार, नजरिये और अभ्यास सत्य को स्वीकार नहीं करते, बल्कि दुष्ट आत्माओं, अस्वच्छ दानवों और शैतान के विचारों और नजरियों के अनुकूल हैं, और तुम अपने आचरण और कार्य में अपने विचारों और नजरियों को लागू करते हो, इसलिए तुम उनकी सत्ता के अधीन जी रहे हो। चूँकि तुम उनकी सत्ता के अधीन जीने को तैयार हो, कहीं बाहर जाते समय मोमो बनाते हो, घर लौटने पर नूडल खाते हो, और चीनी नव वर्ष के समय चावल केक और मछली खाते हो, तो फिर उन्हीं के साथ चले जाओ। तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखने की जरूरत नहीं है, और तुम्हें यह घोषणा करने की जरूरत नहीं है कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो। तुम जहाँ कहीं जाते हो, जो कुछ भी करते हो, तुम शैतान द्वारा तुम्हारे भीतर पिरोई गई जीवनशैली, विचारों और नजरियों का पालन करते हो, तुम धार्मिक धारणाओं के अनुसार लोगों और चीजों को देखते हो, आचरण और कार्य करते हो, जीते और जीवित रहते हो, और तुम जो करते हो उसका परमेश्वर द्वारा तुम्हें सिखाई गई बातों और सत्य से कोई लेना-देना नहीं होता। तो तुम सचमुच शैतान के अनुयायी हो। जब तुम दिल से शैतान के पीछे चलते हो, तो फिर तुम अभी भी यहाँ क्यों बैठे हो? तुम अब भी धर्मोपदेश क्यों सुन रहे हो? क्या यह धोखेबाजी करना नहीं है? क्या यह परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा नहीं है? चूँकि तुम शैतान द्वारा मन में बैठाई गई परंपराओं, अंधविश्वासों और धार्मिक धारणाओं से इतने आसक्त हो, उनमें उलझे हुए हो, और उनके साथ तुम्हारा रिश्ता अभी भी बना हुआ है, इसलिए तुम्हें अब परमेश्वर में विश्वास नहीं रखना चाहिए। तुम्हें बौद्ध मंदिर में रह कर अगरबत्ती जलानी चाहिए, प्रणाम करना चाहिए, पर्ची निकालनी चाहिए, और पवित्र लेखों का जाप करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के घर में नहीं रहना चाहिए, तुम परमेश्वर के वचन सुनने या परमेश्वर का मार्गदर्शन स्वीकारने के लायक नहीं हो। इसलिए जब तुम घोषित करते हो कि तुम परमेश्वर के अनुयायी हो, तो तुम्हें इन पारिवारिक परंपराओं, अंधविश्वासों और धार्मिक धारणाओं को जाने देना चाहिए। अपनी बुनियादी जीवनशैली भी : अगर वह भी परंपरा और अंधविश्वास से जुड़ी हुई है, तो तुम्हें उसे भी जाने देना चाहिए और उसे पकड़े नहीं रखना चाहिए। परमेश्वर जिस बात से सबसे ज्यादा घृणा करता है वह है इंसानी परंपरा, त्योहार के दिन, रीति-रिवाज, और जीने के कुछ खास तरीके जो लोक संस्कृति और परिवार से लोगों तक पहुँचते हैं, और जिनके पीछे कुछ खास व्याख्याएँ होती हैं। मिसाल के तौर पर, कुछ लोगों को घर बनाते समय यह कह कर अपने घर की चौखट पर एक आईना रखना होता है कि दुष्ट आत्माओं को दूर रखने के लिए इसका प्रयोग होता है। तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, फिर भी दानवों से डरते हो? तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, तो फिर दानव तुम्हें इतनी आसानी से परेशान कैसे कर सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के सच्चे विश्वासी हो? चीनी नव वर्ष के समय, अगर कोई बच्चा कोई दुर्भाग्यपूर्ण बात कह देता है जैसे कि “अगर मैं मर गया,” या अगर “अगर मेरी माँ मर गई,” तो वे फौरन कहते हैं, “नहीं, नहीं, नहीं, एक बच्चे की बातें प्रतिबंध नहीं तोड़ सकतीं, एक बच्चे की बातें प्रतिबंध नहीं तोड़ सकतीं।” वे इस डर से बेहद भयभीत हो जाते हैं कि उनकी बातें सच हो जाएँगी। तुम किस बात से डरते हो? अगर वह सच हो भी गई, तो क्या तुम इस वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर सकते? क्या तुम इसका प्रतिरोध कर सकते हो? क्या तुम्हें परमेश्वर से इसे स्वीकार नहीं करना चाहिए? परमेश्वर के साथ कोई प्रतिबंध नहीं हैं, सिर्फ वही चीजें हैं जो या तो सत्य के अनुरूप हैं या नहीं हैं। परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में, तुम्हें किसी प्रतिबंध का पालन नहीं करना चाहिए, बल्कि इन बातों से परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार निपटना चाहिए।

आज की संगति इन विषयों से जुड़ी हुई है कि परिवार लोगों को परंपरा, अंधविश्वास और धर्म की शिक्षा किस तरह से देता है। हालाँकि हो सकता है इन विषयों के बारे में हम ज्यादा न जानते हों, फिर भी संगति के जरिये तुम्हें इतना बताना काफी है कि तुम्हें कैसा रवैया बनाए रखना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार इनसे कैसे पेश आना चाहिए। कम-से-कम जो अभ्यास तुम्हें बनाए रखना चाहिए वह है इन विषयों से जुड़ी चीजों को जाने देना और उन्हें अपने दिल में न रखना या एक सामान्य जीवनशैली के तौर पर बनाए न रखना। तुम्हें सबसे ज्यादा यह करना चाहिए कि इन्हें जाने दो और इनसे परेशान न हो या बंधे न रहो। तुम्हें अपने जीवन-मरण, भाग्य और विपत्ति को इस आधार पर नहीं परखना चाहिए और बेशक तुम्हें इनके आधार पर अपने भविष्य के पथ को चुनना या उसका सामना कतई नहीं करना चाहिए। अगर बाहर जाने पर तुम्हें कोई काली बिल्ली दिख जाए, और तुम कहो, “कहीं आज का दिन दुर्भाग्यपूर्ण तो नहीं होगा? क्या कुछ दुर्भाग्यपूर्ण घटेगा?” तो यह कैसा दृष्टिकोण है? (यह सही नहीं है।) कोई बिल्ली तुम्हारा क्या बिगाड़ सकती है? भले ही इसको लेकर कुछ अंधविश्वासी कहावतें हों, उनका तुमसे कोई लेना-देना नहीं, इसलिए डरने की कोई जरूरत नहीं है। काली बिल्ली को छोड़ो, काले बाघ से भी मत डरो। सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है, और काली बिल्ली को छोड़ो, तुम्हें शैतान या किसी दुष्ट आत्मा से भी डरने की जरूरत नहीं है। अगर तुम्हारे मन में कोई प्रतिबंध नहीं है, तुम सिर्फ सत्य का अनुसरण करते हो और मानते हो कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है, तो भले ही इसके बारे में कुछ कहावतें हों या यह दुर्भाग्य ले भी आए, तो भी तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है। मिसाल के तौर पर, किसी दिन तुम अपने बिस्तर के पास अचानक किसी उल्लू को हू हू की आवाज करते हुए सुनते हो। चीनी लोककथाओं में कहा गया है, “उल्लू की हू हू से मत डरो, उसकी हँसी से डरो।” यह उल्लू हू हू करने के साथ-साथ हंस भी रहा है, जिससे तुम्हें बेहद डर लग रहा है, और तुम्हारे दिल पर इसका थोड़ा असर पड़ रहा है। लेकिन पल भर के लिए सोचो, “जो होना है वह होकर रहेगा, और जो नहीं होना है उसे परमेश्वर होने नहीं देगा। मैं परमेश्वर के हाथ में हूँ, और उसी तरह सब-कुछ उसके हाथ में है। मैं इससे न तो डरता हूँ न प्रभावित होता हूँ। जैसे जीना चाहिए मैं वैसे ही जियूँगा, सत्य का अनुसरण करूँगा, परमेश्वर के वचनों पर अमल करूँगा और परमेश्वर के सभी आयोजनों को समर्पित हो जाऊँगा। यह कभी नहीं बदल सकता!” जब कोई भी चीज तुम्हें परेशान नहीं कर सकती, तो यह सही है। अगर किसी दिन तुम्हें बुरा सपना आता है कि तुम्हारे दाँत गिर गए हैं, बाल भी गिर गए हैं, तुमसे एक कटोरा टूट गया है, तुम खुद को मरा हुआ देखते हो, और एक ही सपने में तमाम बुरी चीजें हो जाती हैं, जिनमें से एक भी तुम्हारे लिए शुभ शकुन नहीं है—तो तुम्हारी प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या तुम अवसाद-ग्रस्त महसूस करोगे? क्या तुम परेशान हो जाओगे? पहले, तुम एक या दो महीने परेशान रहते, और आखिरकार कुछ न होने पर तुम राहत की साँस लेते। लेकिन अब, तुम थोड़े-से ही परेशान हो, और यह सोचते ही कि सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है, तुम्हारा दिल शांत हो जाता है। तुम एक आज्ञाकारी रवैये के साथ परमेश्वर के समक्ष आते हो, और यह सही है। भले ही इन अपशकुनों से कुछ बुरा हो भी जाए, तो भी उसे ठीक करने का रास्ता है। तुम इसे कैसे सुलझा सकते हो? क्या बुरी चीजें भी परमेश्वर के हाथों में नहीं हैं? परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान और दानव तुम्हारे शरीर का एक बाल भी बांका नहीं कर सकते। खास तौर से जीवन और मृत्यु के मामलों में फैसला उनके हाथ में नहीं है। परमेश्वर की अनुमति के बिना ये बड़ी और छोटी चीजें नहीं होंगी। तो किसी रात सपने में तुम जो भी घटना देखो या तुम्हें अपने शरीर में कुछ भी असामान्य लगे, फिक्र मत करो, बेचैन मत हो, और निश्चित रूप से बचने, ठुकराने या प्रतिरोध करने पर विचार मत करो। वूडू पुतले, प्रेतात्मा आह्वान आयोजन, पर्ची निकालने, भविष्यवाणी या ऑनलाइन जाकर जानकारी ढूँढ़ने जैसे इंसानी तरीकों का इस्तेमाल मत करो। इनमें से किसी की भी जरूरत नहीं है। संभव है तुम्हारा सपना यह संकेत दे रहा हो कि सचमुच कुछ बुरा होने वाला है, जैसे कि दिवालिया हो जाना, शेयर की कीमतों का गिर जाना, तुम्हारा व्यापार किसी और के हाथ चले जाना, किसी सभा में तुम्हारा सरकार द्वारा गिरफ्तार हो जाना, सुसमाचार फैलाते समय तुम्हारी शिकायत, वगैरह-वगैरह। तो क्या हुआ? सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में है; डरो मत। चिंतित मत हो, शोक मत मनाओ, और जो बुरी चीजें न हुई हों उनसे मत डरो, और बेशक बुरी चीजों के होने का प्रतिरोध या विरोध मत करो। वही करो जो किसी सृजित प्राणी को करना चाहिए, एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व निभाओ, और वह स्थान लो और नजरिया रखो जो एक सृजित प्राणी को रखना चाहिए—चीजों का सामना करते वक्त सभी को यही रवैया अपनाना चाहिए; यानी स्वीकार करना और पालन करना, बिना शिकायत किए परमेश्वर के आयोजनों को समर्पित होना। इस तरह किसी भी धार्मिक, पारंपरिक या अंधविश्वासी कहावतों या परिणामों से तुम्हें कोई समस्या नहीं होगी, और ये कोई परेशानी नहीं खड़ी करेंगे; तुम अंधकार के प्रभाव या शैतान के किसी विचार से नियंत्रित हुए बिना, शैतान की सत्ता से और अंधकार के प्रभाव से सचमुच बाहर आ जाओगे। परमेश्वर के वचन तुम्हारे विचार, तुम्हारी आत्मा, तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व को जीत कर प्राप्त कर लेंगे। क्या यह स्वतंत्रता नहीं है? (हाँ।) यह संपूर्ण स्वतंत्रता है, मुक्ति और स्वतंत्रता में जीना, और मानव की सादृश्यता प्राप्त होना है। यह कितनी अच्छी बात है!

आज की संगति की विषयवस्तु मूल रूप से यही है। जहाँ तक दैनिक जीवन की आदतों के कुछ प्रतिबंधों का सवाल है, जैसे कि कोई बीमारी होने पर कौन-सा खाना न खाएँ, और कुछ लोग अपनी भीतर होने वाली अत्यधिक गर्मी के कारण मसालेदार खाना नहीं खा सकते, इनका इससे संबंध नहीं होता कि कोई कैसा आचरण करता है या कैसे विचार और नजरिये रखता है, कोई कौन-से पथ पर चलता है इस बात से तो बिल्कुल जुड़ा नहीं है। ये हमारी संगति के दायरे में नहीं हैं। परिवार द्वारा दी गई शिक्षा को लेकर हमारी संगति की विषयवस्तु का संबंध लोगों के विचारों और नजरियों से है, उनकी सामान्य जीवनशैली और जीने के नियमों और साथ ही उनके विचारों, नजरियों, अवस्थितियों, और विविध चीजों के प्रति उनके दृष्टिकोणों से है। हर मामले में इन गलत विचारों, नजरियों और रवैयों को ठीक करके लोगों को जिस अगली चीज में प्रवेश करना चाहिए वह है चीजों के बारे में सही विचारों, नजरियों, रवैयों और दृष्टिकोणों को खोजना और स्वीकार करना। ठीक है, आज के विषय पर संगति अब पूरी हुई। फिर मिलेंगे!

25 मार्च, 2023

फुटनोट :

क. ताई सुई भगवान का संक्षिप्त रूप है। चीनी ज्योतिष में ताई सुई का अर्थ होता है वर्ष का संरक्षक भगवान। ताई सुई किसी वर्ष विशेष के सभी भाग्यों का संचालन करता है।

ख. मूल आलेख में यह वाक्यांश नहीं है, “यानी बेहद अमीर होना, मैंडेरिन में जिसका उच्चारण, संख्या 1, 6 और 8 के समान होता है।”

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