328 इंसान ने ईश्वर को अपना दिल नहीं दिया है

भले ही ईश्वर को अपने दिल में झाँकने देता हो इंसान,

इसके मायने नहीं कि ईश-व्यवस्था का पालन करता इंसान,

या अपनी नियति, अपना सब-कुछ

किया ईश्वर के हवाले इंसान ने।

ईश्वर के आगे तुम कोई भी शपथ लो,

कुछ भी ऐलान करो,

ईश्वर की नज़र में तुम्हारा दिल अभी भी बंद है उसके लिए,

क्योंकि तुम इस पर काबू करने नहीं देते उसे।

इंसान को ईश्वर में आस्था तो है,

मगर उसका दिल ईश्वर से खाली है।

वो जानता नहीं उसे कैसे प्रेम करें,

उसे प्रेम करना चाहता भी नहीं,

उसका दिल ईश्वर की ओर खिंचता नहीं;

टालने की कोशिश करता उसे।

इसलिए इंसान का दिल बहुत दूर है ईश्वर से।


तुमने दिया नहीं दिल अपना ईश्वर को,

उसे सुनाने के लिए बस चिकनी-चुपड़ी बातें करते हो।

तुम उससे अपने कपट-भरे इरादे छिपाते हो,

अपनी साज़िशों, योजनाओं से,

अपने भविष्य को हाथों में जकड़ते हो,

डरते हो कि ईश्वर दूर ले जाएगा उन्हें।

तभी ईश्वर नहीं देख पाता इंसानी ईश-निष्ठा।

इंसान को ईश्वर में आस्था तो है,

मगर उसका दिल ईश्वर से खाली है।

वो जानता नहीं उसे कैसे प्रेम करें,

उसे प्रेम करना चाहता भी नहीं,

उसका दिल ईश्वर की ओर खिंचता नहीं;

टालने की कोशिश करता उसे।

इसलिए इंसान का दिल बहुत दूर है ईश्वर से।


हालाँकि ईश्वर देखता इंसान के दिल की गहराई को,

देख सकता इंसान की सोच और इच्छा को,

और इंसान के दिल में रखी चीज़ों को,

मगर इंसान का दिल ईश्वर का नहीं।

ईश्वर को हक है नज़र रखने का,

मगर नहीं हक उसे काबू में करने का।

आत्म-परक चेतना में, इंसान नहीं चाहता,

छोड़ना खुद को ईश्वर की दया पर।

इंसान ने खुद को, केवल ईश्वर से विमुख नहीं किया है,

ऐसे भी हैं जो तरीके सोचते हैं

अपने दिलों को ढकने के, झूठी धारणा बनाने के लिए

चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं,

ईश्वर से अपना असली चेहरा छिपाते हैं,

ये मनुष्य का हृदय है जिसे ईश्वर देखता है।

इंसान को ईश्वर में आस्था तो है,

मगर उसका दिल ईश्वर से खाली है।

वो जानता नहीं उसे कैसे प्रेम करें,

उसे प्रेम करना चाहता भी नहीं,

उसका दिल ईश्वर की ओर खिंचता नहीं;

टालने की कोशिश करता उसे।

इसलिए इंसान का दिल बहुत दूर है ईश्वर से।


"वचन देह में प्रकट होता है" से रूपांतरित

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