2. धार्मिक दुनिया के सभी पादरी और एल्डर्स बाइबल में पारंगत हैं और अक्सर इसके बारे में दूसरों के सामने व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि लोग बाइबल का पालन करें। क्या ऐसा करने में वे प्रभु को ऊँचा नहीं उठाते और उसकी गवाही नहीं देते हैं? तुम कैसे कह सकते हो कि वे लोगों को धोखा दे रहे हैं, कि वे पाखंडी फरीसी हैं?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :
प्रत्येक धर्म और संप्रदाय के अगुआओं को देखो—वे सभी अहंकारी और आत्म-तुष्ट हैं, और बाइबल की उनकी व्याख्या में संदर्भ का अभाव है और वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार चलते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और ज्ञान पर भरोसा करते हैं। यदि वे बिल्कुल भी उपदेश न दे पाते तो क्या लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही और वे धर्म-सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों का मन कैसे जीता जाए और कुछ चालों का उपयोग कैसे करें। इन चीजों के माध्यम से वे लोगों को धोखा देते हैं और उन्हें अपने सामने ले आते हैं। नाममात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे इन अगुआओं का अनुसरण करते हैं। जब वे सच्चे मार्ग का प्रचार करने वाले किसी व्यक्ति का सामना करते हैं, तो उनमें से कुछ लोग कहते हैं, “हमें आस्था के मामले में हमारे अगुआ से परामर्श करना है।” देखो, परमेश्वर में विश्वास करने और सच्चा मार्ग स्वीकारने की बात आने पर कैसे लोगों को अभी भी दूसरों की सहमति और मंजूरी की जरूरत होती है—क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुआ क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकारने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
जो भी परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझता है वह ऐसा व्यक्ति है जो उसका प्रतिरोध करता है और जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझ चुका है, फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करता, उसे तो परमेश्वर का प्रतिरोधी और भी अधिक माना जाएगा। ऐसे भी लोग हैं जो बड़े-बड़े गिरजाघरों में बाइबल पढ़ते हैं और दिन-भर इसका पाठ करते हैं, फिर भी उनमें से एक भी परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझता। उनमें से एक भी परमेश्वर को नहीं जान पाता; उनमें से कोई भी एक परमेश्वर के इरादों के अनुरूप तो और भी कम हो सकता है। वे सब बेकार और अधम लोग हैं, हर कोई “परमेश्वर” पर उपदेश झाड़ने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा है। वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का बैनर लेकर चलते हैं, फिर भी परमेश्वर का जानबूझकर प्रतिरोध करते हैं, जो मनुष्य का मांस खाते हुए और रक्त पीते हुए परमेश्वर में विश्वास करने की चिप्पी लेकर चलते हैं। ऐसे सभी लोग बुरे दानव हैं जो मनुष्य की आत्मा को निगलते हैं, दानवों के सरदार हैं जो सही मार्ग पर लोगों के कदम रखने को जानबूझकर बाधित करते हैं और वे ऐसी ठोकरें हैं जो लोगों की परमेश्वर की खोज में रुकावट बनती हैं। वे “मजबूत बनावट” वाले दिख सकते हैं, किंतु उनके अनुयायी भला कैसे जानें कि वे उन मसीह-विरोधियों के सिवाय कोई और नहीं हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए लोगों की अगुआई करते हैं? उनके अनुयायी भला कैसे जानें कि वे जीते-जागते दानव हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने के लिए समर्पित हैं? जो लोग परमेश्वर की उपस्थिति में खुद को उच्च सम्मान बख्शते हैं वे मनुष्यों में सर्वाधिक तुच्छ हैं, जबकि जो खुद को नीच समझते हैं वे सर्वाधिक सम्मानित हैं। और जिन्हें यह लगता है कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं और यही नहीं, जो सीधे तौर पर परमेश्वर को देखते हुए दूसरों के लिए परमेश्वर के कार्य की बड़े ही जोर-शोर से घोषणा करने में सक्षम होते हैं—ये मनुष्यों में सबसे अज्ञानी हैं। ऐसे सभी लोगों के पास परमेश्वर की गवाही नहीं होती, वे सभी अहंकारी और दंभी होते हैं। परमेश्वर का वास्तविक अनुभव और व्यवहारिक ज्ञान होने के बावजूद, जो लोग ये मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर का बहुत थोड़ा-सा ज्ञान है, वे परमेश्वर के सबसे प्रिय लोग होते हैं। ऐसे लोग ही सच में गवाह होते हैं और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं
चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में विश्वास रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसके प्रति समर्पण करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो यह मायने नहीं रखता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसके प्रति समर्पण किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और छद्म-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों के प्रति समर्पण कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही वे लोग होते हैं जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना और उसका विरोध करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के शत्रु और मसीह विरोधी हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, ऐसे व्यक्ति में कभी भी समर्पण का कोई भाव नहीं होता, न ही उसने कभी खुशी से समर्पण किया होता है या दीनता का भाव दिखाया है। वे स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं और कभी किसी के आगे नहीं झुकते। परमेश्वर के सामने, ये लोग वचनों का उपदेश देने में स्वयं को सबसे ज़्यादा निपुण समझते हैं और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझते हैं। इनके कब्ज़े में जो “खज़ाना” होता है, ये लोग उसे कभी नहीं छोड़ते, दूसरों को इसके बारे में उपदेश देने के लिए, अपने परिवार की पूजे जाने योग्य विरासत समझते हैं, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए इनका उपयोग करते हैं जो उनकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में इस तरह के कुछ ऐसे लोग हैं। ये कहा जा सकता है कि वे “अदम्य नायक” हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल-दर-साल और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे अपने “पवित्र और अलंघनीय” कर्तव्य को पूरी प्रबलता से लागू करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाता। वे परमेश्वर के घर में “राजा” बनकर युगों-युगों तक बेकाबू होकर दूसरों पर अत्याचार करते चले आ रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करने और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीती-जागती दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने कैसे अस्तित्व में बने रहने दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा समर्पण करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते, फिर इन आततायियों की तो बात ही क्या है जिनके हृदय में थोड़ा-सा भी समर्पण नहीं है! इंसान परमेश्वर के कार्य को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता। इंसान अपनी सारी ताक़त लगाकर भी थोड़ा-बहुत ही पा सकता है जिससे वो आखिरकार पूर्ण बनाया जा सके। फिर प्रधानदूत की संतानों का क्या, जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगी रहती हैं? क्या परमेश्वर द्वारा उन्हें ग्रहण करने की आशा और भी कम नहीं है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे
तू ज्ञान के उतने अंश बोल पाता है जितने समुद्र-तट पर रेत के कण होते हैं, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम है। जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करवाता है। आध्यात्मिक सिद्धांत में लिप्त मत हो—इसका कोई फायदा नहीं! कुछ लोग आध्यात्मिक सिद्धांत के बारे में दशकों से बात कर रहे हैं, और वे महान आध्यात्मिक हस्तियाँ बन गए हैं, लेकिन अंततः, इतने पर वे भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में विफल हैं। चूँकि उन्होंने परमेश्वर के वचनों का अभ्यास या अनुभव नहीं किया है, इसलिए उनके पास अभ्यास के लिए कोई सिद्धांत या मार्ग नहीं है। ऐसे लोगों के पास स्वयं सत्य वास्तविकता नहीं होती, तो वे अन्य लोगों को परमेश्वर में आस्था के सही रास्ते पर कैसे ला सकते हैं? वे केवल लोगों को गुमराह कर सकते हैं। क्या यह दूसरों को और खुद को नुकसान पहुँचाना नहीं है? कम से कम, तुझे वास्तविक समस्याएँ हल करने में सक्षम होना चाहिए, जो ठीक तेरे सामने हैं। अर्थात्, तुझे परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होना चाहिए। केवल यही परमेश्वर के प्रति समर्पण है। जीवन प्रवेश पा लेने पर ही तू परमेश्वर के लिए काम करने के योग्य होता है, और परमेश्वर के लिए ईमानदारी से खुद को खपाने पर ही तू परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किया जा सकता है। हमेशा बड़े-बड़े वक्तव्य न दिया कर और आडंबरपूर्ण सिद्धांत की बात मत किया कर; यह वास्तविक नहीं है। लोगों से अपनी प्रशंसा करवाने के लिए आध्यात्मिक सिद्धांत बघारना परमेश्वर की गवाही देना नहीं है, बल्कि अपनी शान दिखाना है। यह लोगों के लिए बिलकुल भी लाभदायक नहीं है और उन्हें कुछ सिखाता नहीं, और उन्हें आसानी से आध्यात्मिक सिद्धांत की आराधना करने और सत्य के अभ्यास पर ध्यान केंद्रित न करने के लिए प्रेरित कर सकता है—और क्या यह लोगों को गुमराह करना नहीं है? इसी तरह करते रहना कई खोखले सिद्धांतों और नियमों को जन्म देगा, जो लोगों को विवश करेंगे और फँसाएँगे; यह वाकई शर्मनाक है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो
फरीसियों के पाखंडी होने का कारण, उनके दुष्ट होने का कारण यह है कि वे सत्य से विमुख हैं, लेकिन ज्ञान से प्रेम करते हैं, इसलिए वे केवल शास्त्रों का अध्ययन करते हैं और शास्त्रों में वर्णित ज्ञान का अनुसरण करते हैं, लेकिन सत्य या परमेश्वर के वचनों को कभी स्वीकार नहीं करते। वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय उसकी प्रार्थना नहीं करते, न ही वे सत्य की खोज करते हैं या उस पर संगति करते हैं। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का अध्ययन करते हैं, परमेश्वर ने जो कहा और किया है उसका अध्ययन करते हैं, और ऐसा करके वे परमेश्वर के वचनों को एक सिद्धांत में बदल देते हैं, जो दूसरों को सिखाने के लिए एक धर्म-सिद्धांत बन जाता है, जिसे विद्वत्तापूर्ण अध्ययन कहा जाता है। वे विद्वत्तापूर्ण अध्ययन में क्यों लगे रहते हैं? वे क्या पढ़ रहे हैं? उनकी नजर में यह परमेश्वर के वचन या परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं है, और सत्य तो बिल्कुल भी नहीं है। बल्कि, यह एक प्रकार की विद्वता है, या यह भी कह सकते हैं कि यह धर्मशास्त्रीय ज्ञान है। उनके विचार में, इस ज्ञान का, इस विद्वता का प्रचार-प्रसार करना, परमेश्वर के मार्ग का प्रसार करना है, सुसमाचार का प्रसार करना है—इसे वे उपदेश देना कहते हैं, लेकिन वे जो उपदेश देते हैं वह धर्मशास्त्रीय ज्ञान भर है।
... फरीसियों ने जिन धर्मशास्त्रीय सिद्धांतों को समझा उसे उन्होंने ज्ञान और लोगों के आकलन या निंदा करने का औजार माना, यहाँ तक कि उसका प्रयोग प्रभु यीशु पर भी किया गया। इस तरह प्रभु यीशु की निंदा की गई। वे लोग जिस तरह से किसी व्यक्ति का मूल्यांकन या उससे व्यवहार करते थे, वह व्यक्ति के सार पर कभी निर्भर नहीं करता था, न ही इस बात पर निर्भर करता था कि उस व्यक्ति ने जो उपदेश दिया है वह सत्य है या नहीं, और इससे भी कम इस बात पर निर्भर करता था कि उस व्यक्ति द्वारा कहे गए शब्दों का स्रोत क्या है—जिस तरह से फरीसी किसी व्यक्ति का मूल्यांकन या उसकी निंदा करते थे वह केवल बाइबल के पुराने नियम के उन विनियमों, शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर निर्भर करता था जो उन्होंने सीखे थे। हालाँकि फरीसी अपने दिलों में जानते थे कि प्रभु यीशु ने जो कहा और किया वह पाप या किसी कानून का उल्लंघन नहीं था, फिर भी उन्होंने उसकी निंदा की, क्योंकि उसने जो सत्य व्यक्त किए और जो संकेत दिए और चमत्कार किए, उनके कारण बहुत-से लोग उसके अनुगामी और प्रशंसक बन गए थे। फरीसियों के मन में उसके प्रति घृणा बढ़ती जा रही थी, और यहाँ तक कि वे उसे परिदृश्य से ही हटा देना चाहते थे। उन्होंने यह नहीं जाना कि प्रभु यीशु ही वह मसीहा था जो आने वाला था, न ही उन्होंने यह स्वीकार किया कि उसके वचनों में सत्य था, और यह भी नहीं देखा कि उसका कार्य सत्य का पालन करता था। उन्होंने प्रभु यीशु को राक्षसों के राजकुमार बील्जेबब के माध्यम से राक्षसों को बाहर निकालने वाला और अभिमानपूर्ण बातें करने वाला माना। प्रभु यीशु पर इन पापों को थोपना प्रदर्शित करता है कि फरीसियों के मन में प्रभु के लिए कितनी नफरत थी। इसलिए, उन्होंने इस बात को नकारने के लिए पूरी लगन से काम किया कि प्रभु यीशु को परमेश्वर ने भेजा था, और वह परमेश्वर का पुत्र था, और वह मसीहा था। उनके कहने का मतलब था कि “क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करेगा? यदि परमेश्वर देहधारण करता, तो उसका जन्म किसी बहुत ही संभ्रांत परिवार में होता। और उसे शास्त्रियों तथा फरीसियों से शिक्षा भी स्वीकार करनी होती। ‘देहधारी परमेश्वर’ का नाम ग्रहण करने में सक्षम होने से पहले उसने पवित्र शास्त्रों का व्यवस्थित अध्ययन किया होता, उसे शास्त्रीय ज्ञान की समझ होती, और वह शास्त्रों के सम्पूर्ण ज्ञान से लैस हुआ होता।” लेकिन प्रभु यीशु इस ज्ञान से लैस नहीं था, इसलिए उन्होंने उसकी निंदा करते हुए कहा, “सबसे पहले तो तुम इस प्रकार योग्य नहीं हो, इसलिए तुम परमेश्वर नहीं हो सकते; दूसरे, इस शास्त्रीय ज्ञान के बिना परमेश्वर होना तो दूर, तुम परमेश्वर का कार्य भी नहीं कर सकते; तीसरे, तुम्हें मंदिर के बाहर काम नहीं करना चाहिए—अभी तुम मंदिर में काम नहीं करते, बल्कि हमेशा पापियों के बीच में रहते हो, इसलिए तुम जो काम करते हो वह शास्त्रों के दायरे से परे है, जिसके कारण तुम्हारा परमेश्वर होना और भी कम संभव है।” उनकी निंदा का आधार कहाँ से आया? शास्त्र से, मनुष्य के दिमाग से, और उन्हें प्राप्त धर्मशास्त्रीय शिक्षा से। क्योंकि फरीसी धारणाओं, कल्पनाओं और ज्ञान से भरे हुए थे, और उनका विश्वास था कि वह ज्ञान सही है, सत्य है, वैध आधार है, और परमेश्वर कभी भी इन चीजों का उल्लंघन नहीं कर सकता। क्या उन्होंने सत्य की तलाश की थी? उन्होंने ऐसा नहीं किया था। उन्होंने क्या तलाशा था? एक अलौकिक परमेश्वर जो आध्यात्मिक शरीर के रूप में प्रकट होता था। इसलिए, उन्होंने परमेश्वर के कार्यों के मानदंड निर्धारित किए, उसके कार्य को नकार दिया, और मनुष्य की धारणाओं, कल्पनाओं और ज्ञान के आधार पर परमेश्वर के सही या गलत होने के बारे में निर्णय करने लगे। और इसका अंतिम परिणाम क्या हुआ? उन्होंने न केवल परमेश्वर के कार्य की निंदा की, बल्कि उन्होंने देहधारी परमेश्वर को सूली पर चढ़ा दिया।
—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद सात : वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (भाग तीन)
कई लोग परमेश्वर के वचनों को दिन-रात पढ़ते रहते हैं, यहाँ तक कि उनके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती संपत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं, इतना ही नहीं, वे जगह-जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, और दूसरों को भी परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति करके उनकी सहायता करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना है, उसके वचनों की गवाही देना है; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना है; वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना है, ऐसा करना उसके वचनों को अपने जीवन में लागू करना है, ऐसा करना उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने योग्य बनाएगा। परंतु परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हुए भी वे कभी परमेश्वर के वचनों पर खुद अमल नहीं करते या परमेश्वर के वचनों में जो प्रकाशित किया गया है, उससे अपनी तुलना करने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का उपयोग छल से दूसरों की प्रशंसा और विश्वास प्राप्त करने, अपने दम पर प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन और उसकी चोरी करने के लिए करते हैं। वे परमेश्वर के वचनों के प्रसार से मिले अवसर का दोहन परमेश्वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के लिए करने की व्यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुजर चुके हैं, परंतु ये लोग परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में न केवल परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए, दूसरों को परमेश्वर के वचनों से सहायता और पोषण प्रदान करने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने स्वयं सहायता और पोषण नहीं पाया है, और इन सब चीजों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक भय जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, इसके विपरीत, परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ और अधिक गहरी हो रही हैं; उस पर अविश्वास और अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएँ और अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के वचनों के बारे में अपने सिद्धांतों से आपूर्ति और निर्देशन पाकर वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिल्कुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हों, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया हो और वे बचा लिए गए हों, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया हो, परमेश्वर के इरादे समझ लिए हों, और परमेश्वर को जानने का मार्ग खोज लिया हो, मानो परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में वे अक्सर परमेश्वर से रूबरू होते हों। साथ ही, अक्सर वे “द्रवित” होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में “परमेश्वर” की अगुआई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गंभीर परवाह और उदार मंतव्य समझते प्रतीत होते हैं और साथ ही लगता है कि उन्होंने मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जान लिया है, उसके सार को भी जान लिया है और उसके धार्मिक स्वभाव को भी समझ लिया है। इस नींव के आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्व पर और अधिक दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी उत्कृष्टता की स्थिति से और अधिक परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को और अधिक गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचनों के सतही ज्ञान से ओतप्रोत होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्ट सहने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ है, और परमेश्वर संबंधी उनका ज्ञान और अधिक गहरा हुआ है। वे नहीं जानते कि जब तक वे परमेश्वर के वचनों का वास्तव में अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर संबंधी सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी अपनी इच्छित कल्पनाओं और अनुमान से निकलते हैं। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी प्रकार की परीक्षा के सामने नहीं ठहरेगा, उनकी तथाकथित आध्यात्मिकता और उनका आध्यात्मिक कद परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या निरीक्षण के तहत बिल्कुल नहीं ठहरेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं है, और उनका परमेश्वर संबंधी तथाकथित ज्ञान उनकी कल्पना की उड़ान से अधिक कुछ नहीं है। वास्तव में इन लोगों ने, जिन्होंने एक तरह से परमेश्वर के वचनों पर काफी परिश्रम किया है, कभी यह एहसास ही नहीं किया कि सच्ची आस्था क्या है, सच्चा समर्पण क्या है, सच्ची परवाह क्या है, या परमेश्वर का सच्चा ज्ञान क्या है। वे सिद्धांत, कल्पना, ज्ञान, हुनर, परंपरा, अंधविश्वास, यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को भी परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए “पूँजी” और “हथियार” का रूप दे देते हैं, उन्हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, वे इस पूँजी और हथियार का जादुई तावीज भी बना लेते हैं और उसके माध्यम से परमेश्वर को जानते हैं और उसके निरीक्षणों, परीक्षणों, ताड़ना और न्याय का सामना करते हैं। अंत में जो कुछ वे प्राप्त करते हैं, उसमें फिर भी परमेश्वर के बारे में धार्मिक संकेतार्थों और सामंती अंधविश्वासों से ओतप्रोत निष्कर्षों से अधिक कुछ नहीं होता, जो हर तरह से रोमानी, विकृत और रहस्यमय होता है। परमेश्वर को जानने और उसे परिभाषित करने का उनका तरीका उन्हीं लोगों के साँचे में ढला होता है, जो केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करते हैं, जबकि परमेश्वर की व्यावहारिकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्वरूप और अस्तित्व आदि—वह सब, जो वास्तविक स्वयं परमेश्वर से संबंध रखता है—ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें समझने में उनका ज्ञान विफल रहा है, जिनसे उनके ज्ञान का पूरी तरह से संबंध-विच्छेद हो गया है, यहाँ तक कि वे इतने अलग हैं, जितने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। इस तरह, हालाँकि वे लोग परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति और पोषण में जीते हैं, फिर भी वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर सचमुच चलने में असमर्थ हैं। इसका वास्तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी वास्तविक संपर्क या समागम किया है, अतः उनके लिए परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ पर पहुँचना, या अपने भीतर परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास पैदा कर पाना, उसका सच्चा अनुसरण या उसकी सच्ची आराधना जाग्रत कर पाना असंभव है। इस परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण ने—कि उन्हें इस प्रकार परमेश्वर के वचनों को देखना चाहिए, उन्हें इस प्रकार परमेश्वर को देखना चाहिए, उन्हें अनंत काल तक अपने प्रयासों में खाली हाथ लौटने, और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न चल पाने के लिए अभिशप्त कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह प्रदर्शित करता है कि अनंत काल से वे परमेश्वर के शत्रु हैं और अनंत काल तक वे कभी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकेंगे।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना