2. आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है, कि वह देहधारी सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, जो समूचे सत्य को व्यक्त कर रहा है जिससे मानव जाति को शुद्ध किया और बचाया जा सकता है, और यह कि वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है। तो हमें परमेश्वर की आवाज़ को कैसे पहचानना चाहिए, और हम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर प्रभु यीशु की वापसी है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :

“यीशु ने उससे कहा, ‘मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता’” (यूहन्ना 14:6)

“मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)

“क्योंकि परमेश्वर का मार्ग जीवित, और शक्तिशाली, और किसी भी दोधारी तलवार से अधिक तेज़ है, जो प्राण और आत्मा को, और गाँठ-गाँठ और गूदे-गूदे को अलग करके आर-पार छेदता है, और हृदय के विचारों और मंशाओं को जाँचता है” (इब्रानियों 4:12)

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार है और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। चूँकि परमेश्वर देहधारी बना है, इसलिए वह उस कार्य को अपने साथ लाता है जो वह करना चाहता है और चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, इसलिए वह परमेश्वर का स्वरूप व्यक्त करता है और वह मनुष्य के लिए सत्य ला सकता है, उसे जीवन प्रदान कर सकता है और उसे मार्ग दिखा सकता है। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह जाँच करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है, तो उसे इसका निर्धारण उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करना चाहिए। अर्थात्, यह निर्धारित करने के लिए कि वह परमेश्वर का देहधारी स्वरूप है या नहीं और वह सच्चा मार्ग है या नहीं, व्यक्ति को उसके सार के आधार पर उसकी परख करनी चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके वचनों, उसके स्वभाव और बहुत-से अन्य पहलुओं) में निहित होती है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके मूर्ख और अज्ञानी होने का पता चलता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

देहधारी परमेश्वर के वचन एक नया युग आरंभ करते हैं, समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करते हैं, रहस्य प्रकट करते हैं और मनुष्य को वह दिशा दिखाते हैं जो उसे नए युग में ग्रहण करनी है। मनुष्य जो प्रबुद्धता हासिल करता है, वह केवल कुछ साधारण अभ्यास या ज्ञान मात्र है। यह एक नए युग में समस्त मानवजाति को नहीं ले जा सकता या स्वयं परमेश्वर के रहस्य प्रकट नहीं कर सकता। आखिरकार, परमेश्वर परमेश्वर है और मनुष्य मनुष्य है। परमेश्वर में परमेश्वर का सार होता है और मनुष्य में मनुष्य का सार। यदि मनुष्य परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों को पवित्र आत्मा का साधारण प्रबोधन मानता है और प्रेरितों और नबियों के वचनों को परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से कहे गए वचन मानता है तो यह मनुष्य की गलती होगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

सत्य जीवन का सर्वाधिक व्यावहारिक सिद्धांत है और मानवजाति के लिए सर्वोच्च जीवन का नीति-वाक्य है। चूँकि यही वह अपेक्षा है जो परमेश्वर मनुष्य से करता है और यही परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य है, इसलिए इसे “जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है। यह किसी चीज से सारांशित किया गया कोई नीति-वाक्य नहीं है, न ही यह किसी महान हस्ती द्वारा कहा गया कोई प्रसिद्ध उद्धरण है। इसके बजाय, यह स्वर्ग और पृथ्वी तथा सभी चीजों के संप्रभु का मानवजाति के लिए कथन है; यह मनुष्य द्वारा किया गया कुछ वचनों का सारांश नहीं है, बल्कि परमेश्वर का अंतर्निहित जीवन है। इसलिए इसे “सर्वोच्च जीवन-सिद्धांत” कहा जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन बाहरी तौर पर देखने में चाहे सरल हों या गहन, वे सब ऐसे सत्य हैं जो मनुष्य के जीवन प्रवेश के लिए अपरिहार्य हैं; वे जीवनदायी जल के ऐसे स्रोत हैं जो मनुष्य को आत्मा और देह दोनों में जीवित रहने में सक्षम बनाते हैं। वे मनुष्य को जीवित रहने के लिए जरूरी चीजें मुहैया कराते हैं; जैसे कि उसके दैनिक जीवन में स्व-आचरण के नियम और सिद्धांत; उद्धार पाने का अनिवार्य मार्ग और साथ ही उद्धार पाने के लिए लक्ष्य और दिशा; हर वह सत्य जो उसमें परमेश्वर के समक्ष एक सृजित प्राणी के रूप में होना चाहिए; और हर वह सत्य कि मनुष्य परमेश्वर के प्रति कैसे समर्पण करे और कैसे उसकी आराधना करे। वे मनुष्य के जीवित बने रहने की गारंटी हैं, वे मनुष्य की दैनिक रोटी हैं और वे ऐसा मजबूत सहारा भी हैं जो मनुष्य को सशक्त होने और अडिग रहने में सक्षम बनाता है। परमेश्वर के वचन उस सत्य वास्तविकता से संपन्न हैं, जिससे सृजित मानवजाति सामान्य मानवता को जीती है, वे उस सत्य से समृद्ध हैं, जिससे मानवता भ्रष्टता से मुक्त होती है और शैतान के फंदे से निकलती है, वे उस गंभीर और धैर्यपूर्ण शिक्षा, प्रोत्साहन, उत्साहवर्धन और सांत्वना से संपन्न हैं, जो सृष्टिकर्ता सृजित मानवता को देता है। वे ऐसे प्रकाश-स्तंभ हैं जो मनुष्य को सभी सकारात्‍मक चीजों को समझने का मार्गदर्शन और प्रबोधन देते हैं; वे यह सुनिश्चित करने की गारंटी हैं कि मनुष्य वह सब जिएगा और हासिल करेगा जो न्यायसंगत, सुंदर और अच्छा है, वे ऐसे मापदंड हैं जिनसे सभी लोगों, घटनाओं और चीजों को मापा जाता है और वे मार्गदर्शक चिह्न भी हैं जो मनुष्‍य को उद्धार की तरफ और रोशनी के मार्ग पर ले जाते हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना

परमेश्वर को जानना परमेश्वर के वचनों को पढ़ने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने, और साथ ही कई परीक्षणों, शोधनों और काट-छाँट का अनुभव करने के द्वारा होना चाहिए; केवल तभी परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के स्वभाव का सच्चा ज्ञान होना संभव है। कुछ लोग कहते हैं : “मैंने देहधारी परमेश्वर को नहीं देखा है, तो मुझे परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए?” वास्तव में, परमेश्वर के वचन उसके स्वभाव की एक अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के वचनों से तुम मनुष्यों के लिए उसके प्रेम और उद्धार के साथ-साथ उन्हें बचाने के उसके तरीके को भी देख सकते हो...। ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर के वचन स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए जाते हैं, वे मनुष्यों द्वारा लिखे नहीं जाते। उन्हें परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया है; स्वयं परमेश्वर अपने वचनों और अपने दिल की आवाज़ व्यक्त कर रहा है, जिन्हें उसके दिल से निकले वचन भी कहा जा सकता है। उन्हें उसके दिल से निकले वचन क्यों कहा जाता है? वह इसलिए, क्योंकि वे बहुत गहराई से निकलते हैं, और परमेश्वर के स्वभाव, उसके इरादों, उसके ख्यालों और विचारों, मानवजाति के लिए उसके प्रेम, उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार, तथा मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं को व्यक्त करते हैं...। परमेश्वर के कथनों में कठोर वचन, कोमल और विचारशील वचन, और साथ ही प्रकाशनात्मक वचन भी शामिल हैं, जो इंसान की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखते हैं। यदि तुम केवल प्रकाशनात्मक वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर बहुत कठोर है। यदि तुम केवल कोमल वचनों को देखो, तो तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर ज़्यादा अधिकार-संपन्न नहीं है। इसलिए तुम्हें उन्हें संदर्भ से अलग करके नहीं देखना चाहिए; बल्कि उन्हें हर कोण से देखो। कभी-कभी परमेश्वर दयापूर्ण परिप्रेक्ष्य से बोलता है, और तब लोग मानवजाति के लिए उसके प्रेम को देखते हैं; कभी-कभी वह कठोर दृष्टिकोण से बोलता है, और तब लोग देखते हैं कि उसका स्वभाव कोई अपमान सहन नहीं करता, कि मनुष्य अत्यधिक गंदा है, और वह परमेश्वर के मुख को देखने या परमेश्वर के सामने आने के योग्य नहीं है, और यह पूरी तरह से परमेश्वर के अनुग्रह की बदौलत है कि उसे अब परमेश्वर के सामने आने की जो अनुमति है। परमेश्वर के कार्य करने के तरीके और उसके कार्य के अर्थ से उसकी बुद्धि को देखा जा सकता है। लोग इन चीजों को परमेश्वर के वचनों में भी देख सकते हैं, यहाँ तक कि उसके सीधे संपर्क में आए बिना भी।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

इस बार परमेश्वर कार्य करने के लिए आध्यात्मिक देह में नहीं, बल्कि बहुत ही साधारण शरीर में आया है। इसके अलावा, यह परमेश्वर के दूसरे देहधारण का शरीर है और यह वह शरीर भी है, जिसके द्वारा वह देह में लौटकर आया है। यह एक बहुत साधारण देह है। उस पर नजर डालकर तुम ऐसा कुछ भी नहीं देख सकते हो जो उसे दूसरों से भिन्न दिखाता हो, लेकिन तुम उससे अब तक अनसुने सत्य प्राप्त कर सकते हो। महज यह तुच्छ देह परमेश्वर के सत्य के समस्त वचनों का मूर्त रूप है, अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य की वाहक है और मनुष्य के समझने के लिए परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम स्वर्ग के परमेश्वर को समझने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? क्या तुम मानवजाति का गंतव्य देखने की प्रबल अभिलाषा नहीं करते? वह तुम्हें ये सभी रहस्य बताएगा—वे रहस्य जो कोई मनुष्य तुम्हें कभी नहीं बता पाया है—और वह तुम्हें वे सत्य भी बताएगा जिन्हें तुम नहीं समझते। वह राज्य में जाने का तुम्हारा द्वार है, और नए युग में जाने के लिए तुम्हारा मार्गदर्शक है। यह साधारण देह कई रहस्यों को समेटे हुए है जिनकी थाह मनुष्य नहीं ले सकता है। उसके कर्म तुम्हारे लिए गूढ़ हैं, लेकिन उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य का संपूर्ण लक्ष्य तुम्हें यह सब देखने की क्षमता देने के लिए पर्याप्त है कि वह कोई साधारण देह नहीं है, जैसा कि लोग मानते हैं, क्योंकि वह अंत के दिनों के परमेश्वर के इरादों और अंत के दिनों में मानवजाति के प्रति परमेश्वर की परवाह का प्रतिनिधित्व करता है। यद्यपि तुम उसके द्वारा बोले गए उन वचनों को नहीं सुन सकते जो आकाश और पृथ्वी को कँपाते-से लगते हैं, यद्यपि तुम उसकी आँखें आग की लपटों जैसी नहीं देख सकते, और यद्यपि तुम उसके लौह-दंड का अनुशासन नहीं पा सकते, फिर भी तुम उसके वचनों से यह सुन सकते हो कि परमेश्वर क्रोधित हो रहा है और यह जान सकते हो कि परमेश्वर मानवजाति पर दया दिखा रहा है, और तुम परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव और उसकी बुद्धि देख सकते हो, और उससे भी अधिक, समस्त मानवजाति के लिए परमेश्वर की परवाह को समझ सकते हो। अंत के दिनों में परमेश्वर का कार्य मनुष्य को स्वर्ग के परमेश्वर का पृथ्वी पर मनुष्य के बीच रहना दिखाना है और परमेश्वर को जानने, उसके प्रति समर्पण करने, उसका भय मानने और उससे प्रेम करने में सक्षम बनाना है। यही कारण है कि वह दूसरी बार देह में लौटा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम जानते थे? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक महान काम किया है

जब परमेश्वर धरती पर अपना कार्य करने आता है, तो लोग जो देखते हैं, वे सब अलौकिक घटनाएँ होती हैं। लोग अपनी आँखों से जो कुछ देखते हैं और अपने कानों से जो कुछ सुनते हैं, वह सब अलौकिक होता है, क्योंकि उसके कार्य और उसके वचन उनके लिए अबोधगम्य और अप्राप्य होते हैं। यदि स्वर्ग की किसी चीज़ को पृथ्वी पर लाया जाता है, तो वह अलौकिक होने के सिवाय कोई अन्य चीज़ कैसे हो सकती है? जब स्वर्ग के राज्य के रहस्यों को पृथ्वी पर लाया जाता है, ऐसे रहस्य, जो मनुष्य के लिए अबोधगम्य और अगाध हैं और जो बेहद अद्भुत तथा बुद्धिमत्तापूर्ण हैं—तो क्या वे सब अलौकिक नहीं हैं? ... देहधारी परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किए जाने वाले कार्य को लो : इसका कौन-सा पहलू अलौकिक नहीं है? उसके वचन तुम्हारे लिए अबोधगम्य और अप्राप्य हैं, और उसके द्वारा किया जाने वाला कार्य किसी भी व्यक्ति के द्वारा नहीं किया जा सकता। जो वह समझता है, वह मनुष्य द्वारा किसी भी तरह से नहीं समझा जा सकता, और जहाँ तक उसके ज्ञान की बात है, मनुष्य नहीं जानता कि वह कहाँ से आता है। कुछ लोग हैं, जो कहते हैं, “मैं तुम्हारे जैसा ही सामान्य हूँ, तो ऐसा कैसे है कि मैं वह नहीं जानता, जो तुम जानते हो? मैं उम्र में तुमसे बड़ा हूँ और अनुभव से भी अधिक समृद्ध हूँ, फिर भी तुम वह कैसे जान सकते हो, जो मैं नहीं जानता?” जहाँ तक मनुष्य की बात है, यह सब उसके लिए अप्राप्य है। फिर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं, “इस्राएल में किए गए कार्य को कोई नहीं जानता; यहाँ तक कि बाइबल के प्रतिपादक भी कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाते; तुम उसे कैसे जानते हो?” क्या ये सभी अलौकिक मामले नहीं हैं? उसे चमत्कारों का कोई अनुभव नहीं है, फिर भी वह सब जानता है; वह अत्यधिक सहजता से सत्य बोलता और व्यक्त करता है। क्या यह अलौकिक नहीं है? उसका कार्य उससे बढ़कर है, जो देह प्राप्त कर सकता है। इसके बारे में कोई भी देहधारी मनुष्य सोच भी नहीं सकता और मनुष्य के तर्क-विचार के लिए यह पूरी तरह अकल्पनीय है। यद्यपि उसने कभी बाइबल नहीं पढ़ी, फिर भी वह इस्राएल में किए गए परमेश्वर के कार्य को समझता है। और यद्यपि जब वह बोलता है तो वह पृथ्वी पर खड़ा होता है, किंतु वह तीसरे स्वर्ग के रहस्यों की बात करता है। जब मनुष्य इन वचनों को पढ़ता है, तो उसे महसूस होता है : “क्या यह तीसरे स्वर्ग की भाषा नहीं है?” क्या ये सभी ऐसे मामले नहीं हैं, जो सामान्य इंसान की पहुँच से बाहर हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (1)

मनुष्य के कार्य में उसके अनुभव के बहुत-से तत्व होते हैं; मनुष्य वही व्यक्त करता है जैसा उसका स्वरूप होता है। अपना कार्य करने में परमेश्वर भी वही व्यक्त करता है जो उसका स्वरूप है, परंतु उसका अस्तित्व मनुष्य से भिन्न है। मनुष्य का अस्तित्व मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव करता या जिससे सामना होता है, या जो उसके सांसारिक आचरण के फलसफे हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न अस्तित्व व्यक्त करते हैं। क्या तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव है और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और उसके भीतर कैसे अनुभव करते हो, इसे तुम्हारी अभिव्यक्ति में देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार को अच्छी तरह से जानता है और सभी प्रकार के लोगों के विभिन्न अभ्यास उजागर कर सकता है। इतना ही नहीं, वह मनुष्यों के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार भी उजागर कर सकता है। वह दुनिया के लोगों के बीच नहीं रहता, परंतु वह नश्वर लोगों की प्रकृति और दुनिया के लोगों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही उसका अस्तित्व है। यद्यपि वह दुनिया के साथ व्यवहार नहीं करता, लेकिन वह दुनिया से निपटने के तमाम नियम जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह आत्मा के आज के और अतीत के, दोनों कार्यों के बारे में जानता है जिन्हें मनुष्य की आँखें नहीं देख सकतीं और कान नहीं सुन सकते। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि सांसारिक आचरण का फलसफा नहीं है और वह चमत्कार है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही उसका अस्तित्व है, लोगों के लिए खुला भी और उनसे छिपा हुआ भी है। वह जो कुछ व्यक्त करता है, वह असाधारण मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि आत्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता परंतु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह “वन-मानुषों” के साथ संपर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती, परंतु वह ऐसे वचन व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान हस्तियों के वचनों से ऊपर होते हैं। वह ऐसे मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह में रहता है जिनमें मानवता नहीं है और जो मानव-जीवन को या मानवता के मानदंडों को नहीं समझते, परंतु वह मानवजाति से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही वह मानवजाति की नीच और अधम मानवता को उजागर भी करता है। यह सब कुछ उसका अस्तित्व ही है, किसी भी रक्त-माँस के इंसान के अस्तित्व की तुलना में अधिक ऊँचा। उसके लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह उस कार्य को करने के लिए जो उसे करने की जरूरत है और भ्रष्ट मानवजाति के सार को पूरी तरह से उजागर करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करने का अतिरिक्त कदम उठाए। पतित सामाजिक जीवन उसके देह को “विकसित” नहीं कर सकता। उसका कार्य और उसके वचन केवल मनुष्य के विद्रोहीपन को उजागर करते हैं और संसार से निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को उजागर करना और न्याय करना उसकी देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लंबे समय तक मनुष्य के विद्रोहीपन को जानने और मनुष्य की भ्रष्टता से घृणा करने के बाद उसका मनुष्य की अधार्मिकता उजागर करना है। जो भी कार्य वह करता है, वह सब मनुष्य के सामने उसका स्वभाव प्रकट करता है और उसके अस्तित्व को व्यक्त करता है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है; इस कार्य को रक्त-माँस का व्यक्ति नहीं कर सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य

एक समय मैं यहोवा के नाम से पुकारा जाता था, एक समय मुझे लोग मसीहा के रूप में भी जानते थे और एक समय लोग मुझे प्यार और सम्मान से उद्धारकर्ता यीशु भी कहते थे। आज मैं वह यहोवा या यीशु नहीं हूँ, जिसे लोग अतीत में जानते थे। बल्कि मैं वह परमेश्वर हूँ जो अंत के दिनों में वापस आया है, वह परमेश्वर जो युग का समापन करेगा; मैं स्वयं परमेश्वर हूँ, जो अपने संपूर्ण स्वभाव से भरा है और अधिकार, आदर और महिमा से भरा, पृथ्वी के छोर से उदित होता है। लोग कभी मेरे संपर्क में नहीं रहे हैं, उन्होंने मुझे कभी जाना नहीं है और वे मेरे स्वभाव से हमेशा अनभिज्ञ रहे हैं। संसार की रचना के समय से लेकर आज तक एक भी मनुष्य ने मुझे नहीं देखा है। यह वह परमेश्वर है जो अंत के दिनों के दौरान लोगों पर प्रकट होता है, किंतु उनके बीच छिपा हुआ है। वह सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से लबालब भरा हुआ, दहकते हुए सूर्य और धधकती हुई आग के समान, सच्चे और वास्तविक रूप में, लोगों के बीच निवास करता है। ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसका मेरे वचनों द्वारा न्याय नहीं किया जाएगा, और ऐसा एक भी व्यक्ति या चीज नहीं है जिसे जलती आग के माध्यम से शुद्ध नहीं किया जाएगा। अंततः मेरे वचनों के कारण तमाम देश धन्य हो जाएँगे और मेरे वचनों के कारण टुकड़े-टुकड़े भी कर दिए जाएँगे। इस तरह अंत के दिनों में सभी लोग देखेंगे कि मैं ही वह उद्धारकर्ता हूँ जो वापस लौट आया है, और मैं ही वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ जो समस्त मानवजाति को जीतता है। और सभी देखेंगे कि मैं एक बार मनुष्य के लिए पाप-बलि था, किंतु अंत के दिनों में मैं धधकते सूर्य की ज्वाला बन गया हूँ जो सभी चीजों को जला देती है, और साथ ही मैं धार्मिकता का सूर्य बन गया हूँ जो सभी चीजों को प्रकट कर देता है। यह मेरा अंत के दिनों का कार्य है। मैं इस नाम को अपनाता हूँ और यह स्वभाव धारण करता हूँ ताकि सभी लोग देख सकें कि मैं धार्मिक परमेश्वर हूँ, दहकता हुआ सूर्य हूँ और धधकती हुई ज्वाला हूँ, और ताकि सभी मेरी, एक सच्चे परमेश्वर की आराधना कर सकें, और ताकि वे मेरे असली चेहरे को देख सकें : मैं केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं हूँ, और मैं केवल छुटकारा दिलाने वाला नहीं हूँ; बल्कि मैं समस्त आकाश, पृथ्वी और महासागरों के सारे प्राणियों का परमेश्वर हूँ।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है

परमेश्वर विभिन्न तरीकों और कई परिप्रेक्ष्यों के उपयोग से हमें इस बारे में सचेत करते हुए कि हमें क्या करना चाहिए और साथ ही अपने हृदय की वाणी व्यक्त करते हुए अपने कथन जारी रखता है। उसके वचनों में जीवन की शक्ति है, वे हमें वह मार्ग देते हैं जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए और हमें यह अच्छी तरह से समझने में सक्षम बनाते हैं कि सत्य वास्तव में क्या है। हम उसके वचनों से आकर्षित होने लगते हैं, हम उसके बोलने के लहजे और तरीके पर ध्यान देने लगते हैं और हम इस अगोचर व्यक्ति के हृदय की वाणी पर अवचेतन रूप से ध्यान देने लगते हैं। वह हमारे लिए अपने हृदय को मथ डालता है, हमारे लिए नींद और भूख त्याग देता है, हमारे लिए रोता है, हमारे लिए आहें भरता है, हमारे लिए बीमारी में कराहता है; वह हमारी मंजिल और उद्धार की खातिर अपमान सहता है; और हमारी संवेदनहीनता और विद्रोहशीलता के कारण उसका हृदय खून और आँसू बहाता है। जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, वे किसी साधारण व्यक्ति में नहीं हो सकते हैं, न ही वे किसी भ्रष्ट मनुष्य में हो सकते हैं या वह उन्हें हासिल कर सकता है। उसमें ऐसी सहनशीलता और धैर्य है जो किसी साधारण मनुष्य में नहीं होता है, और उसका प्रेम ऐसा है जो किसी सृजित प्राणी में नहीं होता है। उसके अलावा कोई भी हमारे समस्त विचारों को नहीं जान सकता या हमारी प्रकृति और सार को अपनी हथेली के पृष्ठ भाग की तरह भली-भाँति नहीं जान सकता या मानवजाति की विद्रोहशीलता और भ्रष्टता का न्याय नहीं कर सकता या इस तरह से स्वर्ग के परमेश्वर की ओर से हमसे बातचीत और हम पर कार्य नहीं कर सकता। उसके अलावा किसी में परमेश्वर का अधिकार, बुद्धि और गरिमा नहीं है; उसमें परमेश्वर का स्वभाव और उसके पास जो है और जो वह स्वयं है, अपनी संपूर्णता में प्रकट होते हैं। उसके अलावा कोई हमें मार्ग नहीं दिखा सकता या हमारे लिए प्रकाश नहीं ला सकता। उसके अलावा कोई भी उन रहस्यों को प्रकट नहीं कर सकता, जिन्हें परमेश्वर ने सृष्टि के आरंभ से अब तक प्रकट नहीं किया है। उसके अलावा कोई हमें शैतान के बंधन और हमारे भ्रष्ट स्वभावों से नहीं बचा सकता। वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करता है; वह संपूर्ण मानवजाति के लिए परमेश्वर के हृदय की वाणी, परमेश्वर के प्रोत्साहनों और परमेश्वर के न्याय के वचनों को व्यक्त करता है। उसने एक नया युग, एक नया काल आरंभ किया है, वह एक नए स्वर्ग और पृथ्वी और नए कार्य में ले गया है, वह हमारे लिए आशा लेकर आया है और उसने उस जीवन को समाप्त कर दिया जिसे हम अस्पष्ट अवस्था में जी रहे थे, उसने हमारे संपूर्ण अस्तित्व को उद्धार का मार्ग पूरी स्पष्टता से देखने में सक्षम बनाया है। उसने हमारे संपूर्ण अस्तित्व को जीत लिया है और हमारे दिलों को प्राप्त कर लिया है। उस क्षण से हमारे दिल जागरूक हो गए हैं और हमारी आत्माएँ पुनर्जीवित हो गई लगती हैं : यह साधारण, मामूली व्यक्ति, जो हमारे बीच रहता है और जिसे हम इतने लंबे समय से ठुकराते आए हैं—क्या यह वही प्रभु यीशु नहीं है, जो सोते-जागते हमेशा हमारे विचारों में रहता है और जिसके लिए हम रात-दिन लालायित रहते हैं? यह वही है! यह वास्तव में वही है! वही हमारा परमेश्वर है! वही सत्य, मार्ग और जीवन है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 4 : परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना

पिछला: 1. प्रभु यीशु ने कहा था, “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं(यूहन्ना 10:27)। जब प्रभु लौटकर आएगा, तो वह अपनी बातों को कहेगा और अपनी भेड़ों की तलाश में जाएगा। प्रभु के लौटने की प्रतीक्षा करने में परमेश्वर की आवाज़ की तलाश करना महत्वपूर्ण है, लेकिन हम परमेश्वर की आवाज़ और इंसान की आवाज़ के बीच अंतर करने में असमर्थ हैं। कृपया हमारे साथ इस पर सहभागिता करें।

अगला: 3. आप इस बात की गवाही देते हैं कि वचन देह में प्रकट होता है को व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर द्वारा प्रतिपादित किया गया था, फिर भी ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि ये वचन किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा बोले गए थे जिसे पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किया गया था। तो आखिर, देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किसी व्यक्ति द्वारा कहे गए शब्दों के बीच क्या अंतर होता है?

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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1. प्रभु ने हमसे यह कहते हुए, एक वादा किया, “मैं तुम्हारे लिये जगह तैयार करने जाता हूँ। और यदि मैं जाकर तुम्हारे लिये जगह तैयार करूँ, तो फिर आकर तुम्हें अपने यहाँ ले जाऊँगा कि जहाँ मैं रहूँ वहाँ तुम भी रहो” (यूहन्ना 14:2-3)। प्रभु यीशु पुनर्जीवित हुआ और हमारे लिए एक जगह तैयार करने के लिए स्वर्ग में चढ़ा, और इसलिए यह स्थान स्वर्ग में होना चाहिए। फिर भी आप गवाही देते हैं कि प्रभु यीशु लौट आया है और पृथ्वी पर ईश्वर का राज्य स्थापित कर चुका है। मुझे समझ में नहीं आता : स्वर्ग का राज्य स्वर्ग में है या पृथ्वी पर?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :“हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए। तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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