74 परमेश्वर का न्याय और ताड़ना इंसान को बचाने के लिये है

1

परमेश्वर दूषित इंसान को बचाने, धरती पर आया है।

अतीत में उद्धार के लिये, दिखाई बेइंतहा दया और करुणा उसने,

सारी इंसानियत की ख़ातिर, कर दिया शैतान के हवाले ख़ुद को।

अंत पर है अब परमेश्वर का उद्धार।

उस दौरान वर्गीकरण होता सभी का, उनकी किस्म के अनुसार।

न्याय और ताड़ना के ज़रिये वो, पूरी तरह बचा रहा है इंसान को।

मिलेगा तुम सभी को उसका न्याय, ताड़ना और कठोर प्रहार।


2

ये जान लेना चाहिये तुम्हें मगर,

सज़ा नहीं है, इन कठोर प्रहारों में रत्ती-भर।

न्याय और ताड़ना के ज़रिये वो, पूरी तरह बचा रहा है इंसान को।

मिलेगा तुम्हें उसका न्याय, ताड़ना और कठोर प्रहार।


3

उसके वचन कठोर हों कितने भी, उसका रोष प्रचण्ड हो कितना भी,

मिलेगी तुम्हें उसके वचनों से सीख, इरादा नहीं है उसका अहित तुम्हारा।

परमेश्वर का लक्ष्य नहीं, तुम्हें नुकसान पहुंचाना,

निर्मल करने की ख़ातिर उसका धर्मी न्याय और दयारहित परिष्कार,

इंसाँ को बचाने की ख़ातिर हैं कठोर वचन और प्रहार।


4

इंसान को बचाने का, परमेश्वर का तरीका, अब वो नहीं है जो पहले था।

आज उसका धर्मी न्याय है उद्धार तुम्हारा, सदा उद्धार तुम्हारा।

क्या कहना है तुम्हें इस न्याय और ताड़ना के सामने?

क्या तुमने शुरु से आख़िर तक, नहीं पाया है उद्धार?

न्याय और ताड़ना के ज़रिये वो, पूरी तरह बचा रहा है इंसान को।

मिलेगा तुम्हें उसका न्याय, ताड़ना और कठोर प्रहार।


5

देखा है तुमने देह में परमेश्वर को,

महसूस किया है उसकी बुद्धि को, व्यापकता को,

अनुभव किया है उसके प्रहारों को, अनुशासन को,

मगर पाया है उसका असीम अनुग्रह भी।

सोलोमन के ख़ज़ाने से, शानोशौकत से,

तुम्हारी दुआएं बड़ी हैं हर चीज़ से।

मगर क्या तुम जी पाते अब तक,

अगर ना आता परमेश्वर, तुम्हारा रक्षक बनकर?

अगर चाहता परमेश्वर तुम्हें सज़ा देना,

तो देहधारण की उसको ज़रूरत न थी।

तुम ना जी पाते अब तलक,

महज़ एक वचन काफ़ी था, तुम्हारी सज़ा के लिए।

परमेश्वर कहता है जो, अब भी भरोसा नहीं है तुम्हें?

वो पूरी तरह बचा रहा है इंसानियत को।

उसका धर्मी न्याय है उद्धार तुम्हारा, सदा उद्धार तुम्हारा।


—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के उद्धार के लिए तुम्हें सामाजिक प्रतिष्ठा के आशीष से दूर रहकर परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिए से रूपांतरित

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