स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है (IV)

आज, हम एक खास विषय पर संवाद कर रहे हैं। प्रत्येक विश्वासी के लिए, केवल दो ही मुख्य बातें हैं जिन्हें जानने, अनुभव करने और समझने की आवश्यकता है। ये दो बातें क्या हैं? पहली बात है, किसी व्यक्ति का जीवन में व्यक्तिगत प्रवेश, और दूसरी बात परमेश्वर को जानने से संबंधित है। क्या तुम लोगों को लगता है कि हाल ही में हम जिस विषय, परमेश्वर को जानना, पर संवाद कर रहे हैं, वह प्राप्य है? यह कहना उचित होगा कि यह वास्तव में अधिकांश लोगों की समझ से परे है। तुम लोग शायद मेरी बातों से आश्वस्त न हुए हो लेकिन मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा कहता हूँ क्योंकि जब तुम लोग उन बातों को सुन रहे थे जिन्हें मैं पहले कह रहा था, चाहे मैंने उसे किसी भी प्रकार से कहा हो, या किन्हीं शब्दों में कहा हो, तो तुम लोग, शाब्दिक और सैद्धांतिक, दोनों ही रूपों में यह जानने में समर्थ थे कि ये शब्द किस बारे में थे। फिर भी, तुम सभी के साथ एक अत्यन्त गंभीर समस्या यह थी कि तुम यह नहीं समझे कि मैंने ऐसी बातें क्यों कहीं या मैंने ऐसे विषयों पर क्यों बोला। यह इस मामले का मर्म है। इस प्रकार, यद्यपि इन बातों को सुनने से परमेश्वर और उसके कर्मों के बारे में तुम्हारी समझ में थोड़ी-सी वृद्धि और बढ़ोत्तरी हुई है, फिर भी तुम लोगों को लगता है कि परमेश्वर को जानने के लिए अत्यंत कष्टसाध्य प्रयास ज़रूरी हैं। इसका अर्थ यह है कि मैं जो कहता हूँ, उसे सुनने के बाद, तुममें से अधिकांश लोग यह नहीं समझते कि मैंने ऐसा क्यों कहा, और परमेश्वर को जानने से इसका क्या संबंध है। परमेश्वर को जानने से इसके संबंध को समझने में तुम इसलिए असमर्थ हो क्योंकि तुम लोगों के जीवन अनुभव अत्यधिक सतही हैं। यदि परमेश्वर के वचन के बारे में लोगों का ज्ञान और अनुभव बहुत ही उथले स्तर का बना रहता है, तो उसके संबंध में उनका अधिकतर ज्ञान अस्पष्ट और अमूर्त होगा; वह पूरी तरह से आम, सिद्धांतवादी और सैद्धान्तिक होगा। सैद्धांतिक रूप में, यह देखने-सुनने में तर्कसंगत और विवेकसम्मत प्रतीत हो सकता है, परन्तु अधिकांश लोगों के मुख से निकलने वाला परमेश्वर का ज्ञान वस्तुतः खोखला होता है। और मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि यह खोखला होता है? क्योंकि, परमेश्वर को जानने के बारे में जो तुम खुद कहते हो, उसकी सत्यपरकता और सटीकता को लेकर वास्तव में तुम्हें स्पष्ट समझ नहीं है। जैसे कि, यद्यपि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर को जानने के बारे में बहुत सी जानकारियों और विषयों को सुना है, फिर भी परमेश्वर के उनके ज्ञान को अभी भी परिकल्पना और उस सिद्धान्त से परे जाना है जो अस्पष्ट और अमूर्त है। तो इस समस्या को किस प्रकार सुलझाया जा सकता है? क्या तुम लोगों ने इस बारे में कभी सोचा है? यदि कोई सत्य की खोज नहीं करता है तो क्या वह वास्तविकता को पा सकता है? यदि कोई सत्य की खोज नहीं करता है, तो निर्विवादित रूप से वह वास्तविकता रहित है और इसलिए निश्चित रूप से ऐसे लोगों को परमेश्वर के वचन का ज्ञान या अनुभव नहीं है। और जिन लोगों को परमेश्वर के वचनों की समझ नहीं होती, क्या वे परमेश्वर को जान सकते है? बिल्कुल नहीं; दोनों आपस में जुड़े हैं। इसलिए, अधिकांश लोग कहते हैं, "परमेश्वर को जानना इतना कठिन क्यों है? जब मैं स्वयं को जानने की बात करता हूँ तो मैं घण्टों तक बोल सकता हूँ, परन्तु जब परमेश्वर को जानने की बात आती है तो मेरे पास शब्दों का अभाव हो जाता है। यहाँ तक कि जब मैं इस विषय पर थोड़ा-सा भी बोल पाता हूँ, तो मेरे शब्द जबरन होते हैं और सुनने में नीरस लगते हैं। जब मैं स्वयं को उन्हें बोलते हुए सुनता हूँ तो यह सुनने में बेढंगा लगता है।" यही स्रोत है। यदि तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को जानना अत्यन्त कठिन, अत्यन्त श्रमसाध्य है, या तुम्हारे पास बोलने के लिए विषय ही नहीं हैं और बातचीत के लिए और दूसरों तथा स्वयं को देने के लिए तुम कुछ भी वास्तविक नहीं सोच सकते तो यह प्रमाणित करता है कि तुम कोई ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसने परमेश्वर के वचनों का अनुभव कर लिया है। परमेश्वर के वचन क्या हैं? क्या उसके वचन, परमेश्वर जो स्वयं है और जो कुछ उसके पास है, उसकी अभिव्यक्ति नहीं हैं? यदि तुमने परमेश्वर के वचनों का अनुभव नहीं किया है तो क्या तुम्हें इसका ज़रा भी ज्ञान हो सकता है कि उसके पास क्या है और वह स्वयं क्या है? निश्चित रूप से नहीं। ये सभी बातें आपस में जुड़ी हुई हैं। यदि तुम्हें परमेश्वर के वचनों का कोई भी अनुभव नहीं है तो तुम परमेश्वर की इच्छा को ग्रहण नहीं कर सकते हो, और न ही तुम यह जानते हो कि उसका स्वभाव क्या है, उसे क्या पसंद है, वह किस बात से घृणा करता है, मनुष्य से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, अच्छे लोगों के प्रति उसका रवैया क्या है और दुष्ट लोगों के प्रति उसका रवैया क्या है; यह सब निश्चित रूप से तुम्हारे लिए अस्पष्ट और धुँधला होगा। यदि इस तरह की अस्पष्टता के बीच तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो जब तुम उनमें से एक होने का दावा करते हो जो सत्य की खोज करते हैं और परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, तो क्या ऐसे दावे वास्तविक हैं? वे नहीं हैं! इसलिए आओ हम परमेश्वर को जानने के बारे में बातचीत जारी रखें।

तुम सब आज की संगति के विषय को जानने के उत्सुक हो, है न? यह विषय इससे भी संबन्धित है, "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" जिस पर हम हाल ही में बात करते रहे हैं। हमने इस बारे में काफी बात की है कि कैसे "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है," लोगों को यह बताने के लिए विभिन्न साधनों और परिप्रेक्ष्यों का उपयोग किया है कि किस प्रकार परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, किन साधनों के द्वारा वह ऐसा करता है, और किन सिद्धान्तों के द्वारा वह सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है, ताकि वे इस ग्रह पर बनी रहें जिसकी रचना परमेश्वर ने की है। हमने इस बारे में भी काफ़ी बातें की हैं कि कैसे परमेश्वर मानवजाति का भरण-पोषण करता है: किन साधनों के द्वारा वह ऐसा भरण-पोषण करता है, वह मानवजाति को जीने के लिए कैसा पर्यावरण प्रदान करता है, और किन साधनों द्वारा और किन आरंभ बिंदुओं से वह मनुष्य के जीवन के लिए स्थिर पर्यावरण देता है। यद्यपि मैंने सभी चीज़ों पर परमेश्वर के प्रभुत्व और सभी चीज़ों के उसके प्रशासन, और उसके प्रबंधन के बीच संबंध के बारे में प्रत्यक्ष रूप से नहीं बोला है, फिर भी मैंने परोक्ष रूप से बोला है कि किन कारणों से वह सभी चीज़ों को इस प्रकार से प्रशासित करता है, और किन कारणों से वह मानवजाति का इस प्रकार से भरण-पोषण और पालन-पोषण करता है। यह सभी उसके प्रबंधन से संबंधित है। जिसकी हमने बात की है, उसकी विषय-वस्तु बहुत विस्तृत रही हैः बृहत् पर्यावरण से लेकर लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं और भोजन जैसी बहुत छोटी बातों तक, कैसे परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है और उन्हें व्यवस्थित रूप से परिचालित करवाता है, से लेकर सही और उचित जीने के पर्यावरण तक जो उसने संसार की हर प्रजाति के लिए बनाया, इत्यादि। यह समस्त विस्तृत विषय-वस्तु इन बातों से जुड़ी है कि मनुष्य देह में कैसे रहते हैं—यानि यह सब कुछ भौतिक संसार की चीज़ों से जुड़ा है जो कि नग्न आँखों को दिखाई देती हैं, और जिन्हें लोग महसूस कर सकते हैं, जैसे कि, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, मैदान इत्यादि। ये सभी वे वस्तुएँ हैं जिन्हें देखा और स्पर्श किया जा सकता है। जब मैं वायु और तापमान की बात करता हूँ, तो तुम लोग सीधे वायु का अस्तित्व महसूस करने के लिए अपनी श्वास का, और यह अनुभव करने के लिए कि तापमान उच्च है अथवा निम्न, अपने शरीर का उपयोग कर सकते हो। वृक्ष, घास और वन के पशु-पक्षी, आकाश में उड़ने और धरती पर चलने वाली चीज़ें, और विभिन्न छोटे-छोटे जानवर जो बिलों से निकलते हैं, इन सभी को लोगों की स्वयं की आँखों से देखा और उनके स्वयं के कानों से सुना जा सकता है। यद्यपि ऐसी सभी वस्तुओं का दायरा काफ़ी विस्तृत है, फिर भी परमेश्वर द्वारा रची गई सभी चीज़ों में से ये केवल भौतिक संसार का प्रतिनिधित्व करती हैं। भौतिक वस्तुएँ वे हैं जिन्हें लोग देख और महसूस कर सकते हैं, कहने का आशय है, कि जब तुम इन्हें स्पर्श करते हो तो तुम्हें उनका ज्ञान होता है, और जब तुम्हारे नेत्र उन्हें देखते हैं, तो तुम्हारा मस्तिष्क एक छवि, एक चित्र तुम्हारे समक्ष रखता है। ये वे वस्तुएँ हैं जो वास्तविक और सच्ची हैं; तुम्हारे लिये वे अमूर्त नहीं है, अपितु उनके आकार हैं। वे वर्गाकार, या वृत्ताकार, या बड़ी या छोटी हो सकती हैं और प्रत्येक तुम पर एक भिन्न छाप छोड़ती है। ये सभी चीज़ें सृष्टि के भौतिक पहलू को दर्शाती हैं। और इसलिए "सभी चीज़ों पर परमेश्वर का प्रभुत्व" वाक्यांश में कौन सी "सभी चीज़ें" परमेश्वर के लिए शामिल हैं? उनमें केवल वे ही चीज़ें शामिल नहीं हैं जिन्हें मनुष्य देख और स्पर्श कर सकते हैं; इसके अलावा, इनमें वे सभी भी शामिल हैं जो अदृश्य और अस्पृश्य हैं। यह सभी चीज़ों पर परमेश्वर के प्रभुत्व के असली अर्थों में से एक है। यद्यपि ऐसी चीज़ें मनुष्यों के लिए अदृश्य और अस्पृश्य हैं, फिर भी परमेश्वर के लिए—जब तक ये परमेश्वर की आँखों से देखी जा सकती हैं और उसकी संप्रभुता के भीतर हैं, तब तक वे वास्तव में अस्तित्व में हैं। इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्यों के लिए वे अमूर्त और अकल्पनीय, और बल्कि अदृश्य और अस्पृश्य हैं, परमेश्वर के लिए वे वास्तव में और सच में अस्तित्व में है। सभी चीज़ों जिन पर परमेश्वर शासन करता है, उनके बीच यह एक अलग ही दुनिया है और उसके प्रभुत्व वाली सभी चीजों के दायरे का एक अन्य हिस्सा है। यह आज की संगति का विषय है: किस प्रकार परमेश्वर आध्यात्मिक दुनिया पर शासन करता है और उसे चलाता है। चूँकि इस विषय में सम्मिलित है कि किस प्रकार परमेश्वर समस्त वस्तुओं पर शासन और उनका प्रबंधन करता है, इसलिए यह उस संसार—आध्यात्मिक संसार—से संबंधित है जो भौतिक संसार से बाहर है और इसलिए इसे समझना हमारे लिए परम आवश्यक है। इस विषय-वस्तु के बारे में बताए जाने और इसे समझ लेने के बाद ही लोग असलियत में "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है", इन शब्दों के सही अर्थ को समझ सकते हैं। यही कारण है कि क्यों हम इस विषय के बारे में चर्चा करने जा रहे हैं; इसका उद्देश्य "परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, और परमेश्वर सब चीज़ों का प्रबंधन करता है", विषय को पूर्ण करना है। शायद जब तुम लोग इस विषय को सुनो, तो यह तुम लोगों को अजीब और अथाह लगे,—किन्तु इस बात की परवाह किए बिना कि तुम लोग कैसा अनुभव करते हो, चूँकि आध्यात्मिक दुनिया उन सभी चीज़ों का एक भाग है जो परमेश्वर द्वारा शासित हैं, इसलिए तुम लोगों को इस विषय की थोड़ी समझ तो बनानी ही चाहिए। इसकी समझ पा लेने के पश्चात्, तुम लोगों को इस वाक्यांश, "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" की और भी गहरी सराहना, समझ और ज्ञान होगा।

परमेश्वर आध्यात्मिक संसार पर किस प्रकार शासन करता है और उसे चलाता है

भौतिक संसार के विषय में, जब भी कुछ बातें या घटनाएँ लोगों की समझ में नहीं आती हैं, तो वे प्रासंगिक जानकारी को खोज सकते हैं, या उनके मूल और पृष्ठभूमि का पता लगाने के लिए विभिन्न माध्यमों का उपयोग कर सकते हैं। परन्तु जब दूसरे संसार की बात आती है जिसके बारे में हम आज बात कर रहे हैं—आध्यात्मिक संसार, जिसका अस्तित्व भौतिक संसार के बाहर है—तो लोगों के पास ऐसा भी कोई साधन या माध्यम बिलकुल नहीं है जिसके द्वारा इसके बारे में कुछ भी जाना जा सके। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा कहता हूँ क्योंकि, मानवजाति की दुनिया में, भौतिक संसार की हर चीज़ मनुष्य के भौतिक अस्तित्व से अवियोज्य है, और क्योंकि लोगों को ऐसा महसूस होता है कि भौतिक संसार की हर चीज़ उनकी भौतिक जीवन शैली और भौतिक जीवन से अवियोज्य है, इसलिए अधिकांश लोग केवल उन भौतिक चीज़ों से ही अवगत हैं, या उन्हें ही देखते हैं, जो उनकी आँखों के सामने होती हैं, जो चीज़ें उन्हें दिखाई पड़ती हैं। फिर भी, जब आध्यात्मिक दुनिया की बात आती है—कहने का तात्पर्य है कि हर चीज़ जो दूसरी दुनिया की है—तो यह कहना उचित होगा कि अधिकांश लोग विश्वास नहीं करते हैं। चूँकि लोग इसे देख नहीं सकते हैं, और वे मानते हैं कि इसे समझने की, या इसके बारे में कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं है, साथ ही आध्यात्मिक दुनिया भौतिक संसार से पूरी तरह से भिन्न है, और, परमेश्वर के दृष्टिकोण से तो यह खुली है—लेकिन मनुष्यों के लिए, यह रहस्य और गुप्त है—इसलिए लोगों को एक ऐसा मार्ग खोजने में अत्यंत कठिनाई होती है जिसके माध्यम से वे इस दुनिया के विभिन्न पहलुओं को समझ सकें। आध्यात्मिक दुनिया के विभिन्न पहलुओं, जिनके बारे में मैं बोलने जा रहा हूँ, उनका संबंध केवल परमेश्वर के प्रशासन और उसकी संप्रभुता से है: मैं किन्हीं रहस्यों का प्रकाशन नहीं कर रहा हूँ, न ही मैं तुम लोगों को उन रहस्यों में से कोई भी बता रहा हूँ, जिन्हें तुम लोग जानना चाहते हो। चूँकि यह परमेश्वर की संप्रभुता, परमेश्वर के प्रशासन, और परमेश्वर के भरण-पोषण से संबंधित है, इसलिए मैं केवल उस अंश के बारे में बोलूँगा जिसे जानना तुम लोगों के लिए आवश्यक है।

सबसे पहले, मैं तुम लोगों से एक प्रश्न पूछता हूँ : तुम लोगों के मन में आध्यात्मिक दुनिया क्या है? मोटे तौर पर बोला जाए, तो यह वह दुनिया है जो भौतिक संसार से बाहर की है, एक ऐसी दुनिया जो लोगों के लिए अदृश्य और अमूर्त दोनों है। फिर भी, तुम्हारी कल्पना में, आध्यात्मिक दुनिया को किस प्रकार का होना चाहिए? इसे न देख पाने के परिणामस्वरूप, शायद तुम लोग इसके बारे में सोच पाने में सक्षम नहीं हो। फिर भी, जब तुम लोग कुछ दन्तकथाएँ सुनते हो, तब तुम लोग इसके बारे में सोच रहे होते हो, और इसके बारे में सोचने से स्वयं को रोक नहीं पाते हो। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? कुछ ऐसी बात है जो बहुत से लोगों के साथ तब होती है जब वे छोटे होते हैं : जब कोई उन्हें कोई डरावनी कहानी—भूतों या आत्माओं के बारे में—सुनाता है तो वे अत्यंत भयभीत हो जाते हैं। आखिर वे क्यों भयभीत हो जाते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे उन चीज़ों की कल्पना कर रहे होते हैं; यद्यपि वे उन्हें नहीं देख सकते हैं, उन्हें महसूस होता है कि वे उनके कमरों में चारों ओर हैं, किसी छिपे हुए या अंधेरे कोने में, और वे इतने डर जाते हैं कि उनकी सोने की हिम्मत नहीं होती है। विशेष रूप से, रात के समय वे अपने कमरे में अकेले रहने या अपने आँगन में अकेले जाने की हिम्मत नहीं करते हैं। यह तुम्हारी कल्पना की आध्यात्मिक दुनिया है, और लोगों को लगता है कि यह एक भयावह दुनिया है। सच्चाई तो यह है कि हर कोई इसके बारे में कुछ हद तक कल्पना करता है, और हर कोई इसे थोड़ा बहुत अनुभव कर सकता है।

आओ, हम आध्यात्मिक दुनिया के बारे में बात करने से आरंभ करें। यह क्या है? मैं तुम्हें एक छोटा-सा और सरल स्पष्टीकरण देता हूँ : आध्यात्मिक दुनिया एक महत्वपूर्ण स्थान है, एक ऐसा स्थान जो भौतिक संसार से भिन्न है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह महत्वपूर्ण है? हम इसके बारे में विस्तार से बात करने जा रहे हैं। आध्यात्मिक दुनिया का अस्तित्व मानवजाति के भौतिक संसार से अभिन्न रूप से जुड़ा है। सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व में यह मानव के जीवन और मृत्यु के चक्र में एक बड़ी भूमिका निभाता है; यह इसकी भूमिका है, और यह उन कारणों में से एक है जिनकी वजह से इसका अस्तित्व महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जो पाँच इंद्रियों के लिये अगोचर है, इसलिए कोई भी इस बात का सही-सही अनुमान नहीं लगा सकता कि इसका अस्तित्व है अथवा नहीं। इसके विभिन्न गत्यत्मक पहलू मानवीय अस्तित्व के साथ अंतरंगता से जुड़े हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप मानवजाति के जीवन की व्यवस्था भी आध्यात्मिक दुनिया से बेहद प्रभावित होती है। इसमें परमेश्वर की संप्रभुता शामिल है या फिर नहीं? शामिल है। जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो तुम लोग समझ जाते हो कि क्यों मैं इस विषय पर चर्चा कर रहा हूँ : ऐसा इसलिए है क्योंकि यह परमेश्वर की संप्रभुता से और साथ ही उसके प्रशासन से संबंधित है। इस तरह के एक संसार में—जो लोगों के लिए अदृश्य है—इसकी हर स्वर्गिक आज्ञा, आदेश और प्रशासनिक प्रणाली भौतिक संसार के किसी भी देश की व्यवस्थाओं और प्रणालियों से बहुत उच्च है, और इस संसार में रहने वाला कोई भी प्राणी उनकी अवहेलना या उल्लंघन करने का साहस नहीं करेगा। क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता और प्रशासन से संबंधित है? आध्यात्मिक संसार में, स्पष्ट प्रशासनिक आदेश, स्पष्ट स्वर्गिक आज्ञाएँ और स्पष्ट विधान हैं। विभिन्न स्तरों पर और विभिन्न क्षेत्रों में, सेवक सख्ती से अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं, और नियमों और विनियमों का पालन करते है, क्योंकि वे जानते हैं कि स्वर्गिक आज्ञा के उल्लंघन का परिणाम क्या होता है; वे स्पष्ट रूप से अवगत हैं कि किस प्रकार परमेश्वर दुष्टों को दण्ड और भले लोगों को इनाम देता है, और वह किस प्रकार सभी चीज़ों को चलाता है, और उन पर शासन करता है। इसके अतिरिक्त, वे स्पष्ट रूप से देखते हैं कि किस प्रकार परमेश्वर अपने स्वर्गिक आदेशों और विधानों को कार्यान्वित करता है। क्या ये उस भौतिक संसार से भिन्न हैं, जिसमें मानवजाति रहती है? वे दरअसल व्यापक रूप से भिन्न हैं। आध्यात्मिक संसार एक ऐसा संसार है जो भौतिक संसार से पूर्णतया भिन्न है। चूँकि यहाँ स्वर्गिक आदेश और विधान हैं, इसलिए यह परमेश्वर की संप्रभुता, प्रशासन, और इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के स्वभाव तथा साथ ही उसके स्वरूप से संबंधित है। इसे सुनने के पश्चात्, क्या तुम लोगों को यह महसूस नहीं होता है कि इस विषय पर बोलना मेरे लिये अति आवश्यक है? क्या तुम लोग इसमें अंतर्निहित रहस्यों को जानना नहीं चाहते हो? (हाँ, हम चाहते हैं।) आध्यात्मिक दुनिया की अवधारणा ऐसी है। यद्यपि यह भौतिक संसार के साथ सहअस्तित्व में है, और साथ-साथ परमेश्वर के प्रशासन और उसकी संप्रभुता के अधीन है, फिर भी इस दुनिया का परमेश्वर का प्रशासन और उसकी संप्रभुता भौतिक संसार की अपेक्षा बहुत सख्त है। जब विस्तार की बात आती है, तो हमें इस बात से आरंभ करना चाहिए कि किस प्रकार आध्यात्मिक दुनिया मनुष्य के जीवन और म़ृत्यु के चक्र के कार्य के लिए उत्तरदायी है, क्योंकि यह कार्य आध्यात्मिक दुनिया के प्राणियों के कार्य का एक बड़ा भाग है।

मानवजाति में, मैं सभी लोगों को तीन प्रकारों में वर्गीकृत करता हूँ। पहले प्रकार के लोग अविश्वासी हैं, ये वे हैं जो धार्मिक विश्वासों से रहित हैं। ये अविश्वासी कहलाते हैं। अविश्वासियों की बहुत बड़ी संख्या केवल धन में विश्वास रखती है; वे केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं, वे भौतिकवादी हैं और केवल भौतिक संसार में विश्वास करते है—वे जीवन और मृत्यु के चक्र में और देवताओं और प्रेतों के बारे में कही गई बातों में विश्वास नहीं रखते हैं। मैं इन लोगों को अविश्वासियों के रूप में वर्गीकृत करता हूँ, और ये पहले प्रकार के हैं। दूसरा प्रकार अविश्वासियों से अलग विभिन्न मतों को मानने वाले लोगों का है। मानवजाति में, मैं इन मतों के लोगों को अनेक मुख्य समूहों में विभाजित करता हूँ : पहले यहूदी हैं, दूसरे कैथोलिक हैं, तीसरे ईसाई हैं, चौथे मुस्लिम और पाँचवें बौद्ध हैं; ये पाँच प्रकार हैं। ये विभिन्न प्रकार के मतों वाले लोग हैं। तीसरा प्रकार उन लोगों का है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और इसमें तुम लोग शामिल हो। ऐसे विश्वासी वे लोग हैं जो आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। इन लोगों को दो प्रकारों में विभाजित किया जाता है : परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवाकर्ता। इन प्रमुख प्रकारों को स्पष्ट रूप से विभेदित किया गया है। तो अब, अपने मन में तुम लोग मनुष्यों के प्रकारों और क्रमों को स्पष्ट रूप से विभेदित करने में सक्षम हो, हो न? पहला प्रकार अविश्वासियों का है और मैं कह चुका हूँ कि अविश्वासी कौन हैं। क्या वे लोग जो आकाश में वृद्ध मनुष्य में विश्वास करते हैं, अविश्वासी हैं? कई अविश्वासी केवल आकाश में वृद्ध मनुष्य में विश्वास करते हैं; वे मानते हैं कि वायु, वर्षा, आकाशीय बिजली इत्यादि आकाश में इस वृद्ध मनुष्य द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं, जिस पर वे फसल बोने और काटने के लिए निर्भर रहते हैं—फिर भी जब परमेश्वर पर विश्वास करने का उल्लेख किया जाता है, तब वे उसमें विश्वास करने के अनिच्छुक हो जाते हैं। क्या इसे परमेश्वर में विश्वास कहा जा सकता है? ऐसे लोगों को अविश्वासियों में सम्मिलित किया जाता है। तुम इसे समझ गए, है न? इन श्रेणियों को समझने में ग़लती मत करना। दूसरे प्रकार में आस्था वाले लोग हैं और तीसरा प्रकार वे लोग हैं जो इस समय परमेश्वर का अनुसरण कर रहे हैं। क्यों मैंने सभी मनुष्यों को इन प्रकारों में विभाजित किया है? (क्योंकि विभिन्न प्रकार के लोगों के अंत और गंतव्य भिन्न-भिन्न हैं।) यह इसका एक पहलू है। जब इन विभिन्न प्रजातियों और प्रकारों के लोग आध्यात्मिक दुनिया में लौटते हैं, तो उनमें से प्रत्येक का जाने का भिन्न स्थान होगा और वे जीवन और मृत्यु के चक्र की भिन्न—भिन्न व्यवस्थाओं के अधीन किए जाएँगे, और यही कारण है कि क्यों मैंने मनुष्यों को इन मुख्य प्रकारों में वर्गीकृत किया है।

1. अविश्वासियों का जीवन और मृत्यु चक्र

आओ, हम अविश्वासियों के जीवन और मृत्यु के चक्र से आरम्भ करें। मृत्यु के पश्चात् किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक दुनिया के एक नाज़िर द्वारा ले जाया जाता है। किसी व्यक्ति का ठीक-ठीक कौन—सा भाग ले जाया जाता है? उसकी देह नहीं, बल्कि उसकी आत्मा। जब उसकी आत्मा ले जायी जाती है, तब वह एक ऐसे स्थान पर पहुंचता है जो आध्यात्मिक दुनिया का एक अभिकरण है, एक ऐसा स्थान जो विशेष रूप से अभी-अभी मरे हुए लोगों की आत्मा को ग्रहण करता है। (ध्यान दें: किसी के भी मरने के बाद पहला स्थान जहाँ वे जाते हैं, आत्मा के लिए अजनबी होता है।) जब उन्हें इस स्थान पर ले जाया जाता है, तो एक अधिकारी पहली जाँचें करता है, उनका नाम, पता, आयु और उनके समस्त अनुभव की पुष्टि करता है। जब वे जीवित थे तो उन्होंने जो भी किया वह एक पुस्तक में लिखा जाता है और सटीकता के लिए उसका सत्यापन किया जाता है। इस सब की जाँच हो जाने के पश्चात्, उन मनुष्यों के पूरे जीवन के व्यवहार और कार्यकलापों का उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि उन्हें दण्ड दिया जाएगा या वे फिर से मनुष्य के रूप में जन्म लेना जारी रखेंगे, जो कि पहला चरण है। क्या यह पहला चरण भयावह है? यह अत्यधिक भयावह नहीं है, क्योंकि इसमें केवल इतना ही हुआ है कि मनुष्य एक अन्धकारमय और अपरिचित स्थान में पहुँचा है।

दूसरे चरण में, यदि इस मनुष्य ने जीवनभर बहुत से बुरे कार्य किये हैं और अनेक कुकर्म किये हैं, तब उससे निपटने के लिए उसे दण्ड के स्थान पर ले जाया जाएगा। यह वह स्थान होगा जो स्पष्ट रूप से लोगों के दण्ड के लिए उपयोग किया जाता है। उन्हें किस प्रकार के दण्ड दिया जाता है इसका वर्णन उनके द्वारा किये गए पापों पर, और इस बात पर निर्भर करता है कि मृत्यु से पूर्व उन्होंने कितने दुष्टतापूर्ण कार्य किए—यह इस द्वितीय चरण में होने वाली पहली स्थिति है। उनकी मृत्यु से पूर्व उनके द्वारा किये गये बुरे कार्यों और उनकी दुष्टताओं की वजह से, दण्ड के पश्चात् जब वे पुनः जन्म लेते हैं—जब वे एक बार फिर से भौतिक संसार में जन्म लेते हैं—तो कुछ लोग मनुष्य बनते रहेंगे, और कुछ पशु बन जाएँगे। कहने का अर्थ है कि, आध्यात्मिक दुनिया में किसी व्यक्ति के लौटने के पश्चात् उनके द्वारा किए गए दुष्टता के कार्यों की वजह से उन्हें दण्डित किया जाता है; इसके अतिरिक्त, उनके द्वारा किए गए दुष्टता के कार्य की वजह से, अपने अगले जन्म में वे सम्भवत: मनुष्य नहीं, बल्कि पशु बनकर लौटेंगे। जो पशु वे बन सकते हैं उनमें गाय, घोड़े, सूअर, और कुत्ते शामिल हैं। कुछ लोग पक्षी या बत्तख या कलहंस के रूप में पुनर्जन्म ले सकते हैं... पशुओं के रूप में पुनर्जन्म लेने के बाद, जब वे फिर से मरेंगे तो आध्यात्मिक दुनिया में लौट जाएँगे। वहाँ जैसा कि पहले हुआ, मरने से पहले उनके व्यवहार के आधार पर, आध्यात्मिक दुनिया तय करेगी कि वे मनुष्य के रुप में पुनर्जन्म लेंगे या नहीं। अधिकांश लोग बहुत अधिक दुष्टता करते हैं, और उनके पाप अत्यन्त गंभीर होते हैं, इसलिए उन्हें सात से बारह बार तक पशु के रूप में पुनर्जन्म लेना पड़ता है। सात से बारह बार—क्या यह भयावह है? (यह भयावह है।) तुम लोगों को क्या डराता है? किसी मनुष्य का पशु बनना—यह भयावह है। और एक मनुष्य के लिए, एक पशु बनने में सर्वाधिक पीड़ादायक बातें क्या हैं? किसी भाषा का न होना, केवल कुछ साधारण विचार होना, केवल उन्हीं चीज़ों को कर पाना जो पशु करते हैं और पशुओं वाला भोजन ही खा पाना, पशु के समान साधारण मानसिकता और हाव-भाव होना, सीधे खड़े हो कर चलने में समर्थ न होना, मनुष्यों के साथ संवाद न कर पाना, और यह तथ्य की मनुष्यों के किसी भी व्यवहार और गतिविधियों का पशुओं से कोई सम्बन्ध न होना। कहने का आशय है कि, सब चीज़ों के बीच, पशु होना सभी जीवित प्राणियों में तुम्हें निम्नतम कोटि का बना देता है, और यह मनुष्य होने से कहीं अत्यधिक दुःखदायी है। यह उन लोगों के लिए आध्यात्मिक दुनिया के दण्ड का एक पहलू है जिन्होंने बहुत अधिक दुष्टता के कार्य और बड़े पाप किए हैं। जब उनके दण्ड की प्रचण्डता की बात आती है, तो इसका निर्णय इस आधार पर लिया जाता है कि वे किस प्रकार के पशु बनते हैं। उदाहरण के लिए, क्या एक कुत्ता बनने की तुलना में एक सूअर बनना अधिक अच्छा है? कुत्ते की तुलना में सूअर अधिक अच्छा जीवन जीता है या बुरा? बदतर, है न? यदि लोग गाय या घोड़ा बनते हैं, तो वे एक सूअर की तुलना में अधिक बेहतर जीवन जिएंगे या बदतर? (बेहतर।) यदि कोई व्यक्ति बिल्ली के रूप में पुनर्जन्म लेता है तो क्या यह अधिक आरामदायक होगा? वह बिल्कुल वैसा ही पशु होगा, और एक बिल्ली होना एक गाय या घोड़ा होने की तुलना में अधिक आसान है क्योंकि बिल्लियाँ अपना अधिकांश समय नींद की सुस्ती में गुज़ारती हैं। गाय या घोड़ा बनना अधिक मेहनत वाला काम है। इसलिए यदि कोई व्यक्ति गाय या घोड़े के रुप में पुनर्जन्म लेता है, तो उन्हें कठिन परिश्रम करना पड़ता है जो एक कष्टप्रद दण्ड के समान है। गाय या घोड़ा बनने की तुलना में कुत्ता बनना कुछ अधिक बेहतर होगा, क्योंकि कुत्ते का अपने स्वामी के साथ निकट संबंध होता है। कुछ कुत्ते, कई वर्षों तक पालतू होने के बाद, अपने मालिक की कही हुई कई बातें समझने में समर्थ हो जाते हैं। कभी-कभी, कोई कुत्ता अपने मालिक की मनःस्थिति और अपेक्षाओं के अनुरूप बन सकता है और मालिक कुत्ते के साथ ज्यादा अच्छा व्यवहार करता है, और कुत्ता ज्यादा अच्छा खाता और पीता है, और जब वह पीड़ा में होता है तो इसकी अधिक देखभाल की जाती है। तो क्या कुत्ता एक अधिक सुखी जीवन व्यतीत नहीं करता है? इसलिये एक गाय या घोड़ा होने की तुलना में कुत्ता होना बेहतर है। इसमें, किसी व्यक्ति के दण्ड की प्रचण्डता यह निर्धारित करती है कि वह कितनी बार, और साथ ही किस प्रकार के पशु के रूप में जन्म लेता है।

चूँकि अपने जीवित रहने के समय उन्होनें बहुत से पाप किये थे, इसलिए कुछ लोगों को सात से बारह जन्म पशु के रूप में पुनर्जन्म लेने का दण्ड दिया जाता है। पर्याप्त बार दण्डित होने के पश्चात्, आध्यात्मिक दुनिया में लौटने पर उन्हें अन्यत्र ले जाया जाता है—एक ऐसे स्थान पर जहाँ विभिन्न आत्माएँ पहले ही दण्ड पा चुकी होती हैं, और उस प्रकार की होती हैं जो मनुष्य के रूप में जन्म लेने के लिये तैयार हो रही होती हैं। यह स्थान प्रत्येक आत्मा को उस प्रकार के परिवार जिसमें वे उत्पन्न होंगे, एक बार पुनर्जन्म लेने के बाद उनकी क्या भूमिका होगी, आदि के अनुसार श्रेणीबद्ध करता है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जब इस संसार में आएँगे तो गायक बनेंगे, इसलिए उन्हें गायकों के बीच रखा जाता है; कुछ लोग इस संसार में आएँगे तो व्यापारी बनेंगे और इसलिए उन्हें व्यापारी लोगों के बीच रखा जाता है; और यदि किसी को मनुष्य रूप में आने के बाद विज्ञान अनुसंधानकर्ता बनना है तो उसे अनुसंधानकर्ताओं के बीच रखा जाता है। उन्हें वर्गीकृत कर दिए जाने के पश्चात्, प्रत्येक को एक भिन्न समय और नियत तिथि के अनुसार भेजा जाता है, ठीक वैसे ही जैसे कि आजकल लोग ई-मेल भेजते हैं। इसमें जीवन और मृत्यु का एक चक्र पूरा हो जाएगा। जब कोई व्यक्ति आध्यात्मिक दुनिया में पहुँचता है उस दिन से ले कर जब तक उसका दण्ड समाप्त नहीं हो जाता है तब तक, या जब तक उसका एक पशु के रुप में अनेक बार पुनर्जन्म नहीं हो जाता है तथा वह मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेने की तैयारी कर रहा होता है तब यह प्रक्रिया पूर्ण होती है।

जहाँ तक उनकी बात है जिन्होंने दण्ड भोग लिया है और जो अब पशु के रूप में जन्म नहीं लेंगे, क्या उन्हें मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेने के लिए भौतिक संसार में तुरंत भेजा जाएगा? या उन्हें मनुष्यों के बीच आने से पहले कितना समय लगेगा? वह आवृत्ति क्या है जिसके साथ यह हो सकता है? इसके कुछ लौकिक प्रतिबंध हैं। आध्यात्मिक दुनिया में होने वाली हर चीज़ कुछ उचित लौकिक प्रतिबंधों और नियमों के अधीन है—जिसे, यदि मैं संख्याओं के साथ समझाऊँ, तो तुम लोग समझ जाओगे। उनके लिये जो अल्पावधि में पुनर्जन्म लेते हैं, जब वे मरते हैं तो मनुष्य के रूप में उनके पुनर्जन्म की तैयारियाँ पहले ही की जा चुकी होंगी। यह हो सकने का अल्पतम समय तीन दिन है। कुछ लोगों के लिए, इसमें तीन माह लगते हैं, कुछ के लिए इसमें तीन वर्ष लगते हैं, कुछ के लिए इसमें तीस वर्ष लगते हैं, कुछ के लिए इसमें तीन सौ वर्ष लगते हैं, इत्यादि। तो इन लौकिक नियमों के बारे में क्या कहा जा सकता है, और उनकी विशिष्टताएँ क्या हैं? यह भौतिक संसार—मनुष्यों के संसार—किसी आत्मा से क्या चाहता है, इस पर और उस भूमिका पर आधारित होता है जिसे इस आत्मा को इस संसार में निभाना है। जब लोग साधारण व्यक्ति के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं, तो उनमें से अधिकांश अतिशीघ्र पुनर्जन्म लेते हैं, क्योंकि मनुष्य के संसार को ऐसे साधारण लोगों की महती आवश्यकता होती है और इसलिए तीन दिन के पश्चात् वे एक ऐसे परिवार में भेज दिए जाते हैं जो उनके मरने से पहले के परिवार से सर्वथा भिन्न होता है। परन्तु कुछ ऐसे होते हैं जो इस संसार में विशेष भूमिका निभाते हैं। "विशेष" का अर्थ है कि मनुष्यों के संसार में उनकी कोई बड़ी माँग नहीं होती है; न ही ऐसी भूमिका के लिये अधिक व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, इसलिए इसमें तीन सौ वर्ष लग सकते हैं। दूसरे शब्दों में, यह आत्मा हर तीन सौ वर्ष में एक बार अथवा यहाँ तक कि तीन हजार वर्ष में भी एक केवल बार आएगी। ऐसा क्यों है? ऐसा इस तथ्य के कारण है कि तीन सौ वर्ष या तीन हज़ार वर्ष तक संसार में ऐसी भूमिका की आवश्यकता नहीं है, इसलिए उन्हें आध्यात्मिक दुनिया में कहीं पर रखा जाता है। उदाहरण के लिए, कनफ्यूशियस को लें, पारंपरिक चीनी संस्कृति पर उसका गहरा प्रभाव था और उसके आगमन ने उस समय की संस्कृति, ज्ञान, परम्परा और उस समय के लोगों की विचारधारा पर गहरा प्रभाव डाला था। परन्तु इस तरह के मनुष्य की हर एक युग में आवश्यकता नहीं होती है, इसलिए उसे पुनर्जन्म लेने से पहले, तीन सौ या तीन हजार वर्ष तक प्रतीक्षा करते हुए, आध्यात्मिक दुनिया में ही रहना पड़ा था। क्योंकि मनुष्यों के संसार को ऐसे किसी व्यक्ति की आवश्यकता नहीं थी, इसलिए उसे निष्क्रिय रुप से प्रतीक्षा करनी पड़ी, क्योंकि इस तरह की बहुत कम भूमिकाएँ थी, उसके करने के लिए बहुत कम था, इसलिए उसे, निष्क्रिय, और मनुष्य के संसार में उसकी आवश्यकता पड़ने पर भेजे जाने के लिए, अधिकांश समय आध्यात्मिक दुनिया में कहीं पर रखना पड़ा था। जिस बारम्बारता के साथ अधिकतर लोग पुनर्जन्म लेते हैं उसके लिए इस प्रकार के आध्यात्मिक दुनिया के लौकिक नियम हैं। लोग चाहे कोई साधारण या विशेष हों, आध्यात्मिक दुनिया में लोगों के पुनर्जन्म लेने की प्रक्रिया के लिये उचित नियम और सही अभ्यास हैं, और ये नियम और अभ्यास परमेश्वर द्वारा भेजे जाते हैं, उनका निर्णय या नियन्त्रण आध्यात्मिक दुनिया के किसी ना‍ज़िर या प्राणी के द्वारा नहीं किया जाता है। अब तुम समझ गए, है ना?

किसी आत्मा के लिए उसका पुनर्जन्म, इस जीवन में उसकी भूमिका क्या है, किस परिवार में वह जन्म लेती है और उसका जीवन किस प्रकार का होता है, इन सबका उस आत्मा के पिछले जीवन से गहरा संबंध होता है। मनुष्य के संसार में हर प्रकार के लोग आते हैं, और उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिकाएँ भिन्न—भिन्न होती हैं, उसी तरह से उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य भिन्न-भिन्न होते हैं। ये कौन से कार्य हैं? कुछ लोग अपना कर्ज़ चुकाने आते हैं: यदि उन्होंने पिछली ज़िंदगी में किसी से बहुत सा पैसा उधार लिया था, तो वे इस ज़िंदगी में उस कर्ज़ को चुकाने के लिए आते हैं। कुछ लोग, इस बीच, अपना ऋण उगाहने के लिए आए हैं: विगत जीवन में उनके साथ बहुत सी चीज़ों में, और अत्यधिक पैसों का घोटाला किया गया था, और इसलिए उनके आध्यात्मिक दुनिया में आने के बाद, आध्यात्मिक दुनिया उन्हें न्याय देगी और उन्हें इस जीवन में अपना कर्ज़ा उगाहने देगी। कुछ लोग एहसान का कर्ज़ चुकाने के लिए आते हैं: उनके पिछले जीवन के दौरान—यानि उनके पिछले पुनर्जन्म में—कोई उनके प्रति दयावान था, और इस जीवन में उन्हें पुनर्जन्म लेने के लिए एक बड़ा अवसर प्रदान किया गया है और इसलिए वे उस कृतज्ञता का बदला चुकाने के लिए पुनर्जन्म लेते हैं। इस बीच, दूसरे किसी का जीवन लेने के लिए इस जीवन में पैदा हुए हैं। और वे किसका जीवन लेते हैं? उन व्यक्तियों का जिन्होंने पिछले जन्मों में उनके प्राण लिये थे। सारांश में, प्रत्येक व्यक्ति का वर्तमान जीवन अपने विगत जीवनों के साथ प्रगाढ़ रुप से संबंध रखता है, यह संबंध तोड़ा नहीं जा सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति का वर्तमान जीवन उसके पिछले जीवन से बहुत अधिक प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए, हम कहते हैं कि झांग ने अपनी मृत्यु से पहले ली को एक बड़ी मात्रा में पैसों का धोखा दिया था। तो क्या झांग ली का ऋणी बन गया? वह ऋणी है, तो क्या यह स्वाभाविक है कि ली को झांग से अपना ऋण वसूल करना चाहिए? नतीजतन, उनकी मृत्यु के उपरान्त, उनके बीच एक ऋण है जिसका निपटान अवश्य ही किया जाना चाहिए। जब वे पुनर्जन्म लेते हैं और झांग मनुष्य बनता है, तो किस प्रकार से ली उससे अपना ऋण वसूल करता है? एक तरीका है झांग के पुत्र के रुप में पुनर्जन्म लेकर; झांग खूब धन अर्जित करता है जिसे ली द्वारा उड़ा दिया जाता है। चाहे झांग कितना ही धन क्यों न कमाये, उसका पुत्र ली, उसे लुटा देता है। चाहे झांग कितना ही धन क्यों न अर्जित करे, वह कभी पर्याप्त नहीं होता है; और इस बीच उसका पुत्र किसी न किसी कारण से पिता के धन को विभिन्न तरीकों से उड़ा देता है। झांग हैरान रह जाता है, वह सोचता है, "मेरा यह पुत्र हमेशा अपशकुन ही क्यों लाता है? ऐसा क्यों है कि दूसरों के पुत्र इतने शिष्ट हैं? क्यों मेरा ही पुत्र महत्वकांक्षी नहीं है, वह इतना निकम्मा और धन अर्जित करने के अयोग्य क्यों है, और क्यों मुझे सदा उसकी सहायता करनी पड़ती है? चूँकि मुझे उसे सहारा देना है तो मैं सहारा दूँगा—किन्तु ऐसा क्यों है कि चाहे मैं कितना ही धन उसे क्यों न दूँ, वह सदा और अधिक चाहता है? क्यों वह दिनभर में कोई ईमानदारी का काम करने के योग्य नहीं है, और उसके बजाय बाकी सब चीजों जैसे कि आवारागर्दी, खान-पीना, वेश्यावृत्ति और जुएबाजी करने में ही लगा रहता है? आखिर ये हो क्या रहा है?" फिर झांग कुछ समय तक विचार करता है: "ऐसा हो सकता है कि विगत जीवन में मैं उसका ऋणी रहा हूँ? तो ठीक है, मैं वह कर्ज उतार दूँगा! जब तक मैं पूरा चुकता नहीं कर दूँगा, यह मामला समाप्त नहीं होगा!" वह दिन आ सकता है जब ली अपना ऋण वसूल कर लेता है, और जब वह चालीस या पचास के दशक में चल रहा होता है, तो हो सकता है कि एक दिन अचानक उसे चेतना आए और वह महसूस करे कि, "अपने जीवन के पूरे पूर्वार्द्ध में मैंने एक भी भला काम नहीं किया है! मैंने अपने पिता के कमाये हुए सारे धन को उड़ा दिया, इसलिए मुझे एक अच्छा इन्सान बनने की शुरुआत करनी चाहिए! मैं स्वयं को मज़बूत बनाऊँगा; मैं एक ऐसा व्यक्ति बनूँगा जो ईमानदार हो, और उचित रूप से जीवन जीता हो, और मैं अपने पिता को फिर कभी दुःख नहीं पहुँचाऊँगा!" वह ऐसा क्यों सोचता है? वह अचानक अच्छे में कैसे बदल गया? क्या इसका कोई कारण है? क्या कारण है? (ऐसा इसलिए है क्योंकि ली ने अपना ऋण वसूल कर लिया है, झांग ने अपना कर्ज़ चुका दिया है।) इसमें, कार्य-कारण है। कहानी बहुत-बहूत पहले आरम्भ हुई थी, उनके मौजूदा जीवन से पहले, उनके विगत जीवन की यह कहानी उनके वर्तमान जीवन तक लायी गई है, और दोनों में से कोई भी अन्य को दोष नहीं दे सकता है। चाहे झांग ने अपने पुत्र को कुछ भी क्यों न सिखाया हो, उसके पुत्र ने कभी नहीं सुना, और न ही एक दिन भी ईमानदारी से कार्य किया। परन्तु जिस दिन कर्ज चुका दिया गया, उसके पुत्र को सिखाने की कोई आवश्यकता नहीं रही—वह स्वाभाविक रुप से समझ गया। यह एक साधारण सा उदाहरण है। क्या ऐसे अनेक उदाहरण हैं? (हाँ, हैं।) यह लोगों को क्या बताता है? (कि उन्हें अच्छा बनना चाहिए और दुष्टता नहीं करनी चाहिए।) उन्हें कोई दुष्टता नहीं करनी चाहिए, और उनके कुकर्मों का प्रतिफल मिलेगा! अधिकांश अविश्वासी बहुत दुष्टता करते हैं, और उन्हें उनके कुकर्मों का प्रतिफल मिलता है, ठीक है ना? परन्तु क्या यह प्रतिफल मनमाना है? हर कार्य कि पृष्ठभूमि होती है और उसके प्रतिफल का एक कारण होता है। क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारे किसी के साथ पैसे की धोखाधड़ी करने के बाद तुम्हें कुछ नहीं होगा? क्या तुम्हें लगता है कि उस पैसे की ठगी करने के पश्चात्, तुम्हें कोई परिणाम नहीं भुगतना पड़ेगा? यह तो असंभव होगा; और निश्चित रूप से इसके परिणाम होंगे! इस बात की परवाह किए बिना कि वे कौन हैं, या वे यह विश्वास करते हैं अथवा नहीं कि परमेश्वर है, सभी व्यक्तियों को अपने व्यवहार का उत्तरदायित्व लेना होगा और अपनी करतूतों के परिणामों को भुगतना होगा। इस साधारण से उदाहरण के संबंध में—झांग को दण्डित किया जाना और ली का ऋण चुकाया जाना—क्या यह उचित नहीं है? जब लोग इस प्रकार के कार्य करते हैं तो इसी प्रकार का परिणाम होता है। यह आध्यात्मिक दुनिया के प्रशासन से अवियोज्य है। अविश्वासी होने के बावजूद, जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, उनका अस्तित्व ऐसी स्वर्गिक आज्ञाओं और आदेशों के अधीन होता है, इससे कोई बच कर नहीं भाग सकता है और इस सच्चाई से कोई नहीं बच सकता है।

वे लोग जिन्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं है, वे प्रायः मानते हैं कि मनुष्य को दृश्यमान प्रत्येक चीज़ अस्तित्व में है, जबकि प्रत्येक चीज जिसे देखा नहीं जा सकता, या जो लोगों से बहुत दूर है, वह अस्तित्व में नहीं है। वे यह मानना पंसद करते हैं कि "जीवन और मृत्यु का चक्र" नहीं होता है, और कोई "दण्ड" नहीं होता है; इसलिए, वे बिना किसी मलाल के पाप और दुष्टता करते हैं। बाद में वे दण्डित किये जाते हैं, या पशु के रूप में पुनर्जन्म लेते हैं। अविश्वासियों में से अधिकतर प्रकार के लोग इस दुष्चक्र में फँस जाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे इस बात से अनभिज्ञ होते हैं कि आध्यात्मिक दुनिया समस्त जीवित प्राणियों के अपने प्रशासन में सख्त है। चाहे तुम विश्वास करो अथवा नहीं, वह तथ्य अस्तित्व में रहता है, क्योंकि एक भी व्यक्ति या वस्तु उस दायरे से बच नहीं सकती है जो परमेश्वर अपनी आँखों से देखता है, और एक भी व्यक्ति या वस्तु उसकी स्वर्गिक आज्ञाओं और आदेशों के नियमों और उनकी सीमाओं से बच नहीं सकती है। इस प्रकार, यह साधारण सा उदाहरण हर एक को बताता है कि इस बात की परवाह किए बिना कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो अथवा नहीं, पाप करना और दुष्टता करना अस्वीकार्य है और हर कार्य के परिणाम होते हैं। जब कोई, जिसने किसी को धन का धोखा दिया है, इस प्रकार से दण्डित किया जाता है, तो ऐसा दण्ड उचित है। इस तरह के आम तौर पर देखे जाने वाले व्यवहार को आध्यात्मिक दुनिया में दण्डित किया जाता है और ऐसा दण्ड परमेश्वर के आदेशों और स्वर्गिक आज्ञाओं द्वारा दिया जाता है। इसलिए गंभीर आपराधिक और दुष्टतापूर्ण व्यवहार—बलात्कार और लूटपाट, धोखाधड़ी और कपट, चोरी और डकैती, हत्या और आगजनी, इत्यादि—और भी अधिक भिन्न-भिन्न उग्रता वाले दण्ड की श्रृंखला के अधीन किए जाते हैं। और इन भिन्न-भिन्न उग्रता वाले दंडों की श्रृंखला में क्या शामिल हैं? उनमें से कुछ उग्रता के स्तर का निर्धारण करने के लिये समय का प्रयोग करते हैं, जबकि कुछ विभिन्न तरीकों का उपयोग करके ऐसा करते हैं; और अन्य इस निर्धारण के माध्यम से करते हैं कि लोग पुनर्जन्म के बाद कहाँ जाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग गालियाँ बकने वाले होते हैं। "गालियाँ बकने वाले" किसे संदर्भित करता है? इसका अर्थ होता है प्रायः दूसरों को गाली देना और द्वेषपूर्ण भाषा का, ऐसी भाषा का उपयोग करना जो दूसरों को कोसती है। द्वेषपूर्ण भाषा क्या प्रकट करती है? यह प्रकट करती है कि उस व्यक्ति का हृदय कलुषित है। द्वेषपूर्ण भाषा जो लोगों को कोसती है, प्रायः ऐसे ही लोगों के मुख से निकलती है, और ऐसी द्वेषपूर्ण भाषा कठोर परिणाम लाती है। इन लोगों के मरने और उचित दण्ड भोग लेने के पश्चात्, उनका गूंगे के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है। कुछ लोग, जब वे जीवित रहते हैं, तो बडे चौकस रहते हैं, वे प्रायः दूसरों का लाभ उठाते हैं, उनकी छोटी-छोटी योजनाएँ विशेषरूप से सुनियोजित होती हैं, और वे लोगों को बहुत नुकसान पहुँचती हैं। जब उनका पुनर्जन्म होता है, तो वे मूर्ख या मानसिक रूप से विकलांग हो सकते हैं। कुछ लोग दूसरों के निजी जीवन में अक्सर ताक-झाँक करते हैं; उनकी आँखें बहुत सा वह भी देखती हैं जिसकी जानकारी उन्‍हें नहीं होना चाहिए, और वे ऐसा बहुत कुछ जान लेते हैं जो उन्हें नहीं जानना चाहिए। नतीजतन, जब उनका पुनर्जन्म होता है, तो वे अन्धे हो सकते हैं। कुछ लोग जब जीवित होते हैं तो बहुत फुर्तीले होते हैं, वे प्रायः झगड़ते हैं और बहुत दुष्टता करते हैं। इसलिए वे विकलांग, लंगड़े, एक बाँह विहीन के रूप में पुनर्जन्म ले सकते हैं; या वे कुबड़े, या टेढ़ी गर्दन वाले, लचक कर चलने वाले के रूप में पुनर्जन्म ले सकते हैं या उनका एक पैर दूसरे की अपेक्षा छोटा हो सकता है, इत्यादि। इसमें, उन्हें अपने जीवित रहने के दौरान की गई दुष्टता के स्तर के आधार पर विभिन्न दण्डों के अधीन किया गया है। तुम लोगों को क्या लगता है कि कुछ लोग भेंगे क्यों होते हैं? क्या ऐसे काफी लोग हैं? आजकल ऐसे बहुत से लोग हैं। कुछ लोग इसलिए भेंगे होते हैं क्योंकि अपने विगत जीवन में उन्होंने अपनी आँखों का बहुत अधिक उपयोग किया था और बहुत से बुरे कार्य किए थे, और इसलिए इस जीवन में उनका जन्म भेंगे के रूप में होता है और गंभीर मामलों में वे अन्धे भी जन्मे हैं। यह प्रतिफल है! कुछ लोग अपनी मृत्यु से पूर्व दूसरों के साथ बहुत अच्छी तरह से निभाते हैं; वे अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, साथियों, या उनसे जुड़ें लोगों के लिए कई अच्छे कार्य करते हैं। वे दूसरों को दान देते हैं और उनकी सहायता करते हैं, या आर्थिक रुप से उनकी सहायता करते हैं, लोग उनके बारे में बहुत अच्छी राय रखते हैं। जब ऐसे लोग आध्यात्मिक दुनिया में वापस आते है तब उन्हें दंडित नहीं किया जाता है। किसी अविश्वासी को किसी भी प्रकार से दण्डित नहीं किए जाने का अर्थ है कि वह बहुत अच्छा इन्सान था। परमेश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने के बजाय, वे केवल आकाश में वृद्ध व्यक्ति पर विश्वास करते हैं। ऐसा व्यक्ति केवल इतना ही विश्वास करता है कि उससे ऊपर कोई आत्मा है जो हर उस चीज़ को देखती है जो वह करता है—बस यही है जिसमें यह व्यक्ति विश्वास रखता है। इसका परिणाम होता है कि यह व्यक्ति कहीं बेहतर व्यवहार वाला होता। ये लोग दयालु और परोपकारी होते हैं और जब अन्ततः वे आध्यात्मिक दुनिया में लौटते हैं, तो वह उनके साथ बहुत अच्छा व्यवहार करेगी और शीघ्र ही उनका पुनर्जन्म होगा। जब वे पुनः पैदा होंगे, तो वे किस प्रकार के परिवारों में आएँगे? यद्यपि वे परिवार धनी नहीं होंगे, किन्तु वे किसी नुकसान से मुक्त होंगी, इसके सदस्यों के बीच समरसता होगी; पुनर्जन्म पाए ये लोग अपने दिन सुरक्षा, खुशहाली में गुज़रेंगे और हर कोई आनंदमय होगा, और अच्छा जीवन जिएगा। जब ये लोग प्रौढ़ावस्था में पहुँचेंगे, तो उनके बड़े, भरे-पूरे परिवार होंगे, उनकी संतानें बुद्धिमान होंगी और सफलता का आनंद लेंगी, और उनके परिवार सौभाग्य का आनन्द लेंगे—और इस तरह का परिणाम बहुत हद तक इन लोगों के विगत जीवन से जुड़ा होता है। कहने का आशय है कि, कोई व्यक्ति मरने के बाद कहाँ जाता है और कहाँ उसका पुनर्जन्म होता है, वह पुरुष होगा अथवा स्त्री, उसका ध्येय क्या है, जीवन में वह किन परिस्थितियों से गुज़रेगा, उसे कौनसी असफलताएँ मिलेंगी, वह किन आशीषों का सुख भोगेगा, वह किनसे मिलेगा और उसके साथ क्या होगा—कोई भी इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता है, इससे बच नहीं सकता है, या इससे छुप नहीं सकता है। कहने का अर्थ है कि, तुम्हारा जीवन निश्चित कर दिए जाने के पश्चात्, तुम्हारे साथ जो भी होता है उसमें—तुम इससे बचने का कैसा भी, किसी भी साधन से प्रयास करो—आध्यात्मिक दुनिया में परमेश्वर ने तुम्हारे लिये जो जीवन पथ निर्धारित कर दिया है उसके उल्लंघन का तुम्हारे पास कोई उपाय नहीं है। क्योंकि जब तुम पुनर्जन्म लेते हो, तो तुम्हारे जीवन का भाग्य पहले ही निश्चित किया जा चुका होता है। चाहे वह अच्छा हो अथवा बुरा, प्रत्येक को इसका सामना करना चाहिए, और आगे बढते रहना चाहिए। यह एक ऐसा मुद्दा है जिससे इस संसार में रहने वाला कोई भी बच नहीं सकता है, और कोई भी मुद्दा इससे अधिक वास्तविक नहीं है। मैं जो भी कहता रहा हूँ, तुम सब वह सब समझ गए हो, ठीक है न?

इन बातों को समझ लेने के बाद, क्या अब तुम लोगों ने देखा कि परमेश्वर के पास अविश्वासियों के जीवन और मृत्यु के चक्र के लिए बिल्कुल सटीक और कठोर जाँच और व्यवस्था है? सबसे पहले, उसने आध्यात्मिक राज्य में विभिन्न स्वर्गिक आज्ञाएँ, आदेश और प्रणालियाँ स्थापित की हैं, और एक बार इनकी घोषणा हो जाने के बाद, आध्यात्मिक दुनिया के विभिन्न आधिकारिक पदों के प्राणियों के द्वारा, परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किए गए अनुसार, उन्हें बहुत कड़ाई से कार्यान्वित किया जाता है, और कोई भी उनका उल्लंघन करने का साहस नहीं करता है। और इसलिए, मनुष्य के संसार में मानवजाति के जीवन और मृत्यु के चक्र में, चाहे कोई पशु के रूप में पुनर्जन्म ले या इंसान के रूप में, दोनों के लिए नियम हैं। क्योंकि ये नियम परमेश्वर की ओर से आते हैं, इसलिए उन्हें तोड़ने का कोई साहस नहीं करता है, न ही कोई उन्हें तोडने में समर्थ है। यह केवल परमेश्वर की इस संप्रभुता की वजह से है, और चूंकि ऐसे नियम अस्तित्व में हैं, इसलिए यह भौतिक संसार, जिसे लोग देखते हैं नियमित और व्यवस्थित है; यह केवल परमेश्वर की इस संप्रभुता के कारण ही है कि मनुष्य उस दूसरे संसार के साथ शान्ति से रहने में समर्थ है जो मानवजाति के लिए पूर्णरूप से अदृश्य है और इसके साथ समरसता से रहने में सक्षम है—जो पूर्ण रूप से परमेश्वर की संप्रभुता से अभिन्‍न है। व्यक्ति के दैहिक जीवन की मृत्यु के पश्चात्, आत्मा में अभी भी जीवन रहता है, और इसलिए यदि वह परमेश्वर के प्रशासन के अधीन नहीं होती तो क्या होता? आत्मा हर स्थान पर भटकती रहती, हर स्थान में हस्तक्षेप करती, और यहाँ तक कि मनुष्य के संसार में जीवित प्राणियों को भी हानि पहुँचाती। ऐसी हानि केवल मानवजाति को ही नहीं पहुँचाई जाती, बल्कि वनस्पति और पशुओं की ओर भी पहुँचाई जा सकती थी—लेकिन सबसे पहले हानि लोगों को पहुँचती। यदि ऐसा होता—यदि ऐसी आत्मा प्रशासनरहित होती, वाकई लोगों को हानि पहुँचाती, और वाकई दुष्टता के कार्य करती—तो ऐसी आत्मा का भी आध्यात्मिक दुनिया में ठीक से निपटान किया जाता: यदि चीज़ें गंभीर होती तो शीघ्र ही आत्मा का अस्तित्व समाप्त हो जाता और उसे नष्ट कर दिया जाता। यदि संभव हुआ तो, उसे कहीं रख दिया जाएगा और फिर उसका पुनर्जन्म होगा। कहने का आशय है कि, आध्यात्मिक दुनिया में विभिन्न आत्माओं का प्रशासन व्यवस्थित होता है, और उसे चरणबद्ध तरीके से तथा नियमों के अनुसार किया जाता है। यह केवल ऐसे प्रशासन के कारण ही है कि मनुष्य का भौतिक संसार अराजकता में नहीं पड़ा है, कि भौतिक संसार के मनुष्य एक सामान्य मानसिकता, साधारण तर्कशक्ति और एक व्यवस्थित दैहिक जीवन धारण करते हैं। मानवजाति के केवल ऐसे सामान्य जीवन के बाद ही वे जो देह में रहते हैं, वे पनपते रहना और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संतान उत्पन्न करना जारी रखने में समर्थ हो सकते हैं।

अभी-अभी तुमने जिन वचनों को सुना है, उनके बारे में तुम क्या सोचते हो? क्या वे तुम्हारे लिए नये हैं? आज के संगति के विषयों ने तुम पर कैसी छाप छोड़ी है? उनकी नवीनता के अतिरिक्त क्या तुम कुछ और महसूस करते हो? (लोगों को अच्छे व्यवहार वाला होना चाहिए, और हम देख सकते हैं कि परमेश्वर महान है और उस पर श्रद्धा रखी जानी चाहिए।) (विभिन्न प्रकार के लोगों के अंत की व्यवस्था परमेश्वर कैसे करता है इस बारे में अभी-अभी परमेश्वर की संगति सुनने के बाद, एक तरह से मुझे लगता है कि उसका स्वभाव किसी अपराध की अनुमति नहीं देता, और यह कि मुझे उस पर श्रद्धा रखनी चाहिए; और दूसरी तरह से, मैं जानता हूँ कि परमेश्वर किस प्रकार के लोगों को पसंद करता है, और किस प्रकार के लोगों को पसंद नहीं करता है, और इसलिए मैं उनमें से एक बनना चाहूँगा जिन्हें वह पसंद करता है।) क्या तुम लोग देखते हो कि परमेश्वर इस क्षेत्र में अपने कार्यों में उच्च सिद्धान्तों वाला है? वे कौन से सिद्धांत हैं जिनके द्वारा वह कार्य करता है? (लोग जो कार्य करते हैं उन्हीं के अनुसार वह लोगों का अन्त तय करता है।) यह अविश्वासियों के विभिन्न अंतों के बारे में है जिनकी हमने अभी-अभी बात की है। जब अविश्वासियों की बात आती है, तो क्या परमेश्वर की कार्रवाइयों के पीछे अच्छों को पुरस्कृत करने और दुष्टों को दण्ड देने का सिद्धांत है? क्या कोई अपवाद हैं? (नहीं।) क्या तुम लोग देखते हो कि परमेश्वर की कार्यवाइयों के पीछे एक सिद्धांत है? अविश्वासी वास्तव में परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, न ही वे परमेश्वर के आयोजनों का पालन करते हैं। इसके अलावा वे उसकी संप्रभुता से अनभिज्ञ हैं, उसे स्वीकार तो बिल्कुल नहीं करते हैं। अधिक गंभीर बात यह है कि वे परमेश्वर की निन्दा करते हैं और उसे कोसते हैं, और उन लोगों के प्रति शत्रुतापूर्ण होते हैं जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। परमेश्वर के प्रति उनके ऐसे रवैये के बावजूद, उनके प्रति परमेश्वर का प्रशासन अपने सिद्धांतो से विचलित नहीं होता है; वह अपने सिद्धांतों और अपने स्वभाव के अनुसार व्यवस्थित रूप से उन्हें प्रशासित करता है। उनकी शत्रुता को वह किस प्रकार लेता है? अज्ञानता के रूप में! नतीजतन, उसने इन लोगों का—अविश्वासियों में से अधिकतर का—अतीत में एक बार पशु के रूप में पुनर्जन्म करवाया है। तो परमेश्वर की नज़रों में अविश्वासी सही मायने में हैं क्या? वे सब जंगली जानवर हैं। परमेश्वर जंगली जानवरों और साथ ही मानवजाति को प्रशासित करता है, और इस प्रकार के लोगों के लिए उसके सिद्धांत एक समान हैं। यहाँ तक कि इन लोगों के उसके प्रशासन में उसके स्वभाव को अभी भी देखा जा सकता है, जैसा कि सभी चीज़ों पर उसके प्रभुत्व के पीछे उसकी व्यवस्थाओं को देखा जा सकता है। और इसलिए, क्या तुम उन सिद्धांतों में परमेश्वर की संप्रभुता को देखते हो जिनके द्वारा वह उन अविश्वासियों को प्रशासित करता है जिसका मैंने अभी-अभी उल्लेख किया है? क्या तुम परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को देखते हो? (हम देखते हैं।) दूसरे शब्दों में, चाहे वह किसी भी चीज़ से क्यों न निपटे, परमेश्वर अपने सिद्धांतों और स्वभाव के अनुसार कार्य करता है। यही परमेश्वर का सार है; वह उन आदेशों या स्वर्गिक आज्ञाओं को यूँ ही कभी नहीं तोड़ेगा जो उसने स्थापित किए हैं सिर्फ इसलिए कि वह ऐसे लोगों को जंगली जानवर मानता है। परमेश्वर ज़रा भी लापरवाही के बिना, सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है और उसकी कार्रवाइयाँ किसी भी कारक से अप्रभावित रहती हैं। वह जो भी करता है, वह सब उसके स्वयं के सिद्धांतों के अनुपालन में होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के पास स्वयं परमेश्वर का सार है; यह उसके सार का एक पहलू है, जो किसी सृजित किए गए प्राणी के पास नहीं होता है। परमेश्वर हर वस्तु, हर व्यक्ति, और सभी जीवित चीज़ों के बीच जो उसने सृजित की हैं, अपनी सँभाल में, उनके प्रति अपने दृष्टिकोण में, प्रबंधन में, प्रशासन में, और उन पर शासन में न्यायपरायण और उत्तरदायी है, और इसमें वह कभी भी लापरवाह नहीं रहा है। जो अच्छे हैं, वह उनके प्रति कृपापूर्ण और दयावान है; जो दुष्ट हैं, उन्हें वह निर्दयता से दंड देता है; और विभिन्न जीवित प्राणियों के लिए, वह समयबद्ध और नियमित तरीके से, विभिन्न समयों पर मनुष्य संसार की विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार उचित व्यवस्थाएँ करता है, इस तरह से कि ये विभिन्न जीवित प्राणी उन भूमिकाओं के अनुसार जो वे निभाते हैं व्यवस्थित रूप से जन्म लेते रहें, और एक विधिवत तरीके से भौतिक जगत और आध्यात्मिक दुनिया के बीच चलते रहें।

एक जीवित प्राणी की मृत्यु—दैहिक जीवन का अंत—यह दर्शाता है कि एक जीवित प्राणी भौतिक संसार से आध्यात्मिक दुनिया में चला गया है, जबकि एक नए दैहिक जीवन का जन्म यह दर्शाता है कि एक जीवित प्राणी आध्यात्मिक दुनिया से भौतिक संसार में आया है और उसने अपनी भूमिका ग्रहण करना और उसे निभाना आरम्भ कर दिया है। चाहे एक जीवित प्राणी का प्रस्थान हो या आगमन, दोनों आध्यात्मिक दुनिया के कार्य से अवियोज्य हैं। जब तक कोई व्यक्ति भौतिक संसार में आता है, तब तक परमेश्वर द्वारा आध्यात्मिक दुनिया में उस परिवार, जिसमें वह जाता है, उस युग में जिसमें उसे आना है, उस समय जब उसे आना है, और उस भूमिका की, जो उसे निभानी है, की उचित व्यवस्थाएँ और विशेषताएँ पहले ही तैयार की जा चुकी होती हैं। इसलिए इस व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन—जो काम वह करता है, और जो मार्ग वह चुनता है—जरा से भी विचलन के बिना, आध्यात्मिक दुनिया में की गई व्यवस्थाओं के अनुसार चलेगा। इसके अतिरिक्त, जिस समय दैहिक जीवन समाप्त होता है और जिस तरह और जिस स्थान पर यह समाप्त होता है, आध्यात्मिक दुनिया के सामने वह स्पष्ट और प्रत्यक्ष होता है। परमेश्वर भौतिक संसार पर शासन करता है, और वह आध्यात्मिक दुनिया पर भी शासन करता है, और वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के साधारण चक्र को विलंबित नहीं करेगा, न ही वह किसी आत्मा के जीवन और मृत्यु के चक्र के प्रबंधन में कभी भी कोई त्रुटि कर सकता है। आध्यात्मिक दुनिया के आधिकारिक पदों के सभी नाज़िर अपने व्यक्तिगत कार्यों को कार्यान्वित करते हैं, और परमेश्वर के निर्देशों और नियमों के अनुसार वह करते हैं जो उन्हें करना चाहिए। इस प्रकार, मानवजाति के संसार में, मनुष्य द्वारा देखी गई कोई भी भौतिक घटना व्यवस्थित होती है, और उसमें कोई अराजकता नहीं होती है। यह सब कुछ सभी चीज़ों पर परमेश्वर के व्यवस्थित शासन की वजह से है, और साथ ही इस तथ्य के कारण है कि उसका अधिकार प्रत्येक वस्तु पर शासन करता है। उसके प्रभुत्व में वह भौतिक संसार जिसमें मनुष्य रहता है, और, इसके अलावा, मनुष्य के पीछे की वह अदृश्य आध्यात्मिक दुनिया शामिल है। इसलिए, यदि मनुष्य अच्छा जीवन चाहते हैं, और अच्छे परिवेश में रहने की आशा रखते हैं, तो सम्पूर्ण दृश्य भौतिक जगत प्रदान किए जाने के अलावा, मनुष्य को वह आध्यात्मिक दुनिया भी अवश्य प्रदान की जानी चाहिए, जिसे कोई देख नहीं सकता है, जो मानवजाति की ओर से प्रत्येक जीवित प्राणी को संचालित करती है और जो व्यवस्थित है। इस प्रकार, यह कहने के बाद कि परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है, क्या हमने "सभी चीज़ों" के अर्थ की अपनी जानकारी और समझ को नहीं बढ़ाया है? (हाँ।)

2. विभिन्न आस्था वाले लोगों का जीवन और मृत्यु का चक्र

हमने अभी-अभी पहली श्रेणी के लोगों, यानी अविश्वासियों के जीवन और मृत्यु के चक्र के बारे में चर्चा की। अब आओ हम द्वितीय श्रेणी के, यानी विभिन्न आस्था वाले लोगों के बारे में चर्चा करें। "विभिन्न आस्था वाले लोगों का जीवन और मृत्यु चक्र" एक अन्य महत्वपूर्ण विषय है, और यह अत्यंत आवश्यक है कि तुम लोग इस बारे में कुछ समझो। पहले, आओ हम इस बारे में बात करें कि "आस्था वाले लोगों" में "आस्था" यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, कैथोलिक धर्म, इस्लाम और बौद्ध धर्म, इन पाँच प्रमुख धर्मों को संदर्भित करती है। अविश्वासियों के अतिरिक्त, जो लोग इन पाँच धर्मों में विश्वास करते हैं, उनका विश्व की जनसंख्या में एक बड़ा अनुपात है। इन पाँच धर्मों के बीच, जिन्होंने अपने विश्वास से आजीविका बनाई है, वे बहुत थोड़े-से हैं, फिर भी इन धर्मों के बहुत अनुयायी हैं। जब वे मरते हैं, तो भिन्न स्थान पर जाते हैं। किससे "भिन्न"? अविश्वासियों से, यानी उन लोगों से, जिनकी कोई आस्था नहीं है, जिनके बारे में हम अभी-अभी बात कर रहे थे। मरने के बाद, इन पाँचों धर्मों के विश्वासी किसी अन्य स्थान पर जाते हैं, अविश्वासियों के स्थान से भिन्न किसी स्थान पर। किंतु प्रक्रिया एकसमान होती है; आध्यात्मिक दुनिया उनके बारे में उस सबके आधार पर निर्णय करेगी, जो उन्होंने मरने से पहले किया था, उसके पश्चात् तदनुसार उनकी प्रक्रिया की जाएगी। परंतु प्रक्रिया करने के लिए इन लोगों को किसी अन्य स्थान पर क्यों भेजा जाता है? इसका एक महत्वपूर्ण कारण है। क्या है वह कारण? मैं तुम लोगों को इसे एक उदाहरण से समझाऊँगा। किंतु इससे पहले कि मैं बताऊँ, तुम स्वयं सोच रहे होगे : "ऐसा शायद इसलिए होगा, क्योंकि परमेश्वर में उनका कम विश्वास होगा! वे पूर्ण विश्वासी नहीं होंगे।" किंतु यह कारण नहीं है। उन्हें दूसरों से अलग रखने का एक महत्वपूर्ण कारण है।

उदाहरण के लिए, बौद्ध धर्म को लो : मैं तुम्हें एक तथ्य बताता हूँ। एक बौद्ध, सबसे पहले, वह व्यक्ति है, जो बौद्ध धर्म में धर्मांतरित हो गया है, और वह ऐसा व्यक्ति है, जो जानता है कि उसका विश्वास क्या है। जब बौद्ध अपने बाल कटवाते हैं और भिक्षु या भिक्षुणी बनते हैं, तो इसका अर्थ है कि उन्होंने अपने आपको लौकिक संसार से पृथक कर लिया है और मानव-जगत के कोलाहल को बहुत पीछे छोड़ दिया है। प्रतिदिन वे सूत्रों का उच्चारण करते हैं और बुद्ध के नामों का जाप करते हैं, केवल शाकाहारी भोजन करते हैं, तपस्वी का जीवन व्यतीत करते हैं, और अपने दिन तेल के दीये की ठंडी, क्षीण रोशनी में गुजारते हैं। वे अपना सारा जीवन इसी प्रकार व्यतीत करते हैं। जब उनका भौतिक जीवन समाप्त होता है, वे अपने जीवन का सारांश बनाते हैं, परंतु अपने हृदय में उन्हें पता नहीं होता कि मरने के बाद वे कहाँ जाएँगे, किससे मिलेंगे, या उनका अंत क्या होगा—अपने हृदय की गहराई में उन्हें इन चीज़ों के बारे स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। उन्होंने अपने पूरे जीवन में आँख मूँदकर एक प्रकार का विश्वास करने से अधिक कुछ नहीं किया होता, जिसके पश्चात् वे अपनी अंधी इच्छाओं और आदर्शों के साथ इस संसार से चले जाते हैं। ऐसा होता है एक बौद्ध के भौतिक जीवन का अंत, जब वह जीवित संसार को छोड़ता है; उसके बाद वह आध्यात्मिक दुनिया में अपने मूल स्थान पर वापस लौट जाता है। पृथ्वी पर वापस लौटने और अपनी स्व-साधना करते रहने के लिए इस व्यक्ति का पुनर्जन्म होगा या नहीं, यह मृत्यु से पहले के उसके आचरण और अभ्यास पर निर्भर करता है। यदि अपने जीवन-काल में उन्होंने कुछ ग़लत नहीं किया, तो शीघ्र ही उनका पुनर्जन्म हो जाएगा और उन्हें पृथ्वी पर वापस भेज दिया जाएगा, जहाँ वे एक बार फिर भिक्षु या भिक्षुणी बनेंगे। अर्थात्, वे स्वयं द्वारा अपने भौतिक जीवन में पहली बार की गई स्व-साधना के अनुरूप स्व-साधना का अभ्यास करते हैं, और अपने भौतिक जीवन की समाप्ति के बाद वे फिर आध्यात्मिक दुनिया में लौट जाते हैं, जहाँ उनकी जाँच की जाती है। इसके बाद यदि कोई समस्या नहीं पाई जाती, तो वे एक बार फिर मनुष्यों के संसार में लौट सकते हैं, और फिर से बौद्ध धर्म में धर्मांतरित हो सकते हैं और इस प्रकार अपना अभ्यास जारी रख सकते हैं। तीन से सात बार तक पुनर्जन्म लेने के बाद वे एक बार फिर से आध्यात्मिक दुनिया में लौटते हैं, जहाँ अपने भौतिक जीवन की समाप्ति पर वे हर बार जाते हैं। यदि मानव-जगत में उनकी विभिन्न योग्यताएँ और उनके व्यवहार आध्यात्मिक दुनिया की स्वर्गिक आज्ञाओं के मुताबिक होते हैं, तो इसके बाद वे वहीं रहेंगे; उनका फिर मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म नहीं होगा, न ही उन्हें पृथ्वी पर बुरे कार्यों के लिए दंडित किए जाने का कोई जोखिम होगा। उन्हें फिर कभी इस प्रक्रिया से नहीं गुजरना होगा। इसके बजाय, अपनी परिस्थितियों के अनुसार, वे आध्यात्मिक राज्य में कोई पद ग्रहण करेंगे। इसे ही बौद्ध लोग "बुद्धत्व की प्राप्ति" कहते हैं। बुद्धत्व की प्राप्ति का मुख्य रूप से अर्थ है आध्यात्मिक दुनिया के एक पदाधिकारी के रूप में कर्मफल प्राप्त करना, और उसके बाद पुनर्जन्म लेने या दंड भोगने का कोई जोखिम न होना। इसके अतिरिक्त, इसका अर्थ है कि पुनर्जन्म के बाद मनुष्य होने के कष्ट अब और न भोगना। तो क्या अभी भी उनका पशु के रूप में पुनर्जन्म होने की कोई संभावना है? (नहीं।) इसका मतलब है कि वे कोई भूमिका ग्रहण करने के लिए आध्यात्मिक दुनिया में ही बने रहेंगे और उनका पुनर्जन्म नहीं होगा। बौद्ध धर्म में बुद्धत्व के कर्मफल की प्राप्ति का यह एक उदाहरण है। जहाँ तक यह कर्मफल प्राप्त न करने वालों की बात है, आध्यात्मिक दुनिया में उनके लौटने पर वे संबंधित पदाधिकारी द्वारा जाँच और सत्यापन के भागी होते हैं, जो यह पता लगाता है कि जीवित रहते हुए उन्होंने परिश्रमपूर्वक स्व-साधना का अभ्यास नहीं किया था या ईमानदारी से बौद्ध धर्म द्वारा निर्धारित सूत्रों का पाठ और बुद्ध के नामों का जाप नहीं किया था; इसके बजाय, उन्होंने कई दुष्कर्म किए थे, और वे बहुत सारे दुष्ट आचरणों में संलग्न रहे थे। तब आध्यात्मिक दुनिया में उनके बुरे कार्यों के बारे में निर्णय लिया जाता है, जिसके बाद उन्हें दंडित किया जाना निश्चित होता है। इसमें कोई अपवाद नहीं होता। तो इस प्रकार का व्यक्ति कब कर्मफल प्राप्त कर सकता है? उस जीवन-काल में, जब वे कोई बुरा कार्य नहीं करते—जब आध्यात्मिक दुनिया में लौटने के पश्चात् यह देखा जाता है कि उन्होंने मृत्यु से पूर्व कुछ ग़लत नहीं किया था। तब वे पुनर्जन्म लेते रहते हैं, सूत्रों का पाठ और बुद्ध के नामों का जाप करते रहते हैं, अपने दिन तेल के दीये के ठंडे और क्षीण प्रकाश में गुज़ारते रहते हैं, किसी जीव की हत्या नहीं करते या मांस नहीं खाते। वे मनुष्य के संसार में हिस्सा नहीं लेते, उसकी समस्याओं को बहुत पीछे छोड़ देते हैं, और दूसरों के साथ कोई विवाद नहीं करते। इस प्रक्रिया में, यदि उन्होंने कोई बुरा कार्य नहीं किया होता, तो आध्यात्मिक दुनिया में उनके लौटकर आने और उनके समस्त क्रियाकलापों और व्यवहार की जाँच हो चुकने के बाद उन्हें तीन से सात बार तक चलने वाले जीवन-चक्र के लिए एक बार पुनः मनुष्य के संसार में भेजा जाता है। यदि इस दौरान कोई कदाचार नहीं किया गया होता, तो बुद्धत्व की उनकी प्राप्ति अप्रभावित रहेगी, और विलंबित नहीं होगी। यह समस्त आस्था वाले लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र का एक लक्षण है : वे "कर्मफल प्राप्त" करने और आध्यात्मिक संसार में कोई पद प्राप्त करने में समर्थ होते हैं; यही बात है, जो उन्हें अविश्वासियों से अलग बनाती है। पहली बात, जब वे अभी भी पृथ्वी पर जी रहे होते हैं, तो आध्यात्मिक दुनिया में पद ग्रहण करने में सक्षम रहने वाले लोग कैसा आचरण करते हैं? उन्हें निश्चित करना चाहिए कि वे कोई भी बुरा कार्य बिल्कुल न करें : उन्हें हत्या, आगजनी, बलात्कार या लूटपाट नहीं करनी चाहिए; यदि वे कपट, धोखाधड़ी, चोरी या डकैती में संलग्न होते हैं, तो वे कर्मफल प्राप्त नहीं कर सकते। कहने का अर्थ है कि, यदि कुकर्म से उनका कोई भी संबंध या संबद्धता है, तो वे आध्यात्मिक दुनिया द्वारा उन्हें दिए जाने वाले दंड से बच नहीं पाएँगे। आध्यात्मिक दुनिया उन बौद्धों के लिए उचित प्रबंध करती है, जो बुद्धत्व प्राप्त करते हैं : उन्हें उन लोगों को प्रशासित करने के लिए नियुक्त किया जा सकता है, जो बौद्ध धर्म में और आकाश के वृद्ध मनुष्य पर विश्वास करते प्रतीत होते हैं—उन्हें एक अधिकार-क्षेत्र आबंटित किया जा सकता है। वे केवल अविश्वासियों के प्रभारी भी हो सकते हैं, या बहुत गौण कर्तव्यों वाले पदों पर भी हो सकते हैं। ऐसा आबंटन उनकी आत्माओं की विभिन्न प्रकृतियों के अनुसार होता है। यह बौद्ध धर्म का एक उदाहरण है।

हमने जिन पाँच धर्मों की बात की है, उनमें ईसाई धर्म अपेक्षाकृत विशेष है। ईसाइयों को विशेष क्या बनाता है? ये वे लोग हैं, जो सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं। जो लोग सच्चे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें यहाँ कैसे सूचीबद्ध किया जा सकता है? यह कहने पर कि ईसाइयत एक प्रकार की आस्था है, निःसंदेह यह केवल आस्था से करनी होगी; वह केवल एक प्रकार का अनुष्ठान, एक प्रकार का धर्म होगी, और उन लोगों की आस्था से बिलकुल अलग चीज़ होगी, जो ईमानदारी से परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। मेरे द्वारा ईसाइयत को पाँच प्रमुख "धर्मों" के बीच सूचीबद्ध किए जाने का कारण यह है, कि इसे भी यहूदी, बौद्ध और इस्लाम धर्मों के स्तर तक घटा दिया गया है। यहाँ अधिकतर लोग इस बात पर विश्वास नहीं करते कि कोई परमेश्वर है, या यह कि वह सभी चीज़ों पर शासन करता है, उसके अस्तित्व पर तो वे बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते। इसके बजाय, वे मात्र धर्मशास्त्र की चर्चा करने के लिए केवल धर्मग्रंथों का उपयोग करते हैं, और लोगों को दयालु बनना, कष्ट सहना और अच्छे कार्य करना सिखाने के लिए धर्मशास्त्र का उपयोग करते हैं। ईसाइयत इसी प्रकार का धर्म बन गया है : यह केवल धर्मशास्त्र संबंधी सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करता है, मनुष्य का प्रबंधन करने या उसे बचाने के परमेश्वर के कार्य से इसका बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है। यह उन लोगों का धर्म बन गया है, जो परमेश्वर का अनुसरण तो करते हैं, पर जिन्हें वास्तव में परमेश्वर द्वारा अंगीकार नहीं किया जाता। ऐसे लोगों के प्रति अपने दृष्टिकोण में परमेश्वर के पास भी एक सिद्धांत है। वह उन्हें अपनी मर्जी से उसी तरह बेमन से नहीं सँभालता या उनसे उसी तरह बेमन से नहीं निपटता, जैसा कि वह अविश्वासियों के साथ करता है। वह उनके साथ वैसा ही व्यवहार करता है, जैसा कि वह बौद्धों के साथ करता है : यदि जीवित रहते हुए कोई ईसाई आत्मानुशासन का पालन कर पाता है, कठोरता से दस आज्ञाओं का पालन करता है और व्यवस्थाओं और आज्ञाओं के अनुसार परिश्रमपूर्वक व्यवहार करता है, और जीवन भर इन पर दृढ़ रह सकता है, तो उन्हें भी वास्तव में तथाकथित "स्वर्गारोहण" प्राप्त कर पाने से पहले उतना ही समय जीवन और मृत्यु के चक्र से गुज़ारना होगा। इस स्वर्गारोहण को प्राप्त करने के पश्चात्, वे आध्यात्मिक दुनिया में बने रहते हैं, जहाँ वे कोई पद लेते हैं और उसके एक पदाधिकारी बन जाते हैं। इसी प्रकार, यदि वे पृथ्वी पर बुराई करते हैं, यदि वे बहुत पापी हैं और बहुत पाप करते हैं, तब वे भिन्न-भिन्न तीव्रता से दंडित और अनुशासित किए जाएँगे। बौद्ध धर्म में कर्मफल की प्राप्ति का अर्थ है परमानंद की शुद्ध भूमि पर से गुज़रना, किंतु ईसाइयत में इसे क्या कहा जाता है? इसे "स्वर्ग में प्रवेश करना" और "स्वर्गारोहण करवाया जाना" कहते हैं। जिन्हें वास्तव में स्वर्गारोहण करवाया जाता है, वे भी जीवन और मृत्यु के चक्र से तीन से सात बार तक गुज़रते हैं, जिसके पश्चात्, मर जाने पर, वे आध्यात्मिक दुनिया में आते हैं, मानो वे सो गए थे। यदि वे मानक के अनुरूप होते हैं, तो वे कोई पद ग्रहण करने के लिए वहाँ बने रह सकते हैं, और पृथ्वी पर मौजूद लोगों के विपरीत, साधारण तरीके से, या परिपाटी के अनुसार, उनका पुनर्जन्म नहीं होगा।

इन सब धर्मों में, जिस अंत के बारे में लोग बात करते हैं और जिसके लिए वे प्रयास करते हैं, वह वैसा ही है जैसा कि बौद्ध धर्म में कर्मफल प्राप्त करना; फर्क सिर्फ यह है कि इसे भिन्न-भिन्न साधनों के द्वारा प्राप्त किया जाता है। वे सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। इन धर्मों के अनुयायियों के इस भाग के लिए, जो अपने आचरण में धार्मिक नियमों का कड़ाई से पालन करने में समर्थ होते हैं, परमेश्वर एक उचित गंतव्य, जाने के लिए एक उचित स्थान उपलब्ध कराता है, और उन्हें उचित प्रकार से सँभालता है। यह सब तर्कसंगत है, किंतु यह वैसा नहीं है, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं, है न? अब, ईसाइयत में लोगों का क्या होता है, इस बारे में सुनने के बाद, तुम लोग कैसा अनुभव करते हो? क्या तुम्हें लगता है कि उनकी दुर्दशा उचित है? क्या तुम उनके साथ सहानुभूति रखते हो? (थोड़ी-सी।) उनके मामले में कुछ नहीं किया सकता; वे केवल स्वयं को ही दोष दे सकते हैं। मै ऐसा क्यों कहता हूँ? परमेश्वर का कार्य सच्चा है; वह जीवित और वास्तविक है, और उसका कार्य संपूर्ण मानवजाति और प्रत्येक व्यक्ति पर लक्षित है। तो फिर वे इसे स्वीकार क्यों नहीं करते? क्यों वे पागलों की तरह परमेश्वर का विरोध करते हैं और उसे यातना देते हैं? इस तरह का परिणाम पाकर भी उन्हें स्वयं को भाग्यशाली समझना चाहिए, तो तुम उनके लिए खेद क्यों महसूस करते हो? उन्हें इस प्रकार से सँभाला जाना बड़ी सहिष्णुता दर्शाता है। जिस हद तक वे परमेश्वर का विरोध करते हैं, उसके हिसाब से तो उन्हें नष्ट कर दिया जाना चाहिए, फिर भी परमेश्वर ऐसा नहीं करता, वह बस ईसाइयत को किसी साधारण धर्म की तरह ही सँभालता है। तो क्या अन्य धर्मों के बारे में विस्तार से जाने की कोई आवश्यकता है? इन सभी धर्मों की प्रकृति है कि लोग अधिक कठिनाइयाँ सहन करें, कोई बुराई न करें, अच्छे कर्म करें, दूसरों को गाली न दें, दूसरों के बारे में निर्णय न दें, विवादों से दूर रहें, और सज्जन बनें—अधिकांश धार्मिक शिक्षाएँ इसी प्रकार की हैं। और इसलिए, यदि ये आस्था वाले लोग‌—ये विभिन्न धर्मों और पंथों वाले लोग—यदि अपने धार्मिक नियमों का कडाई से पालन कर पाते हैं, तो वे पृथ्वी पर अपने समय के दौरान बड़ी त्रुटियाँ या पाप नहीं करेंगे, और तीन से सात बार तक पुनर्जन्म लेने के बाद, सामान्यत: ये लोग—जो धार्मिक नीतियों का कड़ाई से पालन करने में सक्षम रहते हैं—आम तौर पर, आध्यात्मिक दुनिया में कोई पद लेने के लिए बने रहेंगे। क्या ऐसे बहुत लोग हैं? (नहीं, अधिक नहीं हैं।) तुम्हारा उत्तर किस बात पर आधारित है? भलाई करना या धार्मिक नियमों और व्यवस्थाओं का पालन करना आसान नहीं है। बौद्ध धर्म लोगों को मांस खाने की अनुमति नहीं देता—क्या तुम ऐसा कर सकते हो? यदि तुम्हें भूरे वस्त्र पहनकर किसी बौद्ध मंदिर में पूरे दिन मंत्रों का उच्चारण और बुद्ध के नामों का जाप करना पड़े, तो क्या तुम ऐसा कर सकोगे? यह आसान नहीं होगा। ईसाइयत में दस आज्ञाएँ, आज्ञाएँ और व्यवस्थाएँ हैं, क्या उनका पालन करना आसान है? वह आसान नहीं है। उदाहरण के लिए, दूसरों को गाली न देने को लो : लोग इस नियम का पालन करने में एकदम अक्षम हैं। स्वयं को रोक पाने में असमर्थ होकर वे गाली देते हैं—और गाली देने के बाद वे उन शब्दों को वापस नहीं ले सकते, तो वे क्या करते हैं? रात्रि में वे अपने पाप स्वीकार करते हैं! कभी-कभी दूसरों को गाली देने के बाद भी वे अपने दिल में घृणा को आश्रय दिए रहते हैं, और वे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि वे उन लोगों को किसी समय और ज्यादा नुकसान पहुँचाने की योजना बना लेते हैं। संक्षेप में, जो लोग इस जड़ धर्मांधता के बीच जीते हैं, उनके लिए पाप करने से बचना या बुराई करने से दूर रहना आसान नहीं है। इसलिए, हर धर्म में केवल कुछ लोग ही कर्मफल प्राप्त कर पाते हैं। तुम्हें लगता है कि चूँकि इतने अधिक लोग इन धर्मों का अनुसरण करते हैं, इसलिए उनका एक बड़ा भाग आध्यात्मिक राज्य में कोई भूमिका ग्रहण करने के लिए बने रहने में सक्षम रहता होगा। लेकिन ऐसे लोग उतने अधिक नहीं हैं; वास्तव में केवल कुछ ही इसे प्राप्त कर पाते हैं। आस्था वाले लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र में सामान्यतः ऐसा ही होता है। जो चीज उन्हें अलग करती है, वह यह है कि वे कर्मफल प्राप्त कर सकते हैं, और यही बात उन्हें अविश्वासियों से अलग करती है।

3. परमेश्वर के अनुयायियों का जीवन और मृत्यु चक्र

इसके बाद, आओ, अब हम उन लोगों के जीवन और मृत्यु के चक्र के बारे में बात करें जो परमेश्वर के अनुयायी हैं। इसका संबंध तुम लोगों से है, इसलिए ध्यान दो: सबसे पहले, इस बारे में विचार करो कि परमेश्वर के अनुयायियों को कैसे श्रेणीबद्ध किया जा सकता है। (परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवाकर्ता।) इसमें दरअसल दो हैं: परमेश्वर के चुने हुए लोग और सेवाकर्ता। आओ, पहले हम परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बारे में बात करते हैं, जिसमें बहुत कम लोग हैं। "परमेश्वर के चुने हुए लोग" किसे संदर्भित करता है? परमेश्वर ने जब सारी चीज़ों की रचना कर दी और मानवजाति अस्तित्व में आ गई, तो परमेश्वर ने उन लोगों के एक समूह को चुना जो उसका अनुसरण करते थे; बस इन्हें ही "परमेश्वर के चुने हुए लोग" के तौर पर संदर्भित किया जाता है। परमेश्वर द्वारा इन लोगों को चुनने का एक विशेष दायरा और महत्व था। वह दायरा इसलिए विशेष है क्योंकि वह कुछ चयनित लोगों तक ही सीमित था, जिन्हें तब आना ही होगा जब वह कोई महत्वपूर्ण कार्य करता है। और महत्व क्या है? चूँकि वह परमेश्वर द्वारा चयनित समूह था, इसका अत्यधिक महत्व है। कहने का तात्पर्य है कि, परमेश्वर इन लोगों को बनाना चाहता है और इन्हें पूर्ण करना चाहता है, और प्रबंधन का उसका कार्य पूर्ण हो जाने के पश्चात् वह इन लोगों को प्राप्त कर लेगा। क्या यह महत्व अत्यधिक नहीं है? इस प्रकार, ये चुने हुए लोग परमेश्वर के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करने का इरादा रखता है। जहाँ तक सेवाकर्ताओं की बात है, अच्छा, आओ एक पल के लिए हम हम परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण के विषय को छोडकर पहले उनके उद्गमों के बारे में बात करें। "सेवाकर्ता" का शाब्दिक अर्थ है वह जो सेवा करता है। वे जो सेवा करते हैं, वे अस्थायी हैं, वे लम्बे समय तक, या हमेशा के लिए ऐसा नहीं करते हैं, बल्कि उन्हें अस्थायी रुप से भाड़े पर लिया जाता है या नियुक्त किया जाता है। इनमें से अधिकांश का उद्गम यह है की इन्हें अविश्वासियों में से चुना गया था। जब यह आदेश दिया गया था कि वे परमेश्वर के कार्य में सेवाकर्ता की भूमिका ग्रहण करेंगे, तब वे पृथ्वी पर आए। हो सकता है कि वे अपने पिछले जीवन में पशु रहे हों, किन्तु वे अविश्वासी भी रह चुके होंगे। सेवाकर्ताओं के ये उद्गम हैं।

आओ, अब आगे हम परमेश्वर के चुने हुए लोगों की बात करें। जब वे मरते हैं, तो वे अविश्वासियों से और विभिन्न आस्थावान लोगों से बिल्कुल भिन्न किसी स्थान पर जाते हैं। यह वह स्थान है जहाँ उनके साथ स्वर्गदूत और परमेश्वर के दूत होते हैं; यह एक ऐसा स्थान है जिसका प्रशासन परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से करता है। यद्यपि, इस स्थान पर, परमेश्वर के चुने हुए लोग परमेश्वर को अपनी आंखों से नहीं देख पाते हैं, यह आध्यात्मिक राज्य में किसी भी अन्य स्थान के असदृश होता है; यह एक अलग ही जगह है जहाँ इस हिस्से के लोग मरने के बाद जाते हैं। जब वे मरते हैं तो उन्हें भी परमेश्वर के दूतों की कड़ी छानबीन के अधीन किया जाता है। और क्या छानबीन की जाती है? परमेश्वर के दूत इन लोगों के द्वारा अपने संपूर्ण जीवन में परमेश्वर की आस्था में लिए गए मार्ग की छानबीन करते हैं, उस दौरान क्या कभी उन्होंने परमेश्वर का विरोध किया था या उसे कोसा था, और क्या उन्होंने कोई गंभीर पाप या दुष्टता की थी। यह छानबीन इस प्रश्न का निपटान करती है कि वह व्यक्ति विशेष वहाँ ठहरने की अनुमति पाएगा या उसे जाना ही होगा। "जाना" का क्या अर्थ है? और "ठहरना" का क्या अर्थ है? "जाना" का अर्थ है कि क्या, अपने व्यवहार के आधार पर, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों की श्रेणी में रहेंगे; "ठहरने" की अनुमति मिलने का अर्थ है कि वे उन लोगों के बीच रह सकते हैं जिन्हें परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूर्ण बनाया जाएगा। जो ठहरते हैं, उनके लिए परमेश्वर के पास विशेष व्यवस्थाएँ है। अपने कार्य की प्रत्येक अवधि के दौरान, वह ऐसे लोगों को प्रेरितों के रूप में कार्य करने या कलीसियाओं को पुनर्जीवित करने, या उनकी देखभाल करने का कार्य करने के लिए भेजेगा। परन्तु जो लोग इस कार्य को करने में सक्षम हैं वे पृथ्वी पर बार-बार उस तरह से पुनर्जन्म नहीं लेते हैं जिस तरह से अविश्वासी जन्म लेते हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनर्जन्म लेते हैं; इसके बजाय, वे परमेश्वर के कार्य की आवश्यकताओं और चरणों के अनुसार पृथ्वी पर लौटाए जाते हैं और उन्हें बार-बार पुनर्जन्म नहीं दिया जाता है। तो क्या इस बारे में कोई नियम हैं कि उनका पुनर्जन्म कब होगा? क्या वे हर कुछ वर्षो में एक बार आते हैं? क्या वे ऐसी बारम्बारता में आते हैं? वे ऐसे नहीं आते हैं। यह सब परमेश्वर के कार्य पर, उसके कार्य के चरणों पर और उसकी आवश्यकताओं पर आधारित है, और इसके कोई तय नियम नहीं हैं। एकमात्र नियम यही है कि जब परमेश्वर अंत के दिनों में अपने कार्य के अन्तिम चरण को करता है, तो ये सभी चुने हुए लोग आएँगे और यह आगमन उनका अंतिम पुनर्जन्म होगा। और ऐसा क्यों है? यह परमेश्वर के कार्य के अन्तिम चरण के दौरान प्राप्त किये जाने वाले परिणामों पर आधारित होता है—क्योंकि कार्य के इस अंतिम चरण के दौरान, परमेश्वर इन चुने हुए लोगों को पूरी तरह से पूर्ण करेगा। इसका क्या अर्थ है? यदि, इस अन्तिम चरण के दौरान, इन लोगों को पूरा बनाया और पूर्ण किया जाता है, तब उनका पहले की तरह पुनर्जन्म नहीं होगा; उनके मनुष्य बनने की प्रक्रिया और इसी प्रकार पुनर्जन्म की प्रक्रिया भी पूर्णतया समाप्त हो जाएगी। यह उनसे संबंधित है जो ठहरेंगे। तो जो ठहर नहीं सकते, वे कहाँ जाते हैं? जिन्हें ठहरने की अनुमति नहीं मिलती है, उनका अपना उपयुक्त गंतव्य होता है। सबसे पहले, उनके दुष्ट कार्यों के, उन्होंने जो त्रुटियाँ की हैं, और जो पाप उन्होंने किए हैं, उनके परिणामस्वरूप वे भी दण्डित किए जाएँगे। दण्डित किये जाने के पश्चात, जैसा परिस्थितियों के अनुसार अनुकूल होगा, परमेश्वर उन्हें अविश्वासियों के बीच या विभिन्न आस्था वाले लोगों के बीच भेजने की व्यवस्था करेगा। दूसरे शब्दों में, उनके लिए दो सम्भावित परिणाम हो सकते हैं: एक है दण्डित होना और पुनर्जन्म के बाद शायद एक विशेष धर्म के लोगों के बीच रहना, और दूसरा है अविश्वासी बन जाना। यदि वे अविश्वासी बनते हैं, तो वे सारे अवसर गँवा देंगे; जबकि यदि वे आस्था वाला व्यक्ति बनते हैं—उदाहरण के लिए, यदि वे ईसाई बनते हैं—तो उनके पास अभी भी परमेश्वर के चुने हुए लोगों की श्रेणियों में लौटने का अवसर होगा; इसके बहुत जटिल संबंध हैं। संक्षेप में, यदि परमेश्वर का चुना हुआ कोई व्यक्ति कोई ऐसा काम करता है जो परमेश्वर के प्रति अपमानजनक हो, तो उसे अन्य किसी भी व्यक्ति के समान ही दण्ड दिया जाएगा। उदाहरण के लिये, पौलुस को लें, जिसके बारे में हमने पहले बात की थी। पौलुस एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण जिसे दण्ड दिया जा रहा है। क्या तुम लोगों को अंदाज़ा हो रहा है कि मैं किस बारे में बात कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर के चुने हुए लोगों का दायरा निर्धारित है? (अधिकांशत: निर्धारित है।) इसमें से अधिकतर निर्धारित है, परन्तु उसका एक छोटा हिस्सा निर्धारित नहीं है। ऐसा क्यों है? यहाँ मैंने सबसे स्पष्ट कारण को संदर्भित किया है: दुष्टता करना। जब लोग दुष्टता करते हैं, तो परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता, और जब परमेश्वर उन्हें नहीं चाहता, तो वह उन्हें विभिन्न जातियों और प्रकार के लोगों के बीच फेंक देता है। इससे वे निराश हो जाते हैं और उनके लिए वापस लौटना कठिन हो जाता है। यह सब परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन और मृत्यु चक्र से संबंधित है।

यह अगला विषय सेवाकर्ताओं के जीवन और मृत्यु के चक्र से संबन्धित है। हमने अभी-अभी सेवाकर्ताओं के उद्गम के बारे में बात की है; यानि यह तथ्य कि अपने पिछले जन्मों में अविश्वासी और पशु रहने के बाद उनका पुनर्जन्म हुआ। कार्य का अंतिम चरण आने के साथ ही, परमेश्वर ने अविश्वासियों में से ऐसे लोगों के एक समूह को चुना है और यह समूह बहुत खास है। इन लोगों को चुनने का परमेश्वर का उद्देश्य अपने कार्य के लिए उनकी सेवा लेना है। "सेवा" सुनने में कोई बहुत मनोहर शब्द नहीं है, न ही यह ऐसा कुछ है जिसे कोई चाहेगा, किन्तु हमें यह देखना चाहिए कि यह किसकी ओर लक्षित है। परमेश्वर के सेवाकर्ताओं के अस्तित्व का एक विशेष महत्व है। कोई अन्य उनकी भूमिका नहीं निभा सकता है, क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा चुना गया था। और इन सेवाकर्ताओं की भूमिका क्या है? यह परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सेवा करना है। मुख्य रूप से, उनकी भूमिका परमेश्वर के कार्य में अपनी सेवा प्रदान करना, उसमें सहयोग करना, और परमेश्वर के चुने हुए लोगों की पूर्णता में समायोजन करना है। इस बात की परवाह किए बिना कि वे मेहनत कर रहे हैं, कार्य के किसी पहलू पर काम कर रहे हैं, या कुछ कार्य कर रहे हैं, परमेश्वर की इन सेवाकर्ताओं से क्या अपेक्षा है? क्या वह इनसे बहुत अधिक की माँग कर रहा है? (नहीं, वह बस उनसे निष्ठावान रहने को कहता है।) है। सेवाकर्ताओं को भी निष्ठावान होना ही चाहिए। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारा उद्गम कहाँ से है, या परमेश्वर ने तुम्हें क्यों चुना, तुम्हें परमेश्वर के प्रति, परमेश्वर के तुम्हारे लिए आदेशों के प्रति, और साथ ही उस कार्य के प्रति जिसके लिए तुम उत्तरदायी हो और अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान अवश्य ही होना चाहिए। जो सेवाकर्ता निष्ठावान और परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हैं, उनके लिए परिणाम क्या होगा? वे शेष रह पाएँगे। क्या ऐसा सेवाकर्ता होना जो शेष रह जाता है, एक आशीष है? शेष रहने का क्या अर्थ है? इस आशीष का क्या महत्व है? हैसियत में, वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों के असदृश दिखाई देते हैं, वे भिन्न दिखाई देते हैं। लेकिन, वास्तव में, क्या इस जीवन में वे जिसका आनंद लेते हैं, क्या यह वही नहीं है जिसका आनंद परमेश्वर के चुने हुए लोग लेते हैं? कम से कम, इस जीवन में तो यह वैसा ही है। तुम लोग इससे इनकार नहीं करते, है ना? परमेश्वर के कथन, परमेश्वर का अनुग्रह, परमेश्वर द्वारा भरण-पोषण, परमेश्वर के आशीष—कौन इन चीज़ों का आनन्द नहीं उठाता है? हर कोई ऐसी बहुतायत का आनन्द उठाता है। एक सेवाकर्ता की पहचान है, वह जोकि सेवा करता है, किन्तु परमेश्वर के लिए, वह उन चीज़ों में से एक ही है जिनकी उसने रचना की है; यह मात्र इतना ही है कि उनकी भूमिका सेवाकर्ता की है। उन दोनों के ही परमेश्वर के प्राणी होने के नाते, क्या एक सेवाकर्ता और परमेश्वर के चुने हुए व्यक्ति के बीच कोई अन्तर है? वस्तुतः, अंतर नहीं है। नाममात्र के लिए कहें तो, एक अंतर है; सार का और उनके द्वारा निभाई जाने वाली भूमिका के लिहाज से एक अंतर है—किन्तु परमेश्वर लोगों के इस समूह से कोई भेदभाव नहीं करता है। तो क्यों इन लोगों को सेवाकर्ता के रूप में परिभाषित किया जाता है? तुम लोगों को इस बात की कुछ समझ तो होनी ही चाहिए! सेवाकर्ता अविश्वासियों में से आते हैं। जैसे ही हम यह उल्लेख करते हैं कि वे अविश्वासियों में से आते हैं, यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका अतीत बुरा है: वे सब नास्तिक हैं और अतीत में भी ऐसे ही थे; वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे, और उसके, सत्य के, और सभी सकारात्मक चीजों के प्रति शत्रुतापूर्ण थे। वे परमेश्वर या उसके अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। तो क्या वे परमेश्वर के वचनों को समझने में सक्षम हैं? यह कहना उचित होगा कि, काफी हद तक, वे सक्षम नहीं हैं। ठीक जैसे कि पशु मनुष्य के शब्दों को समझने में सक्षम नहीं हैं, वैसे ही सेवाकर्ता भी यह नहीं समझ सकते कि परमेश्वर क्या कह रहा है, वह क्या चाहता है या वह ऐसी माँगें क्यों करता है। वे नहीं समझते; ये बातें उनकी समझ से बाहर हैं, और वे अप्रबुद्ध रहते हैं। इस कारण से, वे लोग उस जीवन को धारण नहीं करते हैं जिसके बारे में हमने बात की थी। बिना जीवन के, क्या लोग सत्य को समझ सकते हैं? क्या वे सत्य से सुसज्जित हैं? क्या उनके पास परमेश्वर के वचनों का अनुभव और ज्ञान है? (नहीं।) सेवाकर्ताओं के उद्गम ऐसे ही हैं। किन्तु, चूँकि परमेश्वर इन लोगों को सेवाकर्ता बनाता है, इसलिए उनसे उसकी अपेक्षाओं के भी मानक हैं; वह उन्हें तुच्छ दृष्टि से नहीं देखता है, न ही वह उनके प्रति बेपरवाह है। यद्यपि वे उसके वचनों को नहीं समझते हैं, और उनके पास जीवन नहीं है, फिर भी परमेश्वर उनके प्रति दयावान है, और तब भी उनसे उसकी अपेक्षाओं के मानक हैं। तुम लोगों ने अभी-अभी इन मानकों के बारे में बोला: परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना और वह करना जो वह कहता है। अपनी सेवा में तुम्हें अवश्य वहीं सेवा करनी चाहिए जहाँ आवश्यकता है, और बिल्कुल अंत तक सेवा करनी चाहिए। यदि तुम एक निष्ठावान सेवाकर्ता बन सकते हो, बिल्कुल अंत तक सेवा करने में सक्षम हो, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिए सौंपे आदेश को पूर्ण कर सकते हो, तो तुम एक मूल्यों वाला जीवन जियोगे। यदि तुम इसे कर सकते हो, तो तुम शेष रह पाओगे। यदि तुम थोड़ा अधिक प्रयास करते हो, यदि तुम थोड़ा अधिक परिश्रम से प्रयास करते हो, परमेश्वर को जानने के अपने प्रयासों को दोगुना कर पाते हो, परमेश्वर को जानने को लेकर थोड़ा भी बोल पाते हो, उसकी गवाही दे सकते हो, और इसके अतिरिक्त, यदि तुम परमेश्वर की इच्छा में से कुछ समझ सकते हो, परमेश्वर के कार्य में सहयोग कर सकते हो, और परमेश्वर के इरादों के प्रति कुछ-कुछ सचेत हो सकते हो, तब एक सेवाकर्ता के तौर पर तुम अपने भाग्य में बदलाव महसूस करोगे। और भाग्य में यह परिवर्तन क्या होगा? अब तुम शेष नहीं रह पाओगे। तुम्हारे आचरण और तुम्हारी व्यक्तिगत आकांक्षाओं और खोज के आधार पर, परमेश्वर तुम्हें चुने हुओं में से एक बनाएगा। यह तुम्हारे भाग्य में परिवर्तन होगा। सेवाकर्ताओं के लिए इसमें सर्वोत्तम बात क्या है? वह यह है कि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक बन सकते हैं। यदि वे परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक बन जाते हैं तो इसका अर्थ है कि उनका अब अविश्वासियों के समान पशु के रूप में पुनर्जन्म नहीं होगा। क्या यह अच्छा है? हाँ, है, और यह भी एक अच्छा समाचार है: इसका अर्थ है कि सेवाकर्ताओं को ढाला जा सकता है। ऐसी बात नहीं है कि सेवा करने वाले के लिए, जब परमेश्वर उसे सेवा के लिए पूर्वनिर्धारित करता है, तो वह हमेशा ऐसा ही करेगा; ऐसा होना आवश्यक नहीं है। परमेश्वर उसे उसके व्यक्तिगत आचरण के आधार पर सबसे उपयुक्त तरीके से संभालेगा और उसे उत्तर देगा।

परन्तु, ऐसे सेवाकर्ता भी हैं जो बिल्कुल अन्त तक सेवा नहीं कर पाते हैं; ऐसे भी हैं जो अपनी सेवा के दौरान, आधे रास्ते ही हार मान जाते हैं और परमेश्वर को त्याग देते हैं, साथ ही ऐसे लोग भी हैं जो अनेक बुरे कार्य करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे भी हैं जो परमेश्वर के कार्य को बड़ा नुकसान करते हैं और बड़ी क्षति पहुँचाते हैं, और ऐसे सेवा करने वाले भी हैं जो परमेश्वर को कोसते हैं, इत्यादि। ये असाध्य परिणाम क्या संकेतित करते हैं? ऐसे किसी भी दुष्टता पूर्ण कार्यों का अर्थ उनकी सेवाओं की समाप्ति होगा। क्योंकि तुम्हारे सेवा काल के दौरान तुम्हारा आचरण बहुत ख़राब रहा है, और क्योंकि तुमने अपनी हदें पार की हैं, जब परमेश्वर देखता है कि तुम्हारी सेवा अपेक्षित स्तर तक नहीं है, वह तुम्हें सेवा करने की तुम्हारी पात्रता से वंचित कर देगा। वह तुम्हें और सेवा करने की अनुमति नहीं देगा; वह तुम्हें अपनी आँखों के सामने से, और परमेश्वर के घर से हटा देगा। कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुम सेवा नहीं करना चाहते हो? क्या तुम हमेशा दुष्टता करना नहीं चाहते हो? क्या तुम लगातार विश्वासघाती नहीं रहे हो? तब ठीक है, एक सरल उपाय है: तुम्हें सेवा करने की तुम्हारी पात्रता से वंचित कर दिया जाएगा। परमेश्वर की दृष्टि में, किसी सेवाकर्ता को उसकी सेवा करने की पात्रता से वंचित करने का अर्थ है कि उस सेवाकर्ता के अन्त की घोषणा की जा चुकी है, और ऐसे लोग परमेश्वर की अब और सेवा करने पात्र नहीं होंगे। परमेश्वर को इस व्यक्ति की सेवा की अब और आवश्यकता नहीं है, और चाहे वह कितनी ही अच्छी बातें क्यों न करें, वे बातें व्यर्थ होंगी। जब हालात इस स्थिति तक पहुँच जाएँगे, तो यह परिस्थिति असाध्य बन गई होगी; इस तरह के सेवाकर्ताओं के पास लौटने का कोई मार्ग नहीं होगा। और परमेश्वर इस प्रकार के सेवाकर्ताओं के साथ किस प्रकार से निपटता है? क्या वह केवल उन्हें सेवा करने से रोक देता है? नहीं। क्या वह उन्हें केवल बने रहने से रोकता है? या वह उन्हें एक तरफ कर देता है, और उनके सुधरने की प्रतीक्षा करता है? वह ऐसा नहीं करता है। सचमुच, परमेश्वर सेवाकर्ताओं के प्रति इतना प्रेममय नहीं है। यदि परमेश्वर की सेवा के प्रति किसी व्यक्ति की इस प्रकार की प्रवृत्ति है, तो इस प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर उसे सेवा करने की उसकी पात्रता से वंचित कर देगा, और उसे एक बार फिर से अविश्वासियों के बीच फेंक देगा। और जिस सेवा करने वाले को अविश्वासियों में फेंक दिया गया हो, उसका क्या भाग्य होता है? वह अविश्वासियों के समान ही होता है: उन्हें एक पशु के रूप में पुनर्जन्म दिया जाएगा और आध्यात्मिक दुनिया में अविश्वासियों वाला दण्ड दिया जाएगा। इसके अलावा, इस व्यक्ति के दण्ड में परमेश्वर किसी तरह की व्यक्तिगत रुचि नहीं लेगा, क्योंकि परमेश्वर के कार्य से अब ऐसे व्यक्ति का कोई लेना-देना नहीं है। यह न केवल परमेश्वर में उनकी आस्था के जीवन का अन्त है, बल्कि उनके स्वयं के भाग्य का भी अन्त है, साथ ही यह उनके भाग्य की उद्घोषणा है। इस प्रकार, यदि सेवाकर्ता ख़राब ढंग से सेवा करते हैं, तो उन्हें स्वयं परिणाम भुगतने पड़ेंगे। यदि कोई सेवाकर्ता बिल्कुल अन्त तक सेवा करने में असमर्थ है, या उसे बीच में ही सेवा करने की उसकी पात्रता से वंचित कर दिया जाता है, तो उसे अविश्वासियों के बीच फेंक दिया जाएगा—और यदि ऐसा होता है तो उसके साथ मवेशियों के समान ही, उसी प्रकार से निपटा जाएगा जैसे कि अज्ञानियों और तर्कहीन व्यक्तियों के साथ निपटा जाता है। जब इसे मैं इस प्रकार से कहता हूँ, तो तुम्हारी समझ में आता है, है न?

परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों और सेवाकर्ताओं के जीवन और मृत्यु चक्र को कैसे सँभालता है, यह ऊपर उल्लिखित है। यह सुनने के बाद तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या मैंने पहले कभी इस विषय पर बोला है? क्या मैंने परमेश्वर के चुने हुए लोगों और सेवाकर्ताओं के विषय पर कभी बोला है? दरअसल मैंने बोला है, लेकिन तुम लोगों को याद नहीं। परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों और सेवाकर्ताओं के प्रति धार्मिक है। हर तरह से, वह धार्मिक है। क्या मैंने सही कहा? क्या तुम इसमें कहीं दोष ढूँढ सकते हो? क्या ऐसे लोग नहीं हैं जो कहेंगे: "क्यों परमेश्वर चुने हुओं के प्रति इतना सहिष्णु है? और क्यों वह सेवाकर्ताओं के प्रति केवल थोड़ा सा ही सहिष्णु है?" क्या कोई सेवाकर्ताओं के लिये खड़े होने की इच्छा रखता है? "क्या परमेश्वर सेवाकर्ताओं को और समय दे सकता है, तथा उनके प्रति और अधिक धैर्यवान और सहिष्णु हो सकता है?" क्या ऐसा प्रश्न पूछना सही है? (नहीं, ये सही नहीं हैं।) और सही क्यों नहीं है? (क्योंकि हमें सेवाकर्ता बनाकर वास्तव में हम पर उपकार दर्शाया गया है।) सेवाकर्ताओं को केवल सेवा की अनुमति देकर ही उन पर उपकार दर्शाया गया है! "सेवाकर्ता" की पदवी के और उस कार्य के बिना जो वे करते हैं, ये सेवा करने वाले कहाँ होते? ये अविश्वासियों के बीच होते, मवेशियों के साथ जीते और मरते हुए। आज वे, परमेश्वर के सामने और परमेश्वर के घर में आने की अनुमति पाकर, कितने अनुग्रह का आनंद लेते हैं! यह एक ज़बरदस्त अनुग्रह है! यदि परमेश्वर ने तुम्हें सेवा करने का अवसर न दिया होता, तो तुम्हें कभी भी उसके सामने आने का अवसर न मिलता। और क्या कहें, यहाँ तक कि यदि तुम कोई ऐसे हो जो बौद्ध धर्म को मानता है और जिसने परिपक्वता को पा लिया है, तो ज़्यादा से ज़्यादा तुम आध्यात्मिक दुनिया में छोटा-मोटा प्रशासनिक कार्य करने वाले हो; तुम कभी भी परमेश्वर से नहीं मिलोगे, उसकी आवाज़ नहीं सुनोगे, उसके वचनों को नहीं सुनोगे, या उसके प्रेम और आशीषों को महसूस नहीं करोगे, और न ही तुम संभवतः कभी उसके आमने-सामने ही हो सकोगे। बौद्धों के सामने केवल साधारण काम होते हैं। वे संभवतः परमेश्वर को नहीं जान सकते हैं, और वे केवल अनुपालन और आज्ञापालन करते हैं, जबकि सेवाकर्ता कार्य के इस चरण में बहुत अधिक प्राप्त करते हैं! सर्वप्रथम, वे परमेश्वर के आमने-सामने आने, उसकी आवाज़ को सुनने, उसके वचनों को सुनने, और उन अनुग्रहों और आशीषों का अनुभव करने में समर्थ होते हैं जो वह लोगों को देता है। इसके अलावा, वे परमेश्वर के द्वारा दिये गए वचनों और सत्यों का आनंद उठा पाते हैं। सेवाकर्ताओं को वास्तव में बहुत ज्यादा प्राप्त होता है! इस प्रकार यदि एक सेवाकर्ता के रूप में, तुम सही प्रयत्न नहीं भी कर सकते हो, तो क्या परमेश्वर तब भी तुम्हें रखेगा? वह तुम्हें नहीं रख सकता है। वह तुमसे ज्यादा माँग नहीं करता है, बल्कि तुम वह कुछ भी सही ढंग से नहीं करते हो जो वह तुमसे चाहता है; तुम अपने कर्तव्य के मुताबिक नहीं चले हो। इसलिए, निस्संदेह, परमेश्वर तुम्हें नहीं रख सकता है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ऐसा ही है। परमेश्वर तुम्हारे नख़रे नहीं उठाता है, किन्तु वह तुम्हारे साथ किसी तरह का भेदभाव भी नहीं करता है। इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार परमेश्वर कार्य करता है। सभी लोगों और प्राणियों के प्रति परमेश्वर इसी तरह से कार्य करता है।

जब आध्यात्मिक दुनिया की बात आती है, तो यदि इसके विभिन्न जीव कुछ ग़लत करते हैं, या अपने कार्य को ठीक ढंग से नहीं करते हैं, तो परमेश्वर के पास उनसे निपटने के लिए उसी के अनुरूप स्वर्गिक अध्‍यादेश और निर्णय हैं; यह परम सिद्धांत है। इसलिए, परमेश्वर के कई-हजारों-वर्षों के प्रबंधन कार्य के दौरान, कुछ कर्तव्यपालकों जिन्होंने ग़लत कार्य किया था, उन्हें पूर्णतया विनष्ट कर दिया गया है, जबकि कुछ आज भी हिरासत में हैं और दंडित किए जा रहे हैं। आध्यात्मिक दुनिया में हर प्राणी को इसका सामना अवश्य करना पड़ता है। यदि वे कुछ ग़लत करते हैं या कोई दुष्टता करते हैं, तो वे दंडित किए जाते हैं—और यह वैसा ही है जैसा कि परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों और सेवाकर्ताओं के साथ करता है। इस प्रकार, चाहे आध्यात्मिक दुनिया हो या भौतिक संसार, परमेश्वर जिन सिद्धांतों पर काम करता है, वे बदलते नहीं हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम परमेश्वर के कार्यकलापों को देख सकते हो या नहीं, उसके सिद्धांत नहीं बदलते हैं। हमेशा से ही, सभी चीजों के प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण और सभी चीज़ों को सँभालने के उसके सिद्धांत एक ही रहे हैं। यह अपरिवर्तनशील है। परमेश्वर अविश्वासियों में से उन लोगों के प्रति दयालु रहेगा जो अपेक्षाकृत सही तरीके से जीते हैं, और हर धर्म में से उन लोगों के लिये अवसर बचाकर रखेगा जो सद्व्यवहार करते हैं और दुष्टता नहीं करते हैं, उन्हें परमेश्वर द्वारा प्रबंधन की गई सभी चीज़ों में एक भूमिका निभाने देगा, और वह करने देगा जो उन्हें करना चाहिए। इसी प्रकार, उन लोगों के बीच जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, उन लोगों के बीच जो उसके चुने हुए हैं, परमेश्वर इन सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति के साथ भेदभाव नहीं करता है। जो कोई भी ईमानदारी से उसका अनुसरण कर पाता है, वह उसके प्रति दयालु है, और उस हर एक को प्रेम करता है जो ईमानदारी से उसका अनुसरण करता है। केवल इतना ही है कि इन विभिन्न प्रकार के लोगों—अविश्वासियों, विभिन्न आस्थाओं वाले लोगों और परमेश्वर के चुने हुए लोगों—के लिए वह जो उन्हें प्रदान करता है, वह भिन्न होता है। उदाहरण के लिए अविश्वासियों को ही लो: यद्यपि वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और परमेश्वर उन्हें जंगली जानवरों के रूप में देखता है, फिर भी सब बातों के बीच उनमें से हर एक के पास खाने के लिए भोजन होता है, उनका अपना एक स्थान होता है, और जीवन और मृत्यु का सामान्य चक्र होता है। जो दुष्टता करते हैं वे दण्ड पाते हैं और जो भला करते हैं वे आशीष पाते हैं और परमेश्वर की दया प्राप्त करते हैं। क्या ऐसा नहीं है? आस्थावान लोगों के लिए, यदि वे पुनर्जन्म-दर-पुनर्जन्म अपने धार्मिक नियमों का सख्ती से पालन कर पाते हैं, तो इन सभी पुनर्जन्मों के बाद परमेश्वर अंततः उनके लिए अपनी उद्घोषणा करेगा। इसी प्रकार, आज तुम लोगों के लिए, चाहे तुम परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक हो या कोई सेवाकर्ता हो, परमेश्वर समान रूप से तुम्हें राह पर लाएगा और अपने द्वारा नियत किए गए विनियमों और प्रशासनिक आदेशों के अनुसार तुम लोगों का अंत निर्धारित करेगा। इस तरह के लोगों के बीच, विविध प्रकार की आस्था के लोगों के बीच – यानि जो विविध धर्मों से संबंधित हैं—क्या परमेश्वर ने उन्हें रहने का स्थान दिया है? यहूदी कहाँ हैं? क्या परमेश्वर ने उनकी आस्था में हस्तक्षेप किया है? उसने नहीं किया है, है न? और ईसाइयों का क्या? उसने उनमें में भी हस्तक्षेप नहीं किया है। वह उन्हें उनकी स्वयं की पद्धतियों का पालन करने देता है। वह उनसे बात नहीं करता है, या उन्हें कोई प्रबुद्धता नहीं देता है, और, इसके अलावा, वह उन पर कुछ भी प्रकट नहीं करता है। यदि तुम्हें लगता है कि यह सही है, तो इसी तरह से विश्वास करो। कैथोलिक मरियम पर विश्वास करते हैं, और इस पर कि यह मरियम के माध्यम से था कि समाचार यीशु तक पहुँचाया गया था; उनकी आस्था ऐसा ही रूप है। क्या कभी परमेश्वर ने उनके विश्वास को सुधारा है? परमेश्वर उन्हें स्वतंत्र छोड़ देता है; वह उन पर कोई ध्यान नहीं देता है, और उन्हें जीवित रहने के लिए एक निश्चित स्थान देता है। क्या मुसलमानों और बौद्धों के प्रति भी वह वैसा ही नहीं है? उसने उनके लिए भी सीमाएं तय कर दी हैं, और, उनकी संबंधित आस्थाओं में हस्तक्षेप किए बिना, उन्हें स्वयं का जीवित रहने का स्थान लेने देता है। सब कुछ सुव्यवस्थित है। और इस सब में तुम लोग क्या देखते हो? यही कि परमेश्वर अधिकार धारण करता है, किन्तु वह अपने अधिकार का दुरुपयोग नहीं करता है। परमेश्वर सभी चीजों को अचूक क्रम में व्यवस्थित करता है और रीतिबद्ध तरीके से ऐसा करता है, और इसमें उसकी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता निहित है।

आज हमने एक नये और खास विषय पर बात की है, जिसका संबंध आध्यात्मिक दुनिया से है, जो कि आध्यात्मिक दुनिया के परमेश्वर के प्रबंधन के एक पहलू और उस साम्राज्य पर उसके प्रभुत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इन बातों को समझने से पहले हो सकता है कि तुमने कहा हो: "इससे संबंधित हर चीज़ एक रहस्य है, और इसका हमारे जीवन में प्रवेश से कुछ लेना देना नहीं है; ये चीज़ें उन बातों से अलग हैं कि लोग कैसे जीते हैं, और हमें उन्हें समझने की आवश्यकता नहीं है और न ही हम उनके बारे में सुनना चाहते हैं। परमेश्वर को जानने से उनका बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है"। अब, क्या तुम लोगों को लगता है कि ऐेसी सोच के साथ कोई समस्या है? क्या यह सही है? (नहीं।) ऐसी सोच सही नहीं है, और इसमें गंभीर समस्याएँ है। इसका कारण यह है कि यदि तुम यह समझने की इच्छा रखते हो कि कैसे परमेश्वर सभी चीज़ों पर शासन करता है, तो तुम मात्र और केवल यह नहीं समझ सकते कि तुम क्या देख सकते हो और तुम्हारी सोच कहाँ तक जा सकती है; तुम्हें उस दूसरी दुनिया को भी थोड़ा अवश्य ही समझना होगा जो तुम्हारे लिए अदृश्य हो सकती है, किन्तु इस जगत से जटिलता से जुड़ी हुई है जिसे तुम देख सकते हो। यह परमेश्वर की संप्रभुता से संबंधित है, और इसका संबंध "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" विषय से है। यह उसके बारे में जानकारी है। इस जानकारी के बिना, इस बारे में लोगों के ज्ञान में दोष और कमियाँ होंगी कि कैसे परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है। इस प्रकार, आज हमने जिस बारे में बात की है, उसे हमारे पिछले विषयों और साथ ही "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" की विषय-वस्तु का समापन किया जाना कहा जा सकता है। इसे समझ लेने के बाद, क्या तुम लोग इस विषय-वस्तु के माध्यम से परमेश्वर को जानने में समर्थ हो? इससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आज, मैंने सेवाकर्ताओं से संबंधित एक बहुत महत्वपूर्ण सूचना तुम लोगों को दी है। मैं जानता हूँ कि तुम लोग इस तरह के विषयों को सुनना वास्तव में पसंद करते हो और तुम लोग वास्तव में इन बातों की परवाह करते हो। तो इसलिए मैंने आज जो चर्चा की है, क्या तुम लोग उससे संतुष्ट हो? (हाँ, हम हैं।) तुम लोगों पर शायद अन्य कुछ बातों का ज़बरदस्त प्रभाव न हुआ हो, परन्तु सेवाकर्ताओं के बारे में मैंने जो कुछ कहा है, उसका विशेष रूप से ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा है, क्योंकि यह विषय तुममें से हरेक की आत्मा को स्पर्श करता है।

मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ

1. स्वयं परमेश्वर की पहचान और प्रतिष्ठा

हम "परमेश्वर सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है" और साथ ही "परमेश्वर स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है" विषय के अंत में आ गए हैं। ऐसा करने के बाद, हमें एक सारांश तैयार करने की आवश्यकता है। हुमें किस प्रकार का सारांश तैयार करना चाहिए? यह स्वयं परमेश्वर के बारे में निष्कर्ष है। ऐसा होने के कारण इसका परमेश्वर के हर पहलू से, और साथ ही लोग परमेश्वर में कैसे विश्वास करते हैं, इससे अनिवार्य संबंध अवश्य होना चाहिए। और इसलिए, पहले मुझे तुम लोगों से पूछना है: इन धर्मोपदेशों को सुनने के बाद, तुम लोगों के मन की आँखों में परमेश्वर कौन है? (सृष्टिकर्ता।) तुम लोगों के मन की आँखों में परमेश्वर सृष्टिकर्ता है। क्या कुछ और है? परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रभु है। क्या ये शब्द उचित हैं? (उचित हैं।) परमेश्वर ही एकमात्र है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, और सभी चीज़ों को चलाता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, जो कुछ है वही उसे चलाता है, जो कुछ है उस सब पर वही शासन करता है और जो कुछ है उस सब का वही भरण-पोषण करता है। यह परमेश्वर की प्रतिष्ठा और यही उसकी पहचान है। सभी चीजों के लिए और जो कुछ भी है उस सब के लिए, परमेश्वर की असली पहचान, सृजनकर्ता, और सम्पूर्ण सृष्टि के शासक की है। परमेश्वर की ऐसी पहचान है और वह सभी चीज़ों में अद्वितीय है। परमेश्वर का कोई भी प्राणी—चाहे वह मनुष्य के बीच हो या आध्यात्मिक दुनिया में हो—परमेश्वर की पहचान और प्रतिष्ठा का का रूप लेने या उसका स्थान लेने के लिए किसी भी साधन या बहाने का उपयोग नहीं कर सकता है, क्योंकि सभी चीज़ों में वही एक है जो इस पहचान, सामर्थ्य, अधिकार, और सृष्टि पर शासन करने की क्षमता से सम्पन्न है: हमारा अद्वितीय परमेश्वर स्वयं। वह सभी चीज़ों के बीच रहता और चलता है; वह सभी चीज़ों से ऊपर, सर्वोच्च स्थान तक उठ सकता है। वह मनुष्य बनकर, जो मांस और लहू के हैं, उनमें से एक बन कर, लोगों के साथ आमने-सामने होकर और उनके सुख—दुःख बाँट कर, अपने आप को विनम्र बना सकता है, जबकि वहीं दूसरी तरफ, जो कुछ भी है वह सब को नियंत्रित करता है, और जो कुछ भी है उस का भाग्य और उसे किस दिशा में जाना है यह तय करता है। इसके अलावा, वह संपूर्ण मानवजाति के भाग्य और मानवजाति की दिशा का पथप्रदर्शन करता है। इस तरह के परमेश्वर की सभी जीवित प्राणियों के द्वारा आराधना की जानी चाहिए, उसका आज्ञापालन किया जाना चाहिए और उसे जानना चाहिए। इस प्रकार, इस बात की परवाह किए बिना कि तुम मानवजाति में से किस समूह या किस प्रकार सम्बन्धित हो, परमेश्वर में विश्वास करना, परमेश्वर का अनुसरण करना, परमेश्वर का आदर करना, उसके शासन को स्वीकार करना, और अपने भाग्य के लिए उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना ही किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी जीवित प्राणी के लिए एकमात्र विकल्प—आवश्यक विकल्प—है। परमेश्वर की अद्वितीयता में, लोग देखते हैं कि उसका अधिकार, उसका धार्मिक स्वभाव, उसका सार, और वे साधन जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, सभी अद्वितीय हैं; यह अद्वितीयता, स्वयं परमेश्वर की असली पहचान को निर्धारित करती है, और यह उसकी प्रतिष्ठा को भी निर्धारित करती है। इसलिए, सभी प्राणियों के बीच, यदि आध्यात्मिक दुनिया में या मनुष्यों के बीच कोई जीवित प्राणी परमेश्वर की जगह खड़ा होने की इच्छा करता है, तो सफलता वैसे ही असंभव होगी, जैसे कि परमेश्वर का रूप धरने का कोई प्रयास। यह तथ्य है। इस तरह के सृजनकर्ता और शासक की, जो स्वयं परमेश्वर की पहचान, सामर्थ्य और प्रतिष्ठा को धारण करता है, मानवजाति के बारे में क्या अपेक्षाएँ हैं? यह हर एक को स्पष्ट हो जाना चाहिए, और हर एक द्वारा याद रखा जाना चाहिए; यह परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है!

2. परमेश्वर के प्रति मानवजाति की विभिन्न प्रवृत्तियाँ

लोग परमेश्वर के प्रति कैसा बर्ताव करते हैं यह उनका भविष्य निर्धारित करता है, और यह निर्धारित करता है कि कैसे परमेश्वर उनके साथ बर्ताव करेगा और उनसे निपटेगा। यहाँ पर मैं कुछ उदाहरण देने जा रहा हूँ कि कैसे लोग परमेश्वर के प्रति बर्ताव करते हैं। आओ, इस बारे में सुनते और देखते हैं कि उनका ढंग और रवैया, जिससे वे परमेश्वर के सामने आचरण करते हैं, सही है या नहीं। आओ, हम निम्नलिखित सात प्रकार के लोगों के आचरण पर विचार करें:

1) एक प्रकार के ऐसे लोग होते हैं जिनका व्यवहार परमेश्वर के प्रति विशेष रूप से बेतुका होता है। ये लोग सोचते हैं कि परमेश्वर एक बोधिसत्व या मानव बुद्धि वाला पवित्र प्राणी जैसा है, और चाहता है कि जब भी वे लोग आपस में मिलें तो मनुष्य तीन बार उसके सामने झुकें और हर बार के खाने के बाद अगरबत्ती जलाएँ। नतीजतन, जब भी वे उसके अनुग्रह के प्रति अत्यधिक कृतज्ञ होते हैं और उसके प्रति आभार महसूस करते हैं तो अक्सर उनके अंदर इस तरह का संवेग आता है। वे ऐसी कामना करते हैं कि जिस परमेश्वर में वे आज विश्वास करते हैं वह, उस पवित्र प्राणी की तरह जिसकी वे अपने मन में लालसा रखते हैं, अपने प्रति उनके उस व्यवहार को स्वीकार कर सके जिसमें वे मिलने पर तीन बार उसके सामने झुकते हैं हर बार के भोजन के बाद अगरबत्ती जलाते हैं।

2) कुछ लोग परमेश्वर को जीवित बुद्ध के रूप में देखते हैं जो सभी जीवितों के कष्टों को हटाने और उन्हें बचाने में सक्षम है; वे उसे जीवित बुद्ध के रूप में देखते हैं जो उन्हें दुःख के सागर से दूर ले जाने में सक्षम है। परमेश्वर में इन लोगों का विश्वास बुद्ध के रूप में उसकी आराधना करना है। यद्यपि वे अगरबत्ती नहीं जलाते हैं, दण्डवत् नहीं करते हैं, या अर्पण नहीं करते हैं, लेकिन हृदय की गहराई में यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर केवल इस तरह का एक बुद्ध है जो केवल यह चाहता है कि वे बहुत दयालु और धर्मार्थ हों, कि वे किसी जीवित प्राणी को नहीं मारें, दूसरों को गाली देने से बचें, ऐसा जीवन जीएँ जो ईमानदार दिखायी दे, और कुछ बुरा नहीं करें। वे मानते हैं कि केवल यही बातें उसके द्वारा उनसे अपेक्षित हैं; उनके हृदय में यही परमेश्वर है।

3) कुछ लोग परमेश्वर की आराधना ऐसे करते हैं मानो कि वह कोई महान या प्रसिद्ध व्यक्ति हो। उदाहरण के लिए, यह महान व्यक्ति चाहे किसी भी माध्यम से बोलना पसंद करता हो, किसी भी लय में बोलता हो, वह जिन शब्दों और शब्दावली का उपयोग करता है, उसका लहजा, उसके हाथ के संकेत, उसरी राय और कार्यकलाप, उसका आचरण—वे उस सब की नक़ल करते हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जो परमेश्वर में अपने विश्वास के दौरान उनमें पूरी तरह से अवश्य उत्पन्न होनी चाहिए।

4) कुछ लोग परमेश्वर को एक सम्राट के रूप में देखते हैं, वे महसूस हैं कि वह सबसे ऊपर है, और यह कि कोई भी उसका अपमान करने का साहस नहीं करता है—और यदि कोई ऐसा करता है, तो उस व्यक्ति को दण्डित किया जाएगा। वे ऐसे सम्राट की आराधना इसलिए करते हैं क्योंकि उनके हृदय में सम्राट के लिए एक खास जगह है। उनके विचार, तौर तरीके, अधिकार और स्वभाव—यहाँ तक कि उनकी रुचियाँ और व्यक्तिगत जीवन—यह सब कुछ ऐसा बन जाता है जिसे इन लोगों को अवश्य समझना चाहिए; वे ऐसे मुद्दे और मामले बन जाते हैं जिनके बारे में वे चिंतित होते हैं। परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर की आराधना एक सम्राट के रूप में करते हैं। इस तरह का विश्वास हास्यास्पद है।

5) कुछ लोगों की परमेश्वर के अस्तित्व में एक विशेष आस्था होती है और यह आस्था गहन और अटल होती है। क्योंकि उनका परमेश्वर के बारे में ज्ञान बहुत उथला होता है और उन्हें उसके वचनों का ज्यादा अनुभव नहीं होता है, इसलिए वे उसकी आराधना एक प्रतिमा के रूप में करते हैं। यह प्रतिमा उनके हृदय में परमेश्वर है; यह कुछ ऐसा है जिससे उन्हें लगता है कि उन्हें अवश्य ही डरना चाहिए और उसके सामने झुकना चाहिए, और जिसका उन्हें अनुसरण और अनुकरण अवश्य करना चाहिए। वे परमेश्वर को एक ऐसी प्रतिमा के रूप में देखते हैं, जिसका उन्हें जीवनभर अनुसरण अवश्य करना चाहिए। वे उस लहज़े की नकल करते हैं जिसमें ईश्वर बोलता है, और बाहरी रूप में वे उनकी नक़ल करते हैं जिन्हें परमेश्वर पसंद करता है। वे अक्सर ऐसे काम करते हैं जो भोले-भाले, शुद्ध, और ईमानदार प्रतीत होते हैं, और यहाँ तक कि वे इस प्रतिमा का एक ऐसे सहभागी या साथी के रूप में अनुसरण करते हैं जिससे वे कभी अलग नहीं हो सकते हैं। यह उनके विश्वास का ऐसा ही रूप है।

6) एक प्रकार के लोग ऐसे भी हैं जो परमेश्वर के बहुत से वचनों को पढ़ने और बहुत से उपदेशों को सुनने के बावजूद, अपने हृदय की गहराई से यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर के प्रति उनके व्यवहार के पीछे उनका एकमात्र सिद्धांत यह है कि उन्हें हमेशा चापलूस और खुशामदी होना चाहिए, या उस तरह से उसकी स्तुति और सराहना करनी चाहिए जो अवास्तविक हो। वे विश्वास करते हैं कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो चाहता है कि वे इस तरह से व्यवहार करें। इसके अलावा, वे मानते हैं कि यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे किसी भी समय उसके क्रोध को भड़का सकते हैं, या गलती से उसके विरुद्ध पाप कर सकते हैं, और इस तरह पाप करने के परिणामस्वरुप परमेश्वर उन्हें दण्डित करेगा। उनके हृदय में इसी तरह का परमेश्वर है।

7) और फिर ऐसे लोगों की बहुतायत है जो परमेश्वर में आध्यात्मिक सहारा ढूँढते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे इस जगत में रहते हैं, वे शांति या आनंद से रहित हैं, और उन्हें कहीं आराम नहीं मिलता है; परमेश्वर को प्राप्त करने के बाद, उसके वचनों को देख और सुन लेने के बाद, वे अपने हृदयों में वे गुपचुप रूप से आनंदित और प्रफुल्लित होने लगते हैं। ऐसा इसलिये है क्योंकि उनका मानना है कि उन्होंने आख़िरकार एक ऐसी जगह खोज ली है जो उनकी आत्मा को आनंदित करेगी, और उन्होंने आख़िरकार ऐसा परमेश्वर प्राप्त कर लिया है जो उन्हें आध्यात्मिक सहारा देगा। उनके परमेश्वर को स्वीकार कर लेने और उसका अनुसरण शुरू करने के बाद, वे खुश हो जाते हैं, और उनके जीवन संतुष्ट हो जाते हैं। इसके बाद वे अविश्वासियों की तरह व्यवहार नहीं करते जो जीवन में जानवरों की तरह नींद में चलते हैं, और अब वे महसूस करते हैं कि उनके पास जीवन में आगे देखने के लिए कुछ है। इस प्रकार, उन्हें लगता है कि यह परमेश्वर उनकी आध्यात्मिक आवश्यकताओं को बहुत हद तक पूरा कर सकता है और उनके मन और आत्मा, दोनों में एक बड़ा आनंद ला सकता है। इसका अहसास किए बिना, वे इस परमेश्वर को छोड़ने में असमर्थ हो जाते हैं जो उन्हें ऐसा आध्यात्मिक सहारा देता है, और जो उनकी आत्मा और पूरे परिवार के लिए आनंद लाता है। वे मानते हैं कि ईश्वर में विश्वास को उनके जीवन में आध्यात्मिक सहारा लाने से ज्यादा कुछ और करने की ज़रूरत नहीं है।

क्या तुममें से किसी का परमेश्वर के प्रति ऊपर उल्लिखित इन विभिन्न रवैयों में से कोई है? (हाँ, हैं।) यदि, परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में, किसी व्यक्ति के हृदय में इस प्रकार का कोई भी रवैया हो, तो क्या वह सच में परमेश्वर के सम्मुख आने में समर्थ है? यदि किसी के हृदय में इसमें से कोई भी रवैया हो, तो क्या वह परमेश्वर में विश्वास करता है? क्या ऐसा व्यक्ति स्वयं अद्वितीय परमेश्वर में विश्वास करता है? (नहीं।) चूँकि तुम स्वयं अद्वितीय परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हो, तो तुम किसमें विश्वास करते हो? यदि तुम जिसमें विश्वास करते हो वह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर नहीं है, तो यह संभव है कि तुम किसी प्रतिमा में, या किसी महान आदमी में, या किसी बोधिसत्व में विश्वास करते हो, या कि तुम अपने हृदय में स्थित बुद्ध की आराधना करते हो। इसके अलावा, यह भी संभव है कि तुम किसी साधारण व्यक्ति में विश्वास करते हो। संक्षेप में, परमेश्वर के प्रति लोगों के विभिन्न प्रकारों के विश्वास और प्रवृत्तियों की वजह से, लोग अपनी अनुभूति के परमेश्वर को अपने हृदयों में जगह देते हैं, वे परमेश्वर के ऊपर अपनी कल्पनाएँ थोप देते हैं, वे परमेश्वर के बारे में अपने रवैयों और कल्पनाओं को स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के साथ-साथ रखते हैं, और इसके बाद वे प्रतिष्ठापित करने के लिए उन्हें पकड़कर रखते हैं। जब लोग परमेश्वर के प्रति इस प्रकार के अनुचित रवैये रखते हैं तो इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उन्होंने स्वयं सच्चे परमेश्वर को अस्वीकार कर दिया है और एक झूठे ईश्वर की आराधना कर रहे हैं; यह संकेत देता है कि परमेश्वर में विश्वास करते हुए ही वे उसे अस्वीकार कर रहे हैं और उसका विरोध कर रहे हैं और यह कि वे सच्चे परमेश्वर के अस्तित्व से इनकार करते हैं। यदि लोग इस प्रकार के विश्वास बनाए रखेंगे, तो उन्हें किन परिणामों का सामना करना पड़ेगा? इस प्रकार के विश्वासों के साथ, क्या वे कभी परमेश्वर की अपेक्षा को पूरा करने के निकट आ पाएँगे? (नहीं, वे नहीं आ पाएँगे।) इसके विपरीत, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के कारण, ये लोग परमेश्वर के पथ से और भी दूर भटक जाएँगे, क्योंकि वे जिस दिशा की खोज करते हैं, वह उससे ठीक विपरीत है जिसकी परमेश्वर उनसे अपेक्षा करता है। क्या कभी तुम लोगों ने वह कहानी सुनी है कि "रथ को उत्तर की ओर चलाकर दक्षिण की ओर जाना?" यह ठीक उत्तर की ओर रथ चला कर दक्षिण की ओर जाने का मामला हो सकता है। यदि लोग परमेश्वर में इस बेढंगे तरीके से विश्वास करेंगे, तो तुम जितनी अधिक कोशिश करोगे, उतना ही परमेश्वर से अधिक दूर हो जाओगे। और इसलिए मैं तुम लोगों को यह चेतावनी देता हूँ: इससे पहले कि तुम आगे बढ़ो, तुम्हें पहले यह ज़रूर देखना चाहिए कि तुम सही दिशा में जा रहे हो या नहीं? अपने प्रयासों को लक्षित करो, और स्वयं से यह पूछना निश्चित करो, "क्या जिस परमेश्वर पर मैं विश्वास करता हूँ वह सभी चीज़ों का शासक है? क्या वह परमेश्वर जिस पर मैं विश्वास करता हूँ मात्र कोई ऐसा है जो मुझे आध्यात्मिक सहारा देता है? क्या वह मेरा आदर्श मात्र है? जिस परमेश्वर में मैं विश्वास करता हूँ, वह मुझसे क्या चाहता है? क्या परमेश्वर उस सब को अनुमोदित करता है जो मैं करता हूँ? क्या मेरे सभी कार्य और तलाशें परमेश्वर को जानने की खोज के क्रम में हैं? क्या यह मुझसे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुकूल है? क्या जिस पथ पर मैं चलता हूँ वह परमेश्वर के द्वारा मान्य और अनुमोदित है? क्या वह मेरी आस्था से संतुष्ट है?" तुम्हें अक्सर और बार-बार अपने आप से ये प्रश्न पूछने चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के ज्ञान की खोज करना चाहते हो, तो इससे पहले कि तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में सफल हो सको, तुम्हारे पास एक स्पष्ट चेतना और स्पष्ट उद्देश्य अवश्य होने चाहिए।

क्या यह संभव है कि अपनी सहिष्णुता के परिणामस्वरूप, परमेश्वर अनिच्छा से इन अनुचित प्रवृत्तियों को स्वीकार कर ले जिनके बारे में मैंने अभी-अभी बात की है? क्या परमेश्वर इन लोगों के रवैयों की सराहना कर सकेगा? (नहीं।) परमेश्वर की मनुष्यों से और जो उसका अनुकरण करते हैं उनसे, क्या अपेक्षाएँ है? क्या तुम्हें यह स्पष्ट अंदाज़ा है कि वह लोगों से किस प्रकार की प्रवृत्ति की अपेक्षा करता है? अब तक मैं बहुत कह चुका हूँ: मैं स्वयं परमेश्वर के विषय पर और साथ ही उसके कर्मों और उसके स्वरूप के बारे में, बहुत बोल चुका हूँ। क्या अब तुम लोग जानते हो कि परमेश्वर लोगों से क्या प्राप्त करना चाहता है? क्या तुम जानते हो कि वह तुमसे क्या चाहता है? बोलो। यदि अनुभवों और अभ्यास से तुम्हारे ज्ञान में अभी भी कमी है या यह बहुत सतही है, तो तुम लोग इन वचनों के अपने ज्ञान के बारे में कुछ कह सकते हो। क्या तुम्हारे पास ज्ञान का सार है? परमेश्वर मनुष्य से क्या चाहता है? (इन कुछ संगतियों के दौरान, परमेश्वर ने इस बात की आवश्यकता को महत्व दिया है कि हम उसे जानें, उसके कर्मों को जानें, यह जानें कि वही सभी चीज़ों के जीवन का स्रोत है और उसकी हैसियत और पहचान से परिचित हों।) और जब परमेश्वर कहता है कि लोग उसे जानें, तो उसका अंतिम परिणाम क्या होता है? (वे जानते हैं कि परमेश्वर सृजनकर्ता है, और मनुष्य सृजित प्राणी हैं।) जब लोग इस प्रकार का ज्ञान पा लेते हैं, तो परमेश्वर के प्रति उनके रवैयों में, उनके कर्तव्य निष्पादन में, या उनके जीवन स्वभाव में क्या बदलाव आते हैं? क्या तुम लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है? क्या यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर को जानने, और उसे समझने के बाद, वे भले व्यक्ति बन जाते हैं? (परमेश्वर पर विश्वास करना एक भला आदमी बनने की कोशिश करना नहीं है, बल्कि यह परमेश्वर का प्राणी बनने के लिए अनुसरण करना है, जो कि मानकों पर खरा उतरता है और ईमानदार व्यक्ति है।) क्या कुछ और भी है? (परमेश्वर को सच में और सही ढंग से जानने के बाद, हम उसके साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार कर पाते हैं; हम जानते हैं कि परमेश्वर सदैव ही परमेश्वर है, कि हम सृजित किए गए प्राणी हैं, हमें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और हमें अपने सही स्थानों पर टिके रहना चाहिए।) बहुत अच्छा! आओ, कुछ अन्य लोगों से भी सुनें। (हम परमेश्वर को जानते हैं, और अंततः हम ऐसे व्यक्ति बनने में समर्थ हुए हैं जो सच में परमेश्वर को समर्पित होते हैं, परमेश्वर का आदर करते हैं और बुराई से दूर रहते हैं।) यह सही है!

3. वह दृष्टिकोण जो परमेश्वर अपेक्षा करता है कि उसके प्रति मानवजाति का होना चाहिए

वास्तव में, परमेश्वर लोगों से ज्यादा अपेक्षा नहीं करता है—या कम से कम, वह उतनी अपेक्षा नहीं करता है जितनी लोग कल्पना करते हैं। अगर परमेश्वर ने किन्हीं वचनों को नहीं कहा होता, या यदि उसने अपने स्वभाव या किन्हीं कर्मों को व्यक्त नहीं किया होता तो परमेश्वर को जानना तुम लोगों के लिए बहुत कठिन होता, क्योंकि लोगों को उसके इरादों और उसकी इच्छा का अनुमान लगाना पड़ता; यह करना उनके लिए बहुत कठिन होता। किन्तु, उसके कार्य के अंतिम चरण में, परमेश्वर ने बहुत से वचन कहे हैं, बहुत सा कार्य किया है, और मनुष्य से बहुत सी अपेक्षाएँ की हैं। उसने अपने वचनों में, और अपने कार्य की विशाल मात्रा में लोगों को बता दिया है कि उसे क्या पसंद है, उसे किससे घृणा है, और उन्हें किस प्रकार का मनुष्य बनना चाहिए। इन बातों को समझने के बाद, लोगों के अपने हृदयों में परमेश्वर की अपेक्षाओं की सटीक परिभाषा होनी चाहिए, क्योंकि वे अस्पष्टता के बीच परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं, और अस्पष्ट परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, न ही वे अस्पष्टता और शून्यता के बीच परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। इसके बजाय, वे उसके कथनों को सुनने में समर्थ हैं, वे उसकी अपेक्षाओं के मानकों को समझने में, और उन्हें प्राप्त करने में समर्थ हैं, और परमेश्वर लोगों को वह सब बताने में मनुष्य की भाषा का उपयोग करता है जो उन्हें जानना और समझना चाहिए। आज, यदि लोग अभी भी नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है और उसकी उनसे क्या अपेक्षाएँ हैं; अगर वे नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास क्यों करना चाहिए न ही ये कि परमेश्वर में विश्वास या उससे व्यवहार कैसे करना चाहिए, तो फिर इसमें एक समस्या है। अभी-अभी तुम में से प्रत्येक ने एक क्षेत्र विशेष के बारे में बोला; तुम लोग कुछ बातों से परिचित हो, चाहे वे बातें विशिष्ट हों या सामान्य। लेकिन मैं तुम लोगों को परमेश्वर की मनुष्य से सही, पूर्ण और विशिष्ट अपेक्षाएँ बताना चाहता हूँ। वे केवल कुछ वचन हैं, और बहुत साधारण हैं; हो सकता है कि तुम लोग पहले से ही उन्हें जानते हों। परमेश्वर की मनुष्य से, और जो उसका अनुसरण करते हैं उनसे, सही अपेक्षाएँ निम्नानुसार हैं। परमेश्वर की उनसे पाँच अपेक्षाएँ हैं जो उसका अनुसरण करते हैं: सच्चा विश्वास, निष्‍ठापूर्ण अनुकरण, पूर्ण समर्पण, सच्चा ज्ञान और हार्दिक आदर।

इन पाँच बातों में, परमेश्वर चाहता है कि लोग उससे अब और प्रश्न न करें, और न ही अपनी कल्पना या अस्पष्ट और अमूर्त दृष्टिकोण का उपयोग करके उसका अनुसरण करें; उन्हें किन्हीं भी कल्पनाओं या धारणाओं के साथ परमेश्वर का अनुसरण कतई नहीं करना चाहिए। परमेश्वर चाहता है कि जो उसका अनुसरण करते हैं, वे सभी ऐसा पूरी वफादारी से करें, आधे-अधूरे मन से या बिना किसी प्रतिबद्धता के नहीं करें। जब परमेश्वर तुमसे कोई अपेक्षा करता है, या तुम्हारा परीक्षण करता है, तुमसे निपटता या तुम्हें तराशता है, या तुम्हें अनुशासित करता और दंड देता है, तो तुम्हें पूर्ण रूप से उसके प्रति समर्पण कर देना चाहिए। तुम्हें कारण नहीं पूछना चाहिए, या शर्तें नहीं रखनी चाहिए, और तुम्हें तर्क तो बिल्कुल नहीं करना चाहिए। तुम्हारी आज्ञाकारिता चरम होनी चाहिए। परमेश्वर का ज्ञान एक ऐसा क्षेत्र है जिसका लोगों में सबसे ज़्यादा अभाव है। वे अक्सर परमेश्वर पर ऐसी कहावतों, कथनों, और वचनों को थोपते हैं जो उससे संबंधित नहीं होते, ऐसा विश्वास करते हैं कि ये वचन परमेश्वर के ज्ञान की सबसे सही परिभाषा हैं। उन्हें बहुत थोड़ा सा पता है कि ये कहावतें, जो लोगों की कल्पनाओं से आती हैं, उनके अपने तर्क, और अपने ज्ञान से आती हैं, उनका परमेश्वर के सार से ज़रा सा भी सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार, मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि जब उस ज्ञान की बात आती है जो परमेश्वर चाहता है कि लोगों में हो, वह मात्र यह नहीं कहता कि तुम उसे और उसके वचनों को पहचानो, बल्कि यह कि परमेश्वर का तुम्हारा ज्ञान सही हो। भले ही तुम केवल एक वाक्य बोल सको, या केवल थोड़ा सा ही जानते हो, तो यह थोड़ा सा जानना सही और सच्चा हो, और स्वयं परमेश्वर के सार के अनुकूल हो। ऐसा इसलिए क्योंकि परमेश्वर लोगों की अवास्तविक और अविवेकी स्तुति और सराहना से घृणा करता है। उससे भी अधिक, जब लोग उससे हवा की तरह बर्ताव करते हैं तो वह इससे घृणा करता है। जब परमेश्वर के बारे में विषयों की चर्चा के दौरान, लोग तथ्यों की परवाह न करते हुए बात करते हैं, जैसा चाहे वैसा और बेझिझक बोलते हैं, जैसा उन्हें ठीक लगे वैसा बोलते हैं तो वह इससे घृणा करता है; इसके अलावा, वह उनसे नफ़रत करता है जो यह मानते हैं कि वे परमेश्वर को जानते हैं, और उससे संबन्धित अपने ज्ञान के बारे में डींगे मारते हैं, उससे संबन्धित विषयों पर बिना किसी रुकावट या विचार किए चर्चा करते हैं। ऊपर उल्लिखित पाँच अपेक्षाओं में से अंतिम अपेक्षा हार्दिक आदर करना थी: यह परमेश्वर की उनसे परम अपेक्षा है जो उसका अनुसरण करते हैं। जब किसी को परमेश्वर का सही और सच्चा ज्ञान होता है, तो वह परमेश्वर का सच में आदर करने और बुराई से दूर रहने में सक्षम होता है। यह आदर उसके हृदय की गहराई से आता है; यह आदर स्वैच्छिक दिया जाता है, और परमेश्वर द्वारा डाले गए दबाव के परिणामस्वरूप नहीं। परमेश्वर यह नहीं कहता कि तुम उसे किसी अच्छी प्रवृत्ति, या आचरण, या बाहरी व्यवहार का कोई उपहार दो; उसके बजाय, वह कहता है कि तुम अपने हृदय की गहराई से उसका आदर करो और उससे डरो। यह आदर तुम्हारे जीवन स्वभाव में बदलाव, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के कर्मों की समझ प्राप्त करने, परमेश्वर का सार समझने और तुम्हारे द्वारा इस तथ्य को स्वीकार करने के परिणामस्वरूप आता है कि तुम परमेश्वर के प्राणियों में से एक हो। इसलिए, आदर को समझाने के लिए "हार्दिक" शब्द का उपयोग करने का मेरा लक्ष्य यह है कि मनुष्य समझे कि परमेश्वर के लिए उनका आदर उनके हृदय की गहराई से आना चाहिए।

अब उन पाँच अपेक्षाओं पर विचार करें: क्या तुम लोगों में ऐसे लोग हैं जो प्रथम तीन को प्राप्त करने में सक्षम हैं? इससे मैं सच्चे विश्वास, निष्‍ठापूर्ण अनुसरण, और पूर्ण समर्पण को संदर्भित कर रहा हूँ। क्या तुम लोगों में से कोई ऐसे हैं जो इन चीजों में सक्षम हैं? मैं जानता हूँ कि यदि मैंने सभी पाँच कहे होते, तो निश्चित रूप से तुम लोगों में से कोई नहीं होता जो सक्षम हो, किन्तु मैंने इस संख्या को तीन तक कर दिया है। इस बारे में सोचो कि तुम लोग इन चीजों को प्राप्त कर चुके हो या नहीं। क्या "सच्चा विश्वास" प्राप्त करना आसान है? (नहीं, आसान नहीं है।) यह आसान नहीं है, क्योंकि लोग प्रायः परमेश्वर पर प्रश्न उठाते हैं। और "निष्‍ठापूर्ण अनुसरण" के बारे में क्या? यह "निष्‍ठापूर्ण" किसे संदर्भित करता है? (आधे-अधूरे मन से नहीं बल्कि पूरे मन से होना।) आधे-अधूरे मन से नहीं, बल्कि पूरे मन से। एकदम सटीक बात कही! तो क्या तुम लोग इस अपेक्षा को पूरा करने में सक्षम हो? तुम्हें अधिक कड़ी मेहनत करनी होगी, है न? अभी तुम्हें इस अपेक्षा को पूरा पूरा करने में सफल होना बाकी है! "पूर्ण समर्पण" के बारे में क्या कहोगे—क्या तुमने इसे पा लिया है? (नहीं।) तुमने इसे भी नहीं पाया है। तुम बार-बार अवज्ञाकारी, विद्रोहशील हो जाते हो; तुम प्रायः नहीं सुनते हो, या आज्ञापान करना नहीं चाहते हो, या सुनना नहीं चाहते हो। ये तीन मूलभूत अपेक्षाएँ हैं जिन्हें जीवन में प्रवेश करने के बाद लोगों द्वारा पूरा किया जाता है लेकिन तुम लोगों को अभी उन्हें पूरा करना बाकी है। तो, इस वक्त, क्या तुममें बहुत अधिक क्षमता है? आज, मुझे इन वचनों को कहता हुआ सुनने के बाद, क्या तुम चिंतित महसूस करते हो? (हाँ!) यह सही है कि तुम्हें चिंतित महसूस करना चाहिए। चिंतित होने को मत टालो। तुम लोगों की ओर से मैं चिंतित महसूस करता हूँ! मैं अन्य दो अपेक्षाओं पर नहीं जाऊँगा; निस्संदेह, यहाँ कोई भी इन्हें पूरा करने में सक्षम नहीं है। तुम चिंतित हो। तो क्या तुम लोगों ने अपने लक्ष्य निर्धारित कर लिए हैं? तुम्हें कौन से लक्ष्यों के साथ, किस दिशा में खोज करनी चाहिए, और अपने प्रयासों को समर्पित करना चाहिए? क्या तुम्हारा कोई लक्ष्य है? मैं स्पष्ट रूप से कहता हूँ: जब तुम इन पाँच अपेक्षाओं को प्राप्त कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर लिया होगा। उनमें से प्रत्येक एक संकेतक है, और साथ ही किसी व्यक्ति के जीवन में प्रवेश की परिपक्वता का अंतिम लक्ष्य भी। में पहुँचने के बाद लोगों का जीवन में प्रवेश का और इसके अंतिम लक्ष्य का संकेतक। भले ही मैं इन अपेक्षाओं में से एक के बारे में ही विस्तार से बोलना चुनूँ और तुमसे उसे पूरा करने की अपेक्षा करूँ, तब भी इसे प्राप्त करना आसान नहीं होगा; तुम्हें कुछ हद तक कठिनाई झेलनी होगी और विशेष प्रयास करने होंगे। तुम लोगों की मानसिकता कैसी होनी चाहिए? यह वैसी ही होनी चाहिए जैसी एक कैंसर के मरीज़ की होती है जो ऑपरेशन की टेबल पर जाने की प्रतीक्षा कर रहा होता है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करना चाहते हो और यदि तुम परमेश्वर और उसकी संतुष्टि को प्राप्त करना चाहते हो, तो जब तक तुम कुछ हद तक कष्ट सहन नहीं करते हो और विशेष प्रयास नहीं करते हो, तुम इन चीज़ों को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगे। तुम लोगों ने बहुत उपदेश सुन लिया है, किन्तु इसे सुन लेने मात्र का यह मतलब नहीं कि यह उपदेश तुम्हारा हो गया है; तुम्हें इसे अवश्य आत्मसात करना चाहिए और इसे किसी ऐसी वस्तु में रूपांतरित करना चाहिए जो तुमसे सम्बंधित हो। तुम्हें इसे अपने जीवन में आत्मसात कर लेना चाहिए, और इसे अपने अस्तित्व में ले आना चाहिए, इन वचनों और उपदेश को तुम्हारी जीवनशैली का मार्गदर्शन करने देना चाहिए, और तुम्हारे जीवन में अस्तित्व संबंधी मूल्य और अर्थ लाने देना चाहिए। जब ऐसा होगा, तब तुम्हारे लिए इन वचनों को सुनने का महत्व होगा। यदि मेरे द्वारा कहे जा रहे वचन तुम्हारे जीवन में कोई सुधार, या तुम्हारे अस्तित्व का मोल नहीं बढ़ाते हैं, तो तुम्हारा इन्हें सुनना कोई अर्थ नहीं रखता है। तुम लोग इसे समझते हो, है न? इसे समझने के बाद, आगे क्या होता है, यह तुम लोगों पर है। तुम लोगों को काम पर अवश्य लग जाना चाहिए! तुम्हें सभी बातों में ईमानदार अवश्य होना चाहिए! भ्रम में मत रहो; समय तेज़ी से गुज़र रहा है! तुम लोगों में से अधिकांश लोग पहले ही दस साल से भी ज्यादा समय से परमेश्वर में विश्वास करते आ रहे हैं। इन दस सालों को मुड़कर देखो: तुम लोगों ने कितना पाया है? इस जीवन के कितने दशक तुम्हारे पास शेष हैं? और इस जन्म में जीने के लिए तुम्हारे पास और कितने दशक बचे हैं? तुम्हारे पास बहुत समय नहीं बचा है। इस बारे में भूल जाओ कि परमेश्वर का कार्य तुम्हारी प्रतीक्षा करता है या नहीं, उसने तुम्हारे लिए कोई अवसर छोड़ा है या नहीं, या वह उसी कार्य को पुनः करेगा या नहीं—इन चीजों के बारे में बात मत करो। क्या तुम अपने जीवन के पिछले दस वर्षों को पलट सकते हो? हर गुज़रते हुए दिन और तुम्हारे उठाए हर कदम के साथ तुम्हारे पास एक दिन कम होता जाता है। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है! तुम परमेश्वर में अपनी आस्था से केवल तभी प्राप्त करोगे, यदि तुम इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी चीज, भोजन, कपडे, या किसी भी अन्य चीज की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में देखोगे! यदि तुम केवल तभी विश्वास करते हो जब तुम्हारे पास समय होता है, और अपनी आस्था के प्रति अपना पूरा ध्यान समर्पित करने में असमर्थ रहते हो, और यदि तुम हमेशा भ्रम में फँसे रहते हो, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे। तुम लोग इसे समझते हो, है न? आज के लिए हम यहीं रुक जाएँगे। फिर मिलेंगे! (परमेश्वर का धन्यवाद!)

15 फरवरी, 2014

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