15.10. परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने पर

परमेश्‍वर का भय मानना क्‍या है? किस प्रकार कोई दुष्‍टता का त्‍याग कर सकता है?

"परमेश्‍वर का भय मानने" का अर्थ अज्ञात डर या दहशत नहीं होता, ना ही इसका अर्थ टाल-मटोल करना, दूर रखना, मूर्तिपूजा करना या अंधविश्‍वास होता है। वरन्, यह प्रशंसा, आदर, भरोसा, समझ, परवाह, आज्ञाकारिता, समर्पण, प्रेम, के साथ-साथ बिना शर्त और बिना शिकायत आराधना, प्रतिदान और समर्पण करना है। परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना, मनुष्य के पास सच्‍ची प्रशंसा, सच्‍चा भरोसा, सच्‍ची समझ, सच्‍ची परवाह या आज्ञाकारिता नहीं रहेगी, वरन् केवल भय और व्‍यग्रता, केवल शंका, गलतफहमी, टालमटोल और परिहार रहेगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना, मनुष्य के पास सच्‍चा समर्पण और प्रतिदान भी न रहेगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना मनुष्य के पास सच्‍ची आराधना और समर्पण नहीं रहेगा, मात्र अंधी मूर्तिपूजा और अंधविश्‍वास रहेगा; परमेश्‍वर के सच्‍चे ज्ञान के बिना, मनुष्य परमेश्‍वर के मार्ग के अनुरूप संभवत: कार्य न कर पाएगा, परमेश्‍वर का भय नहीं मानेगा, या दुष्‍टता का त्‍याग नहीं कर पाएगा। इसके विपरीत, मनुष्‍य जिस भी क्रियाकलाप और आचरण में संलग्‍न होगा, वह परमेश्‍वर के प्रति विद्रोह और अवज्ञा से, कलंकित करने वाले अभियोगों और निंदात्‍मक आकलनों से तथा सत्‍य के और परमेश्‍वर के वचनों के सही अर्थों के विपरीत चलने वाले दुष्‍ट व्‍यवहारों से भरा होगा।

जब मनुष्य को परमेश्‍वर में सच्‍चा भरोसा होगा, तो वह सच्चाई से उसका अनुसरण करेगा और उस पर निर्भर रहेगा; केवल परमेश्‍वर पर सच्‍चे भरोसे और निर्भरता से ही मनुष्य को सच्‍ची समझ और बोध होगा; परमेश्‍वर के वास्‍तविक बोध के साथ उसके प्रति वास्‍तविक परवाह आती है; केवल परमेश्‍वर के प्रति सच्‍ची परवाह के साथ ही मनुष्य में सच्‍ची आज्ञाकारिता आ सकती है; परमेश्‍वर के प्रति सच्‍ची आज्ञाकारिता के साथ ही मनुष्य में सच्‍चा समर्पण आ सकता है; केवल परमेश्वर के प्रति सच्‍चे समर्पण के साथ ही बिना शर्त और बिना शिकायत प्रतिदान हो सकता है; केवल सच्‍चे भरोसे और निर्भरता, सच्‍ची समझ और परवाह, सच्‍ची आज्ञाकारिता, सच्‍चे समर्पण और प्रतिदान के साथ ही मनुष्य परमेश्‍वर के स्‍वभाव और सार को जान सकता है, और सृजनकर्ता की पहचान को जान सकता है; जब मनुष्य सृजनकर्ता को वास्‍तव में जानेगा केवल तभी उसमें सच्‍ची आराधना और समर्पण जागृत होगा; जब मनुष्य में सृजनकर्ता के प्रति सच्‍ची आराधना और समर्पण होगा केवल तभी वह अपने बुरे तरीकों का वाकई त्‍याग कर पाएगा, अर्थात्, दुष्‍टता का त्‍याग कर पाएगा।

"परमेश्‍वर का भय मानने और दुष्‍टता का त्‍याग करने" की सम्‍पूर्ण प्रक्रिया इस प्रकार बनती है, और यही परमेश्‍वर का भय मानने और दुष्‍टता का त्‍याग करने का समग्र निहित तत्‍व भी है, साथ ही यही वह मार्ग भी है जिसे परमेश्‍वर का भय मानने और दुष्‍टता का त्‍याग करने के लिए तय करना आवश्‍यक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

545. सबसे पहले हम जानते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव प्रताप है, कोप है। वह वध किए जाने हेतु कोई भेड़ नहीं है; इससे भी अधिक, वह कोई कठपुतली नहीं है कि लोग जैसा चाहें वैसा उसे नियन्त्रित करें। वह कोई खाली हवा का झोंका भी नहीं है जिसे धौंस दी जाए। यदि तुम वास्तव में विश्वास करते हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है, तो तुम्हारे पास ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर का भय मानता हो, और तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के सार को क्रोधित नहीं करना है। यह क्रोध कदाचित् किसी किसी शब्द; कदाचित् किसी विचार; किसी प्रकार के अधम व्यवहार; हल्के व्यवहार, ऐसे व्यवहार जो मनुष्य की नज़रों में और नैतिकता में कामचलाऊ हो, के द्वारा उत्पन्न हुआ हो सकता है; या कदाचित् किसी मत, किसी सिद्धान्त के द्वारा उत्पन्न हुआ हो सकता है। हालाँकि, जब एक बार तुम परमेश्वर को क्रोधित कर देते हो, तो तुम्हारा अवसर खो जाता है और तुम्हारे अन्त के दिन आ जाते हैं। यह एक भयानक बात है! यदि तुम नहीं समझते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तो हो सकता है तुम परमेश्वर से नहीं डरते हो, और हो सकता है तुम उसे हर समय अपमानित करते हो। यदि तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का भय कैसे मानें, तो तुम परमेश्वर का भय मानने में असमर्थ हो, और तुम नहीं जानोगे कि परमेश्वर के मार्ग में चलने के पथ—परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना—पर अपने आप को कैसे रखना है। जब एक बार तुम जान जाते हो, तो तुम सचेत रह सकते हो कि परमेश्वर को अपमानित नहीं किया जा सकता है, तब तुम जानोगे कि परमेश्वर का भय मानना और दुष्टता से दूर रहना क्या होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

546. यद्यपि परमेश्वर के सार का एक हिस्सा प्रेम है, और वह हर एक के प्रति दयावान है, फिर भी लोग उस बात की अनदेखी करते हैं और उसे भूल जाते हैं कि उसका सार महिमा भी है। यह कि उसके पास प्रेम है इसका अर्थ यह नहीं है कि लोग मुक्तभाव से उसका अपमान कर सकते हैं और उसे कोई अनुभूति या कोई प्रतिक्रियाएँ नहीं होती है। यह कि उसके पास करुणा है इसका अर्थ यह नहीं है कि जिस प्रकार लोगों से व्यवहार करता है उसमें उसके कोई सिद्धान्त नहीं है। परमेश्वर जीवित है; वह सचमुच में अस्तित्व में है। वह कोई कल्पना की गई कठपुतली या कुछ और नहीं है। चूँकि वह अस्तित्व में है, इसलिए हमें हर समय सावधानीपूर्वक उसके हृदय की आवाज़ सुननी चाहिए, उसकी प्रवृत्ति पर ध्यान देना चाहिए, और उसकी भावनाओं को समझना चाहिए। परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए हमें लोगों की कल्पनाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, और हमें लोगों के विचारों और इच्छाओं को परमेश्वर के ऊपर नहीं थोपना चाहिए, और जिस प्रकार परमेश्वर मनुष्यजाति से व्यवहार करता है उसमें परमेश्वर से मनुष्य की शैली और सोच को काम में नहीं लगवाना चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम परमेश्वर को क्रोधित कर रहे हो, तुम परमेश्वर के कोप को फुसला रहे हो, और तुम परमेश्वर की महिमा को चुनौती दे रहे हो! इस प्रकार, तुम लोगों के इस मसले की गंभीरता को समझ लेने के पश्चात्, मैं तुम लोगों में से हर एक से उसके कार्यकलापों में सावधान और विवेकी होने का आग्रह करता हूँ। अपने बोलने में सावधान और विवेकी रहो। और जिस तरह तुम लोग परमेश्वर के साथ व्यवहार करते हो उसके बारे में, तुम लोग जितना अधिक सावधान और विवेकी रहते हो, उतना ही बेहतर है! जब तुम्हारी समझ में नहीं आता है कि परमेश्वर की प्रवृत्ति क्या है, तो लापरवाही से बात मत करो, अपने कार्यकलापों में लापरवाह मत बनो, और लापरवाही से उपनाम मत रखो। इससे भी अधिक, मनमाने ढंग से निष्कर्षों पर मत पहुँचो। इसके बजाय, तुम्हें प्रतीक्षा और खोज करनी चाहिए; यह भी परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने की अभिव्यक्ति है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

547. यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तब तुम्हारे लिए उस काम को करना असंभव होगा जो उसके लिए तुम्हें करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के सार को नहीं जानते हो, तो उसके प्रति आदर और भय को धारण करना तुम्हारे लिए असंभव होगा; तुम केवल बेपरवाह यंत्रवत ढंग से काम करोगे और घुमा-फिराकर बात कहोगे, इसके अतिरिक्त असाध्य ईश-निन्दा करोगे। हालाँकि परमेश्वर के स्वभाव को समझना वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है, और परमेश्वर के अस्तित्व के ज्ञान को कभी भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता, फिर भी किसी ने भी पूरी तरह इस विषय का परीक्षण नहीं किया है या कोई उसकी गहराई में नहीं गया है। यह बिलकुल साफ-साफ देखा जा सकता है कि तुम सबने मेरे द्वारा दिए गए सभी प्रशासनिक आदेशों को अस्वीकार कर दिया है। यदि तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को नहीं समझते, तो बहुत संभव है कि तुम उसके स्वभाव को ठेस पहुँचा दो। उसके स्वभाव का अपमान ऐसा अपराध है जो स्वयं परमेश्वर के क्रोध को भड़काने के समान है, अगर ऐसा होता है तो अंतत: तुम्हारे क्रियाकलापों का परिणाम प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन होगा। अब तुम्हें एहसास हो जाना चाहिए कि जब तुम उसके सार को जान जाते हो तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को भी समझ सकते हो, और जब तुम परमेश्वर के स्वभाव को समझ जाते हो तो तुम उसके प्रशासनिक आदेशों को भी समझ जाओगे। कहने की आवश्यकता नहीं है कि प्रशासनिक आदेशों में जो निहित है उसमें से काफी कुछ परमेश्वर के स्वभाव का जिक्र करता है, परन्तु उसका सम्पूर्ण स्वभाव प्रशासनिक आदेशों में प्रकट नहीं किया गया है; अत: परमेश्वर के स्वभाव की समझ को और ज़्यादा विकसित करने के लिए तुम्हें एक कदम और आगे बढ़ना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है' से उद्धृत

548. जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परमेश्वर उनके हृदय में बसता है और उनके भीतर हमेशा परमेश्वर का आदर करने वाला हृदय, परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय रहता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें सावधानी और समझदारी से कार्यों को करना चाहिए, और वे जो कुछ भी करें वह परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार होना चाहिये और उसके हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना चाहिए। उन्हें मनमाने ढंग से कुछ भी करते हुए दुराग्रही नहीं होना चाहिए; जो कि संतों की शिष्टता के अनुकूल नहीं है। लोग प्रवंचना और छल करते हुए सभी जगहों पर परमेश्वर का ध्वज लहराते हुए उन्मत्त हो कर नहीं भाग सकते हैं; यह सर्वाधिक विद्रोही प्रकार का आचरण है। परिवारों के अपने नियम होते हैं और राष्ट्रों के अपने कानून होते हैं; क्या परमेश्वर के परिवार में ऐसा और भी अधिक नहीं है? क्या मानक और भी अधिक सख़्त नहीं है? क्या और भी अधिक प्रशासनिक आदेश नहीं हैं? लोग जो चाहें वह करने के लिए स्वतंत्र हैं, परन्तु परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों को इच्छानुसार नहीं बदला जा सकता है। परमेश्वर आखिर परमेश्वर है जो मानवों से अपमान को सहन नहीं करता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो लोगों को मौत दे देता है। क्या लोग वास्तव में यह सब पहले से ही नहीं जानते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

549. हर युग में, जब परमेश्वर संसार में कार्य करता है तब वह मनुष्य को कुछ वचन प्रदान करता है, मनुष्य को कुछ सत्य बताता है। ये सत्य ऐसे मार्ग के रूप में कार्य करते हैं जिसके मुताबिक मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जिसमें मनुष्य को चलना है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में सक्षम बनाता है, और ऐसा मार्ग जिसे मनुष्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने जीवन में और अपनी जीवन यात्राओं के दौरान उसके मुताबिक चलना चाहिए। यह इन्हीं कारणों से है कि परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य को प्रदान करता है। ये वचन जो परमेश्वर से आते हैं उनके मुताबिक ही मनुष्य को चलना चाहिए, और उनके मुताबिक चलना ही जीवन पाना है। यदि कोई व्यक्ति उनके मुताबिक नहीं चलता है, उन्हें अभ्यास में नहीं लाता है, और अपने जीवन में परमेश्वर के वचनों को नहीं जीता है, तो वह व्यक्ति सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहा है। और यदि वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं, तो वे परमेश्वर का भय नहीं मान रहे हैं और दुष्टता से दूर नहीं रह रहे हैं, और न ही वे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यदि कोई परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता है, तो वह परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है; इस प्रकार के व्यक्ति के पास कोई परिणाम नहीं होता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

550. परमेश्वर के मार्ग पर चलना सतही तौर पर नियमों का पालन करने के बारे में नहीं है। इसके बजाय, इसका अर्थ है कि जब तुम्हारा सामना किसी मामले से होता है, तो सबसे पहले, तुम इसे ऐसी परिस्थिति के रूप में देखो जिसकी व्यवस्था परमेश्वर के द्वारा की गई है, ऐसे उत्तरदायित्व के रूप में देखो जिसे उसके द्वारा तुम्हें प्रदान किया गया है, या किसी ऐसी चीज़ के रूप में देखो जो उसने तुम्हें सौंपी है, और जब तुम इस मामले का सामना कर रहे होते हो, तो तुम्हें इसे भी परमेश्वर से आयी किसी परीक्षा के रूप में देखना चाहिए। इस मामले का सामना करते समय, तुम्हारे पास एक मानक अवश्य होना चाहिए, तुम्हें अवश्य सोचना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आया है। तुम्हें इस बारे में सोचना चाहिए कि कैसे इस मामले से इस तरह निपटो कि तुम अपने उत्तरदायित्व को पूरा कर सको, और परमेश्वर के प्रति वफ़ादार रह सको; इसे कैसे करो कि परमेश्वर को क्रोधित न करो, या उसके स्वभाव को अपमानित न करो। ... क्योंकि परमेश्वर के मार्ग पर चलने के लिए, हम किसी भी ऐसी चीज़ को जाने नहीं दे सकते हैं जिसका हमसे लेना देना है, या कोई ऐसी चीज़ जो हमारे आसपास घटित होती है, यहाँ तक कि छोटी-छोटी चीज़ें भी। इस बात की परवाह किए बिना कि हमें कोई मसला ध्यान देने योग्य लगता है नहीं, जब तक हमारा उससे सामना हो रहा है तब तक हमें उसे जाने नहीं देना चाहिए। इस सबको हमारे लिए परमेश्वर की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। इस प्रकार की प्रवृत्ति कैसी है? यदि तुम्हारी इस प्रकार की प्रवृत्ति है, तो यह एक तथ्य की पुष्टि करती है: तुम्हारा हृदय परमेश्वर का भय मानता है, और तुम्हारा हृदय दुष्टता से दूर रहने के लिए तैयार है। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए ऐसी इच्छा है, तो जिसे तुम अभ्यास में लाते हो वह परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मानक से दूर नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

551. परमेश्वर के प्रति अय्यूब का भय और आज्ञाकारिता मनुष्यजाति के लिए एक उदाहरण है, और उसकी सिद्धता और खराई मानवता की पराकाष्ठा थी जो मनुष्य के द्वारा अवश्य धारण की जानी चाहिए। यद्यपि उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, फिर भी उसने यह एहसास किया कि परमेश्वर सचमुच में अस्तित्व में है, और इस एहसास की वजह से वह परमेश्वर का भय मानता था—और परमेश्वर के अपने इसी भय के कारण, वह परमेश्वर का आज्ञा पालन करने में समर्थ था। जो कुछ उसके पास है उसे लेने की उसने परमेश्वर को खुली छूट दी, फिर भी उसने कोई शिकायत नहीं की, और वह परमेश्वर के सामने गिर गया और उसने परमेश्वर से कहा कि, इसी समय, भले ही परमेश्वर उसके प्राण ले ले, फिर भी वह, बिना किसी शिकायत के, प्रसन्नता से उसे ऐसा करने देगा। उसका सम्पूर्ण आचरण उसकी सिद्धता और सच्ची मानवता के कारण था। कहने का तात्पर्य है कि, अपनी निर्दोषता, ईमानदारी, और उदारता के परिणामस्वरूप, अय्यूब परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में अपने एहसास और अनुभव में अटल था, और इस बुनियाद पर उसने स्वयं के बारे में माँगें की तथा अपनी सोच, व्यवहार, आचरण और परमेश्वर के सामने कार्यों के सिद्धान्तों को उसके लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन और परमेश्वर के कर्मों के अनुसार मानकीकृत किया जिन्हें उसने सभी चीज़ों के बीच देखा था। समय बीतने के साथ, उसके अनुभवों ने उसमें परमेश्वर का सच्चा और वास्तविक भय उत्पन्न किया और उसे दुष्टता से दूर रखा। यह ईमानदारी का वही स्रोत था जिसे अय्यूब ने दृढ़ता से थामा। अय्यूब ने ईमानदार, निर्दोष, और उदार मानवता को धारण किया था, और उसे परमेश्वर का भय मानने का, परमेश्वर का आज्ञापालन का, और दुष्टता से दूर रहने का, और साथ ही उस ज्ञान का वास्तविक अनुभव था कि "यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया।" केवल इन्हीं चीज़ों की वजह से ही वह शैतान के ऐसे भयंकर हमलों के बीच डटे रहने और गवाही देने में समर्थ था, और केवल उन्हीं की वजह से वह उस वक्त परमेश्वर को निराश नहीं करने और परमेश्वर को एक संतोषजनक उत्तर देने में समर्थ था जब परमेश्वर की परीक्षाएँ उसके ऊपर आ पड़ी थीं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

552. अय्यूब ने परमेश्वर के चेहरे को नहीं देखा था, या परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को नहीं सुना था, उसने व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के कार्य का अनुभव तो बिलकुल भी नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रति उसके भय और उसकी परीक्षाओं के दौरान उसकी गवाही को सभी लोगों के द्वारा देखा जाता है, और परमेश्वर के द्वारा उनसे प्रेम किया जाता है, उनमें आनन्द मनाया जाता है, और उनकी प्रशंसा की जाती है, और लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं, और इसके अतिरिक्त, उनका स्तुति-गान करते हैं। उसके जीवन के बारे में कुछ भी महान या असाधारण नहीं था: किसी साधारण मनुष्य के समान ही, उसने एक साधारण जीवन जीया था, सूर्य उगने पर काम पर जाना और सूर्य अस्त होने पर अपने घर पर विश्राम के लिए वापस आना। अन्तर यह है कि इन अनेक साधारण दशकों के दौरान, उसने परमेश्वर के मार्ग में एक अंतर्दृष्टि प्राप्त की थी, और परमेश्वर की महान सामर्थ्य और संप्रभुता का ऐसा एहसास किया और उसे समझा था, जैसा किसी और व्यक्ति ने कभी नहीं किया था। वह किसी भी साधारण मनुष्य की अपेक्षा अधिक चतुर नहीं था, उसका जीवन खासतौर पर कठिन नहीं था, इसके अतिरिक्त, न ही उसके पास अदृश्य विशेष कौशल थे। यद्यपि जो उसने धारण किया था वह ऐसा व्यक्तित्व था जो ईमानदार, उदार, और सीधा था, एक ऐसा व्यक्तित्व जो निष्पक्षता और धार्मिकता से प्रेम करता था, और जो सकारात्मक चीज़ों से प्रेम करता था—जिनमें से कुछ भी अधिकांश सामान्य लोगों के द्वारा धारण नहीं किया जाता है। उसने प्रेम और घृणा के बीच अन्तर किया, उसके पास न्याय की समझ थी, वह अटल और दृढ़ था, और वह अपनी सोच में विस्तार के प्रति अतिसावधान ध्यान देता था, और इस प्रकार पृथ्वी पर अपने साधारण समय के दौरान उसने उन सभी असाधारण चीज़ों को देखा जिन्हें परमेश्वर ने किया था, और उसने परमेश्वर की महानता, पवित्रता और धार्मिकता को देखा, उसने मनुष्य के लिए परमेश्वर की चिंता, कृपा, और सुरक्षा को देखा, और सर्वोच्च परमेश्वर की माननीयता और अधिकार को देखा। अय्यूब क्यों इन चीज़ों को हासिल कर पाया था जो किसी भी साधारण मनुष्य से परे थीं, इसका पहला कारण था कि उसके पास एक शुद्ध हृदय था, और उसका हृदय परमेश्वर से सम्बन्धित था, और उसकी अगुवाई सृजनकर्ता के द्वारा की गई थी। दूसरा कारण था उसकी खोज: ऐसा व्यक्ति बनने की खोज जो निर्दोष, और सिद्ध हो, और ऐसा व्यक्ति हो जो स्वर्ग की इच्छा का पालन करे, जिसे परमेश्वर के द्वारा प्रेम किया जाए, और जो दुष्टता से दूर हो गया हो। अय्यूब ने परमेश्वर को देखने या परमेश्वर के वचनों को सुनने में असमर्थ होने पर इन चीज़ों को धारण किया और इनकी खोज की; यद्यपि उसने परमेश्वर को कभी नहीं देखा था, फिर भी वह उन उपायों को जान गया था जिनके द्वारा वह सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है; और उस बुद्धि को समझ गया था जिससे परमेश्वर ऐसा करता है। यद्यपि उसने परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को कभी नहीं सुना था, फिर भी अय्यूब जानता था कि मनुष्य को प्रतिफल देने और मनुष्य से ले लेने के सभी कर्म परमेश्वर की ओर से आते हैं। हालाँकि उसके जीवन के वर्ष किसी भी साधारण मनुष्य से भिन्न नहीं थे, फिर भी उसने अपने जीवन की असाधारणता को सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के अपने ज्ञान को प्रभावित करने, या परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग के अपने अनुसरण को प्रभावित करने नहीं दिया। उसकी नज़रों में, सभी चीज़ों के नियम परमेश्वर के कार्यों से भरे हुए थे, और परमेश्वर की संप्रभुता को व्यक्ति के जीवन के किसी भी भाग में देखा जा सकता था। उसने परमेश्वर को नहीं देखा था, परन्तु वह यह एहसास कर पाता था कि परमेश्वर के कर्म हर जगह हैं, और पृथ्वी पर अपने साधारण समय के दौरान, अपने जीवन के हर कोने में वह परमेश्वर के असाधारण और चमत्कारिक कर्मों को देख पाता था, और परमेश्वर की चमत्कारिक व्यवस्थाओं को देख सकता था। परमेश्वर की गोपनीयता और खामोशी ने अय्यूब के द्वारा परमेश्वर के कर्मों के एहसास को बाधित नहीं किया, न ही इसने सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के उसके ज्ञान को प्रभावित किया। उसका जीवन परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का एहसास था, जो उसके दैनिक जीवन के दौरान, सभी चीज़ों के बीच छिपा हुआ था। अपने दैनिक जीवन में उसने उस परमेश्वर के हृदय की आवाज़ को और परमेश्वर के वचनों को सुना और समझा था, जो सभी चीज़ों के बीच खामोश है, फिर भी अपने हृदय की आवाज़ और अपने वचनों को सभी चीज़ों के नियमों के शासन के द्वारा अभिव्यक्त करता है। तो तुम देखो, कि यदि लोगों के पास अय्यूब के समान ही मानवता और खोज हो, तो वे अय्यूब के समान एहसास और ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, और अय्यूब के समान ही सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता की समझ और ज्ञान को अर्जित कर सकते हैं। परमेश्वर अय्यूब पर प्रकट नहीं हुआ था या परमेश्वर ने उससे बात नहीं की थी, परन्तु अय्यूब सिद्ध, और खरा होने, तथा परमेश्वर का भय मानने और दुष्टता से दूर रहने में समर्थ था। दूसरे शब्दों में, बिना परमेश्वर के प्रकट हुए या मनुष्य से बात किए, सभी चीज़ों के बीच परमेश्वर के कर्म और सभी चीज़ों के ऊपर उसकी संप्रभुता किसी मनुष्य के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर के अस्तित्व, सामर्थ्य और अधिकार को जान ले, और परमेश्वर के सामर्थ्य और अधिकार ऐसे मनुष्य को परमेश्वर का भय दिलाने और दुष्टता से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करवाने के लिए पर्याप्त हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

553. "परमेश्‍वर का भय मानना और दुष्‍टता का त्‍याग करना" तथा परमेश्‍वर को जानना अभिन्‍न रूप से अनगिनत धागों से जुड़े हैं, और उनके बीच का संबंध स्‍पष्‍ट है। यदि कोई दुष्‍टता का त्‍याग करना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का वास्‍तविक भय होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के वास्‍तविक भय को पाना चाहता है, तो उसमें पहले परमेश्‍वर का सच्‍चा ज्ञान होना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के ज्ञान को पाना चा‍हता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए; परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, परमेश्वर के शुद्धिकरण और अनुशासन का अनुभव करना चाहिए, उसकी ताड़ना और न्याय का अनुभव करना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के वचनों का अनुभव करना चाहता है, तो उसे पहले परमेश्‍वर के वचनों के सम्‍मुख आना चाहिए, परमेश्‍वर के समक्ष आना चाहिए, और परमेश्‍वर से लोगों, घटनाओं और वस्‍तुओं के सम्‍मेलन वाले सभी प्रकार के वातावरणों के रूप में परमेश्‍वर के वचनों को अनुभव करने के अवसर देने का निवेदन करना चाहिए; यदि कोई परमेश्‍वर के और उसके वचनों के सम्‍मुख आना चाहता है, तो उसे पहले एक सरल और सच्‍चा हृदय, सत्‍य को स्‍वीकार करने की तत्‍परता, कष्‍ट झेलने की इच्‍छाशक्ति, दुष्‍टता का त्‍याग करने की दृढ़ता और साहस, और एक सच्‍चा सृजित प्राणी बनने की अभिलाषा रखनी चाहिए...। इस प्रकार कदम-दर-कदम आगे बढ़ते हुए, जैसे-जैसे तुम परमेश्‍वर के करीब आते जाओगे, तुम्‍हारा हृदय और पावन होता जाएगा, तुम्‍हारा जीवन और जीवित रहने के मूल्‍य, परमेश्‍वर के तुम्‍हारे ज्ञान के साथ-साथ अधिक-से-अधिक अर्थपूर्ण होते जाएंगे और अधिक-से-अधिक ज्योतिर्मय होते जाएंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

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वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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