अंतिम दिनों के मसीह के कथन- संकलन

विषय-वस्तु

मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करते हैं

अंत के दिनों का कार्य, सभी को उनके स्वभाव के आधार पर अलग करना, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का समापन करना है, क्योंकि समय निकट है और परमेश्वर का दिन आ पहुँचा है। जिन्होंने उसके राज्य में प्रवेश कर लिया है अर्थात्, वे सभी लोग जो अंत तक उसके वफादार रहे हैं, परमेश्वर उन सभी को स्वयं परमेश्वर के युग में ले जाता है। हालाँकि स्वयं परमेश्वर के युग के आने से पहले परमेश्वर जो कार्य करने की इच्छा रखता है वह मनुष्य के कर्मों को देखना या मनुष्य जीवनों के बारे में पूछताछ करना नहीं है, बल्कि उनके विद्रोह का न्याय करना है, क्योंकि परमेश्वर अपने सिंहासन के सामने आने वाले सभी लोगों को शुद्ध करेगा। आज तक जो लोग परमेश्वर के पदचिन्हों पर चले हैं ये ही वे हैं जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने आ गए हैं, इसलिए वे सभी जो परमेश्वर के अंतिम कार्य को स्वीकार करते हैं वे ही परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किए जाने हैं। दूसरे शब्दों में, जो परमेश्वर के अंतिम कार्य को स्वीकार करेंगे उन पर ही परमेश्वर द्वारा न्याय किया जाएगा।

जिस प्रकार से पहले कहा गया है कि, न्याय परमेश्वर के घर से ही आरम्भ होगा। यह “न्याय” परमेश्वर के उस न्याय को संदर्भित करता है जो अंत के दिनों में उसके सिंहासन के सामने आने वाले लोगों के साथ परमेश्वर आज करता है। शायद ऐसे लोग हैं जो ऐसी अलौकिक कल्पनाओं पर विश्वास करते हैं जैसे कि जब अंतिम दिन आ चुके होंगे, तो परमेश्वर स्वर्ग में ऐसी बड़ी मेज़ स्थापित करेगा, जिस पर सफेद कपड़ा बिछा होगा, फिर परमेश्वर एक बड़े सिंहासन पर बैठेगा और सभी लोग ज़मीन पर घुटने टेकेंगे। परमेश्वर उसके बाद प्रत्येक के सामने उसके पाप प्रकट करेगा ताकि इस बात का निर्धारण हो सके कि वह स्वर्ग में जाएगा या फिर वापिस आग और गंधक उगलने वाले दरिया में डाल दिए जाएगा। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य किस प्रकार की कल्पना करता है, परमेश्वर के कार्य का सार नहीं बदला जा सकता है। मनुष्य की कल्पनाएँ मनुष्य के विचारों की रचना से अधिक कुछ नहीं हैं और मनुष्य की देखी और सुनी हुई बाते जुड़ कर और एकत्रित हो कर उसके दिमाग से निकलती हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि, छवियों की कितनी ही उत्कृष्ट कल्पना की जाए, वे तब भी एक आरेख से अधिक कुछ नहीं हैं और परमेश्वर के कार्य की योजना की विकल्प नहीं हैं। आख़िरकार, सभी मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, तो वह कैसे परमेश्वर के विचारों की थाह पा सकता है? मनुष्य परमेश्वर के न्याय के कार्य को अत्यधिक विलक्षण होने की कल्पना करता है। मनुष्य यह विश्वास करता है कि जबकि परमेश्वर स्वयं ही न्याय का कार्य कर रहा है, तो यह अवश्य ही बहुत ज़बर्दस्त पैमाने का और नश्वरों के लिए समझ से बाहर होना चाहिए। इसे स्वर्ग भर में गूँजना और पृथ्वी को हिलाना अवश्य चाहिए, अन्यथा यह परमेश्वर के न्याय का कार्य कैसे हो सकता है? मनुष्य विश्वास करता है कि क्योंकि यह परमेश्वर के न्याय का कार्य है, तो जब वह कार्य करता है तो उसे विशेष रूप से प्रभाव डालने वाला और प्रतापी अवश्य होना चाहिए, और जिनका न्याय किया जा रहा है वे अवश्य आँसू बहाते हुए बिलख रहे होंगे और घुटनों पर टिक कर दया की भीख माँगेगे। यह दृश्य बहुत ही बड़ा नज़ारा और चौंकाने वाला अवश्य होना चाहिए...प्रत्येक मनुष्य परमेश्वर के महान न्याय के कार्य के पौराणिक होने की कल्पना करता है। हालाँकि, क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर के मनुष्यों के बीच न्याय के कार्य को आरम्भ करने के बहुत समय बाद, आप अभी भी गहरी नींद में पड़े हुए हैं? क्या आप जानते हैं, कि जिस समय आप यह मानते हैं परमेश्वर के न्याय का कार्य अधिकृत तौर पर आरम्भ हुआ है, तब तक तो पहले ही समय हो चुका होगा कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को बदल देगा। उस समय, शायद आपने केवल जीवन के अर्थ को ही समझा होगा, परन्तु परमेश्वर के न्याय का निष्ठुर कार्य आप को, तब भी ऊँघते हुए, नरक में पहुँचाएगा। उसके बाद ही आप को अचानक महसूस होगा कि परमेश्वर के न्याय का कार्य पहले से ही सम्पन्न हो चुका है।

आइए अनमोल समय को नष्ट न करें और इन वीभत्स और घृणित विषयों के बारे में और अधिक बातचीत न करें। इसके बजाय कौन सी चीज न्याय का गठन करती है आइए हम इस बारे में बातचीत करें। जब “न्याय” शब्द की बात आती है, तो आप उन वचनों के बारे में सोचेंगे जो यहोवा ने सभी स्थानों के लिए कहे थे और फटकार के उन वचनों के बारे में सोचेंगे जो यीशु ने फरीसियों को कहे थे। यद्यपि ये वचन कठोर हैं, किंतु ये मनुष्यों के बारे में परमेश्वर का न्याय नहीं हैं; ये परमेश्वर के द्वारा केवल विभिन्न परिस्थितियों, अर्थात्, विभिन्न हालातों में कहे गए वचन हैं, और ये यीशु द्वारा तब कहे गए वचनों के असमान हैं जब वह अन्त के दिनों में मनुष्यों का न्याय करता है। अंत के दिनों में, मसीह मनुष्य को सिखाने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है, मनुष्य के सार को प्रकट करता है, और उसके वचनों और कर्मों का विश्लेषण करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्य शामिल हैं, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता से, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसके स्वभाव इत्यादि को जीना चाहिए। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभाव पर केन्द्रित हैं। खासतौर पर, वे वचन जो यह प्रगट करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार से परमेश्वर का तिरस्कार करता है इस संबंध में बोले गए हैं कि किस प्रकार से मनुष्य शैतान का अवतार और परमेश्वर के विरूद्ध दुश्मन की शक्ति है। जब परमेश्वर न्याय का कार्य करता है, तो वह केवल कुछ वचनों से ही मनुष्य की प्रकृति को स्पष्ट नहीं करता है, बल्कि लम्बे समय तक प्रकाशन, व्यवहार, और काँट-छाँट कार्यान्वित करता है। इस प्रकार का प्रकाशन, व्यवहार और काँट-छाँट साधारण वचनों से नहीं बल्कि सत्य से प्रतिस्थापित किया जा सकता है, जिसे मनुष्य बिल्कुल भी धारण नहीं करता है। केवल इस तरीके का कार्य ही न्याय समझा जाता है, केवल इसी प्रकार के न्याय के द्वारा ही मनुष्य को समझाया जा सकता है, परमेश्वर के प्रति समर्पण में पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य परमेश्वर के असली चेहरे और उसके विद्रोहीशीलता के सत्य के बारे में मनुष्य में समझ उत्पन्न करता है। न्याय का कार्य मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा की, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की, और मनुष्य की समझ में न आ सकने वाले रहस्यों की अधिक समझ प्राप्त करने देता है। यह मनुष्य को उसके भ्रष्ट सार तथा उसके भ्रष्टाचार के मूल को पहचानने और जानने, साथ ही मनुष्य की कुरूपता को खोजने देता है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य के द्वारा सम्पादित होते हैं, क्योंकि इस तरह के कार्य का सार ही उन सभी के लिए वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य है जिनका उस पर विश्वास है। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया गया न्याय का कार्य है। यदि आप इन सत्यों को महत्व नहीं देते हैं और इनसे बचने के बारे में या इनसे अलग बच निकलने का कोई नया तरीका निरंतर विचार करते रहते हैं, तो मैं कहूँगा कि आप एक दारुण पापी हैं। यदि आपको परमेश्वर में विश्वास है, मगर सत्य या परमेश्वर की इच्छा को नहीं खोजते हैं, न ही परमेश्वर के निकट लाने वाले मार्ग को प्यार करते हैं, तो मैं कहता हूँ कि आप एक ऐसा व्यक्ति हैं जो न्याय से बचने की कोशिश कर रहा है। आप एक कठपुतली और ग़द्दार हैं जो श्वेत सिंहासन से दूर भाग रहा है, और परमेश्वर अपनी दृष्टि के नीचे से बचकर भागने वाले किसी भी विद्रोही को कभी नहीं छोड़ेगा। इस प्रकार के लोग और भी अधिक कठोर दण्ड प्राप्त करेंगे। जो न्याय किए जाने के लिए परमेश्वर के सम्मुख आते हैं और शुद्ध किए जा चुके हैं वे हमेशा के लिए परमेश्वर के राज्य में रहेंगे। वास्तव में, यह भविष्य में होना है।

न्याय का कार्य परमेश्वर का स्वयं का कार्य है, इसलिए स्वभाविक तौर पर इसे परमेश्वर के द्वारा ही अवश्य किया जाना चाहिए; उसकी जगह इसे मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सत्य के माध्यम से मनुष्य को जीतना न्याय है, इसलिए यह निर्विवाद है कि तब भी परमेश्वर मनुष्यों के मध्य अपना कार्य करने के लिए देहधारी छवि के रूप में प्रकट होता है। अर्थात्, अंत के दिनों में, मसीह पृथ्वी के चारों ओर मनुष्यों को सिखाने के लिए और सभी सत्यों को उन्हें ज्ञात करवाने के लिए सत्य का उपयोग करेगा। यही परमेश्वर के न्याय का कार्य है। परमेश्वर के दूसरे देह धारण के बारे में कई लोगों के मुँह का स्वाद कड़वा हो जाएगा, क्योंकि मनुष्य को यह बात स्वीकार करने में कठिनाई होती है कि परमेश्वर देह-धारण के रूप में न्याय का कार्य करेगा। परन्तु मैं आपको अवश्य बताना चाहता हूँ कि प्रायः परमेश्वर का कार्य मनुष्य की अपेक्षाओं से बहुत अधिक होता है और मनुष्य के मन इसे स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते हैं। क्योंकि मनुष्य पृथ्वी पर कीडे़-मकौड़ों के समान हैं, जबकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है; मनुष्य का मन गंदे पानी से भरे हुए एक गड्डे के समान हैं जो केवल कीड़े-मकौड़ों को ही उत्पन्न करता है, जबकि परमेश्वर के विचारों द्वारा निर्देशित कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर की बुद्धि का ही परिणाम है। मनुष्य निरंतर परमेश्वर के साथ संघर्ष करता रहता है; तो मैं कहता हूँ कि यह स्व-प्रमाणित है कि कौन अंत में हारने के लिए खड़ा है। मैं आप सभी को प्रोत्साहित करता हूँ कि आप अपने आप को सोने से अधिक महत्वपूर्ण न समझें। यदि अन्य लोग परमेश्वर के न्याय को स्वीकार कर सकते हैं, तो फिर आप क्यों नहीं स्वीकार कर सकते हैं? आप दूसरों से कितना ऊँचा खड़े हैं? यदि सत्य के आगे दूसरे अपने सिर झुका सकते हैं, तो आप भी ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं? परमेश्वर के महान कार्य की प्रवृत्ति अविरल है। वह आप की “योग्यताओं” के कारण न्याय के कार्य को फिर से नहीं दोहराएगा, और आप इतने अच्छे अवसर को खोने के कारण बुरी तरह से पछतावा करेंगे। यदि आप को मेरे वचनों पर यकीन नहीं है, तो बस आकाश में उस महान श्वेत सिंहासन द्वारा आप पर “न्याय पारित करने” की प्रतीक्षा करें! आप को अवश्य जानना चाहिए कि सभी इजराइलियों ने यीशु को ठुकराया और अस्वीकार किया था, मगर यीशु द्वारा मानवजाति के छुटकारे का तथ्य अभी भी ब्रह्माण्ड के सिरे तक फैल रहा है। क्या यह तथ्य नहीं है जिसे परमेश्वर ने बहुत पहले पूरा कर दिया था? यदि आप अभी भी यीशु के द्वारा स्वर्ग में उठाए जाने का इंतजार कर रहे हैं, तो मैं कहता हूँ कि आप हठीले अवांछित व्यक्ति हैं।[अ] यीशु आपके जैसे किसी भी झूठे विश्वासी को अभिस्वीकृत नहीं करेगा जो सत्य के प्रति वफादार नहीं हैं और केवल आशीषों की ही माँग करता है। इसके विपरीत, वह दसों हज़ार वर्षों तक जलने देने के लिए आग की झील में आपको फेंकने में कोई दया नहीं दिखाएगा।

क्या अब आप समझ गए कि न्याय क्या है और सत्य क्या है? यदि आप अब समझ गए हैं, तो मैं आप को न्याय के प्रति समर्पित होने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ, अन्यथा आप को कभी भी परमेश्वर की प्रशंसा पाने का या परमेश्वर द्वारा उसके राज्य में ले जाए जाने का अवसर नहीं मिलेगा। जो केवल न्याय को ग्रहण करते हैं परन्तु कभी भी शुद्ध नहीं हो सकते हैं, अर्थात्, जो न्याय के कार्य के मध्य ही भाग जाते हैं, वे हमेशा के लिए परमेश्वर द्वारा नफ़रत और अस्वीकार कर दिए जाएँगे। फरीसियों की तुलना में उनके पाप बहुत अधिक हैं, और अधिक दारुण हैं, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया है और वे परमेश्वर के विरोधी हैं। इस प्रकार के लोग सेवा करने के योग्य भी नहीं है वे अधिक कठोर, अनन्त दण्ड भुगतेंगे। परमेश्वर किसी भी गद्दार को नहीं छोड़ेगा जिसने एक बार तो अपने वचनों के साथ वफादारी का दावा किया मगर फिर परमेश्वर को धोखा दिया। इस प्रकार के लोग आत्मा, प्राण और देह के दण्ड के माध्यम से प्रतिफल महसूस करेंगे। क्या यह परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को प्रकट नहीं करता है? क्या यही वास्तव में परमेश्वर के न्याय और मनुष्यों के प्रकाशन का उद्देश्य नहीं है? सभी प्रकार के दुष्ट कर्म करने वाले ऐसे सभी लोगों को परमेश्वर न्याय के समय ऐसे स्थान में रखेगा जहाँ दुष्टात्माएँ रहती हैं ताकि आत्माएँ अपनी इच्छानुसार उनके दैहिक शरीरों को नष्ट करें। उनके शरीरों से लाश की दुर्गंध आने लगेगी और ऐसा ही उनका उचित प्रतिफल होगा। परमेश्वर उन निष्ठाहीन झूठे विश्वासियों, झूठे प्रेरितों, और झूठे कार्यकर्ताओं के हर एक पाप को उनकी अभिलेख पुस्तक में लिखता है, फिर जब सही समय आता है, वह उन्हें गंदी आत्माओं के बीच में फेंक देता है ताकि आत्माएँ अपनी इच्छानुसार उनके सम्पूर्ण शरीरों को दूषित करें और, परिणामस्वरूप, वे कभी भी पुनःदेहधारण नहीं कर पाएँगे और कभी भी रोशनी को नहीं देखेंगे। ऐसे पाखण्डी जो किसी समय सेवकाई किया करते थे परन्तु अंत तक वफादार बने रहने में सक्षम नहीं रहे उन्हें परमेश्वर द्वारा दुष्टों में मध्य गिना जाएगा ताकि वे दुष्टों की सलाह पर चलें, एक उपद्रवी भीड़ का हिस्सा बनें। अंत में, परमेश्वर उन्हें ऩष्ट कर देगा। परमेश्वर उन लोगों को अलग फेंक देगा और उन पर कोई ध्यान नहीं देगा जो कभी भी महीस के वफादार नहीं रहे हैं या जिन्होंने कोई भी प्रयास समर्पित नहीं किया है, और युगों के बदलने में उन सभी को नष्ट कर देगा। वे पृथ्वी पर अब और नहीं रहेंगे, परमेश्वर के राज्य में मार्ग तो बिल्कुल नहीं प्राप्त करेंगे। जो कभी भी परमेश्वर के प्रति सच्चे नहीं रहे हैं परन्तु परमेश्वर के साथ कार्य करने के लिए मजबूर किए जाते हैं उनकी गिनती परमेश्वर के लिए कार्य करने वालों के मध्य होगी। छोटी सी संख्या में केवल ऐसे ही कुछ लोग जीवित रह सकते हैं, जबकि बहुसंख्य उन लोगों के साथ समाप्त हो जाएँगे जो सेवा करने के लिए भी योग्य नहीं हैं। अंत में, परमेश्वर उन सभी को जिनका मन परमेश्वर के समान है, लोगों को और परमेश्वर के पुत्रों को और साथ ही पादरी बनाए जाने के लिए पूर्वनियत लोगों को, अपने राज्य में ले आएगा। यही प्रतिफल परमेश्वर द्वारा उसके कार्य के माध्यम के द्वारा उत्पन्न किया गया है। उनके लिए जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित किसी भी श्रेणी में नहीं आ सकते हैं, वे अविश्वासियों के मध्य गिने जाएँगे। और आप लोग निश्चय ही कल्पना कर सकते हैं कि उनका परिणाम क्या होगा। मैं आप सभी लोगों से पहले ही कह चुका हूँ जो मुझे कहना चाहिए था; आप लोग जिस मार्ग को चुनते हैं वह निर्णय आप लोगों का लिया हुआ निर्णय होगा। आपको जो समझने की आवश्यकता है वह है किः परमेश्वर का कार्य ऐसे किसी का भी इंतज़ार नहीं करता है जो परमेश्वर के साथ तालमेल बनाए नहीं रख सकता है, और परमेश्वर का धर्मी स्वभाव किसी भी व्यक्ति के प्रति कोई दया नहीं दिखाता है।

फुटनोटः-

अ. ठूँठ का एक टुकड़ा (A piece of deadwood) यह चीन की एक प्रचलित कहावत है, जिसका अर्थ है – “एक आशाहीन मामला”।