487 परमेश्‍वर के वचनों के बिना जीवन का अनुसरण नहीं किया जा सकता

जीवन का अनुसरण करने में, तुम्‍हें दो बातों पर ज़रूर ध्‍यान देना चाहिए : पहली, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर के सत्य को समझना; दूसरी, परमेश्‍वर के वचनों के भीतर स्‍वयं को समझना। ये दो बातें सबसे बुनियादी हैं। परमेश्‍वर के वचनों के बाहर कोई जीवन या सत्य नहीं है। अगर तुम परमेश्‍वर के वचनों के भीतर सत्य को नहीं खोजते हो, तो फिर तुम उसे खोजने कहाँ जा सकते हो? दुनिया में सत्य कहाँ है? संसार की किसी भी पुस्तक में लेशमात्र भी सत्य नहीं है! परमेश्‍वर के वचनों में सत्य को समझने का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग है परमेश्‍वर को उसके ही वचनों के भीतर समझना, उसके वचनों के भीतर मानव जीवन को समझना, उसके वचनों के भीतर सत्य के सभी पहलुओं को समझना, और परमेश्‍वर के वचनों के भीतर सच्चे अर्थों में स्वयं को जानना और मानवता के अस्तित्‍व का अर्थ खोजना...। समस्‍त सत्य परमेश्‍वर के वचनों के भीतर है। तुम सत्य में तब तक प्रवेश नहीं कर सकते जबतक कि प्रवेश परमेश्‍वर के वचनों के ज़रिए न किया जाए। वह मुख्‍य परिणाम जो तुम्हें प्राप्त करना है, यह जानना है कि परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ और ज्ञान से युक्त होना क्‍या होता है। परमेश्‍वर के वचनों की वास्‍तविक समझ के साथ, तुम फिर सत्य को समझ सकते हो। यह सबसे बुनियादी बात है।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से रूपांतरित

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