1. सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही एक सच्चा परमेश्वर है जो सभी चीज़ों पर शासन करता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

इस दुनिया की हर चीज़ तेज़ी से सर्वशक्तिमान के विचारों और उसकी नज़रों तले बदलती है। मानवजाति ने जिन चीज़ों के बारे में कभी नहीं सुना है वो अचानक आ जाती हैं, जबकि माउसके पास जो कुछ लंबे समय से रहा है वो अनजाने में उसके हाथ से फिसल जाता है। सर्वशक्तिमान के ठौर-ठिकाने की थाह कोई नहीं पा सकता, सर्वशक्तिमान की जीवन शक्ति की उत्कृष्टता और महानता का एहसास करने की तो बात ही दूर है। वह इसलिए उत्कृष्ट है कि वह वो समझ सकता है जो मनुष्य नहीं समझ सकता। वह महान इसलिए है कि वह मानवजाति द्वारा त्यागे जाने के बाद भी उसे बचाता है। वह जीवन और मृत्यु का अर्थ जानता है, इसके अतिरिक्त, वह जानता है कि उसके द्वारा सृजित मानवजाति के अस्तित्व को संचालित करने के लिए कौन से नियम उपयुक्त हैं। वह मानव अस्तित्व की नींव है, वह मानवजाति को फिर से जीवित करने वाला मुक्तिदाता है। वह प्रसन्नचित्त दिलों को दु:ख देकर नीचे लाता है और दुखी दिलों को खुशी देकर ऊपर उठाता है, ये सब उसके कार्य के लिए है, उसकी योजना के लिए है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सर्वशक्तिमान की आह' से उद्धृत

ब्रह्मांड और आकाश की विशालता में अनगिनत जीव रहते और प्रजनन करते हैं, जीवन के चक्रीय नियम का पालन करते हैं, और एक अटल नियम का अनुसरण करते हैं। जो मर जाते हैं, वे अपने साथ जीवित लोगों की कहानियाँ लेकर चले जाते हैं, और जो लोग जी रहे हैं, वे खत्म हो चुके लोगों के त्रासद इतिहास को ही दोहराते हैं। और इसलिए, मानवजाति खुद से पूछे बिना नहीं रह पाती : हम क्यों जीते हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? इस संसार को कौन नियंत्रित करता है? और इस मानवजाति को किसने बनाया? क्या मानवजाति को वास्तव में प्रकृति माता ने बनाया? क्या मानवजाति वास्तव में अपने भाग्य की नियंत्रक है? ... मानवजाति यह नहीं जानती कि ब्रह्मांड और सभी चीज़ों का संप्रभु कौन है, और मानवजाति के प्रारंभ और भविष्य के बारे में तो वह बिलकुल भी नहीं जानती। मानवजाति केवल इस व्यवस्था के बीच विवशतापूर्वक जीती है। इससे कोई बच नहीं सकता और इसे कोई बदल नहीं सकता, क्योंकि सभी चीज़ों के बीच और स्वर्ग में अनंतकाल से लेकर अनंतकाल तक वह एक ही है, जो सभी चीज़ों पर अपनी संप्रभुता रखता है। वह एक ही है, जिसे मनुष्य द्वारा कभी देखा नहीं गया है, वह जिसे मनुष्य ने कभी नहीं जाना है, जिसके अस्तित्व पर मनुष्य ने कभी विश्वास नहीं किया है—फिर भी वह एक ही है, जिसने मनुष्य के पूर्वजों में साँस फूँकी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वह एक ही है, जो मानवजाति का भरण-पोषण करता है और उसका अस्तित्व बनाए रखता है; और वह एक ही है, जिसने आज तक मानवजाति का मार्गदर्शन किया है। इतना ही नहीं, वह और केवल वह एक ही है, जिस पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। वह सभी चीज़ों पर संप्रभुता रखता है और ब्रह्मांड के सभी जीवित प्राणियों पर राज करता है। वह चारों मौसमों पर नियंत्रण रखता है, और वही है जो हवा, ठंड, हिमपात और बारिश लाता है। वह मानवजाति के लिए सूर्य का प्रकाश लाता है और रात्रि का सूत्रपात करता है। यह वही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी की व्यवस्था की, और मनुष्य को पहाड़, झीलें और नदियाँ और उनके भीतर के सभी जीव प्रदान किए। उसके कर्म सर्वव्यापी हैं, उसकी सामर्थ्य सर्वव्यापी है, उसकी बुद्धि सर्वव्यापी है, और उसका अधिकार सर्वव्यापी है। इन व्यवस्थाओं और नियमों में से प्रत्येक उसके कर्मों का मूर्त रूप है और प्रत्येक उसकी बुद्धिमत्ता और अधिकार को प्रकट करता है। कौन खुद को उसके प्रभुत्व से मुक्त कर सकता है? और कौन उसकी अभिकल्पनाओं से खुद को छुड़ा सकता है? सभी चीज़ें उसकी निगाह के नीचे मौजूद हैं, और इतना ही नहीं, सभी चीज़ें उसकी संप्रभुता के अधीन रहती हैं। उसके कर्म और उसकी सामर्थ्य मानवजाति के लिए इस तथ्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं छोड़ती कि वह वास्तव में मौजूद है और सभी चीज़ों पर संप्रभुता रखता है। उसके अतिरिक्त कोई ब्रह्मांड पर नियंत्रण नहीं रख सकता, और मानवजाति का निरंतर भरण-पोषण तो बिलकुल नहीं कर सकता। चाहे तुम परमेश्वर के कर्मों को पहचानने में सक्षम हो या न हो, और चाहे तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो या न करते हो, इसमें कोई शक नहीं कि तुम्हारा भाग्य परमेश्वर द्वारा निर्धारित किया जाता है, और इसमें भी कोई शक नहीं कि परमेश्वर हमेशा सभी चीज़ों पर अपनी संप्रभुता रखेगा। उसका अस्तित्व और अधिकार इस बात से निर्धारित नहीं होता कि वे मनुष्य द्वारा पहचाने और समझे जाते हैं या नहीं। केवल वही मनुष्य के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानता है, और केवल वही मानवजाति के भाग्य का निर्धारण कर सकता है। चाहे तुम इस तथ्य को स्वीकार करने में सक्षम हो या न हो, इसमें ज्यादा समय नहीं लगेगा, जब मानवजाति अपनी आँखों से यह सब देखेगी, और परमेश्वर जल्दी ही इस तथ्य को साकार करेगा। मनुष्य परमेश्वर की आँखों के सामने जीता है और मर जाता है। मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए जीता है, और जब उसकी आँखें आखिरी बार बंद होती हैं, तो इस प्रबंधन के लिए ही बंद होती हैं। मनुष्य बार-बार, आगे-पीछे, आता और जाता रहता है। बिना किसी अपवाद के, यह परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी अभिकल्पना का हिस्सा है। परमेश्वर का प्रबंधन कभी रुका नहीं है; वह निरंतर अग्रसर है। वह मानवजाति को अपने अस्तित्व से अवगत कराएगा, अपनी संप्रभुता में विश्वास करवाएगा, अपने कर्मों का अवलोकन करवाएगा, और अपने राज्य में वापस लौट जाएगा। यही उसकी योजना और कार्य है, जिनका वह हजारों वर्षों से प्रबंधन कर रहा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है' से उद्धृत

जीवन का मार्ग कोई ऐसी चीज नहीं है जो हर किसी के पास होता है, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे हर कोई आसानी से प्राप्त कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि जीवन केवल परमेश्वर से ही आ सकता है, कहने का तात्पर्य है कि केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही जीवन का सार है, और केवल स्वयं परमेश्वर के पास ही जीवन का मार्ग है। और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और जीवन के जल का सदा बहने वाला सोता है। जब से परमेश्वर ने संसार को रचा है, उसने जीवन की प्राणशक्ति से जुड़ा बहुत-सा कार्य किया है, बहुत-सा कार्य मनुष्य को जीवन प्रदान करने के लिए किया है, और मनुष्य जीवन प्राप्त कर सके इसके लिए उसने भारी मूल्य चुकाया है। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर स्वयं अनंत जीवन है, और परमेश्वर स्वयं वह मार्ग है जिससे मनुष्य पुनर्जीवित होता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी अनुपस्थित नहीं होता, और हर समय मनुष्य के बीच रहता है। वह मनुष्य के जीवनयापन की प्रेरक शक्ति, मनुष्य के अस्तित्व का आधार, और जन्म के बाद मनुष्य के अस्तित्व के लिए समृद्ध भंडार रहा है। वह मनुष्य के पुनः जन्म लेने का निमित्त है, और उसे प्रत्येक भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने के लिए समर्थ बनाता है। उसकी सामर्थ्य और उसकी कभी न बुझने वाली जीवन शक्ति की बदौलत, मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहा है, इस दौरान परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य मनुष्य के अस्तित्व का मुख्य आधार रही है, और जिसके लिए परमेश्वर ने वह कीमत चुकाई है जो कभी किसी साधारण मनुष्य ने नहीं चुकाई। परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी अन्य शक्ति से जीत सकती है; इससे भी अधिक, यह किसी भी शक्ति से बढ़कर है। उसका जीवन अनंत है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसकी जीवन शक्ति को किसी भी सृजित प्राणी या शत्रु शक्ति द्वारा पराजित नहीं किया जा सकता है। समय और स्थान चाहे जो हो, परमेश्वर की जीवन शक्ति विद्यमान रहती है और अपने देदीप्यमान तेजस्व से चमकती है। स्वर्ग और पृथ्वी बड़े बदलावों से गजर सकते हैं, परंतु परमेश्वर का जीवन हमेशा एक समान ही रहता है। हर चीज का अस्तित्व समाप्त हो सकता है, परंतु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा, क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत और उनके अस्तित्व का मूल है। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से उत्पन्न होता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है, और पृथ्वी का अस्तित्व परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य से उत्पन्न होता है। प्राणशक्ति से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर की प्रभुसत्ता से बाहर नहीं हो सकती, और ऊर्जा से युक्त कोई भी वस्तु परमेश्वर के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं जा सकती। इस प्रकार, वे चाहे कोई भी हों, सभी को परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पित होना ही होगा, प्रत्येक को परमेश्वर की आज्ञा के अधीन रहना ही होगा, और कोई भी उसके हाथों से बच नहीं सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

मानवजाति के अस्तित्व में आने से पहले, ब्रह्माण्ड—आकाश के समस्त ग्रह, सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। बृहद स्तर पर, ये खगोलीय पिंड, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के लिए, परमेश्वर के नियन्त्रण में नियमित रूप से अपने कक्ष में परिक्रमा करते रहे हैं, चाहे ऐसा करने में कितने ही वर्ष लगते हों। कौन-सा ग्रह किस समय में कहाँ जाता है; कौन-सा ग्रह कौन-सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन-सा ग्रह किस कक्ष में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें बिना कोई त्रुटि के होती रहती हैं। ग्रहों की स्थितियाँ और उनके बीच की दूरियाँ सभी कठोर प्रतिमानों का पालन करती हैं, उन सभी को सटीक आँकड़ों द्वारा वर्णित किया जा सकता है; वे जिस ग्रहपथ पर घूमते हैं, उनके कक्षों की गति और स्वरूप, वह समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं, इन सभी को सटीक ढंग से निर्धारित व विशेष नियमों द्वारा परिमाणित किया जा सकता है। बिना चूके युगों से ग्रह इन नियमों का पालन कर रहे हैं। कोई भी शक्ति उनके कक्षों या तरीकों को, जिनका वे पालन करते हैं, नहीं बदल सकती, न ही कोई रुकावट पैदा कर सकती है। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को संचालित करते हैं और वे सटीक आँकड़े जो उनका वर्णन करते हैं, सृजनकर्त्ता के अधिकार द्वारा पूर्वनियत हैं, वे सृजनकर्त्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन अपनी इच्छा से करते हैं। बृहत स्तर पर, कुछ प्रतिमानों, कुछ आँकड़ों, और कुछ अजीब और समझाए न जा सकने वाले नियमों या घटनाओं के बारे में जानना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। यद्यपि मानवजाति यह नहीं स्वीकारती कि परमेश्वर है, न ही इस तथ्य को स्वीकार करती है कि सृजनकर्त्ता ने ही हर चीज़ को बनायी है और हर चीज़ उसी के नियन्त्रण में है, और यही नहीं सृजनकर्त्ता के अधिकार के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारती, फिर भी मानव-विज्ञानी, खगोलशास्त्री और भौतिक-विज्ञानी इसी खोज में लगे हुए हैं कि इस सार्वभौम में सभी चीज़ों का अस्तित्व, और वे सिद्धान्त और प्रतिमान जो उनकी गति को निर्धारित करते हैं, वे सभी एक व्यापक और अदृश्य गूढ़ ऊर्जा द्वारा शासित और नियन्त्रित होते हैं। यह तथ्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतियों के स्वरूपों के बीच एकमात्र शक्तिशाली परमेश्वर ही है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और यद्यपि कोई भी उसके असली स्वरूप को नहीं देख पाता, फिर भी वह हर क्षण हर एक चीज़ को संचालित और नियन्त्रित करता है। कोई भी व्यक्ति या ताकत उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह अवश्य पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व को संचालित करते हैं उन्हें मनुष्यों द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता, किसी के भी द्वारा बदला नहीं जा सकता; साथ ही उसे यह भी स्वीकार करना चाहिए कि मानवजाति इन नियमों को पूरी तरह से नहीं समझ सकती, और वे प्राकृतिक रूप से घटित नहीं हो रही हैं, बल्कि एक परम सत्ता उनका निर्धारण कर रही है। ये सब परमेश्वर के अधिकार की अभिव्यक्तियाँ हैं जिन्हें मनुष्य जाति बृहत स्तर पर समझ व महसूस कर सकती है।

सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सारे मौसम जिनका वह अनुभव करता है, पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य सहित, सारी चीज़ें जो पृथ्वी पर निवास करती हैं, सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और परमेश्वर द्वारा नियन्त्रित की जाती हैं। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अंतर्गत, सभी चीज़ें उसके विचारों के अनुरूप अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं; नियम बनते हैं जो उनके जीवन को संचालित करते हैं, और वे उनके अनुसार चलते हुए विकास करते हैं और निरंतर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज़ इन नियमों के ऊपर नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों का सृजन किया, तो उसने पहाड़ों, मैदानों, रेगिस्तानों, पहाड़ियों, नदियों और झीलों के लिए सीमाएँ खींचीं। पृथ्वी पर पर्वत, मैदान, मरूस्थल, और पहाड़ियों के साथ ही जल के विभिन्न स्रोत हैं। क्या ये विभिन्न प्रकार के भूभाग नहीं हैं? परमेश्वर ने विभिन्न प्रकार के इन भूभागों के बीच सीमाएँ खींची थी। जब हम सीमाओं के निर्माण की बात करते हैं, तो इसका अर्थ है कि पर्वतों की अपनी सीमा-रेखाएँ हैं, मैदानों की अपनी स्वयं की सीमा-रेखाएँ हैं, मरुस्थलों की कुछ सीमाएँ हैं, पहाड़ों का अपना एक निश्चित क्षेत्र है। साथ ही जल के स्रोतों, जैसे नदियों और झीलों की भी एक निश्चित संख्या है। अर्थात्, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की तब उसने हर चीज़ को पूरी स्पष्टता से विभाजित किया। ... परमेश्वर अपने द्वारा सृजित इन सभी विभिन्न भूभागों और भौगोलिक वातावरण के भीतर, सारी चीजों का प्रबंधन, एक योजनाबद्ध और सुव्यवस्थित तरीके से कर रहा है। अतः परमेश्वर द्वारा सृजे जाने के पश्चात कई हज़ार वर्षों से, दसियों हज़ार वर्षों से ये सभी भौगोलिक पर्यावरण अभी भी अस्तित्व में हैं और अपनी भूमिकाएँ निभा रहे हैं। हालांकि ऐसे समय आते हैं जब ज्वालामुखी फटते हैं, भूकंप आते हैं, और बड़े पैमाने पर भूमि की जगह बदल जाती है, फिर भी परमेश्वर किसी भी प्रकार के भू-भाग को अपने मूल कार्य को छोड़ने की अनुमति बिलकुल नहीं देगा। केवल परमेश्वर के इस प्रबंधन, उसके शासन और इन नियमों पर उसके नियंत्रण के कारण ये सारी चीजें—जिन्हें मानवजाति देखती और जिनका आनन्द लेती है—सुव्यवस्थित तरीके से पृथ्वी पर बरकरार रहने में सक्षम हैं। ...

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... विभिन्न भौगोलिक वातावरण के लिए सीमाएँ स्थापित करने के अलावा, परमेश्वर ने विभिन्न पशु-पक्षियों, मछलियों, कीड़े-मकोड़ों, और सभी पेड़-पौधों के लिए सीमाएँ खींचीं। उसने नियम भी स्थापित किये। विभिन्न भौगोलिक वातावरण के मध्य भिन्नताओं के कारण और विभिन्न भौगोलिक वातावरण की मौजूदगी के कारण, विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों, मछलियों, कीड़े-मकोड़ों, और पेड़-पौधों के पास जीवित रहने के लिए अलग-अलग वातावरण हैं। पशु-पक्षी और कीड़े-मकोड़े विभिन्न पेड़-पौधों के बीच रहते हैं, मछलियां पानी में रहती हैं, और पेड़-पौधे भूमि पर उगते हैं। ... परमेश्वर के द्वारा रची गयी सभी चीज़ों के जीवित रहने के लिए अपने नियम हैं—इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे एक ही स्थान में स्थायी रूप से रहते हैं या वे अपने नथुनों से साँस ले सकते हैं या नहीं। परमेश्वर ने इन प्राणियों क सृजित करने के बहुत पहले ही उनके लिये निवास-स्थान, और जीवित रहने के लिए उनके अनुकूल वातावरण बना दिया था। इन प्राणियों के पास जीवित रहने के लिए उनका अपना स्थायी वातावरण, अपना भोजन, अपना निवास-स्थान था और उनके जीवित रहने के लिए उपयुक्त तापमानों से युक्त निर्धारित जगहें थीं। इस तरह वे इधर-उधर भटकते नहीं थे या मानवजाति के जीवन को कमज़ोर या प्रभावित नहीं करते थे। परमेश्वर सभी चीज़ों का प्रबंधन इसी तरह से करता है। वह मानवजाति के जीवित रहने हेतु उत्तम वातावरण प्रदान करता है। सभी चीज़ों के अंतर्गत जीवित प्राणियों में से प्रत्येक के पास जीवित रहने हेतु वातावरण के भीतर जीवन को बनाए रखने वाला भोजन है। उस भोजन के साथ, वे जीवित रहने के लिए अपने पैदाइशी वातावरण से जुड़े रहते हैं; उस प्रकार के वातावरण में, वे परमेश्वर द्वारा स्थापित नियमों के अनुसार निरंतर जीवन-यापन कर रहे हैं, वंश-वृद्धि कर रहे हैं और आगे बढ़ रहे हैं। इस प्रकार के नियमों के कारण, और परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण के कारण, सभी चीज़ें मनुष्यजाति के साथ सामंजस्य में रहती हैं और मनुष्यजाति सभी चीज़ों के साथ परस्पर निर्भरता और सह-अस्तित्व में एक साथ रहती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX' से उद्धृत

जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो, उसी पल से तुम अपना कर्तव्य पूरा करना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान में अपनी भूमिका निभाते हुए तुम अपनी जीवन-यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता, और किसी का भी अपनी नियति पर नियंत्रण नहीं है, क्योंकि केवल वही, जो सभी चीज़ों पर शासन करता है, ऐसा करने में सक्षम है। जिस दिन से मनुष्य अस्तित्व में आया है, परमेश्वर ने ब्रह्मांड का प्रबंधन करते हुए, सभी चीज़ों के लिए परिवर्तन के नियमों और उनकी गतिविधियों के पथ को निर्देशित करते हुए हमेशा ऐसे ही काम किया है। सभी चीज़ों की तरह मनुष्य भी चुपचाप और अनजाने में परमेश्वर से मिठास और बारिश तथा ओस द्वारा पोषित होता है; सभी चीज़ों की तरह मनुष्य भी अनजाने में परमेश्वर के हाथ के आयोजन के अधीन रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में हैं, उसके जीवन की हर चीज़ परमेश्वर की दृष्टि में रहती है। चाहे तुम यह मानो या न मानो, कोई भी और सभी चीज़ें, चाहे जीवित हों या मृत, परमेश्वर के विचारों के अनुसार ही जगह बदलेंगी, परिवर्तित, नवीनीकृत और गायब होंगी। परमेश्वर सभी चीज़ों को इसी तरीके से संचालित करता है।

जब रात चुपचाप आती है, मनुष्य अनजान रहता है, क्योंकि मनुष्य का हृदय यह नहीं समझ सकता कि रात कैसे आती है या कहाँ से आती है। जब रात चुपचाप चली जाती है, मनुष्य दिन के उजाले का स्वागत करता है, लेकिन उजाला कहाँ से आया है और कैसे इसने रात के अँधेरे को दूर भगाया है, मनुष्य यह तो बिलकुल भी नहीं जानता और इससे तो बिलकुल भी अवगत नहीं है। दिन और रात की यह बारंबार होने वाली अदला-बदली मनुष्य को एक अवधि से दूसरी अवधि में, एक ऐतिहासिक संदर्भ से अगले संदर्भ में ले जाती है, और यह भी सुनिश्चित करती है कि हर अवधि में परमेश्वर का कार्य और हर युग के लिए उसकी योजना कार्यान्वित की जाए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है' से उद्धृत

संसार के सृजन के समय से मैंने लोगों के इस समूह को—अर्थात् आज के तुम लोगों को—पूर्वनिर्धारित करना तथा चुनना प्रारंभ कर दिया है। तुम लोगों का मिज़ाज, क्षमता, रूप-रंग, कद-काठी, वह परिवार जिसमें तुमने जन्म लिया, तुम्हारी नौकरी और तुम्हारा विवाह—अपनी समग्रता में तुम, यहां तक कि तुम्हारे बालों और त्वचा का रंग, और तुम्हारे जन्म का समय—सभी कुछ मेरे हाथों से तय किया गया था। यहां तक कि हर एक दिन जो चीज़ें तुम करते हो और जिन लोगों से तुम मिलते हो, उसकी व्यवस्था भी मैंने अपने हाथों से की थी, साथ ही आज तुम्हें अपनी उपस्थिति में लाना भी वस्तुत: मेरा ही आयोजन है। अपने आप को अव्यवस्था में न डालो; तुम्हें शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 74' से उद्धृत

मानवजाति और विश्व के भाग्य सृजनकर्ता की संप्रभुता के साथ घनिष्ठता से गुँथे हुए हैं, और सृजनकर्ता के आयोजनों के साथ अविभाज्य रूप से बँधे हुए हैं; अंत में, वे सृजनकर्ता के अधिकार से अलग नहीं हो सकते। सभी चीज़ों के नियमों के माध्यम से मनुष्य सृजनकर्ता के आयोजन और उसकी संप्रभुता को समझ जाता है; सभी चीज़ों के जीने के नियमों के माध्यम से वह सृजनकर्ता के संचालन को समझ जाता है, सभी चीज़ों की नियति से वह उन तरीकों के बारे में अनुमान लगा लेता है जिनके द्वारा सृजनकर्ता अपनी संप्रभुता का उपयोग करता है और उन पर नियन्त्रण करता है; मानवजाति के जीवन चक्रों और सभी चीज़ों में, मनुष्य वास्तव में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के लिए सृजनकर्ता के आयोजनों और व्यवस्थाओं का अनुभव करता है, वह देखता है कि किस प्रकार वे आयोजन और व्यवस्थाएँ सभी सांसारिक कानूनों, नियमों, संस्थानों और अन्य सभी शक्तियों और ताक़तों की जगह ले लेती हैं। ऐसा होने पर, मानवजाति यह मानने को बाध्य हो जाती है कि कोई भी सृजित प्राणी सृजनकर्ता की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं कर सकता, सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित घटनाओं और चीज़ों को कोई भी शक्ति छीन या बदल नहीं सकती। मनुष्य इन अलौकिक कानूनों और नियमों के अधीन जीता है, सभी चीज़ें कायम रहती हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी वंश बढ़ाती हैं और फैलती हैं। क्या यह सृजनकर्ता के अधिकार का असली मूर्तरूप नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियंता है

(परमेश्वर के वचनों का चुनिंदा अध्याय)

मानवजाति के एक सदस्य और एक सच्चे ईसाई होने के नाते अपने मन और शरीर परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए समर्पित करना हम सभी का उत्तरदायित्व और कर्तव्य है, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और वह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के धार्मिक कार्य के लिए नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के योग्य नहीं होंगी, जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के लिए तो और भी अधिक अयोग्य होंगी, जिसने हमें सब-कुछ प्रदान किया है।

परमेश्वर ने इस संसार की सृष्टि की, उसने इस मानवजाति को बनाया, और इतना ही नहीं, वह प्राचीन यूनानी संस्कृति और मानव-सभ्यता का वास्तुकार भी था। केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति को सांत्वना देता है, और केवल परमेश्वर ही रात-दिन इस मानवजाति का ध्यान रखता है। मानव का विकास और प्रगति परमेश्वर की संप्रभुता से जुड़ी है, मानव का इतिहास और भविष्य परमेश्वर की योजनाओं में निहित है। यदि तुम एक सच्चे ईसाई हो, तो तुम निश्चित ही इस बात पर विश्वास करोगे कि किसी भी देश या राष्ट्र का उत्थान या पतन परमेश्वर की योजनाओं के अनुसार होता है। केवल परमेश्वर ही किसी देश या राष्ट्र के भाग्य को जानता है और केवल परमेश्वर ही इस मानवजाति की दिशा नियंत्रित करता है। यदि मानवजाति अच्छा भाग्य पाना चाहती है, यदि कोई देश अच्छा भाग्य पाना चाहता है, तो मनुष्य को परमेश्वर की आराधना में झुकना होगा, पश्चात्ताप करना होगा और परमेश्वर के सामने अपने पाप स्वीकार करने होंगे, अन्यथा मनुष्य का भाग्य और गंतव्य एक अपरिहार्य विभीषिका बन जाएँगे।

पीछे मुड़कर उस समय को देखो, जब नूह ने नाव बनाई थी : मानवजाति पूरी तरह से भ्रष्ट थी, लोग परमेश्वर के आशीषों से भटक गए थे, परमेश्वर द्वारा अब और उनकी देखभाल नहीं की जा रही थी, और वे परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ खो चुके थे। वे परमेश्वर की रोशनी के बिना अंधकार में रहते थे। फिर वे स्वभाव से व्यभिचारी बन गए, और उन्होंने स्वयं को घृणित चरित्रहीनता में झोंक दिया। ऐसे लोग अब और परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ प्राप्त नहीं कर सकते थे; वे परमेश्वर के चेहरे की गवाही देने या परमेश्वर की वाणी सुनने के अयोग्य थे, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर को त्याग दिया था, उन सब चीजों को बेक़ार समझकर छोड़ दिया था, जो परमेश्वर ने उन्हें प्रदान की थीं, और वे परमेश्वर की शिक्षाओं को भूल गए थे। उनका हृदय परमेश्वर से अधिकाधिक दूर भटक गया था, जिसका परिणाम यह हुआ कि वे विवेक और मानवता से वंचित होकर पथभ्रष्ट हो गए और अधिक से अधिक दुष्ट होते गए। फिर वे मृत्यु के और भी निकट पहुँच गए, और परमेश्वर के कोप और दंड के भागी हो गए। केवल नूह ने परमेश्वर की आराधना की और बुराई से दूर रहा, और इसलिए वह परमेश्वर की वाणी और निर्देशों को सुनने में सक्षम था। उसने परमेश्वर के वचन के अनुसार नाव बनाई, और सभी प्रकार के जीवित प्राणियों को उसमें एकत्र किया। और इस तरह, जब एक बार सब-कुछ तैयार हो गया, तो परमेश्वर ने संसार पर अपनी विनाशलीला शुरू कर दी। केवल नूह और उसके परिवार के सात अन्य लोग इस विनाशलीला में जीवित बचे, क्योंकि नूह ने यहोवा की आराधना की थी और बुराई से दूर रहा था।

अब वर्तमान युग को देखो : नूह जैसे धर्मी मनुष्य, जो परमेश्वर की आराधना कर सके और बुराई से दूर रह सके, होने बंद हो गए हैं। फिर भी परमेश्वर इस मानवजाति के प्रति दयालु है, और इस अंतिम युग में अभी भी उन्हें दोषमुक्त करता है। परमेश्वर उनकी खोज कर रहा है, जो उसके प्रकट होने की लालसा करते हैं। वह उनकी खोज करता है, जो उसके वचनों को सुनने में सक्षम हैं, जो उसके आदेश को नहीं भूले और अपना तन-मन उसे समर्पित करते हैं। वह उनकी खोज करता है, जो उसके सामने बच्चों के समान आज्ञाकारी हैं, और उसका विरोध नहीं करते। यदि तुम किसी भी ताकत या बल से अबाधित होकर ईश्वर के प्रति समर्पित होते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे ऊपर अनुग्रह की दृष्टि डालेगा और तुम्हें अपने आशीष प्रदान करेगा। यदि तुम उच्च पद वाले, सम्मानजनक प्रतिष्ठा वाले, प्रचुर ज्ञान से संपन्न, विपुल संपत्तियों के मालिक हो, और तुम्हें बहुत लोगों का समर्थन प्राप्त है, तो भी ये चीज़ें तुम्हें परमेश्वर के आह्वान और आदेश को स्वीकार करने, और जो कुछ परमेश्वर तुमसे कहता है, उसे करने के लिए उसके सम्मुख आने से नहीं रोकतीं, तो फिर तुम जो कुछ भी करोगे, वह पृथ्वी पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा और मनुष्य का सर्वाधिक धर्मी उपक्रम होगा। यदि तुम अपनी हैसियत और लक्ष्यों की खातिर परमेश्वर के आह्वान को अस्वीकार करोगे, तो जो कुछ भी तुम करोगे, वह परमेश्वर द्वारा श्रापित और यहाँ तक कि तिरस्कृत भी किया जाएगा। शायद तुम कोई अध्यक्ष, कोई वैज्ञानिक, कोई पादरी या कोई एल्डर हो, किंतु इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा पद कितना उच्च है, यदि तुम अपने ज्ञान और अपने उपक्रमों की योग्यता पर भरोसा रखते हो, तो तुम हमेशा असफल रहोगे, और हमेशा परमेश्वर के आशीषों से वंचित रहोगे, क्योंकि परमेश्वर ऐसा कुछ भी स्वीकार नहीं करता जो तुम करते हो, और वह नहीं मानता कि तुम्हारे उपक्रम धर्मी हैं, या यह स्वीकार नहीं करता कि तुम मानवजाति के भले के लिए कार्य कर रहे हो। वह कहेगा कि जो कुछ भी तुम करते हो, वह मानवजाति को परमेश्वर की सुरक्षा और आशीषों से वंचित करने के लिए करते हो। वह कहेगा कि तुम मानवजाति को अंधकार की ओर, मृत्यु की ओर, और एक ऐसे अंतहीन अस्तित्व के आरंभ की ओर ले जा रहे हो, जिसमें मनुष्य ने परमेश्वर और उसके आशीष खो दिए हैं।

मानवजाति द्वारा सामाजिक विज्ञानों के आविष्कार के बाद से मनुष्य का मन विज्ञान और ज्ञान से भर गया है। तब से विज्ञान और ज्ञान मानवजाति के शासन के लिए उपकरण बन गए हैं, और अब मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश और अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं रही हैं। मनुष्य के हृदय में परमेश्वर की स्थिति सबसे नीचे हो गई है। हृदय में परमेश्वर के बिना मनुष्य की आंतरिक दुनिया अंधकारमय, आशारहित और खोखली है। बाद में मनुष्य के हृदय और मन को भरने के लिए कई समाज-वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और राजनीतिज्ञों ने सामने आकर सामाजिक विज्ञान के सिद्धांत, मानव-विकास के सिद्धांत और अन्य कई सिद्धांत व्यक्त किए, जो इस सच्चाई का खंडन करते हैं कि परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की है, और इस तरह, यह विश्वास करने वाले बहुत कम रह गए हैं कि परमेश्वर ने सब-कुछ बनाया है, और विकास के सिद्धांत पर विश्वास करने वालों की संख्या और अधिक बढ़ गई है। अधिकाधिक लोग पुराने विधान के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के अभिलेखों और उसके वचनों को मिथक और किंवदंतियाँ समझते हैं। अपने हृदयों में लोग परमेश्वर की गरिमा और महानता के प्रति, और इस सिद्धांत के प्रति भी कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है, उदासीन हो जाते हैं। मानवजाति का अस्तित्व और देशों एवं राष्ट्रों का भाग्य उनके लिए अब और महत्वपूर्ण नहीं रहे, और मनुष्य केवल खाने-पीने और भोग-विलासिता की खोज में चिंतित, एक खोखले संसार में रहता है। ... कुछ लोग स्वयं इस बात की खोज करने का उत्तरदायित्व लेते हैं कि आज परमेश्वर अपना कार्य कहाँ करता है, या यह तलाशने का उत्तरदायित्व कि वह किस प्रकार मनुष्य के गंतव्य पर नियंत्रण और उसकी व्यवस्था करता है। और इस तरह, मनुष्य के बिना जाने ही मानव-सभ्यता मनुष्य की इच्छाओं के अनुसार चलने में और भी अधिक अक्षम हो गई है, और कई ऐसे लोग भी हैं, जो यह महसूस करते हैं कि इस प्रकार के संसार में रहकर वे, उन लोगों के बजाय जो चले गए हैं, कम खुश हैं। यहाँ तक कि उन देशों के लोग भी, जो अत्यधिक सभ्य हुआ करते थे, इस तरह की शिकायतें व्यक्त करते हैं। क्योंकि परमेश्वर के मार्गदर्शन के बिना शासक और समाजशास्त्री मानवजाति की सभ्यता को सुरक्षित रखने के लिए अपना कितना भी दिमाग क्यों न ख़पा लें, कोई फायदा नहीं होगा। मनुष्य के हृदय का खालीपन कोई नहीं भर सकता, क्योंकि कोई मनुष्य का जीवन नहीं बन सकता, और कोई सामाजिक सिद्धांत मनुष्य को उस खालीपन से मुक्ति नहीं दिला सकता, जिससे वह व्यथित है। विज्ञान, ज्ञान, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, फुरसत, आराम : ये मनुष्य को केवल अस्थायी सांत्वना देते हैं। यहाँ तक कि इन बातों के साथ मनुष्य निश्चित रूप से पाप करेगा और समाज के अन्याय का रोना रोएगा। ये चीज़ें मनुष्य की अन्वेषण की लालसा और इच्छा को दबा नहीं सकतीं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था और मनुष्यों के बेतुके त्याग और अन्वेषण केवल और अधिक कष्ट की ओर ही ले जा सकते हैं और मनुष्य को एक निरंतर भय की स्थिति में रख सकते हैं, और वह यह नहीं जान सकता कि मानवजाति के भविष्य या आगे आने वाले मार्ग का सामना किस प्रकार किया जाए। यहाँ तक कि मनुष्य विज्ञान और ज्ञान से भी डरने लगेगा, और खालीपन के एहसास से और भी भय खाने लगेगा। इस संसार में, चाहे तुम किसी स्वंतत्र देश में रहते हो या बिना मानवाधिकारों वाले देश में, तुम मानवजाति के भाग्य से बचकर भागने में सर्वथा असमर्थ हो। तुम चाहे शासक हो या शासित, तुम भाग्य, रहस्यों और मानवजाति के गंतव्य की खोज करने की इच्छा से बचकर भागने में सर्वथा अक्षम हो, और खालीपन के व्याकुल करने वाले बोध से बचकर भागने में तो और भी ज्यादा अक्षम हो। इस प्रकार की घटनाएँ, जो समस्त मानवजाति के लिए सामान्य हैं, समाजशास्त्रियों द्वारा सामाजिक घटनाएँ कही जाती हैं, फिर भी कोई महान व्यक्ति इस समस्या का समाधान करने के लिए सामने नहीं आ सकता। मनुष्य आखिरकार मनुष्य है, और परमेश्वर का स्थान और जीवन किसी मनुष्य द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। मानवजाति को केवल एक निष्पक्ष समाज की ही आवश्यकता नहीं है, जिसमें हर व्यक्ति को नियमित रूप से अच्छा भोजन मिलता हो और जिसमें सभी समान और स्वतंत्र हों, बल्कि मानवजाति को आवश्यकता है परमेश्वर के उद्धार और अपने लिए जीवन की आपूर्ति की। केवल जब मनुष्य परमेश्वर का उद्धार और जीवन की आपूर्ति प्राप्त करता है, तभी उसकी आवश्यकताओं, अन्वेषण की लालसा और आध्यात्मिक रिक्तता का समाधान हो सकता है। यदि किसी देश या राष्ट्र के लोग परमेश्वर के उद्धार और उसकी देखभाल प्राप्त करने में अक्षम हैं, तो वह देश या राष्ट्र विनाश के मार्ग पर, अंधकार की ओर चला जाएगा, और परमेश्वर द्वारा जड़ से मिटा दिया जाएगा।

शायद तुम्हारा देश वर्तमान में समृद्ध हो रहा हो, किंतु यदि तुम लोगों को परमेश्वर से भटकने देते हो, तो वह स्वयं को उत्तरोत्तर परमेश्वर के आशीषों से वंचित होता हुआ पाएगा। तुम्हारे देश की सभ्यता उत्तरोत्तर पैरों तले रौंदी जाएगी, और जल्दी ही लोग परमेश्वर के विरुद्ध उठ खड़े होंगे और स्वर्ग को कोसने लगेंगे। और इसलिए, मनुष्य के बिना जाने ही देश का भाग्य नष्ट हो जाएगा। परमेश्वर शक्तिशाली देशों को उन देशों से निपटने के लिए ऊपर उठाएगा, जिन्हें परमेश्वर द्वारा श्राप दिया गया है, यहाँ तक कि वह पृथ्वी से उनका अस्तित्व भी मिटा सकता है। किसी देश का उत्थान और पतन इस बात पर आधारित होता है कि क्या उसके शासक परमेश्वर की आराधना करते हैं, और क्या वे अपने लोगों को परमेश्वर के निकट लाने और उसकी आराधना करने में उनकी अगुआई करते हैं। इतना ही नहीं, इस अंतिम युग में, चूँकि वास्तव में परमेश्वर को खोजने और उसकी आराधना करने वाले लोग तेजी से दुर्लभ होते जा रहे हैं, इसलिए परमेश्वर उन देशों पर अपना विशेष अनुग्रह बरसाता है, जिनमें ईसाइयत एक राज्य धर्म है। वह संसार में एक अपेक्षाकृत धार्मिक शिविर बनाने के लिए उन देशों को इकठ्ठा करता है, जबकि नास्तिक देश और वे देश, जो सच्चे परमेश्वर की आराधना नहीं करते, धार्मिक शिविर के विरोधी बन जाते हैं। इस तरह, परमेश्वर का मानवजाति के बीच न केवल एक स्थान होता है, जिसमें वह अपना कार्य करता है, बल्कि वह उन देशों को भी प्राप्त करता है, जो धर्मी अधिकार का प्रयोग कर सकते हैं, और उन देशों पर अंकुश और प्रतिबंध लगाने देता है, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। इसके बावजूद, अभी भी ज्यादा लोग परमेश्वर की आराधना करने के लिए आगे नहीं आते, क्योंकि मनुष्य उससे बहुत दूर भटक गया है और बहुत समय से उसे भूल चुका है। पृथ्वी पर केवल वे ही देश बचते हैं, जो धार्मिकता का अभ्यास करते हैं और अधार्मिकता का विरोध करते हैं। किंतु यह परमेश्वर की इच्छाओं से दूर है, क्योंकि किसी भी देश का शासक अपने लोगों के ऊपर परमेश्वर को नियंत्रण नहीं करने देगा, और कोई राजनीतिक दल अपने लोगों को परमेश्वर की आराधना करने के लिए इकट्ठा नहीं करेगा; परमेश्वर प्रत्येक देश, राष्ट्र, सत्तारूढ़ दल, और यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में अपना यथोचित स्थान खो चुका है। यद्यपि धार्मिक ताक़तें इस दुनिया में मौजूद हैं, शासन करती हैं जिसमें मनुष्य के हृदय में परमेश्वर का स्थान भंगुर है। परमेश्वर के आशीष के बिना राजनीतिक क्षेत्र अव्यवस्था में पड़ जाएगा और हमले के लिए भेद्य हो जाएगा। मानवजाति के लिए परमेश्वर के आशीष से रहित होना सूर्य से रहित होने के समान है। शासक अपने लोगों के लिए चाहे कितने भी परिश्रम से काम क्यों न करें, मानवजाति चाहे कितने भी धर्मी सम्मेलन आयोजित क्यों न करे, इनमें से कोई भी घटनाक्रम को या मानवजाति के भाग्य को नहीं बदलेगा। मनुष्य का मानना है कि वह देश, जिसमें लोगों को भोजन और वस्त्र मिलते हैं, जिसमें वे शांति से एक-साथ रहते हैं, एक अच्छा देश है, और उसका नेतृत्व अच्छा है। किंतु परमेश्वर ऐसा नहीं सोचता। उसका मानना है कि वह देश, जिसमें कोई उसकी आराधना नहीं करता, एक ऐसा देश है, जिसे वह जड़ से मिटा देगा। मनुष्य के सोचने का तरीका परमेश्वर के सोचने के तरीके से पूरी तरह भिन्न है। तो यदि किसी देश का मुखिया परमेश्वर की आराधना नहीं करता, तो उस देश का भाग्य दुःखद होगा, और उस देश का कोई गंतव्य नहीं होगा।

परमेश्वर मनुष्य की राजनीति में भाग नहीं लेता, फिर भी देश या राष्ट्र का भाग्य परमेश्वर द्वारा नियंत्रित होता है। परमेश्वर इस संसार को और संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है। मनुष्य का भाग्य और परमेश्वर की योजना घनिष्ठता से जुड़े हैं, और कोई भी मनुष्य, देश या राष्ट्र परमेश्वर की संप्रभुता से मुक्त नहीं है। यदि मनुष्य अपने भाग्य को जानना चाहता है, तो उसे परमेश्वर के सामने आना होगा। परमेश्वर उन लोगों को समृद्ध करेगा, जो उसका अनुसरण और उसकी आराधना करते हैं, और वह उनका पतन और विनाश करेगा, जो उसका विरोध करते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं।

बाइबल के उस दृश्य का स्मरण करो, जब परमेश्वर ने सदोम पर तबाही बरपाई थी, और यह भी सोचो कि किस प्रकार लूत की पत्नी नमक का खंभा बन गई थी। वापस सोचो कि किस प्रकार नीनवे के लोगों ने टाट और राख में अपने पापों का पश्चात्ताप किया था, और याद करो कि 2,000 वर्ष पहले यहूदियों द्वारा यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने के बाद क्या हुआ था। यहूदी इजराइल से निर्वासित कर दिए गए थे और वे दुनिया भर के देशों में भाग गए थे। बहुत लोग मारे गए थे, और संपूर्ण यहूदी राष्ट्र अभूतपूर्व विनाश का भागी हो गया था। उन्होंने परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया था—जघन्य पाप किया था—और परमेश्वर के स्वभाव को भड़काया था। उनसे उनके किए का भुगतान करवाया गया था, और उन्हें उनके कार्यों के परिणाम भुगतने के लिए मजबूर किया गया था। उन्होंने परमेश्वर की निंदा की थी, परमेश्वर को अस्वीकार किया था, और इसलिए उनकी केवल एक ही नियति थी : परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना। यही वह कड़वा परिणाम और आपदा थी, जो उनके शासक उनके देश और राष्ट्र पर लाए थे।

आज परमेश्वर अपना कार्य करने के लिए संसार में लौट आया है। उसका पहला पड़ाव तानाशाही शासकों का विशाल जमावड़ा : नास्तिकता का कट्टर गढ़ चीन है। परमेश्वर ने अपनी बुद्धि और सामर्थ्य से लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया है। इस अवधि के दौरान चीन की सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा उसका हर तरह से शिकार किया जाता रहा है और उसे अत्यधिक पीड़ा का भागी बनाया जाता रहा है, उसे अपना सिर टिकाने के लिए भी कोई जगह नहीं मिली और वह कोई आश्रय पाने में असमर्थ रहा। इसके बावजूद, परमेश्वर अभी भी वह कार्य जारी रखे हुए है, जिसे करने का उसका इरादा है : वह अपनी वाणी बोलता है और सुसमाचार का प्रसार करता है। कोई भी परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की थाह नहीं पा सकता। चीन में, जो परमेश्वर को शत्रु माननेवाला देश है, परमेश्वर ने कभी भी अपना कार्य बंद नहीं किया है। इसके बजाय, और अधिक लोगों ने उसके कार्य और वचन को स्वीकार किया है, क्योंकि परमेश्वर मानवजाति के हर एक सदस्य को बचाने के लिए वह सब-कुछ करता है, जो वह कर सकता है। हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, उसके मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकती। जो लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, और परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँगे। जो परमेश्वर के कार्य की अवहेलना करता है, उसे नरक भेजा जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य का विरोध करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; जो कोई राष्ट्र परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करने के लिए उठता है, उसे इस पृथ्वी से मिटा दिया जाएगा, और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। मैं सभी राष्ट्रों, सभी देशों, और यहाँ तक कि सभी उद्योगों के लोगों से विनती करता हूँ कि परमेश्वर की वाणी को सुनें, परमेश्वर के कार्य को देखें, और मानवजाति के भाग्य पर ध्यान दें, परमेश्वर को सर्वाधिक पवित्र, सर्वाधिक सम्माननीय, मानवजाति के बीच आराधना का सर्वोच्च और एकमात्र लक्ष्य बनाएँ, और संपूर्ण मानवजाति को परमेश्वर के आशीष के अधीन जीने की अनुमति दें, ठीक उसी तरह से, जैसे अब्राहम के वंशज यहोवा की प्रतिज्ञाओं के अधीन रहे थे और ठीक उसी तरह से, जैसे आदम और हव्वा, जिन्हें परमेश्वर ने सबसे पहले बनाया था, अदन के बगीचे में रहे थे।

परमेश्वर का कार्य एक ज़बरदस्त लहर के समान उमड़ता है। उसे कोई नहीं रोक सकता, और कोई भी उसके प्रयाण को बाधित नहीं कर सकता। केवल वे लोग ही उसके पदचिह्नों का अनुसरण कर सकते हैं और उसकी प्रतिज्ञा प्राप्त कर सकते हैं, जो उसके वचन सावधानीपूर्वक सुनते हैं, और उसकी खोज करते हैं और उसके लिए प्यासे हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे ज़बरदस्त आपदा और उचित दंड के भागी होंगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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