653 परमेश्वर के वचनों के न्याय को कैसे स्वीकार करें

1 खुद को जानने के लिए, तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम अपनी खुद की भ्रष्टता, अपनी महत्वपूर्ण कमज़ोरियों, अपने स्वभाव, अपनी प्रकृति और अपने सार में से क्या प्रकट करते हो। तुम्हें बहुत विस्तार से उन चीज़ों के बारे में भी पता होना चाहिए जो तुम्हारे दैनिक जीवन में सामने आती हैं—तुम्हारे इरादे, तुम्हारे नज़रिए और हर एक बात में तुम्हारा रवैया—चाहे तुम घर पर हो या कलीसिया में, चाहे जब तुम सभाओं में होते हो, या जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, या किसी भी मुद्दे का सामना करते हो। इन बातों के माध्यम से तुम्हें खुद को जानना होगा। खुद को एक अधिक गहरे स्तर पर जानने के लिए, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को एकीकृत करना होगा; केवल उसके वचनों के आधार पर स्वयं को जानकर ही तुम परिणाम हासिल कर सकते हो।

2 परमेश्वर के वचनों के न्याय को प्राप्त करते समय, हमें कष्टों से नहीं घबराना चाहिये, न ही पीड़ा से डरना चाहिये; इस बात से तो बिल्कुल भी ख़ौफ़ नहीं खाना चाहिये कि परमेश्वर के वचन हमारे हृदय को वेध देंगे। हमें उसके वचनों को और अधिक पढ़ना चाहिये कि कैसे परमेश्वर न्याय करता है, ताड़ना देता है और कैसे हमारे भ्रष्ट सार को उजागर करता है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, हमें अक्सर उनसे अपनी तुलना करनी चाहिये। हमारे अंदर इनमें से किसी एक भ्रष्टता का भी अभाव नहीं है; हम सभी उनसे सहमत हो सकते हैं। हमें पहले जानना होगा कि इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि उसके वचन सुनने में अच्‍छे लगते हैं, कि वे हमें कड़वाहट का एहसास कराते हैं या मिठास का—हमें उन सबको स्‍वीकार करना चाहिए। हमें परमेश्‍वर के वचनों के प्रति यही दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

3 हमारी आस्‍था में, हमें दृढ़ता से यह बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं। चूँकि वे सचमुच सत्य हैं, हमें उन्हें तर्कसंगत ढंग से स्वीकार कर लेना चाहिये। हम इस बात को भले ही न पहचानें या स्वीकार न करें, लेकिन परमेश्वर के वचनों के प्रति हमारा पहला रुख़ पूर्ण स्वीकृति का होना चाहिये। परमेश्‍वर के वचन गहन होते हैं। परमेश्वर द्वारा प्रकट हर चीज़ इंसान के भ्रष्ट स्वभाव और उसके जीवन के भीतर गहरी जड़ें जमाये हुए और सारभूत कारकों के बारे में होती है। ये बाह्य घटनायें नहीं होतीं, विशेषकर बाह्य व्यवहार नहीं होते। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के वचनों पर बने रहने के लिए बाहरी घटनाओं पर निर्भर नहीं रह सकते।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "सत्य के अनुसरण का महत्व और मार्ग" से रूपांतरित

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