897 परमेश्वर इंसान को अधिकतम सीमा तक बचाना चाहता है

I

अपने उद्धार कार्य के दौरान,

जिनको बचाया जा सकता है,

अधिकतम सीमा तक उन्हें बचाएगा परमेश्वर,

और त्यागेगा किसी को नहीं परमेश्वर।

मगर जो बदल नहीं सकते स्वभाव अपना,

या जो पालन नहीं कर सकते परमेश्वर की आज्ञा का,

ऐसे लोग दण्ड के भागी होंगे।


II

इस चरण के कार्य से, वचनों के कार्य से,

इंसान के सामने ऐसे रास्ते खुलेंगे,

इंसान के सामने ऐसे राज़ खुलेंगे

समझता नहीं है इंसान जिन्हें।

इससे इंसान परमेश्वर की इच्छा से वाकिफ़ होगा,

परमेश्वर की अपेक्षाओं से वाकिफ़ होगा।

ताकि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाकर,

बदल सके स्वभाव अपना इंसान।


III

अपने कार्य के लिए बस वचन, इस्तेमाल करता है परमेश्वर।

इन्सान के थोड़े-से विद्रोह के लिये,

सज़ा नहीं देता है उसे परमेश्वर

क्योंकि अब उद्धार का वक्त है।

सभी विद्रोहियों को गर सज़ा देता परमेश्वर

तो किसी को नहीं मिलता बचाए जाने का अवसर।

नरक में पड़े होते सभी सज़ा पाकर।

न्याय के वचन से इंसान ख़ुद को जानकर,

परमेश्वर की आज्ञा मानता है,

न्याय के इन वचनों से इंसान सज़ा नहीं पाता है।


IV

जो वचनों की विजय को स्वीकारेंगे,

उनके उद्धार के अवसर होंगे बहुतेरे।

परमेश्वर का उद्धार कार्य

उनके प्रति नर्म और सहिष्णु होगा।

अगर गलत राह से इंसान लौट आएगा,

अगर इंसान पश्चाताप करेगा,

तो परमेश्वर उद्धार का अवसर देगा।


V

जब पहली बार इंसान विद्रोह करता है परमेश्वर से,

तो परमेश्वर उसे मौत नहीं देना चाहता है,

बल्कि उसे बचाने की ख़ातिर, वो सबकुछ ही करता है।

जब किसी को बचाने की गुंजाईश नहीं होती,

तो दरकिनार कर देता है उसे परमेश्वर।

सज़ा को टालता है परमेश्वर,

क्योंकि जिन्हें बचाया जा सकता है, उन्हें बचाना चाहता है परमेश्वर।

महज़ वचनों से वो न्याय, रहनुमाई करता है, प्रबुद्ध करता है इंसान को,

छड़ से मारता नहीं वो इंसान को।

वचनों से बचाना मकसद है,

मायने हैं इस आख़िरी चरण के कार्य के।


"वचन देह में प्रकट होता है" से

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