188 परमेश्वर की एकमात्र ख़्वाहिश धरती पर

देहधारण किया है परमेश्वर ने इस बार,

निमंत्रण पर इंसान के हालात को देखकर,

आपूर्ति करने इंसान को उसकी, जिसकी उसे ज़रूरत है।

1

आ रहा है वो हर इंसान को,

चाहे इंसान की काबिलियत या परवरिश कुछ भी हो,

परमेश्वर के वचन दिखाने, उनमें परमेश्वर के अस्तित्व और

परमेश्वर की अभिव्यक्ति को दिखाने,

वचनों से परमेश्वर की पूर्णता को स्वीकार कराने।

उम्मीद है परमेश्वर को बदलेगा विचार और धारणाएँ इंसान अपनी,

ताकि बस जाए मज़बूती से परमेश्वर का सच्चा चेहरा

इंसान के दिल की गहराइयों में।

यही एकमात्र ख़्वाहिश है धरती पर परमेश्वर की,

ख़्वाहिश है धरती पर परमेश्वर की।

2

हो सकती है प्रकृति महान इंसान की,

हो सकता है अधम सार इंसान का,

कैसे भी रहे हों कर्म उसके अतीत में,

ग़ौर करता नहीं इन सब पर परमेश्वर।

नई छवि बना सके अपने दिल में उसकी,

उम्मीद करता है ये इंसान से परमेश्वर।

उम्मीद है परमेश्वर को बदलेगा विचार और धारणाएँ इंसान अपनी,

ताकि बस जाए मज़बूती से परमेश्वर का सच्चा चेहरा,

इंसान के दिल की गहराइयों में।

यही एकमात्र ख़्वाहिश है धरती पर परमेश्वर की।

3

इंसानियत का सार इंसान जानेगा, और वो अपना नज़रिया बदलेगा,

उम्मीद करता है इंसान से परमेश्वर।

गहराई से चाहेगा उसे इंसान, शाश्वत लगाव रखेगा उससे इंसान,

उम्मीद करता है इंसान से परमेश्वर।

बस इतना ही चाहता है इंसान से परमेश्वर।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कार्य और प्रवेश (7)' से रूपांतरित

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