938 परमेश्वर का स्वभाव है उत्कृष्ट और भव्य

1 परमेश्वर का आनन्द धार्मिकता और ज्योति की उपस्थिति और अभ्युदय से है; अँधकार और बुराई के विनाश से है। वह आनन्दित होता है क्योंकि वह मानवजाति के लिए ज्योति और अच्छा जीवन ले कर आया है; उसका आनन्द धार्मिकता का है, हर चीज़ के सकारात्मक होने का एक प्रतीक, और सब से बढ़कर कल्याण का प्रतीक।

2 परमेश्वर का क्रोध मानवजाति को अन्याय की मौजूदगी और उसके हस्तक्षेप के कारण है पहुँचने वाली हानि के कारण है; बुराई और अँधकार की उपस्थिति के कारण, और ऐसी चीज़ों की उपस्थिति जो सत्य को बाहर धकेल देती है, और उस से भी बढ़कर ऐसी चीज़ों की उपस्थिति के कारण जो उनका विरोध करती हैं जो भला और सुन्दर है।

3 उसका क्रोध एक चिह्न है कि वे सभी चीज़ें जो नकारात्मक हैं आगे से अस्तित्व में न रहें, और इसके अतिरिक्त यह पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुखः मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उस ने आशा की थी परन्तु वह अंधकार में गिर गई, क्योंकि जो कार्य वह मनष्यों के लिए करता है मनुष्य वह उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, और क्योंकि वह जिस मानवजाति से प्रेम करता है वह ज्योति में पूरी तरह जीवन नहीं जी पाती। वह अपनी भोलीभाली मानवजाति के लिए, ईमानदार किन्तु अनजान मनुष्य के लिए, और अच्छे और अनिश्चित भाव वाले मनुष्य के लिए दुखः की अनुभूति करता है। उसका दुखः उसकी भलाई और उसकी करूणा का चिह्नहै, और सुन्दरता और उदारता का चिह्नहै।

4 उसकी प्रसन्नता, वास्तव में, अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों के भले विश्वास को प्राप्त करने से आती है। इसके अतिरिक्त, सभी शत्रु ताकतों को भगाने और हराने से और मनुष्यों के द्वारा भले और शांतिपूर्ण जीवन को प्राप्त करने से आती है। परमेश्वर की प्रसन्नता, मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; उसके बजाए, यह मनोहर फलों को प्राप्त करने का एहसास है, एक एहसास जो आनंद से बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता इस बात का चिह्नहै कि मानवजाति दुखः की जंज़ीरों को तोड़कर आज़ाद होकर ज्योति के संसार में प्रवेश करती है।

5 दूसरे रूप में, मानवजाति की भावनाएँ सिर्फ स्वयं के सारे स्वार्थों के उद्देश्य के तहत अस्तित्व में हैं, धार्मिकता, ज्योति, या जो सुन्दर है उसके लिए नहीं, और स्वर्ग के अनुग्रह के लिए तो बिल्कुल नहीं। मानव जाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं और अँधकार के संसार से वास्ता रखती हैं। वे इच्छा के लिए नहीं हैं, परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं। इसलिए मनुष्य और परमेश्वर को एक ही साँस मे बोला नहीं जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" से रूपांतरित

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