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परमेश्वर इंसान का अंत तय करता है उसके अंदर मौजूद सत्य के आधार पर

I

अब समय है, हर इंसान का अंत तय करे परमेश्वर,

उस चरण का नहीं जब उसने आकार देना शुरू किया इंसान को।

हर शब्द, हर काम हर इंसान का,

लिखता है अपनी किताब में परमेश्वर।

वो दर्ज करता है उन्हें एक-एक कर।

हर इंसान की मंज़िल तय करता है परमेश्वर,

नहीं उम्र, ओहदे या दुखों के आधार पर,

किस हद तक बुलावा देता है करुणा को,

नहीं इस आधार पर, नहीं इस आधार पर,

उसमें सत्य है या नहीं, तय होता है महज़ इस आधार पर।

II

परमेश्वर के अनुसरण में वो इंसान के पथ को देखता है,

उसके अंतर्निहित गुणों को, आख़िरी निष्पादन को देखता है।

इस तरह परमेश्वर के हाथों बचेगा नहीं इंसान कोई।

सभी अपनी किस्म के साथ होंगे, जैसा नियत करेगा परमेश्वर।

हर इंसान की मंज़िल तय करता है परमेश्वर,

नहीं उम्र, ओहदे या दुखों के आधार पर,

किस हद तक बुलावा देता है करुणा को,

नहीं इस आधार पर, नहीं इस आधार पर,

उसमें सत्य है या नहीं, तय होता है महज़ इस आधार पर।

III

जो परमेश्वर का अनुसरण न करेगा, वो दण्डित होगा, वो दण्डित होगा।

इस सच को कोई बदल नहीं सकता।

इसलिये दण्ड के भागी हैं जो लोग,

परमेश्वर की धार्मिकता की वजह से हैं,

प्रतिकार के तौर पर, अनगिनत दुष्कर्मों के लिये हैं।

हर इंसान की मंज़िल तय करता है परमेश्वर,

नहीं उम्र, ओहदे या दुखों के आधार पर,

किस हद तक बुलावा देता है करुणा को,

नहीं इस आधार पर, नहीं इस आधार पर,

उसमें सत्य है या नहीं, तय होता है महज़ इस आधार पर।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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