1.1. परमेश्वर के व्यवस्था के युग में अपने कार्य को प्रकट करने पर

21. यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, अर्थात्, उसने मानवजाति के पूर्वजों, हव्वा और आदम, का सृजन किया, किंतु उसने उन्हें और कोई बुद्धि या ज्ञान प्रदान नहीं किया। यद्यपि वे पहले से ही पृथ्वी पर रह रहे थे, किंतु वे समझते लगभग कुछ नहीं थे। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने का यहोवा का कार्य केवल आधा ही समाप्त हुआ था, पूरा नहीं। उसने केवल मिट्टी से मनुष्य का एक नमूना बनाया था और उसे अपनी साँस दे दी थी, किंतु परमेश्वर का सम्मान करने की पर्याप्त इच्छा प्रदान किए बिना। आरंभ में मनुष्य का मन परमेश्वर का सम्मान करने या उससे डरने का नहीं था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि उसके वचनों को कैसे सुनना है, किंतु पृथ्वी पर जीवन के बुनियादी ज्ञान और मानव-जीवन के सामान्य नियमों से वह अनभिज्ञ था। और इसलिए, यद्यपि यहोवा ने पुरुष और स्त्री का सृजन किया और सात दिन की परियोजना पूरी कर दी, किंतु उसने किसी भी प्रकार से मनुष्य के सृजन को पूरा नहीं किया, क्योंकि मनुष्य केवल एक भूसा था, और उसमें मनुष्य होने की वास्तविकता का अभाव था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यह यहोवा है, जिसने मानवजाति का सृजन किया है, किंतु उसे इस बात का कोई आभास नहीं था कि यहोवा के वचनों और व्यवस्थाओं का पालन कैसे किया जाए। और इसलिए, मानवजाति के सृजन के बाद, यहोवा का कार्य अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ था। उसे अभी भी मनुष्यों को अपने सामने लाने के लिए उनका पूरी तरह से मार्गदर्शन करना था, ताकि वे धरती पर एक-साथ रहने और उसका सम्मान करने में समर्थ हो जाएँ, और ताकि वे उसके मार्गदर्शन से धरती पर एक सामान्य मानव-जीवन के सही रास्ते पर प्रवेश करने में समर्थ हो जाएँ। केवल इसी रूप में मुख्यतः यहोवा के नाम से संचालित कार्य पूरी तरह से संपन्न हुआ था; अर्थात्, केवल इसी रूप में दुनिया का सृजन करने का यहोवा का कार्य पूरी तरह से समाप्त हुआ था। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने के बाद उसे पृथ्वी पर हजारों वर्षों तक मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करना पड़ा, ताकि मानवजाति उसके आदेशों और व्यवस्थाओं का पालन करने और पृथ्वी पर एक सामान्य मानव-जीवन की सभी गतिविधियों में भाग ले पाने में समर्थ हो जाए। केवल तभी यहोवा का कार्य पूर्णतः पूरा हुआ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

22. जब परमेश्वर ने प्रबन्धन योजना के अपने आधिकारिक कार्य की शुरुआत की, तो उसने अनेक नियम निर्धारित किए जिनका पालन मनुष्य के द्वारा किया जाना था। ये नियम पृथ्वी पर मनुष्य को साधारण जीवन जीने देने के लिए थे, मनुष्य का ऐसा साधारण जीवन जो परमेश्वर और उसके मार्गदर्शन से अवियोज्य हो। परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य को बताया कि वेदियों को किस प्रकार बनाएँ, वेदियों को किस प्रकार स्थापित करें। उसके बाद, उसने मनुष्य को बताया कि कैसे बलि चढ़ाएँ, और स्थापित किया कि मनुष्य को किस प्रकार से जीवन जीना था—उसे जीवन में किस पर ध्यान देना था, उसे किसका पालन करना था, उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो कुछ निर्दिष्ट किया था वह सर्वव्यापी था, और इन रिवाजों, नियमों, और सिद्धान्तों के साथ उसने लोगों के व्यवहार को मानकीकृत किया, उनकी ज़िन्दगियों का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर के नियमों के प्रति उनकी दीक्षा का मार्ग दर्शन किया, परमेश्वर की वेदी के सामने आने के लिए उनका मार्गदर्शन किया, और सभी चीज़ों के बीच ऐसा जीवन पाने के लिए मार्गदर्शन किया जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य के लिए बनाया था जो व्यवस्थित क्रम, नियमितता, और संयम को धारण किए हुए था। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सीमाओं को तय करने के लिए सबसे पहले इन साधारण नियमों और सिद्धान्तों का उपयोग किया था, ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने का एक साधारण जीवन हो, और उसके पास मनुष्य का साधारण जीवन हो; उसकी छः हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना की शुरुआत की विशिष्ट विषयवस्तु ऐसी ही है। ये नियम और व्यवस्थाएँ बहुत ही व्यापक विषयवस्तु को आवृत करती हैं, वे व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन के विशिष्ट विवरण हैं, उन लोगों के द्वारा इन्हें स्वीकार और इनका आदर किया जाना था जो व्यवस्था के युग से पहले आए, ये व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य का अभिलेख हैं, और वे संपूर्ण मनुष्यजाति की परमेश्वर के द्वारा अगुवाई और मार्गदर्शन का वास्तविक प्रमाण हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

23. व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा के नाम से मानवजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य किया गया था, और पृथ्वी पर कार्य का पहला चरण आरंभ किया गया था। इस चरण के कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करना, और इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करना और उनके बीच कार्य करना शामिल था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार स्थापित किया। इस आधार से उसने अपने कार्य का विस्तार इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है कि इस्राएल से शुरू करके उसने अपने कार्य का बाहर विस्तार किया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और कि वह यहोवा ही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का निर्माण किया, और कि वह यहोवा ही था, जिसने सभी प्राणियों को सिरजा था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान थी, और इस्राएल की भूमि पर ही परमेश्वर पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य करने गया। वह व्यवस्था के युग का कार्य था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

24. इस समय, इस्राएल में यहोवा के कार्य का महत्व, उद्देश्य, और चरण, पूरी पृथ्वी पर उसके कार्य का सूत्रपात करने के लिए थे, जो इस्राएल को इसका केन्द्र लेते हुए, धीरे-धीरे अन्य-जाति राष्ट्रों में फैलते हैं। यही वह सिद्धांत है जिसके अनुसार वह तमाम विश्व में कार्य करता है—एक प्रतिमान स्थापना करना, और तब तक उसे फैलाना जब तक कि विश्व के सभी लोग उसके सुसमाचार को ग्रहण न कर लें। प्रथम इस्राएली नूह के वंशज थे। इन लोगों को केवल यहोवा की श्वास प्रदान की गई थी, और वे जीवन की मूल आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से समझते थे, किन्तु वे नहीं जानते थे कि यहोवा किस प्रकार का परमेश्वर है, या मनुष्य के लिए उसकी इच्छा को नहीं जानते थे, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानते थे कि समस्त सृष्टि के प्रभु का सम्मान कैसे करें। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि क्या पालन करने के लिए नियम और व्यवस्थाएँ थी, या कि क्या कोई कर्तव्य था जो सृजित किए गए प्राणी को सृष्टा के लिए करना चाहिए: आदम के वंशज इन बातो के बारे में कुछ नहीं जानते थे। वे बस इतना ही जानते थे कि पति को अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए पसीना बहाना और परिश्रम करना चाहिए, और पत्नी को अपने पति के लिए समर्पण करना चाहिए और उस मानव प्रजाति को बनाये रखना चाहिए जिसे यहोवा ने सृजित किया था। दूसरे शब्दों में, ऐसे लोग, जिनके पास केवल यहोवा की श्वास और उसका जीवन था, इस बारे में कुछ भी नहीं जानते थे कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कैसे करें या समस्त सृष्टि के प्रभु को कैसे संतुष्ट करें। वे बहुत ही कम समझते थे। इसलिए भले ही उनके हृदय में कुछ भी कुटिलता या छल नहीं था और उनके बीच कभी-कभार ईर्ष्या और कलह उत्पन्न हो जाता था, फिर भी उन्हें समस्त सृष्टि के प्रभु, यहोवा के बारे में कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। मनुष्य के ये पूर्वज केवल यहोवा की चीज़ों को खाना और यहोवा की चीज़ों का आनन्द लेना जानते थे, किन्तु वे यहोवा का आदर करना नहीं जानते थे; वे नहीं जानते थे कि यहोवा ही वह एक है जिसकी उन्हें घुटने टेककर आराधना करनी चाहिए। इसलिए वे उसका सृजन कैसे कहे जा सकते थे? यदि ऐसा हुआ होता, तो इन वचनों का क्या होता, "यहोवा समस्त सृष्टि का प्रभु है" और "उसने मनुष्य को सृजित किया ताकि मनुष्य उसे अभिव्यक्त कर सके, उसकी महिमा कर सके और उसका प्रतिनिधित्व कर सके"—क्या ये व्यर्थ में नहीं बोले गए होते? जिन लोगों में यहोवा के लिए आदर नहीं है वे उसकी महिमा के गवाह कैसे बन सकते थे? वे कैसे उसकी महिमा की अभिव्यक्तियाँ बन सकते थे? क्या यहोवा के ये वचन कि "मैंने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया" तब दुष्टात्मा—शैतान के हाथों के हथियार नहीं बन जाते? क्या तब ये वचन यहोवा द्वारा मनुष्य के सृजन के लिए अपमान का एक चिह्न नहीं बन जाते? कार्य के उस चरण को पूरा करने के लिए, मनुष्य को बनाने के बाद यहोवा ने आदम के समय से नूह के समय तक उन्हें निर्देश या मार्गदर्शन नहीं दिया। बल्कि, जब जल प्रलय ने दुनिया को नष्ट कर दिया उसके बाद ही ऐसा हुआ कि उसने औपचारिक तौर पर उन इस्राएलियों का मार्गदर्शन करना आरम्भ किया जो नूह के और आदम के भी वंशज थे। इस्राएल में उसके कार्य और कथनों ने इस्राएल के सभी लोगों को मार्गदर्शन दिया जब वे पूरे इस्राएल देश में अपना जीवन जीते थे, और इस तरह मानवजाति को दिखाया कि यहोवा न केवल मनुष्य में अपना श्वास फूँकने में समर्थ है ताकि उसके पास परमेश्वर का जीवन हो सके, और मिट्टी में उठ कर एक सृजित किए गए मानव प्राणी बन सके, बल्कि वह मानवजाति पर शासन करने के लिए मानवजाति को भस्म कर सकता था, और मानवजाति को शाप दे सकता था और अपने राजदण्ड का उपयोग कर सकता था। तब भी, क्या उन्होंने देखा था कि यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता था, और मानवजाति के बीच दिन और रात के समय के अनुसार बात कर सकता था और कार्य कर सकता था। उसने कार्य सिर्फ इसलिए किया था ताकि उसके जीवधारी जान सकें कि मनुष्य धूल से आया था, जिसे परमेश्वर द्वारा उन्नत किया गया, और इसके अलावा यह कि मनुष्य उसके द्वारा बनाया गया था। न केवल इतना, बल्कि उसने इस्राएल में जो कार्य आरम्भ किया था वह इस आशय से था कि दूसरे लोग और राष्ट्र (जो वास्तव में इस्राएल से पृथक नहीं थे, बल्कि इस्राएलियों से अलग हो गए थे, मगर फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज ही थे) इस्राएल से यहोवा के सुसमाचार को प्राप्त कर सकें, ताकि विश्व में सभी सृजित प्राणी यहोवा का आदर करने और उसे महान होना ठहराने में समर्थ हो सकें। यदि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में आरम्भ नहीं किया होता, बल्कि उसके बजाए, मनुष्यों को बनाने के बाद, उन्हें पृथ्वी पर निश्चिन्त जीवन जीने दिया होता, तो उस स्थिति में, मनुष्य की शारीरिक प्रकृति के कारण (प्रकृति का अर्थ है कि मनुष्य उन चीज़ों को कभी नहीं जान सकता है जिन्हें वह देख नहीं सकता है, जिसका अर्थ है कि वह नहीं जानेगा कि यहोवा ने मानवजाति को बनाया है, और इस बात को तो बिल्कुल भी नहीं जानेगा कि उसने ऐसा क्यों किया है), वह कभी नहीं जानेगा कि यह यहोवा था जिसने मानवजाति को बनाया है अथवा कि वह समस्त सृष्टि का प्रभु है। यदि यहोवा ने मनुष्य का सृजन किया होता और उसे पृथ्वी पर रखा होता, और एक अवधि तक मनुष्यों को मार्गदर्शन देने के लिए उनके बीच रहने की अपेक्षा ऐसे ही अपने हाथों की धूल झाड़ कर चला गया होता, तब उस स्थिति में सारी मानवता वापस शून्यता की ओर लौट गयी होती; यहाँ तक कि स्वर्ग, पृथ्वी और उसकी बनाई हुई असंख्य चीज़ें, और समस्त मानवजाति, शून्यता की ओर लौट गयी होती और इसके अलावा शैतान द्वारा कुचल दी गई होती। इस तरह से यहोवा की यह इच्छा कि "पृथ्वी पर, अर्थात्, उसके सृजन के बीच में, उसके पास पृथ्वी पर खड़े होने के लिए एक स्थान, एक पवित्र स्थान होना चाहिए" टूटकर बिखर गई होती। और इसलिए, मानवजाति को बनाने के बाद, वह उनके जीवन में मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहने, और उनके बीच में से उनके साथ बात करने में समर्थ था, सब कुछ अपनी इच्छा को साकार करने, और अपनी योजना को प्राप्त करने के लिए था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

25. दो हज़ार वर्षों से पूर्व जिस दौरान यहोवा ने अपना कार्य किया, मनुष्य कुछ नहीं जानता था, और लगभग समस्त मानवजाति चरित्रहीनता में पतित हो गई थी, जल प्रलय द्वारा संसार के विनाश से पहले तक, वे स्वच्छंद संभोग और भ्रष्टता की गहराई तक पहुँच गए थे; जिसमें उनके हृदय यहोवा से रिक्त थे, उसके मार्ग से तो और भी अधिक रिक्त थे। उन्होंने उस कार्य को कभी नहीं समझा था जिसे यहोवा करने जा रहा था; उनमें समझ का अभाव था, और ज्ञान तो बिलकुल भी नहीं था, और एक साँस लेती हुई मशीन के समान, वे मनुष्य, परमेश्वर, संसार और इस तरह की चीज़ों से पूर्णतया अनभिज्ञ थे। पृथ्वी पर वे साँप के समान बहुत से प्रलोभनों में व्यस्त थे, और बहुत सी ऐसी बातें कहते थे जो यहोवा का अपमान करती थीं, लेकिन क्योंकि वे अनभिज्ञ थे इसलिए यहोवा ने उन्हें ताड़ित या अनुशासित नहीं किया था। केवल जलप्रलय के बाद ही, जब नूह 601 वर्ष का था, यहोवा विधिवत् रूप से नूह के सामने प्रकट हुआ और इन कुल 2,500 वर्षों में, उसने उसका तथा उसके परिवार का मार्गदर्शन किया, और व्यवस्था के युग की समाप्ति तक नूह और उसके वंशजों के साथ-साथ, जलप्रलय में जिन्दा बचे पक्षियों और जानवरों की अगुवाई की। वह इस्राएल में कार्य पर था, अर्थात्, 2,000 वर्षों तक विधिवत रूप से इस्राएल में कार्य पर था, और 500 वर्षों तक एक ही समय में इस्राएल और उसके बाहर कार्य पर था, जो साथ मिलकर 2,500 वर्ष होते हैं। इस अवधि के दौरान, उसने इस्राएलियों को निर्देश दिया कि वे यहोवा की सेवा करें, उसने कहा कि उन्हें मन्दिर का निर्माण करना चाहिए और याजकों के लबादे पहनने चाहिए, और उषाकाल में नंगे पाँव मन्दिर में प्रवेश करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि उनके जूते मन्दिर को गंदा कर दें और मन्दिर के ऊपर से उन पर आग गिरा दी जाए और उन्हें जलाकर मार डाले। उन्होंने अपने कर्तव्यों को पूरा किया और यहोवा की योजनाओं के प्रति समर्पित हो गए। उन्होंने मन्दिर में यहोवा से प्रार्थना की, और यहोवा का प्रकटन प्राप्त करने के बाद, अर्थात्, यहोवा के बोलने के बाद, उन्होंने जनसाधारण की अगुवाई की और उन्हें सिखाया कि उन्हें यहोवा—उनके परमेश्वर—के प्रति आदर दर्शाना चाहिए। यहोवा ने उनसे कहा कि उन्हें एक मन्दिर और एक वेदी बनानी चाहिए, और यहोवा के द्वारा निर्धारित समय पर, अर्थात्, फसह के पर्व पर, उन्हें यहोवा की सेवा के वास्ते बलिदान के रूप में वेदी पर रखने के लिए नए जन्मे हुए बछड़ों और मेमनों को तैयार करना चाहिए, जिससे लोगों को नियन्त्रण में रखा जा सके और उनके हृदयों में यहोवा के लिए आदर उत्पन्न किया जा सके। उन्होंने इस व्यवस्था का पालन किया या नहीं, यह यहोवा के प्रति उनकी वफादारी का पैमाना बन गया। यहोवा ने उनके लिए सब्त का दिन भी नियत किया, जो उसकी सृष्टि की रचना का सातवाँ दिन। सब्त के बाद का दिन उसने पहला दिन, यहोवा की स्तुति करने, उसके लिए भेंट चढ़ाने, और उसके लिए संगीत की रचना करने का दिन बनाया। इस दिन, लोगों के खाने के लिए वेदी के ऊपर की बलियों को बाँटने के प्रयोजन से यहोवा ने सभी याजकों को बुलाकर इकट्ठा किया ताकि वे यहोवा की वेदी पर बलियों का आनन्द उठा सकें। यहोवा ने कहा कि वे धन्य हैं, कि उन्होंने उसके साथ एक हिस्सा साझा किया, और कि वे उसके चुने हुए लोग हैं (जो कि इस्राएलियों के साथ यहोवा का वचन था)। इसीलिए, आज के दिन तक, इस्राएल के लोग अभी भी कहते हैं कि यहोवा ही उनका एकमात्र परमेश्वर है, और अन्य लोगों का परमेश्वर नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

26. व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने मूसा के लिए अनेक आज्ञाएँ निर्धारित की, जैसे कि वह उन्हें उन इस्राएलियों के लिए आगे बढ़ा दे जिन्होंने मिस्र से बाहर उसका अनुसरण किया था। ये आज्ञाएँ यहोवा द्वारा इस्राएलियों को दी गई थीं, और उनका मिस्र के लोगों से कोई संबंध नहीं था; वे इस्राएलियों को नियन्त्रण में रखने के अभिप्राय से थीं। उसने उनसे माँग करने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग किया। उन्होंने सब्त का पालन किया या नहीं, उन्होंने अपने माता-पिता का आदर किया या नहीं, उन्होंने मूर्तियों की आराधना की या नहीं, इत्यादि: यही वे सिद्धांत थे जिनसे उनके पापी या धार्मिक होने का आकलन किया जाता था। उनमें से, कुछ ऐसे थे जो यहोवा की आग से त्रस्त थे, कुछ ऐसे थे जिन्हें पत्थऱ मार कर मार डाला गया था, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यहोवा का आशीष प्राप्त किया था, और इसका निर्धारण इस बात के अनुसार किया जाता था कि उन्होंने इन आज्ञाओं का पालन किया या नहीं। जो सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें पत्थर मार कर मार डाला जाएगा। जो याजक सब्त का पालन नहीं करते थे उन्हें यहोवा की आग से त्रस्त किया जाएगा। जो अपने माता-पिता का आदर नहीं करते थे उन्हें भी पत्थर मार कर मार डाला जाएगा। यह सब कुछ यहोवा द्वारा कहा गया था। यहोवा ने अपनी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं को स्थापित किया था ताकि, जब वह उनके जीवन में उनकी अगुवाई करे, तब लोग उसके वचन को सुनें और उसके वचन का पालन करें और उसके विरूद्ध विद्रोह न करें। उसने नई जन्मी हुई मानव प्रजाति को नियन्त्रण में रखने, अपने भविष्य के कार्य की नींव को बेहतर ढंग से डालने के लिए इन व्यवस्थाओं का उपयोग किया। इसलिए, उस कार्य के आधार पर जो यहोवा ने किया, प्रथम युग को व्यवस्था का युग कहा गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

27. यद्यपि यहोवा ने बहुत से कथन कहे और बहुत से कार्य किये, किंतु उसने इन अज्ञानी लोगों को यह सिखाते हुए कि इंसान कैसे बनें, कैसे जीएँ, यहोवा के मार्ग को कैसे समझें, लोगों का केवल सकारात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया। इनमें से ज़्यादातर, उसने जो कार्य किया वह लोगों से उसके मार्ग का पालन करवाना और उसकी व्यवस्थाओं का अनुसरण करवाना था। कार्य उन लोगों पर किया गया था जो कम गहराई तक भ्रष्ट थे; यह उनके स्वभाव का रूपान्तरण करने या जीवन में प्रगति तक विस्तारित नहीं था। वह लोगों को सीमित और नियन्त्रित करने के लिए केवल व्यवस्था का उपयोग करने तक केंद्रित था। उस समय इस्राएलियों के लिए, यहोवा मात्र मन्दिर का एक परमेश्वर, स्वर्ग का एक परमेश्वर था। वह बादल का एक खम्भा, आग का एक खम्भा था। वह सब जो यहोवा उनसे करने की अपेक्षा करता था, वह था उन बातों का पालन करना जिन्हें आज लोग उसकी व्यवस्थाओं और आज्ञाओं—कोई इन्हें नियम भी कह सकता है—के रूप में जानते हैं, क्योंकि जो यहोवा ने किया वह उन्हें रूपान्तरित करने के अभिप्राय से नहीं था, बल्कि उन्हें बहुत सी वस्तुएँ देने के लिए था जो मनुष्य के पास होनी चाहिए, उन्हें स्वयं अपने मुँह से निर्देश देना था, क्योंकि सृजित किए जाने के बाद, मनुष्य के पास ऐसा कुछ नहीं था जो उसके पास होना चाहिए। इसलिए, जिन लोगों की यहोवा ने अगुवाई की थी उन्हें उनके पूर्वजों, आदम और हव्वा से भी श्रेष्ठ बनाते हुए, उसने लोगों को वे वस्तुएँ दी जो पृथ्वी पर उनके जीवन के लिए उनके पास होनी चाहिए, क्योंकि जो कुछ यहोवा ने उन्हें दिया था वह उससे बढ़कर था जो उसने आदम और हव्वा को आरंभ में दिया था। इसके बावजूद, यहोवा ने इस्राएल में जो कार्य किया, वह केवल मानवजाति का मार्गदर्शन करने और मानवजाति से उनके रचयिता की पहचान करवाने के लिए था। उसने उन्हें जीता नहीं या उन्हें रूपान्तरित नहीं किया, बल्कि मात्र उनका मार्गदर्शन किया। व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य का यही सारांश है। इस्राएल की संपूर्ण धरती पर यह उसके कार्य की पृष्ठभूमि, सच्ची कहानी और सार है, जो छः हज़ार वर्षों के उसके कार्य—मानवजाति को यहोवा के हाथ के नियन्त्रण के अधीन रखने—का आरंभ है। इसमें से उसकी छः-हज़ार-वर्षों की प्रबन्धन योजना में और अधिक कार्य पैदा हुए थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'व्यवस्था के युग का कार्य' से उद्धृत

पिछला: 1. मनुष्यजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य पर अत्यावश्यक वचन

अगला: 1.2. परमेश्वर के अनुग्रह के युग में अपने कार्य को प्रकट करने पर

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

उद्धारकर्त्ता पहले ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है

कई हज़ार सालों से, मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता के आगमन को देखने में सक्षम होने की लालसा की है। मनुष्य ने उद्धारकर्त्ता यीशु को देखने की इच्छा की...

सहस्राब्दि राज्य आ चुका है

क्या तुम लोगों ने देखा है कि इस समूह के लोगों में परमेश्वर कौन-सा कार्य पूरा करेगा? परमेश्वर ने एक बार कहा था कि सहस्राब्दि राज्य में भी...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें