सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (9)

अभी कुछ समय से हम नैतिक आचरण के विषय पर संगति कर रहे हैं। पिछली बार हमने एक कहावत के बारे में संगति की थी—“अगर तुम दूसरों पर वार करते हो, तो उनके चेहरे पर वार मत करो; अगर तुम दूसरों को उजागर करते हो, तो उनकी कमियाँ उजागर मत करो।” आज हम इस कहावत के बारे में संगति कर रहे हैं कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो,” जो मनुष्य के नैतिक आचरण के लिए परंपरागत संस्कृति की ही एक अन्य अपेक्षा है। यह कहावत लोगों के नैतिक आचरण के कौन-से पहल छूती है? क्या इसके लिए लोगों का उदार और सहिष्णु होना अपेक्षित है? (बिल्कुल।) यह मानव-प्रकृति की उदारता से जुड़ी अपेक्षा है। इस अपेक्षा का क्या मानदंड है? इसका मुख्य बिंदु क्या है? (जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।) यह सही है, मुख्य बिंदु यह है कि तुम्हें जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनना चाहिए और इतना आक्रामक नहीं होना चाहिए कि लोगों के लिए कोई रास्ता न छोड़ो। नैतिक आचरण की यह कहावत लोगों से उदार होने और छोटी-मोटी शिकायतें न पालने की अपेक्षा करती है। लोगों के साथ जुड़ते हुए या अपने रोजमर्रा के काम करते समय अगर कोई विवाद, संघर्ष या द्वेष उत्पन्न होता है तो हमलावर पक्ष से निपटने में ज्यादा सख्त, असामान्य या कठोर न होओ। जब जरूरी हो उदार बनो, जब जरूरी हो दरियादिल बनो और दुनिया और मानवजाति के प्रति सचेत रहो। क्या लोगों में इतनी बड़ी दरियादिली है? (नहीं।) लोगों में इतनी बड़ी दरियादिली नहीं है। लोग निश्चित नहीं हैं कि इस तरह की चीज झेलने की इंसानी प्रवृत्ति की क्षमता कितनी बड़ी है और वह किस हद तक सामान्य है। किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति सामान्य लोगों का मूल रवैया क्या होता है जिसने तुम्हें चोट पहुँचाई है, जो तुम्हारे साथ शत्रुता से पेश आया है या जिसने तुम्हारे हितों का अतिक्रमण किया है? वे ऐसे लोगों से नफरत करते हैं। जब लोगों के दिलों में नफरत पैदा होती है तो क्या वे “जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनने” में सक्षम होते हैं? ऐसा करना आसान नहीं है और ज्यादातर लोग ऐसा नहीं कर सकते। जब ज्यादातर लोगों की बात आती है तो क्या वे दूसरे व्यक्ति के साथ उदार होने और बीती बात भूलकर नए सिरे से शुरुआत करने के लिए अपनी मानवता में मौजूद जमीर और समझ पर भरोसा कर सकते हैं? (नहीं।) लेकिन यह कहना पूरी तरह से सही नहीं है कि ऐसा नहीं किया जा सकता। यह पूरी तरह से सही क्यों नहीं है? यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि मुद्दा क्या है और वह कितना अहम या तुच्छ है। साथ ही, समस्याओं की तीव्रता अलग-अलग होती है, इसलिए यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितनी गंभीर है। अगर कोई तुम्हें अपने शब्दों से कभी-कभार ही चोट पहुँचाता है तो जमीर और विवेक वाले व्यक्ति होने पर तुम सोचोगे, “उसके मन में द्वेष नहीं है। वह जो कहता है उसका वह मतलब नहीं होता, वह बिना सोचे-समझे जो मन में आए बोल देता है। उसके साथ बिताए तमाम वर्षों की खातिर या अमुक-अमुक की खातिर या इस या उस चीज की खातिर मैं उसका बुरा नहीं मानूँगा। जैसी कि कहावत भी है, ‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।’ उसकी बात एक टिप्पणी भर है, इसने मेरे अभिमान को ठेस नहीं पहुँचाई या मेरे हितों को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुँचाया, मेरी हैसियत या भविष्य की संभावनाओं को प्रभावित करने की तो बात ही छोड़ो, इसलिए मैं इसे अनदेखा कर दूँगा।” इन तुच्छ मामलों का सामना करते समय लोग इस कहावत का पालन कर सकते हैं कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।” लेकिन अगर कोई वास्तव में तुम्हारे महत्वपूर्ण हितों या तुम्हारे परिवार को नुकसान पहुँचाता है या उसके द्वारा तुम्हें पहुँचाया गया नुकसान तुम्हारे पूरे जीवन को प्रभावित करता है तो क्या तुम फिर भी इस कहावत का पालन कर सकते हो कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो”? उदाहरण के लिए, अगर किसी ने तुम्हारे माता-पिता को मार डाला और तुम्हारे परिवार के बाकी लोगों को भी मारना चाहता है, तो क्या तुम इस कहावत पर अमल कर सकते हो कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो”? (नहीं, मैं नहीं कर सकता।) हाड़-मांस का कोई भी सामान्य व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाएगा। यह कहावत लोगों की गहरी घृणा को बिल्कुल नहीं रोक सकती, और बेशक यह इस मामले पर लोगों के रवैये और राय को प्रभावित तो बिल्कुल भी नहीं कर सकती। अगर कोई जानबूझकर या अनजाने में तुम्हारे हितों को नुकसान पहुँचा दे या तुम्हारी भविष्य की संभावनाओं को प्रभावित कर दे या तुम्हें शारीरिक नुकसान पहुँचा दे, तुम्हें अपंग या जख्मी कर दे या तुम्हारे मानस-पटल और अंतरतम पर ग्रहण लगा दे तो क्या तुम इस कहावत का पालन कर सकते हो, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो”? (नहीं।) तुम नहीं कर सकते। तो, परंपरागत संस्कृति लोगों से अपने नैतिक आचरण में सहिष्णु और उदार होने की अपेक्षा करती है, पर क्या लोग ऐसा कर सकते हैं? ऐसा करना आसान काम नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मामले ने संबंधित व्यक्ति को कितना नुकसान पहुँचाया और प्रभावित किया है, और उसका जमीर और विवेक उसे झेल सकता है या नहीं। अगर कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है और वह व्यक्ति उसे सह सकता है और वह उस सीमा से अधिक नहीं है जिसे उसकी मानवता सह सकती है, यानी एक सामान्य वयस्क के रूप में वह इन चीजों को झेल सकता है और रोष और घृणा दूर की जा सकती है और उन्हें छोड़ना अपेक्षाकृत आसान है, तो वह दूसरे व्यक्ति के साथ सहिष्णु और उदार हो सकता है। तुम परंपरागत संस्कृति से तुम्हें नियंत्रित करने, सिखाने और क्या करना है इस बारे में मार्गदर्शन करने के लिए नैतिक आचरण संबंधी किसी कहावत के बिना भी ऐसा कर सकते हो क्योंकि यह ऐसी चीज है जो सामान्य मानवता में है और ऐसा किया जा सकता है। अगर इस मामले ने तुम्हें बहुत अधिक चोट नहीं पहुँचाई है या शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तुम पर बड़ा असर नहीं डाला है तो तुम इसे आसानी से कर सकते हो। लेकिन अगर उसने शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से तुम पर इतना बड़ा प्रभाव डाला है कि वह तुम्हें पूरे जीवन परेशान करता है, अक्सर तुम्हें उदास और निराश कर देता है, उसकी वजह से तुम अक्सर खिन्न और हताश महसूस करते हो, उसके कारण तुम इस मानवजाति और इस दुनिया को शत्रु समझते हो, तुम्हारे दिल में कोई चैन या खुशी नहीं है और तुम व्यावहारिक रूप से अपना सारा जीवन घृणा में जीते हो, यानी, अगर वह मामला सामान्य मानवता की सहन-शक्ति से परे चला गया है तो जमीर और विवेक रखने वाले व्यक्ति के रूप में जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनना बहुत मुश्किल है। अगर कुछ लोग ऐसा कर सकते हैं तो वे अपवाद हैं, लेकिन यह किस पर आधारित होना चाहिए? किस तरह की शर्तें पूरी होनी चाहिए? कुछ लोग कहते हैं : “तो उन्हें बौद्ध धर्म स्वीकार लेना चाहिए और बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए घृणा त्याग देनी चाहिए।” यह आम लोगों के बीच मुक्ति का मार्ग हो सकता है, लेकिन यह केवल मुक्ति है। वैसे इस शब्द “मुक्ति” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है सांसारिक विवादों, घृणा और हत्या से दूर रहना, और यह “दृष्टि से ओझल, दिमाग से ओझल” कहावत के समान है। अगर तुम ऐसे मामलों से दूर रहते हो और उन्हें देख नहीं पाते, तो उनका तुम्हारी अंतरतम भावनाओं पर बहुत कम प्रभाव पड़ेगा और समय बीतने के साथ वे धीरे-धीरे तुम्हारी याददाश्त से मिट जाएँगी। लेकिन यह इस कहावत का पालन करना नहीं है कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।” लोग इस मामले में उदार या क्षमाशील और सहिष्णु होने और इसे हमेशा के लिए छोड़ पाने में सक्षम नहीं हैं। ये मामले लोगों के दिलों की अंतरतम गहराइयों से सिर्फ धुँधले पड़ गए हैं और वे अब इनकी परवाह नहीं करते। या यह सिर्फ कुछ बौद्ध शिक्षाओं के कारण है कि लोग अनिच्छा से घृणा के साथ जीना बंद कर देते हैं और प्यार और घृणा की इन सांसारिक भावनाओं में फँस जाते हैं। यह सिर्फ प्रेम और घृणा से भरे विवाद और संघर्ष के इन स्थानों से दूर रहने के लिए खुद को निष्क्रिय रूप से मजबूर करना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई इस कहावत पर अमल कर सकता है कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।” ऐसा क्यों है? जहाँ तक सामान्य मानवता का संबंध है, अगर व्यक्ति के साथ कुछ ऐसा होता है जो उसके तन-मन और आत्मा को गंभीर नुकसान पहुँचाता है, जैसे कि असहनीय दबाव या चोट, तो चाहे उसमें कितनी भी क्षमताएँ क्यों न हों, वह इसे सहन नहीं कर सकता। “इसे सहन नहीं कर सकता” से मेरा क्या मतलब है? मेरा मतलब है कि लोगों की सामान्य मानवता, विचार और दृष्टिकोण ये चीजें सहने या इन्हें दूर करने में असमर्थ हैं। मनुष्य की भाषा में कहा जा सकता है कि वे इसे सहन नहीं कर सकते, कि यह मनुष्य की सहनशीलता की सीमा से परे है। विश्वासियों की भाषा में कहा जा सकता है कि वे इस मामले को समझ नहीं सकते, बूझ नहीं सकते या स्वीकार नहीं सकते। इसलिए, चूँकि घृणा की इन भावनाओं को सहने या इन्हें दूर करने का कोई संभव तरीका नहीं है, तो क्या इस कहावत का पालन करना संभव है कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो”? (नहीं।) ऐसा न कर पाने का निहितार्थ क्या है? निहितार्थ यह है कि सामान्य मानवता में इस प्रकार की दरियादिली नहीं होती। उदाहरण के लिए, मान लो किसी ने तुम्हारे माता-पिता को मार डाला और तुम्हारे पूरे परिवार को मिटा दिया, तो क्या तुम इस तरह की चीज भुला सकते हो? क्या यह नफरत दूर करना संभव है? क्या तुम अपने शत्रु को उस तरह देख सकते हो जैसे आम लोगों को देखते हो या अपने शत्रु के बारे में उस तरह सोच सकते हो जैसे तुम आम लोगों के बारे में सोचते हो, और तुम्हारे तन-मन या आत्मा में कोई एहसास न हो? (नहीं।) कोई भी ऐसा नहीं कर सकता, जब तक कि वह बौद्ध धर्म में विश्वास न करता हो और उसने खुद अपनी आँखों से कर्म-फल न देख लिया हो ताकि वह बदला लेने के लिए हत्या का विचार छोड़ सकता है। कुछ लोग कहते हैं : “मैं नेकदिल हूँ, इसलिए अगर किसी ने मेरे माता-पिता को मार डाला तो मैं उसके प्रति उदार हो सकता हूँ और उससे बदला नहीं लूँगा क्योंकि मैं कर्म-फल में बहुत विश्वास करता हूँ। ‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो’ कहावत इसे अच्छी तरह समझाती है : अगर बदला बदले को जन्म देता है तो क्या इसका कभी अंत होगा? यही नहीं, उसने पहले ही अपनी गलती मान ली है, यहाँ तक कि अपने हाथों और घुटनों के बल बैठकर मुझसे माफी भी माँग ली है। हिसाब बराबर हो गया है, मैं उसके प्रति उदार बनूँगा!” क्या लोग इतने उदार हो सकते हैं? (नहीं।) वे ऐसा नहीं कर सकते। उसे पकड़ने के बाद तुम जो कर सकते हो, उसे एक ओर रख दें तो, उसे पकड़ने से पहले भी तुम रोज लगातार बदला लेने के बारे में ही सोच पाते हो। चूँकि इस मामले ने तुम्हें बहुत आहत किया है और तुम पर बहुत असर डाला है, इसलिए एक सामान्य व्यक्ति के नाते तुम निश्चित रूप से इसे जीते-जी कभी नहीं भूलोगे। यहाँ तक कि अपने सपनों में भी तुम अपने परिवार के मारे जाने और अपना बदला लेने की तस्वीरें ही देखोगे। यह मामला तुम्हें शेष पूरे जीवन, तुम्हारी आखिरी साँस तक प्रभावित कर सकता है। इस तरह की घृणा आसानी से छोड़ी ही नहीं जा सकती। बेशक, इससे थोड़े कम गंभीर मामले भी हैं। उदाहरण के लिए, मान लो किसी ने तुम्हें सार्वजनिक रूप से थप्पड़ मारा, सबके सामने शर्मिंदा और बेइज्जत कर अकारण तुम्हारा अपमान किया। तब से बहुत-से लोग तुम्हें घृणा की नजर से देखते हैं, यहाँ तक कि तुम्हारा मजाक भी उड़ाते हैं, इसलिए तुम लोगों के आसपास रहने में शर्म महसूस करते हो। यह तुम्हारे माता-पिता और परिवार के सदस्यों को मारने से कहीं कम गंभीर है। फिर भी, इस कहावत का पालन करना कठिन है कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” क्योंकि तुम्हारे साथ हुई ये चीजें पहले ही सामान्य मानवता की सहनशीलता की सीमा से परे हैं। इन्होंने तुम्हें बहुत अधिक शारीरिक-मानसिक नुकसान पहुँचाया है, और तुम्हारी गरिमा और चरित्र को बहुत आहत किया है। तुम्हारे इन्हें भूल पाने या छोड़ सकने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए तुम्हारे लिए इस कहावत का पालन करना बहुत मुश्किल है कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो”—जो सामान्य है।

जिन पहलुओं पर हमने अभी-अभी संगति की, उन्हें देखते हुए परंपरागत चीनी संस्कृति की नैतिक आचरण संबंधी यह कहावत “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो,” एक ऐसा सिद्धांत है जो लोगों को संयमित और प्रबुद्ध करता है। यह सिर्फ छोटे-मोटे विवाद और तुच्छ संघर्ष ही हल कर सकती है, लेकिन जब गहरी नफरत पालने वाले लोगों की बात आती है तो इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। क्या यह अपेक्षा सामने रखने वाले लोग वास्तव में मनुष्य की मानवता को समझते हैं? कहा जा सकता है कि यह अपेक्षा सामने रखने वाले लोग किसी भी तरह से इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि इंसानी जमीर और विवेक की सहनशीलता का दायरा कितना बड़ा है। बस इतना है कि यह सिद्धांत सामने रखने से वे दुनियादार और नेक दिखाई दे सकते हैं और लोगों की स्वीकृति और चापलूसी अर्जित कर सकते हैं। तथ्य यह है कि वे अच्छी तरह जानते हैं कि अगर कोई व्यक्ति किसी की गरिमा या चरित्र को ठेस पहुँचाता है, उसके हितों को नुकसान पहुँचाता है या उसकी भविष्य की संभावनाओं और उसके पूरे जीवन पर भी असर डालता है, तो मानव-प्रकृति के दृष्टिकोण से आहत पक्ष को प्रतिकार करना चाहिए। चाहे उसमें कितना भी जमीर और विवेक क्यों न हो, वह उसे चुपचाप बरदाश्त नहीं करेगा। ज्यादा से ज्यादा, उसके प्रतिशोध की मात्रा और तरीका ही भिन्न होगा। इस वास्तविक समाज में, इस बेहद अँधेरे और बुरे सामाजिक परिवेश और सामाजिक संदर्भ में, जिसमें लोग रहते हैं, जिसमें मानवाधिकारों का अस्तित्व नहीं है, लोगों ने कभी एक-दूसरे से लड़ना और एक-दूसरे को मारना बंद नहीं किया है, सिर्फ इसलिए कि जब भी वे आहत होते हैं, वे बदला ले सकते हैं। वे जितने ज्यादा गंभीर रूप से आहत होते हैं, बदला लेने की उनकी इच्छा उतनी ही प्रबल होती है और जिन तरीकों से वे बदला लेते हैं, वे उतने ही ज्यादा क्रूर होते हैं। तो इस समाज में प्रचलित प्रवृत्तियाँ कैसी होंगी? लोगों के बीच संबंधों का क्या होगा? क्या समाज में मारकाट और बदले की भरमार नहीं हो जाएगी? इसलिए, यह अपेक्षा सामने रखने वाला व्यक्ति नैतिक आचरण की इस कहावत का उपयोग करते हुए कि—“मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो”—लोगों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए उनसे बहुत ही अप्रत्यक्ष तरीके से प्रतिशोध न लेने के लिए कह रहा है। जब भी लोगों के साथ अनुचित व्यवहार होता है या उनके चरित्र पर लांछन लगता है या उनकी गरिमा को ठेस पहुँचती है, नैतिक आचरण की यह कहावत उन लोगों को कुछ कर गुजरने से पहले दो बार सोचने के लिए प्रेरित कर प्रभावित करती है, और उन्हें आवेश में आने और अति-प्रतिक्रिया करने से रोकती है। अगर इस समाज के लोग अपने साथ अनुचित व्यवहार होने पर, चाहे वह राज्य द्वारा किया जाए या समाज द्वारा या अपने संपर्क में आने वाले लोगों द्वारा, बदला लेना चाहें, तो क्या इस मानवजाति और इस समाज को सँभालना मुश्किल नहीं होगा? जहाँ भी भीड़ होगी, वहाँ झगड़े अपरिहार्य हो जाएँगे और बदला लेना एक सामान्य घटना बन जाएगी। तो क्या तब यह मानवजाति और यह समाज अराजकता में नहीं पड़ जाएँगे? (बिल्कुल।) अराजकता में पड़े समाज को सँभालना शासकों के लिए आसान होता है, या नहीं? (नहीं, उसे सँभालना आसान नहीं होता।) इसी कारण से उन तथाकथित सामाजिक शिक्षकों और विचारकों ने लोगों को समझाने और प्रबुद्ध करने के लिए नैतिक आचरण की यह कहावत सामने रखी कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो”, ताकि जब भी उनके साथ कोई अनुचित व्यवहार या भेदभाव हो या उनका अपमान किया जाए, या उनका उत्पीड़न तक हो या उन्हें कुचल ही क्यों न दिया जाए, और चाहे उनकी आध्यात्मिक या शारीरिक पीड़ा कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वे पहले बदला लेने की न सोचें, बल्कि नैतिकता की इस उत्कृष्ट कहावत के बारे में सोचें, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो,” जिससे वे अनजाने ही परंपरागत संस्कृति की नैतिक आचरण संबंधी इन कहावतों के नियंत्रण स्वीकार कर लें और इस प्रकार अपने विचारों और व्यवहार को प्रभावी ढंग से नियंत्रित कर दूसरों के प्रति, राज्य के प्रति और समाज के प्रति अपनी घृणा दूर कर लें। जब मानव-प्रकृति में अनिवार्य रूप से मौजूद यह शत्रुता और रोष और अपनी गरिमा बचाने के ये सहज विचार दूर कर दिए जाएँगे, तो क्या इस समाज में लोगों के बीच संघर्ष और प्रतिशोध बड़ी मात्रा में कम हो जाएँगे? (हाँ।) उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं : “चलो, झगड़ा खत्म करते हैं, समझौते से संघर्ष सुलटना आसान हो जाएगा। कहा जाता है कि ‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।’ मेरे परिवार को मारने के लिए उसके अपने कारण थे। ताली एक हाथ से नहीं बजती और दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क से चिपके रहते हैं। इसके अलावा, मेरा परिवार वर्षों पहले मर चुका है, गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या फायदा? जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो—लोगों को अपनी घृणा छोड़ पाने के लिए उदार होना सीखना चाहिए, अपनी घृणा छोड़कर ही वे जीवन में खुश रह सकते हैं।” और भी लोग हैं जो कहते हैं : “जो बीत गई सो बात गई। अगर वह मेरे प्रति छोटी-मोटी शिकायतें नहीं रखता या मुझे पहले की तरह दुश्मनी की नजर से नहीं देखता, तो मैं भी उससे झगड़ा नहीं करूँगा, हम बस नए सिरे से शुरुआत करेंगे। जैसी कि कहावत है, ‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।’” अगर ऐसे लोग, चाहे वे कोई भी हों, जब प्रतिशोध लेने वाले हों, तभी अचानक खुद पर लगाम लगा लें, तो क्या उनके तमाम शब्द, कार्य और सैद्धांतिक आधार अनिवार्य रूप से “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” जैसे विचारों और दृष्टिकोणों के प्रभाव से उत्पन्न नहीं होते? (हाँ, होते हैं।) और भी लोग हैं, जो कहते हैं : “ये तमाम तर्क-वितर्क क्यों? तुम इतने अच्छे इंसान हो, फिर भी, इतनी छोटी-सी बात भी नहीं छोड़ सकते! महापुरुषों का दिल दरिया होता है। कम से कम, थोड़ी उदारता बरतो! क्या लोगों को जीवन में थोड़ा उदार नहीं होना चाहिए? एक कदम पीछे हटो और छोटी-छोटी शिकायतें पकड़े रखने के बजाय बड़ी तस्वीर देखो। यह निरर्थक बहसबाजी करते देखना हास्यास्पद है।” ये कहावतें और विचार सांसारिक मामलों के प्रति एक प्रकार के इंसानी रवैये को सारांशित करते हैं, ऐसे रवैये को जो सिर्फ “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” और नैतिकता की ऐसी ही अन्य उत्कृष्ट कहावतों से आते हैं। लोग इन कहावतों से प्रेरित और प्रभावित होते हैं, और उन्हें लगता है कि ये लोगों को समझाने और प्रबुद्ध करने में कुछ भूमिका निभाती हैं, इसलिए वे इन चीजों को सही और उचित मानते हैं।

ऐसा क्यों है कि लोग नफरत छोड़ सकते हैं? इसके मुख्य कारण क्या हैं? एक ओर, वे नैतिक आचरण संबंधी इस कहावत से प्रभावित होते हैं—“मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।” दूसरी ओर, वे इस विचार से चिंतित होते हैं कि अगर वे मन में छोटी-मोटी शिकायतें पालेंगे, लगातार लोगों से घृणा करेंगे और दूसरों के प्रति असहिष्णु रहेंगे तो वे समाज में एक मुकाम हासिल करने में असमर्थ होंगे, जनमत उनकी निंदा करेगा और लोग उनकी हँसी उड़ाएँगे, इसलिए उन्हें मन मारकर और अनिच्छा से अपना गुस्सा पी लेना चाहिए। एक ओर, इंसानी प्रवृत्ति को देखते हुए इस संसार में रहने वाले लोग यह सब अत्याचार, निर्मम चोट और अनुचित व्यवहार सहन नहीं कर सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि ये चीजें सहन कर पाना मानव-प्रकृति में नहीं है। इसलिए, किसी से भी यह अपेक्षा रखना अनुचित और अमानवीय है कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।” दूसरी ओर, यह स्पष्ट है कि इस तरह के विचार और दृष्टिकोण इन मामलों पर लोगों के विचारों और परिप्रेक्ष्यों को प्रभावित या विकृत भी करते हैं, इसलिए वे ऐसे मामलों को ठीक से लेने में असमर्थ रहते हैं, बल्कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” जैसी कहावतों को सही और सकारात्मक चीजें समझते हैं। जब लोगों के साथ अनुचित व्यवहार किया जाता है, तो जनमत की निंदा से बचने के लिए उनके पास अपने अपमान और अपने साथ हुए भेदभाव को दबा देने और प्रतिशोध का अवसर मिलने की प्रतीक्षा करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता। भले ही वे पुरजोर अच्छी-अच्छी बातें कहते हों, जैसे “‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।’ भूल जाओ, प्रतिशोध में कुछ नहीं रखा, बात पुरानी पड़ चुकी है,” लेकिन मानव-प्रवृत्ति उन्हें इस घटना से हुआ नुकसान भूलने से हमेशा रोकती है, यानी इससे उनके तन-मन को जो नुकसान हुआ होता है, वह कभी मिटाया या धूमिल नहीं किया जा सकता। जब लोग कहते हैं, “नफरत भूल जाओ, यह मामला खत्म हो गया है, बात पुरानी पड़ चुकी है,” तो यह सिर्फ “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” जैसे विचारों और दृष्टिकोणों की बाध्यता और प्रभाव से बना एक मुखौटा होता है। बेशक, लोग भी इस तरह के विचारों और दृष्टिकोणों से इस हद तक बँधे होते हैं कि वे सोचते हैं कि अगर वे इन्हें अमल में लाने में सफल नहीं होते, अगर उनमें जहाँ कहीं भी संभव हो, उदार होने का दिल या उदारता नहीं है, तो सभी उन्हें हेय दृष्टि से देखेंगे और उनकी निंदा करेंगे, और समाज में या उनके समुदाय के भीतर उनके साथ और भी ज्यादा भेदभाव किया जाएगा। भेदभाव किए जाने का क्या परिणाम होता है? यही कि जब तुम लोगों के संपर्क में आकर अपना रोजमर्रा का काम करोगे तो वे कहेंगे, “यह आदमी ओछा और प्रतिशोधी है। इसके साथ पेश आते समय सावधान रहना!” जब तुम समुदाय के भीतर अपना रोजमर्रा का काम करते हो तो यह प्रभावी रूप से एक अतिरिक्त बाधा बन जाता है। यह अतिरिक्त बाधा क्यों होती है? क्योंकि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” जैसे विचारों और दृष्टिकोणों से समाज समग्र रूप से प्रभावित होता है। समग्र रूप से समाज के रीति-रिवाज इस तरह की सोच का सम्मान करते हैं और पूरा समाज इससे सीमित, प्रभावित और नियंत्रित होता है, इसलिए अगर तुम इसे अमल में नहीं ला सकते तो समाज में पैर जमाना और अपने समुदाय के भीतर बचे रहना मुश्किल होगा। इसलिए, कुछ लोगों के पास दयनीय जीवन जीते हुए इस तरह के सामाजिक रीति-रिवाजों के आगे सिर झुकाने और “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” जैसी कहावतों और विचारों का पालन करने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होता। इन परिघटनाओं के आलोक में क्या नैतिक विचारों और दृष्टिकोणों के बारे में ये चीजें सामने रखने में तथाकथित नैतिकतावादियों के कुछ उद्देश्य और इरादे नहीं थे? क्या उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि मनुष्य ज्यादा स्वतंत्रता से जी सकें और उनका तन-मन और आत्मा ज्यादा मुक्त हो सकें? या इसलिए कि लोग सुखी जीवन जी सकें? बिल्कुल भी नहीं। नैतिक आचरण की ये कहावतें लोगों की सामान्य मानवता की जरूरतें बिल्कुल भी पूरी नहीं करतीं और ये खास तौर से इसलिए तो नहीं बनाई गईं कि लोग सामान्य मानवता को जी सकें। बल्कि, ये पूरी तरह लोगों को नियंत्रित कर अपनी सत्ता स्थिर करने की शासक-वर्ग की महत्वाकांक्षा पूरी करती हैं। ये शासक वर्ग के काम आती हैं और इसलिए बनाई गई थीं कि शासक वर्ग हर मनुष्य, हर परिवार, हर व्यक्ति, हर समुदाय, हर समूह और तमाम समूहों से मिलकर बने समाज को बाध्य करने के लिए इन चीजों का उपयोग करके सामाजिक व्यवस्था और सामाजिक रीति-रिवाजों पर नियंत्रण रख सके। ऐसे समाजों में ही, ऐसे नैतिक विचारों और दृष्टिकोणों के शिक्षण, प्रभाव और मतारोपण के तहत, समाज के मुख्यधारा के नैतिक विचार और दृष्टिकोण उभरकर आकार लेते हैं। यह सामाजिक नैतिकता और सामाजिक रीति-रिवाजों का आकार लेना मानवजाति के अस्तित्व के लिए ज्यादा अच्छा नहीं रहा, न ही यह मानव-विचार की प्रगति और शुद्धि के लिए ही ज्यादा अच्छा है, न ही यह मानवता की वृद्धि के लिए ज्यादा अच्छा है। इसके विपरीत इन नैतिक विचारों और दृष्टिकोणों के उद्भव के कारण इंसानी सोच एक नियंत्रणीय दायरे के भीतर ही सीमित है। तो, अंत में लाभ किसे होता है? मानवजाति को? या शासक वर्ग को? (शासक वर्ग को।) यह सही है, यह शासक वर्ग ही है जिसे अंत में लाभ होता है। ये नैतिक शास्त्र उनकी सोच और नैतिक आचरण के आधार होने से मनुष्यों पर शासन करना आसान है, उनके आज्ञाकारी नागरिक होने की ज्यादा संभावना है, उन्हें बरगलाना आसान है, वे जो कुछ भी करते हैं उसमें वे नैतिक शास्त्रों की तमाम कहावतों से ज्यादा आसानी से शासित होते हैं, और ज्यादा आसानी से ही वे शासित होते हैं सामाजिक प्रणालियों, सामाजिक नैतिकता, सामाजिक रीति-रिवाजों और जनमत द्वारा। इस तरह जो लोग समान सामाजिक प्रणालियों, नैतिक परिवेश और सामाजिक रीति-रिवाजों के अधीन होते हैं, एक हद तक उनके मूल रूप से सर्वसम्मत विचार और दृष्टिकोण होते हैं, और आचरण की एक सर्वसम्मत कसौटी होती है क्योंकि तथाकथित नैतिकतावादी, विचारक और शिक्षक उनके विचारों और दृष्टिकोणों को प्रसंस्करण और मानकीकरण की प्रक्रिया से गुजार चुके हैं। इस “सर्वसम्मत” शब्द का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि जिन लोगों पर शासन किया जाता है उन सभी को—उनके विचारों और उनकी सामान्य मानवता सहित—नैतिक शास्त्रों की इन कहावतों ने एक-सा और सीमित कर दिया है। लोगों के विचार सीमाबद्ध कर दिए जाते हैं और साथ ही उनकी जुबान और दिमाग भी सीमित कर दिए जाते हैं। सभी को परंपरागत संस्कृति के इन नैतिक विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकारने के लिए बाध्य किया जाता है, एक ओर इनका इस्तेमाल अपने ही व्यवहार का आकलन कर उसे बाधित करने के लिए किया जाता है, तो दूसरी ओर अन्य लोगों और इस समाज का आकलन करने के लिए। बेशक, साथ ही वे जनमत से भी नियंत्रित होते हैं जो नैतिक शास्त्रों से आई इन कहावतों पर केंद्रित होता है। अगर तुम सोचते हो कि काम करने का तुम्हारा तरीका इस कहावत का उल्लंघन करता है कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो,” तो तुम बहुत परेशान और असहज हो जाते हो, और तुम्हारे मन में यह बात आते देर नहीं लगती कि “अगर मैं जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार नहीं हो पाता, अगर मैं लिलिपुट के कुछ बौनों की तरह बहुत तुच्छ और ओछा हूँ, और मैं थोड़ी-सी नफरत भी नहीं छोड़ सकता, बल्कि इसे हर समय ओढ़े रहता हूँ, तो क्या मेरी हँसी नहीं उड़ाई जाएगी? क्या सहकर्मी और दोस्त मेरे साथ भेदभाव नहीं करेंगे?” इसलिए, तुम्हें विशेष रूप से उदार होने का दिखावा करना होगा। अगर लोगों के ये व्यवहार हैं, तो क्या इसका यह मतलब है कि वे जनमत से नियंत्रित होते हैं? (बिल्कुल।) निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो, तुम्हारे दिल की गहराई में अदृश्य बेड़ियाँ हैं, यानी जनमत और पूरे समाज की निंदा तुम्हारे लिए अदृश्य बेड़ियों की तरह हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग जानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करना अच्छा है और परमेश्वर में विश्वास करके वे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं, और परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ है सही मार्ग पर चलना और बुरे काम न करना, लेकिन जब वे पहली बार परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे इसके बारे में खुलकर बात करने या अपनी आस्था स्वीकारने की हिम्मत नहीं करते, यहाँ तक कि सुसमाचार फैलाने की हिम्मत भी नहीं करते। वे इसके बारे में खुलकर बात करने और लोगों को बताने की हिम्मत क्यों नहीं करते? क्या वे समग्र परिवेश से प्रभावित होते हैं? (हाँ।) तो इस समग्र परिवेश का तुम पर क्या प्रभाव और बाध्यताएँ होती हैं? तुम यह स्वीकारने का साहस क्यों नहीं करते कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो? तुम लोग सुसमाचार फैलाने का साहस क्यों नहीं करते? अधिनायकवादी देशों जैसे विशेष मामलों के अलावा, जहाँ आस्थावान लोगों को सताया जाता है, एक और कारण यह है कि जनमत से आने वाली विभिन्न कहावतें तुम्हारे लिए असह्य होती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं कि जब तुम धर्म में विश्वास करना शुरू कर देते हो तो तुम अपने परिवार की परवाह नहीं करते; कुछ लोग यह कहते हुए तुम्हें शैतान के रूप में चित्रित करने लगते हैं कि धर्म में विश्वास करने वाले अमर होना चाहते हैं और वे खुद को समाज से अलग कर लेते हैं; दूसरे लोग कहते हैं कि विश्वासी बिना खाए रह सकते हैं और थकान महसूस किए बिना कई दिनों तक सोते नहीं; और कुछ दूसरे लोग इससे भी बुरी बातें कहते हैं। शुरुआत में क्या तुम लोगों ने यह स्वीकारने का साहस नहीं किया कि तुम परमेश्वर में इसलिए विश्वास करते थे क्योंकि तुम इन मतों से प्रभावित थे? क्या समग्र सामाजिक परिवेश में इन विचारों का तुम पर प्रभाव पड़ता है? (हाँ।) कुछ हद तक ये तुम्हारी मनोदशा को प्रभावित करते हैं और तुम्हारे अभिमान को ठेस पहुँचाते हैं, इसलिए तुम खुले तौर पर यह स्वीकारने की हिम्मत नहीं करते कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। चूँकि यह समाज आस्थावान लोगों और परमेश्वर में विश्वास करने वालों के प्रति अमित्रवत और शत्रुतापूर्ण है, और कुछ लोग नीचतापूर्ण अपमानजनक बातें और निंदात्मक टिप्पणियाँ भी करते हैं जो तुम्हारे लिए असह्य होती हैं, इसलिए तुम खुले तौर पर यह स्वीकारने की हिम्मत नहीं करते कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, और तुम्हें चोरों की तरह छिपकर सभाओं में जाना पड़ता है। तुम डरते हो कि अगर दूसरों को पता चला तो वे निंदात्मक बातें कहेंगे, इसलिए तुम बस यही कर सकते हो कि अपना आक्रोश दबा लो। इस तरह, तुमने चुपचाप बहुत पीड़ा सही है, लेकिन यह तमाम पीड़ा सहना बहुत शिक्षाप्रद है और तुमने बहुत-सी चीजों में एक स्पष्ट अंतर्दृष्टि प्राप्त की है और कुछ सत्य समझे हैं।

अभी-अभी हमने नैतिक आचरण के बारे में इस कहावत पर व्यापक रूप से संगति की है, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनें।” मानवता के परिप्रेक्ष्य से यह कहावत वह न्यूनतम नैतिक आचरण तय करती है जो उदारता और व्यापक सोच के मामले में किसी व्यक्ति में होना चाहिए। तथ्य यह है कि लोगों के मानवाधिकारों, गरिमा, निष्ठा और मानवता को होने वाले नुकसान और उन पर पड़ने वाले प्रभाव के आलोक में, लोगों को दिलासा देने और विवश करने के लिए सिर्फ अपराध-जगत के लुटेरों और डाकुओं की विशिष्ट शब्दावली जैसी इस कहावत का उपयोग करना कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो,” जमीर और विवेक वाले लोगों का बहुत बड़ा अपमान है, और यह अमानवीय और अनैतिक है। सामान्य मानवता में स्वाभाविक रूप से आनंद, क्रोध, दुख और खुशी होती है। मैं आनंद, दुख और खुशी के बारे में और कुछ नहीं कहूँगा। क्रोध भी एक भावना है, जो सामान्य मानवता में होती है। क्रोध किन परिस्थितियों में उत्पन्न और सामान्य रूप से अभिव्यक्त होता है? जब सामान्य मानवता का रोष खुद अभिव्यक्त होता है—अर्थात, जब लोगों की निष्ठा, गरिमा, हितों और उनकी आत्मा और मन को चोट पहुँचती है, उन्हें पैरों तले कुचला और अपमानित किया जाता है तो वे स्वाभाविक रूप से और सहज प्रेरणा से क्रोधित हो जाते हैं, आक्रोश या नफरत तक को जन्म दे देते हैं—यही कारण है कि क्रोध उत्पन्न होता है, और यही उसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति है। कुछ लोग अकारण ही क्रोधित हो जाते हैं। कोई छोटी-सी बात भी उनके क्रोध को भड़का सकती है या कोई गलती से कुछ ऐसा कह देता है जिससे उन्हें ठेस पहुँचती है और इससे उनकी आँखें क्रोध से लाल हो सकती हैं। वे बहुत गर्ममिजाज होते हैं, है न? इनमें से कोई भी चीज उनके जोश, निष्ठा, गरिमा, मानवाधिकारों या आध्यात्मिक दुनिया से संबंधित नहीं होती, फिर भी वे अकारण आगबबूला हो सकते हैं, शायद इसलिए कि वे बहुत गर्ममिजाज होते हैं। जो भी दिखे, उसी चीज पर क्रोध दिखाना सामान्य नहीं है। हम यहाँ जिस बारे में बात कर रहे हैं, वह सामान्य मानवता द्वारा अभिव्यक्त किया गया आक्रोश, क्रोध, रोष और नफरत है। ये कुछ लोगों की सहज प्रतिक्रियाएँ हैं। जब व्यक्ति की निष्ठा, गरिमा, मानवाधिकार और आत्मा को कुचला जाता है, अपमानित किया जाता है या ठेस पहुँचाई जाती है, तो वह व्यक्ति आक्रोश से भर जाता है। यह आक्रोश नाराजगी का क्षणिक दौरा नहीं होता, न ही यह कोई क्षणिक भावना होती है, बल्कि यह व्यक्ति की निष्ठा, गरिमा और आत्मा को जख्मी किए जाने पर होने वाली एक सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया होती है। चूँकि यह एक सामान्य मानवीय प्रतिक्रिया है, इसलिए कहा जा सकता है कि यह प्रतिक्रिया उचित और तर्कसंगत है, इसलिए यह कोई अपराध नहीं है और इसे रोके जाने की जरूरत नहीं है। जहाँ तक उन समस्याओं का सवाल है जो लोगों को इस हद तक चोट पहुँचाती हैं, उन्हें सुलझाया जाना चाहिए और उनसे उचित तरीके से निपटा जाना चाहिए। अगर मामला यथोचित रूप से हल नहीं किया जा सकता या उचित रूप से नहीं निपटाया जा सकता, और “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” कहावत को अमल में लाने की लोगों से अनुचित रूप से अपेक्षा की जाती है, तो यह पीड़ित के लिए अनैतिक और अमानवीय है, और ऐसी चीज है जिससे लोगों को अवगत होना चाहिए।

नैतिक आचरण की इस कहावत “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” के बारे में हमने किन बिंदुओं पर चर्चा की है? आओ, सार प्रस्तुत करते हैं। इस कहावत का सार वही है, जो नैतिक आचरण की अन्य कहावतों का है। ये सब शासक वर्ग और सामाजिक रीति-रिवाजों के काम आती हैं—इन्हें मानवता के परिप्रेक्ष्य से नहीं बनाया जाता। यह कहना कि ये नैतिक शास्त्र शासक वर्ग और सामाजिक रीति-रिवाजों के काम आते हैं, कुछ हद तक उस दायरे से परे हो सकता है जिसे तुम लोगों को परमेश्वर में अपनी आस्था के जरिये समझना और प्राप्त करने में सक्षम होना चाहिए, हालाँकि यह उन लोगों के लिए कुछ हद तक प्राप्य है जो राजनीति, सामाजिक विज्ञान और मानव-विचार के बारे में कुछ जानते हैं। मानवता के परिप्रेक्ष्य से, यानी तुम्हारे अपने परिप्रेक्ष्य से, तुम्हें ऐसी चीजों से कैसे निपटना चाहिए? उदाहरण के लिए, मान लो कि तुम्हें तुम्हारी आस्था के कारण पहले गिरफ्तार, कैद और प्रताड़ित किया गया था। कई-कई दिनों और रातों तक बड़े लाल अजगर ने तुम्हें सोने नहीं दिया और यातना देकर तुम्हें अधमरा कर दिया। चाहे तुम पुरुष हो या महिला, तुम्हारे शरीर और मन ने तमाम तरह के दुर्व्यवहार और यातनाएँ झेलीं, और तुम्हें उन शैतानों ने सभी प्रकार की गंदी और निंदात्मक भाषा का इस्तेमाल करते हुए अपमानित भी किया, तुम्हारा मजाक भी उड़ाया और तुम पर हमला भी किया। यह यातना झेलने के बाद तुम इस देश और इस सरकार के प्रति क्या महसूस करते हो? (नफरत।) यह नफरत पैदा करता है, इस सामाजिक प्रणाली के प्रति नफरत, इस सत्ताधारी दल के प्रति नफरत और इस देश के प्रति नफरत। पहले जब भी तुम पुलिस को देखते थे तो तुम्हारे मन में बहुत सम्मान की भावना आती थी, लेकिन उसके हाथों उत्पीड़न, यातना और मलिनता का शिकार होने के बाद, सम्मान की वह भावना गायब हो गई है और तुम्हारा दिल एक शब्द से भर गया है—घृणा। उसकी मानवता की कमी के लिए घृणा, उसकी सरासर बेईमानी के लिए घृणा और इस बात के लिए घृणा कि वे जानवरों और शैतान की तरह काम करते हैं। भले ही तुमने पुलिस से प्रताड़ित, कलंकित और अपमानित होने के कारण बहुत कष्ट सहे हैं, लेकिन तुमने उसके असली रंग देख लिए हैं, और देखा है कि वे सब मनुष्य की खाल में जानवर और सत्य और परमेश्वर से घृणा करने वाले शैतान हैं, इसलिए तुम उसके प्रति नफरत से भरे हुए हो। यह व्यक्तिगत नफरत या व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, यह उसके दुष्ट सार को स्पष्ट रूप से देखने का परिणाम है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसकी तुमने कल्पना की हो, निष्कर्ष निकाला हो या निर्धारित किया हो, ये सब उसके हाथों तुम्हारे अपमान, कलंक और यातना की यादें हैं—जिसमें उसका हर ढंग, कार्य और शब्द शामिल है—जो तुम्हारे हृदय को नफरत से भर देता है। क्या यह सामान्य है? (हाँ।) जब तुम नफरत से भर जाते हो, तब अगर कोई तुमसे कहता है, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो। नफरत में मत रहो। नफरत दूर करना इससे निपटने का सबसे अच्छा तरीका है,” तो यह सुनकर तुम्हें कैसा लगेगा? (नफरतस्पद।) नफरतस्पद महसूस करने के सिवाय तुम और क्या सकते हो? तो मुझे बताओ, क्या यह नफरत दूर करना संभव है? (नहीं।) इसे दूर नहीं किया जा सकता। कट्टर नफरत कैसे दूर की जा सकती है? अगर कोई तुम्हें अपनी नफरत छोड़ने हेतु राजी करने के लिए इस कहावत का प्रयोग करता है, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो,” तो क्या तुम उसे छोड़ सकते हो? तुम किस तरह प्रतिक्रिया दोगे? तुम्हारी पहली प्रतिक्रिया होगी, “‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो’ यह सब मिथ्या बकवास है, यह निठल्ले तमाशबीनों की गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी है! परंपरागत संस्कृति के विचार और दृष्टिकोण फैलाने वाले ये लोग रोजाना ईसाइयों और अच्छे लोगों को सताते हैं—क्या वे इन शब्दों से विवश और प्रभावित होते हैं? वे तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक कि वे एक-एक को भगा नहीं देते या खत्म नहीं कर देते! वे छद्मवेश में दानव और शैतान हैं। वे जीते-जी लोगों के साथ क्रूरता करते हैं, फिर उनके मर जाने पर वे दूसरों को गुमराह करने के लिए सहानुभूति के कुछ शब्द कह देते हैं। क्या यह घोर दुष्टता नहीं है?” क्या तुम इस तरह प्रतिक्रिया नहीं दोगे और महसूस नहीं करोगे? (बिल्कुल।) जो भी तुम्हें मनाने की कोशिश करेगा, उससे नफरत करते हुए तुम निश्चित रूप से ऐसा महसूस करोगे, यहाँ तक कि उसे शाप भी देना चाहोगे। लेकिन कुछ लोग नहीं समझते। वे कहते हैं, “तुम ऐसा क्यों कर रहे हो? क्या यह नफरतस्पद नहीं है? क्या यह द्वेषपूर्ण नहीं है?” ये निठल्ले तमाशबीनों की गैरजिम्मेदाराना टिप्पणियाँ हैं। तुम मुँहतोड़ जवाब दोगे : “मैं एक इंसान हूँ, मेरी गरिमा और निष्ठा है, लेकिन उन्होंने मुझे इंसान नहीं माना। इसके बजाय उन्होंने मेरे साथ एक जानवर या चौपाये की तरह व्यवहार किया, मेरी निष्ठा और गरिमा को बहुत ठेस पहुँचाई। क्या वे द्वेषी नहीं हैं? तुम मौन रूप से उनके द्वेष को स्वीकारते हो, लेकिन जब हम उनका विरोध कर उनसे नफरत करते हैं, तो तुम इसके लिए हमारी निंदा करते हो। तो यह तुम्हें क्या बनाता है? क्या तुम ही दुष्ट नहीं हो? वे हमें इंसान नहीं समझते, हमें प्रताड़ित करते हैं, पर तुम फिर भी हमसे मानवीय नैतिक आचरण कायम रखने और बुराई का बदला भलाई से देने के लिए कहते हो। क्या तुम सिर्फ बकवास नहीं कर रहे? क्या तुम्हारी मानवता सामान्य है? तुम एक कपटी और पाखंडी हो। तुम न सिर्फ बेहद द्वेषी हो, बल्कि दुष्ट और बेशर्म भी हो!” इसलिए, जब कोई तुम्हें यह कहकर सांत्वना देता है कि “इसके बारे में भूल जाओ, यह पूरी तरह से खत्म हो गया है, शिकायत मत रखो। अगर तुम हमेशा इतने क्षुद्र रहोगे, तो अंत में तुम ही आहत होगे। लोगों को नफरत छोड़ना सीखना होगा, और जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनने का अभ्यास करना होगा,” तो तुम इसके बारे में क्या सोचोगे? क्या तुम यह नहीं सोचोगे, “यह तमाम परंपरागत चीनी संस्कृति शासक वर्ग द्वारा लोगों को गुमराह और नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक साधन है। वे खुद कभी इन विचारों और दृष्टिकोणों से बाध्य नहीं होते, पर लोगों को रोजाना गुमराह करते और निर्दयतापूर्वक चोट पहुँचाते हैं। मैं गरिमा और निष्ठा वाला व्यक्ति हूँ, जिसके साथ जानवर या चौपाये की तरह बेरहमी से खिलवाड़ और दुर्व्यवहार किया गया। मैंने उनकी मौजूदगी में इतना अपमान और बदनामी सही, और मुझे इतना सताया और मेरी गरिमा और निष्ठा से वंचित किया गया कि मैं इंसान भी नहीं दिखता था। और फिर भी तुम नैतिकता की बात करते हो? तुम होते कौन हो इतनी ऊँची-ऊँची बातें करने वाले? क्या मेरे लिए एक बार अपमानित होना काफी नहीं है, जो तुम मुझे उनसे दोबारा अपमानित करवाना चाहते हो? मेरे यह नफरत छोड़ने का कोई उपाय नहीं है!” क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है? (हाँ।) यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति है। कुछ लोग कहते हैं : “यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति नहीं है, यह नफरत भड़काना है।” उस हालत में, इस व्यक्ति के व्यवहार और इस नफरत का कारण कौन था? क्या तुम जानते हो? अगर बड़े लाल अजगर ने उसे क्रूरता से सताया न होता, तो क्या वह ऐसा व्यवहार करता? उसे सताया गया था और वह सिर्फ अपने मन की बात कह रहा है—यह नफरत भड़काना कैसे है? शैतानी शासन लोगों को इस तरह सताते भी हैं और उन्हें अपने मन की बात कहने भी नहीं देते? शैतान लोगों को सताता है और उनका मुँह भी बंद रखना चाहता है। वह उन्हें नफरत या विरोध नहीं करने देता। यह किस तरह का तर्क है? क्या सामान्य मानवता वाले लोगों को दमन और शोषण का विरोध नहीं करना चाहिए? क्या उन्हें बस दब्बूपन से समर्पण करना चाहिए? शैतान ने हजारों सालों से मानवजाति को भ्रष्ट कर नुकसान पहुँचाया है। जब विश्वासी सत्य समझ जाएँ, तो उन्हें जागना चाहिए, शैतान का विरोध करना चाहिए, उसे उजागर करना चाहिए, उससे नफरत करनी चाहिए और उसके विरुद्ध विद्रोह करना चाहिए। यह सामान्य मानवता है, और यह पूरी तरह स्वाभाविक और उचित है। यह वह अच्छा और धार्मिक कर्म है जिसमें सामान्य मानवता सक्षम होनी चाहिए और परमेश्वर इसकी प्रशंसा करता है।

तुम इसे चाहे जिस भी कोण से देखो, नैतिक आचरण के बारे में यह कहावत कि, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें,” बहुत ही अमानवीय और घिनौनी है। यह शासित वर्ग के लोगों से कहती है कि वे किसी भी अनुचित व्यवहार का विरोध न करें—चाहे उन्हें अपने ईमान, गरिमा और मानवाधिकारों पर कैसे भी हमले, अपमान या चोटें सहनी पड़ें—बल्कि नम्रता से उसके प्रति समर्पित हो जाएँ। उन्हें बदला नहीं लेना चाहिए, न ही घृणास्पद चीजों के बारे में सोचना चाहिए, प्रतिशोध के बारे में सोचने की बात तो छोड़ ही दो, बल्कि जहाँ कहीं भी संभव हो, वहाँ उदार होना सुनिश्चित करना चाहिए। क्या यह अमानवीय नहीं है? एकदम स्पष्ट है कि यह अमानवीय है। यह देखते हुए कि यह कहावत शासित वर्ग—साधारण लोगों—से यह सब करने और इस तरह के नैतिक आचरण से खुद को संचालित करने की अपेक्षा करती है, क्या शासक वर्ग का नैतिक आचरण इस अपेक्षा से बढ़कर नहीं होना चाहिए? क्या यह ऐसी चीज नहीं है, जिसे करने के लिए उन्हें और भी ज्यादा बाध्य होना चाहिए? क्या उन्होंने यह किया है? क्या वे यह कर सकते हैं? क्या उन्होंने इस कहावत का इस्तेमाल खुद को बाध्य करने और मापने के लिए किया? क्या उन्होंने अपने लोगों के साथ, उन लोगों के साथ जिन पर वे शासन करते हैं, अपने व्यवहार में इस कहावत को लागू किया? (नहीं।) उन्होंने ऐसा कभी नहीं किया है। वे सिर्फ अपने लोगों से कहते हैं कि वे इस समाज, इस देश या शासक वर्ग को शत्रुता से न देखें, और चाहे वे समाज में या अपने समुदाय के भीतर कितना भी अनुचित व्यवहार क्यों न झेलें, और चाहे वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से कितने भी पीड़ित क्यों न हों, उन्हें जहाँ कहीं भी संभव हो, उदार होना सीखना चाहिए। इसके विपरीत, अगर साधारण लोग—उनकी नजर में आम लोग—उनसे “नहीं” कहते हैं या शासक वर्ग की हैसियत, शासन और अधिकार के बारे में कोई असहमतिपूर्ण राय रखते और आवाज उठाते हैं, तो उन्हें सख्ती से प्रशासित किया जाएगा, यहाँ तक कि गंभीर रूप से दंडित भी किया जाएगा। क्या उस शासक वर्ग का नैतिक आचरण यही होना चाहिए, जो लोगों से “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें” की वकालत करता है? अगर शासित वर्ग के साधारण लोगों में जरा-सी भी परेशानी या जरा-सा भी बदलाव हो, या लोगों के विचारों में उनके प्रति जरा-सा भी विरोध हो, तो उसे फौरन कुचल दिया जाएगा। वे लोगों के दिलो-दिमाग को नियंत्रित करते हैं, और लोगों को अपने प्रति समर्पित होने के लिए बाध्य करते हैं, कोई समझौता नहीं करते। यह ठीक वैसा ही है, जैसा इन कहावतों में कहा गया है, “जब सम्राट अपने अधिकारियों को मरने का आदेश देता है, तो उनके पास मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता,” और “आकाश के नीचे की सारी भूमि राजा की होती है, दुनिया के सारे लोग राजा के अधीन होते हैं।” इसका सार यही है कि शासक जो करता है, सही करता है और लोगों को उससे धोखा खाना चाहिए, उससे नियंत्रित होना चाहिए, उससे अपमानित होना चाहिए, उसे अपने साथ खिलवाड़ करने देना चाहिए, उसके द्वारा कुचला जाना चाहिए, और अंत में उसके द्वारा निगला जाना चाहिए; और शासक वर्ग चाहे कुछ भी करे, वह सही होता है, और जब तक लोग जीवित हैं, तब तक उन्हें आज्ञाकारी नागरिक होना चाहिए, और राजा के प्रति विश्वासघाती नहीं होना चाहिए। राजा कितना भी बुरा क्यों न हो, उसका शासन कितना भी बुरा क्यों न हो, साधारण लोगों को “नहीं” नहीं कहना चाहिए, और प्रतिरोध के विचार नहीं रखने चाहिए, और पूरी तरह से आज्ञापालन करना चाहिए। चूँकि “दुनिया के सारे लोग राजा के अधीन होते हैं,” जिसका अर्थ है कि राजा द्वारा शासित आम लोग उसके अधीन होते हैं, तो क्या राजा को आम लोगों के सामने इस कहावत की मिसाल नहीं देनी चाहिए कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें”? चूँकि आम लोग मूर्ख, अज्ञानी, बेखबर होते हैं और कानून नहीं समझते, इसलिए वे अक्सर कुछ गैरकानूनी और आपराधिक काम कर देते हैं। तो क्या राजा को यह कहावत लागू करने वाला पहला व्यक्ति नहीं होना चाहिए कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें”? साधारण लोगों के साथ उसे उतना ही उदार होना चाहिए, जितना कि वह अपने बच्चों के साथ होता है—क्या राजा को ऐसा ही नहीं करना चाहिए? क्या राजा में भी ऐसी दरियादिली नहीं होनी चाहिए? (हाँ, होनी चाहिए।) तो क्या वह खुद से यह अपेक्षा करता है? (नहीं।) जब राजाओं ने धार्मिक विश्वासों के दमन का आदेश दिया, तो क्या उन्होंने खुद से इस कहावत का पालन करने की अपेक्षा की कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें”? जब उनकी सेना और पुलिस बल ने ईसाइयों को क्रूरता से सताया और प्रताड़ित किया, तो क्या उन्होंने अपनी सरकार से इस कहावत का पालन करने के लिए कहा, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें”? उन्होंने अपनी सरकार या अपने पुलिस बल से ऐसा करने के लिए कभी नहीं कहा। इसके बजाय, उन्होंने सरकार और पुलिस बल पर धार्मिक विश्वासों को सख्ती से दबाने का दबाव डाला और उन्हें उसके लिए मजबूर किया, यहाँ तक कि “उन्हें मौत के घाट उतार दो, इसके लिए कोई दंड नहीं मिलेगा” और “उन्हें बिना आवाज किए नष्ट कर दो” जैसे आदेश जारी किए, जो यह दर्शाता है कि इस दुष्ट संसार के राजा दानव हैं, वे दानवी राजा हैं, वे शैतान हैं। वे सिर्फ अधिकारियों को आग जलाने देते हैं, लेकिन लोगों को दीया भी नहीं जलाने देते। वे नैतिक आचरण संबंधी इन पारंपरिक कहावतों का उपयोग लोगों को विवश और प्रतिबंधित करने के लिए करते हैं, इस डर से कि लोग उनके खिलाफ उठ खड़े होंगे। इसलिए शासक वर्ग लोगों को ठगने के लिए तमाम तरह की कहावतों का उपयोग करता है। उसका एक ही उद्देश्य होता है, जो लोगों के हाथ-पैर जकड़ना और बाँधना है, ताकि लोग उनके शासन के अधीन हो जाएँ, और उन्हें कोई प्रतिरोध न सहना पड़े। वे नैतिक आचरण संबंधी इन सिद्धांतों का उपयोग लोगों को बेवकूफ बनाने और धोखा देने के लिए करते हैं, इनसे वे उनकी आँखों में धूल झोंकते हैं, ताकि वे झुक जाएँ और आज्ञाकारी नागरिक बन जाएँ। शासक वर्ग कितना भी बुरा कर ले और लोगों को पैरों तले रौंद डाले, वह चाहे लोगों का कितना भी दमन और शोषण कर ले, लोग सिर्फ नम्रता से उसके सामने झुक ही सकते हैं, बिल्कुल भी विरोध नहीं कर सकते। मृत्यु का सामना करने पर भी, लोग सिर्फ पलायन ही चुन सकते हैं। वे विरोध नहीं कर सकते, यहाँ तक कि विरोध करने के विचार रखने का साहस भी नहीं कर सकते। यह दिखाने के उद्देश्य से कि वे आज्ञाकारी नागरिक हैं और हमेशा राजा के शासन के प्रति समर्पित और राजा के प्रति वफादार रहेंगे, वे कुदाल और दरांती की ओर देख भी नहीं सकते और न ही उन्हें अपने पास रख सकते हैं, और न ही अपनी जेब में छोटा चाकू और नेल-कटर ले जा सकते हैं। उनकी वफादारी कितनी व्यापक होनी चाहिए? कोई भी यह कहने की हिम्मत नहीं करता, “बतौर प्रजा, हमें परंपरागत संस्कृति के विचारों और दृष्टिकोणों का उपयोग अपने राजा पर निगरानी रखने और उसे विवश करने के लिए करना चाहिए,” और राजा को बुराई करते देखकर कोई भी थोड़ा-सा भी अलग मत सामने रखने की हिम्मत नहीं करता, वरना वह मारा जाएगा। जाहिर है, शासक खुद को न सिर्फ लोगों का राजा मानता है, बल्कि लोगों का संप्रभु और नियंत्रक भी मानता है। चीनी इतिहास में इन सम्राटों ने खुद को “तियांजी” कहा। “तियांजी” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है आकाशीय स्वर्ग का पुत्र, या संक्षेप में “स्वर्ग का पुत्र”। उन्होंने खुद को “पृथ्वी का पुत्र” क्यों नहीं कहा? अगर वे पृथ्वी पर पैदा हुए थे, तो उन्हें पृथ्वी के पुत्र होना चाहिए था, और चूँकि वे स्पष्ट रूप से पृथ्वी पर ही पैदा हुए थे, तो उन्होंने खुद को “स्वर्ग का पुत्र” क्यों कहा? खुद को स्वर्ग का पुत्र कहने का क्या उद्देश्य था? क्या यह कि वे सभी जीवित प्राणियों और इन आम लोगों का तिरस्कार करना चाहते थे? शासन करने का उनका तरीका सर्वोपरि बनकर लोगों को सत्ता और हैसियत से नियंत्रित करना था। कहने का तात्पर्य यह है कि जब उन्होंने सत्ता सँभाली और सम्राट बने, तो उन्हें लोगों की भावनाओं की परवाह न करते हुए उनकी गर्दन पर बेरहमी से सवारी गाँठना मामूली बात लगी, और लोगों की जरा-सी भी हिचकिचाहट उनके प्राण संकट में डाल सकती थी। इस तरह “स्वर्ग का पुत्र” उपाधि अस्तित्व में आई। अगर सम्राट कहता कि वह पृथ्वी का पुत्र है, तो वह निम्न हैसियत का प्रतीत होता, और उसके पास वह प्रताप न होता, जो उसके अनुसार राजा के पास होना चाहिए, और न ही वह शासित वर्ग को डराने में सक्षम होता। इसलिए, उसने इसका स्तर बढ़ा दिया और दावा किया कि वह स्वर्ग का पुत्र है और स्वर्ग का प्रतिनिधित्व करना चाहता है। क्या वह स्वर्ग का प्रतिनिधित्व कर सकता था? क्या उसके पास वह सार था? अगर कोई स्वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का सार न होने पर भी वैसा करने पर जोर देता है, तो यह ढोंग करना है। एक ओर ये शासक स्वर्ग और परमेश्वर को शत्रुता से देखते हैं, लेकिन दूसरी ओर वे ढोंग करते हैं कि वे स्वर्ग के पुत्र हैं और स्वर्ग द्वारा आदेशित हैं, ताकि उनका शासन सुगमता से चल सके। क्या यह बेशर्मी नहीं है? इन तथ्यों को देखते हुए, मनुष्यों के बीच फैली नैतिक आचरण संबंधी इन विभिन्न कहावतों का उद्देश्य लोगों की सामान्य सोच को प्रतिबंधित करना, उनके हाथ-पैर बाँधना, उनके व्यवहार को प्रतिबंधित करना, यहाँ तक कि उनके विभिन्न विचारों, दृष्टिकोणों और अभिव्यक्तियों को भी सामान्य मानवता के दायरे में सीमित करना है। इसके मूल को देखें तो, उनका उद्देश्य अच्छे सामाजिक रीति-रिवाज और सामाजिक नैतिकता निर्मित करना है। बेशक, यह परिणाम प्राप्त करके वे शासक वर्ग की लंबे समय तक शासन करने की महत्वाकांक्षा भी पूरी करती हैं। लेकिन वे चाहे कैसे भी शासन करें, अंततः पीड़ित मानवजाति ही होती है। मानवजाति परंपरागत संस्कृति के इन विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों से सीमित और प्रभावित है। लोगों ने न सिर्फ सुसमाचार सुनने और परमेश्वर का उद्धार प्राप्त करने का अवसर खो दिया है, बल्कि उन्होंने सत्य खोजने और जीवन में सही मार्ग पर चलने का अवसर भी खो दिया है। इसके अलावा, शासकों के नियंत्रण में लोगों के पास शैतान से आने वाले कई प्रकार के विष, भ्रांतियाँ और अन्य नकारात्मक चीजें स्वीकारने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। मानवजाति के लंबे इतिहास के पिछले कुछ हजार वर्षों में शैतान ने ज्ञान और विभिन्न वैचारिक सिद्धांतों का प्रसार करके मानवजाति को शिक्षित किया है, उन्हें उसके मन में बैठाया है और उसे धोखा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप लोगों की पीढ़ियाँ इन विचारों और दृष्टिकोणों से गहराई से प्रभावित कर जकड़ दी गई हैं। निस्संदेह, शैतान के इन विचारों और दृष्टिकोणों के प्रभाव में, लोगों के भ्रष्ट स्वभाव तीव्र और ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस आधार पर लोगों के भ्रष्ट स्वभाव पोषित और “उन्नत” किए गए हैं और वे लोगों के दिलों में गहराई से जड़ें जमा चुके हैं, जिसके कारण वे परमेश्वर को नकारते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं, और पाप में गहरे डूब जाते हैं जिससे वे खुद को निकालने में असमर्थ हैं। जहाँ तक नैतिक आचरण संबंधी इस कहावत—“मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें”—के निर्माण का और साथ ही इस अपेक्षा को सामने रखने के उद्देश्यों, नैतिक आचरण संबंधी इस कहावत के बनने के बाद से लोगों को हुए नुकसान और अन्य तमाम पहलुओं का संबंध है, हम अब इन चीजों पर संगति नहीं करेंगे, और तुम लोग बाद में खुद इन पर और विचार करने के लिए समय निकाल सकते हो।

चीनी लोग परंपरागत संस्कृति में नैतिक आचरण संबंधी कहावतों से अनजान नहीं हैं, लेकिन ये चीजें लोगों को रातोंरात प्रभावित नहीं करतीं। तुम इस तरह के सामाजिक परिवेश में रहते हो, तुमने परंपरागत संस्कृति और नैतिकता के पहलुओं पर इस तरह की वैचारिक शिक्षा प्राप्त की है और तुम इन चीजों से परिचित हो, लेकिन यह तुम्हारे दिमाग में कभी नहीं आया कि इन चीजों का अत्यधिक नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। ये चीजें तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने, सत्य का अनुसरण करने और सत्य की वास्तविकताओं में प्रवेश करने से कितना बाधित करेंगी, या भविष्य में तुम जिस मार्ग पर चलोगे उस पर इनका कितना प्रभाव या अवरोध होगा? क्या तुम लोग इन मुद्दों से अवगत हो? तुम लोगों को उस विषय पर और ज्यादा चिंतन और विचार करना चाहिए, जिसके बारे में हमने आज संगति की है, ताकि तुम इस बात की पूरी समझ हासिल कर सको कि मानवजाति को शिक्षित करने में परंपरागत संस्कृति क्या भूमिका निभाती है, वह वास्तव में क्या है और लोगों को उसे सही तरीके से कैसे लेना चाहिए। ऊपर संगति में हमने जो बातें की हैं, वे परंपरागत संस्कृति की चीजें समझने में तुम लोगों के लिए मददगार और फायदेमंद हैं। बेशक, यह समझ न सिर्फ परंपरागत संस्कृति की समझ है, बल्कि शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने की और उन विभिन्न तरीकों और साधनों की भी समझ है, जिनके माध्यम से शैतान मानवजाति को भ्रष्ट करता है, खासकर उसके द्वारा लोगों में डाले गए विभिन्न विचारों और साथ ही उन विभिन्न तरीकों और साधनों, दृष्टिकोणों, परिप्रेक्ष्यों, रवैयों आदि की समझ भी है, जिनके साथ वह दुनिया और मानवजाति के साथ व्यवहार करता है। परंपरागत संस्कृति की चीजों की पूरी समझ हासिल करने के बाद तुम लोगों को बस परंपरागत संस्कृति की विभिन्न कहावतों और विचारों से बचना और उन्हें नकारना भर नहीं है। इसके बजाय, तुम्हें और ज्यादा विशिष्ट रूप से यह समझना और विश्लेषण करना चाहिए कि नैतिक आचरण संबंधी जिन कहावतों का तुम पालन करते हो और जिन्हें बनाए रखते हो, उन्होंने तुम्हें क्या नुकसान पहुँचाया है, तुम्हारे लिए क्या अवरोध पैदा किए हैं और तुम्हें किन बंधनों में जकड़ा है, और तुम्हारे द्वारा आचरण करने और साथ ही परमेश्वर के वचनों को स्वीकारने और सत्य खोजने के संबंध में उन्होंने तुम्हारे विचारों और दृष्टिकोणों को प्रभावित, अस्तव्यस्त और बाधित करने और इस तरह सत्य स्वीकारने, उसे समझने, उसका अभ्यास करने, और परमेश्वर का पूरी तरह से और अबाध रूप से आज्ञापालन पालन करने में तुमसे देरी करवाने में क्या भूमिका निभाई है। ठीक यही वे चीजें हैं, जिन पर लोगों को चिंतन करना चाहिए और जिनके बारे में जागरूक होना चाहिए। तुम उन्हें सिर्फ टाल या नकार नहीं सकते, तुम्हें उन्हें पहचानने और पूरी तरह से समझने में सक्षम होना चाहिए, ताकि तुम परंपरागत संस्कृति में मौजूद इन दिखावटी और भ्रामक चीजों से अपना दिमाग पूरी तरह से मुक्त कर सको। भले ही नैतिक आचरण संबंधी कुछ कहावतें तुममें गहराई से जड़ें न जमाए हों, बस समय-समय पर तुम्हारी सोच और धारणाओं में अभिव्यक्त होती हों, फिर भी वे तुम्हें थोड़े समय के लिए या किसी एक घटना के दौरान परेशान कर सकती हैं। अगर तुम उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं पहचान सकते, तो तुम अभी भी कुछ कहावतों और विचारों को ऐसी चीजें मान सकते हो, जो काफी सकारात्मक या सत्य के करीब हैं, और यह बहुत परेशानी वाली बात है। नैतिक आचरण के बारे में कुछ कहावतें हैं, जिन्हें तुम अंदर से काफी पसंद करते हो। तुम न सिर्फ अपने दिल में उनसे सहमत हो, बल्कि तुम्हें यह भी लगता है कि उन्हें सार्वजनिक रूप से प्रसारित किया जा सकता है, कि लोग उन्हें सुनने में रुचि लेंगे और उन्हें सकारात्मक चीजों के रूप में स्वीकारेंगे। ये कहावतें त्यागना निस्संदेह तुम्हारे लिए सबसे कठिन है। भले ही तुमने उन्हें सत्य न माना हो, फिर भी तुम आंतरिक रूप से उन्हें अपने हृदय में सकारात्मक चीजें मानते हो और वे अनजाने ही तुम्हारे हृदय में जड़ें जमा लेती हैं और तुम्हारा जीवन बन जाती हैं। जब तुम परमेश्वर में विश्वास करने लगते हो और परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य स्वीकारते हो, तो स्वाभाविक रूप से ये चीजें तुम्हें परेशान करने के लिए उभरेंगी और तुम्हें सत्य स्वीकारने से रोकेंगी। ये सब वे चीजें हैं, जो लोगों को सत्य का अनुसरण करने से रोकती हैं। अगर तुम इन्हें स्पष्ट रूप से नहीं पहचान पाते, तो इन चीजों को सत्य समझ बैठना और उन्हें वही दर्जा देना आसान होता है, जिसका लोगों पर कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हो सकता है, तुमने इन कहावतों को—जैसे कि “उठाए गए धन को जेब में मत रखो,” “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” और “अपने प्रति सख्त और दूसरों के प्रति सहिष्णु बनो”—सत्य न समझा हो और तुम उन्हें अपने नैतिक आचरण को मापने के लिए मानक न मानते हो, और तुम अपना आचरण करने के लक्ष्य के रूप में उनका अनुसरण न करते हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम परंपरागत संस्कृति से प्रभावित और भ्रष्ट नहीं हुए हो। यह भी हो सकता है कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो तुच्छ विवरणों के प्रति इस हद तक उदासीन रहता है कि तुम इस बात की परवाह नहीं करते कि तुम उठाए गए धन को जेब में रखते हो या नहीं, या दूसरों की मदद करने में खुशी पाते हो या नहीं। लेकिन तुम्हें एक बात समझकर उसके बारे में स्पष्ट होना होगा : तुम इस तरह के सामाजिक परिवेश में और एक परंपरागत सांस्कृतिक और वैचारिक शिक्षा के प्रभाव में रहते हो, इसलिए तुम अनिवार्य रूप से इन कहावतों का पालन करोगे जिनकी मानवजाति वकालत करती है, और इनमें से कम से कम कुछ को नैतिक आचरण को मापने के अपने मानक के रूप में अपनाओगे। इसी पर तुम्हें सोच-समझकर विचार करना चाहिए। यह भी हो सकता है कि तुम “उठाए गए धन को जेब में मत रखो” या “दूसरों की मदद करने में खुशी पाओ” जैसी कहावतों को नैतिक आचरण को मापने के अपने मानक के रूप में न अपनाते हो, लेकिन अपने दिल की गहराई में तुम सोचते हो कि अन्य कहावतें, जैसे “मैं अपने दोस्त के लिए गोली भी खा लूँगा,” विशेष रूप से उत्कृष्ट हैं, और वे तुम्हारे जीवन को प्रभावित करने वाले सिद्धांत या वे उच्चतम मानदंड बन गई हैं, जिनके द्वारा तुम लोगों और चीजों को देखते हो, और आचरण और कार्य करते हो। यह क्या दर्शाता है? हालाँकि अपने दिल की गहराई में तुम जानबूझकर परंपरागत संस्कृति का सम्मान या पालन नहीं करते, फिर भी तुम्हारे आचरण के सिद्धांत, तुम्हारे आचरण के तरीके और तुम्हारे जीवन-लक्ष्य, और साथ ही जीवन-लक्ष्यों के सिद्धांत, मूल बिंदु और मत जिनका तुम अनुसरण करते हो, परंपरागत संस्कृति से स्वतंत्र बिल्कुल नहीं हैं। वे परोपकार, धार्मिकता, औचित्य, ज्ञान और विश्वसनीयता के मूल्यों से नहीं बच पाए हैं जिन्हें मानवजाति कायम रखती है, न ही नैतिक आचरण के उन कुछ सिद्धांतों से बच पाए हैं, जिनकी मानवजाति वकालत करती है—तुम इन सीमाओं से बिल्कुल भी नहीं निकल पाए हो। स्पष्ट रूप से कहूँ तो, अगर तुम एक भ्रष्ट इंसान हो, एक जीवित इंसान हो और इंसानों की दुनिया का खाना खाते हो, तो आचरण और जीवन के वे सिद्धांत, जिनका तुम पालन करते हो, परंपरागत संस्कृति से आए नैतिक आचरण के इन सिद्धांतों और मतों से ज्यादा कुछ नहीं हैं। मैं ये जो वचन कहता हूँ और जो समस्याएँ उजागर करता हूँ, उन्हें तुम्हें समझना चाहिए। लेकिन शायद तुम सोचते हो कि तुममें ये समस्याएँ नहीं हैं, इसलिए तुम मेरी बातों की परवाह नहीं करते। तथ्य यह है कि सभी लोगों में अलग-अलग मात्रा में ये समस्याएँ हैं, चाहे तुम इसे महसूस करो या न करो, और यह ऐसी चीज है जिसे परमेश्वर में विश्वास और सत्य का अनुसरण करने वालों को विचारपूर्वक चिंतन कर समझना चाहिए।

हमने अभी-अभी कहा कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” कहावत मानवजाति के नैतिक आचरण पर थोपी गई एक अपेक्षा है। हमने इस कहावत से जुड़ी कुछ समस्याओं और इसके मानवजाति पर पड़े कुछ प्रभावों का भी विश्लेषण किया है। इसने मानवजाति के लिए कुछ अस्वस्थ विचार और दृष्टिकोण पेश किए हैं, और लोगों के अनुसरणों और अस्तित्व पर कुछ ऐसे नकारात्मक प्रभाव डाले हैं जिनसे लोगों को अवगत होना चाहिए। तो, विश्वासियों को मानवता में उदारता और व्यापक सोच की समस्याओं को कैसे समझना चाहिए? इन्हें परमेश्वर के दृष्टिकोण से सही और सकारात्मक तरीके से कैसे समझा जा सकता है? क्या यह बात भी नहीं समझनी चाहिए? (बिल्कुल, समझनी चाहिए।) इन चीजों को समझना वास्तव में कठिन नहीं है। तुम्हें न कोई अनुमान लगाने की जरूरत है, न ही कोई जानकारी खोजने की जरूरत है। परमेश्वर ने जो कुछ कहा है और लोगों के बीच जो कार्य किया है, उससे, और परमेश्वर के स्वभाव से, जो उन विभिन्न तरीकों में दिखाया गया है जिनसे वह तमाम तरह के लोगों के साथ व्यवहार करता है, सीखकर हम जान सकते हैं कि परंपरागत संस्कृति की इन कहावतों और विचारों पर परमेश्वर की ठीक-ठीक क्या राय है और उसके ठीक-ठीक क्या इरादे हैं। परमेश्वर के इरादों और विचारों पर नजर डालकर लोगों को सत्य के अनुसरण का मार्ग मिल जाना चाहिए। कहावत “मारने से कोई फायदा नहीं होता” का, जिसका लोग पालन करते हैं, अर्थ यह होता है कि जब किसी व्यक्ति का सिर काटकर जमीन पर गिरा दिया जाता है तो यह मामला यहीं खत्म हो जाता है और इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। क्या यह एक प्रकार का दृष्टिकोण नहीं है? क्या यह एक ऐसा दृष्टिकोण नहीं है जिसे आम तौर पर लोगों के बीच रखा जाता है? इसका अर्थ है कि जब व्यक्ति के भौतिक जीवन का अंत आ जाता है तो वह जीवन पूरा और समाप्त हो जाता है। उस व्यक्ति ने अपने जीवन में जितनी भी बुरी चीजें की होती हैं, और जितने भी प्रेम, घृणा, जुनून और शत्रुता का अनुभव किया होता है, वे सब ठीक उसी समय समाप्त घोषित कर दिए जाते हैं और वह जीवन समाप्त मान लिया जाता है। लोग इस पर विश्वास करते हैं, लेकिन परमेश्वर के वचनों को और परमेश्वर के कार्यों के विभिन्न संकेतों को देखने से क्या यह परमेश्वर के कार्यों का सिद्धांत है? (नहीं।) तो परमेश्वर के कार्यों का क्या सिद्धांत है? परमेश्वर किस आधार पर ऐसे काम करता है? कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर ऐसे काम अपने प्रशासनिक आदेशों के आधार पर करता है, जो सही है, लेकिन यह पूरी तस्वीर नहीं है। एक ओर, यह उसके प्रशासनिक आदेशों के अनुसार होता है, लेकिन दूसरी ओर, वह सभी तरह के लोगों के साथ अपने स्वभाव और सार के आधार पर व्यवहार करता है—यही पूरी तस्वीर है। परमेश्वर की दृष्टि में अगर कोई व्यक्ति मारा जाता है और उसका सिर भूमि पर गिर जाता है तो क्या उस व्यक्ति का जीवन समाप्त हो जाता है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर किसी व्यक्ति के जीवन का अंत किस तरह करता है? क्या परमेश्वर किसी व्यक्ति के साथ इस तरह व्यवहार करता है? (नहीं।) किसी भी व्यक्ति के साथ व्यवहार करने का परमेश्वर का तरीका सिर्फ उसका सिर काटकर उसे मार देना और मामला खत्म करना नहीं है। परमेश्वर के मानवजाति के साथ व्यवहार करने का एक आरंभ और एक अंत होता है, एक सुसंगतता और एक दृढ़ता होती है। आत्मा के मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेने से लेकर मनुष्य का भौतिक जीवन समाप्त होने के बाद आध्यात्मिक क्षेत्र में लौटने तक, वह चाहे आध्यात्मिक क्षेत्र में हो या भौतिक दुनिया में, वह जिस भी मार्ग का अनुसरण करती हो, वह परमेश्वर के प्रबंधन के अधीन होनी चाहिए। अंत में, उसे पुरस्कृत किया जाता है या दंडित, यह परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों पर निर्भर करता है, और इसके स्वर्गिक नियम भी हैं। अर्थात परमेश्वर किसी व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है, यह पूरे जीवन की नियति पर निर्भर करता है जिसे उसने प्रत्येक व्यक्ति के लिए निर्धारित किया है। व्यक्ति की नियति समाप्त होने के बाद उससे बुरे को दंड देने और अच्छे को पुरस्कृत करने के लिए परमेश्वर द्वारा निर्धारित व्यवस्था और स्वर्गिक नियमों के आधार पर निपटा जाता है। अगर इस व्यक्ति ने संसार में काफी बुराई की है तो इसे काफी दंड भुगतना होगा; अगर इस व्यक्ति ने ज्यादा बुराई नहीं की है और कुछ अच्छे कर्म भी किए हैं तो इसे पुरस्कार दिया जाना चाहिए। वह पुनर्जन्म लेते रह सकता है या नहीं और वह मनुष्य के रूप में पुनर्जन्म लेता है या पशु के रूप में, यह इस जीवन में उसके प्रदर्शन पर निर्भर करता है। मैं क्यों इन चीजों के बारे में संगति कर रहा हूँ? क्योंकि “मारने से कोई फायदा नहीं होता” कहावत के साथ एक और वाक्यांश जुड़ा है, “जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो।” परमेश्वर के बोलने या कार्य करने के ऐसे कोई तरीके नहीं हैं, जो चीजों की गंभीरता घटाने का सिद्धांतहीन प्रयास करते हों। परमेश्वर के कार्य उस तरीके से प्रकट होते हैं, जिससे वह किसी भी सृजित प्राणी के साथ शुरू से अंत तक व्यवहार करता है, जो लोगों को स्पष्ट रूप से यह देखने में सक्षम बनाता है कि यह परमेश्वर ही है जो मनुष्यों की नियति पर संप्रभुता रखता है, उसका आयोजन और व्यवस्था करता है, और फिर, जहाँ उचित हो वहाँ दंड देते हुए व्यक्ति के व्यवहार के अनुसार बुरे को दंडित और भले को पुरस्कृत करता है। परमेश्वर ने जो निर्धारित किया है, उसके अनुसार व्यक्ति को कितने ही वर्षों और कितने ही पुनर्जन्मों के लिए दंडित किया जाना चाहिए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसने कितनी बुराइयाँ की हैं, और आध्यात्मिक क्षेत्र इसे स्थापित नियमों के अनुसार, बिना जरा-से भी विचलन के, लागू करती है। कोई भी इसे बदल नहीं सकता, और जो कोई ऐसा करता है, वह परमेश्वर द्वारा निर्धारित स्वर्गिक नियमों का उल्लंघन करता है, और उसे बिना किसी अपवाद के दंडित किया जाएगा। परमेश्वर की दृष्टि में, इन स्वर्गिक नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि किसी भी व्यक्ति से, चाहे उसने जो भी बुराई की हो या जिन भी स्वर्गिक नियमों और कानूनों का उल्लंघन किया हो, अंततः बिना किसी रियायत के निपटा जाएगा। दुनिया के कानूनों के विपरीत—जहाँ सजाएँ निलंबित रहती हैं, या कोई बीच-बचाव कर सकता है, या न्यायाधीश अपने रुझानों के अनुसार और जहाँ कहीं संभव हो, उदार होकर दयालुता बरत सकता है, ताकि व्यक्ति को अपराध के लिए दोषी न ठहराया जाए और तदनुसार दंडित न किया जाए—आध्यात्मिक क्षेत्र में चीजें इस तरह से काम नहीं करतीं। परमेश्वर प्रत्येक सृजित प्राणी के पिछले और वर्तमान जीवन के साथ सख्ती से उन नियमों के अनुसार व्यवहार करेगा, जिन्हें उसने स्थापित किया है, अर्थात, स्वर्ग के नियमों के अनुसार। इससे फर्क नहीं पड़ता कि व्यक्ति के अपराध कितने गंभीर या गौण हैं, या उसके अच्छे कर्म कितने महान या क्षुद्र हैं, और उस व्यक्ति के अपराध या सत्कर्म कितने समय से चल रहे हैं या वे कितने समय पहले किए गए हैं। इनमें से कोई भी उस तरीके को नहीं बदलता, जिससे सृष्टि का परमेश्वर स्वयं द्वारा सृजित मनुष्यों के साथ व्यवहार करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर द्वारा बनाए गए स्वर्गिक नियम कभी नहीं बदलेंगे। परमेश्वर के कार्यों और उसके कार्य करने के तरीके के पीछे यही सिद्धांत है। जबसे मनुष्य अस्तित्व में आए और परमेश्वर ने उनके बीच कार्य करना शुरू किया, तब से उसके बनाए प्रशासनिक आदेश अर्थात् स्वर्ग के नियम नहीं बदले। इसलिए, अंततः परमेश्वर के पास मनुष्य के अपराधों, अच्छे कर्मों और सभी प्रकार के बुरे कर्मों से निपटने के तरीके होंगे। सभी सृजित प्राणियों को अपने कार्यों और व्यवहार की उचित कीमत चुकानी होगी। लेकिन परमेश्वर प्रत्येक सृजित प्राणी को परमेश्वर के प्रति किए गए विद्रोह, उसके बुरे कर्मों और उसके पिछले अपराधों के कारण दंडित करता है, इसलिए नहीं कि परमेश्वर लोगों से घृणा करता है। परमेश्वर मानवजाति का सदस्य नहीं है। परमेश्वर परमेश्वर है, सृष्टि का प्रभु है। सभी सृजित प्राणियों को इसलिए दंडित नहीं किया जाता कि सृष्टि का प्रभु लोगों से घृणा करता है, बल्कि इसलिए किया जाता है कि उन्होंने परमेश्वर द्वारा स्थापित स्वर्गिक नियमों-विनियमों, कानूनों और आज्ञाओं का उल्लंघन किया है, और इस सच्चाई को कोई नहीं बदल सकता। इस दृष्टिकोण से परमेश्वर की नजरों में “जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” जैसी कोई चीज कभी नहीं होती। हो सकता है, तुम लोग पूरी तरह से न समझ न पाओ कि मैं क्या कह रहा हूँ, लेकिन कुछ भी हो, अंतिम उद्देश्य तुम लोगों को यह बताना है कि परमेश्वर के दिल में कोई घृणा नहीं है, बल्कि सिर्फ स्वर्ग के नियम, प्रशासनिक आदेश, कानून, उसका स्वभाव, और उसका कोप और प्रताप है, जो कोई अपराध सहन नहीं करता। इसलिए, परमेश्वर की नजरों में “जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनो” जैसी कोई चीज नहीं है। तुम्हें जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनने की अपेक्षा से परमेश्वर को नहीं मापना चाहिए, और न ही परमेश्वर को इस अपेक्षा की कसौटी पर जाँचना चाहिए। “परमेश्वर को इस अपेक्षा की कसौटी पर जाँचने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि कभी-कभी जब परमेश्वर लोगों को दया और सहनशीलता दिखाता है, तो कुछ लोग कहते हैं, “देखो, परमेश्वर अच्छा है, परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है, वह जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार होता है, वह मनुष्यों के प्रति वास्तव में सहिष्णु है, परमेश्वर सबसे ज्यादा उदारमना है, उसका मन इंसानों के मन से कहीं ज्यादा बड़ा है, यहाँ तक कि प्रधानमंत्रियों के मन से भी बड़ा!” क्या ऐसा कहना सही है? (नहीं।) अगर तुम इस तरह से परमेश्वर की स्तुति करते हो, तो क्या यह कहना उचित है? (नहीं, यह अनुचित है।) बोलने का यह तरीका गलत है और इसे परमेश्वर पर लागू नहीं किया जा सकता। मनुष्य अपनी उदारता और सहनशीलता दिखाने के लिए, और यह दिखावा करने के लिए कि वे सहिष्णु और उदार, और महान गुणों वाले व्यक्ति हैं, जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार होने का प्रयास करते हैं। जहाँ तक परमेश्वर की बात है, परमेश्वर के सार में दया और सहनशीलता है। दया और सहनशीलता परमेश्वर का सार है। लेकिन परमेश्वर का सार उस उदारता और सहनशीलता के समान नहीं है, जिसे मनुष्य जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार होकर दिखाते हैं। ये दो अलग चीजें हैं। जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार होने में मनुष्यों का उद्देश्य लोगों से अपने बारे में अच्छी बातें कहलवाना है, उनसे यह सुनना है कि उनमें उदारता और अनुग्रह है, और वे अच्छे इंसान हैं। इसके अलावा, यह अस्तित्व के लिए सामाजिक दबावों के कारण भी है। लोग किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही दूसरों के प्रति थोड़ी-सी उदारता और थोड़ी-सी व्यापक सोच दिखाते हैं, वे अंतरात्मा के मापदंड के मुताबिक चलने या उसका पालन करने के लिए नहीं, बल्कि लोगों से अपना आदर और आराधना करवाने के लिए ऐसा करते हैं, या इसलिए कि यह किसी गुप्त उद्देश्य या छल-प्रपंच का हिस्सा होता है। उनके कार्यों में पवित्रता नहीं होती। तो क्या परमेश्वर जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार होने जैसे कार्य करता है? परमेश्वर ऐसे कार्य नहीं करता। कुछ लोग कहते हैं, “क्या परमेश्वर भी लोगों के प्रति उदारता नहीं दिखाता? तो जब वह ऐसा करता है तो क्या वह जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार नहीं होता?” नहीं, यहाँ एक फर्क है जिसे लोगों को समझना चाहिए। ऐसा क्या है जिसे लोगों को समझना चाहिए? वह यह है कि जब लोग “जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें” कहावत लागू करते हैं, तो वे इसे सिद्धांतों के बिना करते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि वे सामाजिक दबावों और जनमत के आगे घुटने टेक रहे होते हैं और यह दिखावा कर रहे होते हैं कि वे अच्छे लोग हैं। इन्हीं नापाक मकसदों से और भले आदमी होने का दिखावा करने के लिए पाखंड का मुखौटा पहनकर लोग अनिच्छा से ऐसा करते हैं। या शायद वे परिस्थितियों से मजबूर होते हैं और बदला लेना चाहते हैं पर ले नहीं पाते, और इस स्थिति में जहाँ कोई अन्य विकल्प नहीं होता, वे अनिच्छा से इस सिद्धांत का पालन करते हैं। यह उनके आंतरिक सार के उद्गार से नहीं आता। जो लोग ऐसा कर सकते हैं, वे वास्तव में अच्छे लोग नहीं हैं या ऐसे लोग नहीं हैं जो वास्तव में सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हैं। तो लोगों के प्रति परमेश्वर के सहिष्णु और दयालु होने और “जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें” कहावत अमल में लाने वाले लोगों के बीच क्या अंतर है? तुम्हीं बताओ, क्या अंतर हैं। (परमेश्वर जो करता है, उसके सिद्धांत होते हैं। उदाहरण के लिए, नीनवे के लोगों ने वास्तव में पश्चात्ताप करने के बाद परमेश्वर की सहनशीलता पाई। इससे हम देख सकते हैं कि परमेश्वर के कार्यों के सिद्धांत होते हैं, और हम यह भी देख सकते हैं कि परमेश्वर के सार में लोगों के प्रति दया और सहिष्णुता है।) सही कहा। यहाँ दो मुख्य अंतर हैं। जिस बिंदु का तुम लोगों ने अभी उल्लेख किया, वह महत्वपूर्ण है, जो यह है कि परमेश्वर जो करता है उसके सिद्धांत होते हैं। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसकी एक स्पष्ट सीमा और दायरा होता है, और यह सीमा और दायरा ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोग समझ सकते हैं। तथ्य यह है कि परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसके कुछ निश्चित सिद्धांत होते हैं। उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के अपराधों के लिए उनके प्रति उदारता दिखाई। जब नीनवे के लोगों ने अपनी बुराई छोड़ दी और वास्तव में पश्चात्ताप किया तो परमेश्वर ने उन्हें क्षमा कर दिया और वादा किया कि वह शहर को और नष्ट नहीं करेगा। परमेश्वर के कार्यों के पीछे यही सिद्धांत था। इस सिद्धांत को यहाँ किस रूप में समझा जा सकता है? यह सबसे महत्वपूर्ण बात थी। मनुष्यों की समझ और बोलने के तरीके के अनुसार, यह कहा जा सकता है कि यह परमेश्वर की सबसे महत्वपूर्ण बात थी। अगर नीनवे के लोगों ने बुराई में लिप्त होना छोड़ दिया और पाप में जीना और परमेश्वर को त्यागना बंद कर दिया, जैसा कि उन्होंने एक बार किया था, और वास्तव में परमेश्वर के आगे पश्चात्ताप करने में सक्षम रहे, तो यह सच्चा पश्चात्ताप परमेश्वर द्वारा उन्हें दी गई आधार-रेखा थी। अगर वे सच्चा पश्चात्ताप कर पाते, तो परमेश्वर उनके साथ उदार होता। इसके विपरीत, अगर वे सच्चा पश्चात्ताप करने में विफल रहते, तो क्या परमेश्वर ने पुनर्विचार किया होता? क्या इस शहर को नष्ट करने का परमेश्वर का पिछला निर्णय और योजना बदल गई होती? (नहीं।) परमेश्वर ने उन्हें दो विकल्प दिए : पहला था अपने बुरे तरीकों पर चलते रहना और तबाही झेलना, जिस स्थिति में पूरा शहर मिटा दिया जाता; दूसरा था अपनी बुराई छोड़ देना, टाट ओढ़कर और राख मलकर उसके सामने सच में पश्चात्ताप करना, और अपने हृदय की गहराई से उसके सामने अपने पाप स्वीकारना, उस स्थिति में वह उनके साथ नरमी बरतता, और चाहे अतीत में उन्होंने जो भी बुराई की हो या उनकी बुराई कितनी भी गंभीर रही हो, वह उनके पश्चात्ताप के कारण शहर नष्ट न करने का मन बना लेता। परमेश्वर ने उन्हें दो विकल्प दिए, और पहला विकल्प चुनने के बजाय उन्होंने दूसरा विकल्प चुना—टाट ओढ़कर और राख मलकर परमेश्वर के सामने सच्चा पश्चात्ताप करने का विकल्प। अंतिम परिणाम क्या रहा? वे परमेश्वर का मन बदलवाने में सफल हुए, अर्थात उससे अपनी योजनाओं पर पुनर्विचार कर उन्हें बदलवाने, उनके प्रति उदारता दिखवाने और शहर को नष्ट करने से रुकवाने में कामयाब रहे। क्या यह वह सिद्धांत नहीं है, जिसके जरिये परमेश्वर कार्य करता है? (हाँ।) यही वह सिद्धांत है, जिसके जरिये परमेश्वर कार्य करता है। इसके अलावा, एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि परमेश्वर के सार में प्रेम और दया है, लेकिन निश्चित रूप से मनुष्य के अपराधों और क्रोध के प्रति असहिष्णुता भी है। नीनवे के विनाश के मामले में परमेश्वर के सार के ये दोनों पहलू प्रकट हुए थे। जब परमेश्वर ने उन लोगों के बुरे कर्म देखे, तो परमेश्वर के कोप का सार अभिव्यक्त होकर प्रकट हो गया। क्या परमेश्वर के क्रोध का कोई सिद्धांत है? (बिल्कुल है।) सरल शब्दों में कहें तो, वह सिद्धांत यह है कि परमेश्वर के क्रोध का एक आधार है। यह अंधाधुंध क्रोधित या कुपित होना नहीं है, यह एक प्रकार की भावना तो बिल्कुल भी नहीं है। बल्कि यह एक स्वभाव है, जो एक निश्चित संदर्भ में उत्पन्न और स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है। परमेश्वर का कोप और प्रताप कोई अपमान सहन नहीं करता। इंसानी भाषा में, इसका अर्थ यह है कि जब परमेश्वर ने नीनवे के लोगों के बुरे कर्म देखे, तो वह क्रोधित और कुपित हो गया। सटीक रूप से कहें तो परमेश्वर इसलिए क्रोधित था, क्योंकि उसका एक पक्ष लोगों के अपराधों के प्रति असहिष्णु होने का है, इसलिए लोगों के बुरे कर्म और नकारात्मक चीजें घटित होते और उभरते देखकर परमेश्वर स्वाभाविक रूप से अपना कोप प्रकट करेगा। तो, अगर परमेश्वर का कोप प्रकट होता तो क्या वह तुरंत शहर को नष्ट कर देता? (नहीं।) इस तरह तुम देख सकते हो कि परमेश्वर जो करता है, उसके सिद्धांत हैं। ऐसा नहीं है कि जब परमेश्वर क्रोधित हो जाता है, तो कहता है, “मेरे पास अधिकार है, मैं तुम्हें नष्ट कर दूँगा! चाहे तुम्हारी जो भी स्थिति हो, मैं तुम्हें मौका नहीं दूँगा!” ऐसा नहीं है। परमेश्वर ने क्या चीजें कीं? परमेश्वर ने चीजों की एक शृंखला की। लोगों को उनकी व्याख्या कैसे करनी चाहिए? परमेश्वर द्वारा की गई तमाम चीजों की शृंखला परमेश्वर के स्वभाव पर आधारित है। वे विशुद्ध रूप से उसके कोप के आधार पर उत्पन्न नहीं हुई थीं। कहने का तात्पर्य यह है कि, परमेश्वर का कोप उतावलापन नहीं है। यह मनुष्यों के उतावलेपन की तरह नहीं है, जो आवेश में आकर कहते हैं, “मेरे पास ताकत है, मैं तुम्हें मार डालूँगा, मैं तुम्हें ठीक कर दूँगा,” या जैसा बड़ा लाल अजगर कहता है, “अगर मैंने तुम्हें पकड़ लिया, तो मैं तुम्हें मार डालूँगा और बिना परेशानी के तुम्हें मौत के घाट उतार दूँगा।” शैतान और दुष्ट इसी तरह से काम करते हैं। उतावलापन शैतान और दुष्टों से आता है। परमेश्वर के क्रोध में कोई उतावलापन नहीं है। उसमें उतावलापन न होना किस तरह प्रकट होता है? जब परमेश्वर ने देखा कि नीनवे के लोग कितने भ्रष्ट हैं तो वह क्रोधित और कुपित हो गया। लेकिन क्रोधित होने के बावजूद उसने अपने कोप के सार की मौजूदगी के कारण एक भी शब्द कहे बिना उन्हें नष्ट नहीं किया। इसके बजाय उसने योना को नीनवे के लोगों के पास यह बताने के लिए भेजा कि वह आगे क्या करने वाला है, वह क्या और क्यों करने जा रहा है ताकि उन्हें स्पष्ट हो जाए और आशा की एक किरण भी मिल जाए। यह तथ्य मनुष्य को बताता है कि परमेश्वर का कोप नकारात्मक और बुरी चीजें सामने आने के कारण प्रकट होता है, लेकिन उसका कोप मनुष्य के उतावलेपन और मनुष्य की भावनाओं से अलग है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर का कोप मनुष्य के उतावलेपन और भावनाओं से अलग है पर क्या परमेश्वर का कोप नियंत्रणीय है?” नहीं, यहाँ नियंत्रणीय शब्द का उपयोग करना उचित नहीं है, ऐसा कहना उचित नहीं है। सटीक रूप से से कहें तो परमेश्वर के कोप के सिद्धांत हैं। अपने कोप में, परमेश्वर ने लड़ीवार कई चीजें कीं जो इस बात को और भी साबित करती हैं कि उसके कार्यों में सत्य और सिद्धांत हैं, और साथ ही मनुष्यजाति को यह भी बताती हैं कि परमेश्वर में कोप के अलावा दया और प्रेम भी हैं। परमेश्वर की दया और प्रेम का निवेश पाकर मनुष्य को क्या लाभ होते हैं? कहने का तात्पर्य यह है कि अगर लोग परमेश्वर के सिखाए तरीके से अपने पाप स्वीकार कर पश्चात्ताप करते हैं तो वे परमेश्वर से जीवन का एक अवसर और बचे रहने की आशा और संभावना प्राप्त कर सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि लोग परमेश्वर की अनुमति से इस शर्त पर जीते रह सकते हैं कि उन्होंने सच में पाप स्वीकार किया है और सच में पश्चात्ताप किया है, तब वे वह वादा प्राप्त करने में सक्षम होंगे जो परमेश्वर उन्हें देता है। क्या कथनों की इस पूरी कड़ी के सिद्धांत नहीं हैं? तुम देखते हो, परमेश्वर द्वारा की जाने वाली हर चीज और हर प्रकार के कार्य के पीछे, इंसानी भाषा में कहें तो एक औचित्य और सतर्कता है, या परमेश्वर के वचनों का उपयोग करें तो सत्य और सिद्धांत हैं। यह मनुष्य के कार्य करने के तरीके से भिन्न है और इसमें मनुष्य के उतावलेपन की मिलावट तो बिल्कुल भी नहीं है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर का स्वभाव शांत है और आवेशपूर्ण नहीं है!” क्या यही बात है? नहीं, यह नहीं कहा जा सकता कि परमेश्वर का स्वभाव शांत और संतुलित है, और आवेशपूर्ण नहीं है—यह इसे मापने और वर्णन करने का इंसानी तरीका है। परमेश्वर जो करता है उसके सत्य और सिद्धांत होते हैं। चाहे वह कुछ भी करे, उसका एक आधार होता है, और वह आधार सत्य और परमेश्वर का स्वभाव है।

नीनवे के लोगों से निपटते हुए परमेश्वर ने कड़ीवार कई चीजें कीं। पहले, उसने योना को नीनवे के लोगों को यह बताने भेजा, “अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा” (योना 3:4)। क्या चालीस दिन बहुत लंबा समय है? इसमें ठीक एक महीना और दस दिन होते हैं जो काफी लंबा समय है और लोगों के लिए कुछ देर सोच-विचार और सच्चा पश्चात्ताप करने के लिए पर्याप्त है। अगर ये चार घंटे या चार दिन होते तो यह पछताने के लिए पर्याप्त समय न होता। लेकिन परमेश्वर ने चालीस दिन दिए, जो एक बहुत लंबा समय था और काफी ज्यादा था। कोई शहर कितना बड़ा हो सकता है? योना ने शहर के एक छोर से दूसरे छोर तक घूमकर थोड़े ही दिनों में सबको सूचित कर दिया, ताकि हर एक नागरिक और हर एक परिवार को संदेश मिल जाए। ये चालीस दिन टाट या राख तैयार करने और कोई अन्य आवश्यक तैयारी करने के लिए काफी थे। तुम इन चीजों से क्या समझे? परमेश्वर ने नीनवे के लोगों को यह बताने के लिए कि वह उनके शहर को नष्ट करने वाला है, उन्हें तैयारी, चिंतन और आत्म-परीक्षण करने के लिए पर्याप्त समय दिया। इंसानी भाषा में कहें तो परमेश्वर ने वह सब किया जो वह कर सकता था और जो उसे करना चाहिए था। चालीस दिन की अवधि पर्याप्त थी, क्योंकि उसने—राजा से लेकर जनसामान्य तक—सभी को सोचने और तैयार होने के लिए पर्याप्त समय दिया। एक ओर, इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर लोगों के लिए जो करता है वह है सहनशीलता दिखाना, और दूसरी ओर, यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर अपने हृदय में लोगों की परवाह करता है और उनके लिए सच्चा प्रेम रखता है। परमेश्वर की दया और प्रेम वास्तव में मौजूद हैं, बिना किसी ढोंग के, और उसका हृदय विश्वसनीय है, बिना किसी ढोंग के। लोगों को पश्चात्ताप करने का अवसर देने के लिए उसने उन्हें चालीस दिन का समय दिया। उन चालीस दिनों में परमेश्वर की सहनशीलता और प्रेम समाहित था। वे चालीस दिन लोगों को यह साबित करने और पूरी तरह से यह देख पाने के लिए काफी थे कि परमेश्वर को लोगों के प्रति सच्ची चिंता और प्रेम है, और परमेश्वर की दया और प्रेम किसी ढोंग के बिना वास्तव में मौजूद हैं। कुछ लोग कहेंगे, “क्या तुमने पहले नहीं कहा था कि परमेश्वर लोगों से प्रेम नहीं करता, कि वह लोगों से घृणा करता है? क्या वह तुम्हारी अभी कही गई बातों का विरोधाभास नहीं है?” क्या यह विरोधाभास है? (नहीं, ऐसा नहीं है।) परमेश्वर अपने हृदय में लोगों की परवाह करता है, उसमें प्रेम का सार है। क्या यह कहना अलग है कि परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है? (बिल्कुल।) यह कैसे अलग है? परमेश्वर वास्तव में लोगों से प्रेम करता है या घृणा? (वह लोगों से प्रेम करता है।) तो परमेश्वर फिर भी लोगों को शाप और ताड़ना क्यों देता है, उनका न्याय क्यों करता है? अगर इतनी महत्वपूर्ण बात भी तुम लोगों को स्पष्ट नहीं है, तो फिर तुम लोग इसे गलत समझे होगे। क्या यह तुम्हारे और परमेश्वर के बीच विरोधाभास है? अगर यह ऐसी चीज है जिसके बारे में तुम स्पष्ट नहीं हो, तो क्या तुम्हारे और परमेश्वर के बीच एक खाई पैदा होने की संभावना नहीं है? तुम्हीं बताओ, अगर परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है, तो क्या परमेश्वर लोगों से घृणा भी करता है? क्या लोगों के लिए परमेश्वर के प्रेम का लोगों के प्रति उसकी घृणा पर कोई असर पड़ता है? क्या लोगों के प्रति परमेश्वर की घृणा का लोगों के लिए उसके प्रेम पर कोई असर पड़ता है? (नहीं, कोई असर नहीं पड़ता।) तो ऐसा क्यों है कि परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है? लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर देहधारी हुआ—क्या यह उसका सबसे बड़ा प्रेम नहीं है? अगर तुम लोग यह नहीं जानते, तो कितनी दयनीय बात है! अगर तुम यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर लोगों से प्रेम क्यों करता है, तो यह हास्यास्पद है। तुम्हीं बताओ, अपने बच्चे के लिए माँ के मन में प्रेम कहाँ से उपजता है? (सहज प्रवृत्ति से।) सही कहा। ममता सहज प्रवृत्ति से उपजती है। तो क्या यह प्रेम इस बात पर आधारित होता है कि बच्चा अच्छा है या बुरा? (नहीं, ऐसा नहीं है।) उदाहरण के लिए, भले ही बच्चा बहुत शरारती हो और कभी-कभी अपनी माँ को बहुत गुस्सा दिला देता हो, फिर भी अंततः वह उससे प्रेम करती है। ऐसा क्यों होता है? जिस तरह से वह अपने बच्चे के साथ व्यवहार करती है, वह माँ के रूप में उसकी भूमिका की सहज प्रवृत्ति से उपजता है। उसकी इस सहज ममता के कारण बच्चे के लिए उसका प्रेम इस बात पर आधारित नहीं होता कि बच्चा अच्छा है या बुरा। कुछ लोग कहते हैं, “जब माँ अपने बच्चे से सहज प्रवृत्ति से प्रेम करती है, तो फिर वह उसे पीटती क्यों है? उससे नफरत क्यों करती है? कभी-कभी गुस्सा होकर उसे डाँटती क्यों है? और कभी-कभी वह इतनी पगला जाती है कि उसके साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहती? क्या तुमने नहीं कहा कि माँ में प्रेम होता है और वह अपने बच्चे से प्रेम करती है? तो वह इतनी बेरहम कैसे हो सकती है?” क्या यह एक विरोधाभास है? नहीं, यह कोई विरोधाभास नहीं है। माँ अपने बच्चे के साथ कैसा व्यवहार करती है, यह माँ के प्रति बच्चे के रवैये और बच्चे के व्यवहार पर निर्भर करता है। लेकिन चाहे वह अपने बच्चे के साथ कैसा भी व्यवहार करे, चाहे वह उसे पीटे और उससे नफरत करे, इसका उसकी ममता की मौजूदगी पर कोई असर नहीं पड़ता। इसी तरह, लोगों के लिए परमेश्वर का प्रेम कहाँ से आता है? (परमेश्वर में प्रेम का सार है।) सही कहा। तुमने अंततः इसे स्पष्ट कर दिया है। यहाँ मूल बात यह है कि परमेश्वर में प्रेम का सार है। परमेश्वर के लोगों से प्रेम और उनकी परवाह करने का कारण यह है कि एक ओर परमेश्वर में प्रेम का सार है। इस प्रेम में दया, करुणा, सहनशीलता और धैर्य है। बेशक, सरोकार की अभिव्यक्तियाँ भी हैं, और कभी-कभी चिंता और उदासी आदि भी। यह सब परमेश्वर के सार से तय होता है। यह इसे व्यक्तिपरक दृष्टिकोण से देखना है। वस्तुपरक दृष्टिकोण से, इंसान परमेश्वर द्वारा सृजित किए गए हैं, जैसे बच्चा अपनी माँ से पैदा होता है, और माँ स्वाभाविक रूप से उसकी परवाह करती है और उनके बीच अटूट रक्त-संबंध होते हैं। इंसानों और परमेश्वर के बीच ये रक्त-संबंध नहीं हैं, जैसा कि इंसान कहते हैं, फिर भी इंसान परमेश्वर द्वारा सृजित किए गए हैं, और वह उनकी परवाह करता है और उनके लिए स्नेह महसूस करता है। परमेश्वर चाहता है कि इंसान अच्छे बनें और सही मार्ग पर चलें, लेकिन उन्हें शैतान के हाथों भ्रष्ट होते, बुराई के मार्ग पर चलते और कष्ट सहते देखना परमेश्वर को दुखी और पीड़ित करता है। यह सामान्य है, है कि नहीं? परमेश्वर में ये प्रतिक्रियाएँ, भावनाएँ और अभिव्यक्तियाँ हैं, ये सभी परमेश्वर के सार के कारण उत्पन्न होती हैं और इन्हें उस आपसी संबंध से अलग नहीं किया जा सकता जो परमेश्वर ने मनुष्य को सृजित कर बनाया है। ये सभी वस्तुपरक तथ्य हैं। कुछ लोग कहते हैं : “चूँकि परमेश्वर के सार में प्रेम है, फिर भी वह लोगों से घृणा क्यों करता है? क्या परमेश्वर लोगों की परवाह नहीं करता? वह फिर भी उनसे घृणा कैसे करता है?” यहाँ एक वस्तुपरक तथ्य भी है, जो यह है कि लोगों का स्वभाव, सार और अन्य पहलू परमेश्वर और सत्य के साथ मेल नहीं खाते, इसलिए लोग परमेश्वर के सामने जो कुछ अभिव्यक्त और प्रकट करते हैं, वह उससे घृणा करता है, वह उसके लिए घृणास्पद है। जैसे-जैसे समय बीतता है, लोगों के भ्रष्ट स्वभाव अधिकाधिक गंभीर होते जाते हैं, उनके पाप अधिकाधिक गंभीर होते जाते हैं, और वे अत्यंत हठी, पश्चात्ताप न करने पर भी अड़े रहते हैं, और सत्य का छोटा-सा अंश भी नहीं स्वीकारते। वे पूरी तरह से परमेश्वर के विरोध में होते हैं, इसलिए उसकी घृणा भड़क जाती है। तो, परमेश्वर की घृणा कहाँ से उत्पन्न होती है? वह क्यों उत्पन्न होती है? वह इसलिए उत्पन्न होती है, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक और पवित्र है, और परमेश्वर की घृणा उसके सार से भड़कती है। परमेश्वर बुराई से घृणा करता है, नकारात्मक चीजों से घृणा करता है, और बुरी ताकतों और बुरी चीजों से घृणा करता है। इसलिए, परमेश्वर इस भ्रष्ट मानवजाति से घृणा करता है। इसलिए परमेश्वर सृजित प्राणियों के लिए जो प्रेम और घृणा प्रकट करता है वे सामान्य हैं और उसके सार से निर्धारित होते हैं। इसमें बिल्कुल भी विरोधाभास नहीं है। कुछ लोग पूछते हैं, “तो परमेश्वर वास्तव में लोगों से प्रेम करता है या घृणा?” तुम इसका उत्तर कैसे दोगे? (यह परमेश्वर के प्रति लोगों के रवैये पर निर्भर करता है या इस पर निर्भर करता है कि लोगों ने वास्तव में पश्चात्ताप किया है या नहीं।) यह मूलभूत रूप से सच है लेकिन पूरी तरह सटीक नहीं है। यह सटीक क्यों नहीं है? क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर को लोगों से अनिवार्यतः प्रेम करना चाहिए? (नहीं।) मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचन और वह सब कार्य जो वह लोगों में करता है, परमेश्वर के स्वभाव और सार की स्वाभाविक अभिव्यक्तियाँ हैं। परमेश्वर के अपने सिद्धांत हैं, उसका लोगों से प्रेम करना जरूरी नहीं है लेकिन उसका लोगों से घृणा करना भी जरूरी नहीं है। परमेश्वर लोगों से सत्य का अनुसरण करने, अपने मार्ग पर चलने और अपने वचनों के अनुसार आचरण और कार्य करने के लिए कहता है। परमेश्वर का लोगों से प्रेम करना जरूरी नहीं है लेकिन उसका लोगों से घृणा करना भी जरूरी नहीं है। यह एक तथ्य है और लोगों को इसे समझना होगा। अभी तुम लोगों ने कहा कि परमेश्वर लोगों के व्यवहार के आधार पर उनसे प्रेम या घृणा करता है। ऐसा कहना गलत क्यों है? परमेश्वर का तुमसे प्रेम करना जरूरी नहीं है, न ही उसका तुमसे घृणा करना बिल्कुल जरूरी है। परमेश्वर तुम्हारी उपेक्षा भी कर सकता है। तुम चाहे सत्य का अनुसरण और परमेश्वर के वचनों के अनुसार आचरण या कार्य करो या चाहे तुम सत्य न स्वीकारो, परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह और उसका विरोध तक करो, अंत में वह प्रत्येक व्यक्ति को उसकी करनी के अनुसार प्रतिफल देगा। अच्छा करने वालों को पुरस्कृत किया जाएगा, जबकि बुरा करने वालों को दंडित किया जाएगा। इसे ही निष्पक्ष और न्यायसंगत ढंग से मामले निपटाना कहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि एक सृजित प्राणी के रूप में तुम्हारे पास यह माँग करने का कोई आधार नहीं है कि परमेश्वर को तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। जब तुम परमेश्वर और सत्य के साथ लालसापूर्वक व्यवहार करते हो और सत्य का अनुसरण करते हो, तो तुम सोचते हो कि उसे तुमसे प्रेम करना चाहिए, लेकिन अगर परमेश्वर तुम्हें अनदेखा करता है और तुमसे प्रेम नहीं करता, तो तुम्हें लगता है कि वह परमेश्वर नहीं है। या जब तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करते हो, तो तुम सोचते हो कि उसे तुमसे घृणा करनी चाहिए और तुम्हें दंड देना चाहिए, लेकिन अगर वह तुम्हें अनदेखा करता है, तो तुम्हें लगता है कि वह परमेश्वर नहीं है। क्या ऐसा सोचना सही है? (नहीं, यह सही नहीं है।) लोगों के संबंधों, जैसे कि माता-पिता और बच्चों के संबंध का आकलन इस प्रकार किया जा सकता है—यानी अपने बच्चों के लिए माता-पिता का प्रेम या घृणा कभी-कभी बच्चों के व्यवहार पर आधारित होती है—लेकिन इंसानों और परमेश्वर के बीच संबंध का आकलन इस तरह नहीं किया जा सकता। इंसानों और परमेश्वर के बीच का संबंध सृजित प्राणियों और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध है और उनमें रक्त-संबंध बिल्कुल नहीं है। यह सिर्फ सृजित प्राणियों और सृष्टिकर्ता के बीच का संबंध है। इसलिए इंसान यह माँग नहीं कर सकते कि परमेश्वर उनसे प्रेम करे या यह घोषणा करे कि वह उनके साथ कहाँ खड़ा है। ये अनुचित माँगें हैं। इस प्रकार का दृष्टिकोण गलत और अनुचित है; लोग ऐसी माँगें नहीं कर सकते। तो अब इसे देखते हुए क्या इंसानों को वास्तव में परमेश्वर के प्रेम की सही समझ है? उनकी पहले की समझ गलत थी, है न। (बिल्कुल।) परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है या घृणा, इसके सिद्धांत हैं। अगर इंसानों का व्यवहार या अनुसरण सत्य के अनुरूप और परमेश्वर की पसंद के अनुसार है, तो वह इसका अनुमोदन करता है। लेकिन लोगों का सार भ्रष्ट है और वे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर सकते हैं और उन आदर्शों और इच्छाओं का अनुसरण कर सकते हैं जो उन्हें सही लगती हैं या जिन्हें वे पसंद करते हैं। यह ऐसी चीज है जिससे परमेश्वर घृणा करता है और जिसे वह अनुमोदित नहीं करता। लेकिन मामला लोगों की इस सोच के विपरीत है कि जब भी परमेश्वर लोगों का अनुमोदन करेगा, वह उन पर पुरस्कार बरसाएगा, या जब भी वह उनका अनुमोदन नहीं करेगा, वह लोगों को अनुशासित और दंडित करेगा। परमेश्वर के कार्यों के सिद्धांत होते हैं। यह परमेश्वर के सार के बारे में बताता है और लोगों को इसे इसी तरह समझना चाहिए।

मैंने कुछ देर पहले ही एक प्रश्न उठाया और परमेश्वर के कार्यों के सिद्धांतों और परमेश्वर के सार पर संगति की। मैंने कौन-सा प्रश्न पूछा था? (परमेश्वर ने यह पूछा कि लोगों के प्रति उसकी सहनशीलता और दया और जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनने के इंसानी अभ्यास के बीच क्या अंतर है। बाद में, तुमने संगति की थी कि परमेश्वर सांसारिक व्यवहार के इस फलसफे के अनुसार कार्य नहीं करता। परमेश्वर मुख्य रूप से दो पहलुओं के आधार पर लोगों के अपराधों से निपटता है : एक ओर परमेश्वर जो करता है उसके सिद्धांत होते हैं, और दूसरी ओर परमेश्वर के सार में दया और कोप दोनों हैं।) यह वास्तव में इसे समझने का सही तरीका है। इस तरह से काम करने के परमेश्वर के सिद्धांत उसके सार और उसके स्वभाव पर आधारित हैं, और जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनने से उनका कोई लेना-देना नहीं है जो कि मनुष्यों के सांसारिक व्यवहार का एक फलसफा है। लोगों के कार्य शैतानी फलसफों पर आधारित और शैतानी स्वभावों से नियंत्रित होते हैं। परमेश्वर के कार्य उसके स्वभाव और सार की अभिव्यक्ति हैं। परमेश्वर के सार में प्रेम, दया और बेशक घृणा भी है। तो क्या अब तुम समझे कि मनुष्यों के बुरे कर्मों और उनके विभिन्न प्रकार के विद्रोहों और विश्वासघात के प्रति परमेश्वर का क्या रवैया है? परमेश्वर के रवैये का क्या आधार है? क्या यह उसके सार से उत्पन्न होता है? (हाँ।) परमेश्वर के सार में दया, प्रेम और कोप है। परमेश्वर का सार धार्मिकता है और परमेश्वर के कार्यों के सिद्धांत इसी सार से उपजते हैं। तो वास्तव में परमेश्वर के कार्यों के सिद्धांत क्या हैं? प्रचुरता से दया करो और गहराई से कोप बरसाओ। इसका जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनने से कोई लेना-देना नहीं है, जिसका मनुष्यों के बीच अभ्यास किया जाता है और जो एक बहुत ही महान सिद्धांत होने का आभास देता है, लेकिन परमेश्वर की दृष्टि में वह उल्लेखनीय नहीं है। एक ओर एक विश्वासी के रूप में तुम इस सिद्धांत के आधार पर परमेश्वर के सार, कर्मों और उसके कार्यों के सिद्धांतों का आकलन नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त, अपने ही परिप्रेक्ष्य से लोगों को सांसारिक व्यवहार के इस फलसफे का पालन नहीं करना चाहिए; उनके पास एक सिद्धांत होना चाहिए कि जब चीजें उन पर आ पड़ें तो कैसे निर्णय लें और इन चीजों से कैसे निपटें। वह सिद्धांत क्या है? लोगों में परमेश्वर का सार नहीं है और बेशक वे हर चीज स्पष्ट सिद्धांतों के साथ नहीं कर सकते, जैसे परमेश्वर करता है, या स्वर्ग में खड़े होकर अवसर नहीं बाँट सकते और सभी के साथ उदार नहीं हो सकते। लोग ऐसा नहीं कर सकते। तो तुम्हें उन चीजों का सामना करने पर क्या करना चाहिए, जो तुम्हें परेशान करती हैं, तुम्हें चोट पहुँचाती हैं या तुम्हारी गरिमा और चरित्र का अपमान करती हैं, यहाँ तक कि तुम्हारे दिल और तुम्हारी आत्मा को चोट पहुँचाती हैं? अगर तुम नैतिक आचरण संबंधी इस कहावत का पालन करते हो, “जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें” तो तुम सिद्धांतों की परवाह किए बिना चीजों को सुचारु करने की कोशिश करते हो, लोगों को खुश करने वाले बनते हो, तुम्हें लगता है कि इस दुनिया में गुजारा करना आसान नहीं, तुम दुश्मन नहीं बना सकते और तुम्हें लोगों को नाराज करने की कोशिश कम करनी चाहिए या बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनना चाहिए, हर मौके पर तटस्थ रहना चाहिए, बीच का रास्ता अपनाना चाहिए, किसी खतरनाक स्थिति में नहीं पड़ना चाहिए और सुरक्षित रहना चाहिए। क्या यह सांसारिक व्यवहार का एक फलसफा नहीं है? (हाँ, है।) यह सांसारिक व्यवहार का एक फलसफा है, न कि एक ऐसा सिद्धांत जो परमेश्वर मनुष्य को सिखाता है। तो परमेश्वर लोगों को कौन-सा सिद्धांत सिखाता है? सत्य का अनुसरण कैसे परिभाषित किया जाता है? पूरी तरह परमेश्वर के वचनों के अनुसार और सत्य को अपनी कसौटी मानकर लोगों और चीजों को देखना और आचरण और कार्य करना। अगर कुछ ऐसा हुआ हो जिसने तुम्हारी घृणा भड़का दी हो तो तुम उसे कैसे देखोगे? तुम उसे किस आधार पर देखोगे? (परमेश्वर के वचनों के आधार पर।) सही कहा। अगर तुम नहीं जानते कि इन चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार कैसे देखा जाए तो तुम सिर्फ जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बन सकते हो, अपना आक्रोश दबा सकते हो, रियायतें दे सकते हो और बदला लेने के अवसर तलाशते हुए उचित समय की प्रतीक्षा कर सकते हो—यही वह रास्ता है जिस पर तुम चलोगे। अगर तुम सत्य का अनुसरण करना चाहते हो तो तुम्हें लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखना चाहिए और खुद से पूछना चाहिए : “यह व्यक्ति मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है? मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसा परिणाम क्यों हो सकता है?” ऐसी चीजें परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखी जानी चाहिए। पहली चीज यह करनी चाहिए कि इस मामले को परमेश्वर से स्वीकारने में सक्षम होना चाहिए और सक्रिय रूप से यह स्वीकारना चाहिए कि यह परमेश्वर की ओर से आया है और तुम्हारे लिए सहायक और लाभदायक है। इस मामले को परमेश्वर से स्वीकारने के लिए तुम्हें पहले यह मानना चाहिए कि यह परमेश्वर द्वारा आयोजित और शासित है। पृथ्वी पर जो कुछ भी होता है, वह सब जो तुम महसूस कर सकते हो, वह सब जो तुम देख सकते हो, वह सब जो तुम सुन सकते हो—सब परमेश्वर की अनुमति से होता है। इस मामले को परमेश्वर से स्वीकारने के बाद इसे परमेश्वर के वचनों की कसौटी पर कसो और पता करो कि जिसने भी यह काम किया है वह किस तरह का व्यक्ति है और इस मामले का सार क्या है, फिर चाहे उसने जो कहा या किया उससे तुम्हें ठेस पहुँची हो या चाहे तुम्हारी भावनाओं को आघात पहुँचाया गया हो या चाहे तुम्हारे चरित्र को कुचला गया हो। पहले यह देखो कि वह व्यक्ति कोई बुरा व्यक्ति है या कोई साधारण भ्रष्ट व्यक्ति, पहले परमेश्वर के वचनों के अनुसार उसकी असलियत जानो और फिर इस मामले को परमेश्वर के वचनों के अनुसार समझकर इससे निपटो। क्या ये कदम उठाना सही नहीं है? (बिल्कुल सही है।) पहले इस मामले को परमेश्वर से स्वीकारो और इस मामले में शामिल लोगों को उसके वचनों के अनुसार देखो ताकि यह निर्धारित कर सको कि क्या वे साधारण भाई-बहन हैं या बुरे लोग, मसीह-विरोधी, अविश्वासी, बुरी आत्माएँ, गंदे राक्षस या बड़े लाल अजगर के जासूस हैं, और उन्होंने जो किया वह भ्रष्टता का एक सामान्य नमूना था या एक दुष्ट कार्य था जिसका उद्देश्य जानबूझकर परेशान करना और बाधित करना था। यह सब परमेश्वर के वचनों से तुलना करके निर्धारित किया जाना चाहिए। चीजों को परमेश्वर के वचनों की कसौटी पर कसना सबसे सटीक और वस्तुनिष्ठ तरीका है। परमेश्वर के वचनों के अनुसार ही लोगों में अंतर करना और मामलों को निपटाना चाहिए। तुम्हें विचार करना चाहिए : “इस घटना ने मेरी भावनाएँ बहुत आहत की हैं और मेरी स्थिति बिगाड़ी है। लेकिन इस घटना के घटित होने ने मुझे जीवन-प्रवेश करने हेतु शिक्षित करने के लिए क्या किया है? परमेश्वर की क्या इच्छा है?” यह तुम्हें मामले की जड़ तक ले जाता है जिसे तुम्हें जानना-समझना चाहिए—यह सही रास्ते पर चलना है। तुम्हें यह सोचते हुए परमेश्वर की इच्छा खोजनी चाहिए : “इस घटना ने मेरे दिल और मेरी आत्मा को आघात पहुँचाया है। मुझे पीड़ा और दर्द महसूस होता है, पर मैं नकारात्मक और तिरस्कारपूर्ण नहीं हो सकता। सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर के वचनों के अनुसार यह समझना, पहचानना और तय करना है कि यह घटना वास्तव में मेरे लिए फायदेमंद है या नहीं। अगर यह परमेश्वर के अनुशासन करने से आती है और मेरे जीवन-प्रवेश और मेरी आत्म-समझ के लिए लाभदायक है तो मुझे इसे स्वीकारकर इसके प्रति समर्पित होना चाहिए; अगर यह शैतान की ओर से प्रलोभन है तो मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और इससे बुद्धिमानी से निपटना चाहिए।” क्या इस तरह खोजना और सोचना सकारात्मक प्रवेश है? क्या यह लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखना है? (बिल्कुल।) इसके बाद तुम जिस भी मामले से निपट रहे हो या लोगों के साथ तुम्हारे संबंधों में जो भी समस्याएँ उत्पन्न होती हों, उन्हें हल करने के लिए तुम्हें परमेश्वर के प्रासंगिक वचनों की तलाश करनी चाहिए। क्रियाओं की इस पूरी कड़ी का क्या उद्देश्य है? इसका उद्देश्य लोगों और चीजों को परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखना है ताकि लोगों और चीजों के संबंध में तुम्हारा परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण पूरी तरह से अलग हों। इसका उद्देश्य अत्यधिक मान-सम्मान पाने के लिए प्रतिष्ठा जुटाना और इज्जत बचाना या देश और समाज में समरसता स्थापित कर शासक वर्ग को संतुष्ट करना नहीं है, बल्कि परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार जीना है ताकि परमेश्वर को संतुष्ट और सृष्टिकर्ता को गौरवान्वित किया जा सके। सिर्फ इस तरह अभ्यास करके ही तुम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो सकते हो। इसलिए तुम्हें परंपरागत संस्कृति में मौजूद नैतिक आचरण संबंधी कहावतों का पालन करने की जरूरत नहीं है। तुम्हें यह विचारने की जरूरत नहीं है, “जब ऐसा मामला मेरे साथ हो, तो क्या मुझे यह कहावत अमल में नहीं लानी चाहिए, ‘मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें’? अगर मैं ऐसा नहीं कर सकता तो जनमत मेरे बारे में क्या सोचेगा?” तुम्हें खुद को विवश और नियंत्रित करने के लिए इन नैतिक सिद्धांतों का उपयोग करने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय तुम्हें किसी ऐसे व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य को अपनाना चाहिए जो सत्य का अनुसरण करता है और लोगों और चीजों के साथ उस तरीके से व्यवहार करना चाहिए जैसा परमेश्वर तुम्हें सत्य का अनुसरण करने के लिए कहता है। क्या यह अस्तित्व का पूरी तरह से नया तरीका नहीं है? क्या यह पूरी तरह से नया जीवन-दृष्टिकोण और जीवन-लक्ष्य नहीं है? (बिल्कुल है।) लोगों और चीजों को देखने का यह तरीका अपनाने पर तुम्हें जानबूझकर खुद से यह कहने की जरूरत नहीं होती, “अगर मैं उदार होना चाहता हूँ और लोगों के बीच एक मुकाम हासिल करना चाहता हूँ, तो मुझे यह-यह करना चाहिए,” तुम्हें अपने साथ इतना कठोर होने की जरूरत नहीं है, तुम्हें अपनी इच्छा के प्रतिकूल जीने की जरूरत नहीं है और तुम्हारी मानवता को इतना विकृत होने की जरूरत नहीं है। इसके बजाय तुम परमेश्वर से प्राप्त इन परिवेशों, लोगों, मामलों और चीजों को स्वाभाविक रूप से और स्वेच्छा से स्वीकारोगे। इतना ही नहीं, तुम इनसे अप्रत्याशित लाभ भी बटोर सकते हो। घृणा जगाने वाली ऐसी चीजों से निपटने में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों की असलियत जानना सीख चुके होगे और परमेश्वर के वचनों के अनुसार ऐसी चीजों को पहचानना और उनसे निपटना सीख चुके होगे। अनुभवों और संघर्ष की एक अवधि से गुजरने के बाद तुम्हें ऐसी चीजों से निपटने के लिए सत्य-सिद्धांत मिल चुके होंगे और तुम जान चुके होगे कि ऐसे लोगों, मामलों और चीजों से निपटते समय किस प्रकार के सत्य-सिद्धांतों का उपयोग करना है। क्या यह सही रास्ते पर चलना नहीं है? इस तरह तुम्हारी मानवता में सुधार हो रहा होगा क्योंकि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलते हो, यानी अब तुम सिर्फ अपने इंसानी जमीर और विवेक के अनुसार नहीं जीते और जब चीजें घटित होती हैं तो तुम उन्हें सिर्फ जमीर और विवेक पर आधारित सोच और दृष्टिकोणों से नहीं देखते, बल्कि परमेश्वर के कई वचन पढ़ने और वास्तव में परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेने के कारण तुम कुछ सत्य समझ चुके होगे और सृष्टिकर्ता परमेश्वर की कुछ वास्तविक समझ पा चुके होगे। यह निश्चित रूप से एक भरपूर फसल है जिससे तुम सत्य और जीवन दोनों प्राप्त कर चुके होगे। अपने जमीर और विवेक के आधार पर तुम अपने सामने आने वाली सभी समस्याओं का सामना और समाधान करने के लिए परमेश्वर के वचनों और सत्य का उपयोग करना सीख चुके होगे और धीरे-धीरे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने लगे होगे। ऐसे मनुष्य कैसे होते हैं? क्या वे परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप होते हैं? ऐसे मनुष्य तेजी से परमेश्वर द्वारा अपेक्षित योग्य सृजित प्राणी बनने के करीब होते हैं और ऐसा करने में धीरे-धीरे परमेश्वर के उद्धार के कार्य के अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने में सक्षम होते हैं। जब लोग सत्य स्वीकारकर परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकते हैं तो बिना जरा-सी भी पीड़ा के इस तरह से जीना कितना आसान है। लेकिन जहाँ तक परंपरागत सांस्कृतिक शिक्षा प्राप्त लोगों की बात है, वे जो कुछ भी करते हैं वह उनकी इच्छा के बहुत ही विपरीत, बहुत ही पाखंडपूर्ण होता है और उनकी मानवता द्वारा प्रकट की जाने वाली चीजें बहुत विकृत और असामान्य होती हैं। ऐसा क्यों होता है? क्योंकि वे नहीं बताते कि वे क्या सोच रहे हैं। उनके होंठ कहते हैं, “जहाँ कहीं संभव हो वहाँ उदार बनें” लेकिन उनका दिल कहता है, “मेरा बदला पूरा नहीं हुआ है। सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या”—क्या यह उनकी अपनी इच्छा के विपरीत नहीं है? (बिल्कुल है।) “विकृत” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ यह है कि ऊपर से वे परोपकार और नैतिकता के सिवाय कुछ नहीं बोलते लेकिन दूसरों की पीठ पीछे वे व्यभिचार और लूटपाट जैसे तमाम तरह के बुरे काम करते हैं। परोपकार और नैतिकता की यह सारी बाहरी बात सिर्फ एक मुखौटा होती है और उनका दिल हर तरह की बुराई, हर तरह के घिनौने विचारों और दृष्टिकोणों से भरा रहता है; यह बेहद गंदी, निहायत घिनौनी, भद्दी और शर्मनाक बात है। विकृत का यही अर्थ है। आधुनिक भाषा में विकृति को दुश्चरित्रता कहा जाता है। वे सभी इतने दुश्चरित्र हैं, फिर भी दूसरों के सामने पूरी तरह से सभ्य, परिष्कृत, सज्जन और सम्माननीय होने का दिखावा करते हैं। उन्हें वास्तव में कोई शर्म नहीं है, वे बहुत दुष्ट हैं! परमेश्वर ने लोगों को जो मार्ग दिखाया है, वह इसलिए नहीं दिखाया कि तुम इस तरह जियो, बल्कि इसलिए दिखाया है कि तुम अपने हर काम में, चाहे वह परमेश्वर के सामने हो या अन्य लोगों के, परमेश्वर के बताए सही सिद्धांतों और अभ्यास के मार्ग का पालन करने में सक्षम बनो। यहाँ तक कि अगर तुम ऐसी चीजों का भी सामना करते हो जो तुम्हारे हितों को नुकसान पहुँचाती हैं या जो तुम्हारी पसंद के अनुरूप नहीं हैं या जिनका तुम पर आजीवन प्रभाव पड़ता है, तो भी इन मामलों से निपटने के लिए तुम्हारे पास सिद्धांत होने चाहिए। उदाहरण के लिए, तुम्हें सगे भाई-बहनों के साथ प्रेम से पेश आना चाहिए और उनके प्रति सहिष्णु, मददगार और सहयोगी बनना सीखना चाहिए। तो, तुम्हें परमेश्वर के शत्रुओं, मसीह-विरोधियों, दुष्ट लोगों और गैर-विश्वासियों या कलीसिया में घुसपैठ करने वाले एजेंटों और जासूसों के साथ क्या करना चाहिए? तुम्हें उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए नकार देना चाहिए। इसकी प्रक्रिया पहचानने और उजागर करने, घृणा महसूस करने और अंततः नकार देने की है। परमेश्वर के घर में प्रशासनिक आदेश और नियम होते हैं। जब बात मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों, गैर-विश्वासियों और उन लोगों की आती है जो दानवों, शैतान और दुष्ट आत्माओं जैसे होते हैं, तो वे सेवा प्रदान करने के लिए तैयार नहीं होते, इसलिए उन्हें परमेश्वर के घर से हमेशा के लिए अलग कर दो। तो फिर उनके साथ परमेश्वर के चुने हुए लोगों को कैसा व्यवहार करना चाहिए? (उन्हें नकार देना चाहिए।) बिल्कुल सही कहा, तुम्हें उन्हें नकार देना चाहिए, हमेशा-हमेशा के लिए नकार देना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : “नकारना एक शब्द भर है। मान लो, तुम सैद्धांतिक रूप से उन्हें नकार देते हो तो फिर तुम वस्तुतः इसे वास्तविक जीवन में कैसे करोगे?” क्या उनका कट्टर विरोधी होना ठीक है? इस तरह अनावश्यक रूप से खुद को थकाने की जरूरत नहीं है। तुम्हें उनका कट्टर विरोधी होने की जरूरत नहीं है, उनसे लड़ने-मरने की जरूरत नहीं है और पीठ पीछे उन्हें कोसने की जरूरत नहीं है। तुम्हें इनमें से कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। बस अपने दिल की गहराई से खुद को उनसे अलग कर लो और सामान्य परिस्थिति में उनके साथ व्यवहार मत करो। विशेष परिस्थिति में और जब तुम्हारे पास कोई विकल्प न हो, तो तुम उनसे सामान्य रूप से बात कर सकते हो लेकिन फिर जल्द से जल्द उनसे दूरी बना लो और उनके किसी भी मामले में मत पड़ो। इसका अर्थ है उन्हें अपने हृदय की गहराई से नकारना, उन्हें भाई-बहन या परमेश्वर के परिवार के सदस्य न समझना और उन्हें विश्वासी न मानना। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो परमेश्वर और सत्य से घृणा करते हैं, जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ते और बाधित करते हैं या जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने का प्रयास करते हैं, तुम्हें न सिर्फ परमेश्वर से उन्हें शाप देने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए, बल्कि उन्हें हमेशा के लिए बाँधना और रोकना भी चाहिए और उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए नकार देना चाहिए। क्या ऐसा करना परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है? यह पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। इन लोगों से निपटने के लिए अपना रुख जाहिर करना और सिद्धांत रखना जरूरी है। अपना रुख जाहिर करने और सिद्धांत रखने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है उनका सार स्पष्ट रूप से देखना, उन्हें विश्वासी कभी न मानना और भाई-बहन बिल्कुल न समझना। वे दुष्ट हैं, शैतान हैं। यह उन्हें माफ करने या न करने का सवाल नहीं है, बल्कि खुद को उनसे अलग करने और उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए नकारने का सवाल है। यह पूरी तरह से न्यायोचित और सत्य के अनुरूप है। कुछ लोग कहते हैं, “क्या परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों के लिए इस तरह की चीजें करना बहुत निर्मम नहीं है?” (नहीं।) रुख जाहिर करने और सिद्धांत रखने का यही अर्थ है। हम वही करते हैं जो परमेश्वर हमें करने के लिए कहता है। परमेश्वर हमें जिसके साथ उदार होने के लिए कहता है, उसके साथ हम उदार होते हैं और परमेश्वर हमें जिससे घृणा करने के लिए कहता है, उससे हम घृणा करते हैं। व्यवस्था के युग में जिन लोगों ने व्यवस्थाओं और आज्ञाओं का उल्लंघन किया, उन्हें परमेश्वर के चुने हुए लोगों ने पत्थर मार-मारकर मार डाला था, लेकिन आज राज्य के युग में परमेश्वर के पास प्रशासनिक आदेश हैं और वह दुष्ट और शैतान जैसे लोगों को सिर्फ हटाता और निकालता है। परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इंसानी धारणाओं से शासित या प्रभावित हुए बिना और धार्मिक लोगों द्वारा आलोचना और निंदा किए जाने से डरे बिना परमेश्वर के वचनों और उसके प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन न करते हुए उन्हें अमल में लाना और उनका पालन करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना ऐसी चीज है जो पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है। हर समय सिर्फ यह विश्वास करो कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, मनुष्य के वचन सत्य नहीं हैं चाहे वे कितने भी अच्छे क्यों न लगें। लोगों में यह आस्था होनी चाहिए। लोगों को परमेश्वर में यह आस्था होनी चाहिए और उनमें समर्पण का यह रवैया भी होना चाहिए। यह रवैये का सवाल है।

हमने नैतिक आचरण संबंधी इस कहावत कि “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें” पर और परमेश्वर के कार्यों के सिद्धांतों पर कमोबेश पर्याप्त कह दिया है। जब ऐसे मामलों की बात आती है जो लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं तो क्या तुम लोग अब उनसे निपटने का वह सिद्धांत समझते हो जो परमेश्वर लोगों को सिखाता है? (बिल्कुल।) वह यह है कि परमेश्वर लोगों को उन मामलों से निपटने में उतावला होने की अनुमति नहीं देता जो उन पर आन पड़ते हैं, किसी भी मामले से निपटने के लिए मानवीय नैतिक संहिताओं का उपयोग करने की तो बात ही छोड़ दो। वह कौन-सा सिद्धांत है जिसके बारे में परमेश्वर लोगों को बताता है? लोगों को किस सिद्धांत का पालन करना चाहिए? (परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों और चीजों को देखो और आचरण और कार्य करो।) बिल्कुल सही कहा, परमेश्वर के वचनों और सत्य के अनुसार लोगों और चीजों को देखो और आचरण और कार्य करो। चाहे जो कुछ भी हो, उससे परमेश्वर के वचनों के अनुसार निपटना चाहिए क्योंकि सभी मामलों और चीजों में जो कुछ भी होता है और जो भी व्यक्ति या मामला सामने आता है, उसके पीछे एक मूल कारण होता है, जिसकी व्यवस्था परमेश्वर करता है और जिसके ऊपर उसकी संप्रभुता होती है। जो कुछ भी होता है, उसका एक सकारात्मक या नकारात्मक अंतिम परिणाम हो सकता है, और उनके बीच का अंतर लोगों के अनुसरणों और उनके चलने के मार्ग पर निर्भर करता है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार मामलों से निपटने का फैसला करते हो तो अंतिम परिणाम सकारात्मक होगा; अगर तुम उनसे देह और उतावलेपन के तरीकों और मनुष्यों के दिमाग से उपजीं तमाम तरह की कहावतों, विचारों और दृष्टिकोणों से निपटने का चुनाव करते हो तो अंतिम परिणाम निश्चित रूप से उतावलेपन और नकारात्मकता का होगा। उतावलेपन और नकारात्मकता की उन चीजों में अगर लोगों की गरिमा, शरीर, आत्मा, हितों आदि को नुकसान पहुँचाना शामिल है, तो वे अंततः लोगों में सिर्फ घृणा और विषाद ही छोड़ जाएँगी, जिससे वे कभी छुटकारा नहीं पा सकते। सिर्फ परमेश्वर के वचनों का पालन करने से ही उन विभिन्न लोगों, मामलों और चीजों के कारणों का पता लगाना संभव है जिनका व्यक्ति सामना करता है, और सिर्फ परमेश्वर के वचनों का पालन करके ही ऐसे लोगों, मामलों और चीजों का सार स्पष्ट रूप से देखना संभव है। बेशक, सिर्फ परमेश्वर के वचनों का पालन करके ही लोग उन सभी विभिन्न लोगों, मामलों और चीजों से संबंधित समस्याओं से सही ढंग से निपट सकते और उन्हें हल कर सकते हैं जिनका वे हकीकत में सामना करते हैं। अंत में, यह लोगों को उन सभी परिवेशों से लाभ उठाने में सक्षम करेगा जिन्हें परमेश्वर सृजित करता है, उनका जीवन धीरे-धीरे विकसित हो जाएगा, उनके भ्रष्ट स्वभाव बदल जाएँगे और साथ ही वे उनके भीतर जीवन में सही दिशा, जीवन के बारे में सही दृष्टिकोण, अस्तित्व का सही तरीका और अनुसरण का सही लक्ष्य और मार्ग पाएँगे। हमने मूल रूप से नैतिक आचरण संबंधी इस कहावत पर अपनी संगति पूरी कर ली है, “मारने से कोई फायदा नहीं होता; जहाँ कहीं भी संभव हो वहाँ उदार बनें।” यह कहावत कुछ सतही है लेकिन सत्य के अनुसार विश्लेषण किया जाए तो इसका सार उतना सरल नहीं है। इस संबंध में लोगों को क्या करना चाहिए और ऐसी स्थितियों से कैसे निपटना चाहिए, यह तो और भी मुश्किल है। इसका संबंध इस बात से है कि क्या लोग सत्य की खोज और उसका अनुसरण कर सकते हैं, और बेशक इसका और भी ज्यादा संबंध लोगों के स्वभाव में बदलाव और लोगों के उद्धार से है। इसलिए चाहे ये समस्याएँ सरल हों या जटिल, सतही हों या गहरी, इनसे सही तरह से और गंभीरता से निपटना चाहिए। लोगों के स्वभाव में बदलावों से संबंधित या लोगों के उद्धार से जुड़ी कोई भी चीज तुच्छ नहीं है, हर चीज निर्णायक और महत्वपूर्ण है। मुझे उम्मीद है कि अब से अपने दैनिक जीवन में तुम लोग परंपरागत संस्कृति में नैतिकता के बारे में तमाम कहावतों और विचारों का अपने विचारों और चेतना से पता लगाओगे, उनका विश्लेषण करोगे और परमेश्वर के वचनों के अनुसार उनकी असलियत जानोगे ताकि तुम धीरे-धीरे उन्हें समझकर हल कर सको, जीवन में एक पूर्णतः नई दिशा और लक्ष्य अपना सको और अपने अस्तित्व का ढंग पूरी तरह से बदल सको। अच्छा, आज की संगति यहीं समाप्त करते हैं। फिर मिलेंगे!

4 अप्रैल, 2013

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