15.3. सत्य को समझने और वास्तविकता में प्रवेश करने पर

433. अभी राज्य का युग है। तुमने इस नये युग में प्रवेश किया है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुमने वास्तव में परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया है या नहीं और उसके वचन तुम्हारे जीवन की वास्तविकता बन चुके हैं या नहीं। परमेश्वर का वचन सभी को बताया गया है ताकि सभी लोग अंत में, वचन के संसार में जिएँ और परमेश्वर का वचन प्रत्येक व्यक्ति को भीतर से प्रबुद्ध और रोशन कर देगा। यदि इस कालखण्ड के दौरान, तुम परमेश्वर के वचन को पढ़ने में जल्दबाज और लापरवाह हो और उसके वचन में तुम्हारी रुचि नहीं है तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी स्थिति में कहीं कुछ गड़बड़ है। यदि तुम वचन के युग में प्रवेश करने में असमर्थ हो तो पवित्र आत्मा तुम में कार्य नहीं करता है; यदि तुम इस युग में प्रवेश कर चुके हो तो वह तुम में अपना काम करेगा। तुम इस समय क्या कर सकते हो, जबकि वचन के युग का आरंभ हुआ है ताकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त कर सको? इस युग में परमेश्वर इसे तुम्हारे बीच वास्तविकता बनाएगा कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जियेगा, सत्य पर अमल करने योग्य बनेगा और ईमानदारीपूर्वक परमेश्वर से प्रेम करेगा; कि सभी लोग परमेश्वर के वचन को नींव के रूप में और अपनी वास्तविकता के रूप में ग्रहण करें, उनके हृदय में परमेश्वर के प्रति आदर हो और परमेश्वर के वचन पर अमल करके मनुष्य परमेश्वर के साथ मिलकर राज्य करे। परमेश्वर अपने इस कार्य को संपन्न करेगा। ... परमेश्वर मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिये वचन का उपयोग करता है; तुम जब वचन को खाते-पीते हो तो तुम्हें अच्छा महसूस होता है, यदि अच्छा महसूस नहीं होता, तब तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं है। परमेश्वर का वचन मनुष्यों का भोजन और उन्हें संचालित करने वाली शक्ति बन जाता है। बाइबल में लिखा है, "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्‍वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा।" यही वह कार्य है जो परमेश्वर आज संपन्न करेगा। वह तुम लोगों को इस सत्य का अनुभव करायेगा। ऐसा कैसे होता था कि प्राचीन समय में लोग परमेश्वर का वचन बिना पढ़े बहुत दिन रहते थे, पर खाते-पीते और काम करते थे? अब ऐसा क्यों नहीं होता? इस युग में परमेश्वर सब मनुष्यों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचन का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय किया जाता है, पूर्ण बनाया जाता है और तब अंत में राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्यों को जीवन दे सकता है, केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्यों को ज्योति और अमल करने का मार्ग दे सकता है, विशेषकर राज्य के युग में। यदि तुम परमेश्वर के वचन को खाते-पीते हो और परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं छोड़ते तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने का कार्य कर पाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'राज्य का युग वचन का युग है' से उद्धृत

434. इंसान के लिए आवश्यक सत्य परमेश्वर के वचनों में निहित है, और सत्य ही इंसान के लिए अत्यंत लाभदायक और सहायक होता है। तुम लोगों के शरीर को इस टॉनिक और पोषण की आवश्यकता है, इससे इंसान को अपनी सामान्य मानवीयता को फिर से प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह ऐसा सत्य है जो इंसान के अंदर होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, उतनी ही तेज़ी से तुम लोगों का जीवन विकसित होगा, और सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम आध्यात्मिक जगत की चीज़ों को उतनी ही स्पष्टता से देखोगे, और शैतान पर विजय पाने के लिए तुम्हारे अंदर उतनी ही ज़्यादा शक्ति होगी। जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करोगे, तो तुम लोग ऐसा बहुत-सा सत्य समझ जाओगे जो तुम लोग समझते नहीं हो। अधिकतर लोग अमल में अपने अनुभव को गहरा करने के बजाय महज़ परमेश्वर के वचनों के पाठ को समझकर और सिद्धांतों से लैस होकर ध्यान केंद्रित करके ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? तो उनके लिए यह कहावत "परमेश्वर के वचन जीवन हैं" वास्तविक कैसे हो सकती है? किसी इंसान का जीवन मात्र परमेश्वर के वचनों को पढ़कर विकसित नहीं हो सकता, बल्कि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाने से ही होता है। अगर तुम्हारी सोच यह है कि जीवन और आध्यात्मिक कद पाने के लिए परमेश्वर के वचनों को समझना ही पर्याप्त है, तो तुम्हारी समझ विकृत है। परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ तब पैदा होती है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, और तुम्हें यह समझ लेना चाहिए कि "इसे हमेशा सत्य पर अमल करके ही समझा जा सकता है।" आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों को जानते हो, लेकिन यह नहीं कह सकते कि तुम इन्हें समझते हो। कुछ लोगों का कहना है कि सत्य पर अमल करने का एकमात्र तरीका यह है कि पहले इसे समझा जाए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, निश्चय ही यह पूरे तौर पर सही तो नहीं है। सत्य का ज्ञान प्राप्त करने से पहले, तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया है। किसी उपदेश में कोई बात सुनकर यह मान लेना कि तुम समझ गए हो, सच्ची समझ नहीं होती—इसे महज़ सत्य को शाब्दिक रूप में समझना कहते हैं, यह उसमें छिपे सच्चे अर्थ को समझने के समान नहीं है। सत्य का सतही ज्ञान होने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में इसे समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करके आता है। इसलिए, जब तुम सत्य का अनुभव कर लेते हो, तो तुम इसे समझ सकते हो, और तभी तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। संकेतार्थों को और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना की एकमात्र तरीका है। इसलिए, तुम सत्य के साथ हर जगह जा सकते हो, लेकिन अगर तुम्हारे अंदर कोई सत्य नहीं है, तो फिर धार्मिक लोगों की तो छोड़ो, तुम अपने परिवारजनों तक को आश्वस्त करने का भी प्रयास करने की मत सोचना। सत्य के बिना तुम हवा में तैरते हिमकणों की तरह हो, लेकिन सत्य के साथ तुम प्रसन्न और मुक्त रह सकते हो, और कोई तुम पर आक्रमण नहीं कर सकता। कोई सिद्धांत कितना ही सशक्त क्यों न हो, लेकिन वह सत्य को परास्त नहीं कर सकता। सत्य के साथ, दुनिया को झुकाया जा सकता है और पर्वतों-समुद्रों को हिलाया जा सकता है, जबकि सत्य के अभाव में कीड़े-मकौड़े भी शहर की मज़बूत दीवारों को मिट्टी में मिला सकते हैं। यह एक स्पष्ट तथ्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

435. परमेश्वर के वचनों के सच्चे अर्थ की वास्तविक समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोच : "मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।" यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तूने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और तूने उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तू उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकता है, तो एक बार इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो जाने पर, यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तू परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार व्याख्या दे सकता है, इसका यह अर्थ नहीं है कि तू इन्हें समझता है। तू चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाये, तेरी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और उसके सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है कि उनके भीतर से सत्य को खोजना; केवल तभी तुम सच में समझ पाओगे कि परमेश्वर क्या कहता है। जब भी परमेश्वर बोलता है, तो वह निश्चित रूप से केवल सामान्यताओं में बात नहीं करता है। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य के भीतर ऐसे विवरण होते हैं जो परमेश्वर के वचनों में निश्चित रूप से प्रकट किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किया जा सकते हैं। जिस तरीके से परमेश्वर सत्य को अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और मनुष्य के सोचने के तरीके के माध्यम से उसे समझा नहीं किया जा सकता है। जब तक लोग प्रयास करते रहेंगे, तब तक वे सत्य के हर पहलू का पूरा अर्थ समझ सकते हैं; अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम इन्हें अनुभव कर सकते हो, शेष बचा विवरण पूरी तरह से तब भर दिया जाएगा जब पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, इस प्रकार वह तुम्हें इन ठोस अवस्थाओं की समझ देगा। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों को समझना, उन्हें पढ़ने के द्वारा उनकी विशिष्ट सामग्री को ढूंढना। दूसरा हिस्सा अनुभव के माध्यम से और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के निहितार्थ को समझना है। मुख्य रूप से इन दोनों तरीकों से ही परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ हासिल की जाती है। यदि तू उसके वचनों की व्याख्या शाब्दिक रूप से या अपनी स्वयं की सोच या कल्पना के चश्मे से करता है, तो परमेश्वर के वचनों की तेरी समझ वास्तविक नहीं है, भले ही तू कितनी भी वाक्पटुता से इनकी व्याख्या कर सकता हो। यह संभव है कि तू संदर्भ से बाहर भी उनका अर्थ निकाल लेऔर उनका ग़लत अर्थ निकाले, यह करना और भी अधिक तकलीफ़देह है। इस प्रकार, सत्य मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों का ज्ञान हासिल करने के माध्यम से पवित्र आत्मा से प्रबुद्धता प्राप्त करके प्राप्त किया जाता है। उसके वचनों के शाब्दिक अर्थ को समझना या उन्हें समझाने में सक्षम होना यह सत्य को प्राप्त करने के रूप में नहीं गिना जाता है। यदि तुझे केवल उसके वचनों की शाब्दिक व्याख्या करने की आवश्यकता होती, तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता का मतलब ही क्या होता? अगर ऐसा होता तो तुझे बस कुछ निश्चित स्तर की शिक्षा की आवश्यकता होती, और अशिक्षित काफी कठिन परिस्थितियों में होते। परमेश्वर का कार्य कुछ ऐसा नहीं है जिसे मानव मस्तिष्क द्वारा समझा जा सकता है। परमेश्वर के वचनों की एक सच्ची समझ मुख्य रूप से पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता पाने पर निर्भर करती है; सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया ऐसी ही है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

436. अगर तुम परमेश्वर के वचनों से परमेश्वर की इच्छा को और उसके कथनों के पीछे के अभिप्रायों को नहीं समझते हो, अगर तुम उन लक्ष्यों या परिणामों को नहीं समझते हो जिसे उसके वचन प्राप्त करना चाहते हैं, अगर तुम यह नहीं समझते हो कि उसके वचन मनुष्य में क्या पूर्ण और हासिल करना चाहते हैं, अगर तुम इन बातों को नहीं समझते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अभी तक सत्य को समझा नहीं है। परमेश्वर जो कहता है उसे क्यों कहता है? वह उस लहजे में क्यों बोलता है? वह अपने हर वचन में इतना ईमानदार और निष्कपट क्यों है? वह कुछ विशिष्ट वचनों को उपयोग के लिए क्यों चुनता है? क्या तुम जानते हो? अगर निश्चित होकर नहीं बता सकते, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर की इच्छा या उसके इरादों को नहीं समझते हो, तुम उनके वचनों के पीछे के संदर्भ को नहीं समझते हो। अगर तुम यह समझ नहीं पाते हो, तो तुम सत्य को कैसे प्राप्त कर सकते हो? सत्य को प्राप्त करने का अर्थ है उसके द्वारा बोले जाने वाले हर वचन के माध्यम से उसकी इच्छा को समझना; इसका अर्थ है समझ लेने के बाद परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर के वचनों को जीना और अपनी वास्तविकता बन जाने देना। तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचन को पूरी तरह से समझ लिए जाने पर ही तुम वास्तव में सत्य को समझ सकते हो। मात्र कुछ शब्द और सिद्धान्त समझकर तुम सोचते हो कि तुम सत्य समझते हो और तुम्हारे पास वास्तविकता है। यहाँ तक कि तुम कहते हो, "परमेश्वर चाहता है कि हम ईमानदार हों और हमने इसका अभ्यास किया है।" लेकिन तुम इसका कारण समझने में असफल हो जाते हो कि परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग ईमानदार हों और कपटी न हों, और साथ ही परमेश्वर क्यों चाहता है कि लोग उससे प्रेम करें। वास्तव में, लोगों से ऐसी अपेक्षा रखने में परमेश्वर का उद्देश्य है उनका उद्धार करना और उन्हें पूर्ण बनाना।

परमेश्वर उन लोगों के लिए सत्य व्यक्त करता है जिनमें सत्य की प्यास है, जो सत्य खोजते हैं और जो सत्य से प्रेम करते हैं। वे लोग जो शब्दों और सिद्धांतों में उलझे रहते हैं तथा लंबे, आडंबरपूर्ण भाषण देना पसंद करते हैं, वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएँगे; वे स्वयं को बेवकूफ बना रहे हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों के बारे में गलत दृष्टिकोण रखते हैं; जो सीधा है उसे पढ़ने के लिए वे अपनी गरदन उल्टी कर लेते हैं, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह गलत होता है। कुछ लोग केवल परमेश्वर के वचनों पर शोध करना जानते हैं और अध्ययन करते हैं कि वह आशीष पाने के बारे में और मनुष्य के गंतव्य के बारे में क्या कहता है। अगर परमेश्वर के वचन उनकी धारणाओं के अनुकूल नहीं होते हैं, तो वे नकारात्मक हो जाते हैं और अपना अनुसरण बंद कर देते हैं। यह दिखाता है कि उन्हें सत्य में कोई दिलचस्पी नहीं है। परिणामस्वरूप, वे सत्य को गंभीरता से नहीं लेते; वे बस अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सत्य को स्वीकारने में सक्षम हैं। भले ही वे परमेश्वर में अपने विश्वास को लेकर बेहद उत्साही हैं और कुछ अच्छे कर्म करने के लिए हरसंभव तरीके से प्रयास करते हैं और दूसरों के सामने खुद को अच्छे से पेश करते हैं, लेकिन वे यह सब केवल भविष्य में एक अच्छी मंज़िल पाने के लिए कर रहे हैं। इस तथ्य के बावजूद कि वे कलीसियाई जीवन से जुड़े हैं, सभी के साथ परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, उन्हें सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने और सत्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है। कुछ अन्य लोग भी हैं जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, लेकिन वे बस बिना रुचि के काम करते हैं; वे सोचते हैं कि उन्होंने बस कुछ शब्दों और सिद्धांतों को समझकर सत्य पा लिया है। वे कितने बेवकूफ हैं! परमेश्वर का वचन ही सत्य है। हालांकि, परमेश्वर के वचनों को पढ़ लेने के बाद तुम आवश्यक रूप से सत्य को न तो समझोगे, न सत्य को प्राप्त करोगे। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के बाद यदि तुम सत्य को हासिल करने में असफल हो जाते हो, तो तुमने बस शब्दों और सिद्धांतों को हासिल किया है। तुम नहीं जानते कि सत्य को प्राप्त करने का अर्थ क्या है। तुम अपनी हथेलियों में परमेश्वर के वचनों को रख सकते हो, लेकिन उन्हें पढ़ने के बाद भी तुम परमेश्वर की इच्छा को समझने में विफल रहते हो, तुम केवल कुछ शब्दों और सिद्धांतों को ही प्राप्त करते हो। सर्वप्रथम, तुम्हें पता होना चाहिए कि परमेश्वर के वचन समझने की दृष्टि से इतने सरल नहीं हैं; परमेश्वर के वचन में बहुत गहराई है। कई वर्षों के अनुभव के बगैर, तुम परमेश्वर के वचनों को संभवतः कैसे समझ सकते हो? परमेश्वर के वचनों के एक वाक्य को ही पूरी तरह अनुभव करने में तुम्हारा पूरा जीवन-काल लग जाएगा। तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हो, लेकिन परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हो; तुमने उसके वचनों के उद्देश्यों, उनके उद्गम, उस प्रभाव को नहीं समझा है जो वे प्राप्त करना चाहते हैं, या जो वे हासिल करना चाहते हैं। अगर तुम इनमें से कुछ भी नहीं समझते हो, तो तुम सत्य को कैसे समझ सकते हो? संभवतः तुमने परमेश्वर के वचनों को कई बार पढ़ा हो और शायद तुमने इसके कई अंशों को कंठस्थ कर लिया हो, लेकिन तुम अभी भी बिलकुल बदले नहीं हो, न ही तुमने कोई प्रगति की है। परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध हमेशा की तरह दूरस्थ और विरक्त है। तुम्हारे और परमेश्वर के बीच, पहले की ही तरह, अभी भी रुकावटें हैं। तुम्हें अभी भी उस पर संदेह है। न केवल तुम परमेश्वर को समझते नहीं हो, बल्कि तुम उसे बहाने देते हो और उसके प्रति धारणाएँ पालते हो। तुम उसका विरोध करते हो और उसका तिरस्कार भी करते हो। इसका अर्थ यह कैसे हो सकता है कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है?

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल वे ही अगुआई कर सकते हैं जिनके पास सत्य की वास्तविकता है' से उद्धृत

437. क्या सत्य के बारे में तुम लोगों की समझ तुम्हारी स्वयं की अवस्थाओं के साथ एकीकृत है? वास्तविक जीवन में, तुम्हें पहले यह सोचना है कि कौन से सत्‍य उन लोगों, चीज़ों, और वस्तुओं से सम्बन्ध रखते हैं जिनके समक्ष तुम आए हो; इन्हीं सत्‍यों के बीच तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो और जिसके समक्ष तुम आए हो उसे उसकी इच्छा के साथ जोड़ सकते हो। यदि तुम नहीं जानते हो कि सत्‍य का कौन सा पहलू उन चीज़ों से सम्बन्ध रखता है जिनका तुमने सामना किया है किन्तु सीधे जाकर परमेश्वर की इच्छा को खोजते हो, तो ऐसा दृष्टिकोण पूरी तरह से भुलावा है और परिणामों को प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि तुम सत्य की खोज करना और परमेश्वर की इच्छा को जानना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि किस प्रकार की चीज़े तुम्हारे ऊपर आयी हैं, वे सत्य के किस पहलू से सम्बन्ध रखती हैं, और परमेश्वर के वचनों में उस सत्य को देखना है जो तुम्‍हारे अनुभव से सम्बन्ध रखता है। तब तुम उस सत्‍य में अभ्यास के उस मार्ग को खोजते हो जो तुम्हारे लिए सही है; और इस तरह से तुम परमेश्वर की इच्छा की अप्रत्यक्ष समझ प्राप्त कर सकते हो। सत्य की खोज करना और उसका अभ्यास करना यांत्रिक रूप से किसी सिद्धांत को लागू करना या किसी सूत्र का अनुसरण करना नहीं है। सत्य सूत्रित नहीं होता है, न ही कोई व्यवस्था है। यह मृत नहीं है—यह जीवन है, यह एक जीवित चीज़ है, और यह वह नियम है जिसका अनुसरण प्राणी को अवश्य करना चाहिए और वह नियम है जिसे मनुष्य को अपने जीवन में अवश्य रखना चाहिए। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें अनुभव से और अधिक समझना होगा। तुम अपने अनुभव की किसी भी अवस्था पर क्यों न पहुँच चुके हो, तुम परमेश्वर के वचनों या सत्य से अवियोज्य हो, और तुम जो कुछ परमेश्वर के स्वभाव के बारे में समझते हो और तुम परमेश्वर के स्वरूप के बारे में जो कुछ समझते हो वे सभी परमेश्वर के वचनों में व्यक्त होते है; और वे सत्य से विकट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और उसका स्वरूप सभी अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप की एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर के स्वरूप को साकार करता है और इसे स्पष्ट रूप से बताता है; यह तुम्हें और अधिक सीधी तरह से बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है, और वह क्या पसंद नहीं करता है, वह तुमसे क्या कराना चाहता है और वह तुम्हें क्या करने की अनुमति नहीं देता है, वह किस प्रकार के लोगों से घृणा करता है और वह किस प्रकार के लोगों से प्रसन्न होता है। जिन सत्‍यों को परमेश्वर प्रकट करता है उनके पीछे लोग उसके आनन्द, क्रोध, दुःख, और खुशी, और साथ ही उसके सार को देख सकते हैं—यह उसके स्वभाव का प्रकट होना है। परमेश्वर के स्वभाव को जानने, और उसके वचन से उसके स्वभाव को समझने के अलावा, जो सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण है वह है व्यावहारिक अनुभव के द्वारा इस समझ तक पहुँचने की आवश्यकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने के लिए अपने आप को वास्तविक जीवन से हटा लेता है, तो वह उसे प्राप्त नहीं कर पाएगा। भले ही कुछ लोग हों जो परमेश्वर के वचन से कुछ समझ प्राप्त कर सकते हों, फिर भी यह सिद्धांतों और वचनों तक ही सीमित रहता है, और परमेश्वर वास्तव में जैसा है यह उसके साथ असमानता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III' से उद्धृत

438. प्रवेश करने की कोशिश करते समय, हर मामले की जाँच होनी चाहिए। सभी मामलों पर परमेश्वर के वचन और सत्य के अनुसार पूरी तरह से चिंतन किया जाना चाहिए ताकि तुम यह जान सको कि कैसे उन्हें इस तरह से कैसे करना है कि वो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हो। अपनी इच्छा से उत्पन्न होने वाली चीज़ें फिर त्यागी जा सकती हैं। तुम जानोगे कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चीज़ों को कैसे करें, और फिर तुम जाकर उन्हें करोगे; ऐसा लगेगा कि जैसे हर चीज़ अपना स्वाभाविक रूप ले रही है, और यह अत्यंत आसान प्रतीत होगा। सत्य से युक्त लोग चीज़ों को ऐसे करते हैं। तब तुम वास्तव में दूसरों को दिखा सकोगे कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है, और वे देखेंगे कि तुमने वाकई कुछ अच्छे काम किए हैं, तुम सिद्धांतों के अनुसार काम करते हो, और तुम हर काम सही ढंग से करते हो। ऐसा व्यक्ति वो होता है जो सत्य को समझता है और जिसके पास वास्तव में कुछ मानवीय सदृशता है। निश्चित रूप से, परमेश्वर के वचन ने लोगों में परिणाम हासिल किये हैं। एक बार जब लोग सत्य को सचमुच में समझ लेते हैं, तो वे अपने अस्तित्व की अवस्थाओं को समझ सकते हैं, जटिल मामलों की तह तक जा सकते हैं और अभ्यास करने का उचित तरीका जान सकते हैं। अगर तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम अपने अस्तित्व की अवस्था को नहीं समझ पाओगे। तुम खुद के खिलाफ विद्रोह करना चाहोगे, लेकिन तुम्हें यह मालूम नहीं होगा कि विद्रोह कैसे करें और तुम किसके खिलाफ विद्रोह कर रहे हो। तुम अपने हठ को त्यागना चाहोगे, लेकिन अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारा हठ सत्य के अनुरूप है, तो फिर तुम उसे कैसे त्याग सकते हो? तुम्हें शायद यह भी लगे कि इसे पवित्र आत्मा ने प्रबुद्ध किया है, इसलिए चाहे जो हो, तुम उसे त्यागने से इनकार करोगे। इस प्रकार, जब लोग सत्य को धारण नहीं करते, तो उनका यह सोचना लाजिमी है कि मानवीय अशुद्धियाँ, नेक इरादे, उलझन-भरा प्रेम, और मानवीय अभ्यास—हठ से उपजने वाली तमाम चीज़ें—सही हैं, और ये सत्य के अनुरूप हैं। तो फिर तुम इन चीज़ों के खिलाफ विद्रोह कैसे कर सकते हो? अगर तुम सत्य को नहीं समझते या नहीं जानते कि सत्य पर अमल करने का अर्थ क्या होता है, अगर तुम्हारी आँखेँ धुँधलाई हुई हैं और तुम्हें नहीं मालूम कि किस तरफ मुड़ना है, इसलिए तुम उसी आधार पर काम करते हो जो तुम्हें सही लगता है, तो तुम कुछ ऐसे कार्य करोगे, जो रास्ते से भटके हुए और ग़लत हैं, कुछ नियमों के अनुसार, कुछ उत्साह से उपजे हुए, कुछ शैतान से निकले हुए होंगे और इनसे गड़बड़ियाँ पैदा होंगी। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे इस तरह से कार्य करते हैं : थोड़ा बायीं ओर, फिर थोड़ा दायीं तरफ; एक पल सही, दूसरे पल भटके हुए; बिल्कुल भी कोई सत्यता नहीं। जो लोग सत्य धारण नहीं करते, वे सभी चीज़ों में एक बेतुका नज़रिया अपनाते हैं। ऐसे में, वे मामलों को सही ढंग से कैसे संभाल सकते हैं? वे किसी समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं? सत्य को समझना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के वचन समझने योग्य होना सत्य की समझ पर निर्भर है, और लोग जो सत्य समझ सकते हैं उसकी सीमा होती है। लोग अपनी पूरी ज़िंदगी परमेश्वर में विश्वास रखेँ, तब भी परमेश्वर के वचनों की उनकी समझ सीमित ही होगी। जो लोग अपेक्षाकृत थोड़े अनुभवी हैं वे भी ज़्यादा-से-ज़्यादा उस स्थिति तक पहुँच सकते हैं जहां वे ऐसे काम बंद कर सकें जिनसे स्पष्ट रूप से परमेश्वर का प्रतिरोध होता है, ऐसे काम बंद कर सकें जो स्पष्ट रूप से बुरे हों और जो किसी भी व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचाते। उनके लिए उस अवस्था में पहुँचना मुमकिन नहीं है, जहां उनके हठ का कोई अंश शामिल न हो। ऐसा इसलिए क्योंकि लोग सामान्य बातें सोचते हैं, और उनकी थोड़ी सोच परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होती है, और समझ-बूझ के एक ऐसे पहलू से संबंधित होती है जिसे हठ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। फिर भी, मुख्य बात हठ के उन अंशों को समझना है जो परमेश्वर के वचनों के विरुद्ध हैं, सत्य के विरुद्ध हैं, और पवित्र आत्मा के प्रबोधन के विरुद्ध हैं। इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जानने का प्रयास करना चाहिए, सत्य को समझ कर ही तुम विवेक पा सकते हो।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है' से उद्धृत

439. अगर तुम लोगों ने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं, लेकिन केवल पाठ के अर्थ को समझा है और तुममें अपने व्यवहारिक अनुभव से परमेश्वर के वचनों का प्रत्यक्ष ज्ञान का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं समझोगे। तुम्हारे विचार से, परमेश्वर के वचन जीवन नहीं हैं, बल्कि महज़ बेजान शब्द हैं। और अगर तुम केवल बेजान शब्दों का पालन करते रहोगे, तब न तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को ग्रहण कर पाओगे, न ही उसकी इच्छा को समझ पाओगे। जब तुम अपने वास्तविक अनुभव में उसके वचनों का अनुभव कर लोगे, तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने स्वयं को प्रकट करेगा, और अनुभव से ही तुम बहुत-से सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को ग्रहण कर पाओगे और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल पाओगे। अगर तुम इन्हें अमल में न लाओ, तो उसके वचन कितने भी स्पष्ट क्यों न हों, तुमने बस उन खोखले शब्दों और सिद्धांतों को ही ग्रहण किया है, जो तुम्हारे लिए धर्म संबंधी नियम बन चुके हैं। क्या यही फरीसियों ने नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अमल में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यवहारिक बन जाएंगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज़्यादा कुछ नहीं है। दरअसल, तुम लोगों द्वारा परमेश्वर में विश्वास रखने की प्रक्रिया ही उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है, या इसे और अधिक साफ तौर कहें तो, परमेश्वर में विश्वास रखना उसके वचनों को जानना, समझना, उनका अनुभव करना और उन्हें जीना है; परमेश्वर में तुम लोगों की आस्था की सच्चाई ऐसी ही है। अगर तुम लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हो और अनंत जीवन पाने की आशा करते हो लेकिन परमेश्वर के वचनों को इस प्रकार अमल में लाने का प्रयास नहीं करते मानो कि वह ऐसी कोई चीज़ है जो तुम्हारे भीतर है, तो तुम मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जा कर केवल भोज्य-पदार्थों को देखा और उनमें से किसी भी चीज़ का स्वाद चखे बिना स्वादिष्ट चीज़ों को रट लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

440. मूलत:, तुम लोगों का लक्ष्य परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर प्रभाव ग्रहण करने देना है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों के अपने अभ्यास में वचनों की सच्ची समझ हासिल करना है। शायद परमेश्वर के वचनों को समझने की तुम्हारी क्षमता थोड़ी कच्ची है, लेकिन जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हो, तो वह इस दोष को दूर कर सकता है, तो तुम लोगों को न केवल बहुत-से सत्यों को जानना चाहिए, बल्कि तुम्हें उनका अभ्यास भी करना चाहिए। यह सबसे महत्वपूर्ण केंद्र-बिंदु है जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यीशु भी ने अपने साढ़े तैंतीस वर्षों में बहुत से अपमान सहे और बहुत कष्ट उठाए। उसने इतने अधिक कष्ट केवल इसलिए उठाए क्योंकि उसने, सत्य पर अमल किया, सभी चीज़ों में परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया, और केवल परमेश्वर की इच्छा की ही परवाह की। अगर उसने सत्य पर अमल किए बिना उसे जान लिया होता तो वह ये कष्ट न उठाता। अगर यीशु ने यहूदियों की शिक्षाओं का पालन किया होता और फरीसियों का अनुसरण किया होता, तो उसने कष्ट न उठाए होते। तुम यीशु के कर्मों से सीख सकते हो कि इंसान पर परमेश्वर के कार्य की प्रभावशीलता इंसान के सहयोग से ही आती है, यह बात तुम लोगों को समझ लेनी चाहिए। अगर यीशु ने सत्य पर अमल न किया होता, तो क्या उसने वो दुख उठाए होते जो सूली पर उठाए? अगर उसने परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य न किया होता तो क्या वह ऐसी दर्दभरी प्रार्थना कर पाता? इसलिए, तुम लोगों को सत्य के अभ्यास की खातिर कष्ट उठाने चाहिए; इंसान को इस तरह के कष्ट उठाने चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए' से उद्धृत

441. परमेश्वर पर उनके विश्वास के समय से आज तक, लोगों ने कई ग़लत प्रेरणाओं को आश्रय दिया है। जब तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे होते हो, तो तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारी सभी प्रेरणाएँ उचित हैं, किन्तु जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भीतर बहुत सी गलत प्रेरणाएँ हैं। इस प्रकार, जब परमेश्वर लोगों को सिद्ध बनाता है, तो वह उन्हें महसूस करवाता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएँ हैं जो परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान को अवरुद्ध कर रही हैं। जब तुम्हारी समझ में आता है कि तुम्हारी प्रेरणाएँ ग़लत हैं, तब यदि तुम अपनी धारणाओं और प्रेरणाओं के अनुसार अभ्यास करना छोड़ पाते हो, और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाते हो और तुम्हारे साथ घटित होने वाली प्रत्येक बात में अपनी स्थिति पर डटे रहते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने देह के विरूद्ध विद्रोह किया है। जब तुम देह के विरूद्ध विद्रोह करोगे, तो तुम्हारे भीतर अपरिहार्य रूप से एक संघर्ष होगा। शैतान कोशिश करके लोगों से अपना अनुसरण करवाएगा, कोशिश करके उन्हें देह की धारणाओं का अनुसरण करवाएगा और देह के हितों को बनाए रखवाएगा—किन्तु परमेश्वर के वचन भीतर से लोगों को प्रबुद्ध करेंगे और रोशनी प्रदान करेंगे, और इस समय यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करो या शैतान का अनुसरण करो। परमेश्वर लोगों से मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों से निपटने, उनके विचारों और धारणाओं से, जो परमेश्वर के मनोनुकूल नहीं हैं, निपटने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है। पवित्र आत्मा लोगों के हृदय में स्पर्श करता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है उन सब के पीछे एक संघर्ष होता है: प्रत्येक बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के लिए प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है, और यद्यपि देह के साथ सभी अच्छे दिखाई दे सकते हैं, किन्तु, वास्तव में, उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होगा—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद ही, एक अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार तय की जा सकती है। कोई यह नहीं जानता है कि रोया जाए या हँसा जाए। क्योंकि मनुष्यों के भीतर की बहुत सी प्रेरणाएँ ग़लत हैं, या फिर क्योंकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं से विलक्षण होता है, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने के पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शुद्धिकरण को सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य का अभ्यास करते हुए एक व्यक्ति का पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने की आवश्यकता नहीं होती, और कोई संघर्ष नहीं होता और वे पीड़ित नहीं होते। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीज़ें हैं जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए उचित नहीं हैं, और देह का अधिक विद्रोही स्वभाव है, जिससे लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है जिससे लोगों को उसके साथ गुज़रने के लिए उसने कहा है। जब कठिनाइयों से तुम्हारा सामना होता है, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो: "हे परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कठिनाई को सहना चाहता हूँ, और इस बात की परवाह किए बिना कि मैं कितनी बड़ी असफलताओं का सामना करता हूँ, मुझे तब भी अवश्य तुझे संतुष्ट करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि मुझे अपना सम्पूर्ण जीवन भी त्यागना पड़े, तब भी मुझे अवश्य तुझे संतुष्ट करना चाहिए!" इस संकल्प के साथ, जब तुम इस प्रकार प्रार्थना करोगे तो तुम अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे। हर बार जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तब हर बार वे शुद्धिकरण से गुज़रते हैं, हर बार उन्हें आजमाया जाता है, और हर बार जब परमेश्वर का कार्य उन पर आता है, तो लोग चरम पीड़ा को सहते हैं। यह सब लोगों के लिए एक परीक्षा है, और इसलिए उन सबके भीतर एक संघर्ष होता है। यही वह वास्तविक मूल्य है जो वे चुकाते हैं। परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ना तथा अधिक दौड़-भाग करना कुछ हद तक एक क़ीमत है। यही लोगों को करना चाहिए, यह उनका कर्तव्य, और उनकी ज़िम्मेदारी है जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, किन्तु लोगों को उनके भीतर की उन बातों को अवश्य एक ओर रखना चाहिए जिन्हें एक ओर रखे जाने की आवश्यकता है। यदि तुम ऐसा नहीं करते हो, तो चाहे तुम्हारी बाह्य पीड़ाएँ कितनी भी अधिक क्यों न हों, और चाहे तुम कितनी ही भाग-दौड़ क्यों न कर लो, सब व्यर्थ रहेगा! कहने का अर्थ है कि, केवल तुम्हारे भीतर के बदलाव ही निर्धारित कर सकते हैं कि तुम्हारी बाहरी कठिनाई का कोई मूल्य है या नहीं। जब तुम्हारा आंतरिक स्वभाव बदल जाता है और तुम सत्य को अभ्यास में ले आते हो, तब तुम्हारी समस्त बाहरी पीड़ाओं को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त हो जाएगा; यदि तुम्हारे आंतरिक स्वभाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तो चाहे तुम कितनी ही पीड़ा क्यों न सह लो या तुम बाहर कितनी ही दौड़-भाग क्यों न कर लो, परमेश्वर की ओर से कोई अनुमोदन नहीं होगा—और ऐसी कठिनाई व्यर्थ है जो परमेश्वर के द्वारा अनुमोदित नहीं है। इसलिए, तुम्हारे द्वारा जो क़ीमत चुकाई गई है परमेश्वर द्वारा स्वीकृत है या नहीं, यह इस बात से निर्धारित होता है कि तुम्हारे भीतर कोई बदलाव आया है या नहीं, और कि परमेश्वर की इच्छा की संतुष्टि, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति वफादारी को प्राप्त करने के लिए तुम सत्य को अभ्यास में लाते हो या नहीं, और अपनी स्वयं की प्रेरणाओं और धारणाओं के विरूद्ध विद्रोह करते हो या नहीं। चाहे तुम कितनी ही भाग-दौड़ क्यों न करो, यदि तुमने कभी भी अपनी स्वयं की प्रेरणाओं के विरूद्ध विद्रोह करना नहीं जाना है, तुम केवल बाहरी कार्यकलापों और जोश को ही खोजते हो, और कभी भी अपने जीवन पर ध्यान नहीं देते हो, तो तुम्हारी कठिनाईयाँ व्यर्थ रही होंगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है' से उद्धृत

442. लोगों के विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं

कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिनाईयों को सह सकते हैं; वे क़ीमत चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा होता है; वे बहुत आदरणीय होते हैं; और उनके पास अन्य लोगों की सराहना होती है। तुम लोग क्या सोचते हो: क्या इस प्रकार के बाहरी आचरण को, सत्य को अभ्यास में लाने के रूप में माना जा सकता है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहा है? ऐसा क्यों है कि बार-बार लोग इस प्रकार के व्यक्तियों को देखते हैं और सोचते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, यह सोचते हैं कि वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? क्यों कुछ लोग इस प्रकार सोचते हैं? इसका केवल एक ही स्पष्टीकरण है। और वह स्पष्टीकरण क्या है? स्पष्टीकरण यह है कि बहुत से लोगों को, ऐसे प्रश्न जैसे कि सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और सत्य की यथार्थता का होना वास्तव में क्या है—ये बहुत स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग हैं जिन्हें अक्सर ऐसे लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जो बाहर से आध्यात्मिक प्रतीत होते हैं, कुलीन प्रतीत होते हैं, उत्कृष्ट छवि वाले प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो पत्रों एवं सिद्धान्तों के बारे में बोल सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो जो लोग उनके द्वारा धोखा दिए गए हैं उन्होंनेने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धान्तों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं इसे कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है। और उन्होंने कभी भी अच्छी तरह से नहीं देखा है कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानते हैं और दुष्टता से दूर रहते हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना है। इसके बजाय, परिचित होने के पहले कदम से ही, थोड़ा-थोड़ा करके, वे इन लोगों की तारीफ करने, और इन लोगों का आदर करने लगते हैं, अन्त में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं कि वे अपने परिवारों एवं नौकरियों को छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर क़ीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और ऐसे लोग हैं जो वास्तव में एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल को प्राप्त कर सकते हैं। उनके मन में, ये आदर्श ऐसे लोग हैं जिनकी प्रशंसा परमेश्वर करता है। किस कारण से लोग इस प्रकार का विश्वास रखते हैं? इस मुद्दे का सार क्या है? यह कौन से परिणामों की ओर ले जा सकता है? आओ, हम सबसे पहले इसके सार के मामले में चर्चा करें।

लोगों के दृष्टिकोणों, लोगों के अभ्यासों, लोग अभ्यास करने के लिए किन सिद्धान्तों को चुनते हैं, और हर कोई सामान्य तौर पर किस चीज़ पर जोर देता है, इन सबसे संबंधित मुद्दों का अनिवार्य रूप से मनुष्यजाति से परमेश्वर की माँगों से कोई लेना देना नहीं है। चाहे लोग उथले मसलों पर ध्यान केन्द्रित करें या गंभीर मसलों पर, पत्रों एवं सिद्धान्तों करें पर या वास्तविकता पर, लोग उसके मुताबिक नहीं चलते हैं जिस के मुताबिक उन्हें सबसे अधिक चलना चाहिए, और वे उसे नहीं जानते हैं जो उन्हें सबसे अधिक जानना चाहिए। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिल्कुल भी पसन्द नहीं करते हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धान्तों को खोजने और उनका अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बजाय, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिन्हें वे समझते हैं, जिन्हें वे जानते हैं, उसे अच्छा अभ्यास और अच्छा व्यवहार सारांशित करते हैं। तब यह सारांश, खोज करने के लिए उनका स्वयं का लक्ष्य बन जाता है, अभ्यास किया जाने वाला सत्य बन जाता है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ऐसे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में लाने के स्थान पर अच्छे मानवीय व्यवहार को उपयोग में लाते हैं, जो परमेश्वर का अनुग्रह पाने हेतु खुशामद करने की लोगों की अभिलाषाओं को भी संतुष्ट करता है। यह सत्य के साथ संघर्ष करने के लिए लोगों को पूँजी देता है जिसे वे परमेश्वर के साथ तर्क करने तथा प्रतिस्पर्द्धा करने के लिए भी उपयोग करते हैं। साथ ही, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और अपने हृदय के आदर्शों को परमेश्वर के स्थान में रख देते हैं। केवल एक ही मूल कारण है जो लोगों से ऐसे अज्ञानता भरे कार्य, अज्ञानता भरे दृष्टिकोण, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास करवाता है, और आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा। कारण यह है कि भले ही लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर की इच्छा को वास्तव में नहीं समझते हैं। यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, यह समझता है कि परमेश्वर क्या पसन्द करता है, किस चीज़ से परमेश्वर घृणा करता है, परमेश्वर क्या चाहता है, किस चीज़ को परमेश्वर अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर नापसन्द करता है, मनुष्य पर अपनी माँगों के प्रति परमेश्वर किस प्रकार का मानक लागू करता है, मनुष्य को सिद्ध करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति को अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति के पास अपना व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति उनका आदर्श बन सकता है? यदि कोई परमेश्वर की इच्छा को समझता है, तो उनका दृष्टिकोण उसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्क-संगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करते है, न ही वे, सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धान्तों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

443. तुम अपना हृदय और शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्यार परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उसके सामने रख सकते हो, उसके प्रति पूरी तरह से आज्ञाकारी हो सकते हो, और उसकी इच्छा के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो। शरीर के लिए नहीं, परिवार के लिए नहीं, और अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं के लिए नहीं, बल्कि परमेश्वर के परिवार के हित के लिए। तुम परमेश्वर के वचन को हर चीज में सिद्धांत के रूप में, नींव के रूप में ले सकते हो। इस तरह, तुम्हारे इरादे और तुम्हारे दृष्टिकोण सब सही जगह पर होंगे, और तुम ऐसे व्यक्ति होओगे जो परमेश्‍वर के सामने उसकी प्रशंसा प्राप्त करता है। जिन लोगों को परमेश्वर पसंद करता है ये वे लोग हैं जो पूर्णतः उसकी ओर हैं, वे लोग हैं जो उसके प्रति समर्पित हैं तथा किसी अन्य के प्रति नहीं। जिनसे वह घृणा करता है ये वे लोग हैं जो उसके साथ में आधा-अधूरे मन से हैं, और जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उन लोगों से घृणा करता है जो उस पर विश्वास करते हैं और हमेशा उसका आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए स्वयं को पूरी तरह से व्यय नहीं कर सकते हैं। वह उन से घृणा करता है जो कहते हैं कि वे उससे प्यार करते हैं, लेकिन अपने हृदय में उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उनसे घृणा करता है जो धोखा देने के लिए लच्छेदार वचनों का उपयोग करते हैं। जिन लोगों का परमेश्वर के प्रति वास्तविक समर्पण या उसके प्रति वास्तविक आज्ञाकारिता नहीं है, वे विश्वासघाती लोग हैं; वे प्राकृतिक रूप से अत्यधिक अभिमानी हैं। जो लोग सामान्य, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने सचमुच में आज्ञाकारी नहीं हो सकते हैं वे और भी अधिक अभिमानी हैं, और वे विशेष रूप से महादूत के कर्त्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। जो लोग वास्तव में खुद को परमेश्वर के लिए व्यय करते हैं वे उसके सामने अपना पूरा अस्तित्व रख देते हैं। वे वास्तव में उसके सभी कथनों का पालन करते हैं, और वे उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम होते हैं। वे परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव बनाते हैं, और वे परमेश्वर के वचन में अभ्यास के हिस्सों को वास्तविक रूप से तलाश करने में सक्षम होते हैं। यह कोई ऐसा है जो वास्तव में परमेश्वर के सामने रहता है। यदि तुम जो करते हो वह तुम्हारे जीवन के लिए लाभदायक है, और उसके वचनों को खाने और पीने के द्वारा, तुम अपनी आंतरिक आवश्यकताओं और अपर्याप्तताओं को पूरा कर सकते हो ताकि तुम्हारा जीवन स्वभाव रूपान्तरित हो जाए, तो यह परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करेगा। यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हो, यदि तुम शरीर को संतुष्ट नहीं करते हो, बल्कि उसकी इच्छा को संतुष्ट करते हो, तो यह उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना है। जब परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में अधिक वास्तविकता से प्रवेश करने के बारे में बात करते हैं, तो इसका अर्थ है कि तुम अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हो और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो। केवल इस प्रकार के व्यावहारिक कार्यों को ही उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना कहा जा सकता है। यदि तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम हो, तो तुममें सच्चाई है। यह वास्तविकता में प्रवेश करने की शुरुआत है; तुम्हें सबसे पहले यह प्रशिक्षण अवश्य पूरा करना चाहिए और केवल उसके बाद ही तुम गहरी वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

444. वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए इंसान को सबकुछ वास्तविक जीवन की ओर मोड़ देना चाहिए। यदि परमेश्वर में विश्वास रखने में, लोग वास्तविक जीवन में प्रवेश करके खुद को न जान पाएँ, और वे वास्तविक जीवन में सामान्य इंसानियत को न जी पाएँ, तो वे विफल हो जाएँगे। जो लोग परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते, वे सब ऐसे लोग हैं जो वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं कर सकते। वे सब ऐसे लोग हैं जो मनुष्यत्व के बारे में बात करते हैं, परंतु दुष्टात्माओं की प्रकृति को जीते हैं। वे सब ऐसे लोग हैं जो सत्य के बारे में बात करते हैं परंतु सिद्धांतों को जीते हैं। जो लोग वास्तविक जीवन में सत्य के साथ नहीं जी सकते, वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं परंतु वे उसके द्वारा घृणित और अस्वीकृत माने जाते हैं। तुम्हें वास्तविक जीवन में प्रवेश करने का अभ्यास करना है, अपनी कमियों, अवज्ञाकारिता, और अज्ञानता को जानना है, और अपने असामान्य मनुष्यत्व और अपनी कमियों को जानना है। इस तरह से, तुम्हारा ज्ञान तुम्हारी वास्तविक स्थिति और कठिनाइयों के साथ एकीकृत हो जाएगा। केवल इस प्रकार का ज्ञान वास्तविक होता है और इससे ही तुम अपनी दशा को सचमुच समझ सकते हो और स्वभाव-संबंधी परिवर्तनों को प्राप्त कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कलीसियाई जीवन और वास्तविक जीवन पर विचार-विमर्श' से उद्धृत

445. राज्य के अच्छे सैनिक उन लोगों के समूह के रूप में प्रशिक्षित नहीं होते जो मात्र वास्तविकता की बातें करते हैं या डींगें मारते हैं; बल्कि वे हर समय परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रशिक्षित होते हैं, ताकि किसी भी असफलता को सामने पाकर वे झुके बिना लगातार परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकें और वे फिर से संसार में न जाएँ। इसी वास्तविकता के विषय में परमेश्वर बात करता है; और मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न समझो। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है। मनुष्य का आध्यात्मिक कद ऐसा नहीं है, अपितु यह परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य का कोई योगदान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहनी होगी और इसके अलावा उसमें पतरस का गौरव होना चाहिए जिसे वे परमेश्वर के कार्य प्राप्त कर लेने के बाद जीते हैं। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह मत सोचो चूँकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो इसलिए तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह एक भ्रम है। यह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं है और इसके कोई वास्तविक मायने नहीं हैं। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! वे सभी जो परमेश्वर के वचनों की गलत समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, उनमें वास्तविक आध्यात्मिक कद होने का तो सवाल ही नहीं है; वे वास्तविकता रहित अज्ञानी लोग हैं। कहने का अर्थ यह है कि वे सभी जो परमेश्वर के वचनों के सार से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर की इच्छा प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा बनाना है जिससे वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। न कि उसे ऐसा व्यक्ति बनाना कि वह केवल वास्तविकता के विषय में बात करे, बल्कि इस योग्य बनाना है कि हर कोई उसके वचनों की वास्तविकता को जी सके।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है' से उद्धृत

446. परमेश्वर वास्तविकता का परमेश्वर है: उसका समस्त कार्य वास्तविक है, उसके द्वारा कहे गए सभी वचन वास्तविक हैं, और उसके द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्य वास्तविक हैं। ऐसी हर चीज़ जो उसके वचन नहीं हैं वे खोखले, अस्तित्वहीन और अनुचित हैं। आज, पवित्र आत्मा परमेश्वर के वचनों में लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए है। यदि लोगों को वास्तविकता में प्रवेश के मार्ग की खोज करनी है, तो उन्हें अवश्य वास्तविकता को ढूँढ़ना, और वास्तविकता को जानना चाहिए, जिसके बाद उन्हें अवश्य वास्तविकता का अनुभव करना चाहिए, और वास्तविकता को जीना चाहिए। लोग जितना अधिक वास्तविकता को जानते हैं, वे उतना ही अधिक यह बताने में समर्थ होते हैं कि दूसरों के वचन वास्तविक हैं या नहीं; लोग जितना अधिक वास्तविकता को जानते हैं, उनकी उतनी ही कम धारणाएँ होती हैं; लोग जितना अधिक वास्तविकता का अनुभव करते हैं, वे उतना ही अधिक वास्तविकता के परमेश्वर के कर्मों को जानते हैं, और उनके लिए अपने भ्रष्ट, शैतानी स्वभावों के बंधन से मुक्त होना उतना ही अधिक आसान होता है; लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे उतना ही अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और उतना ही अधिक देह से घृणा और सत्य से प्रेम करते हैं; और लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों के उतना ही अधिक करीब होते हैं। जो लोग परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए जाते हैं ये वे लोग हैं जो वास्तविकता से सम्पन्न हैं, जो वास्तविकता को जानते हैं और जिन्हें वास्तविकता का अनुभव करने के माध्यम से परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का पता चल गया है। जितना अधिक तुम सचमुच परमेश्वर के साथ सहयोग करोगे और अपने शरीर को अनुशासित करोगे, उतना ही अधिक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को अर्जित करोगे, उतना ही अधिक तुम वास्तविकता को प्राप्त करोगे, और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के द्वारा प्रबुद्ध किए जाओगे—और इस प्रकार उतना ही अधिक परमेश्वर के वास्तविक कर्मों का तुम्हारा ज्ञान होगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश में रहने में समर्थ हो, तो अभ्यास का वर्तमान मार्ग तुम्हें और अधिक स्पष्ट हो जाएगा, और तुम अतीत की धार्मिक धारणाओं एवं पुराने अभ्यासों से अपने आपको अलग करने में और भी अधिक सक्षम हो जाओगे। आज वास्तविकता केन्द्र बिंदु है: लोगों में जितनी अधिक वास्तविकता होगी, सत्य का उनका ज्ञान उतना ही अधिक स्पष्ट होगा, और उतनी ही अधिक विशाल परमेश्वर की इच्छा की उनकी समझ होगी। वास्तविकता सभी पत्रों और सिद्धांतों पर विजय पा सकती है, यह समस्त सिद्धान्त और विशेषज्ञता पर विजय पा सकती है, और लोग जितना अधिक वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, उतना ही अधिक सचमुच में वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, और उसके वचनों के लिए भूखे एवं प्यासे होते हैं। यदि तुम हमेशा वास्तविकता पर ध्यान केन्द्रित करते हो, तो तुम्हारा जीवन दर्शन, धार्मिक धारणाएँ एवं प्राकृतिक चरित्र परमेश्वर के कार्य का अनुसरण करने से स्वाभाविक रूप से मिटा दिया जाएगा। जो वास्तविकता की खोज नहीं करते हैं, और जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उनकी उस चीज की खोज करने की संभावना है जो अलौकिक है, और उनके साथ आसानी से छल किया जाएगा। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों में कार्य का कोई उपाय नहीं है, और इसलिए वे खालीपन महसूस करते हैं, और उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता को कैसे जानें' से उद्धृत

447. जितना अधिक तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे, उतना ही अधिक तुम सत्य को धारण किए रहोगे; जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम तुम्हारे भीतर रहेगा; और जितना अधिक तुम सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक परमेश्वर की आशीष तुम पर होगी। यदि तुम हमेशा इसी प्रकार से अभ्यास करते रहोगे, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के प्रेम को अपने भीतर देखोगे, जैसे पतरस ने परमेश्वर को जाना था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास स्वर्ग और पृथ्वी तथा उसमें मौजूद हर एक चीज को बनाने की बुद्धि है, परन्तु इसके अलावा, उसके पास मनुष्यों के मध्य में वास्तविक कार्य करने की बुद्धि भी है। पतरस कहता है कि स्वर्ग और पृथ्वी तथा उसमें मौजूद सभी चीज़ों को बनाने के कारण, वह न केवल मनुष्यों के प्रेम के योग्य है, बल्कि, मनुष्य को बनाने, उन्हें बचाने, पूर्ण बनाने और अपने प्रेम को उत्तराधिकार में देने की योग्यता रखता है। इसलिए, पतरस ने कहा कि उसमें ऐसा और भी बहुत कुछ है जो परमेश्वर को मनुष्यों के प्रेम के और भी अधिक योग्य बनाता है। पतरस ने यीशु से कहा, "क्या तू स्वर्ग और पृथ्वी और उसमें मौजूद सभी बातों को बनाने से कहीं अधिक अन्य कारणों से मनुष्यों के प्रेम के योग्य नहीं है? तुम्हारे भीतर और भी बहुत कुछ है जो प्रेम करने के योग्य है, तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते हो और घूमते-फिरते हो, तुम्हारी आत्मा मुझे भीतर तक छूती है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मेरी निंदा करते हो—ये बातें तुम्हें मनुष्यों के प्रेम के लिये और भी अधिक योग्य बनाती हैं।" यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविक जीवन में इसे खोजना और पता लगाना होगा, और अपनी देह की इच्छाओं को एक तरफ रखने को तैयार रहना होगा। तुम्हें यह संकल्प करना होगाः ऐसा संकल्पी बनना होगा जो सभी बातों में परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य हो, जिसमें आलस या देह के आनन्द की अभिलाषा न हो, मात्र देह की इच्छाओं के लिए जीवित न हो बल्कि परमेश्वर के लिए जीवित रहे। ऐसा भी समय हो सकता है जब तुम परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर पाओ। ऐसा इसलिए क्योंकि तुम परमेश्वर की इच्छा को नहीं जानते हो; अगली बार, हो सकता है कि इसमें अत्यधिक प्रयास करना पड़े, तुम उसे संतुष्ट करोगे, न कि देह की इच्छाओं को संतुष्ट करोगे। जब तुम इस प्रकार से अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानोगे। तब तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी तथा जो कुछ भी उसमें है उसे बना सकता है, कि वह देहधारी हुआ ताकि लोग वास्तव में और असली में उसे देख सकें, और उसके साथ हकीकत में जुड़ सकें, कि वह मनुष्यों के मध्य चल सकता है, उसका आत्मा लोगों को वास्तविक जीवन में पूर्ण बना सकता है, और उसकी सुंदरता को देखा जा सकता है तथा उसके अनुशासन, दण्ड और आशीषों को अनुभव किया जा सकता है। यदि तुम हमेशा इस प्रकार से अनुभव करते रहोगे, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे और यदि एक दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य सम्बन्ध समाप्त हो जाए, तो तुम उस तिरस्कार को सहन कर पाओगे और पश्चाताप को महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा सामान्य सम्बन्ध होगा तो तुम कभी भी परमेश्वर को छोड़ने की इच्छा नहीं करोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहेगा कि वह तुम्हें छोड़ रहा है, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और तुम कहोगे कि परमेश्वर के द्वारा छोड़े जाने से अच्छा तो मर जाना है। जैसे ही तुम में इस प्रकार की भावनाएं आएंगी, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे, और इस प्रकार से तुम्हारी नींव बनेगी, और तुम निश्चय ही परमेश्वर के प्रेम का आनन्द लोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे' से उद्धृत

448. बहुत लोग अभ्यास के बारे में थोड़ी बात कर सकते हैं और वे अपने व्यक्तिगत विचारों के बारे में बात कर सकते हैं, लेकिन इसमें से अधिकांश दूसरों के वचनों से प्राप्त होने वाला प्रकाश होता है। इसमें उनके अपने व्यक्तिगत अभ्यासों से कुछ भी शामिल नहीं होता, न ही इसमें ऐसा कुछ शामिल होता है, जिसे उन्होंने अपने अनुभवों से देखा हो। मैं पहले इस मुद्दे की चीर-फाड़ कर चुका हूँ; यह मत सोचो कि मुझे कुछ पता नहीं है। तुम केवल कागज़ी शेर हो, और बात तुम शैतान पर विजय पाने, विजय के साक्ष्य वहन करने और परमेश्वर की छवि को जीने की करते हो? यह सब बकवास है! क्या तुम्हें लगता है कि आज परमेश्वर द्वारा बोले गए सभी वचन तुम्हारी सराहना पाने के लिए हैं? मुँह से तुम अपने पुराने स्वभाव को त्यागने और सत्य का अभ्यास करने की बात करते हो, और तुम्हारे हाथ दूसरे कर्म कर रहे हैं और तुम्हारा हृदय दूसरी योजनाओं की साजिश कर रहा है—तुम किस तरह के व्यक्ति हो? तुम्हारा हृदय और तुम्हारे हाथ एक क्यों नहीं हैं? इतने सारे उपदेश खोखले शब्द हो गए हैं; क्या यह हृदय तोड़ने वाली बात नहीं है? यदि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास करने में असमर्थ हो, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने अभी तक पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश नहीं किया है, तुम्हारे अंदर अभी तक पवित्र आत्मा का कार्य नहीं हुआ है, और तुम्हें अभी तक उसका मार्गदर्शन नहीं मिला है। यदि तुम कहते हो कि तुम केवल परमेश्वर के वचन को समझने में समर्थ हो, लेकिन उसका अभ्यास करने में समर्थ नहीं हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो सत्य से प्रेम नहीं करता। परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति को बचाने के लिए नहीं आता। यीशु को जब पापियों, गरीबों और सभी विनम्र लोगों को बचाने के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था, तो उसे बहुत पीड़ा हुई थी। उसके सलीब पर चढ़ने की प्रक्रिया ने पापबलि का काम किया था। यदि तुम परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर सकते, तो तुम्हें जितनी जल्दी हो सके, चले जाना चाहिए; एक मुफ्तखोर के रूप में परमेश्वर के घर में पड़े मत रहो। बहुत-से लोग तो स्वयं को ऐसी चीज़ें करने से रोकने में भी कठिनाई महसूस करते हैं, जो स्पष्टत: परमेश्वर का विरोध करती हैं। क्या वे मृत्यु नहीं माँग रहे हैं? वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की बात कैसे कर सकते हैं? क्या उनमें परमेश्वर का चेहरा देखने की धृष्टता होगी? वह भोजन करना, जो परमेश्वर तुम्हें प्रदान करता है; कुटिल चीज़ें करना, जो परमेश्वर का विरोध करती हैं; दुर्भावनापूर्ण, कपटी और षड्यंत्रकारी बनना, तब भी जबकि परमेश्वर तुम्हें अपने द्वारा दिए गए आशीषों का आनंद लेने देता है—क्या तुम उन्हें प्राप्त करते हुए अपने हाथों को जलता हुआ महसूस नहीं करते? क्या तुम अपने चेहरे को शर्म से लाल होता महसूस नहीं करते? परमेश्वर के विरोध में कुछ करने के बाद, "दुष्ट बनने" के लिए षड्यंत्र रचने के बाद, क्या तुम्हें डर नहीं लगता? यदि तुम्हें कुछ महसूस नहीं होता, तो तुम किसी भविष्य के बारे में बात कैसे कर सकते हो? तुम्हारे लिए पहले से ही कोई भविष्य नहीं था, तो अभी भी तुम्हारी और बड़ी अपेक्षाएँ क्या हो सकती हैं? यदि तुम कोई बेशर्मी की बात करते हो और कोई धिक्कार महसूस नहीं करते, और तुम्हारे ह्रदय में कोई जागरूकता नहीं है, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि तुम परमेश्वर द्वारा पहले ही त्यागे जा चुके हो? मज़ा लेते हुए और अनर्गल ढंग से बोलना और कार्य करना तुम्हारी प्रकृति बन गया है; तुम इस तरह कैसे कभी परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हो? क्या तुम दुनिया भर में चल पाने में सक्षम होगे? तुम पर कौन विश्वास करेगा? जो लोग तुम्हारी सच्ची प्रकृति को जानते हैं, वे तुमसे दूरी बनाए रखेंगे। क्या यह परमेश्वर का दंड नहीं है? कुल मिलाकर, अगर केवल बात होती है और कोई अभ्यास नहीं होता, तो कोई विकास नहीं होता। यद्यपि तुम्हारे बोलते समय पवित्र आत्मा तुम पर कार्य कर रहा हो सकता है, किंतु यदि तुम अभ्यास नहीं करते, तो पवित्र आत्मा कार्य करना बंद कर देगा। यदि तुम इसी तरह से करते रहे, तो भविष्य के बारे में या अपना पूरा अस्तित्व परमेश्वर के कार्य को सौंपने के बारे में कोई बात कैसे हो सकती है? तुम केवल अपना पूरा अस्तित्व सौंपने की बात कर सकते हो, लेकिन तुमने अपना सच्चा प्यार परमेश्वर को नहीं दिया है। उसे तुमसे केवल मौखिक भक्ति मिलती है, उसे तुम्हारा सत्य का अभ्यास करने का इरादा नहीं मिलता। क्या यह तुम्हारा असली आध्यात्मिक कद हो सकता है? यदि तुम ऐसा ही करते रहे, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कब बनाए जाओगे? क्या तुम अपने अंधकारमय और विषादपूर्ण भविष्य के बारे में चिंता महसूस नहीं करते? क्या तुम्हें नहीं लगता कि परमेश्वर ने तुममें आशा खो दी है? क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर अधिक और नए लोगों को पूर्ण बनाना चाहता है? क्या पुरानी चीज़ें कायम रह सकती हैं? तुम आज परमेश्वर के वचनों पर ध्यान नहीं दे रहे हो : क्या तुम कल की प्रतीक्षा कर रहे हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वह व्यक्ति उद्धार प्राप्त करता है जो सत्य का अभ्यास करने को तैयार है' से उद्धृत

449. परमेश्वर की लोगों से अपेक्षाएं बहुत ज़्यादा नहीं हैं। यदि लोग थोड़ा-भी प्रयास करते हैं तो वे "उत्तीर्ण होने योग्य श्रेणी" प्राप्त कर सकेंगे। असल में, सत्य का अभ्यास करने के मुकाबले सत्य को समझना, जानना और स्वीकार करना अधिक जटिल है। सत्य को जानना और स्वीकार करना, सत्य का अभ्यास करने के बाद आता है; यह वो चरण और तरीका है जिसके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। तुम इसका पालन कैसे नहीं कर सकते हो? क्या तुम अपने तरीके से चीजें कर के पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकोगे? पवित्र आत्मा तुम्हारी इच्छा के आधार पर कार्य करता है, या परमेश्वर के वचनों के अनुसार तुम्हारी कमियों के आधार पर? यह व्यर्थ है अगर तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हो। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है लेकिन उनके पास केवल ज्ञान है और बाद में किसी वास्तविक पथ के बारे में कुछ नहीं कह पाते हैं? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान होने का अर्थ सत्य का होना है? क्या यह एक उलझा हुआ दृष्टिकोण नहीं है? तू उतना ज्ञान बोलने में सक्षम है जितना कि समुद्र तट पर रेत है, फिर भी इसमें से कुछ भी वास्तविक पथ से युक्त नहीं होता है। इस में, क्या तू लोगों को मूर्ख नहीं बना रहा है? क्या तू निरर्थक दिखावा नहीं कर रहा है, जिसका समर्थन करने के लिए कोई सार नहीं है? इस तरह का समस्त व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही यह वास्तविकता से रहित होता है, और उतना ही अधिक लोगों को वास्तविकता में ले जाने में असमर्थ होता है; जितना ऊँचा सिद्धांत होता है, उतना ही अधिक तुझसे परमेश्वर की उपेक्षा और उसका विरोध करवाता है। उत्कृष्टतम सिद्धांतों को अनमोल खजाना न समझ; वे घातक हैं, और किसी काम के नहीं हैं! शायद कुछ लोग उत्कृष्टतम सिद्धांतों की बात करने में सक्षम हों—लेकिन इनमें वास्तविकता का कुछ भी नहीं होता है, क्योंकि इन लोगों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव नहीं किया है, और इसलिए उनके पास अभ्यास करने का कोई मार्ग नहीं है। ऐसे लोग मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाने में असमर्थ होते हैं, और वे केवल लोगों को पथभ्रष्ट करेंगे। क्या यह लोगों के लिए हानिकारक नहीं है? कम से कम, तुझे उनकी वर्तमान परेशानियों को हल करने और उन्हें प्रवेश हासिल करने देने में सक्षम अवश्य होना चाहिए; केवल यही समर्पण के रूप में गिना जाता है, और तभी तू परमेश्वर के लिए कार्य करने के योग्य होगा। हमेशा आडंबरपूर्ण, काल्पनिक शब्दों में बात मत कर, और लोगों को तेरी आज्ञापालन करने पर बाध्य करने के लिए अनुपयुक्त अभ्यासों का उपयोग मत कर। ऐसा करने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और यह केवल उनके भ्रम को बढ़ा सकता है। इस तरह कार्य करते रहने के परिणामस्वरूप कई तरह के नियम सिद्धान्त हो जायेंगे, जिससे लोग तुझसे घृणा करेंगे। मनुष्य की कमी ऐसी है, और यह वास्तव में लज्जाजनक है। इसलिए, अब मौजूद समस्याओं के बारे में अधिक बात करो। अन्य लोगों के अनुभवों को निजी संपत्ति न समझो और दूसरों को इसकी सराहना करवाने के लिए इसे ऊँचा न उठाओ। तुम्हें निकलने का अपना, व्यक्तिगत मार्ग खोजना होगा। प्रत्येक व्यक्ति को इसी चीज़ का अभ्यास करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वास्तविकता पर अधिक ध्यान केन्द्रित करो' से उद्धृत

450. परमेश्वर में विश्वास करने का मनुष्य का सबसे बड़ा दोष यह है कि उसका विश्वास सिर्फ़ वचनों में है, और परमेश्वर उसके व्यावहारिक जीवन में कहीं भी विद्यमान नहीं है। वास्तव में, सभी मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, फिर भी परमेश्वर उनके प्रतिदिन के जीवन का हिस्सा नहीं है। परमेश्वर के लिए कई प्रार्थनाएँ मनुष्य के मुख से तो आती हैं, किन्तु परमेश्वर के लिए उसके हृदय में बहुत थोड़ी सी ही जगह है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य की परीक्षा लेता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य की परीक्षा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और अपने आप को परीक्षाओं में जान ले। अन्यथा, सभी मनुष्य प्रधान दूत के वंशज बन जाएँगे, और निरंतर भ्रष्ट बनते चले जाएँगे। परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास के दौरान, कई व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ दिए जाते हैं, जैसे-जैसे वह लगातार परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किया जाता है। अन्यथा, कोई भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता है, और मनुष्य में उस कार्य को करने का परमेश्वर के पास कोई रास्ता नहीं है जो उसे करना चाहिए। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। सिर्फ़ इसके बाद ही परमेश्वर मनुष्य में अपना जीवन कार्य कर सकता है, और सिर्फ़ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कह सकता है। जैसे कि परमेश्वर इसे देखता है, यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम सिर्फ़ अपने स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो परन्तु सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते हो या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते हो, तब भी यह प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय नहीं है, और दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर से संबंधित नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके उसे जान लेना; यह अंतिम लक्ष्य है जिसे मनुष्य को खोजना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने के लिए प्रयास समर्पित अवश्य करने चाहिए ताकि वे तुम्हारे अभ्यास में महसूस किए जा सकें। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। तब यदि तुम सिर्फ़ इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप माना जाएगा। इस रास्ते पर, कई मनुष्य ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बोल सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय, उनकी आँखें आँसूओं से भर जाती हैं, और अपना जीवनकाल नष्ट करने और बुढ़ापे तक व्यर्थ जीने के लिए वे स्वयं से घृणा करते हैं। वे केवल सिद्धांत समझते हैं, वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला सकते, न परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं, इसके बजाय वे बस यहाँ-वहाँ, काम में मशगूल होकर दौड़ते-भागते रहते हैं; मौत की कगार पर पहुँचने के बाद वे अंतत: देख पाते हैं कि उनमें सच्ची गवाही की कमी है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या उस समय बहुत देर नहीं हो जाती है? क्यों फिर तुम वर्तमान समय का लाभ नहीं उठाते हो और उस सत्य की खोज नहीं करते हो जिसे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों करते हो? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो, या इसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते हो, तो क्या ऐसा हो सकता है कि तुम अपने मरने के समय में पछतावा महसूस करना चाहते हो? यदि ऐसा है तो, फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में, ऐसे कई मामले हैं जिनमें मनुष्य, यदि वह सिर्फ़ हल्का सा प्रयास समर्पित करता है, तो सत्य को अभ्यास में ला सकता है और उसके द्वारा परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है। मनुष्य का हृदय निरंतर राक्षसों के कब्ज़े में रहता है और इसलिए वह परमेश्वर के वास्ते कार्य नहीं कर सकता है। बल्कि, वह देह के लिए निरंतर इधर-उधर यात्रा करता रहता है, और अंत में उसे कुछ भी लाभ नहीं मिलता है। यही कारण है कि मनुष्य के पास निरंतर समस्या और पीड़ा बनी रहती है। क्या ये शैतान की यातनाएँ नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? केवल दिखावटी प्रेम करके तुम्हें परमेश्वर को मूर्ख नहीं बनाना चाहिए। बल्कि, तुम्हें ठोस कार्यवाही करनी चाहिए। अपने आप को मूर्ख मत बनाओ; इसका क्या अर्थ है? अपनी देह की इच्छाओं के वास्ते जी कर और प्रसिद्धि और भाग्य के लिए मेहनत करके तुम क्या प्राप्त कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है' से उद्धृत

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