515 अपनी कठिनाइयों को हल करने के लिए सत्य की तलाश करो

1 यदि तुम सत्य को व्यवहार में लाना और उसे समझना चाहते हो, तो सबसे पहले अपने सामने आने वाली कठिनाइयों और अपने आसपास घटने वाली चीज़ों का सार समझो, समझो कि इन मुद्दों के साथ क्या समस्याएँ हैं, साथ ही इस बात को भी समझो कि वो सत्य के किस पहलू से संबंधित हैं। इन चीज़ों की तलाश करो और उसके बाद अपनी वास्तविक कठिनाइयों के आधार पर सत्य की खोज करो। इस तरह, जैसे-जैसे तुम अनुभव प्राप्त करोगे, वैसे-वैसे तुम अपने साथ होने वाली हर चीज़ में परमेश्वर का हाथ देखने लगोगे, और यह भी जानने लगोगे कि वह क्या करना चाहता है और तुममें कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है।

2 यदि तुम बस सभाओं में परमेश्वर के वचन खाते और पीते समय, या अपने कर्तव्य को निभाते हुए ही परमेश्वर के वचन के सत्य से खुद को मापते हो, और यदि तुम महसूस करते हो कि तुम्हारे जीवन में आमतौर पर होने वाली चीजें तुम्हारे विश्वास या सत्य से संबंधित नहीं हैं, और अगर तुम्हें लगता है कि तुम उनसे निपट सकते हो और फिर तुम अपने जीवन-दर्शन के आधार पर ऐसा करते हो, तो तुम कभी भी सत्य को हासिल नहीं करोगे, और तुम कभी नहीं समझ पाओगे कि वास्तव में परमेश्वर तुम्हारे में क्या हासिल करना चाहता है और वह किन परिणामों को प्राप्त करना चाहता है।

3 सत्य का अनुसरण करना एक लंबी प्रक्रिया है। इसका एक सरल पक्ष है, और इसका एक जटिल पक्ष भी है। सरल शब्दों में, हमें अपने आसपास होने वाली हर चीज़ में सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना चाहिए। एक बार जब तुम ऐसा करना शुरू कर दोगे, तो तुम यह देखोगे कि तुम्हें परमेश्वर पर अपने विश्वास में कितना सत्य हासिल करना चाहिए और उसका कितना अनुसरण करना चाहिए, तुम जानोगे कि सत्य बहुत वास्तविक है और सत्य ही जीवन है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग' से रूपांतरित

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