489 परमेश्वर के वचनों को अपनी स्थितियों के सन्दर्भ में पढ़ो

1 जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम्हें उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति के अनुपात में तोलना चाहिए। अर्थात्, जब तुम अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान खुद में कमियों की खोज कर चुके हो, तो तुम्हें अभ्यास करने के लिए एक रास्ता खोजने में और अपनी गलत मंशाओं और धारणाओं को पीठ दिखाने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम हमेशा इसमें कड़ी मेहनत करते हो, और यदि तुम्हारा दिल हमेशा इन बातों पर केंद्रित रहता है, तो तुम्हारे पास अनुसरण के लिए एक मार्ग होगा, तुम खाली महसूस नहीं करोगे, और इस प्रकार तुम एक सामान्य स्थिति बनाए रखने में सक्षम होगे। तभी तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो स्वयं अपने जीवन के दायित्व-भार को उठाता है, और तभी तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो विश्वास रखता है।

2 परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, क्यों लोग उन्हें अभ्यास में ढालने में असमर्थ हैं? क्या ऐसा इसलिए नहीं कि वे जीवन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? उनका कुंजी को समझ नहीं पाना और उनके पास अभ्यास करने का कोई रास्ता न होना इसलिए है कि वे उन्हें अपनी ही स्थिति के विरुद्ध मापने में असमर्थ हैं, और अपनी स्वयं की स्थिति पर काबू पाने में असमर्थ हैं। कैसे देह के सुख को अलग करना, आत्म-तुष्टि को कैसे अलग करना, स्वयं को कैसे बदलना, इन चीजों में प्रवेश कैसे करना, अपनी क्षमता को कैसे बढ़ाना, किस पहलू से शुरू करना, ये सभी वे चीज़ें हैं जो वास्तविक हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अभ्यास (7)" से रूपांतरित

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