489 परमेश्वर के वचनों को अपनी स्थितियों के सन्दर्भ में पढ़ो

1 जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें इनके सामने अपनी स्थिति की वास्तविकता को मापना चाहिए। यानी, जब तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव के दौरान अपनी कमियों का पता चले, तो तुम्हें अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने, गलत अभिप्रेरणाओं और धारणाओं से मुँह मोड़ने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम हमेशा इन बातों का प्रयास करो और इन बातों को हासिल करने में अपने दिल को उँड़ेल दो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा, तुम अपने अंदर खोखलापन महसूस नहीं करोगे, और इस तरह तुम एक सामान्य स्थिति बनाए रखने में सफल हो जाओगे। तब तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो अपने जीवन में भार वहन करता है, जिसमें आस्था है।

2 ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, उन्हें अमल में नहीं ला पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे जीवन को गंभीरता से नहीं लेते? वे अहम बात को समझ नहीं पाते और उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, उसका कारण यह है कि जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनसे अपनी स्थितियों को जोड़ नहीं पाते, न ही वे अपनी स्थितियों को अपने वश में कर पाते हैं। भी बहुत-सी वास्तविक चीज़ें हैं जो तुम नहीं जानते : देह-सुख का त्याग कैसे करें, दंभ को दूर कैसे करें, स्वयं को कैसे बदलें, इन चीज़ों में कैसे प्रवेश करें, अपनी क्षमता कैसे बढ़ाएँ और किस पहलू से शुरू करें। इससे साबित होता है कि तुम्हें अभ्यास का मार्ग मिला नहीं है।

3 स्वयं को इस तरह से तैयार करो : पहले, परमेश्वर के वचन पढ़ो; उनमें दी गयी आध्यात्मिक शब्दावली को अच्छी तरह से समझो; उनमें दिए गए महत्वपूर्ण दर्शनों को ढूँढ़ो; अभ्यास से जुड़े हिस्सों को पहचानो; इन सारे तत्वों को एक-एक करके एक-साथ लाओ; अपने अनुभव में उनमें प्रवेश करो। इन महत्वपूर्ण बातों को समझो। परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते समय सबसे महत्वपूर्ण अभ्यास यह है : परमेश्वर के वचनों के एक अध्याय को पढ़ लेने के बाद, तुम्हें दर्शनों से संबंधित अहम हिस्सों का पता लगाने में समर्थ होना चाहिए, और तुम्हें अभ्यास से संबंधित अहम हिस्सों का पता लगाने में समर्थ होना चाहिए; दर्शनों को आधार के रूप में उपयोग में लाओ और अभ्यास को अपने जीवन में अपने मार्गदर्शक के तौर पर इस्तेमाल करो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से रूपांतरित

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