194 परमेश्वर के वचनों द्वारा शुद्ध होना

1 मैंने यह सोचते हुए प्रभु में कई वर्षों तक विश्वास रखा और अच्छा व्यवहार किया कि मैं पश्चात्ताप किया था, और मैं बदल गया था। मैंने थोड़ा-सा काम किया और फिर परमेश्वर से आशीष मांगा; मुझे लगा कि यह पूरी तरह से सही और उचित ही है। मैंने केवल धर्मशास्त्रीय ज्ञान और सिद्धांतों का प्रचार किया, और मुझे लगा कि मेरे पास सत्य है। लेकिन जब परमेश्वर के वचनों के द्वारा मेरा न्याय किया गया और मुझे ताड़ना दी गई, तक जाकर मैंने प्रकाश देखा। मुझे सत्य और जीवन के बारे में थोड़ी-सी भी जानकारी नहीं थी। मैं काम करने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने की एवज़ में केवल स्वर्गिक राज्य का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता था। मैंने कभी प्रभु के वचनों का अभ्यास या अनुभव नहीं किया था, लेकिन फिर भी मैं प्रभु से प्रशंसा पाना चाहता था। लेकिन अब मुझे एहसास होता है कि मेरी धारणाओं और कल्पनाओं ने मुझे अंधा कर दिया था। अगर परमेश्वर का न्याय और उद्धार न होता, मैं अभी भी अंधेरे में ही जी रहा होता।

2 सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं। वे मेरे दिल की गहराइयों में घर कर गए हैं। परमेश्वर का न्याय और प्रकाशन सभी सच हैं, मुझे समझ में नहीं आता कि मैं शर्म से कहाँ मुँह छिपाऊँ। मेरी प्रकृति लालची और स्वार्थी है, मैं केवल पुरस्कार पाने के लिए प्रभु में विश्वास रखत था। मैंने लोगों को तो बताया कि मैं प्रभु से कैसे प्यार करता हूँ, लेकिन ख़ुद मेरा दिल दुनियादारी और देह-सुखों में लिप्त रहता था। हालाँकि दिखावे के लिये मेरा आचरण अच्छा था, लेकिन मेरा दिल शैतानी स्वभावों से भरा हुआ था। मैंने केवल पद-प्रतिष्ठा के लिए काम और प्रचार किया, मेरे मन में परमेश्वर का कोई भय नहीं था। मेरा हर शब्द और कृत्य धार्मिक अनुष्ठान का प्रदर्शन था, उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं था। मैं इतना भ्रष्ट था कि मैं न्याय और शुद्धिकरण के बिना स्वर्गिक राज्य में प्रवेश करने के योग्य कैसे हो सकता था? अब मुझे एहसास होता है कि परमेश्वर का निर्णय और ताड़ना मेरे लिए उसका उद्धार है। 

3 परमेश्वर हर चीज़ पर शासन करता है और सभी परिवेशों का आयोजन करता है, हर दिन सीखने के लिए बहुत कुछ है। मैं परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत करता हूँ, उसके वचनों को पढ़ता हूँ, और हर दिन परमेश्वर की उपस्थिति में रहता हूँ। अपना कर्तव्य निभाते हुए और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हुए, मैं देखता हूँ कि मेरे अंदर बहुत सारी कमियाँ हैं। अपनी भ्रष्टता पर विचार करते हुए, मैं देखता हूँ कि मैं एक सामान्य इंसान की तरह नहीं जीता। न्याय, परीक्षण, काट-छाँट और व्यवहार का अनुभव करके, मैं परमेश्वर के प्रेम का आस्वादन करता हूँ। मैं परमेश्वर के वचनों को वास्तविक जीवन में उतारता हूँ, मैं हर चीज़ में सत्य खोजता हूँ। अपने व्यवहारिक अनुभवों से मैं देखता हूँ कि परमेश्वर का प्रत्येक वचन सत्य है। परमेश्वर के वचनों के अनुसार आचरण करके, मेरे भ्रष्ट स्वभाव धीरे-धीरे शुद्ध हो रहे हैं। परमेश्वर के प्रति श्रद्धा रखकर और बुराई से दूर रहकर, मैं उसके सामने जीता हूँ। 

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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