अभ्यास (7)

तुम्हारी मानवीयता में बहुत कमी है, तुम्हारी जीवन-शैली बहुत ही निम्न और भ्रष्ट है, तुम्हारे अंदर कोई मानवीयता नहीं है, और तुम्हारे अंदर अंतर्दृष्टि का भी अभाव है। इसलिए तुम्हें सामान्य मानवीयता की बातों से युक्त होना चाहिए। अंतरात्मा, विवेक और अंतर्दृष्टि का होना; यह जानना कि कैसे बोलना और चीज़ों को कैसे देखना है; स्वच्छता का ध्यान रखना; सामान्य इंसान की तरह पेश आना—ये सारे सामान्य मानवीयता के ज्ञान के लक्षण हैं। जब तुम लोग इन बातों में उपयुक्त तरीके से व्यवहार करते हो, तो यह माना जाता है कि तुम लोगों में मानवीयता का स्वीकार्य स्तर है। तुम लोगों को आध्यात्मिक जीवन से भी युक्त होना चाहिए। तुम्हें धरती पर परमेश्वर के समस्त कार्य का ज्ञान और उसके वचनों का अनुभव होना चाहिए। तुम्हें पता होना चाहिए कि उसकी व्यवस्थाओं का पालन कैसे करना है और एक सृजित प्राणी के कर्तव्यों का निर्वहन कैसे करना है। ये उन बातों के दो पहलू हैं जिनमें आज तुम्हें प्रवेश करना चाहिए—मानवीयता के जीवन के लिए स्वयं को तैयार करना और आध्यात्मिकता के जीवन का अभ्यास करना। दोनों अपरिहार्य हैं।

कुछ लोग बेतुके होते हैं : वे केवल अपने आपको मानवीयता के गुणों से युक्त करना जानते हैं। उनके हाव-भाव और रूप-रंग में कोई दोष नहीं निकाला जा सकता; उनकी बातें और बोलने का तरीका सही होता है, उनका पहनावा गरिमापूर्ण और यथोचित होता है। लेकिन अंदर से वे खोखले होते हैं; उनमें सामान्य मानवीयता केवल सतही तौर पर नज़र आती है। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनका ध्यान सिर्फ खाने, पहनने और बोलचाल पर ही रहता है। कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जो केवल फर्श साफ करने, बिस्तर ठीक करने और आम साफ-सफाई पर ही ध्यान देते हैं। इन कामों में उनका कुशल-अभ्यास हो सकता है, लेकिन अगर ऐसे लोगों से अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य के उनके ज्ञान या ताड़ना और न्याय, परीक्षण और शुद्धिकरण के बारे में पूछ लिया जाए, तो वे अपना ज़रा-सा भी अनुभव ज़ाहिर नहीं कर पाएँगे। तुम उनसे पूछ सकते हो : "क्या तुम्हें धरती पर परमेश्वर के प्राथमिक कार्य की कोई समझ है? आज देहधारी परमेश्वर का कार्य यीशु के कार्य से भिन्न कैसे है? यहोवा के कार्य से भिन्न कैसे है? क्या वे दोनों एक ही परमेश्वर हैं? क्या वह इस युग का अंत करने के लिए आया है या इंसान को बचाने के लिए आया है?" लेकिन ऐसे लोगों के पास इन मामलों पर बोलने के लिए कुछ नहीं है। कुछ लोग खूबसूरती से सज-धज कर रहते हैं, लेकिन बस ऊपर-ऊपर से : बहनें अपने आपको फूलों की तरह सँवारती हैं और भाई राजकुमारों या छबीले नौजवानों की तरह कपड़े पहनते हैं। वे केवल बाहरी चीज़ों की परवाह करते हैं, जैसे कि अपने खाने-पहनने की; लेकिन अंदर से वे कंगाल होते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज़रा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके क्या मायने हो सकते हैं? और कुछ तो ऐसे हैं जो भिखारियों की तरह कपड़े पहनते हैं—वे वाकई पूर्वी एशिया के गुलाम लगते हैं! क्या तुम लोगों को सचमुच नहीं पता कि मैं तुम लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ? आपस में सँवाद करो : तुम लोगों ने वास्तव में क्या पाया है? तुमने इतने सालों तक परमेश्वर में आस्था रखी है, फिर भी तुम लोगों ने इतना ही प्राप्त किया है—क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या तुम लज्जित महसूस नहीं करते? इतने सालों से तुम सत्य मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हो, फिर भी तुम्हारा आध्यात्मिक कद नगण्य है! अपने मध्य तरुण महिलाओं को देखो, कपड़ों और मेकअप में तुम बहुत ही सुंदर दिखती हो, एक-दूसरे से अपनी तुलना करती हो—और तुलना क्या करती हो? अपनी मौज-मस्ती की? अपनी माँगों की? क्या तुम्हें यह लगता है कि मैं मॉडल भर्ती करने आया हूँ? तुम में ज़रा भी शर्म नहीं है! तुम लोगों का जीवन कहाँ है? जिन चीज़ों के पीछे तुम लोग भाग रही हो, क्या वे तुम्हारी फिज़ूल की इच्छाएँ नहीं हैं? तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सुंदर हो, भले ही तुम्हें लगता हो कि तुम बहुत सजी-सँवरी हो, लेकिन क्या तुम सच में गोबर के ढेर में जन्मा कुलबुलाता कीड़ा नहीं हो? आज खुशकिस्मती से तुम जिस स्वर्गिक आशीष का आनंद ले रही हो, वो तुम्हारे सुंदर चेहरे के कारण नहीं है, बल्कि परमेश्वर अपवाद स्वरूप तुम्हें ऊपर उठा रहा है। क्या यह तुम्हें अब भी स्पष्ट नहीं हुआ कि तुम कहाँ से आई हो? जीवन का उल्लेख होने पर, तुम अपना मुँह बंद कर लेती हो और कुछ नहीं बोलती, बुत की तरह गूँगी बन जाती हो, फिर भी तुम सजने-सँवरने की जुर्रत करती हो! फिर भी तुम्हारा झुकाव अपने चेहरे पर लाली और पावडर पोतने की तरफ रहता है! और अपने बीच छबीले नौजवानों को देखो, ये अनुशासनहीन पुरुष जो दिनभर मटरगश्ती करते फिरते हैं, बेलगाम रहते हैं और अपने चेहरे पर लापरवाही के हाव-भाव लिए रहते हैं। क्या किसी व्यक्ति को ऐसा बर्ताव करना चाहिए? तुम लोगों में से हर एक आदमी और औरत का ध्यान दिनभर कहाँ रहता है? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोग अपने भरण-पोषण के लिए किस पर निर्भर हो? अपने कपड़े देखो, देखो तुम्हारे हाथों ने क्या प्राप्त किया है, अपने पेट पर हाथ फेरो—इतने बरसों में तुमने अपनी आस्था में जो खून-पसीना बहाया है, उसकी कीमत के बदले तुमने क्या लाभ प्राप्त किया है? तुम अब भी पर्यटन-स्थल के बारे में सोचते हो, अपनी बदबूदार देह को सजाने-सँवारने की सोचते हो—निरर्थक काम! तुमसे सामान्यता का इंसान बनने के लिए कहा जाता है, फिर भी तुम असामान्य हो, यही नहीं तुम पथ-भ्रष्ट भी हो। ऐसा व्यक्ति मेरे सामने आने की धृष्टता कैसे कर सकता है? इस तरह की मानवीयता के साथ, तुम्हारा अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करना, देह पर इतराना और हमेशा देह की वासनाओं में जीना—क्या तुम मलिन हैवानों और दुष्ट आत्माओं के वंशज नहीं हो? मैं ऐसे मलिन हैवानों को लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहने दूँगा! ऐसा मानकर मत चलो कि मुझे पता ही नहीं कि तुम दिल में क्या सोचते हो। तुम अपनी वासना और देह को भले ही कठोर नियंत्रण में रख लो, लेकिन तुम्हारे दिल में जो विचार हैं, उन्हें मैं कैसे न जानूँगा? तुम्हारी आँखों की सारी ख्वाहिशों को मैं कैसे न जानूँगा? क्या तुम युवतियाँ अपनी देह का प्रदर्शन करने के लिए अपने आपको इतना सुंदर नहीं बनाती हो? पुरुषों से तुम्हें क्या लाभ होगा? क्या वे तुम लोगों को अथाह पी‌ड़ा से बचा सकते हैं? जहाँ तक तुम लोगों में छबीले नौजवानों की बात है, तुम सब अपने आपको सभ्य और विशिष्ट दिखाने के लिए सजते-सँवरते हो, लेकिन क्या यह तुम्हारी सुंदरता पर ध्यान ले जाने के लिए रचा गया फरेब नहीं है? तुम लोग यह किसलिए कर रहे हो? महिलाओं से तुम लोगों को क्या फायदा होगा? क्या वे तुम लोगों के पापों का मूल नहीं हैं? मैंने तुम स्त्री-पुरुषों से बहुत-सी बातें कही हैं, लेकिन तुम लोगों ने उनमें से कुछ का ही पालन किया है। तुम लोगों के कान बहरे हैं, तुम लोगों की आँखें कमज़ोर पड़ चुकी हैं, तुम्हारा दिल इस हद तक कठोर है कि तुम्हारे जिस्मों में वासना के अलावा कुछ नहीं है, और यह ऐसा है कि तुम इसके चँगुल में फँस गए हो और अब निकल नहीं सकते। गंदगी और मैल में छटपटाते तुम जैसे कीड़ों के इर्द-गिर्द कौन आना चाहता है? मत भूलो कि तुम्हारी औकात उनसे ज़्यादा कुछ नहीं है जिन्हें मैंने गोबर के ढेर से निकाला है, तुम्हें मूलत: सामान्य मानवीयता से संसाधित नहीं किया गया था। मैं तुम लोगों से उस सामान्य मानवीयता की अपेक्षा करता हूँ जो मूलत: तुम्हारे अंदर नहीं थी, इसकी नहीं कि तुम अपनी वासना की नुमाइश करो या अपनी दुर्गंध-युक्त देह को बेलगाम छोड़ दो, जिसे बरसों तक शैतान ने प्रशिक्षित किया है। जब तुम लोग सजते-सँवरते हो, तो क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि तुम इसमें और गहरे फँस जाओगे? क्या तुम लोगों को पता नहीं कि तुम लोग मूलत: पाप के हो? क्या तुम लोग जानते नहीं कि तुम्हारी देह वासना से इतनी भरी हुई है कि यह तुम्हारे कपड़ों तक से रिसती है, तुम लोगों की असह्य रूप से बदसूरत और मलिन दुष्टों जैसी स्थितियों को प्रकट करती है? क्या बात ऐसी नहीं है कि तुम लोग इसे दूसरों से ज़्यादा बेहतर ढंग से जानते हो? क्या तुम्हारे दिलों को, तुम्हारी आँखों को, तुम्हारे होठों को मलिन दुष्टों ने बिगाड़ नहीं दिया है? क्या तुम्हारे ये अंग गंदे नहीं हैं? क्या तुम्हें लगता है कि जब तक तुम कोई क्रियाकलाप नहीं करते, तब तक तुम सर्वाधिक पवित्र हो? क्या तुम्हें लगता है कि सुदंर वस्त्रों में सजने-सँवरने से तुम्हारी नीच आत्माएँ छिप जाएँगी? ऐसा नहीं होगा! मेरी सलाह है कि अधिक यथार्थवादी बनो : कपटी और नकली मत बनो और अपनी नुमाइश मत करो। तुम लोग अपनी वासना को लेकर एक-दूसरे के सामने शान बघारते हो, लेकिन बदले में तुम लोगों को अनंत यातनाएँ और निर्मम ताड़ना ही मिलेगी! तुम लोगों को एक-दूसरे से आँखें लड़ाने और रोमाँस में लिप्त रहने की क्या आवश्यकता है? क्या यह तुम लोगों की सत्यनिष्ठा का पैमाना और ईमानदारी की हद है? मुझे तुम लोगों में से उनसे नफरत है जो बुरी औषधि और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; मुझे तुम लोगों में से उन नौजवान लड़के-लड़कियों से नफरत है जिन्हें अपने शरीर से लगाव है। बेहतर होगा अगर तुम लोग स्वयं पर नियंत्रण रखो, क्योंकि अब आवश्यक है कि तुम्हारे अंदर सामान्य मानवीयता हो, और तुम्हें अपनी वासना की नुमाइश करने की अनुमति नहीं है—लेकिन फिर भी तुम लोग हाथ से कोई मौका जाने नहीं देते हो, क्योंकि तुम्हारी देह बहुत उछाल मार रही है और तुम्हारी वासना बहुत प्रचंड है!

सतह पर तुम्हारी मानवीयता का जीवन सुव्यवस्थित है, लेकिन जब तुमसे तुम्हारे जीवन-ज्ञान के बारे में बताने को कहा जाता है, तो तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं होता; इसमें तुम निर्धन हो। तुम्हारे अंदर सत्य होना चाहिए! तुम्हारा मानवीयता का जीवन बेहतरी के लिए बदला है, वैसे ही तुम्हारे अंदर का जीवन भी बदलना चाहिए; अपने विचार बदलो, परमेश्वर के विषय में अपना दृष्टिकोण रूपांतरित करो, अपने अंदर के ज्ञान और विचार को बदलो, और परमेश्वर के बारे में ज्ञान बदलो क्योंकि यह तुम्हारी धारणाओं में बसा हुआ है। निपटारा किए जाने के ज़रिए, प्रकाशन और पोषण के ज़रिए, धीरे-धीरे स्वयं के विषय में, मानव जीवन के विषय में और परमेश्वर में आस्था के विषय में अपना ज्ञान बदलो; अपनी समझ को निर्मलता के योग्य बनाओ। इस तरह, इंसान के विचार बदलते हैं, वह चीज़ों को कैसे देखता है और उसका मानसिक रवैया बदलता है। केवल इसी को जीवन स्वभाव में बदलाव कहा जा सकता है। तुमसे यह नहीं कहा जाता कि तुम दिन भर परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हुएमें व्यतीत करो, या कपड़े धोते रहो और साफ-सफाई करते रहो। कम से कम, सामान्य मानवीयता का जीवन स्वाभाविक रूप से सहन करने योग्य होना चाहिए। इसके अलावा, जब बाहर के मामले सँभालने की बात आए, तो भी तुम्हें कुछ अंतर्दृष्टि और विवेक का इस्तेमाल अवश्य करना चाहिए; लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हारे अंदर जीवन का सत्य होना चाहिए। जब तुम स्वयं को जीवन के लिए तैयार कर रहे हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने पर ध्यान देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के बारे में ज्ञान के विषय में, मानवीय जीवन के विषय में और विशेष रूप से अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के विषय में बातचीत करने के योग्य होना चाहिए। चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, तो तुम्हारे अंदर ये चीज़ें होनी चाहिए। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें इनके सामने अपनी स्थिति की वास्तविकता को मापना चाहिए। यानी, जब तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव के दौरान अपनी कमियों का पता चले, तो तुम्हें अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने, गलत अभिप्रेरणाओं और धारणाओं से मुँह मोड़ने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम हमेशा इन बातों का प्रयास करो और इन बातों को हासिल करने में अपने दिल को उँड़ेल दो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा, तुम अपने अंदर खोखलापन महसूस नहीं करोगे, और इस तरह तुम एक सामान्य स्थिति बनाए रखने में सफल हो जाओगे। तब तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो अपने जीवन में भार वहन करता है, जिसमें आस्था है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, उन्हें अमल में नहीं ला पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे सबसे अहम बात को समझ नहीं पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे जीवन को गंभीरता से नहीं लेते? वे अहम बात को समझ नहीं पाते और उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, उसका कारण यह है कि जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनसे अपनी स्थितियों को जोड़ नहीं पाते, न ही वे अपनी स्थितियों को अपने वश में कर पाते हैं। कुछ लोग कहते हैं : "मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़कर उनसे अपनी स्थिति को जोड़ पाता हूँ, और मैं जानता हूँ कि मैं भ्रष्ट हूँ और मेरी क्षमता खराब है, लेकिन मैं परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के काबिल नहीं हूँ।" तुमने केवल सतह को ही देखा है; और भी बहुत-सी वास्तविक चीज़ें हैं जो तुम नहीं जानते : देह-सुख का त्याग कैसे करें, दंभ को दूर कैसे करें, स्वयं को कैसे बदलें, इन चीज़ों में कैसे प्रवेश करें, अपनी क्षमता कैसे बढ़ाएँ और किस पहलू से शुरू करें। तुम केवल सतही तौर पर कुछ चीज़ों को समझते हो, तुम बस इतना जानते हो कि तुम वाकई बहुत भ्रष्ट हो। जब तुम अपने भाई-बहनों से मिलते हो, तो तुम यह चर्चा करते हो कि तुम कितने भ्रष्ट हो, तो ऐसा लगता है कि तुम स्वयं को जानते हो और अपने जीवन के लिए एक बड़ा भार वहन करते हो। दरअसल, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव बदला नहीं है, जिससे साबित होता है कि तुम्हें अभ्यास का मार्ग मिला नहीं है। अगर तुम किसी कलीसिया की अगुवाई करते हो, तो तुम्हें भाई-बहनों की स्थितियों को समझने और उस ओर उनका ध्यान दिलाने में समर्थ होना चाहिए। क्या सिर्फ इतना कहना पर्याप्त होगा : "तुम अवज्ञाकारी और पिछड़े हुए हो!"? नहीं, तुम्हें खास तौर से बताना चाहिए कि उनकी अवज्ञाकारिता और पिछड़ापन किस प्रकार अभिव्यक्त हो रहा है। तुम्हें उनकी अवज्ञाकारी स्थिति पर, उनके अवज्ञाकारी बर्ताव पर और उनके शैतानी स्वभावों पर बोलना चाहिए, और इन बातों पर इस ढंग से बोलना चाहिए जिससे कि वे तुम्हारे शब्दों की सच्चाई से पूरी तरह आश्वस्त हो जाएँ। अपनी बात रखने के लिए तथ्यों और उदाहरणों का सहारा लो, और उन्हें बताओ कि वे किस तरह विद्रोही व्यवहार से अलग हो सकते हैं, और उन्हें अभ्यास का मार्ग बताओ—यह है लोगों को आश्वस्त करने का तरीका। जो इस तरह से काम करते हैं, वही दूसरों की अगुवाई कर सकते हैं; उन्हीं में सत्य की वास्तविकता होती है।

अब तुम लोगों को संगति के ज़रिए बहुत से सत्य मुहैया करा दिए गए हैं, और तुम्हें उनकी जाँच करनी चाहिए। तुम्हें इसका निर्णय करने में समर्थ होना चाहिए कि कुल मिलाकर कितने सत्य हैं। एक बार जब तुम सामान्य मानवीयता को जान लेते हो जो किसी इंसान में होनी चाहिए और स्वयं उसके विभिन्न पहलुओं में अंतर कर पाते हो, किसी के जीवन स्वभाव के बदलाव के मुख्य पहलुओं को जान लेते हो, दर्शनों के गहरे होने को और समझने एवं अनुभव करने के उन त्रुटिपूर्ण साधनों को, जो लोगों ने तमाम युगों में इस्तेमाल किए हैं, जान लेते हो—तभी तुम सही मार्ग पर होगे। धर्म के लोग बाइबल की आराधना इस तरह करते हैं मानो वह परमेश्वर हो; विशेषकर, वे नए नियम के चार सुसमाचारों को ऐसा मानते हैं जैसे वे यीशु के चार चेहरे हों, और वे पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के त्रित्व की बात करते हैं। यह सब बेहद हास्यास्पद है, तुम लोगों को इसकी असलियत जाननी चाहिए; उससे भी अधिक, तुम्हें देहधारी परमेश्वर के सार का और अंत के दिनों के कार्य का ज्ञान होना चाहिए। अभ्यास करने के वे पुराने तरीके, अभ्यास से जुड़ी वे भ्रांतियाँ और भटकाव भी हैं जिन्हें तुम्हें जानना चाहिए, जैसे कि आत्मा में रहना, पवित्र आत्मा से भर दिया जाना, जो कुछ भी आए उसे स्वीकार करना, अधिकार के प्रति समर्पित होना; तुम्हें जानना चाहिए कि पहले लोग कैसे अभ्यास करते थे और आज लोगों को कैसे अभ्यास करना चाहिए। जहाँ तक इसकी बात है कि अगुवाओं और कर्मियों को कलीसिया में कैसे सहयोग करना चाहिए; दंभ और दूसरों के प्रति तिरस्कार को कैसे दूर करें; भाई-बहन परस्पर कैसे रहें; लोगों से और परमेश्वर से सामान्य संबंध कैसे बनाएँ; मानव जीवन में सामान्य-स्थिति कैसे पाएँ; लोगों को अपने आध्यात्मिक जीवन में क्या प्राप्त करना चाहिए; उन्हें परमेश्वर के वचनों को कैसे खाना-पीना चाहिए; परमेश्वर के कौन-से वचन ज्ञान से संबंधित हैं, किनका संबंध दर्शनों से है, और उनमें से कौन-से अभ्यास के मार्ग से संबंधित हैं—क्या इन सबके बारे में बोला नहीं जा चुका है? ये वचन उनके लिए खुले हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं, किसी को कोई प्राथमिकता नहीं दी जाती। आज, तुम लोगों को स्वतंत्र रूप से रहने की योग्यता विकसित करनी चाहिए, दूसरों पर निर्भर रहने की मानसिकता नहीं बनानी चाहिए। भविष्य में, जब तुम लोगों को मार्गदर्शन देने के लिए कोई न होगा, तो तुम मेरे इन वचनों पर विचार करोगे। दु:ख के समय, जब कलीसियाई जीवन जीना संभव नहीं होता, जब भाई-बहन एक-दूसरे से नहीं मिल पाते, उनमें से अधिकतर अकेले रहते हैं, अधिक से अधिक अपने स्थानीय क्षेत्र के लोगों से ही संवाद कर पाते हैं, ऐसे समय में अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद के कारण तुम मजबूती से खड़े रह ही नहीं पाते हो। कष्टों के मध्य, बहुत-से लोग दृढ़ता से टिके रहने में कठिनाई महसूस करते हैं। जो लोग जीवन का मार्ग जानते हैं और जिनमें पर्याप्त सत्य है, केवल वही प्रगति करते रह सकते हैं, धीरे-धीरे शुद्धिकरण और रूपांतरण पा सकते हैं। कष्टों से गुज़रना कोई आसान बात नहीं है; अगर तुम्हें लगता है कि तुम इनसे कुछ ही दिनों में बाहर निकल आओगे, तो इससे साबित होता है कि तुम्हारी सोच कितनी सरल है! तुम्हें लगता है कि सिद्धांतों की अधिक समझ से तुम दृढ़ रह पाओगे, लेकिन यह सच नहीं है! अगर तुम परमेश्वर के वचनों में सार की बातों को न पहचान पाओ, सत्य के महत्वपूर्ण लक्षण न पकड़ पाओ, और तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग न हो, तो जब समय आएगा और तुम्हें कुछ हो जाएगा, तब तुम उलझन में फँस जाओगे। तुम शैतान के प्रलोभन का सामना नहीं कर पाओगे, न ही शुद्धिकरण का आरंभ सह पाओगे। अगर तुम में कोई सत्य न हो, तुम में दर्शनों का अभाव हो, तो जब समय आएगा, तब तुम स्वयं को ढह जाने से न रोक पाओगे। तुम सारी उम्मीदें खो दोगे और कहोगे, "खैर, अगर मुझे हर हालत में मरना ही है, तो अच्छा होगा कि आखिरी पल तक मेरी ताड़ना की जाए! चाहे ताड़ना हो या आग की झील में भेजा जाना हो—जैसी स्थिति होगी, मैं उसका सामना वैसे ही करूँगा!" यह वैसा ही है जैसा सेवाकर्ताओं के समय में था : कुछ लोगों को लगता था कि चाहे जो हो वे सेवाकर्ता हैं, इसलिए उन्होंने जीवन का अनुसरण बंद कर दिया। वे धूम्रपान करते, शराब पीते, देह-सुख में लिप्त रहते, और जो इच्छा होती करते। कुछ तो बस काम के लिए संसार में लौट आते। प्रतिकूल वातावरण भी ऐसा ही होता है; अगर तुम इस पर काबू न पा सको, तो स्वयं पर ज़रा-सी भी पकड़ ढीली पड़ते ही, तुम सारी उम्मीदें छोड़ दोगे। अगर तुम शैतान के प्रभाव पर काबू न पा सको, तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और शैतान तुम्हें बंदी बना लेगा और एक बार फिर तबाही को सौंप दिये जाओगे। इसलिए, आज तुम्हें अपने आपको सत्य से युक्त करना चाहिए; तुम्हें स्वतंत्र रूप से रहने में सक्षम होना चाहिए; और जब तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ो, तो तुम्हें अभ्यास के मार्ग की खोज करने में सक्षम होना चाहिए। तुम्हें सिंचित करने और तुम्हारी चरवाही करने के लिए अगर अगुवा और कर्मी न भी हों, तो भी तुम्हें अनुसरण का मार्ग ढूँढ़ने में, अपनी कमियों का पता लगाने में और उस सत्य को खोजने में सक्षम होना चाहिए जिससे तुम्हें युक्त होना चाहिए और जिसका तुम्हें अभ्यास करना है। क्या परमेश्वर धरती पर आने के बाद, लगातार इंसान के साथ रह सकता है? अपनी धारणाओं के कारण, कुछ लोगों का मानना है : "हे परमेश्वर, अगर तू एक मुकाम तक हम पर कार्य न करे, तो तेरा कार्य समाप्त नहीं माना जा सकता, क्योंकि शैतान तुझ पर आरोप लगा रहा है।" मैं कहता हूँ, एक बार जब मैं अपने वचन बोल चुका होऊँगा, तो मेरा कार्य सफलतापूर्वक समाप्त हो चुका होगा। जब मेरे पास बोलने के लिए कुछ न होगा, तो मेरा कार्य पूरा हो जाएगा। मेरे कार्य का समापन शैतान की पराजय का सबूत होगा, और इस तरह, यह कहा जा सकता है कि शैतान की ओर से बिना किसी आरोप के, यह सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। लेकिन अगर मेरे कार्य की समाप्ति तक भी तुम्हारे अंदर कोई बदलाव नहीं आता है, तो तुम्हारे जैसे लोग उद्धार के परे हैं और तुम्हें हटा दिया जाएगा। मैं आवश्यकता से अधिक कार्य नहीं करूँगा। मैं तब तक अपना कार्य जारी नहीं रखूँगा जब तक तुम्हें एक निश्चित स्तर तक जीत नहीं लिया जाता, जब तक, तुम सब लोगों को सत्य के हर पहलू का स्पष्ट ज्ञान नहीं हो जाता, तुम्हारी क्षमता में सुधार नहीं आ जाता, तुम आंतरिक और बाहरी तौर पर गवाही नहीं दे देते। यह असंभव होगा! आज मैं तुम पर जो कार्य कर रहा हूँ, वो तुम्हें सामान्य मानवीयता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह नए युग के आरंभ और इंसान को नए युग में ले जाने के लिए है। यह कार्य कदम-दर-कदम किया जाता है और प्रत्यक्ष रूप से तुम लोगों के मध्य विकसित होता है : मैं तुम लोगों को रूबरू शिक्षा देता हूँ; मैं तुम्हें हाथ पकड़कर ले जाता हूँ; मैं तुम लोगों को वो बातें बताता हूँ जिसकी तुम्हें समझ नहीं है; तुम्हें वो चीज़ें प्रदान करता हूँ जिनका तुम्हारे अंदर अभाव है। यह कहा जा सकता है कि यह सारा कार्य तुम लोगों के जीवन-पोषण के लिए है, तुम लोगों को सामान्य मानवीयता के जीवन में ले जाने के लिए है; यह खास तौर से अंत के दिनों में लोगों के इस समूह को जीवन के लिए पोषण मुहैया कराने के लिए है। मेरे लिये, यह सारा कार्य पुराने युग का अंत करने और नए युग में ले जाने के लिए है; जहाँ तक शैतान का सवाल है, मैंने उसी को पराजित करने के लिए देहधारण किया। मैं तुम लोगों के बीच अब जो कार्य कर रहा हूँ, वह तुम्हारा आज का पोषण और सही समय पर तुम्हारा उद्धार है, लेकिन इन थोड़े-से वर्षों में, मैं तुम लोगों को सारा सत्य, जीवन का सारा मार्ग बता दूँगा, यहाँ तक कि भविष्य का कार्य भी बता दूँगा; भविष्य में यह तुम लोगों को सामान्य तौर पर चीज़ों का अनुभव करने में समर्थ बनाने के लिए पर्याप्त होगा। मैंने बस अपने सारे वचन तुम लोगों को सौंप दिए हैं। मैं और कोई उपदेश नहीं देता हूँ; आज, मैंने तुम लोगों से जो सारे वचन बोले हैं, वे ही मेरे उपदेश हैं, क्योंकि आज तुम लोगों को मेरे बोले गए वचनों का कोई अनुभव नहीं है, और तुम लोग उनके आंतरिक अर्थ को नहीं समझते हो। एक दिन, तुम लोगों के अनुभव फलीभूत होंगे, जैसा कि आज मैंने कहा है। ये वचन तुम्हारे आज के दर्शन हैं, और भविष्य में तुम इन्हीं पर निर्भर रहोगे; वे आज जीवन के लिए पोषण हैं और भविष्य के लिए उपदेश हैं, इससे बेहतर उपदेश नहीं हो सकते थे। क्योंकि मेरे पास कार्य करने के लिए धरती पर उतना समय नहीं है जितना मेरे वचनों का अनुभव करने के लिए तुम्हारे पास है; मैं मात्र अपना कार्य पूरा कर रहा हूँ, जबकि तुम लोग जीवन का अनुसरण कर रहे हो, एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीवन की लंबी यात्रा शामिल है। बहुत-सी चीज़ों का अनुभव करने के बाद ही तुम जीवन के मार्ग को पूरी तरह से प्राप्त कर पाओगे; तभी तुम मेरे आज बोले गए वचनों के अंदर छिपे हुए अर्थ को समझ पाओगे। जब तुम्हारे हाथों में मेरे वचन होंगे, जब तुम सब लोगों को मेरे सारे आदेश प्राप्त हो जाएँगे, एक बार जब मैं तुम्हें वो सारे कार्य सौंप दूँगा जो मुझे सौंपने चाहिए, और जब वचनों का कार्य समाप्त हो जाएगा, बिना इस बात की परवाह किए कि कितना विशाल प्रभाव प्राप्त हुआ है, तब परमेश्वर की इच्छा का कार्यांवयन भी हो चुका होगा। ऐसा नहीं है जैसा तुम सोचते हो कि तुम्हें एक निश्चित स्थिति तक बदलना चाहिए; परमेश्वर तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करता।

लोग ज़िंदगी में कुछ ही दिनों में विकास प्राप्त नहीं कर लेते हैं। अगर वे हर दिन भी परमेश्वर के वचनों को खाएँ-पिएँ, तो भी यह पर्याप्त नहीं होता। उन्हें अपने जीवन में विकास की अवधि का अनुभव करना चाहिए। यह एक आवश्यक प्रक्रिया है। आज लोगों की क्षमता को देखते हुए, वे क्या हासिल कर सकते हैं? परमेश्वर लोगों की आवश्यकता के अनुसार कार्य करता है, वह उनकी आंतरिक क्षमता के आधार पर उपयुक्त अपेक्षा ही करता है। मान लो कि यह कार्य उच्च क्षमता वाले लोगों के समूह के मध्य किया गया होता : बोले गए वचन तुम लोगों के लिए बोले गए वचनों से अधिक उन्नत होते, दर्शन भी अधिक उन्नत होते, और सत्य भी अधिक उन्नत होते। कुछ वचनों को अधिक कठोर होना होता, इंसान के जीवन-पोषण के लिए अधिक सक्षम होना होता, रहस्यों का उद्घाटन करने में अधिक सक्षम होना होता। लोगों के मध्य बोलते समय, परमेश्वर उनकी आवश्यकताओं के अनुसार उन्हें पोषण देगा। आज तुमसे की गयी अपेक्षाएँ अत्यंत सख्त हो सकती हैं; अगर यही कार्य उच्चतर क्षमता वाले लोगों के समूह पर किया गया होता, तो अपेक्षाएँ कहीं अधिक बड़ी होतीं। परमेश्वर का सारा कार्य लोगों की निहित क्षमता के अनुसार किया जाता है। आज लोगों को जिस हद तक बदला और जीता गया है, वह अधिकतम सीमा है; कार्य का यह चरण कितना प्रभावी रहा है, इसे मापने के लिए अपनी धारणाओं का इस्तेमाल मत करो। सहज रूप से तुम्हारे अंदर जो कुछ है, उसके बारे में तुम लोगों को स्पष्ट होना चाहिए, अपने आपको बहुत ऊँचा मत समझो। मूलत:, तुम में से किसी ने भी जीवन का अनुसरण नहीं किया, बल्कि तुम लोग गलियों में भटकने वाले भिखारी थे। परमेश्वर का तुम्हारी कल्पना की हद तक तुम लोगों को आकार देना, ज़मीन पर तुमसे दंडवत करवाना, तुम्हें पूरी तरह से आश्वस्त करना, मानो कि तुम लोगों ने कोई महान दर्शन देख लिया हो—असंभव है! यह असंभव इसलिए है क्योंकि जिसने परमेश्वर के चमत्कारों को नहीं देखा है, वह मेरी बातों पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर सकता। अगर तुम लोग अच्छी तरह से मेरे वचनों की जाँच भी करते, तो भी तुम्हें पूरी तरह से यकीन न होता; यही इंसानी प्रकृति है। सत्य का अनुसरण करने वालों में कुछ बदलाव आएगा, जबकि जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, उनकी आस्था कम होगी और शायद समाप्त भी हो जाए। तुम लोगों की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि परमेश्वर के वचनों को पूरा होते देखे बिना, पूरी तरह से विश्वास नहीं कर पाते, उसके चमत्कारों को देखे बिना, तुम्हारा विरोध शांत नहीं होता। ऐसी चीज़ों को देखे बिना, कौन परमेश्वर के प्रति पूर्ण रूप से निष्ठावान होगा? और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों का जिसमें विश्वास है, वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि वह चमत्कार है। मैं अब सत्य के विभिन्न पहलुओं पर साफ तौर पर बोल चुका हूँ; उनमें से प्रत्येक पूर्ण है और उन सभी के बीच बहुत करीबी संबंध है। तुमने उन्हें देखा है और अब तुम्हें उन्हें अमल में लाना चाहिए। आज मैं तुम्हें मार्ग दिखाता हूँ, और भविष्य में तुम्हें इन्हें अपने आप अमल में लाना चाहिए। मेरे बोले वचन लोगों से उनकी वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर अपेक्षा रखते हैं, और मैं उनकी आवश्यकताओं और उनमें निहित चीज़ों के अनुसार कार्य करता हूँ। व्यवहारिक परमेश्वर धरती पर व्यवहारिक कार्य करने के लिए आया है, लोगों की वास्तविक परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करने के लिए आया है। वह अतर्कसंगत नहीं है। जब परमेश्वर कार्य करता है, तो वह लोगों को बाध्य नहीं करता। मिसाल के तौर पर, तुम्हारा विवाह करना या न करना, तुम्हारी परिस्थितियों की वास्तविकता पर निर्भर करता है; तुम्हें साफ तौर पर सत्य पहले ही बता दिया गया है, और मैं तुम्हें रोकता नहीं हूँ। कुछ लोगों का परिवार उन्हें परमेश्वर में आस्था रखने से रोकता है जिससे कि वे जब तक शादी न करें, परमेश्वर में आस्था न रख पाएँ। इस तरह, विवाह विपरीत तौर पर उनके लिए मददगार है। दूसरों के लिए, विवाह फायदेमंद नहीं है, बल्कि उसके कारण उन्हें वह भी गँवाना पड़ता है जो पहले उनके पास था। तुम्हारा अपना मामला तुम्हारी वास्तविक परिस्थितियों और तुम्हारे अपने संकल्प से तय होना चाहिए। मैं यहाँ तुम्हारे लिए नए नियम-कानून बनाने के लिए नहीं हूँ जिनके अनुसार मैं तुम लोगों से अपेक्षाएँ करूँ। बहुत-से लोग लगातार चिल्लाते रहते हैं, "परमेश्वर व्यवहारिक है; उसका कार्य वास्तविकता और हमारी परिस्थितियों की वास्तविकता पर आधारित है"—लेकिन क्या तुम जानते हो कि क्या इसे असल बनाता है? बहुत हुई तुम्हारी खोखली बातें! परमेश्वर का कार्य असल है और वास्तविकता पर आधारित है; इसके कोई सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि यह एकदम मुक्त है, पूरा का पूरा खुला हुआ और स्पष्ट। इन कुछ सिद्धांतों के विशिष्ट ब्यौरे क्या हैं? क्या तुम बता सकते हो कि परमेश्वर के कार्य के कौन-से हिस्से ऐसे हैं? तुम्हें विस्तार से बोलना चाहिए, तुम्हारे पास कई तरह की अनुभवजन्य गवाहियाँ होनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के कार्य की इस विशेषता के बारे में एकदम स्पष्ट होना चाहिए—तुम्हें इसका ज्ञान होना चाहिए, तभी तुम इन वचनों को बोलने के पात्र बन पाओगे। अगर तुमसे कोई यह पूछे तो क्या तुम उत्तर दे सकते हो : "देहधारी परमेश्वर ने अंत के दिनों में क्या कार्य किया है? यहाँ ‘व्यवहारिक’ का क्या अर्थ है? क्या तुम उसके व्यवहारिक कार्य के बारे में और उसमें विशेष रूप से क्या शामिल है, बता सकते हो? यीशु देहधारी परमेश्वर है, और आज का परमेश्वर भी देहधारी परमेश्वर है, तो इनमें क्या अंतर है? और क्या समानताएँ हैं? दोनों ने क्या कार्य किया है?" ये सब गवाही देने से संबंधित हैं! इन्हें लेकर भ्रमित मत हो जाना। कुछ लोग यह कहते हैं : "आज परमेश्वर का कार्य असली है। इसमें चमत्कारों और करामातों के प्रदर्शन का कोई स्थान नहीं है।" क्या वह वाकई कोई चमत्कार और करामात नहीं दिखाता? तुम्हें पक्का यकीन है? तुम जानते हो सच में मेरा काम क्या है? कोई यह बात कह सकता है कि वह चमत्कार और करामात नहीं दिखाता, लेकिन वह जो काम करता है और जो वचन बोलता है, क्या वे सब चमत्कार नहीं हैं? कोई कह सकता है कि वह चमत्कार और करामात नहीं दिखाता, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी व्याख्या कैसे की जाती है और ये किनके लिए हैं? कलीसिया में जाए बिना, उसने लोगों की स्थितियों को उजागर कर दिया, और बोलने के अलावा कोई और काम किए बगैर उसने लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है—क्या ये सब चमत्कार नहीं हैं? केवल वचनों से, उसने लोगों को जीत लिया है, और लोग बिना संभावनाओं या उम्मीदों के प्रसन्नता से उसका अनुसरण करते हैं—क्या यह भी चमत्कार नहीं है? जब वह बोलता है, तो उसके वचन लोगों में एक विशेष प्रकार के मनोभाव को प्रेरित करते हैं। अगर वे प्रसन्न महसूस नहीं करते, तो वे खिन्न हो जाते हैं; अगर वे शुद्धिकरण के अधीन नहीं हैं, तो ताड़ना के अधीन हैं। मात्र कुछ तीखे वचनों से, वह लोगों को ताड़ना देता है—क्या यह अलौकिक नहीं है? क्या इंसान ऐसा काम कर सकता है? तुमने इतने सालों तक बाइबल पढ़ी है, तुमने न तो कुछ समझा, न हासिल किया और न ही कोई अंतर्दृष्टि प्राप्त की; तुम अपने आपको विश्वास के उन पुराने और पारम्परिक तरीकों से अलग नहीं कर पाए। बाइबल को समझने का तुम्हारे पास कोई तरीका नहीं है। फिर भी वह बाइबल को पूरी तरह समझ सकता है—क्या यह अलौकिक नहीं है? परमेश्वर जब धरती पर आया, तब अगर उसके बारे में कुछ भी अलौकिक न होता, तो क्या वह तुम लोगों को जीत पाता? उसके असाधारण, दिव्य कार्य के बगैर, तुम में से कौन आश्वस्त होता? तुम्हारी नज़र में, तुम्हें लगता है कि एक सामान्य इंसान काम कर रहा है और तुम लोगों के साथ रह रहा है—बाहर से वह सामान्य, साधारण व्यक्ति दिखता है; तुम जो देखते हो वो सामान्य मानवीयता का मुखौटा है, जबकि सच्चाई यह है कि इसमें दिव्यता कार्यरत है। यह सामान्य मानवीयता नहीं है, बल्कि दिव्यता है; कार्य करता हुआ स्वयं परमेश्वर है, वह कार्य है जिसे वह सामान्य मानवीयता का उपयोग करके करता है। इस तरह, उसका कार्य सामान्य भी है और अलौकिक भी। उसके कार्य को इंसान नहीं कर सकता; और चूँकि इस कार्य को सामान्य इंसान नहीं कर सकता, तो यह असाधारण प्राणी द्वारा किया जाता है। फिर भी यह दिव्यता है जो असाधारण है, न कि मानवीयता; दिव्यता मानवीयता से भिन्न है। जिस व्यक्ति को पवित्र आत्मा उपयोग में लाता है, वह भी साधारण, सामान्य मानवीयता का होता है, लेकिन वह इस कार्य को करने में सक्षम नहीं है। यहाँ एक अंतर है। तुम कह सकते हो : "परमेश्वर कोई अलौकिक परमेश्वर नहीं है; वह कुछ भी अलौकिक नहीं करता। हमारा परमेश्वर व्यवहारिक और वास्तविक वचन बोलता है। वह कलीसिया में वास्तविक और व्यवहारिक कार्य करने आता है। वह हमसे प्रतिदिन आमने-सामने बोलता है, और वह रूबरू ही हमारी स्थिति की ओर इशारा करता है—हमारा परमेश्वर वास्तविक है! वह हमारे साथ रहता है, और उसके बारे में हर चीज़ पूरी तरह से सामान्य है। उसके वेष में कोई भी बात उसे परमेश्वर के रूप में विशिष्ट नहीं बनाती। कभी-कभी ऐसा भी समय आता है, जब वह क्रोधित हो जाता है और हम उसके रोष का प्रताप देखते हैं, कभी-कभी वह मुस्कुराता है, और हम उसका मुस्कुराने वाला व्यवहार देखते हैं। वह आकार और रूप के साथ माँस और रक्त से बना, स्वयं परमेश्वर है जो असली और वास्तविक है।" जब तुम इस तरह से गवाही देते हो, तो वह अपूर्ण गवाही होती है। इससे दूसरों को क्या फायदा होगा? अगर तुम स्वयं परमेश्वर के कार्य की अंदरूनी कहानी और सार की गवाही न दे सको, तो तुम्हारी "गवाही" किसी काम की नहीं!

परमेश्वर की गवाही देना मूलत: परमेश्वर के कार्य के बारे में तुम्हारा अपने ज्ञान को बताने का मामला है, और यह बताना है कि परमेश्वर कैसे लोगों को जीतता है, कैसे उन्हें बचाता है और कैसे उन्हें बदलता है; यह बताना है कि वह सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए कैसे लोगों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें जीते जाने की, पूर्ण बनाए जाने की और बचाए जाने की अनुमति देता है। गवाही देने का अर्थ है उसके कार्य के बारे में बोलना, और उस सब के बारे में बोलना जिसका तुमने अनुभव किया है। केवल उसका कार्य ही उसका प्रतिनिधित्व कर सकता है, उसका कार्य ही उसे सार्वजनिक रूप से उसकी समग्रता में प्रकट कर सकता है; उसका कार्य उसकी गवाही देता है। उसका कार्य और उसके कथन सीधे तौर पर पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं; वह जो कार्य करता है, उसे आत्मा द्वारा किया जाता है, और वह जो वचन बोलता है, वे आत्मा द्वारा बोले जाते हैं। ये बातें मात्र देहधारी परमेश्वर के ज़रिए व्यक्त की जाती हैं, फिर भी, असलियत में, वे आत्मा की अभिव्यक्ति हैं। उसके द्वारा किए जाने वाले सारे कार्य और बोले जाने वाले सारे वचन उसके सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर, देहधारण करके और इंसान के बीच आकर, परमेश्वर न बोलता या कार्य न करता, और वह तुमसे उसकी वास्तविकता, उसकी सामान्यता और उसकी सर्वशक्तिमत्ता बताने के लिए कहता, तो क्या तुम ऐसा कर पाते? क्या तुम जान पाते कि आत्मा का सार क्या है? क्या तुम उसके देह के गुण जान पाते? चूँकि तुमने उसके कार्य के हर चरण का अनुभव कर लिया है, इसलिए उसने तुम लोगों को उसकी गवाही देने के लिए कहा। अगर तुम्हें ऐसा कोई अनुभव न होता, तो वो तुम लोगों को अपनी गवाही देने पर ज़ोर न देता। इस तरह, जब तुम परमेश्वर की गवाही देते हो, तो तुम न केवल उसकी सामान्य मानवीयता के बाह्य रूप की गवाही देते हो, बल्कि उसके कार्य की और उस मार्ग की भी गवाही देते हो जो वो दिखाता है; तुम्हें इस बात की गवाही देनी होती है कि तुम्हें उसने कैसे जीता है और तुम किन पहलुओं में पूर्ण बनाए गए हो। तुम्हें इस किस्म की गवाही देनी चाहिए। अगर, तुम कहीं भी जाकर चिल्लाओगे : "हमारा परमेश्वर कार्य करने आया है, और उसका कार्य सचमुच व्यवहारिक है! उसने हमें बिना अलौकिक कार्यों के, बिना चमत्कारों और करामातों के प्राप्त कर लिया है!" तो लोग पूछेंगे : "तुम्हारा यह कहने का क्या मतलब है कि वो चमत्कार और करामात नहीं दिखाता? बिना चमत्कार और करामात दिखाए उसने तुम्हें कैसे जीत लिया?" और तुम कहते हो : "वह बोलता है और उसने बिना चमत्कार और करामात दिखाए, हमें जीत लिया। उसके कामों ने हमें जीत लिया।" आखिरकार, अगर तुम्हारी बातों में सार नहीं है, अगर तुम कोई विशिष्ट बात न बता सको, तो क्या यह सच्ची गवाही है? देहधारी परमेश्वर जब लोगों को जीतता है, तो यह कार्य उसके दिव्य वचन करते हैं। मानवीयता इस कार्य को नहीं कर सकती; इसे कोई नश्वर इंसान नहीं कर सकता, उच्चतम क्षमता वाले लोग भी इस कार्य को नहीं कर सकते, क्योंकि उसकी दिव्यता किसी भी सृजित प्राणी से ऊँची है। यह लोगों के लिए असाधारण है; आखिरकार, सृष्टिकर्ता सृजित प्राणी से ऊँचा है; सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता से ऊँचा नहीं हो सकता; अगर तुम उससे ऊँचे होते, तो वो तुम्हें जीत नहीं पाता, वह तुम्हें इसलिए ही जीत पाता है क्योंकि वह तुमसे ऊँचा है। जो सारी मानवता को जीत सकता है वह सृष्टिकर्ता है, और अन्य कोई नहीं, केवल वही इस कार्य को कर सकता है। ये वचन "गवाही" हैं—ऐसी गवाही जो तुम्हें देनी चाहिए। तुमने धीरे-धीरे ताड़ना, न्याय, शुद्धिकरण, परीक्षण, विफलता और कष्टों का अनुभव किया है, और तुम्हें जीता गया है; तुमने देह की संभावनाओं का, निजी अभिप्रेरणाओं का, और देह के अंतरंग हितों का त्याग किया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों ने तुम्हें पूरी तरह से जीत लिया है। हालाँकि तुम उसकी अपेक्षाओं के अनुसार अपने जीवन में उतना आगे नहीं बढ़े हो, तुम ये सारी बातें जानते हो और तुम उसके काम से पूरी तरह से आश्वस्त हो। इस तरह, इसे वो गवाही कहा जा सकता है, जो असली और सच्ची है। परमेश्वर न्याय और ताड़ना का जो कार्य करने आया है, उसका उद्देश्य इंसान को जीतना है, लेकिन वह अपने कार्य को समाप्त भी कर रहा है, युग का अंत कर रहा है और समाप्ति का कार्य कर रहा है। वह पूरे युग का अंत कर रहा है, हर इंसान को बचा रहा है, इंसान को हमेशा के लिए पाप से मुक्त कर रहा है; वह पूरी तरह से अपने द्वारा सृजित मानव को हासिल कर रहा है। तुम्हें इस सब की गवाही देनी चाहिए। तुमने परमेश्वर के इतने सारे कार्य का अनुभव किया है, तुमने इसे अपनी आँखों से देखा है और व्यक्तिगत रुप से अनुभव किया है; एकदम अंत तक पहुँचकर तुम्हें सौंपे गए कर्तव्य को पूरा करने में असफल नहीं होना चाहिए। यह कितना दुखद होगा! भविष्य में, जब सुसमाचार फैलेगा, तो तुम्हें अपने ज्ञान के बारे में बताने में सक्षम होना चाहिए, अपने दिल में तुमने जो कुछ पाया है, उसकी गवाही देने में सक्षम होना चाहिए और कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए। एक सृजित प्राणी को यह सब हासिल करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के असली मायने क्या हैं? इसका प्रभाव क्या है? और इसका कितना हिस्सा इंसान पर किया जाता है? लोगों को क्या करना चाहिए? जब तुम लोग देहधारी परमेश्वर के धरती पर आने के बाद से उसके द्वारा किए सारे कार्य को साफ तौर पर बता सकोगे, तब तुम्हारी गवाही पूरी होगी। जब तुम लोग साफ तौर पर इन पाँच चीज़ों के बारे में बता सकोगे : उसके कार्य के मायने; उसकी विषय-वस्तु; उसका सार, वह स्वभाव जिसका प्रतिनिधित्व उसका कार्य करता है; उसके सिद्धांत, तब यह साबित होगा कि तुम परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे अंदर सच्चा ज्ञान है। मेरी तुमसे बहुत अधिक अपेक्षाएँ नहीं हैं, जो लोग सच्ची खोज में लगे हैं, वे उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। अगर तुम परमेश्वर के गवाहों में से एक होने के लिए दृढ़संकल्प हो, तो तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर को किससे घृणा है और किससे प्रेम। तुमने उसके बहुत सारे कार्य का अनुभव किया है; उसके कार्य के ज़रिए, तुम्हें उसके स्वभाव का ज्ञान होना चाहिए, उसकी इच्छा को और इंसान से उसकी अपेक्षाओं को समझना चाहिए, और इस ज्ञान का उपयोग उसकी गवाही देने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए करना चाहिए। तुम इतना ही कह सकते हो : "हम परमेश्वर को जानते हैं। उसका न्याय और ताड़ना बहुत कठोर हैं। उसके वचन बहुत सख्त हैं; वे धार्मिक और प्रतापी हैं, और कोई इंसान उनका उल्लंघन नहीं कर सकता," लेकिन क्या ये वचन अंतत: इंसान को पोषण देते हैं? लोगों पर इनका प्रभाव क्या होता है? क्या तुम वास्तव में जानते हो कि न्याय और ताड़ना का यह कार्य तुम्हारे लिए सर्वाधिक लाभकारी है? परमेश्वर के न्याय और ताड़ना तुम्हारी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता को उजागर करते हैं, है ना? वे तुम्हारे भीतर की उन गंदी और भ्रष्ट चीजों को साफ़ कर सकते हैं और बाहर निकाल सकते हैं, है न? अगर ताड़ना और न्याय न होते, तो तुम्हारा क्या होता? क्या तुम वास्तव में इस तथ्य को समझते हो कि शैतान ने तुम्हें गंभीरतम बिन्दु तक भ्रष्ट कर दिया है? आज, तुम लोगों को इन चीज़ों से युक्त होना चाहिए और इन चीज़ों को अच्छी तरह जानना चाहिए।

आज के समय में परमेश्वर में विश्वास ऐसी आस्था नहीं है जिसकी शायद तुम लोग कल्पना करो—कि इतना पर्याप्त है कि परमेश्वर के वचन पढ़ लिए, प्रार्थना कर ली, भजन गा लिए, नाच लिए, अपने कर्तव्य का निर्वहन कर लिया और सामान्य मानवीयता का जीवन जी लिया। विश्वास रखना सचमुच इतना आसान है क्या? नतीजे मुख्य हैं। यह मुख्य नहीं कि काम को करने के कितने तरीके तुम्हारे पास हैं; बल्कि यह मुख्य है कि तुम सर्वश्रेष्ठ नतीजे आख़िर कैसे हासिल कर सकते हो। शायद तुम परमेश्वर के वचन लेकर अपना ज्ञान प्रतिपादित कर सकते हो, लेकिन जब तुम उन्हें एक ओर रख देते हो, तो तुम्हारे पास कहने को कुछ नहीं होता। इससे ज़ाहिर होता है कि तुम केवल पत्रों और सिद्धांतों की बात तो कर सकते हो लेकिन तुममें अनुभव के ज्ञान का अभाव है। आज, अगर तुम अहम बातों को नहीं समझते हो, तो काम नहीं चलेगा—वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण है! स्वयं को इस तरह से तैयार करो : पहले, परमेश्वर के वचन पढ़ो; उनमें दी गयी आध्यात्मिक शब्दावली को अच्छी तरह से समझो; उनमें दिए गए महत्वपूर्ण दर्शनों को ढूँढ़ो; अभ्यास से जुड़े हिस्सों को पहचानो; इन सारे तत्वों को एक-एक करके एक-साथ लाओ; अपने अनुभव में उनमें प्रवेश करो। इन महत्वपूर्ण बातों को समझो। परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते समय सबसे महत्वपूर्ण अभ्यास यह है : परमेश्वर के वचनों के एक अध्याय को पढ़ लेने के बाद, तुम्हें दर्शनों से संबंधित अहम हिस्सों का पता लगाने में समर्थ होना चाहिए, और तुम्हें अभ्यास से संबंधित अहम हिस्सों का पता लगाने में समर्थ होना चाहिए; दर्शनों को आधार के रूप में उपयोग में लाओ और अभ्यास को अपने जीवन में अपने मार्गदर्शक के तौर पर इस्तेमाल करो। तुम लोगों के अंदर सबसे अधिक कमी इन्हीं चीज़ों की है, और यही तुम लोगों की सबसे बड़ी मुश्किल है; तुम लोग अपने दिल में शायद ही कभी इन बातों पर ध्यान देते हो। आमतौर पर, तुम लोग आलस्य की अवस्था में रहते हो, व्यक्तिगत त्याग करने में प्रेरणारहित और अनिच्छुक रहते हो; या निष्क्रिय रहकर प्रतीक्षा करते हो, और कुछ लोग तो शिकायत भी करते हैं; वे परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य और उसके मायने नहीं समझते, उनके लिए सत्य का अनुसरण करना कठिन होता है। ऐसे लोग सत्य से घृणा करते हैं और वे अंतत: हटा दिए जाएँगे। उनमें से किसी को भी पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, और कोई भी जीवित नहीं बच सकता। अगर लोगों में शैतानी ताकतों का विरोध करने का ज़रा-सा भी संकल्प नहीं है, तो उनमें सुधार की कोई उम्मीद नहीं है!

अब, तुम्हारा प्रयास प्रभावी रहा है या नहीं, यह इस बात से मापा जाता है कि इस समय तुम लोगों के अंदर क्या है। तुम लोगों के परिणाम का निर्धारण करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है; कहने का अर्थ है कि तुम लोगों ने जिन चीज़ों का त्याग किया है और जो कुछ काम किए हैं, उनसे तुम लोगों का परिणाम सामने आता है। तुम लोगों के प्रयास से, तुम लोगों की आस्था से, तुम लोगों ने जो कुछ किया है उनसे, तुम लोगों का परिणाम जाना जाएगा। तुम लोगों में, बहुत-से ऐसे हैं जो पहले ही उद्धार से परे हो चुके हैं, क्योंकि आज का दिन लोगों के परिणाम को उजागर करने का दिन है, और मैं अपने काम में उलझा हुआ नहीं रहूँगा; मैं अगले युग में उन लोगों को नहीं ले जाऊँगा जो पूरी तरह से उद्धार से परे हैं। एक समय आएगा, जब मेरा कार्य पूरा हो जाएगा। मैं उन दुर्गंधयुक्त, बेजान लाशों पर कार्य नहीं करूँगा जिन्हें बिल्कुल भी बचाया नहीं जा सकता; अब इंसान के उद्धार के अंतिम दिन हैं, और मैं निरर्थक कार्य नहीं करूँगा। स्वर्ग और धरती का विरोध मत करो—दुनिया का अंत आ रहा है। यह अपरिहार्य है। चीज़ें इस मुकाम तक आ गयी हैं, और उन्हें रोकने के लिए तुम इंसान के तौर पर कुछ नहीं कर सकते; तुम अपनी इच्छानुसार चीज़ों को बदल नहीं सकते। कल, तुमने सत्य का अनुसरण करने के लिए कीमत अदा नहीं की थी और तुम निष्ठावान नहीं थे; आज, समय आ चुका है, तुम उद्धार से परे हो; और आने वाले कल में तुम्हारे उद्धार की कोई गुंजाइश नहीं होगी। हालाँकि मेरा दिल कोमल है और मैं तुम्हें बचाने के लिए सब-कुछ कर रहा हूँ, अगर तुम अपने स्तर पर प्रयास नहीं करते या अपने लिए विचार नहीं करते, तो इसका मुझसे क्या लेना-देना? जो लोग केवल अपने देह-सुख की सोचते हैं और सुख-साधनों का आनंद लेते हैं; जो विश्वास रखते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन सचमुच विश्वास नहीं रखते; जो बुरी औषधियों और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; जो व्यभिचारी हैं, जो बिखर चुके हैं, तार-तार हो चुके हैं; जो यहोवा के चढ़ावे और उसकी संपत्ति को चुराते हैं; जिन्हें रिश्वत पसंद है; जो व्यर्थ में स्वर्गारोहित होने के सपने देखते हैं; जो अहंकारी और दंभी हैं, जो केवल व्यक्तिगत शोहरत और धन-दौलत के लिए संघर्ष करते हैं; जो कर्कश शब्दों को फैलाते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की निंदा करते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की आलोचना और बुराई करने के अलावा कुछ नहीं करते; जो गुटबाज़ी करते हैं और स्वतंत्रता चाहते हैं; जो खुद को परमेश्वर से भी ऊँचा उठाते हैं; वे तुच्छ नौजवान, अधेड़ उम्र के लोग और बुज़ुर्ग स्त्री-पुरुष जो व्यभिचार में फँसे हुए हैं; जो स्त्री-पुरुष निजी शोहरत और धन-दौलत का मज़ा लेते हैं और लोगों के बीच निजी रुतबा तलाशते हैं; जिन लोगों को कोई मलाल नहीं है और जो पाप में फँसे हुए हैं—क्या वे तमाम लोग उद्धार से परे नहीं हैं? व्यभिचार, पाप, बुरी औषधि, जादू-टोना, अश्लील भाषा और असभ्य शब्द सब तुम लोगों में निरंकुशता से फैल रहे हैं; सत्य और जीवन के वचन तुम लोगों के बीच कुचले जाते हैं और तुम लोगों के मध्य पवित्र भाषा मलिन की जाती है। तुम मलिनता और अवज्ञा से भरे हुए अन्यजाति राष्ट्रो! तुम लोगों का अंतिम परिणाम क्या होगा? जिन्हें देह-सुख से प्यार है, जो देह का जादू-टोना करते हैं, और जो व्यभिचार के पाप में फँसे हुए हैं, वे जीते रहने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं! क्या तुम नहीं जानते कि तुम जैसे लोग कीड़े-मकौड़े हैं जो उद्धार से परे हैं? किसी भी चीज़ की माँग करने का हक तुम्हें किसने दिया? आज तक, उन लोगों में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं आया है जिन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, जो केवल देह से प्यार करते हैं—ऐसे लोगों को कैसे बचाया जा सकता है? जो जीवन के मार्ग को प्रेम नहीं करते, जो परमेश्वर को ऊँचा उठाकर उसकी गवाही नहीं देते, जो अपने रुतबे के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो अपनी प्रशंसा करते हैं—क्या वे आज भी वैसे ही नहीं हैं? उन्हें बचाने का क्या मूल्य है? तुम्हारा बचाया जाना इस बात पर निर्भर नहीं है कि तुम कितने वरिष्ठ हो या तुम कितने साल से काम कर रहे हो, और इस बात पर तो बिल्कुल भी निर्भर नहीं है कि तुमने कितनी साख बना ली है। बल्कि इस बात पर निर्भर है कि क्या तुम्हारा लक्ष्य फलीभूत हुआ है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जिन्हें बचाया जाता है वे ऐसे "वृक्ष" होते हैं जिन पर फल लगते हैं, ऐसे वृक्ष नहीं जो हरी-भरी पत्तियों और फूलों से तो लदे होते हैं, लेकिन जिन पर फल नहीं आते। अगर तुम बरसों तक भी गलियों की खाक छानते रहे हो, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? तुम्हारी गवाही कहाँ है? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी श्रद्धा, खुद के लिए तुम्हारे प्रेम और तुम्हारी वासनायुक्त कामनाओं से कहीं कम है—क्या इस तरह का व्यक्ति पतित नहीं है? वे उद्धार के लिए नमूना और आदर्श कैसे हो सकते हैं? तुम्हारी प्रकृति सुधर नहीं सकती, तुम बहुत ही विद्रोही हो, तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता! क्या ऐसे लोगों को हटा नहीं दिया जाएगा? क्या मेरे काम के समाप्त हो जाने का समय तुम्हारा अंत आने का समय नहीं है? मैंने तुम लोगों के बीच बहुत सारा कार्य किया है और बहुत सारे वचन बोले हैं—इनमें से कितने सच में तुम लोगों के कानों में गए हैं? इनमें से कितनों का तुमने कभी पालन किया है? जब मेरा कार्य समाप्त होगा, तो यह वो समय होगा जब तुम मेरा विरोध करना बंद कर दोगे, तुम मेरे खिलाफ खड़ा होना बंद कर दोगे। जब मैं काम करता हूँ, तो तुम लोग लगातार मेरे खिलाफ काम करते रहते हो; तुम लोग कभी मेरे वचनों का अनुपालन नहीं करते। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तुम अपना "काम" करते हो, और अपना छोटा-सा राज्य बनाते हो। तुम लोग लोमड़ियों और कुत्तों से कम नहीं हो, सब-कुछ मेरे विरोध में कर रहे हो! तुम लगातार उन्हें अपने आगोश में लाने का प्रयास कर रहे हो जो तुम्हें अपना अविभक्त प्रेम समर्पित करते हैं—तुम लोगों की श्रद्धा कहाँ है? तुम्हारा हर काम कपट से भरा होता है! तुम्हारे अंदर न आज्ञाकारिता है, न श्रद्धा है, तुम्हारा हर काम कपटपूर्ण और ईश-निंदा करने वाला होता है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? जो पुरुष यौन-संबंधों में अनैतिक और लम्पट होते हैं, वे हमेशा कामोत्तेजक वेश्याओं को आकर्षित करके उनके साथ मौज-मस्ती करना चाहते हैं। मैं ऐसे काम-वासना में लिप्त अनैतिक राक्षसों को कतई नहीं बचाऊंगा। मैं तुम मलिन राक्षसों से घृणा करता हूँ, तुम्हारा व्यभिचार और तुम्हारी कामोत्तेजना तुम लोगों को नरक में धकेल देगी। तुम लोगों को अपने बारे में क्या कहना है? मलिन राक्षसो और दुष्ट आत्माओ, तुम लोग घिनौने हो! तुम निकृष्ट हो! ऐसे कूड़े-करकट को कैसे बचाया जा सकता है? क्या ऐसे लोगों को जो पाप में फँसे हुए हैं, उन्हें अब भी बचाया जा सकता है? आज, यह सत्य, यह मार्ग और यह जीवन तुम लोगों को आकर्षित नहीं करता; बल्कि, तुम लोग पाप की ओर, धन की ओर, रुतबे की ओर, शोहरत और लाभ की ओर आकर्षित होते हो; देह-सुख की ओर आकर्षित होते हो; सुंदर स्त्री-पुरुषों की ओर आकर्षित होते हो। मेरे राज्य में प्रवेश करने की तुम लोगों की क्या पात्रता है? तुम लोगों की छवि परमेश्वर से भी बड़ी है, तुम लोगों का रुतबा परमेश्वर से भी ऊँचा है, लोगों में तुम्हारी प्रतिष्ठा का तो कहना ही क्या—तुम लोग ऐसे आदर्श बन गए हो जिन्हें लोग पूजते हैं। क्या तुम प्रधान स्वर्गदूत नहीं बन गए हो? जब लोगों के परिणाम उजागर होते हैं, जो वो समय भी है जब उद्धार का कार्य समाप्ति के करीब होने लगेगा, तो तुम लोगों में से बहुत-से ऐसी लाश होंगे जो उद्धार से परे होंगे और जिन्हें हटा दिया जाना होगा। उद्धार-कार्य के दौरान, मैं सभी लोगों के प्रति दयालु और नेक होता हूँ। जब कार्य समाप्त होता है, तो अलग-अलग किस्म के लोगों का परिणाम प्रकट किया जाएगा, और उस समय, मैं दयालु और नेक नहीं रहूँगा, क्योंकि लोगों का परिणाम प्रकट हो चुका होगा, और हर एक को उसकी किस्म के अनुसार वर्गीकृत कर दिया गया होगा, फिर और अधिक उद्धार-कार्य करने का कोई मतलब नहीं होगा, क्योंकि उद्धार का युग गुज़र चुका होगा, और गुज़र जाने के बाद वह वापस नहीं आएगा।

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