637 क्या ये दुनिया तुम्हारी आरामगाह है?

मेरे वचन से बाहर रहने वाले लोग, परीक्षण के कष्टों से भागने वाले लोग,

बस भटक रहे हैं दुनिया में, जैसे उड़ते हैं पतझड़ के पत्ते हवा में।

1

फड़फड़ाते हैं वे इधर उधर।

मिलती नहीं कोई आरामगाह उन्हें,

मिलते नहीं बिल्कुल दिलासे के मेरे वचन उन्हें।

हालांकि पीछा नहीं करते मेरी ताड़ना और शुद्धिकरण उनका,

स्वर्ग के राज्य के बाहर महज़ गलियों के भिखारी हैं वो।

भटक रहे हैं दर-ब-दर वो।

दुनिया तुम्हारी आरामगाह है, क्या यकीन कर सकते हो?

बचकर मेरी ताड़ना से,

क्या तुम इस दुनिया में सहजता से मुस्कुरा सकते हो?

छुपाया जा न सके, दिल के जिस ख़ालीपन को,

क्या पल दो पल की ख़ुशियों से उसे तुम ढक सकते हो?

बना सकते हो मूर्ख तुम अपने घरवालों को,

मगर बना नहीं सकते मूर्ख तुम मुझे।

2

क्योंकि दुर्बल है बहुत आस्था तुम्हारी,

देखी नहीं हैं ख़ुशियाँ जो जीवन दे सकता है तुमको।

बन जाओ सच्चे, आग्रह करता तुमसे मैं, आधा जीवन बिता दो मेरी ख़ातिर।

बेहतर है ये उस साधारण जीवन से

जो जीते तुम, मेहनत करते देह की ख़ातिर,

सहते तमाम दुख-तकलीफ़ें इंसान सह नहीं पाता जिन्हें।

दुनिया तुम्हारी आरामगाह है, क्या यकीन कर सकते हो?

बचकर मेरी ताड़ना से,

क्या तुम इस दुनिया में सहजता से मुस्कुरा सकते हो?

छुपाया जा न सके, दिल के जिस ख़ालीपन को,

क्या पल दो पल की ख़ुशियों से उसे तुम ढक सकते हो?

बना सकते हो मूर्ख तुम अपने घरवालों को,

मगर बना नहीं सकते मूर्ख तुम मुझे।

क्या मायने हैं इसके,

बेहद मुहब्बत करना ख़ुद से और भागना मेरी ताड़ना से?

क्या मायने हैं इसके, बचना मेरी क्षणिक ताड़ना से

और भोगना शर्मिंदगी और सज़ा सदा के लिये?

दुनिया तुम्हारी आरामगाह है, क्या यकीन कर सकते हो?

बचकर मेरी ताड़ना से, क्या तुम इस दुनिया में सहजता से मुस्कुरा सकते हो?

छुपाया जा न सके, दिल के जिस ख़ालीपन को,

क्या पल दो पल की ख़ुशियों से उसे तुम ढक सकते हो?

बना सकते हो मूर्ख तुम अपने घरवालों को,

मगर बना नहीं सकते मूर्ख तुम मुझे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है' से रूपांतरित

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