अध्याय 36
ऐसा कहा जाता है कि परमेश्वर ने अब मनुष्य को ताड़ना देना शुरू कर दिया है, लेकिन कोई भी इस बात का स्पष्ट उत्तर नहीं दे सकता कि इस ताड़ना का सच्चा अर्थ मनुष्य पर आया है या नहीं। परमेश्वर कहता है, “मनुष्य ने ताड़ना में कभी कुछ भी नहीं पाया है, क्योंकि वह अपने दोनों हाथों से अपने गले के जुए को पकड़ने के अलावा कुछ नहीं करता, उसकी दोनों आँखें मुझ पर टिकी रहती हैं, मानो किसी शत्रु पर नजर रखे हों—और इसी पल मुझे दिखता है कि वह कितना दुर्बल है। इसी कारणवश मैं यह कहता हूँ कि कोई भी कभी परीक्षणों के बीच दृढ़ता से खड़ा नहीं रहा है।” परमेश्वर मनुष्य को उस ताड़ना के तथ्यों के बारे में बताता है, जिसका उस पर आना अभी तक बाकी है, और ऐसा वह कुछ भी छोड़े बिना, बहुत विस्तार से करता है। ऐसा लगता है, जैसे मनुष्य ताड़ना में प्रवेश कर चुका है और वास्तव में दृढ़ता से खड़े होने में असमर्थ है। परमेश्वर मनुष्य की बदसूरत विशेषताओं का एक स्पष्ट, सजीव चित्रण प्रस्तुत करता है। इसी कारण मनुष्य स्वयं को दबाव में महसूस करता है : चूँकि परमेश्वर कहता है कि कोई भी कभी परीक्षणों के बीच दृढ़ता से खड़ा नहीं रह पाया है, तो मैं ही कैसे इस विश्व-रिकॉर्ड को तोड़ सकता हूँ, कैसे मैं परंपरा के विरुद्ध स्वीकार्य हो सकता हूँ? इस समय वह सोचना शुरू करता है। वास्तव में, यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा परमेश्वर कहता है, “क्या मैं उन्हें रास्ते के अंत तक ले आया हूँ?” सचमुच, परमेश्वर सभी लोगों को रास्ते के अंत तक ले आया है, और इसलिए, अपनी चेतना में, लोग हमेशा यह मानते हैं कि परमेश्वर क्रूर और अमानवीय है। परमेश्वर ने सभी लोगों को दुनिया के कड़वे समुद्र से बाहर निकाला है, और फिर, “किसी दुर्घटना से बचने के लिए, मैंने पकड़ी गई सभी ‘मछलियों’ को मार दिया, जिसके बाद मछलियाँ समर्पित और आज्ञाकारी हो गईं, और थोड़ी-सी भी शिकायत नहीं करती थीं।” क्या यह तथ्य नहीं है? परमेश्वर ने सभी लोगों को मृत्यु के कड़वे समुद्र से निकालकर मृत्यु की एक दूसरी खाई में खींच लिया है, वह उन सभी को खींचकर “जल्लाद के तख्ते” पर ले आया है, और उसने उन्हें रास्ते के अंत तक पहुँचने पर मजबूर कर दिया है—वह ऐसा परमेश्वर के दूसरे पुत्रों और लोगों के साथ क्यों नहीं करता? बड़े लाल अजगर के देश में ऐसा कार्य करने के पीछे उसका क्या इरादा है? परमेश्वर का हाथ इतना “क्रूर” क्यों है? कोई आश्चर्य नहीं कि “जब मुझे मनुष्य की आवश्यकता होती है, तो वह हमेशा छिपा रहता है। ऐसा लगता है, जैसे उसने कभी भी आश्चर्यजनक दृश्य नहीं देखे, जैसे कि वह ग्रामीण इलाकों में पैदा हुआ हो और शहर के मामलों के बारे में कुछ न जानता हो।” वास्तव में, अपने भीतर लोग पूछते हैं : “ऐसा करके परमेश्वर क्या करने की कोशिश कर रहा है? क्या वह हमें मार डालने की कोशिश नहीं कर रहा? और इसका मतलब क्या है? उसके कार्य के कदम एक के बाद एक हम पर दबाव क्यों डालते हैं, और वह हमारे प्रति थोड़ा-सा भी उदार क्यों नहीं है?” किंतु लोग यह कहने की हिम्मत नहीं करते, और चूँकि परमेश्वर के वचन उन्हें इस तरह के विचारों को त्यागने के लिए प्रेरित करते हैं और उन्हें आगे सोचने के अवसर से वंचित कर देते हैं, इसलिए उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं रहता कि वे इस तरह के और विचारों को छोड़ दें। बात बस इतनी है कि परमेश्वर मनुष्य की सभी धारणाएँ उजागर कर देता है, इसलिए लोग अपनी धारणाएँ पीछे धकेल देते हैं और उन्हें आगे नहीं आने देते। पहले यह कहा गया था कि ये लोग बड़े लाल अजगर की संतति हैं। वास्तव में, स्पष्ट कहा जाए तो, वे बड़े लाल अजगर के मूर्त रूप हैं। जब परमेश्वर उन्हें रास्ते के अंत तक जाने को मजबूर कर देता है और उन्हें मार डालता है, तब—बिना किसी संदेह के—बड़े लाल अजगर के आत्मा के पास उनमें कार्य करने का कोई अवसर नहीं रहता। इस तरह, जब लोग रास्ते के अंत तक पहुँचते हैं, तब बड़ा लाल अजगर भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। यह कहा जा सकता है कि वह परमेश्वर की “महान दया” का बदला चुकाने के लिए मृत्यु का उपयोग कर रहा है। बड़े लाल अजगर के देश में परमेश्वर के कार्य का यह उद्देश्य है। जब लोग अपने जीवन का बलिदान करने के लिए तैयार होते हैं, तो हर चीज तुच्छ हो जाती है और कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता है। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में आगे कुछ करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता। यूँ तो, “देह” की परिभाषा में यह कहा जाता है कि देह शैतान द्वारा भ्रष्ट हुई है, लेकिन अगर लोग वास्तव में स्वयं को अर्पित कर देते हैं, और शैतान से प्रेरित नहीं रहते, तो कोई भी उनकी चुनौती को पार नहीं कर सकता है—और इस समय देह अपना अन्य कार्य निष्पादित करेगी और बाकायदा परमेश्वर के आत्मा से निर्देश प्राप्त करना शुरू कर देगी। यह एक आवश्यक प्रक्रिया है; इसे कदम-दर-कदम होना चाहिए; यदि नहीं, तो परमेश्वर के पास जिद्दी देह में कार्य करने का कोई उपाय नहीं होगा। ऐसी परमेश्वर की बुद्धि है। इस तरह, सभी लोग अनजाने में आज की परिस्थितियों में प्रवेश कर चुके हैं। और क्या यह परमेश्वर नहीं है, जिसने मनुष्य को “बर्बादी की कगार” तक पहुँचाया है? क्या यह मनुष्य द्वारा खोला गया कोई नया रास्ता हो सकता है? तुम लोगों के अनुभवों को देखते हुए ऐसा लगता है कि तुम लोगों पर परमेश्वर अत्यंत क्रूरता के तरीकों का उपयोग करता है, जिससे परमेश्वर की धार्मिकता देखी जा सकती है। तुम लोग कैसे इसकी प्रशंसा नहीं कर सकते? परमेश्वर जो कुछ तुम लोगों पर करता है, वह लोगों को परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव दिखाता है; क्या इसके कारण तुम लोगों को परमेश्वर का अत्यधिक सम्मान नहीं करना चाहिए? आज, इस संक्रांति के समय, जबकि पुराना युग अभी भी अस्तित्व में है और नया युग अभी अस्तित्व में नहीं आया है, तुम लोग परमेश्वर की गवाही कैसे देते हो? क्या ऐसा गंभीर मुद्दा गहरे विचार के योग्य नहीं है? क्या तुम लोग अभी भी अन्य, बाहरी मामलों पर विचार करते हो? परमेश्वर क्यों कहता है, “हालाँकि किसी समय लोग ‘समझ जिंदाबाद’ का नारा लगाते थे, फिर भी किसी ने ‘समझ’ शब्द का विश्लेषण करने में अधिक समय नहीं लगाया, जो दिखाता है कि लोगों में मुझसे प्रेम करने की कोई इच्छा नहीं है”? यदि परमेश्वर ने ऐसी बातें नहीं भी कहीं तो क्या तुम लोग अपनी इच्छा से परमेश्वर के हृदय को समझने की कोशिश नहीं कर सकते?
हालाँकि हाल ही में कुछ लोग परमेश्वर के देहधारण के उद्देश्यों और महत्व के बारे में थोड़ा बहुत जान गए होंगे लेकिन मैं निश्चित रूप से कहता हूँ कि यदि परमेश्वर ने मनुष्य से स्पष्ट रूप से बात नहीं की होती तो कोई भी परमेश्वर के देहधारण के उद्देश्यों और महत्व का अनुमान नहीं लगा पाता। यह पक्का है। क्या यह अभी भी तुम लोगों को स्पष्ट नहीं है? परमेश्वर जो कुछ भी लोगों पर करता है, वह उसकी योजना के प्रबंधन मदों के अलावा कुछ नहीं है—फिर भी वे परमेश्वर के इरादों को सटीक रूप से समझने में असमर्थ हैं। यह मनुष्य की कमी है, किंतु परमेश्वर यह अपेक्षा नहीं रखता कि लोग कुछ करने में सक्षम हों, वह केवल यह चाहता है कि वे “चिकित्सक की सलाह” सुनें। परमेश्वर की यही अपेक्षा है। वह सभी लोगों से सच्चे मानव-जीवन को जानने के लिए कहता है, क्योंकि “उनके दिलों में, ‘मानव-जीवन’ शब्द मौजूद नहीं हैं, उन्हें उनकी कोई परवाह नहीं है, और वे बस मेरे वचनों के प्रति अरुचि महसूस करते हैं, मानो मैं बड़बड़ करने वाली बुढ़िया बन गया हूँ।” लोगों की नजरों में परमेश्वर के वचन किसी रोजमर्रा के बरतन की तरह हैं, और वे उन्हें बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नहीं मानते। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला पाते—वे ऐसे नीच अभागे बन गए हैं, जो सत्य से अवगत तो हैं परंतु उसे अभ्यास में नहीं लाते। इसलिए, मनुष्य की एक अकेली यही कमी एक समयावधि के लिए परमेश्वर में घृणा उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है, और इसलिए वह कई बार कहता है कि लोग उसके वचनों को महत्व नहीं देते। फिर भी अपनी धारणाओं में लोग यह सोचते हैं : “हर दिन हम परमेश्वर के वचनों का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं, तो यह कैसे कहा जा सकता है कि हमने उन्हें महत्व नहीं दिया? क्या यह हमारे साथ अन्याय नहीं है?” पर मैं तुम्हारे लिए थोड़ा गहन-विश्लेषण कर देता हूँ—लोग अवाक हो जाएँगे। जब वे परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, तो वे सहमति में अपना सिर हिलाते हैं, वे दंडवत होकर लोटते हैं, जैसे कोई कुत्ता अपने मालिक के शब्दों पर लोटता है। इस प्रकार, इस समय लोग अपने को अयोग्य महसूस करते हैं, उनकी आँखों से आँसू बहते जाते हैं, मानो वे पश्चात्ताप करना चाहते हों और नए सिरे से शुरू करना चाहते हों। लेकिन जब यह समय बीत जाता है, तो उनका यह भेड़ जैसा आज्ञाकारी स्वभाव तुरंत गायब हो जाता है और उसकी जगह भेड़ियापन ले लेता है। वे परमेश्वर के वचनों को एक तरफ रख देते हैं, हमेशा विश्वास करते हैं कि उनके अपने मामले पहले हैं और परमेश्वर के मामले अंत में आते हैं। उनके इन कार्यकलापों के कारण वे कभी भी परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर पाते। जब तथ्य सामने आते हैं, वे अपनी कोहनी बाहर की तरफ खींचते हैं[क]—यह खाना खिलाने वाले हाथ को ही काट लेना है—कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर कहता है कि वे “बल्कि, जीविका के लिए मुझ पर निर्भर रहते हुए ‘मुझसे कन्नी काटता है।’” केवल इसी से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के वचनों में थोड़ा-सा भी झूठ नहीं है, वे पूरी तरह से सत्य हैं, और उनमें जरा-सी भी अतिशयोक्ति नहीं, फिर भी वे कुछ कम करके कहे गए प्रतीत होते हैं, क्योंकि मनुष्य का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, वह उन्हें सहने में असमर्थ है। परमेश्वर के वचनों ने पहले ही मनुष्य की आंतरिक और बाहरी दोनों चीजों का बिल्कुल स्पष्ट चित्रण प्रस्तुत कर दिया है, उन्होंने उन्हें पूरी स्पष्टता से उकेरा है, जो वास्तव में शैतान के मूल चेहरे से एक सुस्पष्ट समानता दर्शाता है। बात बस इतनी है कि वर्तमान चरण में लोगों ने अभी तक सब कुछ स्पष्ट रूप से नहीं देखा है, और इसलिए यह कहा जाता है कि वे स्वयं को जान नहीं पाए हैं। इसी कारण से मैं कहता हूँ कि यह सबक जारी रहना चाहिए; यह रुक नहीं सकता। जब लोग स्वयं को जान पाएँगे, तभी परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। यह समझना आसान है—मुझे विस्तार में जाने की कोई ज़रूरत नहीं है। परंतु एक बात है, जो मैं तुम लोगों को याद दिलाना चाहूँगा, हालाँकि पहले परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ना चाहिए : “आज इस समय, लोगों ने मुझे कभी कीमती नहीं माना है, उनके हृदय में मेरी कोई जगह नहीं है। क्या वे आने वाले पीड़ादायक दिनों में मुझसे विशुद्ध हृदय के साथ प्रेम कर सकेंगे?” इन शब्दों का क्या अर्थ है? परमेश्वर कहता है कि ताड़ना का मनुष्य पर आना अभी बाकी है, जो दर्शाता है कि “स्वयं को जानने” के वचनों का एक आंतरिक अर्थ भी है—क्या तुमने इसे देखा? कठिनाई और शोधन से गुजरे बिना लोग स्वयं को कैसे जान सकते हैं? क्या ये खाली शब्द नहीं हैं? क्या तुम वास्तव में परमेश्वर द्वारा बोली गई सभी बातों पर विश्वास करते हो? क्या तुम परमेश्वर के वचनों का भेद जान पाते हो? क्यों परमेश्वर ऐसी बातें बार-बार कहता है, “मनुष्य के कार्यों को देखकर, मेरे पास एकमात्र विकल्प चले जाना है,” और यह भी कहता है, “केवल जब पहाड़ गिरते हैं और पृथ्वी फटकर टुकड़े-टुकड़े होती है, तभी लोग मेरे वचनों को याद करते हैं, केवल तभी वे अपने सपनों से जागते हैं, लेकिन तब समय आ चुका होता है, वे एक विशाल बाढ़ द्वारा निगल लिए जाते हैं, उनकी लाशें पानी की सतह पर तैरने लगती हैं”? परमेश्वर क्यों कहता है कि “लोग याद करते हैं” और यह नहीं कहता कि “लोग मेरे वचनों का पालन करते हैं”? क्या यह सच है कि पहाड़ गिर जाते हैं और पृथ्वी फटकर टुकड़े-टुकड़े हो जाती है? लोग ऐसे वचनों पर ध्यान नहीं देते, वे उन्हें फिसलने देते हैं, और इसलिए वे परमेश्वर के वचनों में बहुत कष्ट झेलते हैं। इसका कारण यह है कि वे बहुत विचारहीन हैं। मनुष्य की इस कमी के कारण परमेश्वर कहता है, “मैंने, आँसू की नलिकाओं से रहित इस ‘अजीबोगरीब’ ने, मनुष्य के लिए बहुत आँसू बहाए हैं। किंतु, मनुष्य इस बारे में कुछ नहीं जानता।” चूँकि लोग परमेश्वर के वचनों पर कोई ध्यान नहीं देते, इसलिए परमेश्वर उन्हें याद दिलाने और इस तरह उनकी “सहायता” प्राप्त करने के लिए इस साधन का उपयोग करता है।
अभी मैं दुनिया के घटनाक्रम के बारे में भविष्यवाणी नहीं करूँगा, लेकिन मनुष्य के भाग्य के बारे में कुछ भविष्यवाणी करूँगा। क्या आशय यह नहीं है कि लोग स्वयं को जानें? इसे कैसे समझाया जा सकता है? लोगों को स्वयं को कैसे जानना चाहिए? जब परमेश्वर लोगों को इतना “तड़पाता” है कि वे जीवन और मृत्यु के बीच झूलने लगते हैं, तो वे मानव-जीवन का कुछ अर्थ समझना शुरू करते हैं, और यह मानते हुए कि व्यक्ति का पूरा जीवन एक सपने से अधिक नहीं है, वे मानव-जीवन से थक जाते हैं। वे मानते हैं कि मनुष्य का जीवन पीड़ा से भरा है, कि वे कभी कुछ हासिल किए बिना ही मर जाएँगे, और उनका जीवन निरर्थक और मूल्यहीन है। मानव-जीवन एक सपना है, ऐसा सपना, जिसमें दुख और सुख एक के बाद एक आते हैं। आज लोग परमेश्वर के लिए जीते हैं, लेकिन चूँकि वे मनुष्यों की दुनिया में जीते हैं, इसलिए उनका दैनिक जीवन खाली और मूल्यहीन रहता है, जिससे सभी लोगों को यह पता चलता है कि परमेश्वर का आनंद एक क्षणिक सांत्वना है, और जब वे परमेश्वर का आनंद नहीं लेते तो भले ही वे परमेश्वर पर विश्वास करते हों, तब भी वे देह में जीते हैं—तो इसका क्या अर्थ है? मनुष्य के लिए देह में जीना शून्यता के अलावा और कुछ नहीं है। मानव-जीवन की कठिनाइयों और नाकामियों का अनुभव करने के बाद, बुढ़ापा आने पर मनुष्य के बाल सफेद हो जाते हैं, उसका चेहरा झुर्रियों से भर जाता है, और उसके हाथ घट्ठों से ढक जाते हैं। हालाँकि उसने एक बड़ी कीमत चुकाई है, किंतु उसने बहुत कम ही प्राप्त किया है। इसलिए मेरे वचन एक कदम आगे जाते हैं : देह में रहने वाले सभी शून्यता में जीते हैं। यह संदेह से परे है, और तुम्हें इसकी विस्तार से जाँच करने की आवश्यकता नहीं है। यह मानव-जीवन का मूल चेहरा है, जिसके बारे में परमेश्वर ने बार-बार बात की है। परमेश्वर इन वचनों को मनुष्य की कमजोरी के परिणामस्वरूप कहने से नहीं बचता, बल्कि वह बस अपनी मूल योजना के अनुसार कार्य करता है। शायद कुछ वचन लोगों को सहायता और समझ प्रदान करते हैं, और शायद कुछ ठीक इसका उलटा करते हैं और जानबूझकर लोगों के मृत्यु के वातावरण में रहने का कारण बन जाते हैं—और ठीक इसी वजह से वे पीड़ित हैं। इस प्रकार, परमेश्वर शायद लोगों को जानबूझकर भ्रमित करने के लिए “खाली शहर की रणनीति”[ख] तैयार करता है, लेकिन वे इसे बिल्कुल भी नहीं देख पाते, वे अँधेरे में बने रहते हैं। और फिर भी, सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है, और लोगों को पता होता तो भी वे इससे अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं? इस प्रकार, कोई भी ताड़ना के खतरे से बचने में सक्षम नहीं है—वे क्या कर सकते हैं? वे बस परमेश्वर की व्यवस्थाओं के सामने समर्पण कर सकते हैं—और क्या यह इसलिए नहीं है, क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें पकड़ लिया है और वह उन्हें जाने नहीं देगा? केवल परमेश्वर की धमकियों के तहत ही सब लोग प्रकृति के मार्ग का पालन कर पाते हैं—क्या ऐसा नहीं है? यदि परमेश्वर की व्यवस्था न होती, तो लोग स्वेच्छा से हार कैसे मान लेते? क्या यह मजाक नहीं होगा? हालाँकि मानव-जीवन खाली है, लेकिन जब लोगों का जीवन आराम से बीत रहा हो, तो कौन तैयार होगा चुपचाप मनुष्य की दुनिया छोड़कर परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करने के लिए? लोग बेबसी में मर जाते हैं—कौन कभी प्रचुरता के बीच मरता है, जब उनके पास वह सब होता है, जो वे चाहते हैं? केवल आकाश से उतरा एक “तारा” ही इसका अपवाद होगा। उसके द्वारा लिए गए तीसरे स्वर्ग के जीवन के आनंद की तुलना में पृथ्वी का जीवन रसातल में रहने के समान होगा—केवल ऐसी ही परिस्थितियों में वह मरने को तैयार हो सकता है। फिर भी आज कौन है, जो स्वर्ग का तारा है? मैं भी इस बारे में “अस्पष्ट” हूँ। आओ, चारों ओर खोजें और देखें कि क्या हमें ऐसा कोई मिल सकता है? यदि वह मिल जाता है, तो मैं कहता हूँ कि लोग उससे यह पूछने में मेरी मदद करें कि क्या वह मेरे उपर्युक्त वचनों के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार है? फिर भी मैं तुम लोगों में से प्रत्येक को एक चेतावनी देता हूँ : तुम लोगों में से किसी को भी “नायक” की भूमिका नहीं निभानी चाहिए और मरने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को प्रस्तुत नहीं करना चाहिए, क्या तुम समझते हो?
फुटनोट :
क. “अपनी कोहनी बाहर की ओर फैलाना” एक चीनी मुहावरा है जिसका अर्थ है अपने पक्ष या खेमे की कीमत पर बाहरी लोगों की मदद करना।
ख. “खाली शहर की रणनीति” प्राचीन चीन की छत्तीस रणनीतियों में से 32वीं है। इस रणनीति में भ्रामक रूप से एक दबंग मोर्चा दिखाया जाता है, ताकि अपनी तैयारी की कमी छिपाकर शत्रु को धोखा दिया जा सके।