अध्याय 3

आज अनुग्रह का युग तो रहा नहीं, न ही करुणा का युग है, बल्कि यह राज्य का युग है जिसमें परमेश्वर के लोग प्रकट किए जाते हैं, वह युग जिसमें परमेश्वर दिव्यता के माध्यम से सीधे कार्य करता है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के इस अध्याय में, परमेश्वर उन सभी को आध्यात्मिक क्षेत्र में ले जाता है जो उसके वचन स्वीकार करते हैं। प्रारंभिक परिच्छेद में, वह पहले से ये तैयारियाँ करता है, और अगर कोई परमेश्वर के वचनों के ज्ञान से युक्त है, तो वह तरबूज़ प्राप्त करने के लिए बेल के पीछे चल पड़ेगा, और सीधे-सीधे समझ जाएगा कि परमेश्वर अपने लोगों में क्या प्राप्त करना चाहता है। पहले "सेवाकर्ताओं" की पदवी का प्रयोग करके लोगों का परीक्षण किया जाता था, और आज, उन्हें परीक्षा से गुज़ारने के बाद, उनका प्रशिक्षण औपचारिक रूप से आरंभ हो जाता है। इसके अलावा, अतीत के वचनों की नींव के आधार पर लोगों को परमेश्वर के कार्य का और अधिक ज्ञान होना ही चाहिए, और वचनों और व्यक्तित्व को, पवित्रात्मा और व्यक्तित्व को, एक अविभाज्य संपूर्ण के रूप में—एक मुख, एक हृदय, एक क्रिया, और एक स्रोत के रूप में—देखना चाहिए। यह अपेक्षा सर्वोपरि अपेक्षा है जो सृष्टि के समय से परमेश्वर द्वारा मनुष्य से की गई है। इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर अपने प्रयासों का एक भाग अपने लोगों पर व्यय करना चाहता है, कि वह उनमें कुछ चिह्न और चमत्कार प्रदर्शित करना चाहता है, और सबसे महत्वपूर्ण यह कि वह सभी लोगों से परमेश्वर के कार्य और वचनों का उनकी संपूर्णता में पालन करवाना चाहता है। एक दृष्टि से, परमेश्वर स्वयं अपनी गवाही पर कायम रहता है, और दूसरी दृष्टि से, उसने अपने लोगों से अपेक्षाएँ की हैं, और जनसाधारण के लिए परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाएँ सीधे निर्गत की हैं : इस प्रकार, चूँकि तुम लोगों को मेरे लोग बुलाया जाता है, चीज़ें वैसी नहीं रहीं जैसी हुआ करती थीं; तुम लोगों को मेरे आत्मा के कथनों पर ध्यान देना और उनका पालन करना चाहिए, और मेरे कार्य का ध्यानपूर्वक अनुसरण करना चाहिए; तुम मेरे आत्मा और मेरे देह को संभवतः अलग न कर सको, क्योंकि हम अंतर्निहित रूप से एक हैं, और प्रकृति से अविभाज्य हैं। इसमें, लोगों को देहधारी परमेश्वर की उपेक्षा करने से रोकने के लिए एक बार फिर "क्योंकि हम अंतर्निहित रूप से एक हैं, और प्रकृति से अविभाज्य हैं" इन वचनों पर बल दिया गया है; क्योंकि ऐसी उपेक्षा मनुष्य की विफलता है, यह परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं में एक बार फिर अंकित की गई है। इसके बाद, परमेश्वर, कुछ भी छिपाए बिना, लोगों को परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं के उल्लंघन के परिणाम के बारे में सूचित करता है, यह कहकर कि "वो नुक़सान उठाएगा, और केवल अपने कड़वे प्याले से ही पी पाएगा।" चूँकि मनुष्य कमज़ोर है, इसलिए इन वचनों को सुनने के बाद वह मन ही मन परमेश्वर से अधिक सावधान होने को बाध्य हो जाता है, क्योंकि "कड़वा प्याला" लोगों को थोड़ी देर के लिए विचारमग्न करने के लिए काफ़ी है। परमेश्वर जिस "कड़वे प्याले" की बात करता है, उसके विषय में लोगों की कई व्याख्याएँ हैं : वचनों के अनुसार न्याय किया जाना या राज्य से निष्कासित कर दिया जाना, या एक समयावधि के लिए अलग-थलग कर दिया जाना, या शरीर का शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया जाना और दुष्ट आत्माओं द्वारा काबू कर लिया जाना, या परमेश्वर के आत्मा द्वारा त्याग दिया जाना, या शरीर को समाप्त करके अधोलोक में भेज दिया जाना। लोगों के सोच-विचार से यही व्याख्याएँ प्राप्त की जा सकती हैं, और इसलिए अपनी कल्पना में लोग इनके आगे जाने में समर्थ नहीं हैं। परंतु परमेश्वर के विचार मनुष्यों के विचारों से भिन्न हैं; कहने का तात्पर्य यह कि "कड़वे प्याले" का अर्थ उपरोक्त चीज़ों में से कोई भी नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है परमेश्वर का व्यवहार प्राप्त करने के बाद परमेश्वर के बारे में लोगों के ज्ञान की सीमा। इसे अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो, जब कोई मनमाने ढँग से परमेश्वर के आत्मा और उसके वचनों को अलग करता है, या वचनों और व्यक्तित्व को अलग करता है, या आत्मा और उस देह को अलग करता है जिसे वह पहनता है, तो यह व्यक्ति न केवल परमेश्वर के वचनों में परमेश्वर को जानने में असमर्थ होता है, बल्कि अगर वे परमेश्वर के प्रति थोड़े शंकालु हो जाते हैं, तो वे हर मोड़ पर विवेकशून्य हो जाएँगे। ऐसा नहीं है कि लोग कल्पना करते हैं कि उन्हें सीधे-सीधे काट दिया गया है; बल्कि, वे धीरे-धीरे परमेश्वर की ताड़ना में पड़ने लग जाते हैं—कहने का तात्पर्य यह है कि वे अधिक महाविपत्तियों में पड़ जाते हैं, और कोई भी उनके अनुरूप नहीं हो सकता, मानो उन्हें दुष्ट आत्माओं ने जकड़ लिया हो, और मानो वे बिना सिर वाली मक्खी हों, जो जहाँ भी जाती हैं चीज़ों से टकराती रहती हैं। इसके बावजूद, वे अब भी छोड़ नहीं पाते। उनके हृदयों में, चीज़ें अवर्णनीय रूप से कठिन होती हैं, मानो उनके हृदयों में अकथनीय पीड़ा हो—फिर भी वे अपना मुँह नहीं खोल सकते, और वे सारा दिन बेहोशी की हालत में बिताते हैं, परमेश्वर को महसूस नहीं कर पाते हैं। इन्हीं परिस्थितियों में परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाएँ उन्हें धमकाती हैं, ताकि वे आनंद न होने के बावजूद कलीसिया छोड़कर जाने की हिम्मत न करें—इसे ही "आंतरिक और बाह्य आक्रमण" कहा जाता है और इसे झेल पाना लोगों के लिए अत्यधिक कठिन होता है। यहाँ जो कहा गया है वह लोगों की धारणाओं से अलग है—और ऐसा इसलिए है क्योंकि, उन परिस्थितियों में, वे अब भी परमेश्वर की तलाश करना जानते हैं, और यह तब होता है जब परमेश्वर उनकी ओर से पीठ फेर लेता है, और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि एक अविश्वासी के समान, वे परमेश्वर को महसूस करने में पूर्णतः असमर्थ होते हैं। परमेश्वर ऐसे लोगों को सीधे नहीं बचाता है; जब उनका कड़वा प्याला खाली हो जाता है, यही वह समय होता है जब उनका अंतिम दिन आ गया होता है। परंतु, इस क्षण, वे अब भी परमेश्वर की इच्छा तलाश करते हैं, इस अभिलाषा से कि थोड़ा-सा आनंद ले लें—किंतु जब तक विशेष परिस्थितियाँ न हों, यह समय अतीत से भिन्न है।

इसके बाद, परमेश्वर सभी को सकारात्मक पहलू स्पष्ट करता है, और इस प्रकार वे एक बार फिर जीवन प्राप्त करते हैं—क्योंकि, अतीत के समय में, परमेश्वर ने कहा कि सेवाकर्ताओं का कोई जीवन नहीं था, किंतु आज परमेश्वर अचानक "भीतर के जीवन" की बात करता है। जीवन की बात करने से ही लोगों को पता चलता है कि उनके भीतर अब भी परमेश्वर का जीवन हो सकता है। इस तरह, परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अनेक मात्राओं में बढ़ जाता है, और वे परमेश्वर के प्रेम और दया का और अधिक ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार, इन वचनों को देखने के बाद, सभी लोग अपनी पिछली ग़लतियों पर पछताते हैं, और गुपचुप पश्चाताप के आँसू बहाते हैं। अधिकांश अपने मन में चुपचाप ठान भी लेते हैं कि उन्हें परमेश्वर को संतुष्ट करना ही चाहिए। कभी-कभी, परमेश्वर के वचन लोगों के अंतर्तम हृदय को बींध देते हैं, जिससे लोगों के लिए उन्हें स्वीकार कर पाना दुष्कर हो जाता है, और उनके लिए शांतचित्त रह पाना कठिन हो जाता है। कभी-कभी, परमेश्वर के वचन खरे और गंभीर होते हैं, और लोगों के दिलों को गर्माहट पहुँचाते हैं, इतनी कि लोगों द्वारा उन वचनों को पढ़ लिए जाने के बाद, यह वैसा ही होता है जब खो जाने के कई वर्षों बाद मेमना अपनी माँ को देखता है। उनकी आँखों में आँसू भर आते हैं, वे भावनाओं से अभिभूत हो जाते हैं, और, सिसकियों से बेहाल, उस बयां न कर सकने वाले कष्ट से स्वयं को मुक्त करते हुए जो कई वर्षों से उनके हृदयों में रहा है, वे स्वयं को परमेश्वर के आलिंगन में सौंप देने के लिए व्याकुल हो उठते हैं, ताकि परमेश्वर को अपनी वफ़ादारी दिखा सकें। कई महीनों की परीक्षा के कारण, वे थोड़े अतिसंवेदनशील हो गए हैं, मानो, वे सालों से बिस्तर पर पड़े अपाहिज हों जिसे अभी-अभी घबराहट का दौरा पड़ा हो। परमेश्वर के वचनों में उनके विश्वास के प्रति उन्हें अडिग बनाने के लिए परमेश्वर कई बार नीचे लिखे पर ज़ोर देता है : "ताकि मेरे कार्य का अगला चरण सुचारू रूप से और निर्बाध आगे बढ़ सके, मैं अपने घर के सभी लोगों की परीक्षा लेने के लिए वचनों के शुद्धिकरण का प्रयोग करूँगा।" यहाँ, परमेश्वर कहता है, "अपने घर के सभी लोगों की परीक्षा लेने के लिए"; ध्यान से पढ़ने पर हमें पता चलता है कि जब लोग सेवाकर्ताओं के रूप में कार्य करते हैं, तब भी वे परमेश्वर के घर के लोग होते हैं। यही नहीं, ये वचन "परमेश्वर के लोग" उपाधि के प्रति परमेश्वर की सच्चाई पर ज़ोर देते हैं, जिससे लोगों को उनके हृदय में यथेष्ट राहत पहुँचाते हैं। और इसलिए, लोगों द्वारा परमेश्वर के वचन पढ़ लिए जाने के बाद, या जब "परमेश्वर के लोग" उपाधि अभी प्रकट होनी है, तब परमेश्वर बार-बार लोगों में इन अनेक अभिव्यंजनाओं की ओर ध्यान क्यों दिलाता है? क्या केवल यह दिखाने के लिए कि परमेश्वर ही वह परमेश्वर है जो मनुष्य के हृदय में गहराई तक झाँकता है? यह मात्र आंशिक कारण है—और यहाँ, इसका बस द्वितीयक महत्व ही है। परमेश्वर ऐसा सभी लोगों को पूरी तरह विश्वास दिलाने के लिए करता है, ताकि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचनों से अपनी अपर्याप्तताएँ जान सके और जीवन से संबंधित अपनी पिछली कमियाँ जान सके, और इससे भी अधिक महत्वपूर्ण, ताकि कार्य के अगले चरण की नींव रख सके। लोग केवल स्वयं को जानने की नींव के आधार पर ही परमेश्वर को जानने और परमेश्वर के अनुकरण का अनुसरण करने का प्रयास कर सकते हैं। इन वचनों के कारण, लोग नकारात्मक और निष्क्रिय से बदलकर सकारात्मक और सक्रिय हो जाते हैं, और इसी के बल पर परमेश्वर के कार्य का दूसरा भाग जड़ें जमा पाता है। कहा जा सकता है कि नींव के रूप में कार्य के इस चरण के साथ, परमेश्वर के कार्य का दूसरा भाग आसान-सी बात बन जाता है, जिसके लिए ज़रा-से प्रयास के अलावा कुछ नहीं चाहिए। इसलिए, जब लोग अपने हृदय के भीतर की उदासी को बाहर निकाल फेंकते हैं और सकारात्मक और सक्रिय बन जाते हैं, तब परमेश्वर इस अवसर का उपयोग अपने लोगों से अन्य अपेक्षाएँ करने के लिए करता है : "मेरे वचन किसी भी समय या स्थान पर निर्मुक्त और व्यक्त किए जाते हैं, और इसलिए तुम लोगों को भी हर समय मेरे समक्ष स्वयं को जानना चाहिए। क्योंकि आज का दिन, पहले जो कुछ बीता उससे भिन्न है, और तुम जो भी चाहते हो उसे अब और संपन्न नहीं कर सकते। इसके बजाय, तुम्हें मेरे वचनों के मार्गदर्शन में, अपने शरीर को वश में करने में सक्षम होना ही चाहिए; तुम्हें मेरे वचनों का उपयोग मुख्य सहारे के रूप में करना ही चाहिए, और तुम अंधाधुँध ढँग से कार्य नहीं कर सकते।" इसमें, परमेश्वर प्राथमिक रूप से "मेरे वचनों" पर ज़ोर देता है; अतीत में भी, उसने कई बार "मेरे वचनों" का उल्लेख किया है, और इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति इस पर कुछ ध्यान दिये बिना नहीं रह पाता। परमेश्वर के कार्य के अगले चरण के मर्म का संकेत इस प्रकार मिलता है : सभी लोगों को परमेश्वर के वचनों की ओर अपना ध्यान ले जाना होगा, और उनकी कोई दूसरी चाहत नहीं हो सकेगी। सभी को परमेश्वर के मुख से बोले गए वचनों को सँजोकर रखना ही चाहिए, और उन्हें हल्के-फुल्के ढँग से नहीं लेना चाहिए; कलीसिया की पूर्व परिस्थितियाँ उस समय इस तरह समाप्त हो जाएँगी, जब एक व्यक्ति परमेश्वर के वचन पढ़ेगा और कई लोग आमीन कहकर आज्ञाकारी होंगे। उस समय, लोग परमेश्वर के वचन नहीं जानते थे, किंतु उन्होंने अपना बचाव करने के अस्त्र के रूप में उन्हें लिया। इसे उलटने के लिए, पृथ्वी पर मौजूद परमेश्वर मनुष्य से नई और अधिक बड़ी माँगें करता है। परमेश्वर के ऊँचे मानकों और कठोर आवश्यकताओं को देखने के बाद लोगों को नकारात्मक और निष्क्रिय होने से रोकने के लिए, परमेश्वर लोगों को कई बार यह कहकर प्रोत्साहित करता है : "चूँकि चीज़ें ऐसी स्थिति में पहुँच गई हैं जैसी वे आज हैं, इसलिए तुम लोगों को अतीत के अपने कर्मों और कार्यकलापों के विषय में खिन्नता और पछतावा महसूस करने की आवश्यकता नहीं है। मेरी उदारशीलता समुद्रों और आकाश के समान असीम है—ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं मनुष्य की क्षमताओं और अपने बारे में उसके ज्ञान से उतना ही परिचित न होऊँ जितना अपने हाथ की हथेली से परिचित हूँ?" ये सच्चे और खरे वचन अचानक लोगों का मन खोल देते हैं, और तत्काल उन्हें निराशा से परमेश्वर के प्रति प्रेम की ओर, सकारात्मक और सक्रिय होने की ओर ले जाते हैं, क्योंकि परमेश्वर लोगों के हृदयों के भीतर की कमज़ोरी मज़बूती से पकड़कर बोलता है। इससे अवगत हुए बिना, लोग अपने अतीत के कार्यकलापों के कारण परमेश्वर के सामने हमेशा शर्मिंदा महसूस करते हैं, और वे बार-बार पछतावा व्यक्त करते हैं। इस प्रकार, परमेश्वर इन वचनों को विशेषतः स्वाभाविक और सामान्य रूप से प्रकट करता है, ताकि लोग यह न महसूस करें कि परमेश्वर के वचन कठोर और नीरस हैं, बल्कि यह महसूस करें कि वे निर्मम भी हैं और नर्म भी, तथा सुस्पष्ट और सजीव भी हैं।

सृष्टि से लेकर आज तक, परमेश्वर ने आध्यात्मिक जगत से मनुष्य के लिए चुपचाप सारी व्यवस्थाएँ की हैं, और आध्यात्मिक जगत का सत्य मनुष्य को कभी वर्णित नहीं किया। तो भी, आज, परमेश्वर अचानक इसके भीतर छिड़े संग्राम का संक्षिप्त विवरण दे रहा है, जिससे लोग स्वाभाविक ही अपना सिर खुजाते रह जाते हैं, उनका यह बोध गहरा हो जाता है कि परमेश्वर अगाध और अज्ञेय है, और उनके लिए परमेश्वर के वचनों के स्रोत का पता लगाना और भी कठिन हो जाता है। कहा जा सकता है कि आध्यात्मिक जगत की संग्रामरत स्थिति सभी लोगों को उत्साह से इसमें भाग लेने के लिए प्रवृत्त कर देती है। यह भविष्य के कार्य का पहला अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है, और यही लोगों को आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने में समर्थ बनाने का सूत्र है। इससे देखा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य का अगला कदम मुख्य रूप से आत्मा को लक्ष्य करता है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य सभी लोगों को देह के भीतर परमेश्वर के आत्मा के चमत्कारिक कर्मों का और अधिक ज्ञान देना है, इस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान सभी लोगों को शैतान की मूर्खता का और प्रकृति का और अधिक ज्ञान देना है। यद्यपि वे आध्यात्मिक क्षेत्र में नहीं जन्मे थे, किंतु उन्हें लगता है कि मानो उन्होंने शैतान को देख लिया है, और एक बार जब वे यह महसूस कर लेते हैं, तो परमेश्वर तत्काल बोलने के दूसरे साधन अपना लेता है—और एक बार जब लोगों ने सोचने का यह तरीक़ा प्राप्त कर लिया, तो परमेश्वर पूछता है : "मैं ऐसी तात्कालिकता के साथ तुम लोगों को क्यों सिखला रहा हूँ? मैं तुम लोगों को आध्यात्मिक जगत के तथ्य क्यों बता रहा हूँ? मैं क्यों तुम लोगों को बार-बार याद दिलाता और नसीहत देता हूँ?" इत्यादि—प्रश्नों की एक पूरी श्रृंखला जो लोगों के मन में कई सवाल उत्पन्न करती है : परमेश्वर इस स्वर में बात क्यों करता है? क्यों वह आध्यात्मिक जगत के विषयों की बात करता है, और कलीसिया के निर्माण के दौरान लोगों से की गई अपनी मांगों की बात क्यों नहीं करता है? परमेश्वर रहस्यों को प्रकट करके लोगों की धारणाओं पर प्रहार क्यों नहीं करता? बस थोड़ा और विचारशील होकर लोग परमेश्वर के कार्यों के चरणों का किंचित ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, और इस प्रकार, जब वे भविष्य में प्रलोभनों का सामना करते हैं, तब उनके भीतर शैतान के प्रति घृणा का वास्तविक बोध पैदा होता है। यहाँ तक कि जब वे भविष्य में परीक्षाओं का सामना करते हैं, तब भी वे परमेश्वर को जान पाते और शैतान से अधिक गहराई से घृणा कर पाते हैं, और इस प्रकार शैतान को शाप दे पाते हैं।

अंत में, परमेश्वर की इच्छा मनुष्य के समक्ष पूरी तरह प्रकट होती है: "... मेरे प्रत्येक वचन को अपनी आत्माओं के भीतर जड़ पकड़ने और फलने-फूलने देने, और सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप से और अधिक फल देने में समर्थ होना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं जो माँगता हूँ वे केवल उजले, रंग-बिरंगे फूल ही नहीं, बल्कि भरपूर फल हैं, फल जो हमेशा पके रहते हैं।" अपने लोगों से परमेश्वर की बारम्बार माँगों में, यह उन सब में सर्वाधिक व्यापक है, यह केंद्र बिंदु है, और इसे सीधे-सच्चे ढंग से सामने रखा गया है। मैंने सामान्य मानवता में कार्य करने से पूर्ण दिव्यता में कार्य करने की ओर कदम बढ़ाया है; इस तरह, अतीत में, अपने सादे-सरल वचनों में मुझे आगे कोई और स्पष्टीकरण जोड़ने की आवश्यकता नहीं थी, और अधिकांश लोग मेरे वचनों का अर्थ समझ पाते थे। परिणाम यह था कि उन दिनों, आवश्यकता बस यह थी कि लोग मेरे वचनों को जानें और वास्तविकता के बारे में बोल पाएँ। लेकिन, यह चरण बिल्कुल भिन्न है। मेरी दिव्यता ने पूरी तरह अधिग्रहित कर लिया है, और मानवता के लिए भूमिका निभाने की कोई जगह नहीं छोड़ी है। इस तरह, यदि वे जो मेरे लोगों के बीच हैं मेरे वचनों का सही अर्थ समझना चाहते हैं, तो उन्हें अत्यधिक कठिनाई होती है। केवल मेरे कथनों के माध्यम से ही वे प्रबुद्धता और रोशनी प्राप्त कर सकते हैं, और इस माध्यम से इतर मेरे वचनों के उद्देश्य को समझने का कोई भी विचार निठल्ले दिवास्वपनों के अलावा कुछ नहीं है। मेरे कथनों को स्वीकार करने के बाद जब सभी लोगों को मेरे बारे में अधिक ज्ञान हो जाता है, तब यही वह समय होता है जब मेरे लोग मुझे जीते हैं, यही वह समय होता है जब देह में मेरा कार्य पूरा हो जाता है, और वह समय जब मेरी दिव्यता देह में संपूर्ण रूप से जीवन व्यतीत कर लेती है। इस क्षण, सभी लोग मुझे देह में जानेंगे, और सच्चे अर्थ में कह पाएँगे कि परमेश्वर देह में प्रकट होता है, और यही फल होगा। यह और भी प्रमाण है कि परमेश्वर कलीसिया का निर्माण करते हुए थक चुका है—अर्थात, "पौधा-घर में फूल यद्यपि तारों जितने अनगिनत होते हैं, और प्रशंसकों की सारी भीड़ आकर्षित करते हैं, किंतु एक बार जब वे मुरझा जाते हैं, तब वे शैतान के कपटपूर्ण कुचक्रों की तरह जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं, और कोई भी उनमें रुचि नहीं दिखाता।" यद्यपि कलीसिया के निर्माण के समय परमेश्वर ने स्वयं कार्य भी किया था, फिर भी चूँकि यह वह परमेश्वर है जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं होता, इसलिए वह बीती हुई बातों को याद नहीं करता रहता है। लोगों को पीछे मुड़कर अतीत के बारे में सोचने से रोकने के लिए, उसने ये वचन प्रयुक्त किए "वे शैतान के कपटपूर्ण कुचक्रों की तरह जीर्ण-शीर्ण हो जाते हैं", जो दर्शाते हैं कि परमेश्वर सिद्धांतों से बँधकर नहीं चलता। हो सकता है कुछ लोग परमेश्वर की इच्छा की ग़लत व्याख्या करें और पूछें : जब यह स्वयं परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है, तो फिर उसने ऐसा क्यों कहा कि, "एक बार जब वे मुरझा जाते हैं, तब कोई भी उनमें कोई रुचि नहीं दिखाता"? ये वचन लोगों को एक प्रकाशन देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे सभी लोगों को नया, और सही, आरंभ बिंदु लेने देते हैं; केवल तभी वे परमेश्वर की इच्छा संतुष्ट कर पाएँगे। अंततः, परमेश्वर के लोग परमेश्वर को वह स्तुति दे पाएँगे जो सच्ची होगी, बलात नहीं, और जो उनके हृदय से आई होगी। यही वह है जो परमेश्वर की 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना का मर्म है। अर्थात, यह 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना का ठोस रूप है : सभी लोगों को परमेश्वर के देहधारण का महत्व जानने देना—उन्हें देहधारी हुए परमेश्वर को, अर्थात देह में परमेश्वर के कर्मों को, व्यावहारिक रूप से जानने देना—ताकि वे अज्ञात परमेश्वर को नकार दें, और उस परमेश्वर को जानें जो आज और साथ ही बीते कल का भी, और उससे भी अधिक, आने वाले कल का है, जो अनंत काल से अनंत काल तक सच में और वास्तव में विद्यमान है। केवल तभी परमेश्वर विश्राम में प्रवेश करेगा!

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