अध्याय 9

लोगों की कल्पना में, परमेश्वर परमेश्वर है, और मनुष्य मनुष्य हैं। परमेश्वर मनुष्य की भाषा नहीं बोलता, न ही मनुष्य परमेश्वर की भाषा बोल सकते हैं। परमेश्वर के लिए, मानवता की मांगें पूरी करना मामूली बात है-एक बार में एक ही चीज़-जबकि मानवता से परमेश्वर की अपेक्षाएं मनुष्य की पहुँच से बाहर और अकल्पनीय हैं। लेकिन, सच्चाई इसके ठीक उलट है: परमेश्वर मनुष्य का केवल "0.1 प्रतिशत" मांगता है। यह लोगों के लिए न केवल विस्मयकारी है, बल्कि इससे लोग बहुत ज़्यादा घबरा जाते हैं, मानो वो सभी पूरी तरह भ्रमित हों। यह केवल परमेश्वर की प्रबुद्धता और अनुग्रह ही है कि लोगों ने परमेश्वर की इच्छा का थोड़ा-बहुत ज्ञान हासिल कर लिया है। हालांकि 1 मार्च को, सभी लोग एक बार फिर हक्के-बक्के और सोच में पड़ गए थे; परमेश्वर ने कहा कि उसके लोग चमचमाती बर्फ़ जैसे हों, न कि घुमक्कड़ बादल की तरह। तो यह "बर्फ़" किसकी ओर इशारा करती है? और "घुमक्कड़ बादल" क्या इंगित करते हैं? इस बिंदु पर, परमेश्वर जानबूझकर इन वचनों के गहरे अर्थ को उजागर नहीं कर रहा है। इससे लोग भ्रमित हो जाते हैं, और इस प्रकार जैसे-जैसे वे ज्ञान की तलाश करते हैं, उनकी आस्था बढ़ती जाती है—क्योंकि यह परमेश्वर के लोगों से एक विशिष्ट अपेक्षा है, और कुछ नहीं; और इसलिए लोगों का अधिक समय अनायास ही इन न समझ पाने योग्य वचनों के बारे में सोचने में व्यतीत होता है। नतीजतन, उनके दिमाग में कई विचार उपजते हैं, बहते हिमकण उनकी आँखों के सामने चमकते हैं, और उनके दिमाग में तुरंत आकाश में घुमक्कड़ बादल घूमने लगते हैं। परमेश्वर क्यों कहता है कि उसके लोग चमकदार बर्फ़ जैसे हों, घुमक्कड़ बादलों के समान नहीं? यहां वास्तविक अर्थ क्या है? ये शब्द विशेष रूप से किस बात की ओर इशारा कर रहे हैं? "बर्फ़" न केवल प्रकृति को सुंदर बनाती है, बल्कि खेत के लिए भी अच्छी है—यह कीटाणुओं को मारने के लिए अच्छी है। भारी बर्फ़बारी के बाद, सभी कीटाणु चमचमाती बर्फ़ से ढक जाते हैं, और पूरा इलाका तुरंत जीवन से भर जाता है। इसी तरह, परमेश्वर के लोगों को न केवल देहधारी परमेश्वर को जानना चाहिए बल्कि स्वयं को परमेश्वर के देहधारण के तथ्य के प्रति अनुशासित भी करना चाहिए; ऐसा करके, वो सामान्य मानवता को जी पाएंगे। इस तरह से बर्फ़ प्रकृति को सुंदर बनाती है; अंततः, परमेश्वर के लोगों की परिपक्वता, पृथ्वी पर परमेश्वर का राज्य स्थापित करते हुए, और परमेश्वर का पवित्र नाम फैलाते और उसकी महिमा को बढ़ाते हुए बड़े लाल अजगर को समाप्त करेगी, ताकि पृथ्वी पर पूरा राज्य परमेश्वर की धार्मिकता से भर जाए, परमेश्वर की कांति से चमके और उसकी महिमा से जगमगाए। हर जगह शांति और संतुष्टि, खुशी और तृप्ति, और सदैव नवीन सुंदरता के दृश्य हों। विभिन्न महामारियां जो अभी विद्यमान हैं—भ्रष्ट शैतानी स्वभाव, जैसे अधार्मिकता, कुटिलता और धोखेबाज़ी, बुरी इच्छाएं आदि—सभी जड़ से मिट जाएंगी और इस प्रकार स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का नवीनीकरण हो जाएगा। यही "भारी हिमपात के बाद" का सही अर्थ है। जो लोग घुमक्कड़ बादल की तरह हैं, वो उस तरह के लोग हैं, जो झुंड का अनुसरण करते हैं, जिसका परमेश्वर ज़िक्र करता है; यदि शैतान का प्रलोभन हो या परमेश्वर के परीक्षण हों, तो वो तुरंत दूर चले जाएंगे, रहेंगे नहीं। लंबे समय तक गायब होने से उनका सार भी नहीं बचेगा। यदि लोग घुमक्कड़ बादल की तरह हैं, तो वे न केवल परमेश्वर की छवि को नहीं जी पाते, बल्कि परमेश्वर के नाम को भी शर्मिंदा करते हैं, क्योंकि ऐसे लोगों को किसी भी समय या स्थान पर नष्ट होने का ख़तरा होता है; वो शैतान के उपभोग का भोजन होते हैं—और जब शैतान उन्हें बंदी बना लेगा, तो वो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करके शैतान की सेवा करेंगे। यह स्पष्ट रूप से परमेश्वर के नाम पर लांछन है, और इसी से परमेश्वर को सबसे ज़्यादा चिढ़ होती है; ऐसे लोग परमेश्वर के दुश्मन हैं। इस तरह, इनमें न तो सामान्य लोगों की तरह सार होता और न कोई व्यावहारिक मूल्य। इसी वजह से परमेश्वर अपने लोगों से ऐसी अपेक्षाएं रखता है। हालांकि इन वचनों के बारे में थोड़ा समझने के बाद, लोगों को समझ नहीं आता कि वो अब क्या करें, क्योंकि परमेश्वर के वचनों का विषय स्वयं परमेश्वर की ओर पलट चुका होता है, जो उन्हें एक कठिन स्थिति में डाल देता है: "क्योंकि मैं पवित्र भूमि से हूँ, मैं कमल के समान नहीं, जिसके पास केवल एक नाम है और कोई सार नहीं क्योंकि वह दलदल में होता है न कि पवित्र भूमि में।" अपने लोगों से अपनी अपेक्षाएं बताने के बाद, परमेश्वर अपने जन्म का वर्णन क्यों करता है? क्या ऐसा हो सकता है कि दोनों के बीच कोई संबंध हो? वास्तव में, उनके बीच एक अंतर्निहित संबंध है—यदि नहीं होता, तो परमेश्वर लोगों को यह नहीं बताता। हरी पत्तियों के बीच, मंद हवा में कमल आगे-पीछे झूलता है। यह आँखों के लिए सुखद है और बहुत प्यारा है। उससे लोगों की नज़रें नहीं हटतीं और वो एक फूल चुनने और करीब से देखने हेतु पानी में तैरने को बेचैन रहते हैं। हालांकि परमेश्वर कहता है कि कमल दलदल में होता है, और इसका केवल नाम है, इसमें कोई सार नहीं होता; लगता है परमेश्वर कमल को कोई महत्व नहीं देता, और उसके वचनों से ज़ाहिर है कि उसके प्रति परमेश्वर के मन में कुछ घृणा है। युगों-युगों तक, बहुतों ने कमल की प्रशंसा की है क्योंकि वह बेदाग रहकर गंदगी से निकलता है, यहां तक कि कमल अतुल्य और अनिर्वचनीय रूप से अद्भुत होता है। लेकिन परमेश्वर की नज़रों में, कमल मूल्यहीन है—परमेश्वर और मनुष्य में यही अंतर है। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच उतना ही अंतर है, जितनी स्वर्ग के शीर्ष और पृथ्वी की तली में दूरी है। चूँकि कमल दलदल में होता है, इसलिए जिन पोषक तत्वों की उसे आवश्यकता होती है, वो सब भी वहीं से आते हैं। अंतर केवल इतना है कि कमल ख़ुद को छिपाने में समर्थ है और इस तरह आँखों को आनंद प्रदान करता है। बहुत से लोग कमल के केवल बाहरी सौंदर्य को देखते हैं, पर कोई यह नहीं देखता कि कमल के भीतर का जीवन कितना गंदा और अपवित्र है। इसलिए, परमेश्वर कहता है कि इसका केवल नाम है, इसमें कोई सार नहीं है—जो कि पूरी तरह से सही और सच है। और क्या यह हूबहू वैसा ही नहीं है, जैसे आज परमेश्वर के लोग हैं? परमेश्वर के लिए उनका समर्पण और विश्वास केवल ऊपरी है। वो लोग परमेश्वर के सामने उसकी चापलूसी करते हैं और दिखावा करते हैं ताकि परमेश्वर उनसे संतुष्ट हो जाए; हालांकि, अंदर से वो भ्रष्ट और शैतानी स्वभाव से भरे होते हैं, उनके पेट अशुद्धियों से भरे होते हैं। इसलिए, परमेश्वर मनुष्य के सामने प्रश्न रखता है, पूछता है कि परमेश्वर के प्रति उनकी वफ़ादारी अशुद्धियों से दूषित है या वह शुद्ध और पूरे हृदय से है। जब लोग सेवाकर्मी थे, तो बहुत से लोगों ने अपने मुँह से परमेश्वर की स्तुति की, किन्तु अपने हृदय में उसे कोसा। उन्होंने शब्दों से परमेश्वर के आगे समर्पण किया, परंतु हृदय से उन्होंने परमेश्वर की अवज्ञा की। उनके मुँह से नकारात्मक शब्द निकले, और उन्होंने परमेश्वर के प्रति विरोध का भाव रखा। ऐसे लोग भी थे, जिनके कार्यकलापों में एक समंवित चाल थी: उनके मुँह से गंदी बातें निकलती थीं और वो अपने हाथों से इशारे करते थे, पूरी तरह स्वच्छंद, बड़े लाल अजगर की असली छवि की एक ज्वलंत और सजीव अभिव्यक्ति देते थे। ऐसे लोग असल में बड़े लाल अजगर के संपोले कहे जाने योग्य हैं। लेकिन आज ये लोग वफ़ादार सेवाकर्मियों की जगह खड़े हैं और इस तरह कार्य करते हैं मानो वो परमेश्वर के वफ़ादार लोग हों—कितने बेशर्म हैं वो! हालांकि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं; वो दलदल से आते हैं, इसलिए अपना असली रंग दिखाने के सिवा उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि परमेश्वर पवित्र और शुद्ध है, तथा असली और वास्तविक है, इसलिए उसका देह पवित्रात्मा से जन्म लेता है। यह निश्चित और अकाट्य है। न केवल स्वयं परमेश्वर के लिए गवाही देने में समर्थ होना, बल्कि स्वयं को परमेश्वर की इच्छा के मुताबिक़ पूरी तरह सौंपने में सक्षम होना: ये परमेश्वर के सार का एक पक्ष है। देह एक छवि के साथ पवित्रात्मा से जन्म लेता है, इसका अर्थ है कि देह जिससे आत्मा स्वयं को ओढ़ता है, वह अनिवार्यत: मनुष्य की देह से भिन्न है, और यह अंतर मुख्य रूप से उनकी आत्मा में निहित है। "एक छवि के साथ आत्मा" का तात्पर्य है कि कैसे, सामान्य मानवता द्वारा आच्छादित रहने के परिणामस्वरूप, दिव्यता सामान्य रूप से भीतर से काम करने में समर्थ है। यह थोड़ा भी अलौकिक नहीं है, और मानवता द्वारा सीमित नहीं है। "आत्मा की छवि" का अर्थ है पूर्ण दिव्यता, और यह मानवता द्वारा सीमित नहीं है। इस तरह, परमेश्वर का अंतर्निहित स्वभाव और सच्ची छवि को पूरी तरह से देहधारी शरीर में जिया जा सकता है, जो न केवल सामान्य और स्थिर है, बल्कि उसमें प्रताप और कोप भी है। पहला देहधारी शरीर केवल ऐसे परमेश्वर को ही प्रस्तुत कर सकता था, लोग जिसका केवल अनुमान ही लगा सकते थे; यानी वह केवल चिह्न दिखाने, चमत्कार और भविष्यवाणियां करने में समर्थ था। इस प्रकार, उसने पूरी तरह से परमेश्वर की वास्तविकता को नहीं जिया था, और इसलिए वह एक छवि के साथ आत्मा का मूर्तरूप नहीं था; वह दिव्यता का प्रत्यक्ष प्रकटन था। साथ ही, क्योंकि वह सामान्य मानवता के पार चला गया था, इसलिए उसे पूर्ण स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर नहीं कहा गया, बल्कि उसमें थोड़ा-सा अंश स्वर्ग के अज्ञात परमेश्वर का था; वह लोगों की धारणाओं का परमेश्वर था। यह दो देहधारी शरीरों के बीच का अनिवार्य अंतर है।

ब्रह्मांड के उच्चतम बिंदु से, परमेश्वर इंसान की हर गतिविधि को, और लोग जो कहते और करते हैं, उस सबको देखता है। वह उनके अंतरतम के तमाम विचारों को पूर्ण स्पष्टता के साथ देखता है, उन्हें कभी अनदेखा नहीं करता; और इसीलिए परमेश्वर के वचन, लोगों के हर विचार पर चोट करते हुए सीधे उनके हृदय को चीर देते हैं, उसके वचन चतुर और त्रुटिरहित होते हैं। "यद्यपि लोग मेरी आत्मा को 'जानते' हैं, फिर भी वो मेरी आत्मा को नाराज़ करते हैं। मेरे वचन लोगों के कुरुप चेहरों के साथ-साथ उनके अंतरतम में छिपे विचारों को भी प्रकट कर देते हैं और इससे पृथ्वी पर जो भी हैं, मेरी जाँच में गिर पड़ते हैं।" इससे यह देखा जा सकता है कि हालाँकि मानवता से परमेश्वर की बहुत अधिक अपेक्षाएं नहीं हैं, फिर भी लोग परमेश्वर द्वारा आत्मा की पड़ताल को सह नहीं पाते। "हालांकि गिर पड़ने के बावजूद, उनके हृदय मुझसे दूर नहीं जा पाते। सृष्टि के प्राणियों में कौन है, जो मेरे कार्यों के फलस्वरूप मुझसे प्रेम नहीं करने लगता?" यह परमेश्वर की पूर्ण बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता का और भी अधिक सूचक है, और इस प्रकार वह सब कुछ उजागर करता है, जो परमेश्वर के लोगों ने सेवाकर्मियों के रूप में रहते हुए सोचा था: "व्यापार" की विफलता के बाद, उनके दिमाग़ में आए "सैकड़ों हजारों" या "लाखों" विचार निष्फल हो गए। हालांकि परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों की वजह से और परमेश्वर के प्रताप और कोप की वजह से-भले ही उनके सिर दुःख में झुके थे-लेकिन तब भी उन्होंने नकारात्मक सोच के साथ परमेश्वर की सेवा की, और अतीत के उनके सभी अभ्यास केवल खोखली बातें होकर रह गए और पूरी तरह भुला दिए गए। बल्कि अपना मनोरंजन करने, समय बिताने या गँवाने के लिए, उन्होंने स्वेच्छा से हर वो काम किया, जिससे उन्हें और हर किसी को ख़ुशी मिली। ... लोगों के बीच यही सब चल रहा था। इस प्रकार, परमेश्वर मानवता के समक्ष खुलकर कहता है: "कौन है जो मेरे वचनों के फलस्वरूप मेरे लिए नहीं तरसता? मेरे प्रेम के कारण किसके हृदय में अनुराग की भावनाएँ पैदा नहीं होतीं?" सच कहूँ तो, मनुष्य परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं, और उनमें से ऐसा एक भी नहीं है, जो परमेश्वर के वचनों को पढ़ना पसंद न करे; सिर्फ़ इतना ही है कि वो परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में नहीं ला पाते क्योंकि वे अपनी प्रकृति से मजबूर हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, बहुत से लोग परमेश्वर के वचनों से अलग होना सहन नहीं कर पाते, परमेश्वर के लिए उनके भीतर प्रेम उमड़ता है। इस प्रकार, परमेश्वर एक बार पुनः शैतान को धिक्कारता है, और एक बार पुनः उसके बदसूरत चेहरे को उजागर करता है। "इस युग में जब शैतान हंगामा खड़ा कर देता है और बुरी तरह से निरंकुश हो जाता है" यह भी वही युग है, जिसमें परमेश्वर धरती पर अपने आधिकारिक, विशाल कार्य का आरंभ करता है। उसके बाद, वह दुनिया के सर्वनाश का कार्य आरंभ करता है। दूसरे शब्दों में, शैतान जितना अधिक पागलपन करेगा, परमेश्वर का दिन उतनी ही जल्दी आएगा। इस प्रकार, परमेश्वर जितना अधिक शैतान के उपद्रव के बारे में बोलेगा, वह दिन करीब आता जाएगा, जब परमेश्वर दुनिया का सर्वनाश करेगा। ऐसी है शैतान के लिए परमेश्वर की घोषणा।

परमेश्वर ने बार-बार ऐसा क्यों कहा "... मेरी पीठ पीछे, वे 'प्रशंसनीय' गंदे आचरणों में लिप्त हो जाते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि जिस देह को मैंने ओढ़ रखा है, वह तुम्हारे चाल-चलन, तुम्हारे आचरण और तुम्हारे वचनों के बारे में कुछ नहीं जानती।" उसने ऐसे वचन सिर्फ़ एक या दो बार नहीं कहे—ऐसा क्यों? एक बार जब लोगों को परमेश्वर से सांत्वना मिल जाती है, और वो मानवता के लिए परमेश्वर के दुःख से अवगत हो जाते हैं, तो जब वो आगे संघर्ष करते हैं तब उनके लिए अतीत को भूलना आसान हो जाता है। फिर भी परमेश्वर मनुष्यों के प्रति थोड़ा भी उदार नहीं है: वह निरंतर लोगों के विचारों को निशाना बनाता रहता है। इस प्रकार, वह लोगों को बारंबार स्वयं को जानने, व्यभिचार रोकने, उन प्रशंसनीय गंदे लेन-देन में लिप्त न होने, फिर कभी देहधारी परमेश्वर के साथ विश्वासघात न करने के लिए कहता है। हालाँकि लोगों की प्रकृति बदलती नहीं है, लेकिन उन्हें कुछेक बार याद दिलाने से लाभ तो होता ही है। इसके बाद, परमेश्वर मनुष्यों के हृदय में मौजूद रहस्यों को प्रकट करने के लिए उनके परिप्रेक्ष्य से बोलता है: "कई वर्षों तक मैंने हवा और बारिश को सहा है, और मैंने मनुष्य के संसार की कड़वाहट का भी अनुभव किया है; हालांकि गहन चिंतन करने पर, कितना भी कष्ट क्यों न आए, लेकिन वो मेरे प्रति इंसान के अंदर निराशा पैदा नहीं कर सकते, कोई भी मधुरता मनुष्यों को मेरे प्रति उदासीन, हताश या उपेक्षापूर्ण होने का कारण तो बिलकुल नहीं बन सकती। क्या मेरे लिए उनका प्रेम वास्तव में पीड़ा की कमी या फिर मिठास की कमी तक ही सीमित है?" "सूर्य के नीचे सबकुछ रिक्त है," इन वचनों का निस्संदेह आंतरिक अर्थ है। इस प्रकार परमेश्वर कह रहा है कि किसी भी चीज़ के कारण इंसान परमेश्वर से उम्मीद नहीं खो सकता या उसकी ओर से कभी उदासीन नहीं हो सकता। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम न करें, तो इससे अच्छा है वो मर जाएं; यदि वे परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो उनकी पीड़ा व्यर्थ है, और खुशियाँ खोखली हैं, जो उनके पापों में जुड़ जाती हैं। क्योंकि एक भी व्यक्ति परमेश्वर से वास्तव में प्रेम नहीं करता, इसलिए परमेश्वर कहता है, "क्या मेरे लिए उनका प्रेम वास्तव में पीड़ा की कमी या फिर मिठास की कमी तक ही सीमित है?" मानवता की दुनिया में, पीड़ा या मिठास के बिना कोई कैसे जीवित रह सकता है? परमेश्वर बार-बार कहता है, "किसी एक भी इंसान ने कभी मेरा चेहरा नहीं देखा है, मेरी आवाज़ नहीं सुनी है क्योंकि मनुष्य दरअसल मुझे जानता ही नहीं।" परमेश्वर कहता है कि मनुष्य उसे सच में नहीं जानता, लेकिन वह इंसान से उसे जानने के लिए क्यों कहता है? क्या यह विरोधाभास नहीं है? परमेश्वर के हर एक वचन का एक निश्चित उद्देश्य है। चूँकि मनुष्य सुन्न हो गया है, इसलिए परमेश्वर हर मनुष्य के हृदय का अंततः 0.1 प्रतिशत पाने के लिए उसके ज़रिए अपना 100 प्रतिशत कार्य करने का सिद्धांत अपनाता है। परमेश्वर इसी पद्धति से कार्य करता है, और अपना लक्ष्य पाने के लिए परमेश्वर को इसी प्रकार कार्य करना चाहिए। यही वास्तव में परमेश्वर के वचनों की बुद्धि भी है। क्या तुम लोगों ने इस बात को समझ लिया है?

परमेश्वर कहता है: "जब मैं अपने रहस्यों को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करता हूँ और देह में अपनी इच्छा स्पष्ट करता हूँ, तो तुम लोग कोई ध्यान नहीं देते; तुम आवाज़ों को सुनते हो, पर उनके अर्थ को नहीं समझते। मैं दु:ख से उबर गया हूँ। हालाँकि मैं देह में हूँ, पर मैं देह की सेवकाई करने में असमर्थ हूँ।" एक लिहाज़ से, ये वचन लोगों से उनकी संवेदनशून्यता के कारण, परमेश्वर के साथ सहयोग करने की पहल कराते हैं; दूसरे लिहाज़ से, परमेश्वर देह में अपनी दिव्यता का असली चेहरा प्रकट करता है। चूँकि मनुष्यों का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा होता है, इसलिए उस अवधि में जब परमेश्वर देह में होता है, तो दिव्यता का प्रकटन केवल उनकी स्वीकृति की योग्यता के अनुसार होता है। कार्य के इस चरण के दौरान, अधिकांश लोग इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं पाते, जिससे पता चलता है कि वो ग्रहणशील नहीं हैं। इस प्रकार, इस कार्य के दौरान दिव्यता पूरी तरह से अपने सभी मूल कर्तव्य नहीं निभाती; वह केवल एक छोटा-सा हिस्सा ही निभाती है। यह दर्शाता है कि भविष्य के कार्य में, दिव्यता मानवता ग्रहण करने की अवस्था के अनुसार ही धीरे-धीरे प्रकट होगी। लेकिन दिव्यता धीरे-धीरे विकसित नहीं होती; बल्कि यह वह है जो देहधारी परमेश्वर के पास सार रूप में है, और जो मनुष्य के आध्यात्मिक कद के समान नहीं है।

मनुष्य के सृजन के पीछे परमेश्वर का एक उद्देश्य और अर्थ था, और इसीलिए परमेश्वर ने कहा था, "यदि मानवता मेरे कोप से नष्ट हो गई होती, तो मेरे स्वर्ग और पृथ्वी की रचना करने का क्या महत्व रह जाता?" जब मनुष्य भ्रष्ट हो गए, तो परमेश्वर ने अपनी ख़ुशी के लिए उनका एक हिस्सा पाने की योजना बनाई; उसकी मंशा यह नहीं थी कि सभी मनुष्यों को नष्ट कर दिया जाएगा, न ही यह मंशा थी कि परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों के मामूली से उल्लंघन पर ही उनका उन्मूलन कर दिया जाएगा। यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है; जैसा कि परमेश्वर ने कहा, यह अर्थहीन होगा। असल में इस "निरर्थकता" की वजह से ही परमेश्वर की बुद्धि स्पष्ट की गयी है। क्या सभी लोगों को ताड़ना देने, उनका न्याय करने, उन सब पर प्रहार करने और अंतत: केवल उन्हें चुनने के लिए जो उसे प्रेम करते हैं, परमेश्वर के बोलने और कई तरीक़ों से कार्य करने के ज़्यादा बड़े मायने नहीं हैं? ठीक इसी तरह से परमेश्वर के कर्म प्रकट होते हैं, और इसलिए मनुष्य का सृजन और भी अर्थपूर्ण हो जाता है। इस प्रकार, कहा जाता है कि परमेश्वर के अधिकांश वचन उनके आगे प्रवाहित होते रहते हैं; यह एक उद्देश्य प्राप्त करने के लिए है, और ठीक यही उसके वचनों के अंश की वास्तविकता है।

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