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वचन देह में प्रकट होता है

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नौवें कथन की व्याख्या

लोगों की कल्पना में, परमेश्वर परमेश्वर है, और मनुष्य मनुष्य है। परमेश्वर मनुष्य की भाषा नहीं बोलता है, न ही मनुष्य परमेश्वर की भाषा बोल सकता है, और परमेश्वर के लिए, मनुष्य की उससे माँगे ऐसी हैं जो आसानी से प्राप्त की जा सकती हैं, जबकि परमेश्वर की मनुष्य से अपेक्षाएँ मनुष्य के लिए अप्राप्य और अकल्पनीय हैं। हालाँकि, तथ्य हूबहू विपरीत है: परमेश्वर मनुष्य का केवल " 0.1 प्रतिशत" माँगता है। यह हर किसी के लिए न केवल विस्मयकारी है, बल्कि उन्हें बहुत ज्यादा हक्का-बक्का महसूस करवाता है, मानो कि वे सभी पूरी तरह से भ्रमित हों। यह केवल परमेश्वर द्वार प्रबुद्धता, और परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है, कि लोगों को परमेश्वर की इच्छा के बारे में थोड़ा ज्ञान प्राप्त होता है। किन्तु 1 मार्च को, सभी लोग एक बार पुनः हक्का-बक्का और परेशान रह गए थे। परमेश्वर ने कहा कि उसके चमचमाते हुए बर्फ बन जाएँ, न कि घुमक्कड़ बादल। तो यह "चमचमाती बर्फ" किसका इशारा करती है? और "घुमक्कड़ बादल" क्या इंगित करता है? इस बिंदु पर, परमेश्वर जानबूझकर इन वचनों के भीतरी अर्थ के बारे में कुछ नहीं कह रहा है। यह लोगों को भ्रम में डालता है, और इस प्रकार जैसे-जैसे वे तलाश करते हैं उनकी आस्था को बढ़ाता है—क्योंकि यह परमेश्वर के लोगों की एक विशिष्ट आवश्यकता है, और अन्य कुछ नहीं, और इसलिए हर कोई स्वयं को इन अथाह वचनों के बारे में सोचने के लिए अनायास ही अधिक समय व्यतीत करता हुआ पाता है। परिणामस्वरूप, बहते हुए हिमकण उनकी आँखों के सामने चमकते हैं, और आकाश के घुमक्कड़ बादल तुरंत उनके दिमाग में दिखाई देते हैं। परमेश्वर क्यों कहता है कि उसके लोग चमकदार बर्फ के रूप में बनें, और घुमक्कड़ बादलों के रूप में नहीं? यहाँ वास्तविक अर्थ क्या है? ये शब्द विशेष रूप से किस बात का इशारा कर रहे हैं? "चमचमाती बर्फ" न केवल परिदृश्य को सुंदर बनाती है, बल्कि खेत के लिए भी अच्छी है—यह बैक्टीरिया को मारने के लिए अच्छी है। भारी बर्फबारी के बाद, सभी बैक्टीरिया चमचमाती बर्फ से ढक जाते हैं, और पूरी जगह तुरंत जीवन से भरपूर हो जाती है। इसी तरह, परमेश्वर के लोगों को न केवल देहधारी परमेश्वर को जानना चाहिए बल्कि स्वयं को परमेश्वर के देहधारण के तथ्य के वश में करना चाहिए, और इस प्रकार सामान्य मानवता का जीवन व्यतीत करना चाहिए। इस तरह से ही बर्फ परिदृश्य को सुंदर बनाता है; अंततः, परमेश्वर के लोगों की परिपक्वता, पृथ्वी पर परमेश्वर का राज्य स्थापित करते हुए, परमेश्वर के पवित्र नाम को फैलाते हुए और उसकी महिमा को बढ़ाते हुए बड़े लाल अजगर को समाप्त करेगी, ताकि पृथ्वी पर पूरा राज्य परमेश्वर की धार्मिकता से भर जाता है, परमेश्वर की कांति को आगे चमकाता है, और परमेश्वर की महिमा के साथ जगमगाता है, और हर जगह शांति और संतुष्टि, खुशी और तृप्ति, और सदैव-नवीन सुंदरता के दृश्य होते हैं। विभिन्न विपत्तियाँ जो वर्तमान समय में विद्यमान हैं—भ्रष्ट शैतानिक स्वभाव, जैसे कि अधार्मिकता, कुटिलता और धोखेबाजी, बुरी इच्छाएँ आदि—सभी जड़ से मिट जाती हैं, और इस प्रकार स्वर्ग और पृथ्वी दोनों का नवीनीकरण हो जाता है। यही "भारी हिमपात के बाद" का सच्चा अर्थ है। जो घुमक्कड़ बादल हैं वे उस तरह के लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा कहे गए झुंड का अनुसरण करते हैं; यदि शैतान का प्रलोभन या परमेश्वर की परीक्षाएँ हों, तो वे तुरंत दूर चले जाएँगे, तथा अब और नहीं रहेंगे। लंबे समय तक गायब होने के बाद यहाँ तक कि उनका सार भी नहीं बचेगा। यदि लोग घुमक्कड़ बादल हैं, तो वे न केवल परमेश्वर की छवि को जीने में अक्षम हैं, बल्कि परमेश्वर के नाम पर शर्मिंदगी भी लाते हैं, क्योंकि ऐसे लोग किसी भी समय या स्थान पर छीन लिए जाने के खतरे में होते हैं, वे भोजन हैं जिसे शैतान उपभोग करता है, और जब शैतान उन्हें बंदी बनाएगा, तो वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात करेंगे और शैतान की सेवा करेंगे। यह स्पष्ट रूप से परमेश्वर के नाम पर शर्मिंदगी लाता है, यही है जिससे परमेश्वर है सबसे अधिक अप्रसन्न होता है, और वे परमेश्वर के दुश्मन हैं। इस प्रकार, वे बिना सामान्य लोगों के सार वाले और बिना किसी वास्तविक उपयोगिता मूल्य वाले दोनों हैं। इसी वजह से परमेश्वर अपने लोगों से ऐसी अपेक्षा करता है। किन्तु इन वचनों के बारे में थोड़ा समझने के बाद, लोगों की समझ में नहीं आता है कि आगे क्या करें, क्योंकि परमेश्वर के वचनों का विषय स्वयं परमेश्वर की ओर पलट गया है, जो उन्हें एक कठिन स्थिति में डालता है: “क्योंकि मैं पवित्र भूमि से आया था, कमल के समान नहीं, जिसके पास केवल एक नाम है और कोई सार नहीं क्योंकि वह कीचड़ से आया था न कि पवित्र भूमि से।” अपने लोगों की ओर अपनी अपेक्षाओं को बोलने के बाद, क्यों परमेश्वर स्वयं परमेश्वर के जन्म का वर्णन करता है? क्या ऐसा हो सकता है कि दोनों के बीच कोई संबंध है? वास्तव में, उनके बीच एक अंतर्निहित संबंध है—यदि नहीं होता, तो परमेश्वर लोगों से इस प्रकार से नहीं बोलता। हरी पत्तियों के बीच, मंद हवा में कमल आगे-पीछे झूलता है। यह आँखों के लिए सुखद है और बहुत प्यारा है। लोग बस इसमें से पर्याप्त प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और एक तना चुनने और करीब से देखने हेतु पानी में तैरने के लिए बेचैन हो रहे हैं। फिर भी परमेश्वर कहता है कि कमल कीचड़ में से आता है, और इसका केवल नाम है और कोई सार नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर कमलों को कोई महत्व नहीं देता है, और उसके वचनों से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि उनके प्रति उसे कुछ घृणा है। युगों के दौरान, बहुत से लोग कमलों पर प्रशंसा उँड़ेल चुके हैं क्योंकि वे गंदगी से बेदाग उभरते हैं, इस स्थिति तक कि वे लगभग तुलना से परे, अनिर्वचनीय रूप से अद्भुत होते हैं। किन्तु परमेश्वर की नज़रों में, कमल मूल्यहीन हैं—जो कि निश्चित रूप से परमेश्वर और मनुष्य के बीच में अंतर है। यह परमेश्वर और मनुष्य के बीच की दूरी को दिखाने के लिए पर्याप्त है, जो कि इतनी बड़ी है जितनी कि आकाश के शीर्ष और पृथ्वी के तले के बीच है। क्योंकि कमल कीचड़ में आता है, इसलिए जिन पोषक तत्वों की इसे आवश्यकता होती है वे सभी वहाँ से आते हैं। यह सिर्फ इतना ही है कि कमल खुद को छिपाने, और इस तरह आँखों के लिए एक दावत प्रदान करने में समर्थ है। बहुत से लोग कमल के केवल बाहरी सौन्दर्य को देखते हैं, किन्तु उनमें से कोई भी नहीं देखता है कि कमल के भीतर का जीवन गंदा और अशुद्ध है। इस प्रकार, परमेश्वर कहता है कि इसका केवल एक नाम है और इसमें कोई सार नहीं है—जो कि पूरी तरह से सही और सच है। और क्या यह हूबहू वैसा ही नहीं है जैसा कि परमेश्वर के लोग आज हैं? वे केवल बाह्य रूप से परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं और उस पर विश्वास करते हैं। परमेश्वर से पहले, वे परमेश्वर को अपने साथ संतुष्ट करवाने के लिए अनुग्रह प्राप्त करते हैं और स्वयं का दिखावा करते हैं; अंदर से, हालाँकि, वे भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से भरे हुए होते हैं, उनके पेट अशुद्धियों से भरे होते है। इसलिए, परमेश्वर मनुष्य के सामने प्रश्न खड़े करता है, पूछता है कि क्या परमेश्वर के प्रति उसकी वफादारी अशुद्धियों से दूषित है, कि क्या यह शुद्ध और पूरे हृदय से है। जब वे सेवा करने वाले थे, तो बहुत से लोगों ने अपने मुँह से परमेश्वर की स्तुति की, किन्तु अपने हृदय में उसे शाप दिया। अपने मुँह से, वे परमेश्वर के आज्ञाकारी थे, परन्तु अपने हृदय से, उन्होंने परमेश्वर की अवज्ञा की। उनके मुँह ने नकारात्मक शब्द कथन किए, और उनके हृदयों में वे परमेश्वर का विरोध छुपाते थे। यहाँ तक ​​कि ऐसे भी थे जिनके कार्यकलाप समन्वित थे: वे अपने मुँह से अश्लीलताओं को निर्गत करते थे और अपने हाथों से इशारा करते थे, सर्वथा स्वच्छंद, बड़े लाल अजगर के असली चेहरे की एक ज्वलंत और सजीव अभिव्यक्ति दे रहे थे। वे सच में बड़े लाल अजगर के अंडे कहे जाने के योग्य हैं। किन्तु आज, वे वफादार सेवा करने वालों की जगह पर खड़े हैं और परमेश्वर के वफादार लोगों की तरह कार्यकलाप करते हैं—कितने बेशर्म! यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है; वे कीचड़ में से आए, इसलिए उनके पास अपने असली रंगों को दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि परमेश्वर पवित्र और शुद्ध है, तथा यथार्थ और वास्तविक है, इसलिए उसका देह पवित्रात्मा से आता है। यह निश्चित है, और संदेह से परे है। न केवल स्वयं परमेश्वर की गवाही देने में समर्थ होना, बल्कि परमेश्वर की इच्छा को पूर्णतः कार्यान्वित करने में सक्षम होना : यह परमेश्वर के सार का एक पक्ष है। यह कि देह एक छवि के साथ पवित्रात्मा से आता है का अर्थ है कि देह जिससे आत्मा स्वयं को ढकता है, वह आवश्यक रूप से मनुष्य की देह से भिन्न है, और यह अंतर मुख्य रूप से उनकी आत्मा में निहित है। एक छवि के साथ पवित्रात्मा जिसे संदर्भित करता है, वह है कि कैसे, सामान्य मानवता के द्वारा आवृत किए जाने के परिणामस्वरूप, दिव्यता सामान्य रूप से भीतर काम करने में समर्थ है, जो कि थोड़ा सा भी अलौकिक नहीं है, और मानवता द्वारा सीमित नहीं है। "पवित्रात्मा की छवि" पूर्ण दिव्यता को संदर्भित करती है, और मानवता द्वारा सीमित नहीं है। अपने आप में, परमेश्वर का अंतर्निहित स्वभाव और सच्ची छवि देहधारी देह में पूरी तरह से जीए जा सकते हैं, जो कि न केवल सामान्य और स्थिर है, बल्कि महिमा और कोप के साथ है। पहला देहधारी देह केवल लोगों की धारणाओं के परमेश्वर को ही प्रस्तुत कर सकता था, अर्थात्, वह केवल चिन्हों और अद्भुत कामों को करने और भविष्यवाणी कहने में समर्थ था। इस प्रकार, उसने पूरी तरह से परमेश्वर की वास्तविकता को नहीं जीया था, और इसलिए एक छवि के साथ आत्मा का मूर्तरूप नहीं था; वह मात्र परमेश्वर की प्रत्यक्ष प्रतीति था। और क्योंकि वह सामान्य मानवता के पार चला गया था, इसलिए वह पूर्ण व्यावहारिक परमेश्वर स्वयं नहीं कहा गया था, किन्तु उसके बारे में स्वर्ग में थोड़ा अस्पष्ट परमेश्वर था, वह लोगों की धारणाओं का परमेश्वर था। यह दो देहधारी देहों के बीच का अनिवार्य अंतर है।

ब्रह्मांड में उच्चतम बिंदु से, परमेश्वर मनुष्य की हर चाल को देखता है, उस समग्र को जो लोग कहते और करते हैं। यहाँ तक ​​कि उनके हर अंतर्तम विचार को वह पूर्ण स्पष्टता के साथ देखता है, इसे अनदेखा नहीं करता है—और इसलिए परमेश्वर के वचन, उनके हर विचार पर चोट करते हुए, सीधे लोगों के हृदय को चीरते हैं, और उसके वचन चतुर और बिना किसी त्रुटि के होते हैं। “यद्यपि मनुष्य मेरी आत्मा को जानता है, किन्तु वह मेरी आत्मा का अपमान करता है। मेरे वचन सभी लोगों के कुरूप चेहरों को प्रकट कर देते हैं, और लोगों के अंतरतम के विचारों को प्रकट कर देते हैं, और धरती पर सभी को मेरी जाँच के बीच में गिराने का कारण बनते हैं।" इससे यह देखा जा सकता है कि, यद्यपि परमेश्वर की मनुष्य से अपेक्षाएँ उच्च नहीं हैं, फिर भी लोग परमेश्वर के आत्मा की जाँच को सहन करने में असमर्थ हैं। “यद्यपि मनुष्य गिर पड़ता है, किन्तु उसका हृदय मुझ से दूर भटकने की हिम्मत नहीं करता है। परमेश्वर के प्राणियों के बीच, कौन है जो मेरे कार्य की वजह से मुझ से प्रेम करने के लिए मेरे पास नहीं आता है?” यहाँ तक कि यह परमेश्वर की पूरी बुद्धि और सर्वसामर्थ्य का और भी अधिक द्योतक है, और इस प्रकार उस सभी को प्रकट करता है जो परमेश्वर के लोगों ने सोचा था जब वे सेवा करने वालों की स्थिति में थे: यद्यपि, विफलता में समाप्त हुए "व्यापार" के बाद, "सैकड़ों हजारों" या "लाखों" अपने मस्तिष्क में निष्फल हो गए, परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं की वजह से, और परमेश्वर की महिमा और कोप की वजह से, भले ही उन्होंने दुःख में अपने सिरों को झुका दिया, वे तब भी नकारात्मकता के बीच परमेश्वर की सेवा करते थे, किन्तु अतीत के उनके सभी अभ्यास केवल खोखली बातें बन गईं, और पूरी तरह से भुला दिए गए; इसके बदले उन्होंने, समय बिताने अथवा व्यर्थ गँवाने के लिए, इच्छानुसार उन चीजों को किया जिन्होंने उनका स्वयं का मनोरंजन करते रहने के लिए उन्हें और हर किसी को खुश किया ...। यह वह था जो वास्तव में मनुष्य के बीच में चल रहा था। इस प्रकार, परमेश्वर मनुष्य को खुल कर बोलता है और कहता है: “मेरे वचनों के परिणामस्वरूप कौन है जो मेरी लालसा नहीं करता है? मेरे प्रेम के कारण किसके हृदय में भक्ति की भावनाएँ उत्पन्न नहीं होती हैं?” सच्चाई बताने के लिए, सभी लोग परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, और उनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो परमेश्वर के वचनों को पढ़ना पसंद नहीं करता है—सिर्फ इतना ही है कि वे परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में लाने में असमर्थ हैं क्योंकि वे अपनी प्रकृति द्वारा बाधित हैं। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, बहुत से लोग परमेश्वर के वचनों से अलग होना सहन नहीं तक सकते हैं, और परमेश्वर के लिए प्रेम उनके भीतर उमड़ता है। इस प्रकार, परमेश्वर एक बार पुनः शैतान को शाप देता है, और एक बार पुनः उसके बदसूरत चेहरे को उजागर करता है “उस युग में भी जिसमें शैतान दंगों को चलाता है और पागलों की तरह निरंकुश हो जाता है,” यह भी वही युग है जिसमें परमेश्वर धरती पर अपने आधिकारिक, महान कार्य का आरंभ करता है। इसके बाद, वह दुनिया का सर्वनाश करने का कार्य आरंभ करता है जिसका अर्थ है कि, जितना अधिक शैतान दंगा चलाता है, उतना ही समीप परमेश्वर का दिन आता है, और इसलिए उतना ही अधिक परमेश्वर शैतान के उपद्रव के बारे में बोलता है, इस प्रकार यह दिखाया जाता है कि वह दिन जब परमेश्वर दुनिया का सर्वनाश करता है करीब आता है। शैतान के प्रति परमेश्वर की घोषणा इस तरह की ही है।

परमेश्वर ने बार-बार ऐसा क्यों कहा “…और मेरी पीठ के पीछे, वे उन “प्रशंसनीय” गंदे व्यवहारों में व्यस्त जाते हैं। क्या तुम्हें लगता है कि यह देह, जिससे मैंने अपने आपको आच्छादित किया हुआ है, तुम्हारे चाल-चलन, तुम्हारे आचरण और तुम्हारे वचनों के बारे में कुछ नहीं जानता है?” उसने ऐसे वचनों को सिर्फ एक या दो बार नहीं कहा—ऐसा क्यों है? एक बार जब लोगों का परमेश्वर से सामना हो जाता है, और वे मनुष्य के लिए परमेश्वर के दुःख से अवगत हो जाते हैं, तो जब वे आगे संघर्ष करते हैं तो उनके लिए अतीत को भूलना आसान हो जाता है। किन्तु परमेश्वर मनुष्य के प्रति थोड़ा सा भी उदार नहीं होता है: वह लोगों के विचारों की खोज करता रहता है। इस प्रकार वह कई बार लोगों से स्वयं को जानने, उनकी व्यभिचारिता को समाप्त करने, उन "प्रशंसनीय" गंदे लेन-देन में अब और शामिल न होने, फिर कभी भी देह में परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं करने के लिए कहता है। यद्यपि लोगों के स्वभाव नहीं बदलते हैं, किन्तु उन्हें कुछेक बार याद दिलाने में लाभ होता है। इसके बाद, परमेश्वर मनुष्य में रहस्य को प्रकट करने के लिए मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से बोलता है: “बहुत वर्षों तक मैंने हवा और बारिश को सहा है, और इस प्रकार मैंने मनुष्य के संसार की कड़वाहट का भी अनुभव किया है, फिर भी गहन चिंतन करने पर, कष्ट की किसी भी मात्रा से शरीरधारी मनुष्य मुझमें आशा को नहीं खो सकता है, और किसी भी प्रकार की मधुरता शरीरधारी मनुष्य को मेरे प्रति निरूत्साहित, उदासीन या उपेक्षापूर्ण होने का कारण तो बिलकुल नहीं बन सकती है। क्या मेरे लिए मनुष्य का प्रेम वास्तव में या तो कोई पीड़ा नहीं या कोई मधुरता तक ही सीमित है?” “पृथ्वी पर सभी रिक्त है," इन वचनों का निस्संदेह आंतरिक अर्थ है। इस प्रकार परमेश्वर कह रहा है कि कोई भी चीज़ परमेश्वर में मनुष्य की आशा का त्याग नहीं करवा सकती है या उसकी ओर उदासीन नहीं करवा सकती है। यदि लोग परमेश्वर से प्यार नहीं करते हैं, तो वे मर भी सकते हैं; यदि वे परमेश्वर से प्यार नहीं करते हैं, तो उनकी पीड़ा व्यर्थ है, और उनके आशीष खोखले हैं, और उनके पापों में जोड़ दिए जाते हैं। क्योंकि एक भी व्यक्ति परमेश्वर से वास्तव में प्यार नहीं करता है, इसलिए परमेश्वर कहता है, “क्या मेरे लिए मनुष्य का प्रेम वास्तव में या तो कोई पीड़ा नहीं या कोई मधुरता नहीं तक ही सीमित है।” मनुष्य की दुनिया में, कोई भी दर्द या मिठास के बिना अस्तित्व में कैसे रह सकता है? बार-बार, परमेश्वर कहता है कि, "किसी एक भी मनुष्य ने कभी भी सचमुच मेरा चेहरा नहीं देखा है और सचमुच मेरी आवाज को नहीं सुना है, क्योंकि मनुष्य मुझे वास्तव में नहीं जानता है।" परमेश्वर कहता है कि मनुष्य वास्तव में उसे नहीं जानता है, फिर भी वह क्यों कहता है कि मनुष्य उसे जानता है? क्या यह एक विरोधाभास नहीं है? परमेश्वर के हर एक वचन का एक निश्चित लक्ष्य है। क्योंकि मनुष्य निष्ठुर हो गया है, इसलिए परमेश्वर मनुष्य के हृदय में अंततः 0.1 प्रतिशत प्राप्त करने के लिए मनुष्य में अपने कार्य का 100% करने के सिद्धांत को काम में लाता है। ऐसी ही पद्धति है जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए परमेश्वर को अवश्य इसी प्रकार से कार्य करना चाहिए। यही हूबहू परमेश्वर के वचनों की बुद्धि भी है। क्या तुम लोग इसे समझ गए?

परमेश्वर कहता है “जब मैं अपने रहस्यों को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करता हूँ और देह में अपनी इच्छा को स्पष्ट करता हूँ, तो तुम लोग कोई ध्यान नहीं देते हो; तुम लोग आवाज़ को सुनते हो, परन्तु अर्थ को नहीं समझते हो। मैं उदासी के वशीभूत हो गया हूँ। यद्यपि मैं देह में हूँ, किन्तु मैं देह की सेवकाई के कार्य करने में असमर्थ हूँ।” एक विचार से, ये वचन लोगों से, उनकी निष्ठुरता के कारण, परमेश्वर के साथ सहयोग करने के लिए पहल करवाते हैं; दूसरे विचार से, परमेश्वर देह में अपनी दिव्यता का असली चेहरा प्रकट करता है। क्योंकि लोगों की कद-काठी बहुत छोटी है, इसलिए उस अवधि के दौरान जब परमेश्वर देह में होता है तो दिव्यता का प्रकटन केवल मनुष्य की स्वीकृति की योग्यताओं के अनुसार होता है। कार्य के इस चरण के दौरान, अधिकांश लोग पूरी स्वीकृति में असमर्थ रहते हैं, जो पर्याप्त रूप से दर्शाता है कि उनकी स्वीकृति की योग्यताएँ कितनी कम हैं। इस प्रकार, कार्य करते समय दिव्यता पूरी तरह से अपना मूल प्रकार्य नहीं करती है; यह है तो किन्तु एक छोटा सा हिस्सा है। यह दर्शाता है कि भविष्य के काम में, दिव्यता मनुष्य के ठीक होने की अवस्था के अनुसार धीरे-धीरे प्रकट की जाएगी। हालाँकि, दिव्यता धीरे-धीरे विकसित नहीं होती है, किन्तु वह है जो देहधारी परमेश्वर के पास अनिवार्य रूप से है, और मनुष्य की कद-काठी के असदृश है।

मनुष्य के सृजन का परमेश्वर का एक उद्देश्य और अर्थ था, और इसलिए परमेश्वर ने कहा था, “यदि मनुष्य को मेरे प्रचण्ड क्रोध में नष्ट कर दिया जाता, तो मैंने जो स्वर्ग और पृथ्वी की सृष्टि की है उसका क्या महत्व रह जाता?” मनुष्य के भ्रष्ट होने के बाद, परमेश्वर ने अपनी खुशी के लिए लोगों के एक हिस्से को प्राप्त करने की योजना बनाई; यह ऐसा मामला नहीं है कि सभी लोगों को नष्ट किया जाना है, या परमेश्वर की प्रशासनिक आज्ञाओं के थोड़े से उल्लंघन पर ही उनका उन्मूलन कर दिया जाएगा। यह परमेश्वर की इच्छा नहीं है। जैसा कि परमेश्वर ने कहा था, यह अर्थहीन होगा। यह ठीक इस "अर्थहीनता" की वजह से है कि परमेश्वर की बुद्धि स्पष्ट की जाती है। क्या सभी लोगों को ताड़ित करने, उनका न्याय करने और उन पर प्रहार करने, अंततः उन्हे चुनने के लिए जो वास्तव में उससे प्यार करते हैं, परमेश्वर के कई तरीकों से बोलने और कार्य करने का अधिक बड़ा महत्व नहीं है? और यह ठीक इसी तरह से है कि परमेश्वर के कर्म प्रकट होते हैं, और इसलिए मनुष्य का सृजन अधिक सार्थक हो जाता है। इस प्रकार, परमेश्वर के अधिकांश वचन आगे प्रवाहित होते रहते हैं; यह एक उद्देश्य प्राप्त करने के लिए है, और केवल यही उसके कुछ वचनों की वास्तविकता है।

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