15.8. परमेश्वर का आज्ञापालन कैसे करें पर

517. परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण वास्तविक अवश्य होना चाहिए और अवश्य जीया जाना चाहिए। सतही तौर पर समर्पण करके परमेश्वर के अनुमोदन को प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और अपने स्वभाव में रूपान्तरण का प्रयास किए बिना परमेश्वर के वचन के मात्र सतही पहलू का पालन करके परमेश्वर के हृदय को प्रसन्न करने में समर्थ नहीं हुआ जा सकता है। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण एक समान हैं। जो केवल परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं लेकिन उसके कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते हैं उन्हें आज्ञाकारी नहीं माना जा सकता है, और उन्हें तो बिल्कुल भी नहीं माना जा सकता है जो सचमुच में समर्पण नहीं करते हैं, और बाहरी तौर पर वे चापलूस हैं। जो सचमुच में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे सभी कार्य से लाभ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य की समझ प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। केवल ऐसे लोग ही वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। ऐसे लोग नए कार्य से नया ज्ञान प्राप्त करने और उससे नए परिवर्तनों का अनुभव करने में समर्थ होते हैं। केवल ऐसे मनुष्यों के पास ही परमेश्वर का अनुमोदन होता हैः केवल इस प्रकार का मनुष्य ही ऐसा है जिसे सिद्ध बनाया जाता है, एक ऐसा जो अपने स्वभाव में रूपान्तरण से गुज़र चुका है। जिन्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त होता है ये वे लोग हैं जो खुशी से परमेश्वर के प्रति, और साथ ही उसके वचन और उसके कार्य के प्रति समर्पित होते हैं। केवल इस प्रकार का मनुष्य ही सही मार्ग में है; केवल इस प्रकार का मनुष्य ही ईमानदारी से परमेश्वर की कामना करता है और ईमानदारी से परमेश्वर की खोज करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे' से उद्धृत

518. परमेश्वर के देह में होने के दौरान, जिस आज्ञाकारिता की वह लोगों से अपेक्षा करता है वह वह नहीं होती है जो लोग कल्पना करते हैं—आलोचना या विरोध नहीं करना। इसके बजाय, वह अपेक्षा करता है कि लोग उसके वचनों को जीवन के लिए अपना सिद्धांत और अपनी उत्तरजीविता की नींव बना लें, कि वे उसके वचनों के सार को पूरी तरह से अभ्यास में ले आएँ, और कि वे पूरी तरह से उसकी इच्छा को संतुष्ट करें। देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने की लोगों से अपेक्षा करने का एक पहलू उसके वचनों को अभ्यास में लाने को संदर्भित करता है, और दूसरा पहलू उसकी सादगी और व्यावहारिकता का पालन करने में सक्षम होने को संदर्भित करता है। ये दोनों पूर्ण होने चाहिए। जो लोग इन दोनों पहलुओं को प्राप्त कर सकते हैं वे सभी ऐसे हैं जिनके पास परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम वाला हृदय है। ये सभी वे लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, और वे सभी परमेश्वर से उतना ही प्यार करते हैं जितना वे अपने स्वयं के जीवन से प्यार करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

519. परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अलग-अलग अवधियों में भिन्न होता है। यदि तुम एक चरण में बड़ी आज्ञाकारिता दिखाते हो, मगर अगले चरण में कम दिखाते हो या कुछ भी नहीं दिखाते हो, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है तब यदि तुम परमेश्वर के साथ समान गति से चलते हो, तो जब वह अगला कदम उठाता है तब तुम्हें समान गति से अवश्य चलते रहना चाहिए। केवल तभी तुम ऐसे एक हो जो पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञाकारी है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में अचल अवश्य बने रहना चाहिए। तुम यूँ ही जब अच्छा लगे तभी आज्ञा नहीं मान सकते हो और जब अच्छा न लगे तब अवज्ञा नहीं कर सकते हो। इस प्रकार की अवज्ञा को परमेश्वर का अनुमोदन नहीं मिलता है। यदि तुम उस नए कार्य के साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते हो, जिसके बारे में मैं संगति करता हूँ, और पूर्व की बातों को लगातार धारण नहीं कर सकते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों के माध्यम से तुम्हारा भरण-पोषण करना है। जब तुम उसके वचनों का पालन करते हो और उन्हें स्वीकार करते हो, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिलकुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं कहता हूँ। जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो, और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम लोगों के देखने के लिए और तुम लोगों को वर्तमान समय के प्रकाश में लाने के लिए एक नया प्रकाश छोड़ता हूँ। जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुम में कार्य करेगा। कुछ लोग हैं जो अड़ियल हो सकते हैं और कहेंगे, "जैसा तुम कहते हो मैं वैसा करूँगा ही नहीं।" तब मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम अब सड़क के अंत तक आ गए हो। तुम पूरी तरह से सूख गए हो, और तुममें और जीवन नहीं बचा है। इसलिए, अपने स्वभाव के रूपान्तरण का अनुभव करने में, वर्तमान प्रकाश के साथ तालमेल बिठाए रखना बहुत ही ज़्यादा निर्णायक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे' से उद्धृत

520. नए प्रकाश की सराहना करना, उसे स्वीकार करने में समर्थ होना और उसे अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की कुंजी है। केवल यही सच्ची आज्ञाकारिता है। जो लोग परमेश्वर के लिए प्यासे होने की इच्छा नहीं रखते हैं वे परमेश्वर की आज्ञा मानने का मन रखने वाला होने में असमर्थ हैं, और वे केवल यथास्थिति के साथ अपनी संतुष्टि के फलस्वरूप केवल परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं। मनुष्य परमेश्वर का आज्ञापालन इसलिए नहीं कर सकता है क्योंकि वह उसके प्रभाव में है जो पहले आया था। ऐसी चीज़ें जो पहले आई थीं उन्होंने परमेश्वर के बारे में लोगों को हर प्रकार की धारणाएँ एवं भ्रांतियाँ दी हैं जो उनके मनों में परमेश्वर की छवि बन गई हैं। इस प्रकार, जिन में वे विश्वास करते हैं वे उनकी स्वयं की धारणाएँ, और उनकी स्वयं की कल्पनाओं के मानक हैं। यदि तुम अपनी कल्पनाओं के परमेश्वर के विरुद्ध उस परमेश्वर को मापते हो, जो आज वास्तविक कार्य करता है, तो तुम्हारा विश्वास शैतान से आता है, और तुम्हारी स्वयं की प्राथमिकताओं के अनुसार है—और परमेश्वर इस तरह का विश्वास नहीं चाहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि उनके परिचय पत्र कितने उत्कृष्ट हैं, और उनके समर्पण की परवाह किए बिना—भले ही उन्होंने उसके कार्य के लिए जीवन भर के प्रयासों का समर्पण किया हो, और अपने आपको शहीद कर दिया हो—परमेश्वर इस तरह के विश्वास वाले किसी को भी स्वीकार नहीं करता है। वह उन्हें मात्र थोड़ा सा अनुग्रह दिखाता है, और थोड़े समय के लिए उन्हें उसका आनन्द उठाने देता है। इस तरह के लोग सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ हैं, पवित्र आत्मा उनके भीतर काम नहीं करता है, और परमेश्वर बारी-बारी से उन में प्रत्येक को हटा देगा। इस बात की परवाह किए बिना कि वे बुजुर्ग हैं या जवान, जो लोग अपने विश्वास में परमेश्वर का आज्ञापालन नहीं करते हैं और जिनके पास ग़लत प्रेरणाएँ हैं, ये ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य का विरोध और उसमें हस्तक्षेप करते हैं, और ऐसे लोग निर्विवाद रूप से परमेश्वर द्वारा हटा दिए जाएँगे। ऐसे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ी सी भी आज्ञाकारिता नहीं है, जो केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करते हैं, और जिनमें परमेश्वर की प्रीति एवं सुंदरता का थोड़ा सा भाव है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते हैं, और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों का पालन नहीं करते हैं—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहते हैं, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाएँगे, पूर्ण नहीं बनाए जाएँगे। परमेश्वर लोगों को उनकी आज्ञाकारिता के माध्यम से, परमेश्वर के वचन को उनके द्वारा खाए, पीए एवं उसका आनन्द उठाए जाने के माध्यम से, और उनके जीवन में कष्ट एवं शुद्धिकरण के माध्यम से पूर्ण बनाता है। केवल इस तरह के विश्वास के माध्यम से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है, केवल तभी वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान को धारण कर सकते हैं। परमेश्वर के अनुग्रहों के बीच रह कर सन्तुष्ट न होना, सत्य के लिए सक्रियता से प्यासे होना, और सत्य की खोज करना, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की खोज करना—सचेतनता से परमेश्वर की आज्ञा मानने का यही अर्थ है; यह ठीक उसी प्रकार का विश्वास है जो परमेश्वर चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रहों का आनन्द उठाने से अधिक और कुछ नहीं करते हैं, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं, या परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं, और उनकी आज्ञाकारिता, धर्मनिष्ठता, और प्रेम तथा धैर्य सभी सतही हैं। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रहों का आनन्द लेते हैं, वे वास्तव में परमेश्वर को नहीं जान सकते हैं, और यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला होता है, और वे ऐसी बातें कहते हैं जैसे कि परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है, या परमेश्वर मनुष्य के प्रति करुणामय है। यह मनुष्य के जीवन का प्रतिनिधित्व नहीं करता है, और यह नहीं दिखाता है कि लोग सचमुच में परमेश्वर को जानते हैं। यदि, जब परमेश्वर के वचन उन्हें शुद्ध करते हैं, या जब परमेश्वर के परीक्षण उन पर आते हैं, तो लोग परमेश्वर की आज्ञा मानने में असमर्थ होते हैं—उसके बजाए, यदि वे सन्देहास्पद हो जाते हैं, और नीचे गिर जाते हैं—तो वे न्यूनतम आज्ञाकारी भी नहीं रहते हैं। उनके भीतर, परमेश्वर के विश्वास के बारे में बहुत सारे नियम और प्रतिबंध हैं, पुराने अनुभव हैं जो कई वर्षों के विश्वास के परिणामस्वरूप हैं, या बाइबल पर आधारित विभिन्न सिद्धांत हैं। क्या इस प्रकार के लोग परमेश्वर का आज्ञापालन कर सकते हैं? ये लोग मानवीय चीज़ों से भरे हुए हैं—वे परमेश्वर का आज्ञापालन कैसे कर सकते हैं? वे सभी अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार आज्ञापालन करते हैं—क्या परमेश्वर इस तरह की आज्ञाकारिता की इच्छा कर सकता है? यह परमेश्वर का आज्ञापालन करना नहीं है, बल्कि सिद्धांतों पर अटल रहना है, यह अपने आपको सन्तुष्ट करना और सांत्वना देना है। यदि तुम कहते हो कि यह परमेश्वर का आज्ञापालन है, तो क्या तुम उसका तिरस्कार नहीं करते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए' से उद्धृत

521. यदि मनुष्य धार्मिक अवधारणाओं को छोड़ दे, तो वह आज परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य को मापने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं करेगा, और उसके बजाय सीधे तौर पर उनका पालन करेगा। भले ही परमेश्वर का आज का कार्य साफ़ तौर पर अतीत के कार्य से अलग है, तुम अतीत के विचारों का त्याग कर पाते हो और आज सीधे तौर पर परमेश्वर के वचनों का पालन कर पाते हो। यदि तुम इस प्रकार के ज्ञान के योग्य हो कि तुम आज परमेश्वर के कार्य को सबसे मुख्य स्थान देते हो, भले ही उसने अतीत में किसी भी तरह से कार्य किया हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो अपनी अवधारणों को छोड़ चुका है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करता है, और जो परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन करने में सक्षम है और परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करता है। इस तरह, तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो सचमुच परमेश्वर का आज्ञापालन करता है। तुम परमेश्वर के कार्य का विश्लेषण या अध्ययन नहीं करते हो; यह कुछ ऐसा है कि मानो परमेश्वर अपने अतीत के कार्य को भूल गया है और तुम भी उसे भूल गए हो। वर्तमान ही वर्तमान है, और अतीत, बीता हुआ कल हो गया है, और चूँकि परमेश्वर ने जो कुछ अतीत में किया था, आज उसे अलग कर दिया है, इसलिए तुम्हें भी उसमें टिके नहीं रहना चाहिए। केवल तभी तुम वैसे व्यक्ति बन पाओगे जो परमेश्वर का पूरी तरह से आज्ञापालन करता है और जिसने अपनी धार्मिक अवधारणाओं को पूरी तरह से त्याग दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं' से उद्धृत

522. चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और उसके सभी कार्यों में विश्वास अवश्य रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए। यदि तुम ऐसा करने में असमर्थ हो, तो यह मायने नहीं रखता है कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी कभी भी उसका आज्ञापालन नहीं किया है या उसके सभी वचनों को स्वीकार नहीं किया है, बल्कि उसके बजाए परमेश्वर से समर्पण करने को और तुम्हारी अवधारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सब से अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और तुम एक अविश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति कैसे परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन करने में समर्थ हो सकता है जो मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही मनुष्य वह है जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना करता है और उसका विरोध करता है। वह परमेश्वर का शत्रु है और मसीह विरोधी है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखता है, ऐसे व्यक्ति ने कभी भी समर्पण करने का जरा सा भी इरादा नहीं दिखाया है, और कभी भी खुशी से समर्पण नहीं दिखाया है और अपने आपको दीन नहीं बनाया है। वह दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाता है और कभी भी किसी के प्रति भी समर्पण नहीं दिखाता है। परमेश्वर के सामने, वह स्वयं को वचन का उपदेश देने में सबसे ज़्यादा निपुण समझता है और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझता है। वह उस अनमोल "ख़जाने" को कभी नहीं छोड़ता है जो पहले से ही उसके अधिकार में है, बल्कि आराधना करने, दूसरों को उसके बारे में उपदेश देने के लिए, उन्हें अपने परिवार की विरासत मानता है, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए उनका उपयोग करता है जो उसकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में कुछ संख्या में ऐसे लोग हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि वे "अदम्य नायक" हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल दर साल और पीढ़ी दर पीढ़ी वे अपने "पवित्र और अनुलंघनीय" कर्तव्य को जोशपूर्वक लागू करने की कोशिश करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता है और एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निन्दा करने का साहस नहीं करता है। वे परमेश्वर के घर में "राजा" बन गए हैं, और युगों-युगों से दूसरों पर क्रूरतापूर्वक शासन करते हुए उच्छृंखल चल रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करता है और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीवित दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने अस्तित्व में रहने की अनुमति कैसे दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा आज्ञापालन करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते हैं, तो ये आततायी जिनके हृदय में थोड़ी सी भी आज्ञाकारिता नहीं है कितना कम चल सकते हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे' से उद्धृत

523. वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते हैं, परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, कि वे परमेश्वर के वचन के लिए प्यासे हों, और परमेश्वर के वचनों को खाएँ एवं पीएँ, और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्राप्त कर सकें। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सचमुच में इस प्रकार की हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उन्नत करेगा, और वह निश्चित रूप से तुम्हारे प्रति अनुग्रहपूर्ण होगा। कोई भी इस पर सन्देह नहीं कर सकता है, और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता के वास्ते नहीं हैं, और तुम्हारे अन्य लक्ष्य हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रत्येक कार्यकलाप—परमेश्वर के विरोध में होंगे। तुम मृदुभाषी एवं विनम्र-व्यवहार वाले हो सकते हो, तुम्हारा हर कार्यकलाप और अभिव्यक्ति सही दिखायी दे सकती है, तुम एक ऐसा व्यक्ति दिखाई दे सकते हो जो कि आज्ञाकारी है, किन्तु जब परमेश्वर के प्रति तुम्हारी प्रेरणाओं एवं परमेश्वर में विश्वास के बारे में तुम्हारे दृष्टिकोण की बात आती है, तो जो कुछ भी तुम करते हो वह परमेश्वर के विरोध में और बुरा होता है। जो लोग भेड़ों के समान आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परन्तु जिनके हृदय बुरे इरादों को आश्रय देते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं, वे प्रत्यक्षत: परमेश्वर का अपमान करते हैं, और परमेश्वर उन में से एक को भी नहीं छोड़ेगा। पवित्र आत्मा उन में से प्रत्येक को प्रकट करेगा, ताकि सभी यह देख सकें कि उन में से प्रत्येक से, जो पाखण्डी हैं, पवित्र आत्मा के द्वारा निश्चित रूप से घृणा की जाएगी एवं उनका तिरस्कार किया जाएगा। चिंता मत करो: परमेश्वर बारी-बारी से उन में से प्रत्येक के साथ निपटेगा और उनका समाधान करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए' से उद्धृत

524. इस बात की माप करने में कि क्या लोग परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर पाते हैं, मुख्य बात यह है कि क्या वे परमेश्वर से अत्यधिक की माँगें कर रहे हैं, और क्या उनके गुप्त अभिप्राय भी हैं। अगर लोग सदा परमेश्वर के सामने अपनी माँगें रखते हैं, तो इसका अर्थ है कि वे उसकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, यदि तुम इसे परमेश्वर से प्राप्त नहीं कर सकते, सत्य की तलाश नहीं कर सकते, यदि तुम सदैव अपने ही व्यक्तिपरक तर्क से बात करते हो, हमेशा यह महसूस करते हो कि केवल तुम ही सही हो, और यदि तुम अब भी परमेश्वर पर संदेह कर सकते हो, तो तुम मुश्किल में रहोगे। ऐसे लोग सबसे घमंडी एवं परमेश्वर के प्रति विद्रोही होते हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर से माँगते रहते हैं, वे सच में आज्ञापालन नहीं कर सकते। अगर तुम परमेश्वर के सामने अपनी मांगें रखते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम उससे सौदा कर रहे हो, अपने विचार स्वयं चुन रहे हो, और तुम अपने विचारों के अनुसार कार्य कर रहे हो। इसमें, तुम परमेश्वर से विश्वासघात करते हो, और तुम में आज्ञाकारिता नहीं है। परमेश्वर के सामने माँगें रखना अर्थहीन है; अगर तुम्हें सचमुच परमेश्वर में विश्वास होता तो तुम उसके सामने कोई माँग रखने की हिम्मत न करते, न ही तुम इस योग्य होते कि तुम उसके सामने अपनी माँगें रखो, चाहे वे माँगें उचित हों या न हों। अगर तुम्हारा विश्वास सच्चा है, और तुम उसे परमेश्वर मानते हो, तो तुम्हारे पास उसकी आराधना करने और उसकी आज्ञा का पालन करने के अलावा कोई विकल्प न होगा। आज न सिर्फ़ लोगों के पास विकल्प है, बल्कि वे यह भी मांग करते हैं कि परमेश्वर उनकी सोच के अनुसार कार्य करे। वे अपने विचार स्वयं चुनते हैं और कहते हैं कि परमेश्वर उनके अनुसार काम करे, और वे खुद से यह अपेक्षा नहीं करते कि वे परमेश्वर के विचार के अनुसार काम करें। इस तरह, उनके भीतर कोई सच्चा विश्वास नहीं होता, न ही इस विश्वास का कोई सार होता है। जब तुम परमेश्वर से कम माँगें करने में सक्षम हो जाओगे, तुम्हारे सच्चे विश्वास और तुम्हारी आज्ञाकारिता में वृद्धि होगी, और तुम्हारी तार्किकता भी अपेक्षाकृत सामान्य हो जाएगा।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं' से उद्धृत

525. वास्तविक-जीवन की समस्याओं का सामना करते समय, तुम्हें किस प्रकार परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता को जानना और समझना चाहिए? जब तुम नहीं जानते हो कि किस प्रकार इन समस्याओं को समझें, सँभालें और अनुभव करें, तो तुम्हें अपने इरादे, अपनी इच्छा, और परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की अपनी वास्तविकता को दर्शाने के लिए किस प्रकार की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए? पहले तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना होगा; फिर तुम्हें खोजना सीखना होगा; तब तुम्हें समर्पण करना सीखना होगा। "प्रतीक्षा" का अर्थ है परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना, उन लोगों, घटनाओं एवं चीज़ों की प्रतीक्षा करना जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित की हैं, और उसकी इच्छा की प्रतीक्षा करना कि वह धीरे-धीरे अपनी इच्छा को तुम पर प्रकट करे। "खोजना" का अर्थ है उन लोगों, घटनाओं और चीज़ों के माध्यम से तुम्हारे लिए परमेश्वर के विचारशील इरादों का अवलोकन करना और उन्हें समझना जो उसने बनाए हैं, उनके माध्यम से सत्य को समझना, वह समझना जो मनुष्यों को अवश्य पूरा करना चाहिए और उन मार्गों को समझना जिनका उन्हें पालन अवश्य करना चाहिए, इस बात को समझना कि परमेश्वर का मनुष्यों में किन परिणामों को प्राप्त करने का अभिप्राय है और उसका उनमें किन उपलब्धियों को देखने का अभिप्राय है। "समर्पण करना", वास्तव में, उन लोगों, घटनाओं, और चीज़ों को स्वीकार करने की ओर संकेत करता है जो परमेश्वर ने आयोजित की हैं, उसकी संप्रभुता को स्वीकार करने और, उसके माध्यम से, यह जान लेने की ओर संकेत करता है कि किस प्रकार सृजनकर्ता मनुष्य के भाग्य पर हुक्म चलाता है, कि वह किस प्रकार अपने जीवन से मनुष्य को आपूर्ति करता है, कि वह किस प्रकार मनुष्यों के भीतर सत्य का कार्य करता है। परमेश्वर की व्यवस्थाओं और संप्रभुता के अधीन सभी चीज़ें प्राकृतिक नियमों का पालन करती हैं, और यदि तुम परमेश्वर को अपने लिए सभी चीज़ों की व्यवस्था करने और उन पर हुक्म चलाने देते हो, तो तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना चाहिए, तुम्हें खोज करना सीखना चाहिए, और तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। यही वह प्रवृत्ति है जिसे हर उस व्यक्ति को अवश्य अपनानी चाहिए जो परमेश्वर में अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहता है, और वह मूल गुण है जो हर उस व्यक्ति को अवश्य धारण करना चाहिए जो परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करना चाहता है। इस प्रकार की प्रवृत्ति रखने के लिए, इस प्रकार की योग्यता धारण करने के लिए, तुम लोगों को और अधिक कठिन परिश्रम करना होगा; और केवल इस प्रकार से ही तुम लोग सच्ची वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III' से उद्धृत

526. जब नूह ने वैसा किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था तो वह नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादे क्या थे। उसे नहीं पता था कि परमेश्वर क्या पूरा करना चाहता था। परमेश्वर ने नूह को सिर्फ एक आज्ञा दी थी, उसे कुछ करने के लिए निर्देश दिया था, किन्तु अधिक विवरण नहीं दिया, पर वह आगे बढ़ा और उसने इसे किया। उसने अकेले में परमेश्वर के इरादों को जानने की कोशिश नहीं की, न ही उसने परमेश्वर का विरोध किया या न ही वह दोमना था। उसने मात्र इसे एक शुद्ध एवं सरल हृदय के साथ तदनुसार किया। जो कुछ करने के लिए परमेश्वर ने उसे अनुमति दी उसने उसे किया, और कार्यों को करने के लिए परमेश्वर के वचन को मानने एवं सुनने में उसका दृढ़ विश्वास था। जो कुछ परमेश्वर ने उसे सौंपा था उसके साथ उसने इसी प्रकार स्पष्टवादिता एवं सरलता से व्यवहार किया था। उसका सार—उसके कार्यों का सार आज्ञाकारिता थी, आलोचना या प्रतिरोध नहीं था, और इसके अतिरिक्त, अपनी व्यक्तिगत रुचियों और अपने लाभ एवं हानि के विषय में सोचना नहीं था। और, जब परमेश्वर ने कहा कि वह जलप्रलय से संसार का नाश करेगा, तो नूह ने नहीं पूछा कब या नहीं पूछा कि चीज़ों का क्या होगा, और उसने निश्चित तौर पर परमेश्वर से नहीं पूछा कि वह किस प्रकार संसार को नष्ट करने जा रहा था। उसने केवल वही किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था। चाहे जैसे भी परमेश्वर इसे बनाना चाहता था या जिस भी चीज़ से बनाना चाहता था, उसने बिलकुल वैसा ही किया जैसा परमेश्वर ने उसे कहा था और उसके तुरन्त बाद कार्य का प्रारम्भ भी किया था। उसने परमेश्वर को संतुष्ट करने के रवैये के साथ परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार काम किया था। क्या वह स्वयं की आपदा से बचने में सहायता करने के लिए इसे कर रहा था? नहीं। क्या उसने परमेश्वर से पूछा कि संसार को नष्ट होने में कितना समय बाकी है? उसने नहीं पूछा। क्या उसने परमेश्वर से पूछा या क्या वह जानता था कि जहाज़ बनाने के लिए कितना समय लगेगा? वह यह भी नहीं जानता था। उसने केवल आज्ञा को माना, ध्यान से सुना, और इसके अनुसार किया।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I' से उद्धृत

527. परमेश्वर पर अपने विश्वास में, पतरस ने हर एक बात में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया था और उन सब में जो परमेश्वर से आया था, उसमें उसने आज्ञा मानने का प्रयास किया। बिना ज़रा सी भी शिकायत के, वह ताड़ना एवं न्याय, साथ ही साथ शुद्धिकरण, क्लेश एवं अपने जीवन में मौजूद कमी को स्वीकार कर सकता था, उसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए उसके प्रेम को पलट नहीं सकता था। क्या यह परमेश्वर के लिए चरम प्रेम नहीं है? क्या यह परमेश्वर के एक प्राणी के कर्तव्य की परिपूर्णता नहीं है? चाहे ताड़ना हो, न्याय हो, या क्लेश—तू मृत्यु तक आज्ञाकारिता हासिल करने में सदैव सक्षम हो, यह वह चीज़ है जिसे परमेश्वर के एक प्राणी के द्वारा हासिल किया जाना चाहिए, यह परमेश्वर के लिए प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इतना कुछ हासिल कर सकता है, तो वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी है, तथा ऐसा और कुछ नहीं है जो सृष्टिकर्ता की इच्छा को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। कल्पना कर कि तू परमेश्वर के लिए काम कर सकता है, फिर भी तू परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानता है, और सच्चाई से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ है। इस रीति से, तूने न केवल परमेश्वर के एक प्राणी के अपने कर्तव्य को नहीं निभाया होगा, बल्कि तू परमेश्वर के द्वारा निन्दित भी किया जाएगा, क्योंकि तू ऐसा व्यक्ति है जो सत्य धारण नहीं करता है, जो परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने में असमर्थ है, और जो परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है। तू केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने के विषय में परवाह करता है, और सत्य को अभ्यास में लाने, या स्वयं को जानने की परवाह नहीं करता है। तू सृष्टिकर्ता को समझता एवं जानता नहीं है, और सृष्टिकर्ता से प्रेम या उसकी आज्ञा का पालन नहीं करता है। तू ऐसा व्यक्ति है जो स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी है, और इसलिए ऐसे लोग सृष्टिकर्ता के प्रिय नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है' से उद्धृत

528. परमेश्वर के लिए एक ज़बर्दस्त गवाही देना मुख्य रूप से इस बात से संबंधित है कि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ है या नहीं, और तुम इस व्यक्ति के सामने आज्ञापालन करने में सक्षम हो या नहीं जो कि न केवल साधारण है, बल्कि सामान्य है, और मृत्युपर्यंत भी उसका आज्ञापालन कर पाते हो या नहीं। यदि तुम वास्तव में इस आज्ञाकारिता के माध्यम से परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर द्वारा ग्रहण किए जा चुके हो। मृत्यु होने तक पालन करने में सक्षम होना, और उसके सामने शिकायतों से मुक्त होना, आलोचनाएँ न करना, बदनाम न करना, धारणाएँ न रखना, और कोई अन्य आशय न रखना—इस तरह परमेश्वर को महिमा मिलेगी। एक नियमित व्यक्ति के सम्मुख आत्मसमर्पण जिसे मनुष्य द्वारा तुच्छ समझा जाता है और किसी भी अवधारणा के बिना मृत्यु तक आत्मसमर्पण करने में सक्षम होना—यह सच्ची गवाही है। परमेश्वर लोगों से इसमें प्रवेश करने की अपेक्षा करता है इस बात की वास्तविकता यह है कि तुम उसके वचनों का पालन करने में सक्षम हो जाओ, उसके वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम हो जाओ, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने झुकने और अपने स्वयं के भ्रष्टाचार को जानने में सक्षम हो जाओ, उसके सामने अपना हृदय खोलने में सक्षम हो जाओ, और अंत में उसके इन वचनों के माध्यम से उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाओ। जब ये वचन तुम्हें जीत लेते हैं और तुम्हें पूरी तरह उसके प्रति आज्ञाकारी बना देते हैं तो परमेश्वर को महिमा प्राप्त होती है; इसके माध्यम से वह शैतान को लज्जित करता है और अपने कार्य को पूरा करता है। जब तुम्हारी देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता के बारे में कोई धारणा नहीं होती है, अर्थात्, जब तुम इस परीक्षा में अडिग रहते हो, तो तुम एक अच्छी गवाही देते हो। यदि ऐसा दिन आता है जब तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की पूरी समझ हो जाती है और तुम पतरस की तरह मृत्युपर्यंत आज्ञापालन कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाओगे, और उसके द्वारा पूर्ण बना दिए जाओगे। परमेश्वर जो कुछ भी करता है जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होता है, वह तुम्हारे लिए एक परीक्षा होती है। यदि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो इसके लिए तुम्हें कष्ट भुगतने या शुद्ध किए जाने की आवश्यकता नहीं होती। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका कार्य इतना व्यावहारिक है और तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है कि यह तुम्हारे लिए अपनी धारणाओं को छोड़ देना आवश्यक बनाता है। यही कारण है कि यह तुम्हारे लिए एक परीक्षा है। यह परमेश्वर की व्यावहारिकता के कारण है कि सभी लोग परीक्षाओं के बीच में हैं; उसका कार्य व्यावहारिक है, अलौकिक नहीं। किसी भी अवधारणा को रखे बिना उसके व्यावहारिक वचनों, उसके व्यावहारिक कथनों को पूरी तरह से समझकर, और जितना अधिक उसका कार्य व्यावहारिक है उतना ही अधिक उसे वास्तव में प्यार करने में सक्षम हो कर, तुम उसके द्वारा प्राप्त किए जाओगे। उन लोगों का समूह जिन्हें परमेश्वर प्राप्त करेगा वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, अर्थात्, जो उसकी व्यावहारिकता को जानते हैं, और उससे भी ज्यादा ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य का पालन करने में सक्षम हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं' से उद्धृत

पिछला: 15.7. ईमानदार व्यक्ति कैसे बनें पर

अगला: 15.9. अपना कर्तव्य सही ढंग से पूरा करने पर

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें

परमेश्वर के सामने तुम सभी लोग पुरस्कार प्राप्त करके और उसकी नज़रों में उसके अनुग्रह की वस्तु बन कर प्रसन्न होते हो। यह हर एक की इच्छा होती...

जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं

परमेश्वर की गवाही देने के लिए और बड़े लाल अजगर को शर्मिन्दा करने के लिए तुम्हारे पास एक सिद्धांत, एक शर्त होनी चाहिए: अपने दिल में तुम्हें...

अध्याय 26

मेरे घर में कौन रहा है? मेरे लिए कौन खड़ा हुआ है? किसने मेरे बदले दुःख उठाया है? किसने मेरे सामने प्रतिज्ञा ली है? किसने वर्तमान तक मेरा...

वचन देह में प्रकट होता है अंत के दिनों के मसीह के कथन (संकलन) अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ जीवन में प्रवेश पर उपदेश और वार्तालाप अंत के दिनों के मसीह के लिए गवाहियाँ परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें