983 हर दिन जो तुम अभी जीते हो, निर्णायक है

1 जो जीवन तुम हर दिन जीते हो वह अब तुम्हारी नियति और तुम्हारी तकदीर के लिए निर्णायक और बहुत ही महत्वपूर्ण है। अतः जो कुछ तुम्हारे पास है और हर मिनट जो गुज़रता जाता है उसमें तुम्हें आनन्दित होना चाहिए। खुद को सबसे बड़ा लाभ देने के लिए तुम्हें अपने समय का हर सम्भव सदुपयोग करना चाहिए, ताकि तुम अपने जीवन को व्यर्थ में न जियो। शायद तुम इसके बारे में भ्रमित हो कि मैं ये वचन क्यों कह रहा हूँ? खुलकर कहूँ, तो मैं तुम में से किसी के भी कार्यों से प्रसन्न नहीं हूँ। क्योंकि तुम्हारे लिए मुझ में जो आशाएँ हैं वे वैसी नहीं हैं जैसे तुम अब हो।

2 इस प्रकार, मैं इसे इस तरह से प्रकट कर सकता हूँ: तुम सभी खतरे के मुहाने पर हो। उद्धार के लिए तुम्हारा पहले का रोना और सत्य का अनुसरण करने और ज्योति की खोज करने के लिए तुम्हारी पूर्व आकांक्षाएँ खत्म होने वाली हैं। अंत में, क्या तुम मुझे इस तरह का प्रतिफल दोगे, यह कुछ ऐसा है जिसकी मैंने कभी अपेक्षा नहीं की थी। मैं प्रमाणित सत्य के विपरीत कुछ भी नहीं कहना चाहता हूँ, क्योंकि तुमने मुझे बहुत निराश किया है। शायद तुम उस मामले को वहाँ तक ऐसे ही नहीं छोड़ना चाहते और वास्तविकता का सामना नहीं करना चाहते। फिर भी मैं गम्भीरतापूर्वक तुमसे यह प्रश्न पूछना चाहता हूँ: इन सभी वर्षों में, तुम्हारा हृदय किन चीज़ों से भरा हुआ था? तुम्हारा हृदय किसके प्रति वफादार है?

3 यह इसलिए है क्योंकि मैं तुम्हें बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ, तुम्हारी बहुत परवाह करता हूँ, और जो कुछ तुम करते हो उस पर बहुत ज़्यादा ध्यान लगाता हूँ; क्योंकि मैं लगातार तुमसे प्रश्न करता हूँ और अकथनीय तकलीफ सहता हूँ। तो भी, मुझे बदले में अनादर और असहनीय परित्याग दिया जाता है। इस प्रकार तुम मेरे प्रति कर्तव्य में ढीले हो; मैं कैसे इसके बारे में कुछ नहीं जानूँगा। यदि तुम विश्वास करते हो कि यह संभव हो सकता है, तो इससे यह सत्य और भी अधिक प्रमाणित होता है कि तुम मेरे साथ कोमलता के साथ बर्ताव नहीं कर रहे हो। और इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम कटु सच्चाइयों से मुँह मोड़ रहे हो। तुम इतने चतुर हो कि तुम नहीं जानते कि तुम क्या कर रहे हो; मुझे लेखा देते समय तुम किस चीज़ का प्रयोग करोगे?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "तुम किस के प्रति वफादार हो?" से रूपांतरित

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