1006 परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण किये जाने की चार शर्तें

1 परमेश्वर के न्याय, उसकी ताड़ना और पूर्ण बनाये जाने की स्थिति को लोगों द्वारा स्वीकार करने की चार मूलभूत शर्तें हैं : एक स्वीकार्य मानक तक अपने कर्तव्य का निर्वाह करना, आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति रखना, मूलतः ईमानदार होना और पश्चाताप करने वाला हृदय होना। जब ये चार शर्तें पूरी हो जाती हैं, तब परमेश्वर लोगों में न्याय और ताड़ना का कार्य शुरू करता है। लोगों में न्याय और ताड़ना का कार्य करने से पहले, परमेश्वर उनका आकलन करेगा—और वह इसका आकलन कैसे करता है? परमेश्वर के पास कई मानक हैं। सबसे पहले वह देखता है कि उसके द्वारा दी गई आज्ञा के प्रति लोगों का रवैया कैसा है, क्या वे वफ़ादारी दिखाने में सक्षम हैं और क्या वे अपना पूरा हृदय और ताकत अर्पित कर सकते हैं। कुल मिलाकर, वह यही देखता है कि क्या तुम एक स्वीकार्य मानक तक अपना कर्तव्य पूरा कर पाने में सक्षम हो। यह पहली शर्त है।

2 दूसरी शर्त, तुम में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति होनी चाहिये। पूर्ण आज्ञाकारिता हासिल करने से पहले, तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति होनी चाहिये। परमेश्वर द्वारा तुम्हें दी गई आज्ञाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में, तुम्हें—तर्क और विवेक के दृष्टिकोण से देखने के अलावा सत्य की खोज करने, परमेश्वर की इच्छा को समझने में भी सक्षम होना चाहिए। तुम चाहे किसी भी तरह के परिवेश में हो, तुम्हारे सामने चाहे जैसी भी स्थितियां आएं, इनकी परवाह किये बिना तुम्हें आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति रखने में सक्षम होना चाहिये। कहने का मतलब यह है कि तुम इसे स्वीकार करते हो कि परमेश्वर के वचन सही हैं, तुम परमेश्वर के वचनों को सत्य मानते हो, तुम परमेश्वर के वचनों को अपने अभ्यास का सिद्धांत मानते हो और यहाँ तक कि अगर तुम्हें सिद्धांत की अधिक समझ नहीं है, तब भी तुम इस तरह इसका पालन कर सकते हो जैसे कि तुम किसी मत से चिपके हुए हो। यह एक तरह की प्रवृत्ति है।

3 जब तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की प्रवृत्ति होती है, तब तुम्हारी बातों, आचरण और व्यवहार में आगे जल्द ही परिवर्तन होंगे। और ये परिवर्तन क्या होंगे? परमेश्वर तुम्हें मूलतः ईमानदार मानेगा। तुम्हारी बातों और आचरण में जान-बूझकर बोले गये झूठ की मात्रा कम होगी; तुम्हारी 80% बातें सही होंगी। कभी-कभी, बुरी आदतों के कारण या जिस परिवेश में तुम रहते हो उसके कारण या कुछ अन्य कारणों से तुम संयोगवश झूठ बोलोगे और तब तुम्हें अंदर से बुरा महसूस होगा, फिर तुम पश्चाताप करोगे और परमेश्वर के समक्ष अपनी गलती स्वीकार करोगे, और जब इस तरह की चीज़ें तुम्हारे साथ दोबारा होंगी, तब वे उतनी बुरी नहीं होंगी, तुम्हारी स्थिति बेहतर से बेहतर होती चली जाएगी और परमेश्वर तुम्हें मूलतः एक ईमानदार इंसान के रूप में देखेगा।

4 परमेश्वर की अपेक्षा है कि लोगों का हृदय पश्चातापी हो। हर अवस्था में—चाहे वह परमेश्वर द्वारा तुम्हें अनुशासित किये जाने या ताड़ना दिये जाने की बात हो, या जब वह तुम्हें याद दिलाता हो और उपदेश देता हो—तुम्हारे और परमेश्वर के बीच कोई विवाद पैदा होने पर, तुम लगातार अपने विचारों और दृष्टिकोणों से चिपके रहते हो, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी ग़लतफहमियों, आरोपों और अवज्ञाकारिता में कोई सुधार नहीं होता है—अगर तुम अपने आपको नहीं बदलते हो, तो परमेश्वर तुम्हें याद रखेगा। अगर तुम अपने विचारों और उद्देश्यों को अलग रखते हुए अपने आपको बदल सको और तुम्हारा ऐसा इरादा हो, तो यह भी समर्पण का एक रवैया है; यह इस तथ्य की स्वीकृति और पुष्टि है कि सृष्टि का प्रभु सत्य, मार्ग और जीवन है। यह तुम्हारे द्वारा सृष्टिकर्ता की पहचान और सार को मान्यता दिए जाने का प्रमाण है। परमेश्वर इसे खास तौर पर महत्वपूर्ण मानता है।

5 जब तुम अपनी खुद की भावनाओं के अनुसार नहीं जीते हो, जब तुम अपने जीवन के सिद्धांतों के अनुसार नहीं जीते हो, बल्कि परमेश्वर द्वारा बोले गये वचनों के अनुरूप जीते हो, परमेश्वर द्वारा तुम्हें दिये गए सिद्धांतों के अनुरूप जीते हो और परमेश्वर द्वारा तुम्हे दिये गए दायित्व के अनुसार चलते हो, अभ्यास के उस मार्ग पर चलते हो जिस पर तुम्हें चलना चाहिये और जिसके बारे में परमेश्वर ने तुम्हें बताया है, तो इस बात की परवाह किये बिना कि परमेश्वर तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करता है, परमेश्वर तुम्हारी बातों पर ध्यान देता है या नहीं , तुम वही करते हो जो तुम्हें करना चाहिये, तब परमेश्वर तुम्हें पहचान लेगा। एक बार जब तुम इन चीज़ों को पूरा कर लोगे—एक बार जब तुम सृष्टिकर्ता की पहचान को समझ जाओगे, अपने खुद के कर्तव्य के प्रति अपने जिम्मेदार रवैये को अपनाओगे, और सत्य के प्रति अपने दृष्टिकोण में तुम अपने आपको पूरी तरह बदल सकने की प्रवृत्ति रखोगे—तब परमेश्वर तुम्हारे अंदर न्याय और ताड़ना का कार्य करेगा; और यहीं से तुम्हारे उद्धार की शुरुआत होगी।

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपनी धारणाओं का समाधान करके ही कोई परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग में प्रवेश कर सकता है (3)' से रूपांतरित

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