VIII. धर्म-संबंधी धारणाओं का खुलासा

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 281

परमेश्वर और मनुष्य को समान नहीं कहा जा सकता। परमेश्वर का सार और कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक अथाह और समझ से परे है। यदि परमेश्वर मनुष्यों के संसार में व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य न करे और अपने वचन न कहे, तो मनुष्य कभी भी परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझ पाएगा। और इसलिए वे लोग भी, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को समर्पित कर दिया है, उसका अनुमोदन प्राप्त करने में सक्षम नहीं होंगे। यदि परमेश्वर कार्य कार्य करने के लिए तैयार न हो, तो मनुष्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न करे, वह सब शून्य होगा, क्योंकि परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से सदैव ऊँचे रहेंगे, और परमेश्वर की बुद्धि मनुष्य की समझ से परे है। और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग परमेश्वर और उसके काम को "पूरी तरह से समझने" का दावा करते करते हैं, वे सब मूर्ख हैं, अभिमानी और अज्ञानी हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं करना चाहिए; बल्कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य को परिभाषित नहीं कर सकता। परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य इतना महत्त्वहीन है, जितनी कि चींटी; तो फिर वह परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? जो लोग गंभीरतापूर्वक यह कहना पसंद करते हैं, "परमेश्वर इस तरह से या उस तरह से कार्य नहीं करता," या "परमेश्वर ऐसा है या वैसा है"—क्या वे अहंकारपूर्वक नहीं बोलते? हम सबको जानना चाहिए कि मनुष्य, जो कि शरीरधारी है, शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है। मनुष्य की प्रकृति ही है परमेश्वर का विरोध करना। मनुष्य परमेश्वर के समान नहीं हो सकता, परमेश्वर के कार्य के लिए परामर्श देने की उम्मीद तो वह बिलकुल भी नहीं कर सकता। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर मनुष्य का मार्गदर्शन कैसे करता है, तो यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। यह उचित है कि इस या उस विचार की डींग हाँकने के बजाय मनुष्य को समर्पण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य धूल मात्र है। चूँकि हमारा इरादा परमेश्वर की खोज करने का है, इसलिए हमें परमेश्वर के विचार के लिए उसके कार्य पर अपनी धारणाएँ नहीं थोपनी चाहिए, और जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव को उसके चरम रूप में नियोजित तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिए। क्या ऐसा करना हमें मसीह-विरोधी नहीं बनाएगा? ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास कैसे कर सकते हैं? चूँकि हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, और चूँकि हम उसे संतुष्ट करना और उसे देखना चाहते हैं, इसलिए हमें सत्य के मार्ग की खोज करनी चाहिए, और परमेश्वर के अनुकूल रहने का मार्ग तलाशना चाहिए। हमें परमेश्वर के कड़े विरोध में खड़े नहीं होना चाहिए। ऐसे कार्यों से क्या भला हो सकता है?

आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है। हो सकता है, तुम इन वचनों को स्वीकार न कर पाओ और वे तुम्हें अजीब लगें, पर मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम अपनी स्वाभाविकता प्रकट मत करो, क्योंकि केवल वे ही सत्य को पा सकते हैं, जो परमेश्वर के समक्ष धार्मिकता के लिए सच्ची भूख-प्यास रखते हैं, और केवल वे ही परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जा सकते हैं और उसका मार्गदर्शन पा सकते हैं, जो वास्तव में धर्मनिष्ठ हैं। परिणाम संयम और शांति के साथ सत्य की खोज करने से मिलते हैं, झगड़े और विवाद से नहीं। जब मैं यह कहता हूँ कि "आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है," तो मैं परमेश्वर के देह में लौटने की बात कर रहा हूँ। शायद ये वचन तुम्हें व्याकुल न करते हों; शायद तुम इनसे घृणा करते हो; या शायद ये तुम्हारे लिए बड़े रुचिकर हों। चाहे जो भी मामला हो, मुझे आशा है कि वे सब, जो परमेश्वर के प्रकट होने के लिए वास्तव में लालायित हैं, इस तथ्य का सामना कर सकते हैं और इसके बारे में झटपट निष्कर्षों पर पहुँचने के बजाय इसकी सावधानीपूर्वक जाँच कर सकते हैं; बुद्धिमान व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 282

परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तुम्हें परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर को उसके आज के वचनों और कार्य के आधार पर जानना चाहिए, बिना किसी भटकाव या भ्रान्ति के, और अन्य सभी चीजों से पहले तुम्हें परमेश्वर के कार्य को जानना चाहिए। यही परमेश्वर को जानने का आधार है। वे सभी विभिन्न भ्रांतियां जिनमें परमेश्वर के वचनों की शुद्ध स्वीकृति नहीं है, वे धार्मिक अवधारणाएं हैं, वे ऐसी स्वीकृति हैं जो पथभ्रष्ट और गलत हैं। धार्मिक अगुवाओं की सबसे बड़ी कुशलता यह है कि वे अतीत में स्वीकृत परमेश्वर के वचनों को लेकर आते हैं और परमेश्वर के आज के वचनों के विरुद्ध उनकी जांच करते हैं। यदि आज के समय में परमेश्वर की सेवा करते समय, तुम पवित्र आत्मा द्वारा अतीत में कही गई प्रबुद्ध बातों को पकड़े रहते हो, तो तुम्हारी सेवा रुकावट उत्पन्न करेगी और तुम्हारे अभ्यास पुराने हो जाएँगे और धार्मिक अनुष्ठान से कुछ अधिक नहीं होंगे। यदि तुम यह विश्‍वास करते हो जो परमेश्‍वर की सेवा करते हैं उन्‍हें बाह्य रूप में विनम्र और धैर्यवान होना चाहिए..., और यदि तुम आज इस प्रकार की जानकारी को अभ्यास में लाते हो तो ऐसा ज्ञान धार्मिक अवधारणा है, और इस प्रकार का अभ्यास एक पाखण्डी कार्य बन गया है। "धार्मिक अवधारणाएं" उन बातों को दर्शाती हैं जो अप्रचलित और पुराने ढंग की हैं (परमेश्वर के द्वारा पहले कहे गए वचनों और पवित्र आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर प्रकट किए गए प्रकाश की स्वीकृति समेत), और यदि वे आज अभ्यास में लाए जाते हैं, तो वे परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य को कोई भी लाभ नहीं देते हैं। यदि मनुष्य अपने भीतर की उन बातों को शुद्ध नहीं कर पाता है जो धार्मिक अवधारणाओं से आती हैं, तो वे बातें मनुष्यों द्वारा परमेश्वर की सेवकाई में बहुत बड़ी बाधा बन जाएँगी। धार्मिक अवधारणाओं वाले लोग पवित्र आत्मा के कार्यों के साथ किसी भी प्रकार से कदम से कदम नहीं मिला सकते हैं, वे एक कदम, फिर दो कदम पीछे हो जाएंगे—क्योंकि ये धार्मिक अवधारणाएं मनुष्य को असाधारण रूप से आत्मतुष्ट और घमण्डी बना देती हैं। परमेश्वर अतीत में कही गई बातों और किए गए कार्यों की कोई ललक महसूस नहीं करता है, यदि कुछ अप्रचलित हो गया है, तो वह उसे समाप्त कर देता है। निश्चय ही तुम अपनी अवधारणाओं को त्यागने में सक्षम हो? यदि तुम परमेश्वर के पूर्व में कहे गए वचनों पर बने रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध होता है कि तुम परमेश्वर के कार्य को जानते हो? यदि तुम पवित्र आत्मा के प्रकाश को आज स्वीकार करने में असमर्थ हो, और उसके बजाय अतीत के प्रकाश से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध हो सकता है कि तुम परमेश्वर के नक्शेकदम पर चलते हो? क्या तुम अभी भी धार्मिक अवधारणाओं को छोड़ पाने में असमर्थ हो? यदि ऐसा है, तो तुम परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाओगे।

यदि मनुष्य धार्मिक अवधारणाओं को छोड़ दे, तो वह आज परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य को मापने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं करेगा, और उसके बजाय सीधे तौर पर उनका पालन करेगा। भले ही परमेश्वर का आज का कार्य साफ़ तौर पर अतीत के कार्य से अलग है, तुम अतीत के विचारों का त्याग कर पाते हो और आज सीधे तौर पर परमेश्वर के वचनों का पालन कर पाते हो। यदि तुम इस प्रकार के ज्ञान के योग्य हो कि तुम आज परमेश्वर के कार्य को सबसे मुख्य स्थान देते हो, भले ही उसने अतीत में किसी भी तरह से कार्य किया हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो अपनी अवधारणों को छोड़ चुका है, जो परमेश्वर का आज्ञापालन करता है, और जो परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन करने में सक्षम है और परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करता है। इस तरह, तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो सचमुच परमेश्वर का आज्ञापालन करता है। तुम परमेश्वर के कार्य का विश्लेषण या अध्ययन नहीं करते हो; यह कुछ ऐसा है कि मानो परमेश्वर अपने अतीत के कार्य को भूल गया है और तुम भी उसे भूल गए हो। वर्तमान ही वर्तमान है, और अतीत, बीता हुआ कल हो गया है, और चूँकि परमेश्वर ने जो कुछ अतीत में किया था, आज उसे अलग कर दिया है, इसलिए तुम्हें भी उसमें टिके नहीं रहना चाहिए। केवल तभी तुम वैसे व्यक्ति बन पाओगे जो परमेश्वर का पूरी तरह से आज्ञापालन करता है और जिसने अपनी धार्मिक अवधारणाओं को पूरी तरह से त्याग दिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 283

क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई-नई प्रगति होती है, इसलिए ऐसा कार्य भी होता है जो नए कार्य के उदय होने पर अप्रचलित और पुराना हो जाता है। यह पुराना और नया कार्य परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक है; प्रत्येक कदम पिछले कदम के बाद आता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें निस्संदेह समाप्त कर देनी चाहिए। उदाहरण के लिए, मनुष्य की लम्बे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभवों और शिक्षाओं के साथ मिलकर, मनुष्य के दिमाग में सभी प्रकार की अवधारणाएं बना दी हैं। फिर भी मनुष्यों के द्वारा इस प्रकार की अवधारणाएं बनाने की और भी अधिक अनुकूल बात यह है कि परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है, और साथ ही प्राचीन समय के पारंपरिक सिद्धांतों का बहुत सालों से विस्तार हुआ है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर में मनुष्यों के विश्वास में, विभिन्न अवधारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण लोगों में परमेश्वर की सभी प्रकार की अवधारणात्मक समझों में निरंतर उत्पत्ति और विकास हुआ है, जिसने कई ऐसे धार्मिक लोगों को उत्पन्न कर दिया है परमेश्वर का शत्रु बन के लिए परमेश्वर की सावा करते हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक अवधारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता है, और वह कभी भी सिद्धांत नहीं बनता, इसके बजाय, निरंतर बदलता रहता है और कमोवेश परिवर्तित होता रहता है। यह कार्य स्वयं परमेश्वर के निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यही परमेश्वर के कार्य का निहित सिद्धांत और अनेक उपायों में से एक है जिससे परमेश्वर अपने प्रबंधन को पूर्ण करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य बदल नहीं पाएगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा, और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परन्तु वास्तव में ये समय-समय पर होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर पर विश्वास करता है, वह बहुत भिन्न है। वह पुराने, परिचित सिद्धांतों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और जितने अधिक वे पुराने होते हैं उतने ही अधिक उसे प्रिय होते हैं। मनुष्य का मूर्ख दिमाग, एक ऐसा दिमाग जो पत्थर के समान दुराग्रही है, परमेश्वर के इतने सारे अथाह नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? मनुष्य हमेशा नए रहने वाले और कभी भी पुराने न होने वाले परमेश्वर से घृणा करता है; वह हमेशा ही केवल ऐसे परमेश्वर को पसंद करता है जिसके लंबे दाँत हैं, सफेद बाल हैं, और जो अपनी जगह पर अटका रहता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी पसंद है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छः हजार सालों से नया कार्य कर रहा है। तब, वे किसी भी इलाज से परे हैं। हो सकता है कि यह मनुष्य की हठ के कारण या किसी मनुष्य के द्वारा परमेश्वर के प्रबंधन के नियमों की अनुल्लंघनीयता के कारण हो—परन्तु वे पादरी और महिलाएँ अभी भी फटी-पुरानी किताबों और दस्तावेजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को ऐसे आगे बढ़ाता जाता है मानो उसके साथ कोई है ही नहीं। हालांकि ये विरोधाभास परमेश्वर और मनुष्यों को शत्रु बनाते हैं, और इनमें कभी मेल भी नहीं हो सकता है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, जैसे कि वे होकर भी नहीं हैं। फिर भी मनुष्य, अभी भी अपनी आस्थाओं और अवधारणाओं से चिपका रहता है, और उन्हें कभी भी छोड़ता नहीं है। फिर भी एक बात बिल्कुल स्पष्ट है: हालांकि मनुष्य अपने रुख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर के कदम हमेशा आगे बढ़ते रहते हैं और वह अपना रुख परिस्थितियों के अनुसार हमेशा बदलता रहता है, और अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने हरा दिए गए दुश्मनों का सबसे बड़ा शत्रु है, और इंसानों में जो हार गए हैं और वे जो अभी भी हारने के लिए बचे हैं, उनके मध्य विजेता भी मौजूद हैं। परमेश्वर के साथ कौन प्रतिस्पर्धा कर सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की अवधारणाएं परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्यों के द्वारा ही उत्पन्न हुई हैं। फिर भी परमेश्वर इस कारण से मनुष्यों को नहीं क्षमा करता है, इसके अलावा, न ही वह परमेश्वर के कार्य के बाहर खेप-दर-खेप "परमेश्वर के लिए" ऐसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा करता है। इसके बजाय, वह मनुष्यों की अवधारणाओं और पुरानी, पवित्र आस्थाओं के कारण बहुत ही ज्यादा चिढ़ा हुआ है और यहां तक कि उसका इरादा उस तिथि को स्वीकार करने का भी नहीं है जिसमें ये धारणाएं सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये अवधारणाएँ उसके कार्य के कारण बनी हैं, क्योंकि मनुष्य की अवधारणाएं मनुष्यों के द्वारा ही फैलाई जाती हैं; उनका स्रोत मनुष्यों की सोच और दिमाग है, परमेश्वर नहीं बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा यही रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिन बातों को वह मनुष्यों को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वह युगों और कालों में विभाजित है, न कि अनन्त और स्थिर है। यह इसलिए क्योंकि वह परमेश्वर है जो मनुष्य को जीवित और नया बनने के योग्य बनाता है, बजाय शैतान के जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम सब अभी भी यह नहीं समझते हो? तुम में परमेश्वर के प्रति अवधारणाएं हैं और तुम उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नहीं हो क्योंकि तुम संकीर्ण दिमाग वाले हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य में बहुत कम बोध है, या इसलिए कि परमेश्वर का कार्य मानवीय इच्छाओं के अनुसार नहीं है—इसके अलावा, न ही ऐसा इसलिए है कि परमेश्वर अपने कर्तव्यों के प्रति हमेशा बेपरवाह रहता है। तुम अपनी अवधारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ सकते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर आज्ञाकारिता की अत्यधिक कमी है और क्योंकि तुममें परमेश्वर की सृष्टि की थोड़ी सी भी समानता नहीं है, इसलिए नहीं कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है; सारे कष्ट और दुर्भाग्य केवल मनुष्य के कारण ही आये हैं। परमेश्वर के इरादे हमेशा नेक होते हैं: वह तुम्हें अवधारणा बनाने का कारण देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी बदल जाओ और नए होते जाओ। फिर भी तुम फ़र्क नहीं कर सकते हो और हमेशा या तो अध्ययन या फिर विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीज़ें मुश्किल बना रहा है, बल्कि तुममें परमेश्वर के लिए आदर नहीं है, और तुम्हारी अवज्ञा भी बहुत ज्यादा है। एक छोटा सा प्राणी जो पहले परमेश्वर के द्वारा दिया गया था, उसका बहुत ही नगण्य भाग लेने का साहस करता है, और जो फिर पलटकर परमेश्वर पर आक्रमण कर है—क्या यह मनुष्यों के द्वारा अवज्ञा नहीं है? यह कहना उचित है कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और वह अपनी व्यर्थ की, लच्छेदार, बदबूदार, सड़ी हुई, अलंकृत भाषा का, जैसा भी वे चाहें, आडंबर करने में तो और भी अयोग्य है—उन घिसी-पिटी अवधारणाओं के बारे में तो कुछ कहना ही नहीं। क्या ये और भी बेकार नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 284

परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है। यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता, लेकिन जिन तरीकों से वह कार्य करता है, वे निरंतर बदलते रहते हैं, जिसका अर्थ यह हुआ कि जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे भी निरंतर बदलते रहते हैं। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, मनुष्य का परमेश्वर का ज्ञान उतना ही अधिक होता है। परमेश्वर के कार्य के कारण मनुष्य के स्वभाव में तदनुरूप बदलाव आता है। लेकिन चूँकि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदलता रहता है, इसलिए पवित्र आत्मा के कार्य को न समझने वाले और सत्य को न जानने वाले बेतुके लोग परमेश्वर का विरोध करने लग जाते हैं। परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता, न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है, बल्कि पहले कभी नहीं किए गए कार्य के साथ आगे बढ़ता जाता है। चूँकि परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर ही उसके आज के कार्य का आकलन करता है, इस कारण परमेश्वर के लिए नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना लगातार अत्यंत कठिन हो गया है। मनुष्य के सामने बहुत अधिक मुश्किलें हैं! मनुष्य की सोच बहुत ही रूढ़िवादी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता, फिर भी हर कोई उसे सीमा में बांध देता है। जब मनुष्य परमेश्वर से दूर जाता है, तो वह जीवन, सत्य और परमेश्वर की आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जाने वाले अधिक बड़े आशीषों को तो बिल्कुल ग्रहण नहीं करता। सभी मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, फिर भी परमेश्वर के कार्य में किसी भी बदलाव को सहन नहीं कर पाते। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उन्हें लगता है परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा ठहरा रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से जो कुछ भी शाश्वत उद्धार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है, वह है व्यवस्था का पालन करना, अगर वे पश्चाताप करेंगे और अपने पापों को स्वीकार करेंगे, तो परमेश्वर की इच्छा हमेशा संतुष्ट रहेगी। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर न तो बाइबल से बढ़कर होना चाहिए और न ही वो हो सकता है। उनके इन्हीं विचारों ने उन्हें पुरानी व्यवस्था से दृढ़ता से बाँध रखा है और मृत नियमों में जकड़ कर रखा है। ऐसे लोग तो और भी हैं जो यह मानते हैं कि परमेश्वर का नया कार्य जो भी हो, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया जाना ही चाहिए और कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी "सच्चे" मन से उसका अनुसरण करते हैं, उन्हें प्रकटन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए; अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। मनुष्य के बेतुके हृदय और उसके आत्म-महत्व एवं दंभी विद्रोही स्वभाव को देखते हुए, परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के कार्य पर ध्यान से विचार करता है और न ही इसे विनम्रता से स्वीकार करता है; बल्कि मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए, तिरस्कार का रवैया अपनाता है। क्या यह ऐसे मनुष्य का व्यवहार नहीं है जो परमेश्वर का विरोधी और उससे विद्रोह करने वाला है? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?

यीशु ने कहा था कि यहोवा का कार्य अनुग्रह के युग में ही समाप्त हो गया, वैसे ही जैसे मैं आज कहता हूँ कि यीशु का कार्य भी पीछे छूट गया है। यदि केवल व्यवस्था का युग होता और अनुग्रह का युग न होता, तो यीशु को सलीब पर नहीं चढ़ाया गया होता और वह पूरी मानवजाति का उद्धार नहीं कर पाता; यदि केवल व्यवस्था का युग होता, तो क्या मानवजाति कभी आज तक पहुँच पाती? इतिहास आगे बढ़ता है, क्या इतिहास परमेश्वर के कार्य की प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है? क्या यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भर में मनुष्य के लिए उसके प्रबंधन का चित्रण नहीं है? इतिहास आगे प्रगति करता है, वैसे ही परमेश्वर का कार्य भी आगे बढ़ता है, और परमेश्वर की इच्छा निरंतर बदलती रहती है। वह कार्य के एक ही चरण में छः हज़ार साल तक नहीं रह सकता था, क्योंकि हर कोई जानता है कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता है, और वह हमेशा सलीब पर चढ़ने जैसा काम नहीं कर सकता, सलीब पर एक बार, दो बार, तीन बार नहीं चढ़ सकता...। ऐसा सोचना हास्यास्पद होगा। परमेश्वर वही कार्य करता नहीं रह सकता; उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और हमेशा नया रहता है, बहुत कुछ वैसा ही जैसे कि मैं प्रतिदिन तुम लोगों से नए वचन कहता और नया कार्य करता हूँ। यही वह कार्य है जो मैं करता हूँ, और मुख्य शब्द हैं "नया" और "अद्भुत"। "परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा" : यह कहावत वास्तव में सही है। परमेश्वर का सार कभी भी नहीं बदलता, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर, और वह कभी शैतान नहीं बन सकता, परन्तु इनसे यह सिद्ध नहीं होता है कि उसका कार्य उसके सार की तरह ही अचर और अचल है। तुम कहते हो कि परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, परन्तु फिर तुम किस प्रकार से यह समझा सकते हो कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी भी पुराना नहीं होता? परमेश्वर का कार्य हमेशा फैलता और निरंतर बदलता रहता है, उसकी इच्छा निरंतर व्यक्त होती रहती है और मनुष्य को ज्ञात करवाई जाती है। जैसे-जैसे मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, मनुष्य का स्वभावबिना रुके बदलता जाता है, और उसका ज्ञान भी बदलता जाता है। तो फिर, यह परिवर्तन कहाँ से उत्पन्न होता है? क्या यह परमेश्वर के चिर-परिवर्तनशील कार्य से नहीं होता? यदि मनुष्य का स्वभाव बदल सकता है, तो मनुष्य मेरे कार्य और मेरे वचनों को निरंतर बदलने क्यों नहीं दे सकता? क्या मेरा मनुष्यों के प्रतिबंधों के अधीन होना आवश्यक है? इसमें, तुम क्या केवल ज़बर्दस्ती की बहस और कुतर्क का इस्तेमाल नहीं ले रहे हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वो मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 285

सभी यहूदी पुराने नियम पढ़ते थे और यशायाह की भविष्यवाणी को जानते थे कि चरणी में एक नर शिशु जन्म लेगा। तो फिर इस भविष्यवाणी को भलीभाँति जानते हुए भी उन्होंने यीशु को क्यों सताया? क्या ऐसा उनकी विद्रोही प्रकृति और पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति अज्ञानता के कारण नहीं हुआ? उस समय, फरीसियों को विश्वास था कि यीशु का कार्य उस भविष्यवाणी से भिन्न था जो वे नर शिशु के बारे में जानते थे; और आज लोग परमेश्वर को इसलिए अस्वीकार करते हैं क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं है। क्या परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोहीपन का सार समान नहीं है? क्या तुम बिना कोई प्रश्न किए, पवित्र आत्मा के समस्त कार्य को स्वीकार कर सकते हो? यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो यह धारा सही है और तुम्हें बिना किसी आशंका के इसे स्वीकार कर लेना चाहिये; और क्या स्वीकार करना है, इसे लेकर तुम्हें कोई आनाकानी नहीं करनी चाहिए। यदि तुम परमेश्वर से और अधिक अंतर्दृष्टि पाते हो फिर भी उसके खिलाफ ज़्यादा चौकस रहने लगते हो, तो क्या यह अनुचित नहीं है? तुम्हें बाइबल में और अधिक प्रमाण की तलाश नहीं करनी चाहिए; अगर यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिये, क्योंकि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें उसकी जाँच-पड़ताल नहीं करनी चाहिए। यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, तुम्हें मुझसे और सबूत नहीं माँगने चाहिए, बल्कि तुम्हें यह विचार करने में सक्षम होना चाहिए कि क्या मैं तुम्हारे लिए लाभदायक हूँ, यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। भले ही तुम्हें बाइबल में बहुत सारे अखंडनीय सबूत प्राप्त हो जाएँ, फिर भी ये तुम्हें पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते। तुम केवल बाइबल के दायरे में ही रहते हो, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को गहरा कर सकती है। यद्यपि बाइबल में भविष्यवाणी की गई थी कि एक नर शिशु जन्म लेगा, मगर कोई इसकी थाह नहीं पा सका कि किस पर यह भविष्यवाणी खरी उतरेगी, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का कार्य नहीं पता था, और यही कारण था कि फरीसी यीशु के विरोध में खड़े हो गए। कुछ लोग जानते हैं कि मेरा कार्य मनुष्य के हित में है, फिर भी वे निरंतर यह विश्वास करते रहते हैं कि यीशु और मैं, दो पूरी तरह से अलग, परस्पर असंगत प्राणी हैं। उस समय, यीशु ने अनुग्रह के युग में अपने अनुयायियों को इन विषयों पर बस उपदेशों की एक श्रृंखला दी, जैसे कि कैसे अभ्यास करें, कैसे एक साथ इकट्ठा हों, प्रार्थना में कैसे याचना करें, दूसरों से कैसा व्यवहार करें इत्यादि। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और उसने केवल यह प्रतिपादित किया कि शिष्य और वे लोग जो उसका अनुसरण करते हैं, कैसे अभ्यास करें। उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने नियम निर्धारित किए, तब उसने अनुग्रह के युग का कार्य क्यों नहीं किया? उसने पहले से ही अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों को इसे स्वीकार करने में मदद नहीं करता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने पहले से ही अनुग्रह के युग का कार्य नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और कभी भी कार्य का आगामी चरण पहले से नहीं करता। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने केवल अंत के दिनों के चिह्नों के बारे में बात की, इस बारे में बात की कि किस प्रकार से धैर्यवान बनें, कैसे बचाए जाएँ, कैसे पश्चाताप करें, कैसे अपने पापों को स्वीकार करें, सलीब को कैसे धारण करें और कैसे पीड़ा सहन करें; उसने कभी इस पर कुछ नहीं कहा कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस प्रकार प्रवेश हासिल करना चाहिए या उसे परमेश्वर की इच्छा को किस प्रकार से संतुष्ट करने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना हास्यास्पद नहीं है? महज़ बाइबल को हाथों में पकड़कर तुम क्या देख सकते हो? चाहे बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से देख सकता था?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वो मनुष्य, जिसने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, किस प्रकार उसके प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 286

फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया, क्या तुम लोग उसका कारण जानना चाहते हो? क्या तुम फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे ज्यादा और क्या, उन्होंने केवल इस बात पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, मगर जीवन के इस सत्य की खोज नहीं की। इसलिए, वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं, क्यों उन्हें जीवन के मार्ग के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है? तुम लोग कैसे कहते हो कि ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर के आशीष प्राप्त करेंगे? वे मसीहा को कैसे देख सकते हैं? वे यीशु का विरोध करते थे क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु के द्धारा कहे गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे, और क्योंकि उन्होंने मसीहा को नहीं समझा था। क्योंकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था, और कभी भी मसीहा के साथ नहीं रहे थे, उन्होंने मसीहा के नाम के साथ व्यर्थ ही चिपके रहने की ग़लती की, जबकि किसी भी संभव ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का पालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत है: इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, तुम मसीह नहीं हो जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता। क्या ये दृष्टिकोण हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? मैं तुम लोगों से पुनः पूछता हूँ: मान लेते हैं कि तुम लोगों में यीशु के बारे में थोड़ी सी भी समझ नहीं है, तो क्या तुम लोगों के लिए उन गलतियों को करना अत्यंत आसान नहीं है जो बिल्कुल आरंभ के फरीसियों ने की थी? क्या तुम सत्य के मार्ग को जानने के योग्य हो? क्या तुम सचमुच में यह विश्वास दिला सकते हो कि तुम मसीह का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य हो? यदि तुम नहीं जानते हो कि क्या तुम ईसा का विरोध करोगे, तो मेरा कहना है कि तुम पहले से ही मौत के कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे, वे सभी यीशु का विरोध करने में, यीशु को अस्वीकार करने में, उन्हें बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते हैं, वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उसे बुरा भला कहने में सक्षम हैं। इसके अलावा, वे यीशु के लौटने को शैतान के द्वारा दिए जाने वाले धोखे के समान देखने में सक्षम हैं और अधिकांश लोग देह में लौटे यीशु की निंदा करेंगे। क्या इन सबसे तुम लोगों को डर नहीं लगता है? जिसका तुम लोग सामना करते हो, वह पवित्र आत्मा के विरोध में तिरस्कार होगा, कलीसियाओं के लिए पवित्र आत्मा के वचनों का विनाश होगा और यीशु के द्वारा व्यक्त किए गए समस्त वचनों को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम लोग हठधर्मिता से अपनी गलतियों को मानने से इनकार करते हो, तो श्वेत बादल पर यीशु के देह में लौटने पर तुम लोग यीशु के कार्य को कैसे समझ सकते हो? यह मैं तुम लोगों को बताता हूँ: जो लोग सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं, मगर अंधों की तरह यीशु के श्वेत बादलों पर आगमन का इंतज़ार करते हैं, निश्चित रूप से पवित्र आत्मा के विरोध में उनका तिरस्कार करेंगे, और ये वे वर्ग हैं जो नष्ट कर दिए जायेंगे। तुम लोग सिर्फ़ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो, और सिर्फ़ स्वर्ग के सुखद राज्य का आनंद लेना चाहता हो, मगर जब यीशु देह में लौटा, तो तुमने यीशु के द्वारा कहे गए वचनों का कभी भी पालन नहीं किया, और यीशु के द्वारा व्यक्त किये गए सत्य को कभी भी ग्रहण नहीं किया। यीशु के एक श्वेत बादल पर वापस आने के तथ्य के बदले में तुम लोग क्या थामे रखना चाहोगे? क्या वही ईमानदारी जिसमें तुम लोग बार-बार पाप करते रहते हो, और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? एक श्वेत बादल पर वापस आने वाले यीशु के लिए तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या कार्य के वे वर्ष, जिनकी तुम लोग स्वयं सराहना करते हो? लौट कर आये यीशु को तुम लोगों पर विश्वास कराने के लिए तुम लोग किस चीज को थाम कर रखोगे? क्या वह तुम्‍हारा अभिमानी स्वभाव है, जो किसी भी सत्य का पालन नहीं करता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 287

तुम लोगों की सत्यनिष्ठा सिर्फ़ वचनों में है, तुम लोगों का ज्ञान सिर्फ़ बौद्धिक और वैचारिक है, तुम लोगों की मेहनत सिर्फ स्वर्ग की आशीषें पाने के लिए है, और इसलिए तुम लोगों का विश्वास अवश्य ही किस प्रकार का हो सकता है? आज भी, तुम लोग सत्य के प्रत्येक वचन को एक बहरे कान से ही सुनते हो। तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि ईसा क्या है, तुम लोग नहीं जानते हो कि यहोवा का आदर कैसे करें, तुम लोग नहीं जानते हो कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश किया जाए, और तुम लोग नहीं जानते हो कि परमेश्वर के स्वयं के कार्य और मनुष्य के धोखे के बीच कैसे भेद करें। तुम परमेश्वर के द्वारा व्यक्त किये गए किसी सत्य के वचन की केवल निंदा करना ही जानते हो, जो तुम्हारे विचार के अनुरूप नहीं होता है। तुम्हारी विनम्रता कहाँ है? तुम्हारी आज्ञाकारिता कहाँ है? तुम्हारी सत्यनिष्ठा कहाँ है? सत्य को खोजने की तुम्हारी इच्छा कहाँ है? परमेश्वर के बारे में तुम्हारा आदर कहाँ है? मैं तुम लोगों बता दूँ, कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं, वे निश्चित रूप से उस श्रेणी के होंगे जो विनाश को झेलेगी। वे जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकार करने में अक्षम हैं, वे निश्चित रूप से नरक के वंशज, महान फ़रिश्ते के वंशज हैं, उस श्रेणी के हैं जो अनंत विनाश के अधीन की जाएगी। कई लोग मैं क्या कहता हूँ इसकी परवाह नहीं करते हैं, किंतु मैं ऐसे हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ जो यीशु का अनुसरण करते हैं, कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते हुए अपनी आँखों से देखो, तो यह धार्मिकता के सूर्य का सार्वजनिक प्रकटन होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा, मगर तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते हुए देखोगे, यही वह समय भी होगा जब तुम दण्ड दिए जाने के लिए नीचे नरक में चले जाओगे। वह परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति का समय होगा, और यह तब होगा जब परमेश्वर सज्जन को पुरस्कार और दुष्ट को दण्ड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय मनुष्य के संकेतों को देखने से पहले ही समाप्त हो चुका होगा, जब वहाँ सिर्फ़ सत्य की अभिव्यक्ति ही होगी। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं तथा संकेतों की खोज नहीं करते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए जाते हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ़ वे ही जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि "ऐसा यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता है एक झूठा मसीह है" अनंत दण्ड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ़ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो संकेतों को प्रदर्शित करता है, परन्तु उस यीशु को स्वीकार नहीं करते हैं जो गंभीर न्याय की घोषणा करता है और जीवन में सच्चे मार्ग को बताता है। इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटें तो वह उसके साथ व्यवहार करें। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अभिमानी हैं। ऐसे अधम लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु का लौटना उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, परन्तु उनके लिए जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं, यह निंदा का एक संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के विरोध में तिरस्कार नहीं करना चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करता हो और सत्य की खोज करने के लिए लालायित हो; सिर्फ़ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। निष्कर्ष पर न पहुँचो; इससे ज्यादा और क्या, परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और विचारहीन न बनो। तुम लोगों को जानना चाहिए कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उन्हें विनम्र और श्रद्धावान होना चाहिए। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक-भौं सिकोड़ते हैं, वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जिन्होंने सत्य को सुन लिया है और फिर भी लापरवाही के साथ निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या उसकी निंदा करते हैं, ऐसे लोग अभिमान से घिरे हुए हैं। जो कोई भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को श्राप देने या दूसरों की निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो तर्कसंगत हो और सत्य को स्वीकार करता हो। शायद, सत्य के मार्ग को सुन कर और जीवन के वचन को पढ़ कर, तुम विश्वास करते हो कि इन 10,000 वचनों में से सिर्फ़ एक ही वचन है जो तुम्हारे दृढ़ विश्वास के अनुसार और बाइबल के समान है, और फिर तुम्हें उसमें इन वचनों में से 10,000वें वचन की खोज करते रहना चाहिए। मैं अब भी तुम्हें सुझाव देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो, और अपने आप को बहुत ऊँचा न उठाओ। परमेश्वर के लिए अपने हृदय में इतना थोड़ा सा आदर रखकर, तुम बड़े प्रकाश को प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्यों को पढ़ कर, कुछ लोग इन वचनों की बिना देखे ही यह कहते हुए निंदा करेंगे, "यह पवित्र आत्मा की थोड़ी प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है," अथवा "यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को धोखा देने के लिए आया है।" जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे अज्ञानता से अंधे हो गए हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः आरंभ से शुरू करने की सलाह देता हूँ! अंत के दिनों में झूठे मसीहों के प्रकट होने की वजह से परमेश्वर द्वारा व्यक्त किये गए वचनों की तुम लोगों को निंदा अवश्य नहीं करनी चाहिए, और क्योंकि तुम लोग धोखे से डरते हो, इसलिए तुम लोगों को ऐसा अवश्य नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के विरोध में तिरस्कार करे। क्या यह एक बड़ी दयनीय स्थिति नहीं होगी? यदि, बहुत जाँच के बाद, अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं, और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दण्डित किए जाओगे, और आशीषों के बिना होगे। यदि तुम ऐसे सत्य को जो साफ़-साफ़ और स्पष्ट रूप से कहा गया है स्वीकार नहीं कर सकते हो, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौटने के लिए पर्याप्त सौभाग्यशाली नहीं है? इस बारे में विचार करो! उतावले और अविवेकी न बनो, और परमेश्वर में विश्वास को एक खेल की तरह न समझो। अपनी मंजिल के लिए, अपनी संभावनाओं के लिए, अपने जीवन के लिए विचार करो और अपने स्वयं के साथ ऊपरी तौर से दिलचस्पी न लो। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, तब तक परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नया बना चुका होगा' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 288

उस समय, यीशु के काम का कुछ हिस्सा पुराने विधान के अनुसार था और साथ ही मूसा की व्यवस्थाओं और व्यवस्था के युग में यहोवा के वचनों के अनुसार भी था। इन सब चीज़ों का यीशु ने अपने काम के एक हिस्से को करने में उपयोग किया। उसने लोगों को उपदेश दिया और उन्हें यहूदियों के मंदिरों में पढ़ाया, और उसने नबियों द्वारा पुराने विधान में की गई भविष्यवाणियों का इस्तेमाल कर उन फरीसियों को फटकार लगाई जो उससे बैर रखते थे, और उनकी अवज्ञा को प्रकट करने के लिए पवित्र शास्त्रों के वचनों का इस्तेमाल किया और इस तरह उनकी निंदा की। क्योंकि वे यीशु ने जो किया उसे तुच्छ मानते थे; विशेष रूप से, यीशु के बहुत से काम पवित्र शास्त्रों के नियमों के अनुसार नहीं किए गए थे, और इसके अलावा, जो उसने सिखाया वह उनके अपने शब्दों से बढ़कर था, और पवित्र शास्त्रों में नबियों की भविष्यवाणी से भी कहीं अधिक बढ़कर था। यीशु का काम केवल मनुष्य के छुटकारे और सूली पर चढ़ाये जाने के लिए था, और इस प्रकार, किसी भी व्यक्ति को जीतने के लिए उसे अधिक वचन कहने की कोई जरूरत नहीं थी। उसने मनुष्य को जो कुछ भी सिखाया उसमें से काफी कुछ पवित्र शास्त्रों के वचनों से लिया गया था, और भले ही उसका काम पवित्र शास्त्रों से आगे नहीं बढ़ा, फिर भी वह सूली पर चढ़ाये जाने के काम को पूरा कर पाया। उसका काम सिर्फ वचन का कार्य नहीं था, न ही मानव-जाति पर विजय पाने की खातिर किया गया काम था, बल्कि मानव जाति के छुटकारे के लिए किया गया काम था। उसने मानव-जाति के लिए बस पापबलि का काम किया, और मानव-जाति के लिए वचन के स्रोत का काम नहीं किया। उसने अन्यजातियों का काम नहीं किया, जो कि मनुष्य को जीतने का काम था, बल्कि सूली पर चढ़ने का काम था, वह काम जो उन लोगों के बीच किया गया था जो एक परमेश्वर के होने में विश्वास करते थे। यद्यपि उसका काम पवित्र शास्त्रों की बुनियाद पर किया गया था, और उसने पुराने नबियों की भविष्यवाणी का इस्तेमाल फरीसियों की निंदा करने के लिए किया, फिर भी यह सूली पर चढ़ाये जाने के काम को पूरा करने के लिए पर्याप्त था। यदि आज का काम भी, पवित्र शास्त्रों में पुराने नबियों की भविष्यवाणियों की बुनियाद पर किया जाता, तो तुम लोगों को जीतना नामुमकिन होता, क्योंकि पुराने विधान में तुम चीनियों की कोई अवज्ञा और पाप दर्ज नहीं है, और वहां तुम लोगों के पापों का कोई इतिहास नहीं है। इसलिए, अगर यह काम बाइबल में अब भी होता, तो तुम कभी राजी नहीं होते। बाइबल में इस्राएलियों का एक सीमित इतिहास दर्ज है, जो कि यह स्थापित करने में असमर्थ है कि तुम लोग बुरे हो या अच्छे, या यह तुम लोगों का न्याय करने में असमर्थ है। कल्पना करो कि मुझे तुम लोगों का न्याय इस्राएलियों के इतिहास के अनुसार करना होता—तो क्या तुम लोग मेरा वैसे ही अनुसरण करते जैसा कि आज करते हो? क्या तुम लोग जानते हो कि तुम लोग कितने जिद्दी हो? अगर इस चरण के दौरान कोई वचन न बोले जाते, तो विजय का काम पूरा करना असंभव होता। क्योंकि मैं क्रूस पर चढ़ाये जाने के लिए नहीं आया हूँ, मुझे उन वचनों को बोलना ही होगा जो बाइबल से अलग हैं, ताकि तुम लोगों पर विजय प्राप्त हो सके। यीशु द्वारा किया गया कार्य पुराने विधान से महज एक चरण आगे था; यह एक युग शुरू करने के लिए और उस युग की अगुआई करने के लिए इस्तेमाल किया गया था। उसने क्यों कहा था, "यह न समझो कि मैं व्यवस्था को नष्ट करने के लिए आया हूँ, मैं उनका उन्मूलन करने नहीं बल्कि मैं व्यवस्था पूरी करने आया हूँ"? फिर भी उसके काम में बहुत कुछ ऐसा था जो पुराने विधान के इस्राएलियों द्वारा पालन किये जाने वाली व्यवस्थाओं और आज्ञाओं से अलग था, क्योंकि वह व्यवस्था का पालन करने नहीं आया था, बल्कि इसे पूरा करने के लिए आया था। इसे पूरा करने की प्रक्रिया में कई व्यावहारिक चीजें शामिल थीं: उसका कार्य अधिक व्यावहारिक और वास्तविक था, और इसके अलावा, वह अधिक जीवंत था, और नियमों का अंधा पालन नहीं था। क्या इस्राएली सब्त का पालन नहीं करते थे? जब यीशु आया, तो क्या उसने सब्त का पालन नहीं किया, क्योंकि उसने कहा था कि मनुष्य का पुत्र सब्त का प्रभु है, और जब सब्त का प्रभु आ पहुंचेगा, तो वह जैसा चाहेगा वैसा करेगा। वह पुराने विधान की व्यवस्थाओं को पूरा करने और उन्हें बदलने के लिए आया था। आज जो कुछ किया जाता है वह वर्तमान पर आधारित है, फिर भी यह अब भी व्यवस्था के युग में किये गए यहोवा के कार्य की नींव पर टिका है, और इस दायरे का उल्लंघन नहीं करता। उदाहरण के लिए, अपनी ज़बान सम्भालना, व्यभिचार न करना, क्या ये पुराने विधान की व्यवस्थाएं नहीं हैं? आज, तुम लोगों से जो अपेक्षित है वह केवल दस आज्ञाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ऐसी आज्ञायें और व्यवस्थाएं शामिल हैं जो पहले आई आज्ञाओं और व्यवस्थाओं के मुकाबले अधिक उच्च क्रम की हैं। फिर भी, इसका यह मतलब नहीं है कि जो कुछ पहले आया उसे खत्म कर दिया गया है, क्योंकि परमेश्वर के काम का प्रत्येक चरण, पिछले चरण की नींव पर किया जाता है। जहाँ तक उन चीज़ों का सम्बन्ध है, जिनसे यहोवा ने इस्राएल को परिचित कराया, जैसे कि लोगों से अपेक्षा करना कि वे बलिदान दें, माँ-बाप का आदर करें, मूर्तियों की पूजा न करें, दूसरों पर वार न करें या अपशब्द न बोलें, व्यभिचार न करें, धूम्रपान या मदिरापान ना करें, मरी हुई चीज़ों को न खाएं, और रक्तपान न करें—क्या यह सब आज भी तुम लोगों के अभ्यास की नींव नहीं है? अतीत की नींव पर ही आज तक काम पूरा होता आया है। हालांकि, अतीत की व्यवस्थाओं का अब और उल्लेख नहीं किया जाता और तुमसे कई नई मांगें अपेक्षित हैं, फिर भी इन व्यवस्थाओं के समाप्त होने की बात तो दूर है, इसके बजाय, वे और ऊँचे स्थान पर उठा दी गई हैं। यह कहना कि उन्हें समाप्त कर दिया गया है, मतलब है कि पिछला युग पुराना हो गया है, जबकि कुछ ऐसी आज्ञाएं हैं जिनका तुम्हें अनंतकाल तक सम्मान करना चाहिए। अतीत की आज्ञाएं पहले से ही अभ्यास में लाई जा चुकी हैं, वे पहले से ही मनुष्य का अस्तित्व बन चुकी हैं, और धूम्रपान न करना, मदिरापान न करना, आदि पर विशेष जोर देने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी नींव पर, आज तुम लोगों की जरूरत के अनुसार, आध्यात्मिक-कद के अनुसार और आज के काम के अनुसार, नई आज्ञाएं निर्धारित की गई हैं। नए युग के लिए आज्ञाओं का निर्धारण करने का मतलब अतीत की आज्ञाओं को खत्म करना नहीं, बल्कि उन्हें इसी आधार पर और ऊँचा उठाकर, मनुष्य के क्रियाकलापों को और अधिक पूर्ण और वास्तविकता के अनुरूप बनाना है। यदि आज, तुम लोगों को सिर्फ आज्ञाओं का पालन करना होता और इस्राएलियों की तरह, पुराने विधान की व्यवस्थाओं का पालन करना होता, और यदि, तुम लोगों को यहोवा द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं को याद रखना होता, तो भी तुम लोगों के बदल सकने की कोई संभावना नहीं होती। यदि तुम लोगों को केवल उन कुछ सीमित आज्ञाओं का पालन करना होता या असंख्य व्यवस्थाओं को याद करना होता, तो तुम्हारी पुरानी प्रकृति गहराई में गड़ी रहती और इसे उखाड़ फेंकने का कोई रास्ता नहीं होता। इस प्रकार तुम लोग और अधिक भ्रष्ट हो जाते, और तुम लोगों में से कोई एक भी आज्ञाकारी नहीं बनता। कहने का अर्थ यह है कि कुछ सरल आज्ञाएं या अनगिनत व्यवस्थाएं तुम्हें यहोवा के कामों को जानने में मदद करने में असमर्थ हैं। तुम लोग इस्राएलियों के समान नहीं हो: व्यवस्थाओं का पालन और आज्ञाओं को याद करने से वे यहोवा के कार्यों को देख पाए, और सिर्फ उसकी ही भक्ति कर सके। लेकिन तुम लोग इसे प्राप्त करने में असमर्थ हो, और पुराने विधान के युग की कुछ आज्ञाएं न केवल तुम्हें अपना हृदय देने में मदद करने में, या तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ हैं, बल्कि ये तुम लोगों को शिथिल बना देंगी, और तुम्हें अधोलोक में पहुंचा देंगी। क्योंकि मेरा काम विजय का काम है, और तुम लोगों की अवज्ञा और पुरानी प्रकृति की ओर केंद्रित है, आज, यहोवा और यीशु के दया भरे वचन, न्याय के गंभीर वचनों के सामने काफी नहीं पड़ते हैं। ऐसे कड़े शब्दों के बिना, तुम "विशेषज्ञों" पर विजय प्राप्त करना असंभव हो जायेगा, जो हजारों सालों से अवज्ञाकारी रहे हैं। पुराने विधान की व्यवस्थाओं ने बहुत पहले तुम लोगों पर से अपनी शक्ति खो दी थी, और आज का न्याय पुरानी व्यवस्थाओं की तुलना में कहीं ज्यादा दुर्जेय है। तुम लोगों के लिए न्याय सबसे उपयुक्त है, व्यवस्थाओं के तुच्छ प्रतिबंध नहीं, क्योंकि तुम लोग बिल्कुल प्रारम्भ वाली मानव-जाति नहीं हो, बल्कि वह मानव-जाति हो जिसे हजारों वर्षों से भ्रष्ट किया गया है। आज मनुष्य को जो हासिल करना है, वह मनुष्य की आज की वास्तविक दशा के अनुसार है, वर्तमान-दिन के मनुष्य की क्षमता और वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार है, और इसके लिए जरूरी नहीं है कि तुम नियमों का पालन करो। ऐसा इसलिए है कि तुम्हारी पुरानी प्रकृति में परिवर्तन हासिल किया जा सके, और ताकि तुम अपनी धारणाओं को त्याग सको।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 289

इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना को अंत तक पहुँचने के लिए उसे आगे की दिशा में प्रगति करते रहना चाहिए। हर दिन उसे नया कार्य करना चाहिए, हर वर्ष उसे नया कार्य करना चाहिए; उसे नए मार्गों का सूत्रपात करना चाहिए, नए युगों का सूत्रपात करना चाहिए, नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए, और इनके साथ, नए नाम और नया कार्य लाना चाहिए। क्षण-प्रतिक्षण परमेश्वर का आत्मा नया कार्य कर रहा है, कभी भी पुराने तरीकों या नियमों से चिपका नहीं रहता। न ही उसका कार्य कभी रुका है, बल्कि हर गुज़रते पल के साथ घटित होता रहता है। यदि तुम कहते हो कि पवित्र आत्मा का कार्य अपरिवर्तनशील है, तो फिर क्यों यहोवा ने तो याजकों को मंदिर में अपनी सेवा करने के लिए कहा, जबकि यीशु ने मंदिर में प्रवेश नहीं किया—बावजूद इस तथ्य के, कि जब वह आया, तो लोगों ने यह भी कहा कि वह महायाजक है, और कि वह दाऊद के घर का है और महायाजक और महान राजा भी है? और उसने बलियाँ क्यों नहीं चढ़ाईं? मंदिर में प्रवेश करना या नहीं करना—क्या यह सब स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं है? यदि, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, यीशु पुनः आएगा और अंत के दिनों में तब भी यीशु कहलाएगा, और तब भी एक सफेद बादल पर यीशु की छवि में मनुष्यों के बीच अवरोहण करेगा : तो क्या यह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या पवित्र आत्मा पुराने से चिपके रहने में ही सक्षम है? मनुष्य जो कुछ भी मानता है, वे धारणाएँ हैं, और जो कुछ भी मनुष्य समझता है, वह शाब्दिक अर्थ के अनुसार है, और साथ ही उसकी कल्पना के अनुसार है; वे पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं, और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं हैं। परमेश्वर उस तरह से कार्य नहीं करेगा; परमेश्वर इतना नासमझ और मूर्ख नहीं है, और उसका कार्य इतना सरल नहीं है जितना कि तुम कल्पना करते हो। मनुष्य जो भी कल्पना करता है, उसके आधार पर, यीशु एक बादल पर सवार होकर आएगा और तुम लोगों के बीच उतरेगा। तुम लोग उसे देखोगे, जो एक बादल पर सवारी करते हुए तुम लोगों को बताएगा कि वह यीशु है। तुम लोग उसके हाथों में कीलों के निशान भी देखोगे, और उसे यीशु के रूप में जानोगे। और वह तुम लोगों को फिर से बचाएगा, और तुम लोगों का शक्तिशाली परमेश्वर होगा। वह तुम लोगों को बचाएगा, तुम लोगों को एक नया नाम प्रदान करेगा, और तुम लोगों में से प्रत्येक को एक सफ़ेद पत्थर देगा, जिसके बाद तुम लोगों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने दिया जाएगा और स्वर्ग में तुम्हारा स्वागत किया जाएगा। क्या इस तरह के विश्वास मनुष्य की धारणाएँ नहीं हैं? क्या परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता है, या क्या वह मनुष्य की धारणाओं के विपरीत कार्य करता है? क्या मनुष्य की सभी धारणाएँ शैतान से नहीं आतीं? क्या मनुष्य का सब-कुछ शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किया गया है? यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार अपना कार्य करता, तो क्या वह शैतान नहीं बन गया होता? क्या वह उसी प्रकार का नहीं होता, जैसे उसके सृजन हैं? चूँकि उसके सृजन अब शैतान द्वारा इतने भ्रष्ट कर दिए गए हैं कि मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, इसलिए यदि परमेश्वर शैतान की चीज़ों के अनुसार कार्य करता, तो क्या वह शैतान के साथ मिला हुआ नहीं होता? मनुष्य परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? इसलिए, परमेश्वर कभी मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करेगा, और कभी उस तरह से कार्य नहीं करेगा, जैसी तुम कल्पना करते हो। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि स्वयं परमेश्वर ने कहा था कि वह एक बादल पर आएगा। यह सच है कि परमेश्वर ने स्वयं ऐसा कहा था, पर क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के रहस्यों की थाह नहीं पा सकता? क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के वचनों की व्याख्या नहीं कर सकता? क्या तुम, बिना लेशमात्र संदेह के, निश्चित हो कि तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन कर दिया गया था? निश्चित रूप से ऐसा नहीं था कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें इतने प्रत्यक्ष तरीके से दिखाया था। क्या वह पवित्र आत्मा था, जिसने तुम्हें निर्देश दिए थे, या तुम्हारी स्वयं की धारणाओं ने तुम्हें ऐसा सोचने के लिए प्रेरित किया? तुमने कहा, "यह स्वयं परमेश्वर द्वारा कहा गया था।" किंतु हम परमेश्वर के वचनों को मापने के लिए अपनी धारणाओं और मन का उपयोग नहीं कर सकते। जहाँ तक यशायाह के वचनों की बात है, क्या तुम पूरी निश्चितता के साथ उसके वचनों की व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम उसके वचनों की व्याख्या करने का साहस करते हो? चूँकि तुम यशायाह के वचनों की व्याख्या करने का साहस नहीं करते, तो तुम यीशु के वचनों की व्याख्या करने का साहस क्यों करते हो? कौन अधिक उत्कृष्ट है, यीशु अथवा यशायाह? चूँकि उत्तर यीशु है, तो तुम यीशु द्वारा बोले गए वचनों की व्याख्या क्यों करते हो? क्या परमेश्वर अपने कार्य के बारे में तुम्हें अग्रिम रूप से बताएगा? कोई एक प्राणी भी नहीं जान सकता, यहाँ तक कि स्वर्ग के दूत भी नहीं, और न ही मनुष्य का पुत्र जान सकता है, तो तुम कैसे जान सकते हो? मनुष्य में बहुत कमी है। अभी तुम लोगों के लिए जो महत्वपूर्ण है, वह है कार्य के तीन चरणों को जानना। यहोवा के कार्य से लेकर यीशु के कार्य तक, और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन के पूर्ण विस्तार को एक सतत सूत्र में पिरोते हैं, और वे सब एक ही पवित्रात्मा का कार्य हैं। दुनिया के सृजन से परमेश्वर हमेशा मानवजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में कार्य के तीन चरण अचूक रूप में एक ही पवित्रात्मा का कार्य हैं। इन तीन चरणों को पृथक करने वाले सभी लोग परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं। अब तुम्हारे लिए यह समझना उचित है कि प्रथम चरण से लेकर आज तक का समस्त कार्य एक ही परमेश्वर का कार्य है, एक ही पवित्रात्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 290

चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसे परमेश्वर के पदचिह्नों का, कदम दर कदम, करीब से अवश्य अनुसरण करना चाहिए; और उसे "जहाँ कहीं मेम्ना जाता है उसका अनुसरण करना" चाहिए। केवल ये ही ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को खोजते हैं, केवल ये ही ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग पत्रों और सिद्धान्तों का ज्यों का त्यों अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा निष्कासित कर दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल सच्चाईयों का ही पालन करता है कि "यहोवा ही परमेश्वर है" और "यीशु ही मसीह है," जो ऐसी सच्चाईयाँ हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में अक्षम रहेगा। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा से भी सन्देह के बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस तरह, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्कासित किया जा सकता है? इस बात पर ध्यान दिए बिना कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रूका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और उसके प्रबंधन के कार्य की पूर्णता से पहले, वह सदैव व्यस्त रहा है, और कभी नहीं रुकता है। किन्तु मनुष्य अलग हैः पवित्र आत्मा के कार्य के एक अंश को प्राप्त करने के बाद, वह इसके साथ ऐसा व्यवहार करता है मानो कि यह कभी नहीं बदलेगा; थोड़ा का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता है; परमेश्वर के कार्य के सिर्फ छोटे से भाग को देखने के बाद, वह तुरन्त ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के रूप में निर्धारित करता है, और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव उसी स्वरूप में बना रहेगा जिसे वह अपने सामने देखता है, कि यह अतीत में ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही बना रहेगा; सिर्फ एक सतही ज्ञान प्राप्त करने के बाद, मनुष्य इतना घमण्डी हो जाता है कि वह स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है जिसका बस कोई अस्तित्व नहीं होता है; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद, परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला यह व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य इसे स्वीकार नहीं करता है। ये ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं; वे अति रूढ़िवादी हैं, और वे नई चीज़ों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य विश्वास करता है कि इस्राएली "केवल यहोवा में विश्वास करने और यीशु में विश्वास नहीं करने" में ग़लत थे, मगर अधिकांश लोग एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जिसमें वे "केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं" और "मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किन्तु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।" तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान के अधिकार क्षेत्र के अधीन जीवन बिताते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त नहीं करते हैं। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है? दुनिया भर के ईसाई जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है वे सभी उस विश्वास को थामे रहते हैं कि वे भाग्यशाली लोग हैं, कि परमेश्वर उनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा करेगा। फिर भी वे निश्चयपूर्वक यह नहीं कह सकते हैं कि क्यों परमेश्वर उन्हें तीसरे स्वर्ग तक ले जाएगा, न ही वे इस बारे निश्चित हैं कि किस प्रकार यीशु उन्हें इकट्ठा करने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर आएगा, और वे पूर्ण निश्चयपूर्वक यह तो बिलकुल नहीं कह सकते हैं कि यीशु सचमुच में उस दिन सफेद बदल पर सवार होकर आएगा या नहीं जिस दिन की वे कल्पना करते हैं। वे सभी चिन्तित हैं, और उनकी समझ में नहीं आता है; वे स्वयं भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े से मुट्ठी भर लोग हैं, जो हरपंथ से आते हैं। जिस कार्य को परमेश्वर अब करता है, वर्तमान युग, परमेश्वर की इच्छा—उन्हें इनमें से किसी भी चीज़ की कोई समझ नहीं है, और वे अपनी अँगुलियों में दिनों को गिनने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक मेम्ने के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं केवल वे ही अन्तिम आशीष को प्राप्त कर सकते हैं, जबकि जो "चतुर लोग", बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं मगर विश्वास करते हैं कि उन्होंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, वे परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ हैं। वे सभी विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे बिल्कुल अकारण ही परमेश्वर के कार्य के लगातार विकास को छोटा करते हैं, और पूर्ण निश्चय के साथ विश्वास करते हुए प्रतीत होते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग तक ले जाएगा, उन्हें जिनकी "परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादारी है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं।" यद्यपि उनकी परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के प्रति "अत्यधिक वफादारी" है, फिर भी उनके वचन और करतूतें अत्यंत घिनौने महसूस होते हैं क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं, और छल और दुष्टता करते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं करते हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिलाते हैं, और जो केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, ऐसे लोग बन गए हैं जिन्हें नए युग के द्वारा ठुकरा दिया गया है, और जिन्हें दण्ड दिया जाएगा। क्या उनसे भी अधिक बेचारा और कोई है? अनेक लोग तो यह भी विश्वास करते हैं कि जो प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे सभी विवेकहीन हैं। ये लोग, जो केवल "विवेक" की ही बात करते हैं, और पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं, अन्ततः अपने स्वयं के विवेक द्वारा अपने भविष्य की संभावनाओं को छोटा करवा देंगे। परमेश्वर का कार्य सिद्धान्त का पालन नहीं करता है, और यद्यपि यह उसका स्वयं का कार्य है, फिर भी परमेश्वर इससे चिपका नहीं रहता है। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा जाता है, जिसे हटाया जाना चाहिए उसे हटाया जाता है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के सिर्फ एक छोटे से भाग को ही पकड़े रहने के द्वारा स्वयं को परमेश्वर से शत्रुता की स्थिति में रख देता है। क्या यह मनुष्य की बेहूदगी नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? लोग जितना अधिक भयभीत और अति सतर्क होते हैं क्योंकि वे परमेश्वर के आशीषों को प्राप्त नहीं करने की वजह से डरते हैं, उतना ही अधिक वे और बड़े आशीषों को प्राप्त करने, और अंतिम आशीष को पाने में अक्षम होते हैं। जो लोग दासों की तरह व्यवस्था का पालन करते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अत्यंत वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, और वे जितना अधिक व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। क्योंकि अब राज्य का युग है और व्यवस्था का युग नहीं है, और आज के कार्य को अतीत के कार्य से एक ही साँस में नहीं कहा जा सकता है, न ही अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से नहीं की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, और मनुष्य का अभ्यास भी बदल चुका है, यह व्यवस्था को पकड़े रहना या सलीब को सहना नहीं है। इसलिए, व्यवस्था और क्रूस के प्रति लोगों की वफादारी को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 291

आज तुम पर विजय प्राप्त करने का उद्देश्य यही है कि तुम स्वीकार करो कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है, और दूसरों का भी परमेश्वर है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह उन सभी का परमेश्वर है जो उससे प्यार करते हैं, और सारी सृष्टि का परमेश्वर है। वह इस्राएलियों का परमेश्वर है और मिस्र के लोगों का परमेश्वर है। वह ब्रिटिश का परमेश्वर है और अमरिकियों का परमेश्वर है। वह केवल आदम और हव्वा का परमेश्वर नहीं है, बल्कि उनके सभी वंशजों का भी परमेश्वर है। वह स्वर्ग और पृथ्वी की हर चीज़ का परमेश्वर है। इस्राएली परिवार और सभी गैर-यहूदी परिवार सभी एक ही परमेश्वर के हाथ में हैं। उसने न केवल कई हज़ार सालों तक इस्राएल में कार्य किया था और कभी यहूदिया में पैदा हुआ था, बल्कि आज वह चीन में उतर रहा है, वह जगह जहां बड़ा लाल अजगर कुंडली बनाकर बैठा हुआ है। यदि यहूदिया में पैदा होना उसे यहूदियों का राजा बना देता है, तो क्या तुम सभी के बीच में आज उतरना उसे तुम लोगों का परमेश्वर नहीं बनाता है? उसने इस्राएलियों की अगुवाई की और यहूदिया में पैदा हुआ, और वह एक गैर यहूदी भूमि में भी पैदा हुआ है। क्या उसका सभी कार्य उस मानव जाति के लिए नहीं किया जाता जिसका उसने निर्माण किया? क्या वह इस्राएलियों को सौ गुना पसंद करता है और गैर-यहूदियों से एक हज़ार गुना घृणा करता है? क्या यह तुम्हारी धारणा नहीं है? वह तुम लोग हो जो परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते हो; ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कभी तुम लोगों का परमेश्वर नहीं था। वह तुम लोग हो जो परमेश्वर को ठुकराते हो; ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम लोगों का परमेश्वर बनने के लिए तैयार नहीं है। ऐसी कौन-सी निर्मित चीज़ है जो सर्वशक्तिमान के हाथों में नहीं है? आज, तुम लोगों पर विजय पाने के लिए, क्या यही लक्ष्य नहीं है कि तुम लोग मानो कि परमेश्वर तुम लोगों के परमेश्वर के अलावा कोई और नहीं है? यदि तुम अभी भी मानते हो कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, और अभी भी यह मानते हो कि इस्राएल में दाऊद का घर परमेश्वर के जन्म का स्थान है और इस्राएल के अलावा कोई भी राष्ट्र परमेश्वर को "उत्पन्न" करने के योग्य नहीं है, और तो और कोई गैर-यहूदी परिवार यहोवा के कार्यों को निजी तौर पर प्राप्त करने के लिए सक्षम नहीं है—अगर तुम अभी भी इस तरह सोचते हो, तो क्या यह तुम्हें एक ज़िद्दी विरोधी नहीं बनाता? हमेशा इस्राएल पर मत अटके रहो। परमेश्वर तुम लोगों के बीच अभी उपस्थित है। स्वर्ग की ओर भी देखते मत रहो। स्वर्ग में अपने परमेश्वर के लिए तड़पना बंद करो! परमेश्वर तुम लोगों के बीच में आया है, तो वह स्वर्ग में कैसे हो सकता है? तुम लोगों ने परमेश्वर पर बहुत लंबे समय तक विश्वास नहीं किया है, फिर भी तुम लोगों की उसके बारे में बहुत सारी धारणाएं हैं, इस हद तक कि तुम लोग इस बारे में एक क्षण के लिए भी यह सोचने की हिम्मत नहीं कर सकते कि इस्राएलियों का परमेश्वर अपनी उपस्थिति से तुम लोगों पर अनुग्रह करेगा। तुम लोग इस बारे में सोचने की इससे भी कम हिम्मत करते हो कि तुम कैसे परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप में प्रकट होते हुए देख सकते हो, यह जानते हुए कि तुम कितने असहनीय ढंग से अपवित्र हो। तुम लोगों ने यह भी कभी नहीं सोचा कि कैसे एक गैर-यहूदी भूमि में परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से उतर सकता है। उसे तो सिनाई पर्वत पर या जैतून पर्वत पर उतरना चाहिए और इस्राएलियों के समक्ष प्रकट होना चाहिए। क्या गैर-यहूदी (जो इस्राएल के बाहर के लोग है) सभी उसकी घृणा के पात्र नहीं हैं? वह व्यक्तिगत रूप से उनके बीच कैसे काम कर सकता है? ये सभी आरोपिक धारणाएं हैं जिन्हें तुम लोगों ने कई वर्षों से विकसित किया है। आज तुम लोगों पर विजय प्राप्त करने का उद्देश्य है तुम लोगों की इन धारणों को ध्वस्त कर देना। इस तरह तुम लोग परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से अपने बीच में प्रकट होते हुए देख पाओगे—सिनाई पर्वत पर या जैतून पर्वत पर नहीं, बल्कि उन लोगों के बीच जिनकी उसने अतीत में कभी अगुवाई नहीं की है। जब परमेश्वर ने अपने दो चरणों का कार्य इस्राएल में किया, तो इस्राएलियों और गैर-यहूदी जातियों ने समान रूप से यह धारणा अपना ली: यद्यपि यह सत्य है कि परमेश्वर ने सभी चीज़ें बनाई हैं, वह केवल इस्राएलियों का परमेश्वर बनने को तैयार है, गैर-यहूदियों का परमेश्वर नहीं। इस्राएली मानते हैं कि परमेश्वर केवल हमारा परमेश्वर हो सकता है, तुम सभी गैर-यहूदियों का परमेश्वर नहीं, और क्योंकि तुम लोग यहोवा का सम्मान नहीं करते हो, यहोवा—हमारा परमेश्वर—तुम लोगों से घृणा करता है। इसके अतिरिक्त, उन यहूदियों का यह भी मानना है: प्रभु यीशु ने हम यहूदियों की छवि ग्रहण की थी और यह एक ऐसा परमेश्वर है जिस पर यहूदियों का चिन्ह उपस्थित है। हमारे बीच ही परमेश्वर कार्य करता है। परमेश्वर की छवि और हमारी छवि समान हैं; हमारी छवि परमेश्वर के करीब है। प्रभु यीशु हम यहूदियों का राजा है; अन्य जातियाँ ऐसा महान उद्धार प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। प्रभु यीशु हम यहूदियों के लिए पापबलि है। कार्य के केवल इन दो चरणों के आधार पर ही इस्राएलियों और यहूदियों ने कई धारणाएं बना ली थीं। वे रोब से स्वयं के लिए परमेश्वर पर दावा करते हैं, और मानते नहीं हैं कि परमेश्वर गैर-यहूदी जातियों का भी परमेश्वर है। इस प्रकार, परमेश्वर गैर-यहूदी जातियों के दिल में एक रिक्त स्थान बन गया। यह इसलिए कि हर कोई यह मानने लगा था कि परमेश्वर गैर-यहूदी जातियों का परमेश्वर नहीं बनना चाहता है और वह केवल इस्राएलियों को ही पसंद करता है—जो उसके चुने हुए लोग हैं—और वह यहूदियों को पसंद करता है, विशेषकर उन अनुयायियों को जो उसका अनुसरण करते थे। क्या तुम नहीं जानते कि यहोवा और यीशु ने जो कार्य किया, वह सभी मानव जाति के अस्तित्व के लिए किया था? क्या तुम लोग अब स्वीकारते हो कि परमेश्वर उन सभी लोगों का परमेश्वर है जो इस्राएल से बाहर पैदा हुए? क्या आज परमेश्वर तुम्हारे बीच नहीं है? यह एक सपना नहीं हो सकता है, है न? क्या तुम लोग इस वास्तविकता को स्वीकारते नहीं हो? तुम लोग इस पर विश्वास करने की या इसके बारे में सोचने की हिम्मत नहीं करते। चाहे तुम लोग जैसे भी इसे देखो, क्या परमेश्वर तुम लोगों के बीच ठीक यहाँ नहीं है? क्या तुम लोग अभी भी इन शब्दों पर विश्वास करने से डरते हो? इस दिन से, क्या वे सभी जिन पर विजय प्राप्त की गई है और सभी जो परमेश्वर के अनुयायी बनना चाहते हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं? क्या तुम सभी, जो आज अनुयायी हो, इस्राएल के बाहर चुने हुए लोग नहीं हो? क्या तुम लोगों का पद इस्राएलियों के बराबर नहीं है? क्या यह सब वह नहीं है जिसे तुम लोगों को पहचानना चाहिए? क्या तुम पर विजय पाने के कार्य का यही उद्देश्य नहीं है? क्योंकि तुम लोग परमेश्वर को देख सकते हो, तो वह तुम लोगों का परमेश्वर हमेशा रहेगा, शुरू से लेकर भविष्य तक। जब तक कि तुम लोग उसके पीछे चलने के लिए और उसकी वफ़ादार और आज्ञाकारी रचनाएं बने रहने के लिए तैयार रहोगे, तब तक वह तुम लोगों को अकेला नहीं छोड़ेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'विजय के कार्य का आंतरिक सत्य (3)' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 292

केवल अपनी पुरानी धारणाओं को अलग रखकर तुम नए ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो, फिर भी पुराना ज्ञान आवश्यक नहीं कि पुरानी धारणाएँ हो। मनुष्य द्वारा कल्पना की गई बातों को "धारणाएँ" कहते हैं जो वास्तविकताओं के साथ मेल नहीं खातीं हैं। यदि पुराना ज्ञान पुराने युग में पहले से ही पुराना हो गया था, और इसने मनुष्य को नए कार्य में प्रवेश करने से रोक दिया था, तो इस प्रकार का ज्ञान भी एक धारणा है। यदि मनुष्य इस प्रकार के ज्ञान के लिए सही रास्ता लेने में समर्थ हो, और, पुरानी और नई बातों को जोड़कर, कई विभिन्न पहलुओं से परमेश्वर को जान सकता हो, तो पुराना ज्ञान मनुष्य के लिए सहायता बन जाता है और वह आधार बन जाता है जिसके द्वारा मनुष्य नए युग में प्रवेश करता है। परमेश्वर को जानने का सबक, कई सिद्धान्तों में निपुण होना तुम्हारे लिए आवश्यक बनाता है: जैसे कि परमेश्वर को जानने के मार्ग पर किस प्रकार प्रवेश करें, परमेश्वर को जानने के लिए तुम्हें कौन से सत्यों को समझना चाहिए और किस प्रकार से अपनी धारणाओं और पुराने स्वभाव से छुटकारा पाएं ताकि तुम परमेश्वर के नए कार्य की सभी व्यवस्थाओं के लिए समर्पित हो सको। यदि तुम परमेश्वर को जानने के सबक में प्रवेश करने के लिए इन सिद्धान्तों का आधार के रूप में उपयोग करते हो, तो तुम्हारा ज्ञान और गहरा हो जाएगा। यदि तुम्हें कार्य के तीन चरणों की स्पष्ट जानकारी है—जिसका अर्थ है कि परमेश्वर की सम्पूर्ण प्रबंधन योजना—और यदि तुम वर्तमान चरण के साथ परमेश्वर के कार्य के पिछले दोनों चरणों को पूरी तरह से सह-सम्बन्धित कर सको, और देख सको कि यह कार्य एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है, तो तुम्हारे पास अतुलनीय रूप से एक दृढ़ आधार होगा। कार्य के तीनों चरण एक ही परमेश्वर के द्वारा किए गए थे; यही सबसे महान दर्शन है और परमेश्वर को जानने का एकमात्र मार्ग है। कार्य के तीनों चरण केवल स्वयं परमेश्वर के द्वारा ही किए गए हो सकते हैं, और कोई भी मनुष्य इस प्रकार का कार्य उसकी ओर से नहीं कर सकता है—कहने का तात्पर्य है कि आरंभ से लेकर आज तक केवल परमेश्वर स्वयं ही अपना कार्य कर सकता था। यद्यपि परमेश्वर के कार्य के तीनों चरण विभिन्न युगों और स्थानों में किए गए हैं, और यद्यपि प्रत्येक का कार्य भी अलग-अलग है, किन्तु यह सब कार्य एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है। सभी दर्शनों में, यह सबसे महान दर्शन है जो मनुष्य को जानना चाहिए, और यदि यह पूरी तरह से मनुष्यों के द्वारा समझा जा सके, तो वह अडिग रहने में समर्थ होगा। आज विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं और वे पवित्र आत्मा के कार्य तथा जो कार्य पवित्र आत्मा के नहीं हैं उनके बीच अंतर नहीं कर पा रहे हैं—और इसलिए वे नहीं बता सकते कि क्या कार्य का यह चरण भी, कार्य के पिछले दो चरणों के समान, यहोवा परमेश्वर के द्वारा किया गया है। यद्यपि लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, तब भी उनमें से अधिकांश लोग अभी भी यह बताने में समर्थ नहीं हैं कि क्या यही सही मार्ग है। मनुष्य चिंता करता रहता है कि क्या यही वह मार्ग है जिसकी अगुवाई परमेश्वर स्वयं ने व्यक्तिगत रूप से की है और क्या परमेश्वर का देहधारण एक वास्तविकता है, और जब इस तरह की बातें आती हैं तो अधिकांश लोगों को अभी भी कोई भनक तक नहीं है कि कैसे जानें। जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वे मार्ग का निर्धारण करने में असमर्थ होते हैं, और इसलिए जो संदेश बोले जाते हैं उनका इन लोगों में आंशिक प्रभाव पड़ता है, और वे पूरी तरह से प्रभावशाली होने में असमर्थ रहते हैं और इसलिए यह फिर ऐसे लोगों के जीवन प्रवेश को प्रभावित करता है। यदि मनुष्य कार्य के तीनों चरणों में देख सकता कि वे विभिन्न समयों, स्थानों और लोगों में परमेश्वर स्वयं के द्वारा किए गए हैं, अगर मनुष्य यह देख सकता है कि, यद्यपि कार्य भिन्न है, तब भी यह सब एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है, और चूँकि यह कार्य एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है, तो इसे सही और बिना ग़लती का अवश्य होना चाहिए, और यह कि यद्यपि यह मनुष्यों की धारणाओं से विषम है, तो भी इस बात से इनकार नहीं कि यह एक ही परमेश्वर का कार्य है—यदि मनुष्य निश्चित हो कर कहे कि यह एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य है, तो मनुष्यों की धारणाएँ तुच्छ और उल्लेख किए जाने के अयोग्य हो जाएँगी। क्योंकि मनुष्य के दर्शन अस्पष्ट हैं, और मनुष्य केवल यहोवा को परमेश्वर के रूप में और यीशु को प्रभु के रूप में जानते हैं, और आज के देहधारी परमेश्वर के बारे में दुविधा में हैं, इसलिए कई लोग यहोवा और यीशु के कार्यों के प्रति समर्पित रहते हैं, आज के कार्य के बारे में धारणाओं से व्याकुल हो जाते हैं, अधिकांश लोग हमेशा संशय में रहते हैं और आज के कार्य को गम्भीरता से नहीं लेते हैं। मनुष्य की कार्य के उन अंतिम दो चरणों के बारे में कोई धारणाएँ नहीं हैं जो अदृश्य थीं। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य पिछले दोनों चरणों की वास्तविकता को नहीं समझता है और व्यक्तिगत रूप से वह उनका साक्षी नहीं रहा। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्हें देखा नहीं जा सकता है कि मनुष्य जैसा पसंद करता है वैसी ही कल्पना करता है; इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या जुटाता है, इसे सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य और सुधारने के लिए कोई नहीं है। मनुष्य नकारात्मक परिणामों के बारे में चिंता किए बिना और अपनी कल्पना को मुक्त रूप से दौड़ने देते हुए, अपनी प्राकृतिक सहज प्रवृत्ति को खुली छूट दे देता है, क्योंकि इसे सत्यापित करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं और इसलिए मनुष्य की कल्पनाएँ "वास्तविकता" बन जाती हैं, इस बात की परवाह किए बिना कि उनका कोई सबूत है या नहीं। इस प्रकार मनुष्य अपने मन में कल्पित परमेश्वर को मानने लगता है और वास्तविक परमेश्वर को नहीं खोजता है। यदि एक व्यक्ति का एक प्रकार का विश्वास है, तो सौ लोगों के बीच सौ प्रकार के विश्वास होंगे। मनुष्य इसी प्रकार के विश्वास को धारण करता है क्योंकि उसने परमेश्वर के कार्य की वास्तविकता को नहीं देखा है, क्योंकि उसने इसे अपने कानों से केवल सुना है और अपनी आँखों से नहीं देखा है। मनुष्यों ने उपाख्यानों और कहानियों को सुना है—परन्तु उसने परमेश्वर के कार्य के तथ्यों के ज्ञान के बारे में शायद ही सुना है। इस प्रकार यह उनकी स्वयं की धारणा की वजह से है कि ऐसे लोग जो केवल एक साल से विश्वासी रहे हैं वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और यही उस सभी के बारे में भी सत्य है जिन्होंने परमेश्वर पर पूरे जीवन भर विश्वास किया है। जो लोग तथ्यों को नहीं देख सकते वे ऐसे विश्वास से बच नहीं सकते जिसमें उनकी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं। मनुष्य विश्वास करता है कि उसने अपनी सभी पुरानी अवधारणाओं के बंधनों से स्वयं को मुक्त कर लिया है और एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। क्या मनुष्य नहीं जानता है कि उन लोगों का ज्ञान जो परमेश्वर का असली चेहरा नहीं देख सकते, केवल धारणाएँ और अफ़वाहें हैं? मनुष्य सोचता है कि उसकी धारणाएँ सही हैं और बिना गलतियों की हैं, और सोचता है कि ये धारणाएँ परमेश्वर की ओर से आती हैं। आज, जब मनुष्य परमेश्वर के कार्यों को देखता है, वह उन धारणाओं को छोड़ देता है जो कई सालों से बनी हुई थीं। अतीत की कल्पनाशीलताएँ और विचार इस चरण के कार्य में अवरोध बन गए और मनुष्य के लिए इस प्रकार की धारणाओं को जाने देना और इस प्रकार के विचारों का खण्डन करना कठिन हो जाता है। इस कदम-दर-कदम कार्य की ओर उन कई लोगों की धारणाएँ जिन्होंने आज तक परमेश्वर का अनुसरण किया है बहुत ही कष्टदायक हो गई हैं और इन लोगों ने देहधारी परमेश्वर के प्रति धीरे-धीरे एक हठी शत्रुता बना ली और उनके इस घृणा का स्रोत मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। यह इसलिए है क्योंकि तथ्य मनुष्य को उसकी कल्पनाशीलताओं की लगाम को खुली छूट देने की अनुमति नहीं देते हैं, और इसके अलावा, मनुष्य के द्वारा आसानी से खण्डित नहीं किए जा सकते और मनुष्यों की धारणाएँ और कल्पनाशीलताएँ तथ्यों के अस्तित्व को बहा नहीं सकती हैं, और इसके अलावा, क्योंकि मनुष्य तथ्यों की शुद्धता और सच्चाई पर विचार नहीं करता है, और केवल एक ही सोच के साथ अपनी धारणाओं को ढीला छोड़ देता है, और अपनी कल्पनाओं को कार्यान्वित करता है, कि मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाशीलताएँ आज के कार्य के शत्रु बन गए हो, वह कार्य जो मनुष्यों की धारणाओं से विषम है। इसे केवल मनुष्यों की धारणाओं की ग़लती ही कहा जा सकता है, इसे परमेश्वर के कार्य की ग़लती नहीं कहा जा सकता है। मनुष्य जो चाहे कल्पना कर सकता है, परन्तु वह परमेश्वर के कार्य के किसी भी चरण या इसके छोटे से भी अंश के बारे में स्वतंत्र रूप से विवाद नहीं कर सकता है; परमेश्वर के कार्य का तथ्य मनुष्यों के द्वारा अनुल्लंघनीय है। तुम अपनी कल्पनाओं को खुली छूट दे सकते हो और यहाँ तक कि यहोवा एवं यीशु के कार्यों के बारे में सुंदर कहानियों को भी संकलित कर सकते हो, परन्तु तुम यहोवा और यीशु के कार्य के प्रत्येक चरण के तथ्य का खण्डन नहीं कर सकते हो; यह एक सिद्धान्त है, और एक प्रशासकीय आदेश भी है और तुम लोगों को इन मामलों के महत्व को समझना चाहिए। मनुष्य यह विश्वास करता है कि कार्य का यह पड़ाव मनुष्यों की धारणाओं के साथ असंगत है, और यह कि यह कार्य के पिछले दो चरणों का मामला नहीं है। अपनी कल्पना में, मनुष्य यह विश्वास करता है कि पिछले दोनों चरणों का कार्य निश्चित रूप से वही नहीं है जैसा कि आज का कार्य है—परन्तु क्या तुमने कभी यह ध्यान दिया है कि परमेश्वर के कार्य के सब सिद्धान्त एक ही हैं, कि उसका कार्य हमेशा व्यवहारिक होता है और युगों की परवाह किए बिना, हमेशा ऐसे लोगों की भरमार होगी जो उसके कार्य के तथ्य का प्रतिरोध और विरोध करते हैं? आज जो लोग कार्य के इस चरण का प्रतिरोध और विरोध करते हैं निस्संदेह उन्होंने अतीत में भी परमेश्वर का विरोध किया होगा, क्योंकि इस प्रकार के लोग सदैव परमेश्वर के शत्रु रहेंगे। वे लोग जो परमेश्वर के कार्य के तथ्य को जानते हैं कार्यों के इन तीन चरणों को एक ही परमेश्वर के कार्य के रूप में देखेंगे, और अपनी धारणाओं को जाने देंगे। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, और सचमुच परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब परमेश्वर के प्रबंधन का सम्पूर्ण कार्य समाप्ति के निकट होगा, तो परमेश्वर प्रत्येक वस्तु को उसके प्रकार के आधार पर श्रेणीबद्ध करेगा। मनुष्य रचयिता के हाथों से रचा गया था, और अंत में वह मनुष्य को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में ले लेगा; कार्य के तीन चरणों का यही निष्कर्ष है। अंत के दिनों में कार्य का चरण और इस्राएल एवं यहूदा में पिछले दो चरण, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में परमेश्वर के प्रबंधन की योजना के हिस्से हैं। इसे कोई नकार नहीं सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का तथ्य है। यद्यपि लोगों ने इस कार्य का ज्यादा अनुभव या साक्ष्य नहीं किया है, परन्तु तथ्य तब भी तथ्य ही हैं और इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा नकारा नहीं जा सकता है। ब्रह्माण्ड के हर देश के लोग जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सभी कार्य के इन तीनों चरणों को स्वीकार करेंगे। यदि तुम केवल कार्य के किसी एक विशेष चरण को ही जानते हो, और कार्य के अन्य दो चरणों को नहीं समझते हो, अतीत में परमेश्वर के कार्यों को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रबंधन की समस्त योजना के संपूर्ण सत्य के बारे में बात करने में असमर्थ हो, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान एक-पक्षीय है, क्योंकि तुम परमेश्वर को जानते या समझते नहीं हो, और इसलिए तुम परमेश्वर की गवाही देने के लिए उपयुक्त नहीं हो। इस बात की परवाह किए बिना कि इन चीज़ों के बारे में तुम्हारा वर्तमान का ज्ञान गहरा या सतही है, अंत में, तुम लोगों के पास ज्ञान होना चाहिए, और तुम्हें अवश्य पूरी तरह से आश्वस्त होना चाहिए, और सभी लोग परमेश्वर के कार्य की सम्पूर्णता को देखेंगे और उसके प्रभुत्व के अधीन समर्पित होंगे। इस कार्य के अन्त में, सभी धर्म एक हो जाएँगे, सभी प्राणी रचयिता के प्रभुत्व के अधीन वापस लौट जाएँगे, सभी प्राणी एक ही सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे, और सभी दुष्ट धर्म समाप्त हो जाएँगे और कभी दोबारा प्रकट नहीं होंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 293

परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य, मनुष्यों में कैसा प्रभाव प्राप्त किया जाना है, और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की इच्छा क्या है, इन बातों को समझना हर उस व्यक्ति के लिए ज़रूरी है जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अभी सभी मनुष्यों में जिस चीज का अभाव है, वह है परमेश्वर के कार्य का ज्ञान। मनुष्य न बूझता है और न ही समझता है कि वास्तव में कौन सी चीज मनुष्य में परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर के समस्त कार्य और सृष्टि की रचना के बाद से परमेश्वर की इच्छा को निर्मित करती है। यह अपर्याप्तता न केवल समस्त धार्मिक जगत में देखी जाती है, बल्कि इसके अलावा परमेश्वर के सभी विश्वासियों में भी देखी जाती है। जब वह दिन आता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर को देखते हो और उसकी बुद्धि को समझते हो; जब तुम परमेश्वर के सब कर्मों को देखते हो, और पहचानते हो कि परमेश्वर क्या है और उसके पास क्या है; जब तुम उसकी विपुलता, बुद्धि, चमत्कार और मनुष्य में उसके समस्त कार्य को निहारते हो, तब उस दिन होगा कि तुमने परमेश्वर में सफल विश्वास को प्राप्त कर लिया है। जब परमेश्वर को सर्वव्यापी और अत्यधिक विपुल कहा जाता है, तब सर्वव्यापी से क्या अभिप्राय है? और विपुलता से क्या अभिप्राय है? यदि तुम इस बात को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के विश्वासी नहीं माने जा सकते हो। मैं क्यों कहता हूँ कि धार्मिक जगत के वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं और कुकर्मी हैं, जो उसी प्रकार के हैं जैसा शैतान है? जब मैं कहता हूँ कि वे कुकर्मी हैं, तो ऐसा इसलिये कहता हूँ क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं अथवा उसकी बुद्धि को नही देखते हैं। परमेश्वर उन पर कभी भी अपने कार्य को प्रकट नहीं करता है; वे अंधे व्यक्ति हैं, वे परमेश्वर के कर्मों को नहीं देखते हैं। वे परमेश्वर द्वारा परित्यक्त हैं और उन्हें परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा बिल्कुल भी प्राप्त नहीं है, और पवित्र आत्मा का कार्य तो और भी कम प्राप्त है। वे जो परमेश्वर के कार्य के बिना हैं, वे कुकर्मी हैं और परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं। जिन्हें मैं कहता हूँ कि वे परमेश्वर के विरोध में हैं ये वे लोग हैं जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं, वे लोग हैं जो निरर्थक वचनों से परमेश्वर को स्वीकार करते हैं मगर परमेश्वर को नहीं जानते हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं मगर उनकी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं, और वे लोग हैं जो परमेश्वर के अनुग्रह में आनंद उठाते हैं मगर उनकी गवाही नहीं दे सकते हैं। परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य, और मनुष्य में उसके कार्य को समझे बिना मनुष्य परमेश्वर के हृदय के अनुरूप नहीं हो सकता है, और परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकता है। मनुष्य के द्वारा परमेश्वर का विरोध करने का कारण, एक ओर मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से, और दूसरी ओर, परमेश्वर के प्रति अज्ञानता और परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों की और मनुष्य के प्रति उनकी इच्छा की समझ की कमी से उत्पन्न होता है। इन दोनों पहलुओं का, परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध के इतिहास में समावेश होता है। नौसिखिए विश्वासी परमेश्वर का विरोध करते हैं क्योंकि ऐसा विरोध उनकी प्रकृति में होता है, जबकि कई वर्षों से विश्वास वाले लोगों में परमेश्वर का विरोध, उनके भ्रष्ट स्वभाव के अलावा, परमेश्वर के प्रति उनकी अज्ञानता का परिणाम है। परमेश्वर के देहधारी बनने से पहले के समय में क्या किसी मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया है, इसका मापन इस बात से होता था कि क्या उसने स्वर्ग में परमेश्वर द्वारा निर्धारित आदेशों का पालन किया है। उदाहरण के लिये, व्यवस्था के युग में, जो कोई भी यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं करते थे, वे ही थे जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया था; जो कोई भी यहोवा के प्रसाद की चोरी करते थे, और जो कोई भी यहोवा के कृपापात्र लोगों के विरुद्ध खड़े हुए थे, वे ही थे जिन्होंने परमेश्वर का विरोध किया था और वे ही होंगे जिन्हें पत्थरों से मार डाला जाएगा; जो कोई भी अपने पिता और माता का आदर नहीं करते थे, और जो कोई भी दूसरों को चोट पहुँचाते या शाप देते थे, उन लोगों ने ही व्यवस्था का पालन नहीं किया था। और वे सब जो यहोवा की व्यवस्था को नहीं मानते थे, वे ही थे जो उसके विरुद्ध खड़े होते थे। अनुग्रह के युग में अब और ऐसा नहीं था, तब जो कोई भी यीशु के विरुद्ध खड़े हुए थे, ये वे थे जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े थे, और जो कोई भी यीशु के बोले गये वचनों का पालन नहीं करता था, ये वे थे जो "परमेश्वर के विरोध" में खड़े थे। इस युग में, "परमेश्वर का विरोध" का निर्धारण अधिक स्पष्ट और अधिक वास्तविक रूप में परिभाषित हो गया था। उन दिनों में, जब परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, तब क्या किसी मनुष्य ने परमेश्वर का विरोध किया है इसका मापन इस बात पर आधारित था कि क्या मनुष्य ने स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना की और उनकी खोज की। "परमेश्वर के प्रति विरोध" की परिभाषा उस समय इतनी वास्तविक नहीं थी, क्योंकि तब मनुष्य परमेश्वर को समझ नहीं सकता था और न ही उसकी छवि को या इस बात को जान सकता था कि उन्होंने कैसे कार्य किया और कैसे वचन बोले। मनुष्य की परमेश्वर के बारे में कोई अवधारणा नहीं थी, और वह परमेश्वर पर अस्पष्ट रूप में विश्वास करता था, क्योंकि वे मनुष्यों पर प्रकट नहीं हुए थे। इस कारण, मनुष्य ने अपनी कल्पनाओं में परमेश्वर पर जैसे भी विश्वास किया, परमेश्वर ने मनुष्य की निंदा नहीं की या मनुष्यों से अधिक कुछ नहीं माँगा, क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं देख सकता था। जब परमेश्वर ने देहधारण किया और मनुष्यों के बीच काम करने आया, तो सभी ने उन्हें देखा और उसके वचनों को सुना, और सभी ने देह में परमेश्वर के कार्यों को देखा। उस समय, मनुष्य की जितनी भी अवधारणाएँ थी, वे सब मानो साबुन के झाग में घुल कर बह गईं। वे जो परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखते हैं, और अपने-अपने हृदयों में आज्ञाकारी हैं, उन सभी की निंदा नहीं की जाएगी, जबकि वे जो जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग ईसा-विरोधी हैं और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ रखते हैं, मगर खुशी से आज्ञा मानते हैं, निंदित नहीं किए जाएँगे। परमेश्वर मनुष्य की उसके आशयों और क्रियाकलापों के आधार पर निंदा करते हैं, कभी भी विचारों और मत के आधार पर नहीं। यदि मनुष्य की ऐसे आधार पर निंदा की जाए, तो कोई भी परमेश्वर के कुपित हाथों से बच कर नहीं भाग पाएगा। जो जानबूझकर देहधारी परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं, वे उसके द्वारा की गई अवज्ञा के कारण दण्ड पाएँगे। उनका जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करना, परमेश्वर की उनकी अवधारणाओं से उत्पन्न होता है, जिसका परिणाम परमेश्वर के कार्य में उनका व्यवधान है। ऐसे व्यक्ति जानते-बूझते हुए परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करते हैं और उसे नष्ट करते हैं। उनकी न केवल परमेश्वर के बारे में अवधारणाएँ हैं, बल्कि वे उन कामों को करते हैं जो परमेश्वर के कार्य में व्यवधान डालते हैं, और यही कारण है कि ऐसे मनुष्यों के इस तरीके की निंदा की जाएगी। वे जो परमेश्वर के कार्य में जानबूझकर व्यवधान डालने में संलग्न नहीं होते हैं, उनकी पापियों के समान निंदा नहीं की जाएगी, क्योंकि वे इच्छा से आज्ञापालन कर सकते हैं और विघ्न एवं व्यवधान उत्पन्न नहीं करते हैं। ऐसे व्यक्तियों की निंदा नहीं की जाएगी। हालाँकि, जब मनुष्य कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेता है, तब भी वह परमेश्वर के बारे में कई अवधारणाएँ मन में रखता है और देहधारी परमेश्वर के कार्य को समझने में असमर्थ रहता है, और अनेक वर्षों के अनुभव के बावजूद, वह परमेश्वर के बारे में बहुत सी अवधारणाएँ बनाए रखता है और तब भी परमेश्वर को समझने में असमर्थ बना रहता है, तब भले ही वह अपने हृदय में परमेश्वर की बहुत सी अवधारणाओं के बावजूद कोई गड़बड़ी उत्पन्न नहीं करे, और भले ही ये अवधारणाएँ दिखाई न दें, ऐसे लोग परमेश्वर के कार्य में किसी सेवा के योग्य नहीं हैं। वे सुसमाचार का उपदेश देने या परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ हैं; ऐसे मनुष्य किसी काम के नहीं हैं और मंदबुद्धि हैं। क्योंकि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं और वे परमेश्वर के बारे में अपनी अवधारणाओं का परित्याग करने में अक्षम हैं, इसलिए वे निंदित किए जाएँगे। इसे इस प्रकार कहा जा सकता है: नौसिखिए विश्वासियों के लिये परमेश्वर की अवधारणाएँ रखना या परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं जानना असामान्य नहीं है, परंतु जिन्होंने बहुत वर्षों तक विश्वास किया है और परमेश्वर के कार्य का बहुत अनुभव किया है, उनका ऐसी अवधारणाएँ रखना, और उससे बढ़कर उनमें परमेश्वर का ज्ञान न होना, असामान्य है। यह ऐसी असामान्य अवस्था का परिणाम है कि ऐसे मनुष्यों की निंदा की जाती है। ऐसे असामान्य लोग किसी काम के नहीं है; ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करते हैं और जिन्होंने व्यर्थ में ही परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लिया है। ऐसे सभी लोग अंत में मार डाले जाएँगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे वो लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 294

ऐसे लोग जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते हैं वे लोग हैं जो परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और इससे भी अधिक वे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते हैं। वे जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं, वे हर दिन बाइबल पढ़ते हैं, फिर भी उनमें से एक भी परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझता है। एक भी इंसान परमेश्वर को नहीं जान पाता है; और यही नहीं, उनमें से एक भी परमेश्वर के हृदय के अनुरूप नहीं है। वे सबके सब व्यर्थ, अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पर खड़ा हैं। यद्यपि वे परमेश्वर के नाम पर धमकी देते हैं, किंतु वे जानबूझ कर उसका विरोध करते हैं। यद्यपि वे स्वयं को परमेश्वर का विश्वासी दर्शाते हैं, किंतु ये वे लोग हैं जो मनुष्यों का मांस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाना चाहते हैं या सही मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं, और वे बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट उत्पन्न करती हैं। यद्यपि वे "मज़बूत देह" वाले हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे ईसा-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर के विरोध में ले जाते हैं? वे कैसे जानेंगे कि ये जीवित शैतान हैं जो निगलने के लिए विशेष रूप से आत्माओं को खोज रहे हैं? वे जो परमेश्वर के सामने अपने आप को आदर देते हैं, वे सबसे अधिक अधम लोग हैं, जबकि वे जो स्वयं को दीन और विनम्र बनाते हैं, वे सबसे अधिक आदरणीय है। और वे जो यह सोचते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं, और दूसरों को परमेश्वर के कार्य की धूमधाम से उद्घोषणा करते हैं, जबकि उनकी आँखें परमेश्वर पर लगी रहती हैं—अत्यंत अज्ञानी हैं। ऐसे व्यक्ति वे हैं जिनमें परमेश्वर की गवाही नहीं हैं, वे अभिमानी और दंभी हैं। वे जो परमेश्वर के अपने वास्तविक अनुभव और व्यवहारिक ज्ञान के बावजूद यह मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर का बहुत थोड़ा सा ज्ञान है, परमेश्वर के सबसे अधिक प्रिय लोग हैं। ये ही ऐसे लोग हैं जिनमें वास्तव में गवाही होती है और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य होते हैं। जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को समझते हैं मगर उस सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, मगर परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध जाते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जिनमें देहधारी परमेश्वर की अवधारणाएँ हैं और जानबूझ कर विद्रोह करते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के बारे में निर्णय लेते हैं वे परमेश्वर के विरोधी हैं; और जो कोई भी परमेश्वर को जानने में और उनकी गवाही देने में असमर्थ है, वह परमेश्वर का विरोधी है। इसलिये मेरे सत्योपदेश को सुनिए: यदि तुम लोगों को इस मार्ग पर चलने का वास्तव में विश्वास है, तो इस मार्ग पर चलते रहिए। यदि तुम लोग परमेश्वर के विरोध से परहेज नहीं कर सकते हो, तो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, बेहतर है कि तुम लोग यह मार्ग छोड़कर चले जाओ। अन्यथा यह वास्तव में शुभ के बजाय अशुभ का शकुन है, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति अतिशय भ्रष्ट है। तुम लोगों में लेशमात्र भी स्वामिभक्ति या आज्ञाकारिता, या ऐसा हृदय नहीं है जिसमें धार्मिकता और सत्य की प्यास हो। और न ही तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति लेशमात्र भी प्रेम है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने तुम्हारी दशा अति विध्वस्त है। तुम लोगों को जो पालन करना चाहिए वह करने में और जो बोलना चाहिए वह बोलने में तुम लोग सक्षम नहीं हो। तुम लोग उन चीजों का अभ्यास करने में सक्षम नहीं हो जिनका तुम लोगों को अभ्यास करना चाहिए। तुम लोग उस कार्य को करने में सक्षम नहीं हो जो तुम लोगों को करना चाहिए। तुम लोगों में वह स्वामिभक्ति, विवेक, आज्ञाकारिता और संकल्पशक्ति नहीं है जो तुममें होनी चाहिए। तुम लोगों ने उस तकलीफ़ को नहीं झेला है, जो तुम लोगों को झेलनी चाहिए, तुम लोगों में वह विश्वास नहीं है, जो तुम लोगों में होना चाहिए। तुम लोग सभी गुणों से विहीन हो, क्या तुम लोगों के पास जीते रहने के लिए आत्म-सम्मान है? मेरा तुम लोगों से आग्रह है कि अनंत विश्राम के लिए अपनी आँखें बंद कर लेना तुम लोगों के लिए बेहतर है, जिससे तुम परमेश्वर को तुम लोगों के लिए चिंता करने और कष्ट झेलने से बचा सकते हो। तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हो मगर तुम उसकी इच्छा को नहीं जानते हो; तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, मगर परमेश्वर की माँगों को पूरा करने में सक्षम नहीं हो। तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो मगर परमेश्वर को जानते नहीं हो, और ऐसे जीते हो मानो प्रयत्न करने का कोई लक्ष्य नहीं है। तुम लोगों के कोई आदर्श और कोई उद्देश्य नहीं हैं। तुम लोग मनुष्य की तरह जीते हो मगर तुम लोगों के पास विवेक, सत्यनिष्ठा या लेशमात्र भी विश्वसनीयता नहीं है। तुम लोगों को मनुष्य कैसे समझा जा सकता है? तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो मगर उसे धोखा देते हो। ऊपर से, तुम लोग परमेश्वर का धन ले लेते हो और उसके चढ़ावों को खा जाते हो, मगर अंत में, परमेश्वर के लिए कोई आदर भाव अथवा परमेश्वर के प्रति विवेक का प्रदर्शन नहीं करते हो। यहाँ तक कि तुम लोग परमेश्वर की अत्यंत मामूली माँगों को भी पूरा नहीं कर सकते हो। तो तुम लोगों को मनुष्य कैसे माना जा सकता है? जो भोजन तुम लोग खाते हो और जो साँस तुम लोग लेते हो, वे परमेश्वर से आते हैं, तुम उसके अनुग्रह का आनंद लेते हो, मगर अंत में, तुम लोगों को परमेश्वर का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता है। इसके विपरीत, तुम लोग निकम्मे बन गए हो जो परमेश्वर का विरोध करते हो। क्या तब तुम लोग एक जंगली जानवर नहीं हो जो कुत्ते से भी बेहतर नहीं है? क्या जानवरों में कोई ऐसा है जो तुम लोगों की तुलना में अधिक द्वेषपूर्ण है?

वे पादरी और बुज़ुर्ग जो ऊँचे-ऊँचे उपदेश-मंच पर खड़े होकर सिखाते हैं कि मनुष्य परमेश्वर के विरोध और शैतान के साथ गठजोड़ में है; क्या तुम लोगों में से वे लोग जो मनुष्यों को सिखाने के लिए ऊँचे-ऊँचे मंचों पर नहीं खड़े होते हैं, परमेश्वर के और भी अधिक विरोधी नहीं हो सकते हैं? इतना ही नहीं, क्या तुम लोग तब शैतान के साथ मिलीभगत में नहीं हो? जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते हैं, वे नहीं जानते हैं कि परमेश्वर के हृदय के अनुरूप कैसे बनें। निश्चित रूप से, यह उनके लिये सत्य नहीं हो सकता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझते हैं? परमेश्वर के कार्य में कभी भी त्रुटि नहीं होती है, बल्कि, यह मनुष्य का अनुसरण है जिसमें त्रुटि होती है। क्या वे पतित लोग जो जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करते हैं, पादरियों और बुज़ुर्गों की तुलना में अधिक कुटिल और दुर्भावनापूर्ण नहीं है? बहुत से लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और उन बहुत से लोगों में, परमेश्वर के प्रति विरोध के भी बहुत से प्रकार हैं। जैसे सभी प्रकार के विश्वासी हैं, वैसे ही सभी प्रकार के वे लोग भी हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, प्रत्येक व्यक्ति दूसरे से भिन्न। जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को स्पष्ट रूप में नहीं समझते हैं, उनमें से एक को भी नहीं बचाया जा सकता है। इस बात की परवाह किए बिना कि अतीत में मनुष्य ने किस प्रकार परमेश्वर का विरोध किया होगा, जब मनुष्य को परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य समझ में आता है, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने प्रयास समर्पित करता है, तो परमेश्वर द्वारा उसके पिछले पाप धोकर साफ कर दिए जाएँगे। जब तक मनुष्य सत्य की खोज और सत्य का अभ्यास करता है, तब तक उसने जो किया है उसे परमेश्वर अपने मन में नहीं रखेंगे। बल्कि, यह सत्य पर मनुष्य के अभ्यास के आधार पर है कि परमेश्वर मनुष्य को सही ठहराते हैं। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। मनुष्य के परमेश्वर को देखने या उसके कार्य का अनुभव करने से पहले, इस बात की परवाह किए बिना कि मनुष्य परमेश्वर के प्रति कैसी क्रिया करता है, परमेश्वर उसे अपने मन में नहीं रखता है। फिर भी, एक बार मनुष्य परमेश्वर को जान ले और उसके कार्य का अनुभव कर ले, तो मनुष्य के सभी कर्म और क्रियाकलाप परमेश्वर द्वारा "ऐतिहासिक अभिलेख" में लिख लिए जाते हैं, क्योंकि मनुष्य ने परमेश्वर को देख लिया है और उसके कार्य के भीतर जीवन जीया है।

जब मनुष्य वास्तव में यह देख लेता है कि परमेश्वर क्या हैं, उसके पास क्या है, वह उसकी सर्वश्रेष्ठता को देख लेता है, और परमेश्वर के कार्य को वास्तव में जान लेता है, और उससे भी अधिक, जब मनुष्य का पहला वाला स्वभाव बदल जाता है, तब मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने वाले अपने विद्रोही स्वभाव को पूरी तरह से दूर कर लेता है। ऐसा कहा जा सकता है कि हर मनुष्य ने एक न एक बार परमेश्वर का विरोध किया है और हर मनुष्य ने एक न एक बार अवश्य परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया है। हालाँकि, यदि तुममें देहधारी परमेश्वर की आज्ञा मानने का संकल्प हो, और उसके बाद से परमेश्वर के हृदय को अपनी सत्यनिष्ठा द्वारा संतुष्ट करते हो, उस सत्य का अभ्यास करते हो जिसका तुम्हें करना चाहिए, अपने उस कर्तव्य को करते हो जो तुम्हें करना चाहिए, और उन विनियमों को मानते हो जो तुम्हें मानने चाहिए, तब तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने विद्रोहीपन को दूर करना चाहता है, और ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि तुम अपनी गलतियाँ मानने से इनकार करते हो, और तुम्हारे हृदय में पश्चाताप नहीं है, यदि तुम अपने विद्रोही मार्गों में बने रहते हो, और परमेश्वर के साथ काम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने का जरा भी हृदय में नहीं रखते हो, तब तुम्हारे जैसा ऐसा दुराग्रही मूर्ख व्यक्ति निश्चित रूप से दण्ड पाएगा, और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने वाला व्यक्ति कभी नहीं होगा। यदि ऐसा है, तो तुम आज और आने वाले कल भी परमेश्वर के शत्रु हो, और उसके बाद के दिनों में भी तुम परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे; तुम सदैव परमेश्वर के विरोधी रहोगे और परमेश्वर के शत्रु रहोगे। परमेश्वर तुम्हें कैसे क्षमा कर सकता है? परमेश्वर का विरोध करना मनुष्य का स्वभाव है, परंतु मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने के "रहस्यों" को सप्रयोजन नहीं पा सकता है क्योंकि उसके स्वभाव को बदलना दुर्गम कार्य है। यदि ऐसा मामला है, तो बेहतर होगा कि इससे पहले कि बहुत देर हो जाए तुम चले जाओ, अन्यथा ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारी ताड़ना अधिक कठोर हो जाए, और ऐसा न हो कि तुम्हारी क्रूरतापूर्ण प्रकृति उभर जाए और दुर्दमनीय हो जाए, जब तक कि अंत में परमेश्वर द्वारा तुम्हारे दैहिक शरीर को समाप्त न कर दिया जाए। तुम धन्य होने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो; यदि अंत में, तुम पर दुर्भाग्य आ पड़ता है, तो यह उचित नहीं होगा। मैं तुम लोगों को प्रोत्साहित करता हूँ कि सर्वोत्तम होगा कि तुम एक अन्य योजना बनाओ; परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास की तुलना में कोई भी अन्य अभ्यास बेहतर रहेगा। निश्चत रूप से इस एक मार्ग से अधिक और भी मार्ग हैं? इसके बावजूद भी क्या तुम लोग सत्य की खोज किए बिना जीते नहीं रहोगे? इस प्रकार से परमेश्वर के साथ असहमत होकर क्यों जीया जाए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी लोग जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे वो लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 295

मैं मनुष्यों के मध्य बहुत कार्य कर चुका हूँ और इस दौरान मैंने कई वचन भी व्यक्त किए हैं। ये समस्त वचन मनुष्य के उद्धार के लिए हैं, और इसलिए व्यक्त किए गए थे, ताकि मनुष्य मेरे अनुकूल बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने थोड़े ही लोग पाए हैं, जो मेरे अनुकूल हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों को बहुमूल्य नहीं समझता—ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुकूल नहीं है। इस तरह, मैं जो कार्य करता हूँ, वह सिर्फ़ इसलिए नहीं किया जाता कि मनुष्य मेरी आराधना कर सके; बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, वह इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य मेरे अनुकूल बन सके। मनुष्य भ्रष्ट हो चुका है और शैतान के फंदे में जी रहा है। सभी लोग देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं, और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं, जो मेरे अनुकूल हो। ऐसे लोग भी हैं, जो कहते हैं कि वे मेरे अनुकूल हैं, परंतु वे सब अस्पष्ट मूर्तियों की आराधना करते हैं। हालाँकि वे मेरे नाम को पवित्र मानते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मूलत: वे सब मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही "उपयुक्त" अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका उल्लेख पवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुकूल कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्र को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे बाइबल के भीतर एक ऐसे अज्ञात परमेश्वर को कैद कर देते हैं, जिसे उन्होंने स्वयं भी कभी नहीं देखा है, और जिसे देखने में वे अक्षम हैं, और जिसे वे फ़ुरसत के समय में ही निगाह डालने के लिए बाहर निकालते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाओं पर कोई ध्यान नहीं देते, परंतु इसके बजाय, पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। कई और लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे वचनों और उक्तियों को बहुत महत्वपूर्ण समझते हैं, इस हद कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुकूलता का मार्ग या सत्य के साथ अनुकूलता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के वचनों के साथ अनुकूलता का मार्ग खोजते हैं, और वे विश्वास करते हैं कि कोई भी चीज़ जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। उन्होंने उस समय के यीशु के साथ अनुकूल होने की कोशिश नहीं की, बल्कि कर्मठतापूर्वक व्यवस्था का इस हद तक अक्षरशः पालन किया कि—यीशु पर पुराने विधान की व्यवस्था का पालन न करने और मसीहा न होने का आरोप लगाते हुए—निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुकूलता के मार्ग की खोज नहीं की? उनके दिमाग़ में पवित्रशास्त्र का एक-एक वचन घर कर गया था, जबकि मेरी इच्छा और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि कठोरता से पवित्रशास्त्र के वचनों से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं थे, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। दरअसल वे बाइबल की रखवाली करने वाले कुत्ते थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक वचन की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए किया। इस प्रकार उन्होंने अपना भविष्य त्यागने और यीशु की निंदा करने के लिए उसकी मृत्यु के रूप में पापबलि देने को प्राथमिकता दी, क्योंकि यीशु पवित्रशास्त्र के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक वचन के नौकर नहीं थे?

और आज के लोगों के बारे में क्या कहूँ? मसीह सत्य बताने के लिए आया है, फिर भी वे निश्चित ही उसे इस दुनिया से निष्कासित कर देंगे, ताकि वे स्वर्ग में प्रवेश हासिल कर सकें और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। वे बाइबल के हितों की रक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को पूरी तरह से नकार देंगे, और वे बाइबल का चिरस्थायी अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए देह में लौटे मसीह को फिर से सूली पर चढ़ा देंगे। मनुष्य मेरा उद्धार कैसे प्राप्त कर सकता है, जब उसका हृदय इतना अधिक द्वेष से भरा है और उसकी प्रकृति मेरी इतनी विरोधी है? मैं मनुष्य के मध्य रहता हूँ, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे नहीं जानता। जब मैं मनुष्य पर अपना प्रकाश डालता हूँ, तब भी वह मेरे अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है। जब मैं लोगों पर क्रोधित होता हूँ, तो वे मेरे अस्तित्व को और अधिक प्रबलता से नकारते हैं। मनुष्य वचनों और बाइबल के साथ अनुकूलता की खोज करता है, लेकिन सत्य के साथ अनुकूलता का मार्ग खोजने के लिए एक भी व्यक्ति मेरे समक्ष नहीं आता। मनुष्य मुझे स्वर्ग में खोजता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो देह में उन्हीं के बीच रहता हूँ, बहुत मामूली हूँ। जो लोग सिर्फ़ बाइबल के वचनों के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ़ एक अज्ञात परमेश्वर के साथ अनुकूलता की खोज करते हैं, वे मेरे लिए एक घृणित दृश्य हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं, और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अनकहा खज़ाना देने में सक्षम है; जिस परमेश्वर की वे आराधना करते हैं, वह एक ऐसा परमेश्वर है, जो अपने आपको मनुष्य की दया पर छोड़ देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य बस वचनों के लिए बहुत नीच है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मेरे सामने असीमित माँगें रखते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

जो लोग मेरे विरुद्ध हैं, वे मेरे अनुकूल नहीं हैं। ऐसा ही मामला उनका है, जो सत्य से प्रेम नहीं करते। जो मेरे प्रति विद्रोह करते हैं, वे मेरे और भी अधिक विरुद्ध हैं और मेरे अनुकूल नहीं हैं। जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, मैं उन सभी को बुराई के हाथों में छोड़ देता हूँ, जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, मैं उन सभी को बुराई द्वारा भ्रष्ट किए जाने के लिए त्याग देता हूँ, उन्हें अपने दुष्कर्म प्रकट करने के लिए असीमित स्वतंत्रता दे देता हूँ, और अंत में उन्हें बुराई को सौंप देता हूँ कि वह उन्हें निगल जाए। मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मेरी आराधना करते हैं, अर्थात्, मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मुझ पर विश्वास करते हैं। मुझे सिर्फ इस बात की फिक्र है कि कितने लोग मेरे अनुकूल हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सब जो मेरे अनुकूल नहीं हैं, वे ऐसे दुष्ट हैं जो मुझे धोखा देते हैं; वे मेरे शत्रु हैं, और मैं अपने शत्रुओं को अपने घर में "प्रतिष्ठापित" नहीं करूँगा। जो मेरे अनुकूल हैं, वे हमेशा मेरे घर में मेरी सेवा करेंगे, और जो मेरे विरुद्ध जाते हैं, वे हमेशा मेरी सज़ा भुगतेंगे। जो सिर्फ़ बाइबल के वचनों पर ही ध्यान देते हैं और न तो सत्य में दिलचस्पी रखते हैं और न मेरे पदचिह्न खोजने में—वे मेरे विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मुझे बाइबल के अनुसार सीमित कर देते हैं, मुझे बाइबल में ही कैद कर देते हैं, और इसलिए वे मेरे परम निंदक हैं। ऐसे लोग मेरे सामने कैसे आ सकते हैं? वे मेरे कर्मों या मेरी इच्छा या सत्य पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि वचनों से ग्रस्त हो जाते हैं—वचन जो मार देते हैं। ऐसे लोग मेरे अनुकूल कैसे हो सकते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 296

यीशु के देहधारी होने के सत्य के अस्तित्व में आने के बाद, मनुष्य ने इस बात में विश्वास किया: वह न केवल स्वर्ग का परमेश्वर है, बल्कि वह पुत्र भी है, और यहां तक कि वह आत्मा भी है। यह पारम्परिक धारणा है जिसे मनुष्य धारण किए हुए है कि, एक ऐसा परमेश्वर है जो स्वर्ग में हैः एक त्रित्व जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा है, और ये सभी एक में हैं। सभी मानवों की यही धारणाएं हैं: परमेश्वर केवल एक ही परमेश्वर है, परन्तु उसके तीन भाग हैं, जिसे कष्टदायक रूप से पारंपरिक धारणा में दृढ़ता से जकड़े सभी लोग पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा मानते हैं। केवल यही तीनों संपूर्ण परमेश्वर को बनाते हैं। बिना पवित्र पिता के परमेश्वर संपूर्ण नहीं बनता है। इसी प्रकार से परमेश्वर पुत्र और पवित्र आत्मा के बिना संपूर्ण नहीं है। उनके विचार में वे यह विश्वास करते हैं कि सिर्फ पिता और सिर्फ पुत्र को ही परमेश्वर नहीं माना जा सकता। केवल पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को एक साथ मिलाकर स्वयं सम्पूर्ण परमेश्वर माना जा सकता है। अब, सभी धार्मिक विश्वासी और तुम लोगों में से प्रत्येक अनुयायी भी, इस बात पर विश्वास करता है। फिर भी यह विश्वास सही है कि नहीं इस बात को कोई भी स्पष्ट नहीं कर पाता है, क्योंकि हमेशा तुम सब परमेश्वर के मामले में भ्रम के कोहरे में रहते हो। हालांकि तुम सब नहीं जानते कि ये विचार सही हैं या गलत, क्योंकि तुम धार्मिक विचारों से बुरी तरह से संक्रमित हो गए हो। धार्मिक भावनाओं की परम्परावादी धारणाओं को तुम सबने अत्यधिक गहराई से स्वीकार कर लिया है और यह ज़हर तुम्हारे भीतर बहुत ही गहराई से प्रवेश कर चुका है। इसलिए तुम इस मामले में भी इन हानिकारक प्रभावों के सामने अपना समर्पण कर चुके हो क्योंकि त्रित्व का अस्तित्व है ही नहीं। इसका मतलब यह है कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व मौजूद नहीं है। यह सब मनुष्य की पारम्परिक धारणा है और मनुष्य का भ्रामक विश्वास है। सदियों से मनुष्य इस त्रित्व पर विश्वास करता आ रहा है, यह मनुष्य की बुद्धि की धारणाओं से जन्मी, मनुष्य के द्वारा मनगढ़ंत बातें हैं और मनुष्य के द्वारा पहले कभी भी देखी नहीं गई हैं। इन अनेक वर्षों के दौरान बाइबल के कई प्रतिपादक हुए हैं जिन्होंने त्रित्व का "सही अर्थ" समझाया है, परन्तु त्रित्व के तीन अभिन्न-तत्व वाले व्यक्तित्वों के बारे में इस प्रकार का स्पष्टीकरण, अस्पष्ट और अनिश्चित है और लोग परमेश्वर की "रचना" के बारे में पूरी तरह संभ्रमित हैं। कोई भी महान व्यक्ति कभी भी इसका सम्पूर्ण विवरण प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं हुआ है; अधिकांश स्पष्टीकरण, तर्क के मामलों में और कागज़ पर जायज़ ठहरते हैं, परन्तु किसी भी व्यक्ति को इसके अर्थ की पूरी स्पष्टता से समझ नहीं है। यह इसलिए है क्योंकि यह "महान त्रित्व" जो मनुष्य अपने हृदय में धारण किए हुए है वह अस्तित्व में है ही नहीं। क्योंकि कभी भी किसी ने परमेश्वर के सच्चे स्वरूप को नहीं देखा है या कभी कोई प्राणी इतना भाग्यशाली नहीं हुआ है कि यह देखने के लिए कि परमेश्वर के निवास स्थान में क्या-क्या है परमेश्वर के स्थान तक भेंट करने के लिए पहुंच पाए, ताकि इस बात का निर्धारण कर सके कि "परमेश्वर के भवन" में कितने हज़ारों या लाखों पीढ़ियाँ रहती हैं या यह जांच सके कि परमेश्वर की निहित रचना कितने भागों से निर्मित है। जिसकी मुख्यत: जांच करनी चाहिये वह हैः पिता और पुत्र की आयु, साथ ही साथ पवित्र आत्मा की भी आयु; प्रत्येक व्यक्ति का रूप-रंग; वे कैसे अलग हुए और कैसे वे एक हुए। दुर्भाग्यवश, इन सभी वर्षों में, कोई एक भी मनुष्य इस मामले में सत्य का निर्धारण नहीं कर पाया है। वे बस अनुमान लगाते है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति स्वर्ग में देखने के लिए नहीं गया और न ही सम्पूर्ण मानवजाति के लिए "जांच की रिर्पोट" लेकर वापस आया है ताकि वह इस मामले के सत्य का अभिलेख उन उत्कृष्ट और सच्चे धार्मिक विश्वासियो सौंप सके जो त्रित्व के बारे में चिंतित हैं। निश्चय ही, ऐसे विचार रखने के लिये लोगों को दोष नहीं दिया जा सकताकि, यहोवा पिता ने यीशु पुत्र को मानवजाति की रचना करते समय अपने साथ क्यों नहीं रखा था? यदि, आरम्भ में, सभी कुछ यहोवा के नाम से हुआ होता, तो यह बेहतर होता। यदि दोष देना ही है तो, यह यहोवा परमेश्वर की क्षणिक गलती पर डाला जाना चाहिए, जिसने पुत्र और पवित्र आत्मा को उत्पत्ति के समय अपने सामने नहीं बुलाया था, बल्कि अपना कार्य अकेले ही किया। यदि उन सभी ने एक साथ कार्य किया होता, तो क्या वे एक ही नहीं बन गए होते? यदि, उत्पत्ति से लेकर अंत तक, केवल यहोवा का ही नाम होता और अनुग्रह के काल में यीशु का नाम नहीं होता या तब भी उसे यहोवा ही पुकारा जाता, तो क्या परमेश्वर मानवजाति के इस भेदभाव की यातना से बच नहीं जाता? सच तो यह है कि इन सब के लिए यहोवा को दोषी नहीं ठहराया जा सकता; यदि दोष ही देना है तो, पवित्र आत्मा को देना चाहिए, जो यहोवा, यीशु और यहां तक कि पवित्र आत्मा के नाम से हज़ारों सालों से अपना कार्य करता रहा है और उसने मनुष्य को ऐसा भ्रमित कर दिया है और चकरा दिया है कि वह जान ही नहीं पाया कि असल में परमेश्वर कौन है। यदि स्वयं पवित्र आत्मा ने किसी रूप या प्रतिकृति के बिना कार्य किया होता और इसके अलावा, यीशु जैसे नाम के बिना कार्य किया होता और मनुष्य उसे न देख पाता न छू पाता, केवल गर्जन की आवाज़ को सुन पाता, तो क्या इस प्रकार का कार्य मनुष्यों के लिए और भी अधिक फायदेमंद नहीं होता? तो अब क्या किया जा सकता है? मनुष्य के विचार एकत्रित होकर इस हद तक पर्वत के समान उच्च और समुद्र के समान व्यापक हो गए हैं, कि आज का परमेश्वर उन्हें अब और नहीं सह सकता, और पूरी तरह से उलझन में है। अतीत में जब केवल यहोवा, यीशु और उन दोनों के मध्य में पवित्र आत्मा था, मनुष्य पहले से ही हैरानी में था कि इसका सामना किस प्रकार करे और अब उसमें सर्वशक्तिमान भी जुड़ गया। उसे भी परमेश्वर का एक भाग ही कहा जाता है। कौन जानता है कि वह कौन है और त्रित्व के किस व्यक्तित्व के साथ गुंथा हुआ है, या वह कितने सालों से भीतर छुपा हुआ है? मनुष्य इसे कैसे सह सकता है? पहले तो केवल त्रित्व ही मनुष्य के जीवनभर व्याख्या करने के लिए काफी था, परन्तु अब यहां पर "एक परमेश्वर में चार व्यक्तित्व" हैं। इसकी व्याख्या किस प्रकार से की जा सकती है? क्या तुम इसकी व्याख्या कर सकते हो? भाइयो और बहनो! तुम लोगों ने आज तक इस प्रकार के परमेश्वर पर विश्वास कैसे किया? मैं तुम सबको सलाम करता हूं। त्रित्व ही झेलने के लिए पर्याप्त था, तुम लोग इस एक परमेश्वर के चार रूपों पर और अटूट विश्वास कैसे करते रह सकते थे? तुम्हें इन सब से बाहर निकलने के लिए आग्रह किया गया है, लेकिन तुम इन्कार कर देते हो। समझ में नहीं आता! तुम लोग वास्तव में कुछ और ही हो! एक व्यक्ति इन चार परमेश्वरों पर विश्वास तक कर जाता है और उसमें से कुछ भी समझ नहीं पाता; तुम्हें लगता नहीं कि ये एक चमत्कार है? मैं नहीं कह सकता था कि तुम लोग इस प्रकार के महान चमत्कार करने में सक्षम हो! मैं बताता हूँ कि वास्तव में, ब्रह्माण्ड में कहीं भी त्रित्व का अस्तित्व नहीं है। परमेश्वर के न पिता है और न पुत्र, और इस तथ्य का तो और भी वजूद नहीं है कि पिता और पुत्र संयुक्त तौर पर पवित्र-आत्मा का साधन के रूप में उपयोग करते हैं। यह सब बड़ा भ्रम है और संसार में इसका कोई अस्तित्व नहीं है! परन्तु इस प्रकार के भ्रम का अपना मूल है और यह पूरी तरह से बिना आधार के नहीं है, क्योंकि तुम लोगों की बुद्धि अत्यंत साधारण नहीं है और विचार बिना तर्क के नहीं हैं। बल्कि, वे काफी उपयुक्त और प्रवीण हैं, इतने कि किसी शैतान के द्वारा भी अभेद्य हैं। अफसोस यह है कि ये विचार बिल्कुल भ्रामक हैं और इनका अस्तित्व नहीं है! तुम लोगों ने वास्तविक सत्य को देखा ही नहीं है; तुम लोग केवल अनुमान और धारणाएं बना रहे हो, फिर धोखेबाज़ी से दूसरों का विश्वास प्राप्त करने या बुद्धिहीन या तर्कहीन लोगों पर प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए इन सब को कहानी में पिरो रहे हो, ताकि वे तुम्हारी महान और प्रसिद्ध "विशेषज्ञ शिक्षाओं" पर विश्वास करें। क्या यह सच है? क्या जीवन का यह वो तरीका है जो मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए? यह सब बकवास है! एक शब्द भी उचित नहीं है! इतने सालों में, परमेश्वर तुम लोगों के द्वारा इस प्रकार से विभाजित किया गया है, प्रत्येक पीढ़ी द्वारा इसे इतनी सूक्ष्मता से विभाजित किया गया है कि एक परमेश्वर को बिल्कुल तीन अलग भागों में बांट दिया गया है। और अब मनुष्य के लिए यह पूरी तरह से असम्भव है कि इन तीनों को फिर से एक परमेश्वर बना दिया जाए, क्योंकि तुम लोगों ने उसे बहुत ही सूक्ष्मता से बांट दिया है! यदि मेरा कार्य सही समय पर शुरु ना हो गया होता तो, कहना कठिन है कि तुम इस तरह ढिठाई से कब तक चलते रहते! इस प्रकार से परमेश्वर को विभाजित करते रहने से, वह अब तक कैसे तुम्हारा परमेश्वर बना रह सकता है? क्या तुम लोग अब भी परमेश्वर को पहचान सकते हो? क्या तुम अभी भी उसे अपना पिता स्वीकार करके उसके पास वापस आओगे? यदि मैं थोड़ा और बाद में आता, तो हो सकता है कि तुम लोग "पिता और पुत्र", यहोवा और यीशु को इस्राएल वापस भेज चुके होते और दावा करते कि तुम स्वयं ही परमेश्वर का एक भाग हो। भाग्यवश, अब ये अंत के दिन हैं। अंत में, वह दिन आ गया है जिसकी मैंने बहुत प्रतीक्षा की है, और मेरे अपने हाथों से इस चरण के कार्य को पूर्ण करने के बाद ही तुम लोगों द्वारा स्वयं परमेश्वर को बांटने का कार्य रूका है। यदि यह नहीं होता, तो तुम लोग और भी अधिक आगे बढ़ जाते, यहां तक कि सभी शैतानों को अपने मध्य में आराधना के लिए अपनी मेज़ों पर रख दिया होता। यह तुम सबकी चालाकी है! परमेश्वर को बांटने के तुम्हारे तरीके! क्या तुम सब अभी भी ऐसा ही करोगे? मैं तुमसे पूछता हूं: कितने परमेश्वर हैं? कौन सा परमेश्वर तुम लोगों के लिए उद्धार लाएगा? पहला परमेश्वर, दूसरा या फिर तीसरा जिससे तुम सब हमेशा प्रार्थना करते हो? उनमें से तुम लोग हमेशा किस पर विश्वास करते हो? पिता पर, या फिर पुत्र पर? या फिर आत्मा पर? मुझे बताओ कि तुम किस पर विश्वास करते हो। हालांकि तुम्हारे हर शब्द में परमेश्वर पर विश्वास दिखता है, लेकिन जिस पर वास्तव में तुम लोग विश्वास करते हो वो तुम्हारा मष्तिष्क है। तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं! फिर भी तुम सबके दिमाग में इस प्रकार के कई "त्रित्व" हैं! क्या तुम सब इस बात से सहमत नहीं हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 297

यदि त्रित्व की इस अवधारणा के अनुसार काम के तीन चरणों का मूल्यांकन किया जाता है, तो तीन परमेश्वर होने चाहिए क्योंकि प्रत्येक के द्वारा किए गए काम एकसमान नहीं हैं। यदि तुम लोगों में से कोई भी कहता है कि त्रित्व वास्तव में मौजूद है, तो वह समझाए कि तीन व्यक्तियों में यह एक परमेश्वर क्या है। पवित्र पिता क्या है? पुत्र क्या है? पवित्र आत्मा क्या है? क्या यहोवा पवित्र पिता है? क्या यीशु पुत्र है? फिर पवित्र आत्मा का क्या? क्या पिता एक आत्मा नहीं है? पुत्र का सार भी क्या एक आत्मा नहीं है? क्या यीशु का काम पवित्र आत्मा का काम नहीं था? एक समय आत्मा द्वारा किया गया यहोवा का काम यीशु के काम के ही समान नहीं था? परमेश्वर के पास कितनी आत्माएं हो सकती हैं? तुम्हारे स्पष्टीकरण के अनुसार, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के तीन जन एक हैं; यदि ऐसा है, तो तीन आत्माएं हैं, लेकिन तीन आत्माओं का अर्थ है कि तीन परमेश्वर हैं। इसका मतलब है कि कोई भी एक सच्चा परमेश्वर नहीं है; इस प्रकार के परमेश्वर के पास अभी भी परमेश्वर का निहित पदार्थ कैसे हो सकता है? यदि तुम मानते हो कि केवल एक ही परमेश्वर है, तो उसका एक पुत्र कैसे हो सकता है और वह पिता कैसे बन सकता है? क्या यह सब केवल तुम्हारी धारणाएं नहीं हैं? केवल एक परमेश्वर है, इस परमेश्वर में केवल एक ही व्यक्ति है, और परमेश्वर का केवल एक आत्मा है, वैसा ही जैसा कि बाइबल में लिखा गया है कि "केवल एक पवित्र आत्मा और केवल एक ही परमेश्वर है"। जिस पिता और पुत्र के बारे में तुम बोलते हो वे चाहे अस्तित्व में हों, फिर भी एक ही परमेश्वर है, और पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का सार जिसे तुम सब मानते हो, वह पवित्र आत्मा का सार है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर एक आत्मा है, लेकिन वह देहधारण में और मनुष्यों के बीच रहने के साथ-साथ सभी चीजों से ऊँचा होने में सक्षम है। उसका आत्मा समस्त-समावेशी और सर्वव्यापी है। वह एक ही समय पर देह में हो सकता है और पूरे विश्व में और विश्व के ऊपर हो सकता है। चूंकि सभी लोग कहते हैं कि परमेश्वर एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, फिर एक ही परमेश्वर है, जो किसी की इच्छा पर विभाजित नहीं होता! परमेश्वर केवल एक आत्मा है, और केवल एक ही व्यक्ति है; और वह परमेश्वर का आत्मा है। यदि तुम कहते हो, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, तो क्या वे तीन परमेश्वर नहीं हैं? पवित्र आत्मा एक तत्व है, पुत्र दूसरा है, और पिता एक और है। उनके व्यक्तित्व अलग हैं और उनके सार अलग हैं, तो वे एक इकलौते परमेश्वर का हिस्सा कैसे हो सकते हैं? पवित्र आत्मा एक आत्मा है; यह मनुष्य के लिए समझने में आसान है। यदि ऐसा है तो, पिता और भी अधिक एक आत्मा है। वह पृथ्वी पर कभी नहीं उतरा और कभी भी देह नहीं बना; वह मनुष्यों के दिल में यहोवा परमेश्वर है, और वह निश्चित रूप से एक आत्मा भी है। तो उसके और पवित्र आत्मा के बीच संबंध क्या है? क्या यह पिता और पुत्र के बीच का संबंध है? या यह पवित्र आत्मा और पिता के आत्मा के बीच का रिश्ता है? क्या प्रत्येक आत्मा का सार एकसमान है? या पवित्र आत्मा पिता का एक साधन है? इसे कैसे समझाया जा सकता है? और फिर पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह दो आत्माओं का सम्बन्ध है या एक मनुष्य और आत्मा के बीच का संबंध है? ये सभी ऐसे मामले हैं जिनका कोई स्पष्टीकरण नहीं हो सकता है! यदि वे सभी एक आत्मा हैं, तो तीन व्यक्तियों की कोई बात नहीं हो सकती, क्योंकि वे एक आत्मा के हैं। यदि वे अलग-अलग व्यक्ति होते, तो उनकी आत्मा शक्ति में भिन्न होती, और बस वे एक ही आत्मा नहीं हो सकते थे। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह अवधारणा सबसे बेतुकी है! यह परमेश्वर को खंडित करता और उसे तीन व्यक्तियों में विभाजित करता है, प्रत्येक एक ओहदे और आत्मा के साथ है; तो कैसे वह अब भी एक आत्मा और एक परमेश्वर हो सकता है? मुझे बताओ, आकाश और पृथ्वी, और उसके भीतर की सारी चीज़ें क्या पिता, पुत्र या पवित्र आत्मा के द्वारा बनाई गई थीं? कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने यह सब एक साथ बनाया। फिर किसने मानवजाति को छुड़ाया? क्या यह पवित्र आत्मा था, पुत्र था या पिता? कुछ लोग कहते हैं कि वह पुत्र था जिसने मानवजाति को छुड़ाया था। फिर सार में पुत्र कौन है? क्या वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण नहीं है? एक सृजित आदमी के परिप्रेक्ष्य से वो देहधारी स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाता है। क्या तुम नहीं जानते हो कि यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण से हुआ था? उसके भीतर पवित्र आत्मा है; तुम कुछ भी कहो, वह अभी भी स्वर्ग में परमेश्वर के साथ एकसार है, क्योंकि वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण है। पुत्र का यह विचार असत्य है। यह एक आत्मा है जो सभी काम करता है; केवल परमेश्वर स्वयं, अर्थात, परमेश्वर का आत्मा अपना काम करता है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है जो यीशु में काम करता है? यदि काम पवित्र आत्मा (अर्थात, परमेश्वर का आत्मा) द्वारा नहीं किया गया था, तो क्या उसका काम स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था? जब प्रार्थना करते हुए यीशु ने स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया, तो यह केवल एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से किया गया था, केवल इसलिए कि परमेश्वर के आत्मा ने एक सामान्य और साधारण देह का चोला धारण किया था और उसके पास एक सृजित प्राणी का बाह्य आवरण था। यद्यपि उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा था, उसका बाहरी स्वरूप अभी भी एक सामान्य व्यक्ति का था; दूसरे शब्दों में, वह "मनुष्य का पुत्र" बन गया था, जिसके बारे में स्वयं यीशु समेत सभी मनुष्यों ने बात की थी। यह देखते हुए कि वह मनुष्य का पुत्र कहलाता है, वह एक व्यक्ति है (चाहे पुरुष हो या महिला, किसी भी हाल में एक इंसान के बाहरी कवच के साथ) जो सामान्य लोगों के साधारण परिवार में पैदा हुआ है। इसलिए, यीशु का स्वर्ग में परमेश्वर को पिता बुलाना, वैसा ही था जैसा कि तुम लोगों ने पहले उसे पिता कहा था; उसने सृष्टि के एक व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से ऐसा किया। क्या तुम लोगों को अभी भी प्रभु की प्रार्थना याद है जो यीशु ने तुम्हें याद करने के लिए सिखाई थी? "हे पिता हमारे, जो स्वर्ग में है...।" उसने सभी मनुष्यों से स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाने को कहा। और तब से उसने भी उसे पिता कहा, उसने ऐसा उस व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से किया था जो तुम सभी के साथ समान स्तर पर खड़ा था। चूंकि तुमने पिता के नाम से स्वर्ग में परमेश्वर को बुलाया था, इस से पता चलता है कि यीशु ने स्वयं को तुम सबके साथ समान स्तर पर देखा, और पृथ्वी पर परमेश्वर द्वारा चुने गए व्यक्ति (अर्थात परमेश्वर के पुत्र) के रूप में देखा। यदि तुम लोग परमेश्वर को "पिता" कहते हो, तो क्या यह इसलिए नहीं है कि तुम सब सृजित प्राणी हो? पृथ्वी पर यीशु का अधिकार चाहे जितना भी अधिक हो, क्रूस पर चढ़ने से पहले, वह मात्र मनुष्य का पुत्र था, वह पवित्र आत्मा (अर्थात, परमेश्वर) द्वारा नियंत्रित था, और पृथ्वी के सृजित प्राणियों में से एक था, क्योंकि उसने अभी भी अपना काम पूरा नहीं किया था। इसलिए, स्वर्ग में परमेश्वर को पिता बुलाना पूरी तरह से उसकी विनम्रता और आज्ञाकारिता थी। परमेश्वर (अर्थात, स्वर्ग में आत्मा) को उसका इस प्रकार संबोधन करना हालांकि, यह साबित नहीं करता कि वह स्वर्ग में परमेश्वर के आत्मा का पुत्र है। बल्कि, यह केवल यही है कि उसका दृष्टिकोण अलग है, न कि वह एक अलग व्यक्ति है। अलग व्यक्तियों का अस्तित्व एक मिथ्या है! क्रूस पर चढ़ने से पहले, यीशु मनुष्य का पुत्र था जो शरीर की सीमाओं से बंधा था, और उसके पास पूरी तरह से आत्मा का अधिकार नहीं था। यही कारण है कि वह केवल एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की इच्छा तलाश सकता था। यह वैसा ही है जैसा गेथसमनी में उसने तीन बार प्रार्थना की थी: "जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।" क्रूस पर रखे जाने से पहले, वह बस यहूदियों का राजा था; वह मसीह, मनुष्य का पुत्र था, और महिमा का शरीर नहीं था। यही कारण है कि, एक सृजित प्राणी के दृष्टिकोण से, उसने परमेश्वर को पिता बुलाया। अब, तुम यह नहीं कह सकते कि जो लोग परमेश्वर को पिता बुलाते हैं, वे पुत्र हैं। यदि ऐसा होता, तो क्या यीशु द्वारा प्रभु की प्रार्थना सिखाए जाने के बाद, क्या तुम सभी पुत्र नहीं बन गए होते? यदि तुम लोग अभी भी आश्वस्त नहीं हो, तो मुझे बताओ, वह कौन है जिसे तुम सब पिता कहते हो? यदि तुम लोग यीशु की बात कर रहे हो, तो तुम सबके लिए यीशु का पिता कौन है? एक बार जब यीशु चला गया, तो पिता और पुत्र का यह विचार अब और नहीं रहा। यह विचार केवल उन वर्षों के लिए उपयुक्त था जब यीशु देह बना था; अन्य सभी परिस्थितियों में, जब तुम परमेश्वर को पिता कहते हो तो यह रिश्ता वह है जो सृष्टि के परमेश्वर और सृजित प्राणी के बीच होता है। ऐसा कोई समय नहीं है जिस पर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व खड़ा रह सकता है; यह एक मिथ्या है जो युगों तक शायद ही कभी समझा गया है और अस्तित्व में नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 298

यह अधिकांश लोगों को उत्पत्ति से परमेश्वर के वचनों को याद दिला सकता है: "हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ।" यह देखते हुए कि परमेश्वर कहता है, "हम" मनुष्य को "अपनी" छवि में बनाएँ, तो "हम" इंगित करता है दो या अधिक; चूंकि उसने "हम" कहा, फिर सिर्फ एक ही परमेश्वर नहीं है। इस तरह, मनुष्य ने अलग व्यक्तियों की कल्पना पर विचार करना शुरू कर दिया, और इन वचनों से पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का विचार उभरा। तो फिर पिता कैसा है? पुत्र कैसा है? और पवित्र आत्मा कैसा है? क्या संभवत: यह हो सकता है कि आज की मानवजाति एक ऐसी छवि में बनाई गई थी, जो तीनों से मिलकर बनती है? तो मनुष्य की छवि क्या पिता की तरह है, या पुत्र की तरह या पवित्र आत्मा की तरह है? मनुष्य परमेश्वर के किस जन की छवि है? मनुष्य का यह विचार बिल्कुल ग़लत और अतर्कसंगत है! यह केवल एक परमेश्वर को कई परमेश्वरों में विभाजित कर सकता है। जिस समय मूसा ने उत्पत्ति ग्रन्थ लिखा था, उस समय दुनिया के सृजन के बाद मानव जाति का सृजन हो चुका था। बिल्कुल शुरुआत में, जब दुनिया शुरू हुई, तो मूसा मौजूद नहीं था। और मूसा ने बहुत बाद में बाइबल लिखी, तो वह यह कैसे जान सकता था कि स्वर्ग में परमेश्वर ने क्या बात की? उसे ज़रा भी भान नहीं था कि परमेश्वर ने कैसे दुनिया बनायी। बाइबिल के पुराने नियम में, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का उल्लेख नहीं है, केवल एक ही सच्चे परमेश्वर यहोवा का है, जो इस्राएल में अपने काम को पूरा करता है। उसे जैसे जैसे युग बदलता है उसके अनुसार अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है, लेकिन यह साबित नहीं कर सकता कि प्रत्येक नाम एक अलग व्यक्ति को दर्शाता है। यदि ऐसा होता तो, क्या परमेश्वर में असंख्य व्यक्ति नहीं होते? पुराने नियम में जो लिखा है, वह यहोवा का काम है, व्यवस्था के युग की शुरुआत के लिए स्वयं परमेश्वर के कार्य का चरण है। यह परमेश्वर का काम था, जहां जैसा उसने कहा, वह हुआ, और जैसा उसने आज्ञा दी, वैसा खड़ा हुआ। यहोवा ने कभी नहीं कहा कि वह पिता है जो काम करने के लिए आया है, या उसने कभी पुत्र के मानव जाति के उद्धार के लिए आने कि भविष्यवाणी नहीं की। जब यीशु के समय की बात आई, तो केवल यह कहा गया कि परमेश्वर सभी मनुष्यों को छुड़ाने के लिए देह बन गया, न कि यह कि पुत्र आया है। चूंकि युग एक जैसे नहीं होते और जो काम परमेश्वर खुद करता है, वह भी अलग होता है, उसे अपने काम को अलग राज्यों में पूरा करना होता है। इस तरह, वह पहचान भी अलग होती है जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का मानना है कि यहोवा यीशु का पिता है, लेकिन यह वास्तव में यीशु ने स्वीकार नहीं किया था, जिसने कहा: "हम पिता और पुत्र के रूप में कभी भी अलग नहीं थे; मैं और स्वर्ग में पिता एक हैं। पिता मुझ में है और मैं पिता में हूं; जब मनुष्य पुत्र को देखता है, तो वह स्वर्गीय पिता को देखता है।" यह सब कहे जाने के बाद, पिता हो या पुत्र हो, वे एक आत्मा हैं, अलग-अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं हैं। एक बार जब मनुष्य समझाने की कोशिश करता है, तो अलग-अलग व्यक्तियों के विचार के साथ मामला जटिल हो जाता है, साथ ही पिता, पुत्र और आत्मा के बीच का संबंध भी। जब मनुष्य अलग-अलग व्यक्तियों के बारे में बोलता है, तो क्या यह परमेश्वर को मूर्तरूप नहीं देता? मनुष्य व्यक्तियों को पहले, दूसरे और तीसरे के रूप में स्थान भी देता है; ये सभी बस मनुष्य की अवधारणा हैं, संदर्भ के योग्य नहीं हैं, और बिल्कुल अवास्तविक है! यदि तुम ने उससे पूछा: "कितने परमेश्वर हैं?" वह कहेगा कि परमेश्वर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व है: एक सच्चा परमेश्वर। यदि तुम ने फिर से पूछा: "पिता कौन है?" वह कहेगा: "पिता स्वर्ग में परमेश्वर का आत्मा है; वह सब का प्रभारी है, और स्वर्ग का स्वामी है।" "तो क्या आत्मा यहोवा है?" वह कहेगा: "हाँ!" यदि तुम ने फिर उससे पूछा, "पुत्र कौन है?" तो वह कहेगा कि निश्चित रूप से यीशु पुत्र है। "तो यीशु की कहानी क्या है? वह कहाँ से आया था?" वह कहेगा: "यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा मरियम के गर्भधारण करने से हुआ था।" "तो क्या उसका सार भी आत्मा नहीं है? क्या उसका काम भी पवित्र आत्मा का प्रतिनिधि नहीं है? यहोवा आत्मा है, और उसी तरह यीशु का सार भी आत्मा है। अब आखिरी दिनों में, यह कहना अनावश्यक है कि अभी भी काम आत्मा कर रहा है; वे अलग-अलग व्यक्ति कैसे हो सकते हैं? क्या यह सिर्फ परमेश्वर का आत्मा नहीं जो आत्मा के काम को अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों से कर रहा है?" ऐसे तो, व्यक्तियों के बीच कोई अंतर नहीं है। यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, और निस्संदेह, उसका काम बिल्कुल पवित्र आत्मा का काम था। यहोवा द्वारा किए गए काम के पहले चरण में, वह न तो देह बना और न ही मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। तो मनुष्य ने कभी उसके प्रकटन को नहीं देखा। कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कितना महान और कितना ऊंचा था, वह फिर भी आत्मा था, स्वयं परमेश्वर जिसने पहले मनुष्य को बनाया था। अर्थात, वह परमेश्वर का आत्मा था। जब वह बादलों में से मनुष्य से बात करता था, वह केवल एक आत्मा था। किसी ने भी उसके प्रकटन को नहीं देखा; केवल अनुग्रह के युग में जब परमेश्वर का आत्मा शरीर में आया और यहूदिया में देहधारी हुआ, तो मनुष्य ने पहली बार एक यहूदी के रूप में देहधारण की छवि को देखा। यहोवा की भावना को महसूस नहीं किया जा सका। हालांकि, वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था, अर्थात स्वयं यहोवा के आत्मा से गर्भ में आया था, और यीशु का जन्म तब भी परमेश्वर के आत्मा के मूर्तरूप में हुआ था। मनुष्य ने जो सबसे पहले देखा वह यह था कि पवित्र आत्मा यीशु पर एक कबूतर की तरह उतर रहा है; यह यीशु के लिए विशेष आत्मा नहीं था, बल्कि पवित्र आत्मा था। तो क्या यीशु का आत्मा पवित्र आत्मा से अलग हो सकता है? अगर यीशु यीशु है, पुत्र है, और पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है, तो वे एक कैसे हो सकते हैं? यदि ऐसा है तो काम नहीं किया जा सकता है। यीशु के भीतर का आत्मा, स्वर्ग में आत्मा, और यहोवा का आत्मा सब एक हैं। इसे पवित्र आत्मा, परमेश्वर का आत्मा, सात गुना सशक्त आत्मा और सर्व सयुंक्त आत्मा कहा जा सकता है। परमेश्वर का आत्मा बहुत से काम कर सकता है। वह दुनिया को बनाने और पृथ्वी को बाढ़ द्वारा नष्ट करने में सक्षम है; वह सारी मानव जाति को मुक्ति दिला सकता है, और इसके अलावा, सारी मानव जाति को जीत और नष्ट कर सकता है। ये सारे काम स्वयं परमेश्वर द्वारा किये गए हैं और उसके स्थान पर परमेश्वर के किसी भी अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता था। उसके आत्मा को यहोवा और यीशु के नाम से, साथ ही सर्वशक्तिमान के नाम से भी बुलाया जा सकता है। वह प्रभु और मसीह है। वह मनुष्य का पुत्र भी बन सकता है। वह स्वर्ग में भी है और पृथ्वी पर भी है; वह ब्रह्मांडों के ऊपर और भीड़ के बीच में है। वह स्वर्ग और पृथ्वी का एकमात्र स्वामी है! सृष्टि के समय से अब तक, यह काम खुद परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया गया है। यह कार्य स्वर्ग में हो या देह में, सब कुछ उसकी आत्मा से किया जाता है। सभी प्राणी, चाहे स्वर्ग में हों या पृथ्वी पर, उसकी सर्वशक्तिमान हथेली में हैं; यह सब स्वयं परमेश्वर का काम है और उसके स्थान पर किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। स्वर्ग में, वह आत्मा है, लेकिन खुद परमेश्वर भी है; मनुष्यों के बीच में, वह शरीर है लेकिन वह स्वयं परमेश्वर बना रहता है। यद्यपि उसे हज़ारों हज़ार नामों से बुलाया जाता है, तो भी वह स्वयं है, और सारे काम उसके आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं। उसके क्रूसीकरण के माध्यम से सारी मानव जाति का छुटकारा उसके आत्मा का प्रत्यक्ष काम था, और वैसे ही अंत के दिनों के दौरान सभी देशों और सभी भू भागों के लिए उसकी घोषणा भी। हर समय, परमेश्वर को केवल सर्वशक्तिमान और एक सच्चा परमेश्वर, सभी समावेशी स्वयं परमेश्वर कहा जा सकता है। अलग-अलग व्यक्ति अस्तित्व में नहीं हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का यह विचार तो बिल्कुल नहीं है! स्वर्ग और पृथ्वी में केवल एक ही परमेश्वर है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?' से उद्धृत

परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 299

परमेश्वर की प्रबंधन योजना छह हजार वर्षों तक फैली है और उसके काम में अंतर के आधार पर तीन युगों में विभाजित है: पहला युग पुराने नियम का व्यवस्था का युग है; दूसरा अनुग्रह का युग है; और तीसरा वह है जो कि अंत के दिनों से संबंधित है—राज्य का युग। प्रत्येक युग में एक अलग पहचान को दर्शाया जाता है। यह केवल काम में अंतर के कारण है, अर्थात, काम की आवश्यकताएं। व्यवस्था के युग के दौरान, काम का पहला चरण इस्राएल में किया गया था, और यहूदिया में छुटकारे के काम का समापन करने का दूसरा चरण पूरा किया गया था। छुटकारे के काम के लिए, यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण से और एकमात्र पुत्र के रूप में हुआ था। यह सब काम की आवश्यकताओं के कारण था। अंत के दिनों में, परमेश्वर अपने काम को अन्यजातियों के राष्ट्रों में विस्तारित करना और वहाँ के लोगों पर विजय प्राप्त करना चाहता है ताकि उसका नाम उनके बीच महान हो। वह सम्पूर्ण सत्य को समझने और उसमें प्रवेश करने मे मनुष्य का मार्गदर्शन करना चाहता है। यह सब काम एक आत्मा द्वारा किया जाता है। वह अलग-अलग दृष्टिकोण से ऐसा करे तो भी, काम की प्रकृति और सिद्धांत एक समान रहते हैं। एक बार जब तुम उन कामों के सिद्धांतों और प्रकृति को देखते हो, जो उन्होंने किया है, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि यह सब एक आत्मा के द्वारा किया जाता है। फिर भी कुछ लोग कह सकते हैं: "पिता पिता है; पुत्र पुत्र है; पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है, और अंत में, वे एक बनेंगे।" तो तुम उन्हें एक कैसे बना सकते हो? पिता और पवित्र आत्मा को एक कैसे बनाया जा सकता है? यदि वे मूल रूप से दो थे, तो चाहे वे एक साथ कैसे भी जोड़ें जायें, क्या वे दो हिस्से नहीं बने रहेंगे? जब तुम उन्हें एक बनाने को कहते हो, तो क्या यह बस दो अलग हिस्सों को जोड़कर एक बनाना नहीं है? लेकिन क्या वे पूरे किए जाने से पहले वे दो भाग नहीं थे? प्रत्येक आत्मा का एक विशिष्ट सार होता है, और दो आत्माएं एक नहीं बन सकती हैं। आत्मा भौतिक वस्तु नहीं है और भौतिक दुनिया की किसी भी अन्य वस्तु के समान नहीं है। जैसे मनुष्य इसे देखते हैं, पिता एक आत्मा है, बेटा दूसरा, और पवित्र आत्मा एक और, फिर तीन आत्माएं एक साथ पूरे तीन गिलास पानी की तरह मिल कर पूरा एक बनते हैं। क्या यह तीन को एक बनाना नहीं है? यह एक शुद्ध रूप से गलत व्याख्या है! क्या यह परमेश्वर को विभाजित करना नहीं है? पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी को एक कैसे बनाया जा सकता है? क्या वे विभिन्न प्रकृति के तीन भाग नहीं हैं? अभी भी ऐसे लोग हैं जो कहते हैं, "क्या परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि यीशु उसका प्रिय पुत्र है?" यीशु परमेश्वर का प्रिय पुत्र है, जिस पर वह प्रसन्न है—यह निश्चित रूप से परमेश्वर ने स्वयं ही कहा था। यह परमेश्वर की स्वयं के लिए गवाही थी, लेकिन केवल एक अलग परिप्रेक्ष्य से, स्वर्ग में आत्मा के अपने स्वयं के देहधारण को साक्ष्य देना। यीशु उसका देहधारण है, स्वर्ग में उसका पुत्र नहीं। क्या तुम समझते हो? यीशु के वचन, "मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है," क्या यह संकेत नहीं देते कि वे एक आत्मा हैं? और यह देहधारण के कारण नहीं है कि वे स्वर्ग और पृथ्वी के बीच अलग हो गए थे? वास्तव में, वे अभी भी एक हैं; चाहे कुछ भी हो, यह केवल परमेश्वर की स्वयं के लिए गवाही है। युग में परिवर्तन, काम की आवश्यकताओं, और उसके प्रबंधन योजना के विभिन्न चरणों के कारण, जिस नाम से मनुष्य उसे बुलाता है वह भी अलग हो जाता है। जब वह काम के पहले चरण को करने के लिए आया था, तो उसे केवल यहोवा, इस्राएलियों का चरवाहा ही कहा जा सकता था। दूसरे चरण में, देहधारी परमेश्वर को केवल प्रभु और मसीह कहा जा सकता था। परन्तु उस समय, स्वर्ग में आत्मा ने केवल यह बताया था कि वह परमेश्वर का प्यारा पुत्र है, और उसने परमेश्वर का एकमात्र पुत्र होने का उल्लेख नहीं किया था। ऐसा हुआ ही नहीं था। परमेश्वर की एकमात्र सन्तान कैसे हो सकती है? तो क्या परमेश्वर मनुष्य नहीं बनता? क्योंकि वह देहधारण था, उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा गया, और इस से, पिता और पुत्र के बीच का संबंध आया। यह बस स्वर्ग और पृथ्वी के बीच जो विभाजन है उसके कारण हुआ। यीशु ने देह के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना की। चूंकि उसने इस तरह की सामान्य मानवता के देह को धारण किया था, यह उस देह के परिप्रेक्ष्य से है जो उसने कहा: मेरा बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का है। चूंकि मैंने इस धरती पर आने के लिए देह धारण किया है, अब मैं स्वर्ग से बहुत दूर हूँ। इस कारण से, वह केवल पिता परमेश्वर के सामने देह के परिप्रेक्ष्य से ही प्रार्थना कर सकता था। यह उसका कर्तव्य था, और जो परमेश्वर के देहधारी आत्मा में होना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि वह परमेश्वर नहीं है क्योंकि वह देह के दृष्टिकोण से पिता से प्रार्थना करता है। यद्यपि उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा जाता है, वह अभी भी परमेश्वर है, क्योंकि वह आत्मा का देहधारण है, और उसका सार अब भी आत्मा है। जैसे ही मनुष्य इसे देखता है, वह सोचता है कि वह क्यों प्रार्थना करता है यदि वह खुद परमेश्वर है। इसका कारण यह है कि वह देहधारी परमेश्वर, देह के भीतर रह रहा परमेश्वर है, और स्वर्ग में आत्मा नहीं है। जैसे मनुष्य इसे देखता है, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी परमेश्वर हैं। केवल तीनों से एक बनने वाला ही सच्चा परमेश्वर समझा जा सकता है, और इस तरह, उनकी शक्ति असाधारण रूप से महान है। अभी भी ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि केवल इस तरह से वह सात गुना सशक्त आत्मा है। जब पुत्र ने अपने आने के बाद प्रार्थना की, तो वह आत्मा है जिससे उसने प्रार्थना की थी। वास्तव में, वह एक सृजित प्राणी होने के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना कर रहा था। क्योंकि शरीर संपूर्ण नहीं है, वह संपूर्ण नहीं था और जब वह शरीर में आया तो उसमें कई कमजोरियां थीं, और वह देह में अपना कार्य करते हुए बहुत परेशान था। यही कारण है कि उसने अपने क्रूस पर चढ़ने से पहले पिता से तीन बार प्रार्थना की और साथ ही उससे पहले भी कई बार प्रार्थना की थी। उसने अपने शिष्यों के बीच प्रार्थना की; अकेले एक पहाड़ पर प्रार्थना की; उसने मछली पकड़ने वाली नाव पर सवार होकर प्रार्थना की; उसने कई लोगों के बीच प्रार्थना की; रोटी तोड़ते वक्त प्रार्थना की; और दूसरों को आशीष देते समय उसने प्रार्थना की। उसने ऐसा क्यों किया? वह आत्मा था जिससे उसने प्रार्थना की थी; वह आत्मा से प्रार्थना कर रहा था, स्वर्ग में परमेश्वर से, देह के परिप्रेक्ष्य से। इसलिए, मनुष्य के दृष्टिकोण से, यीशु काम के उस चरण में पुत्र बन गया। इस चरण में, हालांकि, वह प्रार्थना नहीं करता है। ऐसा क्यों है? इसका कारण है कि वह जो लाता है वह वचन का काम है, और वचन का न्याय और ताड़ना है। उसे प्रार्थना की कोई आवश्यकता नहीं है, और उसकी सेवकाई को बोलना है। वह क्रूस पर नहीं चढ़ाया जाता है, और लोग उसे उन्हें नहीं सौंपते जो सत्ता में हैं। वह केवल अपना काम करता है और सब कुछ सही हो जाता है। जिस वक्त यीशु ने प्रार्थना की, तो वह स्वर्ग के राज्य के अवतरित होने के लिए, पिता की इच्छा पूरी होने के लिए और आने वाले काम के लिए पिता परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा था। इस चरण में, स्वर्ग का राज्य पहले ही उतर चुका है, तो क्या उसे अब भी प्रार्थना करने की ज़रूरत है? उसका काम युग खत्म करने का है, और अब कोई नया युग नहीं है, इसलिए क्या अगले चरण के लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता है? अफ़सोस कि ऐसा नहीं है!

मनुष्य के स्पष्टीकरण में कई विरोधाभास हैं। अवश्य, ये सभी मनुष्य के विचार हैं; बिना और किसी जाँच-पड़ताल के, तुम सभी को विश्वास होगा कि वे सही हैं। क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर का त्रित्व के रूप में यह विचार मनुष्य की धारणा है? मनुष्य का कोई ज्ञान पूरा और संपूर्ण नहीं है। हमेशा अशुद्धियां होती हैं, और मनुष्य के पास बहुत अधिक विचार हैं; यह दर्शाता है कि एक सृजन किया गया प्राणी, परमेश्वर के काम की व्याख्या कर ही नहीं सकता है। मनुष्य के मन में बहुत कुछ है, सभी तर्क और विचार से आते हैं, जो सत्य के साथ संघर्ष करते हैं। क्या तुम्हारा तर्क परमेश्वर के काम का पूरी तरह से विश्लेषण कर सकता है? क्या तुम यहोवा के सभी कामों की समझ पा सकते हो? क्या यह तुम एक मानव हो कर सब कुछ देख सकते हो, या वह स्वयं परमेश्वर है जो अनन्त से अनन्त तक देखने में सक्षम है? क्या यह तुम हो जो बीते अनंत काल से आने वाले अनंत काल तक देख सकता है, या यह परमेश्वर है जो ऐसा कर सकता है? तुम्हारा क्या कहना है? परमेश्वर की व्याख्या करने के लिए तुम कैसे योग्य हो? तुम्हारे स्पष्टीकरण का आधार क्या है? क्या तुम परमेश्वर हो? स्वर्ग और पृथ्वी, और इसमें सब कुछ स्वयं परमेश्वर द्वारा बनाई गई थी। यह तुम नहीं थे, जिसने यह किया था, तो तुम गलत स्पष्टीकरण क्यों दे रहे हो? अब, क्या तुम त्रित्व में विश्वास करते रहोगे? क्या तुम्हें नहीं लगता कि यह बहुत भारी है? यह तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा कि तुम एक परमेश्वर में विश्वास करो, न कि तीन में। हल्का होना सबसे अच्छा है, क्योंकि "प्रभु का भार हल्का है।"

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या त्रित्व का अस्तित्व है?' से उद्धृत

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