133 हर युग में नया कार्य करता है परमेश्वर

1 युगों के गुज़रने के अनुसार परमेश्वर मनुष्य को अपना अंतर्निहित, विशेष स्वभाव—अपना स्वरूप—प्रकट करता है; एक अकेले युग का कार्य परमेश्वर के समग्र स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकता है। और इसलिए, "परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है" वचन उसके कार्य के संदर्भ में हैं, और "परमेश्वर अपरिवर्तशील है" वचन उस संदर्भ में हैं जो परमेश्वर का अंतर्निहित स्वरूप है। परमेश्वर इतना सरल नहीं है जितना मनुष्य कल्पना करता है, और उसका कार्य किसी एक युग में नहीं रुका रह सकता है। उदाहरण के लिए, यहोवा हमेशा परमेश्वर के नाम के लिए नहीं हो सकता है; परमेश्वर यीशु के नाम के तहत भी अपना कार्य कर सकता है। यह एक संकेत है कि परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे की ओर प्रगति करते हुए बढ़ रहा है।

2 परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर की चमत्कारिकता, परमेश्वर की धार्मिकता, और परमेश्वर का प्रताप कभी नहीं बदलेंगे। उसका सार और उसका स्वरूप कभी नहीं बदलेगा। जहाँ तक उसके कार्य की बात है, हालाँकि, यह हमेशा आगे की ओर प्रगति कर रहा है, हमेशा गहरा होता जा रहा है, क्योंकि वह हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है। हर युग में परमेश्वर एक नया नाम अपनाता है, हर युग में वह नया कार्य करता है, और हर युग में वह अपने प्राणियों को अपनी नई इच्छा और नए स्वभाव को देखने देता है। यदि लोग नए युग में परमेश्वर के नए स्वभाव की अभिव्यक्ति को देखने में असफल रहते हैं, तो क्या वे उसे हमेशा के लिए सलीब पर नहीं ठोंक देंगे? और ऐसा करके, क्या वे परमेश्वर को परिभाषित नहीं करेंगे?

3 इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छः-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना के अंत तक पहुँचने के लिए, इसे आगे की दिशा में प्रगति अवश्य करते रहना चाहिए। प्रत्येक दिन उसे नया कार्य अवश्य करना चाहिए, प्रत्येक वर्ष उसे नया कार्य अवश्य करना चाहिए; उसे नए मार्गों को अवश्य खोलना चाहिए, नए युगों का आरंभ अवश्य करना चाहिए, अवश्य नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए और इनके साथ, नए नाम और नया कार्य लाना चाहिए। हर क्षण परमेश्वर का आत्मा नया कार्य कर रहा है, कभी भी पुराने तरीकों और विनियमों से चिपका नहीं रहता है। न ही उसका कार्य कभी रुका है है, बल्कि हर गुज़रते पल के साथ होता रहता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से रूपांतरित

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अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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