क्या त्रित्व का विचार तर्कसंगत है?
जबसे देहधारी प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग का कार्य किया, तबसे 2000 साल तक, ईसाइयत ने एक सच्चे परमेश्वर को “त्रित्व” के रूप में परिभाषित...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
अंत के दिनों में, प्रभु यीशु देहधारण करके लौट आए हैं और सत्य के करोड़ों वचनों को व्यक्त किया है, और “परमेश्वर के घर से न्याय का कार्य” किया है। सभी देशों और सभी स्थानों के वे लोग जो परमेश्वर के प्रकट होने की लालसा रखते हैं, उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए वचनों को पढ़ा है और सभी ने उन्हें परमेश्वर की वाणी के रूप में पहचाना है। एक के बाद एक, वे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आए हैं। मसीह के न्याय के आसन के सामने के अनुभव के माध्यम से, उनका भ्रष्ट स्वभाव कुछ हद तक शुद्ध हो गया है। हालाँकि, धार्मिक जगत में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह देखते हुए कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इतने सारे सत्य व्यक्त किए हैं, फिर भी उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। वे सोचते हैं, “प्रभु यीशु ने कहा था : ‘जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है’ (यूहन्ना 3:36)। प्रभु यीशु मनुष्य का पुत्र है, वह मसीह है और उसका मार्ग अनन्त जीवन का मार्ग है। हम मानते हैं कि जब तक हम प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, हम अनन्त जीवन प्राप्त कर सकते हैं। हमें सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास क्यों करना चाहिए? क्या आप कह रहे हैं कि भले ही हम प्रभु यीशु में विश्वास करते हैं, हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते? यह असंभव है। प्रभु हमें नहीं छोड़ेगा।” क्या यह दृष्टिकोण सही है?
यह सच है कि प्रभु यीशु ने कहा था : “जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है,” लेकिन उसने यह भी कहा था : “मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। इससे प्रभु यीशु का क्या मतलब था? इसका मतलब है कि केवल अनुग्रह के युग के यीशु में विश्वास करना ही काफी नहीं है। सबसे अहम बात यीशु की वापसी में विश्वास करना है, प्रभु यीशु के दूसरे आगमन में विश्वास करना है और यह विश्वास करना है कि सत्य का आत्मा मनुष्य को सभी सत्य में मार्गदर्शन करने के लिए आया है। यही सबसे अहम है। इसलिए, हम निश्चित हो सकते हैं कि प्रभु यीशु के वचनों, “जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है,” को इस तरह समझा जा सकता है : “पुत्र पर विश्वास करने” का अर्थ केवल प्रभु यीशु में विश्वास करना नहीं है, बल्कि उस मनुष्य के पुत्र में भी विश्वास करना है जो अंत के दिनों में लौटता है। इसका अर्थ अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्यों में विश्वास करना है। केवल इसी तरह हम अनन्त जीवन प्राप्त कर सकते हैं। यदि हम केवल अनुग्रह के युग के प्रभु यीशु के नाम में विश्वास करते हैं, तो हमारे लिए अनन्त जीवन प्राप्त करना असंभव होगा। क्योंकि अनुग्रह के युग में, प्रभु यीशु ने केवल छुटकारे का कार्य किया; उसने न्याय का कार्य नहीं किया। इसलिए, अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु में विश्वास करने से लोगों ने जो हासिल किया वह बहुत सीमित था। हम सभी जानते हैं कि अनुग्रह के युग के पिछले दो हजार वर्षों में, भले ही प्रभु के सभी विश्वासियों के पाप क्षमा कर दिए गए हैं, फिर भी वे दिन में पाप करने और रात में कबूल करने के अंतहीन चक्र में जीते हैं। चाहे वे अपनी देह को वश में करने की कितनी भी कोशिश करें, वे पाप के बंधन से मुक्त नहीं हो सकते। क्या यह तथ्य नहीं है? कोई भी यह नहीं समझ पाया है कि ऐसा क्यों है, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इस मामले को पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है।
सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यूँ तो यीशु मनुष्यों के बीच आया और उसने बहुत-सा कार्य किया, फिर भी उसने केवल समस्त मानवजाति के छुटकारे का कार्य पूरा किया और मनुष्य की पाप-बलि के रूप में काम किया; उसने मनुष्य को उसके समस्त भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त नहीं किया। मनुष्य को शैतान के प्रभाव से पूरी तरह बचाने के लिए केवल यीशु का पाप-बलि बनना और मनुष्य के पापों को वहन करना ही आवश्यक नहीं था, बल्कि मनुष्य को शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए उसके स्वभाव से पूरी तरह छुटकारा दिलाने के लिए परमेश्वर को और भी बड़ा कार्य करना आवश्यक था। और इसलिए मनुष्य को उसके पापों के लिए क्षमा कर दिए जाने के बाद परमेश्वर देह में लौटा कि उसे नए युग में ले जाए और उसने ताड़ना एवं न्याय का कार्य आरंभ कर दिया। यह कार्य मनुष्य को एक उच्चतर क्षेत्र में ले आया है। वे सब जो परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन समर्पण करेंगे, उच्चतर सत्य का आनंद लेंगे और अधिक बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे वास्तव में प्रकाश में जिएँगे और सत्य, मार्ग और जीवन प्राप्त करेंगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)। “तुम सिर्फ यह जानते हो कि यीशु अंत के दिनों में उतरेगा, परन्तु वह वास्तव में कैसे उतरेगा? तुम लोगों जैसा कोई पापी, जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है और जो बदलाव या परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने से होकर नहीं गुजरा है—क्या तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकते हो? तुम्हारे लिए, तुम जो कि अभी भी अपने पुराने स्वरूप वाले हो, यह सच है कि तुम्हें यीशु के द्वारा बचाया गया था, और परमेश्वर के उद्धार की वजह से अब तुम पाप के नहीं हो, परंतु इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम पाप या अशुद्धता से रहित हो। यदि तुम बदलाव से होकर नहीं गुजरे हो तो तुम पावनीकृत कैसे हो सकते हो? भीतर से, तुम अशुद्धताओं से भरे हुए हो और तुम स्वार्थी और नीच हो, मगर तब भी तुम यीशु के साथ उतरना चाहते हो—वाह रे तुम्हारी किस्मत! तुम परमेश्वर पर अपने विश्वास में एक कदम चूक गए हो; तुम्हें मात्र छुटकारा दिया गया है, परंतु तुम बदलाव से होकर नहीं गुजरे हो। तुम्हें परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने के लिए परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से तुम्हें परिवर्तित और शुद्ध करने का कार्य करना होगा; वरना तुम्हें केवल छुटकारा मिला होगा और तुम किसी भी तरह से पावनीकृत नहीं हो सकते। उस स्थिति में तुम परमेश्वर के साथ अद्भुत आशीषों का आनंद लेने के अयोग्य होते हो, क्योंकि तुम मनुष्य का प्रबंधन करने के परमेश्वर के कार्य से एक कदम पीछे छूट गए हो, जो कि मनुष्य को परिवर्तित करने और पूर्ण बनाने का महत्वपूर्ण कदम है। इसलिए तुम, एक पापी जिसे अभी-अभी छुटकारा दिया गया है, परमेश्वर की विरासत को सीधे तौर पर प्राप्त करने के लायक नहीं हो” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पदवियों और पहचान के संबंध में)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। जो लोग केवल प्रभु यीशु के छुटकारे के कार्य को स्वीकार करते हैं, उनके पाप केवल क्षमा किए गए हैं; उन्हें उनके पापों से शुद्ध और पावनीकृत नहीं किया गया है। वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकते और निश्चित रूप से अनन्त जीवन पाने के योग्य नहीं हैं। हमारी आस्था में अनन्त जीवन पाने के लिए, हमें अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना होगा। केवल पाप से शुद्ध होकर, अधिक सत्य को समझकर और उच्चतर सत्य प्राप्त करके ही हम प्रकाश में रह सकते हैं और परमेश्वर के वादों को प्राप्त करने के योग्य हो सकते हैं। तो लोग केवल प्रभु यीशु में विश्वास करके अनन्त जीवन नहीं प्राप्त कर सकते। उन्हें प्रभु यीशु की वापसी का स्वागत करना होगा, सर्वशक्तिमान परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सभी सत्यों को स्वीकार करना होगा, अपनी पापी प्रकृति का समाधान करना होगा और स्वभाव में बदलाव लाने के लिए अपने पापों से शुद्ध होना होगा। केवल तभी वे अनन्त जीवन प्राप्त कर सकते हैं। जो कोई भी यह देखता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने इतने सारे सत्य व्यक्त किए हैं लेकिन उन्हें स्वीकार करने से इनकार करता है, वह निश्चित रूप से ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से विमुख है और सत्य से नफरत करता है। इन लोगों को परमेश्वर द्वारा त्याग दिया जाएगा और हटा दिया जाएगा और वे आपदाओं में गिर जाएँगे। इसीलिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मैं तुम लोगों को यह बताता हूँ : जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते, फिर भी अंधों की तरह श्वेत बादलों पर यीशु के आगमन का इंतजार करते हैं, वे निश्चित रूप से वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा की ईश-निंदा करते हैं और ये वो वर्ग है जो निश्चित तौर पर नष्ट कर दिया जाएगा। तुम लोग सिर्फ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो और सिर्फ स्वर्ग के सुखद क्षेत्र का आनंद लेना चाहते हो, तुमने यीशु के कहे वचनों का कभी पालन नहीं किया और जब यीशु देह में लौटता है तो उसके द्वारा व्यक्त किए गए सत्य को तुमने कभी नहीं स्वीकारा। यीशु के एक श्वेत बादल पर लौटने के तथ्य के बदले तुम लोग क्या दोगे? क्या वही ईमान दोगे, जिससे तुम लोग बार-बार पाप करते हो और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? श्वेत बादल पर लौटने वाले यीशु को तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या ये कार्य के कई वर्षों की वह पूँजी है, जिसके जरिए तुम अपनी बड़ाई करते हो? तुम किस चीज को थामकर रखोगे, ताकि लौटकर आए यीशु को तुम पर भरोसा हो? क्या वह तुम लोगों की अभिमानी प्रकृति है, जो किसी भी सत्य को समर्पित नहीं होती?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा)। “अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनके पास सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? ... देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है)।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
जबसे देहधारी प्रभु यीशु ने अनुग्रह के युग का कार्य किया, तबसे 2000 साल तक, ईसाइयत ने एक सच्चे परमेश्वर को “त्रित्व” के रूप में परिभाषित...
अब आपदाएँ अधिक से अधिक गंभीर होती जा रही हैं। बहुत-से विश्वासी उत्सुकता से प्रभु का स्वागत करने की आशा कर रहे हैं ताकि वे आपदाओं से बच सकें...
उद्धारकर्ता सर्वशक्तिमान परमेश्वर अंत के दिनों में प्रकट होकर कार्य कर रहा है, उसने करोड़ों वचन व्यक्त किए हैं। वह मनुष्य को पूरी तरह से...
2,000 वर्ष पहले, प्रभु यीशु ने सूली पर चढ़ाये जाने, और छुटकारे का कार्य पूरा कर लेने के बाद, वापस लौटकर आने का वादा किया था। तब से, सभी...