मेरी गलतफहमी और परमेश्वर के प्रति सतर्कता हट गई
चोंगशिन, चीन2023 में मेरे पास कलीसिया में सुसमाचार कार्य की जिम्मेदारी थी, लेकिन कुछ समय बाद खराब कार्य क्षमताओं और टीम अगुआ के कर्तव्य...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
मई 2024 में मुझे एक रिपोर्ट पत्र मिला। यह बहन वांग यी के बारे में था, जिसके साथ मैंने पहले सहयोग किया था। जाँच से पता चला कि अगुआ के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान वांग यी घमंडी और आत्मतुष्ट रही थी। उसने कलीसिया के कार्य के लिए कई बुरे लोगों और छद्म-विश्वासियों को पदोन्नत किया और इस्तेमाल किया था और जब दूसरों ने उसे ऐसा न करने की सलाह दी तो उसने उनकी बात नहीं सुनी, जिससे कलीसिया के कार्य को गंभीर नुकसान पहुँचा। अंत में उसे बर्खास्त कर दिया गया और आत्म-चिंतन करने के लिए अलग-थलग कर दिया गया। वांग यी के साथ जो हुआ उसे देखकर मैं बहुत बेचैन थी। मुझे लगा कि अगुआ होना वाकई खतरनाक है; तुम्हें पता ही नहीं चलता कि कब तुम बुराई कर बैठो और तुम्हें बेनकाब करके निकाल दिया जाए। सितंबर के अंत में मुझे अपने अगुआओं से एक पत्र मिला जिसमें मुझे उस कलीसिया में अस्थायी रूप से काम करने के लिए कहा गया था जिसके लिए वांग यी जिम्मेदार थी। मैंने मन ही मन सोचा, “मेरा जीवन प्रवेश खराब है और मेरा स्वभाव भी काफी घमंडी है। अगर मैंने काम अच्छी तरह से नहीं किया, तो क्या मुझे भी बेनकाब करके निकाल दिया जाएगा?” मुझे पता था कि यह कर्तव्य परमेश्वर की अनुमति से मेरे पास आ रहा है और मेरे द्वारा इससे इनकार करना परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं होगा। लेकिन अगर मैंने इसे स्वीकार किया तो मुझे डर था कि मैं बेनकाब हो जाऊँगी। मैं बहुत दुविधा में थी, लेकिन अंत में मैं बेमन से सहमत हो गई।
उसके बाद मैं इस कलीसिया में काम करने गई। कुछ समय बाद मैंने पाया कि एक तकनीकी पर्यवेक्षक अपने कर्तव्य के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं उठाता था, वह लगातार आलसी और गैर-जिम्मेदार था और उसे जल्द से जल्द बर्खास्त करने की जरूरत थी। उस समय मैंने शिनचेंग को पर्यवेक्षक के रूप में अपना कर्तव्य निभाने का प्रशिक्षण देने के लिए पदोन्नत करने पर विचार किया। भाई-बहनों के मूल्यांकन के आधार पर मैं देख पाई कि शिनचेंग अपने कर्तव्य में दायित्व उठाती थी और उसके पास इस क्षेत्र में कौशल थे, इसलिए उसे कुछ समय के लिए परखा जा सकता था। लेकिन मेरी सहयोगी बहन लिन हुई ने कहा कि शिनचेंग का परिवार परमेश्वर में उसके विश्वास के कारण उसे सताता है और उसे चिंता थी कि उसे पर्यवेक्षक बनाने से जोखिम पैदा होंगे। उसकी स्थिति की पड़ताल के बाद मुझे पता चला कि जब शिनचेंग ने पहली बार परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया था, तो उसके पति ने उसे सताया था, लेकिन कई साल बीत चुके थे और अब उसका पति कुछ नहीं कहता था। इसलिए मैंने लिन हुई से कहा कि इस समय कोई और उपयुक्त नहीं है और शिनचेंग काम कर सकती है और इस दौरान हम उस पर नजर रखेंगे, लेकिन लिन हुई फिर भी असहमत रही। मैंने मन ही मन सोचा, “मैं अभी-अभी यह कर्तव्य निभाने यहाँ आई हूँ, इसलिए मैं कलीसिया सदस्यों को लिन हुई जितनी अच्छी तरह नहीं जानती। साथ ही उसका रवैया काफी दृढ़ है। अगर मैं शिनचेंग का इस्तेमाल करने पर जोर देती हूँ, तो क्या होगा अगर उसका पति उसे सताए और कलीसिया के लिए खतरा पैदा कर दे? क्या उसकी जिम्मेदारी मुझे नहीं उठानी पड़ेगी? क्या तब भाई-बहन यह नहीं कहेंगे कि मैं घमंडी और आत्मतुष्ट हो गई हूँ, क्योंकि मैंने दूसरों की राय नहीं सुनी? यह मेरी ओर से एक बुरा कर्म होगा।” यह सोचकर मैंने आगे कुछ नहीं कहा। नतीजतन, तकनीकी पर्यवेक्षक को समय पर बर्खास्त न करने की वजह से काम की प्रगति में देरी हुई। इसके अतिरिक्त लोगों को विकसित करने के काम में मैंने देखा कि उपदेशक ली यान में कुछ काबिलियत थी और वह सत्य को स्वीकार कर सकती थी। हालाँकि उसका जीवन प्रवेश उथला था और वह कई सिद्धांत नहीं समझती थी। फिर भी मुझे लगा कि एक बार जब वह उन्हें समझ लेगी तो वह कुछ वास्तविक कार्य कर सकती है, इसलिए मैंने उसे विकसित करने की योजना बनाई। लेकिन उसके बाद कुछ लोगों ने टिप्पणी की कि ली यान काफी धोखेबाज थी, कहा कि वह उस काम की रिपोर्ट करने में विफल रही जिसकी रिपोर्ट की जानी चाहिए थी और यहाँ तक दावा किया कि उसे रिपोर्ट करना नहीं आता। स्थिति समझने के लिए उससे मिलने के बाद मुझे एहसास हुआ कि वह रिपोर्ट बनाने में विफल नहीं थी, न ही वह धोखेबाज थी; बात बस इतनी थी कि उसका अनुभव उथला था और वह नहीं जानती थी कि काम कैसे करें। उस समय मैंने सोचा, “भाई-बहन ली यान के साथ सही ढंग से पेश नहीं आ रहे हैं; वे बस बाहरी दिखावे से आँक रहे हैं। मुझे उनके साथ लोगों से सही ढंग से पेश आने के सिद्धांतों के बारे में संगति करनी चाहिए।” लेकिन फिर मेरे मन में एक और विचार आया, “चूँकि सभी भाई-बहनों ने यह कहा है, अगर मैं अभी भी अपने नजरिए पर अड़ी रहती हूँ, तो क्या वे यह नहीं कहेंगे कि मैं बिल्कुल वांग यी की तरह हूँ—कि मैं दूसरों के सुझाव नहीं सुनती और लोगों को विकसित करने में मनमानी करती हूँ? बेहतर होगा कि मैं आगे बढ़कर जोखिम न लूँ। मैं बस कुछ समय तक इंतजार करूँगी और देखूँगी कि क्या होता है।” यह सोचने के बाद मैंने ली यान को विकसित नहीं किया। जब मेरे अगुआओं ने लोगों को विकसित करने की स्थिति के बारे में पूछने के लिए लिखा, तो मैंने सोचा, “अगर मैं ली यान की सिफारिश करती हूँ, वह बाद में बेनकाब हो जाती है, तो क्या होगा? क्या अगुआ यह नहीं कहेंगे कि मेरा स्वभाव घमंडी है और मैं भाई-बहनों की अलग-अलग राय स्वीकार नहीं करती? लेकिन अगर मैं किसी को विकसित नहीं करती, तो अगुआ कहेंगे कि मैं कोई वास्तविक कार्य नहीं कर रही हूँ। बेहतर होगा कि मैं अगुआओं को बस इतना बता दूँ कि मैं ठीक से उसका पता नहीं लगा पा रही हूँ। इस तरह भले ही ली यान बाद में बेनकाब हो जाए, यह केवल मेरी जिम्मेदारी नहीं होगी।” इसलिए जब मैंने अगुआओं को जवाब लिखा, तो एक पल मैंने कहा कि ली यान को विकसित किया जा सकता है और अगले ही पल मैंने कहा कि मैं ठीक से उसका पता नहीं लगा पा रही हूँ, मैंने कोई स्पष्ट रवैया नहीं दिखाया। उसके बाद भी मैंने ली यान को विकसित नहीं किया। चूँकि अपना कर्तव्य करते समय मैं हमेशा अति-सावधान रहती थी, डरती थी कि अगर कर्मियों में फेरबदल अनुचित हुआ तो मुझे जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी, इसलिए मैं टालती रहती थी और कोई अंतिम फैसला लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाती थी। नतीजतन कर्मियों की कमी के कारण कुछ काम धीमी गति से आगे बढ़ा। मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा गलत है, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, इस समय अपना कर्तव्य करते हुए मैं बहुत निष्क्रिय हूँ और मैं हमेशा अति-सावधान रहती हूँ। मेरे दिल में बहुत पीड़ा है। मैं प्रार्थना करती हूँ कि मेरी अपनी समस्याएँ समझने में तुम मेरा मार्गदर्शन करो।”
बाद में मेरे अगुआओं ने लिखकर पूछा, “लोगों को विकसित करने की प्रगति इतनी धीमी क्यों है? हम देखते हैं कि अपना कर्तव्य करते समय तुम बहुत निष्क्रिय हो और हमें इसका कारण नहीं पता।” मैंने अगुआओं को अपनी दशा के बारे में बताया और उन्होंने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा : “कुछ लोग वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास करते आए हैं, फिर भी थोड़ा-सा भी सत्य नहीं समझते। चीजों के बारे में उनका दृष्टिकोण अविश्वासियों जैसा ही होता है। जब वे किसी नकली अगुआ या मसीह-विरोधी का खुलासा होते या उसे हटाए जाते हुए देखते हैं तो सोचते हैं, ‘परमेश्वर के विश्वासी और अनुयायी के रूप में परमेश्वर के समक्ष जीना बर्फ की पतली परत पर चलने जैसा है! यह तलवार की धार पर जीने जैसा है!’ और दूसरे कहते हैं, ‘एक अगुआ या कार्यकर्ता होना और परमेश्वर की सेवा करना जोखिमपूर्ण है। यह वैसा ही है जैसी कि कहावत है—“राजा की संगत में रहना बाघ की संगत में रहने के समान है।” यदि तुम गलत कहते या करते हो तो तुम परमेश्वर के स्वभाव को नाराज कर दोगे और तुम्हें हटा दिया जाएगा और दंडित किया जाएगा!’ क्या ये टिप्पणियाँ सही हैं? ‘बर्फ की पतली परत पर चलना’ और ‘तलवार की धार पर जीना’—इन शब्दों का क्या मतलब है? इन शब्दों का मतलब है कि स्थिति बहुत खतरनाक है—कि व्यक्ति हर पल किसी बड़े खतरे का सामना करेगा और थोड़ी-सी भी लापरवाही से व्यक्ति लड़खड़ा जाएगा। ‘राजा की संगत में रहना बाघ की संगत में रहने के समान है’ अविश्वासियों के बीच एक आम कहावत है। इसका मतलब है कि दानव राजा की मौजूदगी में जीना खतरनाक है। अगर कोई इस कहावत को परमेश्वर की सेवा करने पर लागू करता है, तो उन्होंने क्या गलती कर दी है? दानव राजा की तुलना परमेश्वर से, सृष्टिकर्ता से करना—क्या यह परमेश्वर की ईशनिंदा नहीं है? यह एक गंभीर समस्या है। परमेश्वर एक धार्मिक और पवित्र परमेश्वर है; कि परमेश्वर का प्रतिरोध करने और उससे शत्रुता रखने के लिए मनुष्य को दंड दिया जाना चाहिए, यह बिल्कुल स्वाभाविक और उचित है। शैतान और दानवों में लेशमात्र भी सत्य नहीं होता है; वे गंदे और दुष्ट हैं, वे बेगुनाहों का वध करते हैं और अच्छे लोगों को निगल जाते हैं। परमेश्वर के साथ, एक ही सांस में उनका उल्लेख कैसे किया जा सकता है? लोग तथ्यों को विकृत कर परमेश्वर को बदनाम क्यों करते हैं? यह परमेश्वर की घोर निंदा है! जब कुछ ऐसे लोगों की काट-छाँट की जाती है जो अक्सर नकारात्मक होते हैं और गंभीरता से अपने कर्तव्य नहीं निभाते हैं तो वे चिंता करते हैं कि उन्हें हटा दिया जाएगा और वे अक्सर मन ही मन में सोचते हैं, ‘परमेश्वर पर विश्वास करना वाकई बर्फ की रपटीली पगडंडी पर चलने जैसा है! जैसे ही तुम कुछ गलत करते हो, तुम्हारी काट-छाँट की जाती है; जैसे ही तुम नकली अगुआ या मसीह-विरोधी के रूप में निरूपित किए जाते हो, तुम बर्खास्त कर दिए और हटा दिए जाते हो। परमेश्वर के घर में परमेश्वर का क्रोधित होना असामान्य नहीं है और जब लोग कुछ खराब काम कर चुके होते हैं तो उन्हें एक शब्द के जरिए हटा दिया जाता है। उन्हें पछताने का भी मौका नहीं दिया जाता।’ क्या वाकई में चीजें ऐसी हैं? क्या परमेश्वर का घर लोगों को वाकई में पश्चात्ताप करने का मौका नहीं देता? (यह गलत है।) उन बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों को इसलिए हटा ही दिया जाता है, क्योंकि उन्होंने विविध बुराइयाँ की होती हैं और वे काट-छाँट से गुजर चुके होते हैं, लेकिन बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद वे अपने तरीके नहीं बदलते। लोगों के इस तरह से सोचने में क्या समस्या है? वे खुद के लिए मिथ्या तर्क दे रहे होते हैं। वे सत्य का अनुसरण नहीं करते, न ही वे ठीक से श्रम करते हैं और चूँकि वे बाहर निकाल दिए जाने और हटाए जाने से डरते हैं, इसलिए वे कटुतापूर्वक शिकायत करते हैं और धारणाएँ फैलाते हैं। स्पष्ट रूप से, वे खराब मानवता के होते हैं, और अक्सर अपने काम में अनमने, नकारात्मक और सुस्त होते हैं। वे बेनकाब कर हटाए जाने से डरते हैं, इसलिए सारा दोष कलीसिया और परमेश्वर पर डाल देते हैं। इसकी प्रकृति क्या है? वह परमेश्वर की आलोचना करना, उसकी शिकायत करना और उसका प्रतिरोध करना है। ये टिप्पणियाँ सबसे स्पष्ट भ्रांतियाँ और सबसे बेतुके दावे हैं। यह तथ्य कि ये लोग ऐसी चीजें कह सकते हैं इस बात का प्रमाण है कि वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बावजूद, इन्होंने कभी भी सत्य का अनुसरण नहीं किया है। केवल यही इन्हें परमेश्वर की आलोचना करने, उसका प्रतिरोध और उसकी ईशनिंदा करने के स्तर तक गिरा देगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के कठोर प्रकाशन ने मेरे दिल को बेध दिया और उसे सहना दर्दनाक था। मुझे वो समय याद आया जब मैंने वांग यी को घमंडी होने, अपने नजरिए पर अड़े रहने, सिद्धांतों का उल्लंघन कर लोगों को चुनने और कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करने और बाधा डालने के कारण बर्खास्त होते देखा था। इससे मुझे लगा कि अगुआ का कर्तव्य निभाने के कारण ही उसने ये बुरे कर्म किए थे। मैंने सोचा कि मुझे भविष्य में कभी अगुआ नहीं बनना चाहिए; अगर मैंने बुराई की, तो मेरे बचाए जाने का कोई मौका नहीं रहेगा। जब ऊपरी अगुआओं ने मुझे कलीसिया के कार्य की जिम्मेदारी लेने के लिए कहा, तो मैंने ऊपर से तो सहमति दे दी, लेकिन मैं अपने दिल में सतर्क थी। मुझे लगा कि अगुआ होना एक खतरनाक काम है और मुझे गलती करने और फिर बेनकाब होकर बर्खास्त किए जाने का डर था। मैं स्पष्ट रूप से देख सकती थी कि तकनीकी पर्यवेक्षक अपने कर्तव्य में गैर-जिम्मेदार था और उसे तत्काल बर्खास्त करने की आवश्यकता थी। चीजों को तौलने के बाद मुझे लगा कि शिनचेंग एक उपयुक्त उम्मीदवार है और मैं उसे पदोन्नत और विकसित करना चाहती थी। लेकिन जब मैंने सुना कि मेरी सहयोगी शिनचेंग का उपयोग करने से असहमत है, तो मैंने इस पर आगे चर्चा करने की कोशिश नहीं की, क्योंकि मुझे डर था कि वह कहेगी कि मैं अपने नजरिए पर जोर दे रही हूँ। मुझे यह भी डर था कि शिनचेंग का पति उसे फिर से सताएगा और अगर इस वजह से कलीसिया में कोई परेशानी आई तो मुझे इसकी जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। इसलिए मैंने समय पर पर्यवेक्षक को नहीं बदला, जिससे काम की प्रगति में देरी हुई। साथ ही मैं ली यान को विकसित करना चाहती थी, लेकिन जब मैंने सुना कि कुछ भाई-बहनों ने उसका खराब मूल्यांकन किया है, भले ही मुझे पता था कि मुझे उनके साथ लोगों से निष्पक्ष रूप से पेश आने के सिद्धांतों के बारे में संगति करनी चाहिए, मुझे डर था कि वे कहेंगे कि मैं घमंडी हूँ और दूसरों की नहीं सुनती, इसलिए मैंने जोर देने की हिम्मत नहीं की। अपना कर्तव्य करते समय मैं बहुत डरपोक और झिझकने वाली थी और मैंने कोई रुख अपनाने की हिम्मत नहीं की, इसलिए कर्मियों को समय पर विकसित नहीं किया जा सका, जिससे कलीसिया के कार्य में बाधा आई। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि मेरे ये सभी विचार परमेश्वर के प्रति मेरी सतर्कता थे। सांसारिक राजा न्यायसंगत या धार्मिक नहीं होते; जैसे ही उन्हें पता चलता है कि किसी ने कुछ गलत किया है या उन्हें थोड़ा सा भी नाराज किया है, वे उन्हें सताते हैं। मैंने परमेश्वर को बिल्कुल एक सांसारिक राजा की तरह ही मान लिया था, जो लोगों को जवाबदेह ठहराता है और गलती करते ही उन्हें बर्खास्त कर देता है और निकाल देता है। यह परमेश्वर के खिलाफ एक गंभीर ईशनिंदा थी! इस बारे में सोचते हुए, वांग यी की विफलता मुख्य रूप से उसके घमंडी स्वभाव के कारण थी। उसने अपने कर्तव्य में मनमानी की, भाई-बहनों के सलाह देने पर भी उसने नहीं सुना और अपने ही नजरियों पर विशेष रूप से अड़ी रही। इससे काम को नुकसान पहुँचा, इसीलिए उसे बर्खास्त किया गया। ऐसा नहीं था कि एक गलती करने के कारण उसे निकाल दिया गया था। मैंने संदर्भ या घटनाओं के क्रम को नहीं देखा, बल्कि केवल बाहरी दिखावे से ही आँक लिया, यह अर्थ निकाल लिया कि वह इसलिए बेनकाब हुई क्योंकि वह एक अगुआ का कर्तव्य कर रही थी। मैं सचमुच काले को सफेद और सफेद को काला कर रही थी और सही-गलत में भेद नहीं कर पा रही थी! मैंने तुरंत प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, चूँकि मैं तुम्हारे धार्मिक स्वभाव को नहीं जानती, इसलिए अपना कर्तव्य करते समय मैं हमेशा शंका में और सतर्क रहती हूँ। मेरे विचार और अभिव्यक्तियाँ तुम्हारे खिलाफ ईशनिंदा करते हैं और उन्होंने कलीसिया के कार्य में भी बाधा डाली है। हे परमेश्वर, मेरी विनती है कि तुम मेरा भ्रष्ट स्वभाव जानने के लिए मेरा मार्गदर्शन करो।”
बाद में मैंने विचार किया। कौन सा भ्रष्ट स्वभाव मुझे इस तरह परमेश्वर के प्रति सतर्क रहने के लिए मजबूर कर रहा था? एक दिन मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “लोगों को अपने कर्तव्यों और परमेश्वर के प्रति ईमानदार दिल से पेश आना चाहिए। जो परमेश्वर का भय मानते हैं, उन्हें ऐसा करने में सक्षम होना चाहिए। ईमानदार दिल वाले लोगों का परमेश्वर के प्रति कैसा रवैया होता है? कम से कम, उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाले दिल होते हैं। उनके पास सभी चीजों में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाले दिल होते हैं; यानी, वे आशीषों या विपत्तियों के बारे में नहीं पूछते, वे शर्तें नहीं रखते और वे खुद को परमेश्वर के आयोजन की दया पर छोड़ देते हैं। ये ईमानदार दिल वाले लोग हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर पर संदेह करते हैं, हमेशा उसकी पड़ताल करते हैं, उससे सौदेबाजी की कोशिश में लगे रहते हैं—क्या वे ईमानदार दिल वाले लोग होते हैं? (नहीं।) ऐसे लोगों के दिलों में क्या होता है? कपट और दुष्टता; वे हमेशा पड़ताल करते रहते हैं। और वे किस चीज की पड़ताल करते हैं? (लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये की।) वे हमेशा लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये की पड़ताल करते रहते हैं। यह कौन-सी समस्या है? और वे इसकी पड़ताल क्यों करते हैं? क्योंकि इससे उनके महत्वपूर्ण हित जुड़े हुए हैं। वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘परमेश्वर ने मेरे लिए इस परिस्थिति का इंतजाम किया है, उसने मेरे साथ यह घटना होने दी। उसने ऐसा क्यों किया? ऐसा और लोगों के साथ तो नहीं हुआ—यह मेरे साथ ही क्यों हुआ? और इसके क्या परिणाम होंगे?’ वे इन्हीं चीजों की पड़ताल में लगे रहते हैं; वे अपने नफा-नुकसान, आशीष और विपत्तियों की पड़ताल करते हैं। और क्या इन चीजों की पड़ताल करते हुए वे सत्य का अभ्यास कर पाते हैं? क्या वे परमेश्वर के प्रति समर्पण कर पाते हैं? वे ऐसा नहीं कर पाते। वे अपने दिलों में जिन चीजों के बारे में सोचते हैं, उनकी प्रकृति क्या है? वे सभी उनके अपने हितों पर और अपने लिए लाभ सुरक्षित करने पर केंद्रित हैं। ... जब लोग केवल अपने भविष्य, नियति और हितों पर विचार करते हैं, तो क्या होता है? उनके लिए परमेश्वर के प्रति समर्पण करना आसान नहीं होगा; भले ही वे चाहें, वे ऐसा नहीं कर पाएँगे। जो कोई भी अपने भविष्य, नियति और हितों को विशेष महत्व देता है, वह हमेशा यह पड़ताल करता है कि क्या परमेश्वर का काम उसके भविष्य, उसकी नियति और आशीषें प्राप्त करने के लिए फायदेमंद है। अंत में, उसकी सभी पड़तालों का परिणाम क्या होता है? केवल यह हो सकता है कि चूँकि परमेश्वर का काम उसकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, वह अक्सर परमेश्वर के बारे में शिकायत करता है, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करता है और परमेश्वर का विरोध करता है। भले ही ऐसे लोग अभी भी अपना कर्तव्य निभाने में लगे रह सकते हैं, वे ऐसा लापरवाही से और नकारात्मकता के साथ करते हैं; अपने दिलों में, वे यह सोचते रहते हैं कि कैसे फायदा उठाया जाए और कोई नुकसान भी न हो। ऐसे इरादों के साथ अपना कर्तव्य निभाना परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करने के बराबर है। यह कौन-सा स्वभाव दर्शाता है? यह कपट है, यह एक दुष्ट स्वभाव है। यह एक साधारण भ्रष्ट स्वभाव नहीं है—यह दुष्टता तक बढ़ गया है। अपने दिल में इस तरह का दुष्ट स्वभाव पालना परमेश्वर के खिलाफ लड़ना है! तुम्हें इस समस्या की असलियत जाननी चाहिए। यदि कोई हमेशा परमेश्वर की पड़ताल कर रहा है और लेन-देन की मानसिकता के साथ अपना कर्तव्य निभा रहा है, तो क्या वह अपना कर्तव्य पूरा कर पाएगा? बिल्कुल नहीं। वह अपने दिल से और ईमानदारी से परमेश्वर की आराधना नहीं करता और वह अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी से व्यवहार नहीं करता है। अपना कर्तव्य निभाते हुए बस देखता और निरीक्षण करता है, हमेशा खुद को रोकता है। इसका परिणाम क्या है? परमेश्वर ऐसे लोगों में काम नहीं करता—वे उलझे हुए और भ्रमित होते हैं, वे नहीं समझते कि सत्य सिद्धांत क्या हैं और वे हमेशा अपनी मर्जी के अनुसार काम करते हैं, लगातार गलतियाँ करते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य सिद्धांत खोजकर ही कोई अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा सकता है)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन ने मुझे दिखाया कि मैं कितनी अविश्वसनीय रूप से स्वार्थी और नीच थी। मैंने सोचा कि जब से मैंने वांग यी के खिलाफ रिपोर्ट पत्र को सँभाला था, मैंने अपने दिल में परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना ली थीं और मुझे लगा कि वांग यी केवल एक अगुआ के रूप में अपने कर्तव्य के कारण ही बेनकाब हुई थी। इस भ्रामक दृष्टिकोण के साथ मैं अपना कर्तव्य करने के दौरान डरपोक बन गई और झिझकने लगी। मैं स्पष्ट रूप से देख सकती थी कि अनुपयुक्त कर्मियों को समय पर बर्खास्त किए जाने की आवश्यकता थी और मैंने ऐसे लोगों को भी ढूँढ़ लिया था जिन्हें विकसित किया जा सकता था। लेकिन जब मैंने अलग-अलग राय सुनी तो मुझे चिंता हुई कि अगर मैंने गलत निर्णय लिया तो मुझे जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी। इसलिए मैंने निर्णय लेने में देरी की, कलीसिया के कार्य में बाधा आना तो मंजूर किया पर कर्मियों को तुरंत नहीं बदला और मैंने काम की प्रगति रोक दी। मैंने सिर्फ अपने परिणाम और मंजिल पर विचार किया, कलीसिया के कार्य के बारे में बिल्कुल नहीं सोचा। परमेश्वर ने मुझे इतना महत्वपूर्ण कर्तव्य देकर मेरा उत्कर्ष किया ताकि मैं भाई-बहनों को उसके वचनों का अनुभव करने और सत्य का अभ्यास करने में अगुआई करूँ और विभिन्न कर्तव्य निभाने के लिए उपयुक्त लोगों को खोज सकूँ। लेकिन मैंने केवल अपने हितों पर विचार किया, परमेश्वर के प्रति संदेह से भरी रही और इतनी अति-सावधान रही कि मैंने अपने विचार व्यक्त करने की हिम्मत नहीं की। मैं अपनी जिम्मेदारियाँ बिल्कुल भी पूरी नहीं कर रही थी। ईमानदार दिल वाले लोग अपने कर्तव्य के प्रति सच्चे दिल से पेश आते हैं। वे इस बारे में सोचते हैं कि परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा कैसे की जाए और वे अपने कर्तव्य में परमेश्वर का नेतृत्व प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन खुद को देखने पर, मैं हमेशा चिंतित रहती थी कि गलत व्यक्ति का उपयोग करने से मैं बेनकाब हो जाऊँगी और निकाल दी जाऊँगी। मैं सिर्फ इस बारे में सोचती थी कि केवल अपने हितों की रक्षा कैसे करूँ। इस तरह की मानसिकता को अपने कर्तव्य में लाने से मेरे लिए परमेश्वर की अगुआई और आशीष पाना असंभव हो गया।
फिर मैंने विचार किया कि मैं अपना कर्तव्य करते समय हमेशा अति-सावधान क्यों रहती थी, डरती थी कि एक अलग राय व्यक्त करने से लोग यह कहने लगेंगे कि मैं घमंडी और आत्मतुष्ट हूँ। तो फिर घमंडी और आत्मतुष्ट होने और सिद्धांतों पर कायम रहने के बीच क्या अंतर है? अपनी खोज में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कार्य करते समय अक्सर सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और काट-छाँट स्वीकार नहीं करते हैं। अपने दिल में वे स्पष्ट रूप से जानते हैं कि दूसरे लोग जो बातें कहते हैं वे सत्य के अनुरूप हैं, लेकिन वे इन्हें स्वीकार नहीं करते हैं। ऐसे लोग बहुत ही अहंकारी और आत्मतुष्ट होते हैं! मैं ऐसा क्यों कहता हूँ कि वे अहंकारी हैं? काट-छाँट स्वीकार करने के प्रति इनकार में वे अवज्ञाकारी होते हैं, और क्या अवज्ञा अहंकार नहीं है? वे सोचते हैं कि वे अच्छा कर रहे हैं और वे यह नहीं सोचते कि वे कोई गलती करते हैं, जिसका अर्थ है कि वे स्वयं को नहीं जानते हैं और अहंकारी हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध की जड़ उसकी अहंकारी प्रकृति है)। “इसलिए अगर तुम्हारे कर्तव्य के दौरान ऐसा समय आता है जब सभी की राय बँट जाती है, तो तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? क्या इस पर अनवरत बहस करते जाने से समस्या का समाधान होने वाला है? (नहीं।) तो फिर तुम्हें समस्या का समाधान कैसे करना चाहिए? इस स्थिति में, जो इंसान सत्य को समझता है उसे मुद्दा हल करने के लिए आगे आना चाहिए, पहले मुद्दे को खोलकर रखना चाहिए और दोनों पक्षों को अपनी राय रखने देनी चाहिए। फिर, सभी को एक-साथ सत्य खोजना है, और परमेश्वर से प्रार्थना करने के बाद परमेश्वर के वचनों में प्रासंगिक सत्यों पर संगति करनी है। सत्य सिद्धांतों पर संगति करने और स्पष्टता प्राप्त करने के बाद दोनों पक्ष समर्पण कर पाएँगे। हरेक को अवश्य ही सत्य के प्रति समर्पित होना सीखना चाहिए। ... परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करते समय एक अटल, दृढ़ रवैया रखना, एक दृढ़ पक्ष लेने और सिद्धांतों पर कायम रहने की अभिव्यक्ति है और परमेश्वर इसका अनुमोदन करता है। भले ही दूसरों को लगे कि ऐसे व्यक्ति के बोलने के तरीके या उसके रवैये में कोई समस्या है, लेकिन वास्तव में, यह कोई समस्या नहीं है; यह सत्य वास्तविकता से युक्त होने की अभिव्यक्ति है। कुछ लोग जिनमें आध्यात्मिक समझ की कमी होती है और जिनकी प्रच्छन्न मंशाएँ होती हैं, वे दूसरों की इस बात को उनके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए पकड़ने की कोशिश करेंगे, लेकिन इसमें भ्रष्ट स्वभाव का प्रकटीकरण बिल्कुल भी शामिल नहीं है। याद रखो, सत्य सिद्धांतों पर कायम रहना सबसे महत्वपूर्ण है। यदि कोई सत्य सिद्धांतों पर कायम नहीं रहता, तो चाहे वह कितनी भी सुखद बातें क्यों न कहे, वह एक पाखंडी है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अभ्यास जीवन प्रवेश प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे घमंडी और आत्मतुष्ट होने और सिद्धांतों पर कायम रहने के बीच का अंतर समझने में मदद की : घमंड और आत्मतुष्टि का मतलब है कि जब तुम्हारे कार्यकलाप स्पष्ट रूप से सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं, फिर भी तुम अपने नजरियों पर अड़े रहते हो और जब दूसरे तुम्हारी समस्याओं की ओर इशारा करते हैं या तुम्हारी काट-छाँट करते हैं तो तुम इसे स्वीकार करने से इनकार कर देते हो, इसके बजाय बस यह मानते हो कि तुम सही हो। लेकिन खोजने और यह पुष्टि करने के बाद कि यह सिद्धांतों के अनुरूप है, कुछ करने पर जोर देना—यह सिद्धांतों पर कायम रहना है और यह परमेश्वर के इरादे के अनुरूप है। मैंने देखा कि शिनचेंग अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदारी उठाती थी और तकनीकी पक्ष को समझती थी, जिससे वह तकनीकी पर्यवेक्षक बनने के लिए उपयुक्त थी। मेरी सहयोगी शिनचेंग के घर के माहौल को लेकर चिंतित थी और उसे पदोन्नत नहीं करना चाहती थी। मुझे अपनी सहयोगी के साथ सत्य खोजना चाहिए था ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि हम सिद्धांतों के अनुसार लोगों को पदोन्नत करते हैं और उनका उपयोग करते हैं, ताकि कलीसिया का कार्य प्रभावित न हो। मैंने देखा कि ली यान को विकसित और प्रशिक्षित किया जा सकता है, लेकिन चूँकि भाई-बहन सिद्धांतों को नहीं समझते थे, इसलिए उन्होंने उसे बाहरी दिखावे के आधार पर आँका और उसके बारे में उनका मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ नहीं था। मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों को देखने के लिए उनका मार्गदर्शन करना चाहिए था, लेकिन मुझे डर था कि वे कहेंगे कि मैं घमंडी हूँ और अपने नजरिये पर जोर देती हूँ, इसलिए मैंने उसे विकसित करने का विचार छोड़ दिया। मैंने देखा कि मेरा बोध वास्तव में कितना बेतुका था; यहाँ तक कि मैं घमंडी और आत्मतुष्ट होने और सिद्धांतों पर कायम रहने के बीच अंतर भी नहीं कर सकती थी। मैंने सिद्धांतों के अनुसार समस्याएँ सँभालने को घमंड माना था और इसके परिणामस्वरूप, मैंने अपने विचार व्यक्त करने या सिद्धांतों पर कायम रहने की हिम्मत नहीं की, जिससे कलीसिया के कार्य में बाधा आई। इसी के साथ मुझे परमेश्वर के वचनों में अभ्यास का एक मार्ग भी मिला : अपना कर्तव्य करते समय जब अलग-अलग नजरियों या मतों का सामना करना पड़े, तो मुझे इस मुद्दे को खुले तौर पर सामने लाना चाहिए ताकि इसे हल करने के लिए हर कोई एक साथ सत्य की खोज कर सके। इसका एहसास करते ही मुझे तुरंत राहत महसूस हुई।
बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा और लोगों को पदोन्नत करने और विकसित करने का मेरा मार्ग साफ हो गया। परमेश्वर कहता है : “कुछ प्रतिभाशाली व्यक्तियों के मामले में, ऐसी परिस्थितियों में जहाँ कोई भी उन्हें पूरी तरह से पहचान या समझ नहीं पाता है, उन्हें कलीसिया के कार्य की जरूरतों के अनुसार प्रारंभिक रूप से पदोन्नत किया जा सकता है और उनका उपयोग किया जा सकता है—कार्य में देरी मत करो, और लोगों को विकसित करने में देरी मत करो; यही कुंजी है। कुछ लोग पूछते हैं, ‘अगर उपयोग किए जाने के बाद वे कार्य में गड़बड़ी कर देते हैं, तो क्या होगा? कौन जिम्मेदार होगा?’ जब तुम किसी का उपयोग करते हो, तो क्या यह ऐसा है जैसे तुम उसे किसी वीरान द्वीप पर छोड़ देते हो जहाँ कोई भी उससे संपर्क नहीं कर सकता है? क्या वास्तव में उसके आसपास ऐसे कई दूसरे लोग नहीं हैं जो विशिष्ट कार्यों में लगे हुए हैं? इन सभी मामलों को सुलझाने के तरीके हैं; यानी, उसकी निगरानी करना, जाँच-परख करना और उसे समझना, और, अगर परिस्थितियाँ अनुमति दें, तो यह सब नजदीकी संपर्क के जरिए करना। नजदीकी संपर्क से वास्तव में क्या अभिप्राय है? इससे अभिप्राय है उसके साथ मिलकर कार्य करना; कार्य करने की प्रक्रिया उसे समझने की प्रक्रिया है। क्या तुम इस किस्म के संपर्क के जरिए उसे धीरे-धीरे समझने नहीं लगोगे? अगर तुम्हारे पास संपर्क बनाने का अवसर तो है लेकिन तुम ऐसा नहीं करते हो, और कुछ प्रश्न पूछने के लिए बस एक फोन कॉल कर लेते हो और फिर उसे वहीं छोड़ देते हो, तो फिर उसे समझना असंभव है। समस्याओं को सुलझाने के लिए तुम जिन लोगों से संपर्क बना सकते हो उनसे तुम्हें संपर्क बनाना चाहिए। इसलिए, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अपने कार्य में आलसी नहीं होना चाहिए। तो, अगर तुम किसी की जाँच-परख कर उसे समझना चाहते हो, तो तुम्हें यह कैसे करना चाहिए? (उससे संपर्क बनाकर करना चाहिए।) सही कहा न? यहाँ मुख्य बात यह है कि तुम्हें इस कार्य में अपना दिल लगाना होगा!” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (7))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे यह समझने में मदद की कि किसी को चुनते समय कोई भी पूर्ण सटीकता की गारंटी नहीं दे सकता। जब तक तुम्हारी पसंद वर्तमान समय में सिद्धांतों के अनुरूप है, काम की जरूरतों के अनुसार विकसित करने और उपयोग करने की अपेक्षाओं को पूरा करती है और काम को लाभ पहुँचाती है, तो इतना काफी है। फिर बाद की जाँच-परख के बाद उपयुक्त लोग अपनी भूमिका में बने रह सकते हैं, जबकि अनुपयुक्त लोगों को बदला या बर्खास्त किया जा सकता है। इस तरह अभ्यास करना कलीसिया के कार्य के लिए फायदेमंद है। अगर पदोन्नत और विकसित किया गया कोई व्यक्ति बाद में अनुपयुक्त पाया जाता है तो परमेश्वर का घर तुम्हें जिम्मेदार नहीं ठहराएगा; आखिरकार कोई भी व्यक्ति एक ही नजर में किसी व्यक्ति के सार की असलियत नहीं जान सकता। बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के प्रकाश में अपनी सहयोगी से बात की और वह शिनचेंग को तकनीकी पर्यवेक्षक का कर्तव्य सौंपने के लिए सहमत हो गई। शिनचेंग ने अपना कर्तव्य सँभालने के बाद कलीसिया में कोई सुरक्षा जोखिम पैदा नहीं किया। मैंने ली यान के साथ भी संगति की और उसकी कमियों के बारे में उसकी मदद की। एक अवधि के बाद ली यान ने कुछ प्रगति की और इस बात पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया कि अपने कर्तव्य में नतीजे कैसे प्राप्त किए जाएँ। बाद में उसे एक जिला अगुआ के रूप में चुना गया। जब मैंने देखा कि कर्मियों को ठीक से बदल दिया गया है और वे सभी सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, तो मुझे इस बात से और भी अधिक घृणा महसूस हुई कि मैं अतीत में कितनी स्वार्थी और नीच रही थी। मैंने केवल अपने हितों पर विचार किया था और कलीसिया के कार्य में बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न की थी। इसके बाद मैंने खुद को अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित कर दिया। जब मुझे ऐसे मुद्दों का सामना करना पड़ता जिन्हें मैं स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाती थी, तो मैं भाई-बहनों के साथ सिद्धांतों की खोज करती थी। कुछ समय बाद हमने काम की विभिन्न मदों में प्रगति की। मैंने अपने दिल की गहराइयों से परमेश्वर को धन्यवाद दिया और अनुभव किया कि सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य निभाना कितना सुकून भरा और आनंददायक है।
दो महीने बाद ऊपरी अगुआओं ने मुझे अपने विवरण लिखने के लिए कहा और मेरे बारे में मूल्यांकन एकत्र करने शुरू कर दिए। मैंने सोचा, “क्या वे मुझे फिर से कोई नया कर्तव्य सौंपने जा रहे हैं?” यह सोचते हुए कि मैं पहले कर्तव्यों में बदलाव के बारे में किस तरह अटकलों और शंकाओं से भरी रहती थी, मैंने अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की और व्यक्त किया कि इस बार मुझे जो भी कर्तव्य सौंपा जाएगा, मैं उसके प्रति समर्पण करने के लिए तैयार हूँ। कुछ दिनों बाद अगुआओं ने पत्र लिखकर कहा कि मुझे निर्णायक समूह के सदस्य के रूप में चुना गया है। जब मैंने देखा कि यह निर्णायक समूह है, तो भी मैं थोड़ी हैरान और घबराई हुई थी। “निर्णायक समूह में अपना कर्तव्य निभाने में और भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। कई मुद्दों पर निर्णय लेने की आवश्यकता होती है और यदि कोई गलत निर्णय लिया जाता है जिससे कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचता है, तो मुझे निकाल दिया जाएगा और मैं बचाए जाने का अपना मौका गँवा दूँगी।” मुझे कुछ दुविधा महसूस हुई। फिर अगुआओं ने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा : “परमेश्वर के घर के पास इस बारे में सिद्धांत हैं कि किस तरह के लोगों को पदोन्नत और इस्तेमाल करना है और किस तरह के लोगों को इस्तेमाल नहीं करना है, साथ ही किन लोगों को विकसित करना है और किन लोगों को नहीं करना है; यह सब परमेश्वर के घर के कार्य की जरूरतों पर आधारित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसे पदोन्नत किया जाता है और किसे इस्तेमाल किया जाता है, उद्देश्य उन्हें विकसित करना है ताकि वे अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकें और यह जान सकें कि परमेश्वर के कार्य का कैसे अनुभव करना है, और वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य की जिम्मेदारी उठाने और कार्य करने में समर्थ बन सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस समस्या को सुलझाया जा रहा है, उद्देश्य उन्हें ज्यादा सत्य समझने में और यह सीखने में सक्षम बनाना है कि जिन विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों से उनका सामना होता है, उनसे वे कैसे सबक सीखें और भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करें। इस तरीके से उनके लिए सभी पहलुओं में सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना आसान हो जाता है। यह तुमसे सेवा करवाने के लिए तुम्हारा शोषण करने के बारे में नहीं है और इस बारे में तो और भी नहीं है कि किसी रिक्त पद को भरने के लिए तुम्हारा शोषण किया जा रहा है क्योंकि कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल रहा है और जब कोई उपयुक्त व्यक्ति आ जाता है तब तुम्हें धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जाता है। यह ऐसा नहीं है। दरअसल यह तुम्हें खुद को प्रशिक्षित करने का अवसर दे रहा है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो तुम मजबूती से डटे रहोगे; अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो, तब भी तुम मजबूती से डटे नहीं रह पाओगे। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि परमेश्वर के घर को तुम अप्रिय लगते हो, इसलिए वह तुम्हारी कमी का फायदा उठाने और तुम्हें हटाने का अवसर ढूँढ़ेगा। जब परमेश्वर का घर कहता है कि वह तुम्हें विकसित करेगा और तुम्हें पदोन्नत करेगा तब वह सही मायने में तुम्हें विकसित करेगा। जो बात मायने रखती है वह यह है कि तुम सत्य के लिए कैसे प्रयास करते हो। अगर तुम सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते तो परमेश्वर का घर तुम्हें त्याग देगा और तुम्हें अब और विकसित नहीं करेगा। कुछ लोग एक अवधि तक विकसित किए जाने के बाद इसलिए बर्खास्त कर दिए जाते हैं क्योंकि उनकी काबिलियत खराब होती है और वे वास्तविक कार्य नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग अपने विकसित किए जाने की अवधि के दौरान सत्य रत्ती भर भी नहीं स्वीकारते हैं, मनमाने ढंग से कार्य करते हैं और परमेश्वर के घर के कार्य में गड़बड़ करते हैं और बाधा डालते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं। कुछ दूसरे लोग सत्य का बिल्कुल भी अनुसरण नहीं करते हैं, मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चलते हैं, हमेशा शोहरत, लाभ और रुतबे के लिए कार्य करते हैं और बर्खास्त कर दिए जाते हैं और हटा दिए जाते हैं। इन सभी स्थितियों को लोगों का उपयोग करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुसार सँभाला जाता है। परमेश्वर का घर अभी भी उन लोगों को विकसित करेगा जो सत्य स्वीकार सकते हैं और सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं, भले ही वे कुछ गलतियाँ करके अपराध करें। अगर यह कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य स्वीकार सकता है, और जब उसकी काट-छाँट की जाती है तब वह सत्य नहीं स्वीकारता है, तो फिर उसे सीधे बर्खास्त कर देना चाहिए और हटा देना चाहिए। ... स्थिति चाहे जो भी हो, जब परमेश्वर का घर इन लोगों को पदोन्नत करता है तब यह हमेशा उन्हें विकसित करने और उन्हें सत्य वास्तविकता की तरफ ले जाने के लिए होता है, वह यह उम्मीद करता है कि वे कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से कर सकेंगे और उन कर्तव्यों को पूरा कर सकेंगे जो उन्हें पूरे करने चाहिए। अगर तुम्हें यह पता नहीं भी हो कि किसी कार्य को कैसे करना है क्योंकि तुम बेवकूफ हो और तुममें अंतर्दृष्टि की कमी है या क्योंकि तुम्हारी काबिलियत खराब है, जब तक तुम सत्य सिद्धांतों के लिए प्रयास करते हो, तुममें जिम्मेदारी का यह बोध है, तुम इस कार्य को अच्छी तरह से करने के इच्छुक हो और कलीसिया के कार्य की रक्षा कर सकते हो, तब तक परमेश्वर का घर अब भी तुम्हें विकसित करेगा, भले ही तुमने अतीत में कुछ मूर्खता भरी चीजें की हों। कुछ लोग, हालाँकि उनकी काबिलियत जरा-सी खराब होती है, फिर भी कुछ आसान कार्य कर सकते हैं। हालाँकि समस्याओं को हल करने के लिए सत्य पर उनकी संगति अच्छे नतीजे नहीं दे सकती, लेकिन वे कलीसिया के कार्य का बचाव कर सकते हैं। हर सभा में सत्य के जिस भी पहलू पर संगति की जाती है, वे उसे स्वीकार पाते हैं और आज्ञाकारी और विनम्र बन पाते हैं। अगर कोई कार्य अच्छी तरह से नहीं किया जाता है तो वे उससे सबक सीख सकते हैं। हालाँकि उनकी काबिलियत जरा-सी खराब होती है, लेकिन उनके दिल सत्य के लिए प्रयास कर सकते हैं। एक अवधि तक कार्य करने के बाद वे प्रगति करते हैं और उनके नतीजे उत्तरोत्तर बेहतर होते जाते हैं। मेरी नजर में ऐसे लोगों के पास उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद होती है। ज्यादातर लोग मानते हैं कि अच्छी काबिलियत वाले लोगों को उद्धार प्राप्त करने की संभावना होती है। मेरे विचार से आवश्यक रूप से ऐसा नहीं है। मुख्य बात यह है कि लोगों को सत्य का अनुसरण करना होगा ताकि वे पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकें, अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ सकें और उद्धार प्राप्त कर सकें। कुछ लोगों में औसत काबिलियत होती है और उनके कर्तव्य के नतीजे भी औसत होते हैं, लेकिन परमेश्वर के घर से वर्षों तक सिंचाई और भरण-पोषण प्राप्त करने के बाद वे सत्य में अपने दिल लगाने शुरू कर देते हैं और वे कुछ सत्यों को सचमुच समझने लगते हैं। वे कुछ व्यावहारिक अनुभव भी प्राप्त करते हैं, कुछ चीजों की असलियत जान सकते हैं और कुछ समस्याओं को सुलझा सकते हैं, जिससे वे कलीसिया के कार्य में उत्तरोत्तर प्रगति करते जाते हैं। यह काफी अच्छा है; ऐसे लोग विकसित किए जाने योग्य हैं” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (26))। मैं परमेश्वर के वचनों से गहराई से प्रभावित हुई और मुझे और भी अधिक महसूस हुआ कि मैं कितनी नीच और दुष्ट थी, जो अपनी छोटी सोच के साथ लगातार परमेश्वर पर संदेह करती थी। तभी मैं परमेश्वर के वचनों से यह भी समझ गई कि परमेश्वर के घर में लोगों को पदोन्नत करने और उन्हें निकालने के सिद्धांत होते हैं। जब किसी को पदोन्नत किया जाता है और उसका उपयोग किया जाता है, तो यह उन्हें विकसित करने के सच्चे इरादे से किया जाता है। परमेश्वर उन लोगों को बचाता और उन्हें पूर्ण बनाता है जो सत्य का अनुसरण करते हैं; वह उन लोगों का खुलासा करता है और उन्हें निकाल देता है, जो ऐसा नहीं करते। हालाँकि जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, उनके कर्तव्य में विचलन और कमियाँ हो सकती हैं, लेकिन जब तक वे सत्य को स्वीकार करते हैं, वे अधिक से अधिक प्रगति करेंगे और उन्हें नहीं निकाला जाएगा। जिन लोगों को निकाला जाता है, उन्हें अंततः इसलिए बर्खास्त किया जाता है क्योंकि वे सत्य का अनुसरण नहीं करते, चाहे उन्हें कितनी भी मदद और सहायता क्यों न दी जाए, वे अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते और कलीसिया के कार्य में देरी करते हैं। मैंने अतीत के बारे में सोचा कि कैसे जब मैं एक अगुआ या कार्यकर्ता थी तो मैंने भी कुछ लोगों का गलत इस्तेमाल किया था, लेकिन परमेश्वर के घर ने मेरी निंदा नहीं की या मुझे विकसित करना बंद नहीं किया। इसके बजाय उन्होंने इस बात पर गौर किया कि उस समय गलत लोगों का इस्तेमाल क्यों किया गया था और यह देखकर कि मैंने आत्म-चिंतन किया है और खुद को कुछ हद तक समझ लिया है, उन्होंने मुझे खुद को प्रशिक्षित करने का एक और मौका दिया। इस एहसास से मेरे दिल को सुकून महसूस हुआ। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, कलीसिया की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की इच्छा जताई और फिर मैंने कर्तव्य स्वीकार कर लिया।
एक बार टीम पर्यवेक्षक का चुनाव करते समय, हम एक बहन के मूल्यांकनों पर विचार कर रहे थे। ज्यादातर लोगों ने लिखा कि यह व्यक्ति कठिनाई सह सकता है, सौंपे गए किसी भी कर्तव्य के प्रति समर्पण हो सकता है और अक्सर खुद को जानने के बारे में बात करता है, इसलिए वे उसे पर्यवेक्षक के रूप में चुनने के लिए सहमत हुए। मैं इस बहन के संपर्क में पहले भी आ चुकी थी। उसके बारे में मेरी समझ के आधार पर, वह अपने कर्तव्य में सिद्धांतों का पालन करने में लगातार विफल रही, वह कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत बोल सकती थी लेकिन उसमें सत्य वास्तविकता नहीं थी और वह असल समस्याओं को हल नहीं कर सकती थी और उसने अपने कर्तव्य में कोई नतीजे हासिल नहीं किए थे। वह पर्यवेक्षक बनने के लिए उपयुक्त नहीं थी। मैं अपना नजरिया बताना चाहती थी, लेकिन फिर मैंने सोचा, “चूँकि मेरे सभी सहयोगी उसके पर्यवेक्षक बनने पर सहमत हैं, अगर मैं अकेली हूँ जो इसे स्वीकार नहीं करती, तो क्या वे कहेंगे कि मैं बहुत घमंडी हूँ?” मैं थोड़ा हिचकिचाई। उस पल मुझे सत्य पर कायम रहने और घमंडी और आत्मतुष्ट होने के बीच का अंतर याद आया। सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना घमंड नहीं है। और तो और, वे इस व्यक्ति को अच्छी तरह से नहीं जानते थे। मुझे अपना नजरिया स्पष्ट करना चाहिए और सिद्धांतों के अनुसार सभी के साथ इस मामले पर विचार करना चाहिए। इसलिए मैंने अपना नजरिया स्पष्ट किया। इसे सुनने के बाद उन्हें लगा कि यह व्यक्ति इस समय पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं है और भविष्य में उसकी अभिव्यक्तियों पर नजर रखने की जरूरत है। इस तरह अभ्यास करने से मेरे दिल को बहुत सुकून मिला। परमेश्वर का धन्यवाद!
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
चोंगशिन, चीन2023 में मेरे पास कलीसिया में सुसमाचार कार्य की जिम्मेदारी थी, लेकिन कुछ समय बाद खराब कार्य क्षमताओं और टीम अगुआ के कर्तव्य...
झांग शिन, चीन 1995 में मैं प्रभु यीशु में विश्वास करने लगी। उस समय एक उपदेशक ने प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में दी गई भविष्यवाणियों का उपयोग...
युचेन, चीनमार्च 2023 में मैं कलीसिया में एक प्रचारक का अपना कर्तव्य निभा रही थी। चूँकि मैंने अपने कर्तव्यों में कुछ नतीजे हासिल किए थे,...
बाई लू, चीन2023 के नवंबर के मध्य में एक दिन मुझे ऊपरी अगुआई से एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि भाई-बहनों ने मुझे जिला अगुआ के रूप में चुना...