न मिटने वाला दर्द

23 मई, 2026

लियू यान, चीन

मई 2004 में, एक सभा से लौटते समय मुझे और वू को गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि एक यहूदा ने हमारे साथ गद्दारी कर दी थी। पुलिस स्टेशन में, पुलिस मुझसे लगातार पूछताछ करती रही, यह जानने की माँग करती रही कि कलीसिया अगुआ कौन हैं और चढ़ावे कहाँ रखे हैं। जब मैंने मुँह नहीं खोला तो चार-पाँच अधिकारियों ने मुझे घेर लिया, मुझे धक्के दिए और पीटा। एक अधिकारी ने एक मीटर से अधिक लंबी और अँगूठे जितनी मोटी बाँस की छड़ी से मेरे पूरे शरीर को बेरहमी से पीटा, और वह बार-बार अपने पैर से मेरी जाँघों को कुचलता रहा। एक महिला पुलिसकर्मी ने मेरे चेहरे पर जोर से थप्पड़ मारा। उन्होंने मेरे हाथ पीठ के पीछे करके हथकड़ी लगा दी और उन्हें पीछे की ओर खींच दिया। इतनी यातना के कारण साँस लेना भी मुश्किल था—ऐसा लग रहा था जैसे मेरा दम घुट रहा हो। मेरे चेहरे से पसीना बह रहा था और वे बारी-बारी से मुझे पीटते और पूछताछ करते रहे। मेरा पूरा शरीर दर्द से तड़प रहा था। मैं टॉयलेट जाने के लिए अपनी पैंट भी नीचे नहीं खिसका पा रही थी; एक महिला पुलिसकर्मी को मेरी पैंट नीचे खींचनी पड़ी। मैंने अपनी जाँघों और कूल्हों के किनारों पर बड़े-बड़े चोट के निशान देखे, जिनका रंग गहरा बैंगनी हो गया था। मुझे इतना दर्द हो रहा था कि मैं उकड़ूँ भी नहीं बैठ पा रही थी। उस रात, यह देखकर कि मैं अभी भी मुँह नहीं खोल रही हूँ, उन्होंने मुझे बर्फीले ठंडे फर्श पर बैठा दिया और बारी-बारी से मुझसे पूछताछ करते रहे। वे मुझे हिलने या सोने नहीं देते थे। ठंड के कारण मेरी पीठ का निचला हिस्सा और पैर सुन्न हो गए और सूज गए। मेरा सिर चकरा रहा था और दर्द से फटने लगा। जब भी मैं अपनी आँखें बंद करती, एक अधिकारी मुझ पर चिल्लाता। मुझे लगा कि मैं अब और बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगी, मानो मैं मरने वाली हूँ। मैंने सोचा, “अगर मैंने कुछ नहीं कहा, तो वे मुझे जाने नहीं देंगे। पता नहीं इसके बाद वे मुझे किस तरह की यातनाएँ देंगे। क्या मैं इसे सह पाऊँगी? अगर मुझे यातना देकर मार डाला गया तो क्या मेरी आस्था व्यर्थ नहीं जाएगी? अगर मैं मर गई तो मेरा उद्धार कैसे होगा?” इसलिए उन्हें मूर्ख बनाने की उम्मीद में मैंने कुछ मनगढ़ंत बातें कह दीं, लेकिन उन्होंने मेरी बात पर बिल्कुल विश्वास नहीं किया और पूछताछ जारी रखी।

अगली दोपहर लगभग पाँच या छह बजे, म्युनिसिपल पब्लिक सिक्योरिटी ब्यूरो और नेशनल सिक्योरिटी ब्रिगेड के अधिकारी मुझे और वू को पूछताछ जारी रखने के लिए एक होटल में ले गए। खिड़कियों पर मोटे काले पर्दे लटके हुए थे और हथियारबंद पुलिस पहरा दे रही थी। यह देखकर मेरे अंदर सिहरन दौड़ गई। मैं बहुत डरी हुई थी, यह नहीं जानती थी कि वे आगे मुझे कैसे यातनाएँ देंगे। मैं मन ही मन परमेश्वर से लगातार प्रार्थना करती रही। पुलिस ने मुझे वू से अलग कर दिया और दिन के 24 घंटे बारी-बारी से हमसे पूछताछ की। उन्होंने मुझे एक कुर्सी पर बैठा दिया और मुझे हिलने या सोने नहीं दिया। अगर मैं अपनी आँखें बंद करती तो वे चिल्लाकर मुझे गालियाँ देते। इस यातना से मेरा सिर चकरा रहा था और मैं बदहवास हो गई थी। दो दिन बाद, वू ने मेरे साथ गद्दारी कर दी। उसने उन्हें बता दिया कि चढ़ावे स्थानांतरित करने की जिम्मेदारी मेरी थी। उसने कई जिला अगुआओं, मेजबान परिवारों और सामान सँभालने वाले परिवारों के साथ भी गद्दारी की। वू का इकबालिया बयान हाथ में पकड़े हुए, एक अधिकारी ने मुझे धमकाते हुए कहा, “तुम्हारे न बोलने का कोई फायदा नहीं है। उसने हमें सब कुछ बता दिया है। तुमने चढ़ावे कहाँ भेजे थे? हम वह पैसा ढूँढ़ निकालेंगे, भले ही हमें इसके लिए ज़मीन ही क्यों न खोदनी पड़े। अगर तुम नहीं भी बोलोगी तो भी हम तुम्हें सजा देंगे! सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया सरकार की कार्रवाई का एक मुख्य लक्ष्य है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर में विश्वास करना सामाजिक व्यवस्था को भंग करता है। यह गैरकानूनी है। अगर हम तुम्हें जान से भी मार दें तो भी हम किसी मुसीबत में नहीं पड़ेंगे! हम तुम्हें इस तरह पीट रहे हैं, तुम्हारा परमेश्वर आकर तुम्हें बचाता क्यों नहीं? कोई परमेश्वर नहीं है!” फिर उन्होंने मुझ पर ऐसी बातें कहने का दबाव डालने की कोशिश की जिनसे परमेश्वर की निंदा हो। जब मैंने मना कर दिया तो उसने मेरे चेहरे पर जोरदार थप्पड़ मारा। उसने क्रूरता से गुर्राते हुए कहा, “तुमसे निपटने के हमारे पास बहुत से तरीके हैं! अगर तुम नहीं बोली तो हम चाकू से तुम्हारा चेहरा चीर कर बिगाड़ देंगे, फिर मछलियों को खिलाने के लिए तुम्हें एक बोरे में भरकर हुआंगपु नदी में फेंक देंगे!” मैंने सोचा, “ये दुष्ट पुलिसवाले कुछ भी कर सकते हैं। अगर ये सच में मुझे नदी में फेंक दें तो किसी को पता भी नहीं चलेगा कि मैं मर गई। मैं अभी मरना नहीं चाहती। अगर मैं मर गई तो क्या मेरी आस्था व्यर्थ नहीं जाएगी? फिर मेरा उद्धार कैसे होगा? शायद मुझे कुछ बता देना चाहिए... वैसे भी, वू ने तो बता ही दिया है। मेरे कबूल करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता।” फिर पुलिस ने मुझे उन मेजबान परिवारों और सामान सँभालने वाले परिवारों के पते बताए जिनकी वू ने पहचान की थी, साथ ही बहनों का हुलिया और उनके नाम भी बताए। मैंने मौन रहकर उन्हें स्वीकार कर लिया। लेकिन अधिकारी ने कहा, “उसने सब कुछ कबूल कर लिया है और वह सीधे घर जा रही है। तुमने सिर्फ उसी बात की पुष्टि की है जो उसने हमें पहले ही बता दी थी। तुमने किसी एक भी व्यक्ति का नाम या घर का पता नहीं बताया है। अगर तुम नहीं बताओगी तो हम तुम्हें फिर भी जेल भेजेंगे। अपने खराब रवैये और सहयोग न करने के कारण इसकी ज़िम्मेदार तुम खुद होगी!” मैंने सोचा कि अगर मैं थोड़ा और बता दूँ तो शायद वे मुझे जाने दें या मेरी सजा कम कर दें। इसलिए, मैंने उन्हें एक और मेजबान बहन का पता बता दिया। जिस पल मैंने अपनी बहन के साथ गद्दारी की, मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे नरक में धकेल दिया गया हो। मैं उस एहसास को शब्दों में बयां नहीं कर सकती। मेरी सारी ताकत खत्म हो गई थी। मैं फर्श पर गिर पड़ी और फूट-फूट कर रोने लगी। मैंने खुद को मारने के लिए बिजली का तार पकड़ने की कोशिश की, लेकिन एक अधिकारी ने अपने पैर से मेरा हाथ दबा दिया। अपनी बहन के साथ गद्दारी करने पर मैं पछतावे से भर गई थी और अपने दिल में मैंने खुद को बार-बार कोसा, कहा कि मैं मरने और नष्ट होने के ही लायक हूँ। मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “मैं उन लोगों पर अब और दया नहीं करूँगा, जिन्होंने क्लेश के समय में मेरे प्रति रत्ती भर भी निष्ठा नहीं दिखाई, क्योंकि मेरी दया का विस्तार केवल इतनी दूर तक ही है। इसके अतिरिक्त, मुझे ऐसा कोई इंसान पसंद नहीं जिसने कभी मेरे साथ विश्वासघात किया हो और ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं जो अपने मित्रों के हितों के साथ गद्दारी करते हैं। चाहे जो भी व्यक्ति हो, मेरा यही स्वभाव है। मुझे तुम लोगों को बता देना चाहिए : जो कोई भी पूरी तरह से मेरा दिल तोड़ता है, उसे दूसरी बार मुझसे क्षमा प्राप्त नहीं होगी...(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे डरा दिया। मुझे महसूस हुआ कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अपमान नहीं किया जा सकता। मैंने अपनी बहन से गद्दारी और परमेश्वर से विश्वासघात किया था। मैंने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया था और परमेश्वर अब मुझे नहीं चाहेगा। एक विश्वासी के रूप में मेरा जीवन पूरी तरह से खत्म हो गया था। उस पल, मुझे जीवन से बेहतर मौत लग रही थी।

लेकिन पुलिस ने फिर भी मुझे नहीं जाने दिया। वे कलीसिया के बारे में जानकारी के लिए मुझसे लगातार पूछताछ करते रहे। वे मुझे दिन के 24 घंटे कुर्सी पर बैठने के लिए मजबूर करते थे और मुझे हिलने या सोने नहीं देते थे। उन्होंने मुझे लगभग एक हफ्ते तक सोने न देकर यातनाएँ दीं। मैं इतनी तकलीफ में थी कि मैं कुछ खा नहीं पा रही थी। मुझे बेहोश होने की कगार पर देखकर, पुलिस मुझे आईवी ड्रिप के लिए अस्पताल ले गई। जब हम लौटे तो उन्होंने बारी-बारी से मुझसे पूछताछ करना जारी रखा और मुझे भाई-बहनों की तस्वीरें दिखाकर उन्हें पहचानने के लिए कहा। मैंने खुद से कहा, “मैंने पहले ही परमेश्वर के स्वभाव का अपमान कर दिया है और एक शर्मनाक यहूदा बन गई हूँ। मैं फिर से परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकती।” इसलिए चाहे उन्होंने मुझसे कैसे भी पूछताछ की, मैंने कुछ नहीं कहा। एक महीने बाद, उन्होंने “सामाजिक व्यवस्था को भंग करने” के आरोप में मुझे दो साल के लिए श्रम शिविर द्वारा पुनर्शिक्षा में भेज दिया। जब पुलिस वू और मुझे श्रम शिविर द्वारा पुनर्शिक्षा ले जा रही थी, वू ने मुझे बताया कि मैंने जिस मेजबान बहन के साथ गद्दारी की थी, उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके परिवार द्वारा कुछ जुगाड़ लगाने के बाद उसे रिहा कर दिया गया, लेकिन वह लगातार निगरानी में थी। यह सुनकर मुझे लगा जैसे मेरे दिल में सुई चुभ गई हो। मुझे खुद से नफरत हो रही थी कि मैं मौत से इतना डरती थी, और मैंने अपनी बहन के साथ गद्दारी की थी, जिससे उसके लिए सभाओं में भाग लेना या अपना कर्तव्य निभाना असंभव हो गया था। कितनी ही बार मैं रोई और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, उससे एक और परिवेश तैयार करने की भीख माँगी ताकि मुझे बस एक और मौका मिल सके। मैंने कसम खाई कि भले ही पुलिस मुझे यातना देकर मार डाले, मैं फिर कभी अपने भाई-बहनों के साथ गद्दारी नहीं करूँगी। श्रम शिविर में अपने दो साल के दौरान, जब भी मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आते : “ऐसे लोगों के साथ जुड़ना तो मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं जो अपने मित्रों के हितों के साथ गद्दारी करते हैं,” मुझे लगा कि मुझे उद्धार का दूसरा मौका कभी नहीं मिलेगा और मैं नरक में पहुँच जाऊँगी, सज़ा भुगतूँगी। इस विचार ने मुझे बहुत अधिक नकारात्मक बना दिया। यह वेदना मौत से भी बदतर थी। यहाँ तक कि मुझे लगा कि मेरी आत्मा की इस पीड़ा से मौत ही मुझे मुक्ति दिला सकती है।

दो साल जेल में रहने के बाद, मुझे रिहा कर दिया गया और मैं घर लौट आई, लेकिन मैं इतनी शर्मिंदा थी कि अपने भाई-बहनों का सामना नहीं कर सकती थी। एक बहन के साथ गद्दारी करने वाली शर्मनाक यहूदा होने के लिए मुझे खुद से नफरत थी। मैं अत्यधिक मानसिक पीड़ा में थी, मुझे यकीन था कि परमेश्वर मुझे कभी नहीं बचाएगा और मेरा शापित होना और दंड पाना तय है। मैं निराश हो गई, सारी उम्मीदें खो बैठी और मरना चाहती थी ताकि सब कुछ खत्म हो जाए। एक दिन, मुझे परमेश्वर के वचनों का खयाल आया : “1. यदि तुम सचमुच सेवाकर्मी हो तो क्या तुम लापरवाही या नकारात्मक तत्वों के बिना लगन से मुझे सेवा प्रदान कर सकते हो? ... 10. क्या तुम मेरे निष्ठावान अनुयायी बने रहने में सक्षम हो और आजीवन मेरे लिए कष्ट भुगतने को तैयार हो, भले ही तुम्हें कुछ प्राप्त न हो?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2))परमेश्वर के वचन प्रकाश की एक किरण की तरह थे जिन्होंने मेरे दिल के अँधेरे को चीर दिया और मुझे जीते रहने का साहस दिया। यह सच था। यह परमेश्वर का अनुग्रह ही था कि मैं अपनी आस्था में उसके लिए सेवा प्रदान कर सकती थी। भले ही परमेश्वर अंत में मुझे न बचाए, फिर भी मुझे उसके लिए सेवा प्रदान करनी चाहिए। उसके वचनों पर विचार करते हुए, मुझमें थोड़ी आस्था फिर से जाग गई। मैं उस दिन के लिए तरस रही थी जब मैं फिर से परमेश्वर के वचन पढ़ सकूँगी और अपने भाई-बहनों के साथ मिलकर सभा और अपना कर्तव्य कर सकूँगी। कभी-कभी, बहनें मेरी माँ के घर पर सभाओं के लिए आती थीं, और मुझे उनसे ईर्ष्या होती थी कि वे एक साथ परमेश्वर के वचन पढ़ सकती हैं। यह सोचकर कि मैं परमेश्वर की कितनी ऋणी हूँ, मैं कलीसिया के लिए जो कर सकती थी, वह करना चाहती थी। जब बहनें सभा करने आतीं तो मैं बाहर उनके लिए पहरा देती और आस-पास नजर रखती थी। कभी-कभी मैं चढ़ावे के रूप में देने के लिए थोड़े पैसे बचा लेती थी। यही एक तरीका था जिससे मेरे दिल को कुछ सुकून मिल सकता था।

2011 के वसंत में, एक बहन ने मुझे ढूँढ़ निकाला और पूछा, “क्या तुम सभाओं में भाग लेना चाहती हो?” उस पल, मैं इतनी भावुक हो गई कि मेरी आँखों में आँसू भर आए। मैं जानती थी कि यह परमेश्वर की दया है और वह मुझे एक और मौका दे रहा है। बाद में कलीसिया ने मेरे लिए नए विश्वासियों को सींचने की व्यवस्था की। आंधी हो या तूफान, मैंने कभी एक भी दिन नहीं छोड़ा। मैं बस अपने अपराध की भरपाई करने के लिए ईमानदारी से सेवा करना चाहती थी। जब भी मैं परमेश्वर के प्रोत्साहन, दिलासे या सांत्वना के वचनों को पढ़ती, मुझे महसूस होता कि परमेश्वर एक प्यार करने वाली माँ की तरह है जो हमारी कमजोरियों को समझता है और हमारे अपरिपक्वता पर दया करता है, जहाँ तक संभव हो हमें बचाता है और मेरे चेहरे पर आँसू बहने लगते थे। लेकिन जिस पल मुझे याद आता कि मैं यहूदा बन गई थी और मैंने परमेश्वर को धोखा दिया था, मुझे लगता कि वे वचन मेरे लिए नहीं थे। परमेश्वर मेरे जैसे किसी व्यक्ति को नहीं बचाएगा। मैं उसके वादे या उसका उद्धार पाने के योग्य नहीं थी। जब भी मैं यह सोचती, हताशा और दुख में डूब जाती थी।

2016 में, मैंने पाठ-आधारित कर्तव्य निभाना शुरू किया। एक बार, मैंने एक भाई द्वारा लिखी गई एक अनुभवजन्य गवाही पढ़ी। उसे पुलिस ने बेरहमी से यातनाएँ दी थीं, लेकिन उसने यहूदा बनने के बजाय मरना बेहतर समझा। मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई। हम दोनों को ही गिरफ्तार किया गया था, लेकिन वह अपनी गवाही में अडिग रहा था, जबकि मैंने परमेश्वर से विश्वासघात और अपराध किया था। अगर मैंने उस समय अपने शरीर को न सँजोया होता तो क्या मैं भी उसकी तरह अपनी गवाही में अडिग नहीं रहती? क्या मैं इन सभी वर्षों की आंतरिक यंत्रणा से बच नहीं जाती? सभाओं के दौरान, जब मैं बहनों को किसी निश्चित पहलू में अपनी भ्रष्टता को जानने के बारे में संगति करते हुए सुनती, तो मैं सोचती, “वे तो बस कुछ भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर रही हैं। मैं अलग हूँ। मैंने अपने भाई-बहनों के साथ गद्दारी की है। मैं यहूदा बन गई। मैंने एक गंभीर अपराध किया है, और इसे कभी मिटाया नहीं जा सकता। परमेश्वर मुझे नहीं बचाएगा।” उसके बाद, जब भी मैं यहूदाओं को बाहर निकालने से संबंधित सामग्री देखती तो मैं हताश और दुखी हो जाती थी, इस डर से कि एक दिन मुझे भी बाहर निकाल दिया जाएगा। 2022 की सर्दियों में, जिन दो लोगों के साथ मैंने कभी काम किया था, लियू जिंग और चेन होंग, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने पुलिस के यातनाएँ शुरू करने से पहले ही अपने भाई-बहनों और मेजबान परिवारों के साथ गद्दारी कर दी। चेन होंग ने गद्दारी करते हुए चढ़ावों का भी पता बता दिया। इसके बाद, उन्होंने कोई पछतावा नहीं दिखाया और उन्हें एक-एक करके कलीसिया से निकाल दिया गया। यह सोचकर कि मैं भी उनकी तरह यहूदा बन गई थी और किसी दिन मुझे भी निकाला जा सकता है, मैं बहुत हताश हो गई।

भले ही मैं इन सभी वर्षों में अपना कर्तव्य निभाती आ रही थी, मेरा दिल अपने अपराध को लेकर लगातार दुख और हताशा में डूबा रहता था और मुझे कोई मुक्ति नहीं मिल पा रही थी। मैंने अपनी नकारात्मक दशा को सुलझाने के लिए कभी सत्य नहीं खोजा, मुझे लगा कि मेरे जैसे व्यक्ति के लिए बस ईमानदारी से सेवा करना ही काफी है। यह तब तक चलता रहा जब तक मैंने अपनी आध्यात्मिक भक्ति के दौरान परमेश्वर के वचन नहीं पढ़े : “लोगों के हताशा में डूबने का एक और मूल कारण यह भी है कि वयस्क होने से पहले या बालिग होने के बाद ही लोगों के साथ कुछ विशेष चीजें घटित हो जाती हैं, यानी वे कोई अपराध करते हैं, या कुछ बेवकूफी-भरे, मूर्खतापूर्ण और अज्ञानतापूर्ण काम करते हैं। इन अपराधों, बेवकूफी-भरे और अज्ञानतापूर्ण करतूतों के कारण वे हताशा में डूब जाते हैं। इस प्रकार की हताशा आत्म-निंदा है और यह एक प्रकार का निरूपण भी है कि वे किस प्रकार के लोग हैं। ... ऐसे काम करने वाले लोग कोई खास चीज होने पर, या कुछ निश्चित माहौल या संदर्भों में अक्सर अनजाने ही बेचैन महसूस करते हैं। बेचैनी की यह भावना अनजाने ही उन्हें गहन हताशा में डुबो देती है और वे अपनी हताशा से बँधकर प्रतिबंधित हो जाते हैं। जब भी वे सत्य पर कोई धर्मसंदेश या संगति सुनते हैं, यह हताशा धीरे-धीरे उनके दिमाग और उनके अंतरतम में समा जाती है, और वे खुद को कठघरे में खड़ा करते हैं, कहते हैं, ‘क्या मैं यह कर सकता हूँ? क्या मैं सत्य का अनुसरण करने में समर्थ हूँ? क्या मैं उद्धार प्राप्त कर सकता हूँ? मैं किस किस्म का इंसान हूँ? मैंने पहले वह काम किया, मैं वैसा इंसान हुआ करता था। क्या मैं बचाए जाने से परे हूँ? क्या परमेश्वर अभी भी मुझे बचाएगा?’ कुछ लोग कभी-कभार अपनी हताशा को त्याग सकते हैं, उसे पीछे छोड़ सकते हैं। अपने कर्तव्यों, दायित्वों और जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से पूरा करने के लिए, वे भरसक अपनी सच्चाई और अपनी पूरी ऊर्जा लगा सकते हैं, यहाँ तक कि सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के वचनों पर चिंतन करने में और परमेश्वर के वचनों को समझने के लिए कड़ी मेहनत करने में अपना पूरा दिल और मन लगा सकते हैं। लेकिन जैसे ही कोई विशेष स्थिति या परिस्थिति सामने आती है, हताशा उन पर एक बार फिर से हावी हो जाती है और उन्हें दिल की गहराई में आरोपी महसूस करवाती है। वे मन-ही-मन सोचते हैं, ‘तुमने पहले वह करतूत की थी, तुम उस किस्म के इंसान थे। क्या तुम उद्धार पा सकते हो? सत्य पर अमल करने का क्या कोई तुक है? तुम्हारी करतूत के बारे में परमेश्वर क्या सोचता है? क्या परमेश्वर तुम्हारी करतूत के लिए तुम्हें माफ कर देगा? क्या अब इस तरह कीमत चुकाने से उस अपराध की भरपाई हो सकेगी?’ वे अक्सर खुद को धिक्कारते हैं और भीतर गहरे में खुद को आरोपी महसूस करते हैं, वे अक्सर खुद पर संदेह करते हैं और खुद से सवाल करते हैं। वे इस हताशा को कभी भी त्याग नहीं सकते और अपने दिलों में, उन्होंने जो शर्मनाक काम किया है, उसके बारे में एक निरंतर बेचैनी का भाव महसूस करते हैं। तो उन्होंने इतने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है और ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने परमेश्वर की कही कोई भी बात सुनी है, न ही ऐसा लगता है कि उन्होंने इसमें से कुछ भी समझा है। मानो वे नहीं जानते कि क्या उद्धार-प्राप्ति का उनके साथ कोई लेना-देना है, क्या उन्हें दोषमुक्त कर छुड़ाया जा सकता है, या क्या वे परमेश्वर का न्याय और ताड़ना और उसका उद्धार प्राप्त करने योग्य हैं। उन्हें इन सब चीजों का कोई अंदाजा नहीं है। कोई जवाब न मिलने और कोई सही फैसला न मिलने के कारण, वे निरंतर भीतर गहराई से हताश महसूस करते हैं। अपने अंतरतम दिलों में, उन्होंने जो किया है उसे बार-बार याद करते हैं, वे उसे अपने मन में बार-बार दोहराते हैं, यह याद करते हुए कि यह सब कैसे शुरू हुआ और कैसे समाप्त हुआ, यह याद करते हुए कि पहले क्या हुआ और बाद में क्या हुआ। चाहे वे इसे कैसे भी याद करें, वे हमेशा पापी महसूस करते हैं और इसलिए वे इन वर्षों में इस मामले को लेकर लगातार हताश महसूस करते हैं। यहाँ तक कि जब वे अपने कर्तव्य कर रहे होते हैं, जब वे किसी निश्चित कार्य के लिए एक पर्यवेक्षक के रूप में सेवा करते हैं, तब भी उन्हें लगता है कि उनके बचाए जाने की कोई आशा नहीं है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों ने जो उजागर किया, वह बिल्कुल मेरी ही दशा थी। जब से मुझे गिरफ्तार किया गया था और मैंने अपनी बहन के साथ गद्दारी करके वह अपराध किया था, मैं हताशा की भावनाओं में जी रही थी। मुझे लगता था कि मैंने परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया है, कि वह निश्चित रूप से मुझसे घृणा करता है, चाहे मैं कितना भी अनुसरण कर लूँ, वह मुझे कभी नहीं बचाएगा। जब मैंने परमेश्वर के प्रोत्साहन और उपदेश के वचन देखे तो मुझे लगा कि वे मेरे लिए नहीं हैं, बल्कि उन भाई-बहनों के लिए हैं जिन्होंने कभी कोई अपराध नहीं किया है। जब भी मैं यहूदाओं को बाहर निकालने के बारे में सामग्री देखती तो मेरा दिल चिंतित और बेचैन हो जाता। मुझे लगता कि चूँकि मैं भी उन्हीं की तरह यहूदा बन गई थी, इसलिए शायद एक दिन मुझे भी बाहर निकाल दिया जाएगा। हालाँकि मैं कलीसिया में अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन मेरा दिल परमेश्वर के लिए हमेशा बंद रहता था, मैं सत्य का अनुसरण करने के लिए कोई ऊर्जा नहीं जुटा पा रही थी। मैं सिर्फ ईमानदारी से सेवा करने से ही संतुष्ट थी। भले ही मैंने एक बहन के साथ गद्दारी करने का अपराध किया था, फिर भी परमेश्वर ने मुझ पर दया की और मुझे अपना कर्तव्य निभाने का मौका दिया। मेरे सबसे गहरे दर्द और कमजोरी के क्षणों में, परमेश्वर ने मुझे मेरी नकारात्मकता से बाहर निकालने और अभ्यास का मार्ग खोजने में मदद करने के लिए अपने वचनों का उपयोग किया। परमेश्वर मुझे हमेशा सत्य और जीवन प्रदान करता रहा है, लेकिन मैं नहीं जानती थी कि मेरे लिए क्या अच्छा है। मैंने परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाने के लिए ईमानदारी से सत्य का अनुसरण नहीं किया। इसके बजाय, मैंने परमेश्वर को गलत समझा और उसके खिलाफ सतर्क रही, हताशा की भावनाओं में जीती रही। सचमुच मुझमें कोई अंतरात्मा या विवेक नहीं था। मैं परमेश्वर की बहुत बड़ी ऋणी थी और उसके उद्धार के योग्य नहीं थी! परमेश्वर के वचनों से, मुझे समझ आया कि परमेश्वर नहीं चाहता था कि मैं अपने अपराध के कारण हताशा की भावनाओं में जीऊँ। वह चाहता था कि मैं इसकी बाधाओं से मुक्त हो जाऊँ और ईमानदारी से सत्य का अनुसरण करूँ, उद्धार के मार्ग पर चलूँ। मुझे पता था कि अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुलझाने के लिए मुझे परमेश्वर के वचनों को अधिक खाना और पीना होगा और सत्य खोजना होगा; मैं अपने अपराध की बाधाओं के बीच जीती नहीं रह सकती थी और नकारात्मकता में पीछे नहीं हट सकती थी।

बाद में, मैंने विचार किया, “जब मुझे लगा कि मेरे बचने की कोई उम्मीद नहीं है तो मैं हताशा में क्यों जी रही थी? कौन-सा भ्रष्ट स्वभाव मुझे नियंत्रित कर रहा है?” मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग भविष्य के लिए आशीष पाने का अनुसरण करते हैं; यही उनके विश्वास का लक्ष्‍य होता है। सभी लोगों की यही मंशा और आशा होती है, लेकिन उनकी प्रकृति की भ्रष्टता का समाधान परीक्षणों और शोधन के माध्यम से किया जाना चाहिए। लोग जिन-जिन पहलुओं में शुद्ध नहीं किए जाते और अभी भी भ्रष्टता दिखाते हैं उन पहलुओं में उनका शोधन किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर तुम्हारे लिए परिवेशों का इंतजाम करता है, तुम्हें उनमें शोधन से गुजरने के लिए बाध्य करता है, ताकि तुम अपनी भ्रष्टता को जान जाओ। अंततः तुम उस मुकाम पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम अपने मंसूबों और इच्छाओं को छोड़ने और परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करने के लिए इच्छुक होगे, भले ही इसका मतलब मृत्यु हो। इसलिए अगर लोग कई वर्षों के शोधन से न गुजरें, अगर वे एक हद तक कष्ट न सहें, तो वे अपनी सोच और अपने दिलों में देह की भ्रष्टता की बाधाओं से मुक्त होने में सक्षम नहीं होंगे। जिन किन्हीं पहलुओं में लोग अभी भी अपनी शैतानी प्रकृति की बाध्यताओं में जकड़े हैं और जिन भी पहलुओं में उनकी अपनी इच्छाएँ और माँगें बची हैं, उन्हीं पहलुओं में उन्हें कष्ट उठाना चाहिए। केवल कष्ट झेलकर ही लोग सबक सीख सकते हैं, जिसका अर्थ है कि वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझ सकते हैं। वास्तव में, कई सत्य कष्ट और परीक्षणों से गुजरकर ही समझ में आते हैं। कोई भी व्यक्ति आरामदायक और सहज परिवेश में या अनुकूल परिस्थितियों में परमेश्वर के इरादों को नहीं समझ सकता है, परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि को नहीं जान सकता है, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आकलन नहीं कर सकता है। यह असंभव होगा!(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। पता चला कि मैं हताशा में इसलिए जी रही थी क्योंकि आशीष पाने की मेरी इच्छा चकनाचूर हो गई थी। शुरुआत से ही, मैंने आशीष पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास किया था। यही कारण था कि मैं सभाओं में सक्रिय थी और अपने कर्तव्य में उत्साही थी। जब मेरे अविश्वासी पति ने मुझे रोका, मुझे गालियाँ दीं और पीटा, तब भी मैं बाधित नहीं हुई। परमेश्वर में विश्वास करने के कुछ समय बाद ही, मैं अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर से निकल गई थी। बचाए जाने, जीवित रहने और वह सुंदर गंतव्य प्राप्त करने के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया, जो परमेश्वर ने मनुष्य के लिए तैयार किया है। एक बार जब मुझे गिरफ्तार कर लिया गया और मैं यहूदा बन गई तो मुझे लगा कि परमेश्वर मुझे अब नहीं बचाएगा। आशीषों की अपनी उम्मीदों को चकनाचूर होते देख, मैं निरंतर नकारात्मकता की स्थिति में जी रही थी और अब सत्य का अनुसरण करने को तैयार नहीं थी। मैंने देखा कि परमेश्वर में विश्वास करने का मेरा इरादा गलत था। यह सत्य का अनुसरण करने के लिए नहीं था, बल्कि आशीष प्राप्त करने के लिए था। मैं अनुग्रह के युग के उन लोगों से अलग नहीं थी जो भरपेट निवाले खाने की कोशिश करते थे। परमेश्वर में अपने विश्वास में, मैं बस यही सोचती थी कि उससे आशीष और लाभ कैसे प्राप्त किया जाए। मैंने कभी नहीं सोचा कि अपने अपराध को सुलझाने के लिए सत्य का अनुसरण कैसे करूँ या परमेश्वर के प्रेम और उद्धार का बदला कैसे चुकाऊँ। मैं मानवता से कितनी रहित थी! इस प्रकाशन का अनुभव करने के द्वारा मैंने अंततः अपनी आस्था में किए गए सौदों के प्रयासों और अशुद्धियों को पहचान लिया। ये वास्तव में परमेश्वर के लिए घृणित और वीभत्स हैं!

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े, समझ गई कि अपराधों से कैसे निपटना है और उन्हें सुलझाने का एक मार्ग मिल गया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “थोड़ा-सा अपराध कर देने पर कुछ लोग अंदाजा लगाते हैं : ‘क्या परमेश्वर ने मुझे प्रकट कर हटा दिया है? क्या वह मुझे मार गिराएगा?’ इस बार परमेश्वर लोगों को मार गिराने के लिए नहीं, बल्कि यथासम्भव अधिकतम सीमा तक उन्हें बचाने के लिए कार्य करने आया है। कोई भी त्रुटिहीन नहीं है—अगर सबको मार गिरा दिया जाए तो क्या यह ‘उद्धार’ होगा? कुछ अपराध जानबूझकर किए जाते हैं, जबकि अन्य अपराध अनिच्छा से होते हैं। जो चीजें तुम अनिच्छा से करते हो उन्हें पहचान लेने के बाद अगर तुम बदल सकते हो तो क्या परमेश्वर तुम्हारे ऐसा करने से पहले तुम्हें मार गिराएगा? क्या परमेश्वर इस तरह से लोगों को बचाएगा? वह इस तरह काम नहीं करता! चाहे तुम्हारा विद्रोही स्वभाव हो या तुमने अनिच्छा से कार्य किया हो, यह याद रखो : तुम्हें आत्मचिंतन कर खुद को जानना चाहिए। तुरंत खुद को बदलो और अपनी पूरी ताकत से सत्य के लिए प्रयास करो—और, चाहे कैसी भी परिस्थितियाँ क्यों न आएँ, खुद को निराशा में न पड़ने दो। परमेश्वर मनुष्य के उद्धार का कार्य कर रहा है और वह जिन्हें बचाना चाहता है, उन पर यूँ ही मनमाने ढंग से प्रहार नहीं करेगा। यह निश्चित है। भले ही वास्तव में परमेश्वर का ऐसा कोई विश्वासी हो जिसे उसने अंत में मार गिराया हो, फिर भी जो कुछ परमेश्वर करता है, उसके धार्मिक होने की गारंटी होगी। समय पर वह तुम्हें जानने देगा कि उसने उस व्यक्ति को क्यों मार गिराया, ताकि तुम पूरी तरह कायल हो जाओ। अभी बस सत्य के लिए प्रयास करो, जीवन-प्रवेश पर ध्यान केंद्रित करो और अपने कर्तव्य के अच्छे प्रदर्शन का अनुसरण करो। इसमें कोई गलती नहीं है! चाहे परमेश्वर अंत में तुम्हें कैसे भी सँभाले, उसके धार्मिक होने की गारंटी है; तुम्हें इस पर संदेह नहीं करना चाहिए, और तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। भले ही तुम परमेश्वर की धार्मिकता को इस समय नहीं समझ सकते, लेकिन एक दिन आएगा जब तुम कायल हो जाओगे। परमेश्वर न्यायपूर्वक और सम्मानपूर्वक कार्य करता है; वह खुलकर हर चीज प्रकट करता है। अगर तुम लोग इस पर ध्यान से विचार करो, तो तुम दिल से महसूस किए जाने वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचोगे कि परमेश्वर का कार्य लोगों को बचाना और उनके भ्रष्ट स्वभावों को पूरी तरह बदलना है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। “परमेश्वर तुम्हें किस तरह से क्षमादान देकर दोष-मुक्त कर सकता है? यह तुम्हारे दिल पर निर्भर करता है। अगर तुम ईमानदारी से पाप-स्वीकार करते हो, सच में अपनी गलती और समस्या को पहचान लेते हो, यह पहचान लेते हो कि तुमने क्या किया है—भले ही वह अपराध हो या पाप-सच्चे पाप—तुम स्वीकार का सच्चा रवैया अपनाते हो, तुम अपनी करनी के लिए सच्ची घृणा महसूस करते हो और सच में पूरी तरह बदल जाते हो और तुम वह गलत काम दोबारा कभी नहीं करते तो अंततः एक दिन आएगा जब तुम्हें परमेश्वर से क्षमादान और दोष-मुक्ति मिल जाएगी, यानी परमेश्वर तुम्हारी की हुई अज्ञानतापूर्ण, मूर्खतापूर्ण और गंदी करतूतों के आधार पर तुम्हारा परिणाम तय नहीं करेगा। जब तुम इस स्तर पर पहुँच जाओगे, तो परमेश्वर इस मामले को बिल्कुल भी याद नहीं रखेगा; तुम भी दूसरे सामान्य लोगों जैसे ही होगे, जरा भी फर्क नहीं होगा। लेकिन शर्त यह है कि तुम ईमानदार रहो और तुम्हारा रवैया दाऊद की तरह पश्चातापी हो। अपने अपराध के लिए दाऊद ने कितने आँसू बहाए थे? अनगिनत आँसू। वह कितनी बार रोया था? अनगिनत बार। उसके बहाए आँसुओं को इन शब्दों में बयान किया जा सकता है : ‘मैं हर रात अपने आँसुओं में तैरते बिस्तर पर सोता हूँ।’ मुझे नहीं पता कि तुम्हारा अपराध कितना गंभीर है। अगर सचमुच गंभीर है, तो तुम्हें तब तक रोना पड़ सकता है जब तक कि तुम्हारा बिस्तर तुम्हारे आँसुओं पर तैरने न लगे—परमेश्वर से क्षमा पाने से पहले तुम्हें उस स्तर तक पाप-स्वीकार और प्रायश्चित्त करना पड़ सकता है। अगर तुम ऐसा नहीं करते, तो मुझे डर है कि तुम्हारा अपराध परमेश्वर की नजरों में पाप बन जाएगा और तुम्हें इसकी क्षमा नहीं मिलेगी। तब तुम मुसीबत में पड़ जाओगे और फिर इस बारे में कुछ भी और कहना बेतुका होगा। ... अगर तुम परमेश्वर से क्षमादान पाना चाहते हो, तो तुम्हें पहले सच्चे हृदय वाला बनना पड़ेगा : एक ओर तो तुम्हारे पास सच्चे पाप-स्वीकार का रवैया होना चाहिए और तुम्हें सच्चे हृदय भी लाना और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाना होगा, वरना सब निरर्थक है। अगर तुम ये दो चीजें कर सको, अगर तुम अपनी सच्चाई और नेकनीयती से परमेश्वर को द्रवित कर सके, कि वह तुम्हें तुम्हारे पापों से मुक्ति दे सके, तो तुम ठीक दूसरे लोगों जैसे ही बन जाओगे। परमेश्वर तुम्हें भी उसी नजर से देखेगा जिससे वह दूसरों को देखता है, वह तुमसे भी वैसे ही पेश आएगा जैसे वह दूसरों से पेश आता है, और वह तुम्हें भी उसी तरह न्याय और ताड़ना देगा, परीक्षण करके तुम्हारा शोधन करेगा, जैसे वह दूसरे लोगों को करता है—तुमसे कोई अलग बर्ताव नहीं होगा। इस प्रकार तुममें न सिर्फ सत्य का अनुसरण करने का दृढ़-संकल्प और आकांक्षा होगी, बल्कि परमेश्वर सत्य के अनुसरण में तुम्हें भी उसी तरह प्रबुद्ध करेगा, मार्गदर्शन और पोषण देगा। बेशक, अब चूँकि तुममें ईमानदार और सच्ची आकांक्षा और एक ईमानदार रवैया है, इसलिए परमेश्वर तुमसे कोई अलग बर्ताव नहीं करेगा और ठीक दूसरे लोगों की ही तरह तुम्हें उद्धार का मौका मिलेगा। तुमने यह समझ लिया है, है न? (हाँ।)” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि वह सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है। केवल एक अपराध के लिए पश्चात्ताप करने का मौका दिए बिना, वह हमेशा के लिए लोगों को दोषी नहीं ठहरा देता। परमेश्वर यह देखता है कि क्या हम अपराध करने के बाद सचमुच पश्चात्ताप कर सकते हैं और फिर कभी अपराध नहीं करते। मैंने दाऊद के बारे में सोचा, जिसने उरियाह की पत्नी को पाने के लिए अपनी शक्ति का इस्तेमाल किया था। जब उसे एहसास हुआ कि उसने पाप किया है और परमेश्वर की घृणा मोल ली है तो उसने सचमुच परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप किया और फिर कभी वह पाप नहीं किया। अपने बुढ़ापे में उसने उस युवा स्त्री को छुआ तक नहीं जिसे उसका बिस्तर गर्म करने के लिए लाया गया था। उसका पश्चात्ताप सिर्फ शब्दों में नहीं था; उसने इसे वास्तविक कार्यों से साबित किया और इसलिए उसे परमेश्वर की दया और सहनशीलता प्राप्त हुई। फिर मैंने लियू जिंग और चेन होंग के बारे में सोचा, जो बिना यातना सहे ही यहूदा बन गए थे। चेन होंग ने दस लाख युआन से अधिक के चढ़ावे के स्थान की भी जानकारी दे दी थी। उसके बाद, दोनों में से किसी ने भी कोई पछतावा नहीं दिखाया। उन्हें कलीसिया से बाहर निकालना परमेश्वर की धार्मिकता को पूरी तरह से प्रकट करता है। कलीसिया ने मुझे वापस इसलिए स्वीकार किया क्योंकि मैंने अपनी बहन के साथ कमजोरी के एक क्षण में गद्दारी की थी, जब मैं यातना बर्दाश्त नहीं कर पाई थी। उसके बाद मैं पछतावे और आत्म-भर्त्सना से भर गई थी और मैंने अपनी पूरी क्षमता से अपना कर्तव्य निभाया, इसलिए परमेश्वर के घर ने मुझे एक और मौका दिया। परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक और अच्छा है और वह हर किसी के साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करता है। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कोई भी त्रुटिहीन नहीं है—अगर सबको मार गिरा दिया जाए तो क्या यह ‘उद्धार’ होगा?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। इन वचनों ने मुझे विशेष रूप से महसूस कराया कि परमेश्वर एक प्यार करने वाली माँ की तरह है, जो गलती करने वाले बच्चे को सिखाने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है, उन्हें याद दिलाता और प्रोत्साहित करता है कि वे खुद से हार न मानें। परमेश्वर के वचनों की गहराइयों में, मैंने उसके श्रमसाध्य इरादों और मानवजाति के लिए उसकी सहनशीलता और दया को महसूस किया। मुझे पता था कि मुझे सचमुच पश्चात्ताप करना होगा। मैं अब अपने अपराध से बँधकर, खुद पर फैसला नहीं सुना सकती थी और इसके कारण खुद से उम्मीद नहीं छोड़ सकती थी। मुझे अपना कर्तव्य पूरे दिल से निभाना था, जब चीजें सामने आएँ तो सत्य को अधिक खोजना था, सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने पर ध्यान केंद्रित करना था और अपने अपराध की भरपाई के लिए वास्तविक कार्यों का उपयोग करना था।

बाद में, मैंने विचार किया और महसूस किया कि मेरी विफलता का मूल कारण यह था कि मुझे अपनी जान प्यारी थी और मैं मौत से डरती थी। तो मैं इस समस्या का समाधान कैसे कर सकती थी? एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और मुझे समझ आया कि मृत्यु का सामना कैसे करना है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “प्रभु यीशु के उन शिष्यों की मौत कैसे हुई? उनमें ऐसे शिष्य थे जिन्हें पत्थरों से मार डाला गया, घोड़े से बाँध कर घसीटा गया, सूली पर उलटा लटका दिया गया, पाँच घोड़ों से खिंचवाकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए—विभिन्न रूपों की मौत उन पर टूटी। उनकी मृत्यु का कारण क्या था? क्या ऐसा है कि उन्होंने कुछ गलत काम किया और फिर उन्हें कानून के जरिए सजा दी गई? नहीं। उन्होंने प्रभु के सुसमाचार का प्रसार किया, लेकिन दुनिया के लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया और इसके बजाय उनकी निंदा की, उन्हें पीटा और उन्हें कोसा, यहाँ तक कि उन्हें मार डाला—इस तरह वे शहीद हुए। आओ, हम उन शहीदों के अंतिम परिणाम या उनके कर्मों पर परमेश्वर के फैसले के बारे में बात न करें, बल्कि यह पूछें : जब वे शहीद अंत तक पहुँचे, तो क्या उनके जीवन के अंत के तरीके मानवीय धारणाओं के अनुरूप थे? (नहीं, वे नहीं थे।) मानवीय धारणाओं के परिप्रेक्ष्य से, उन शहीदों ने परमेश्वर के कार्य का प्रसार करने के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई, लेकिन अंततः शैतान द्वारा उन्हें गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाकर मार डाला गया। यह मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं है। हालाँकि, ये चीजें ठीक वही हैं जो उन पर बीतीं—यह वही है जिसकी परमेश्वर ने अनुमति दी। इसमें कौन-सा सत्य खोजा जा सकता है? क्या परमेश्वर का उन्हें इस तरह मरने देना उसका शाप और निंदा थी या यह उसकी व्यवस्था थी, उसका आशीष था? यह दोनों में से कुछ भी नहीं था। यह क्या था? उन शहीदों की मौतों के बारे में सोचकर लोगों को दुख होता है, फिर भी ये वास्तव में तथ्य हैं। परमेश्वर में विश्वास करने वालों के इस तरह मरने के लिए क्या स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए? जब हम इस विषय का उल्लेख करते हैं, तो तुम लोग खुद को उनकी जगह पर रखते हो, तो क्या तुम लोग अपने दिलों में परेशान और थोड़ा-सा छिपा हुआ दर्द महसूस करते हो? तुम सोचते हो, ‘इन लोगों ने परमेश्वर के सुसमाचार का प्रसार करने का अपना कर्तव्य निभाया, इन्हें अच्छा इंसान माना जाना चाहिए, तो फिर उनका अंत, और उनका परिणाम ऐसा कैसे हो सकता है?’ वास्तव में, उनके शरीर इसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुए और चल बसे; यह मानव संसार से प्रस्थान का उनका अपना तरीका था, तो भी इसका यह अर्थ नहीं था कि उनका परिणाम भी वैसा ही था। उनके निधन और प्रस्थान का तरीका चाहे जो भी रहा हो या यह चाहे जैसे भी हुआ हो, लेकिन परमेश्वर ने उन जीवनों के, उन सृजित प्राणियों के अंतिम परिणाम इस तरह निर्धारित नहीं किए थे। यह ऐसी बात है जो तुम्हें स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। इसके विपरीत, यह सटीक तौर पर वह तरीका था जिससे उन्होंने इस संसार की घोर निंदा की और परमेश्वर के कर्मों की गवाही दी। इन सृजित प्राणियों ने अपने सर्वाधिक बहुमूल्य जीवन का उपयोग किया—उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण का उपयोग—परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए किया, परमेश्वर के महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए किया और शैतान तथा इस संसार के समक्ष यह घोषणा करने के लिए किया कि परमेश्वर के कर्म सही हैं, प्रभु यीशु परमेश्वर है, वह प्रभु है और परमेश्वर का देहधारी शरीर है। यहाँ तक कि अपने जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षण तक उन्होंने प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं नकारा। क्या यह इस संसार को दोषी ठहराने का एक रूप नहीं था? उन्होंने अपने जीवन का उपयोग संसार के समक्ष यह घोषणा करने, मनुष्यों के सामने यह साबित करने के लिए किया कि प्रभु यीशु प्रभु है, प्रभु यीशु मसीह है, वह परमेश्वर का देहधारी है, कि उसने समस्त मानवजाति के छुटकारे के लिए जो कार्य किया वही मानवजाति को जीवित रख पाया है—यह सच्चाई कभी बदलने वाली नहीं है। जो लोग प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए शहीद हुए, उन्होंने किस सीमा तक अपना कर्तव्य निभाया? क्या यह अंतिम सीमा तक किया गया था? यह अंतिम सीमा कैसे परिलक्षित होती थी? (उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया।) यह सही है, उन्होंने अपने जीवन से कीमत चुकाई। ... मृत्यु चाहे जैसे हो, किंतु उन्हें शैतान के सामने, शैतान के हाथों में नहीं मरना चाहिए। यदि मरना ही है, तो उन्हें परमेश्वर के हाथों में मरना चाहिए। लोग परमेश्वर से आए हैं, और उन्हें परमेश्वर के पास ही लौटना है—यही विवेक और रवैया सृजित प्राणियों में होना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रचार करना वह कर्तव्य है जिसे निभाना सभी विश्वासियों का दायित्व है)। प्रभु यीशु का अनुसरण करने वाले शिष्यों को दुनिया द्वारा उनके सुसमाचार का प्रसार करने के लिए निंदित और प्रताड़ित किया गया और यहाँ तक कि वे शहीद भी हो गए। भले ही उनका शरीर मर गया, उन्होंने शैतान के सामने एक मजबूत और शानदार गवाही दी। उन्होंने जो किया उसे परमेश्वर ने स्वीकार किया और उनकी आत्माएँ उसके पास लौट गईं। मैं इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख पा रही थी। मुझे यातना देकर मार डाले जाने का डर था, इसलिए खुद को बचाने के लिए, मैंने अपनी बहन के साथ गद्दारी की और परमेश्वर से विश्वासघात किया। मेरा शरीर तो कष्ट से बच गया, लेकिन मेरी अंतरात्मा की धिक्कार और मेरी आत्मा की पीड़ा मेरे दिल में काँटे की तरह चुभती रही। यह मौत से भी बदतर महसूस होता था! यह आध्यात्मिक पीड़ा ऐसी है जिसकी भरपाई कोई भी भौतिक वस्तु कभी नहीं कर सकती। अपनी विफलता की जड़ को समझते हुए, मैं इस क्षेत्र में खुद को सत्य से अधिक सुसज्जित करने के लिए तैयार थी। मैंने एक गुप्त संकल्प भी लिया कि अगर मुझे फिर कभी गिरफ्तार किया गया तो मैं अपने भाई-बहनों या परमेश्वर के घर के हितों के साथ गद्दारी नहीं करूँगी, भले ही मुझे पीट-पीटकर मार डाला जाए। मैं परमेश्वर के वचनों पर भरोसा करके अपनी गवाही में अडिग रहूँगी!

इन सभी वर्षों में, मैं हताशा की भावनाओं में जी रही थी और मुझे कोई मुक्ति नहीं मिल रही थी। परमेश्वर के वचनों ने ही मेरे दिल की गाँठ खोली, मुझे अपनी गलतफहमियों को छोड़ने और अपने अपराध का सही ढंग से सामना करने की अनुमति दी और मेरी आत्मा को मुक्ति और आज़ादी दिलाई। मैंने अपने दिल में प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं अब तुम्हारे खिलाफ विद्रोह नहीं करना चाहती। चाहे भविष्य में मेरा परिणाम और गंतव्य अच्छा हो या न हो, मैं अब आशीष पाने के लिए अपना कर्तव्य नहीं निभाना चाहती। मैं एक सृजित प्राणी के स्थान पर खड़े होने और अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाने के लिए तैयार हूँ। भविष्य में तुम मेरे साथ कैसा भी व्यवहार करो और भले ही तुम मुझे सजा दो और शाप दो, वह तुम्हारी धार्मिकता है।” प्रार्थना करने के बाद मेरे दिल को बहुत सुकून मिला। इस अनुभव के माध्यम से मैं वास्तव में यह समझ पाई कि चाहे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के वचन कितने भी कठोर क्यों न हों और चाहे वे शाप हों या निंदा, परमेश्वर का इरादा हमेशा लोगों को बचाने का होता है!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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