खतरनाक माहौलों से अब मैं पीछे नहीं हटती हूँ

23 मई, 2026

हान फेंग, चीन

10 सितंबर 2024 को मुझे अगुआओं से एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि नानचेंग कलीसिया का एक अगुआ झाओ हुई गिरफ्तार हो चुका है और यहूदा बन गया है, बहुत-से भाई-बहनों के साथ गद्दारी कर चुका है। कलीसिया के तीस से ज्यादा लोग पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे। चूँकि मैं पहले एक जिला अगुआ थी और वहाँ के कुछ भंडार घरों को अच्छी तरह से जानती थी, इसलिए वे चाहते थे कि मैं भेंटें हटाने की जिम्मेदारी सँभालूँ। स्थिति अत्यावश्यक थी। यह जानकर कि परमेश्वर की भेंटों की रक्षा करना मेरी जिम्मेदारी है, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, ईमानदारी से सहयोग करने की अपनी इच्छा जताई।

जब मैं नानचेंग कलीसिया पहुँची, मुझे पता चला कि डीकन और महत्वपूर्ण कार्यकर्ता सारे ही गिरफ्तार हो चुके थे। हर दिन हमें कई भाई-बहनों के गिरफ्तार होने की खबर मिलती थी। कुछ को तो पुलिस उनके घरों में भी परेशान करती थी। गिरफ्तार हुए कुछ भाई-बहनों को वे घर पता थे जहाँ भेंटें रखी हुई थीं। मैंने मन में सोचा, “माहौल बहुत शत्रुतापूर्ण है। अगर मैं भेंटें हटाने जाती हूँ, तो क्या मेरा पीछा किया जाएगा और मुझ पर नजर रखी जाएगी? झाओ हुई जानता है कि मैं अगुआई का कर्तव्य निभाया करती थी। क्या वह मेरे साथ भी गद्दारी कर चुका होगा? इसके अलावा, 2019 में मेरे साथ एक यहूदा गद्दारी कर चुका था और तब पुलिस ने मेरी जाँच की थी। यह तो परमेश्वर की अद्भुत सुरक्षा थी कि मैं उस मुसीबत से बच निकली। इस बार अगर मैं भेंटें हटाते हुए गिरफ्तार हो गई तो पुलिस निश्चित रूप से मुझे आसानी से नहीं छोड़ेगी। वह मेरे जीते-जी खाल उधेड़ देगी!” भाई-बहनों को पुलिस द्वारा बेरहमी से यातनाएँ देने के वीडियो याद कर मैं भयाक्रांत हो गई। अगर मैं गिरफ्तार हो गई तो मैं नहीं जानती थी कि क्या मैं यह सब सह पाऊँगी। अगर मैं यातना न सह सकी और परमेश्वर को धोखा दे बैठी, यहूदा बन गई तो क्या परमेश्वर में मेरी आस्था विफल नहीं हो जाएगी? अगर मैं गिरफ्तार हो गई और कई साल के लिए जेल में डाल दी गई, तो मैं न तो परमेश्वर के वचन पढ़ पाऊँगी और न ही अपना कर्तव्य निभा पाऊँगी। तब मैं अच्छे कर्म कैसे तैयार करूँगी या उद्धार का अनुसरण कैसे करूँगी? मैं जितना सोचती, उतनी ही डरपोक होती जा रही थी। मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा ठीक नहीं है। मैंने पहले भी बहुत बार खतरनाक माहौल का सामना किया था और उन मौकों पर परमेश्वर की अद्भुत सुरक्षा देखी थी। फिर भी मुझमें कतई कोई आस्था क्यों नहीं थी? मैंने अपने दिल में परमेश्वर को पुकारा कि वह मुझे आस्था दे। बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “परमेश्वर लोगों पर पूर्णता का कार्य करता है और वे इसे देख नहीं सकते, छू नहीं सकते; ऐसी परिस्थितियों में आस्था आवश्यक होती है। जब कोई चीज नग्न आँखों से न देखी जा सकती हो, तब आस्था आवश्यक होती है। जब तुम अपनी धारणाएँ नहीं छोड़ पाते, तब आस्था आवश्यक होती है। जब तुम परमेश्वर के कार्य के बारे में स्पष्ट नहीं होते तो यही अपेक्षा की जाती है कि तुम आस्था रखो, ठोस रुख अपनाए रखो और अपनी गवाही में अडिग रहो। जब अय्यूब इस मुकाम पर पहुँच गया तो परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और उससे बोला। यानी जब तुममें आस्था होगी, तभी तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ हो पाओगे। जब तुममें आस्था होगी, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा और अगर तुममें आस्था नहीं है तो वह ऐसा नहीं कर सकता। परमेश्वर तुम्हें वह सब प्रदान करेगा, जिसे पाने की तुम आशा करते हो। अगर तुम्हारे पास विश्वास नहीं है तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता और तुम परमेश्वर के कार्य को देखने में असमर्थ होगे, उसकी सर्वशक्तिमत्ता को तो बिल्कुल भी नहीं देख पाओगे। जब तुम्हारे वास्तविक अनुभवों में यह आस्था होती है कि तुम परमेश्वर के कर्म देख सको, तब परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा और भीतर से तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। इस आस्था के बिना परमेश्वर ऐसा करने में असमर्थ होगा। अगर तुम परमेश्वर पर विश्वास खो चुके हो, तो तुम कैसे उसके कार्य का अनुभव कर पाओगे? इसलिए, केवल जब तुम्हारे भीतर आस्था हो और तुम परमेश्वर पर संदेह न करो और जब तुम उस पर सच्ची आस्था रखो जो उसके कुछ भी करने से न डगमगाए, तभी वह तुम्हारे अनुभवों के माध्यम से तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन करेगा और केवल तभी तुम उसके कार्यों को देख सकोगे। ये सभी चीजें आस्था के माध्यम से ही हासिल की जाती हैं। आस्था केवल शोधन के माध्यम से ही आती है और शोधन की अनुपस्थिति में आस्था विकसित नहीं हो सकती। आस्था का संदर्भ किस चीज से है? आस्था वह सच्चा विश्वास और निष्कपट हृदय है जो मनुष्यों में तब होना चाहिए जब वे किसी चीज को देख या छू न सकते हों, जब परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप न हो या जब वह मनुष्यों की पहुँच से बाहर हो। यही वह आस्था है, जिसकी मैं बात करता हूँ(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा)। “शैतान चाहे कितना ही ‘अत्यधिक शक्तिशाली’ क्यों न हो, चाहे वह कितना ही ढीठ और महत्वाकांक्षी क्यों न हो, चाहे उसमें नुकसान पहुँचाने की कितनी ही बड़ी क्षमता क्यों न हो, मनुष्य को भ्रष्ट करने और लुभाने की उसकी क्षमताएँ कितनी ही व्यापक क्यों न हों, मनुष्य को डराने-धमकाने की उसकी चालें और साजिशें कितनी ही चतुर क्यों न हों, या उसके अस्तित्व के रूप कितने ही विविध क्यों न हों, वह कभी एक भी सजीव वस्तु बनाने, सभी चीजों के अस्तित्व के लिए नियम या कानून बनाने, या किसी भी वस्तु पर, चाहे वह सजीव हो या निर्जीव, शासन करने या संप्रभुता रखने में सक्षम नहीं हुआ है। ब्रह्मांड और आकाशमंडल में, एक भी ऐसा व्यक्ति या ऐसी वस्तु नहीं है जो उसके द्वारा अस्तित्व में लाई गई हो या जो उसके कारण अस्तित्व में हो; एक भी ऐसा व्यक्ति या ऐसी वस्तु नहीं है जो उसकी संप्रभुता में हो या उसके द्वारा शासित हो। इसके विपरीत उसे न केवल परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन रहना पड़ता है, बल्कि उसे परमेश्वर की सभी आज्ञाओं और आदेशों का पालन भी करना पड़ता है। परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान जमीन पर पानी की एक बूँद या रेत के एक कण को भी आसानी से छू नहीं सकता; परमेश्वर की अनुमति के बिना, शैतान जमीन पर चींटियों का भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता, मानवजाति की तो बात ही छोड़ दो, जिसे परमेश्वर ने बनाया था। परमेश्वर की नजरों में, शैतान पहाड़ पर उगे सोसन के फूलों, हवा में उड़ते पक्षियों, समुद्र की मछलियों और धरती पर रेंगती इल्लियों से भी तुच्छ है। सभी चीजों के बीच उसकी भूमिका सभी चीजों की सेवा करना, मानवजाति की सेवा करना और परमेश्वर के कार्य और उसकी प्रबंधन योजना की सेवा करना है(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि सभी चीजों और घटनाओं पर परमेश्वर की संप्रभुता है। परमेश्वर की अनुमति के बिना शैतान मेरी जान नहीं ले सकता है, फिर चाहे यह कितना भी उच्छृंखल या दुष्ट क्यों न हो। यह ठीक वैसा ही है जैसा अय्यूब के परीक्षण के समय हुआ था। परमेश्वर ने शैतान को उसकी जान लेने की अनुमति नहीं दी, और शैतान ने परमेश्वर द्वारा तय की गई सीमा को पार करने की हिम्मत नहीं की। लेकिन परमेश्वर में मेरी आस्था बहुत कम थी। जब मैंने देखा कि माहौल शत्रुतापूर्ण है, तो मैं एक यहूदा द्वारा पहचाने जाने या पुलिस द्वारा निगरानी रखे जाने और गिरफ्तार किए जाने से डर गई, इसलिए मैं कायरता और डर में जी रही थी और भेंटें हटाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। यह सोचकर मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। “मैं एक कायर कछुए की तरह अपने कवच में नहीं छिप सकती : सभी चीजें और घटनाएँ परमेश्वर के हाथों में हैं, तो क्या मेरा गिरफ्तार होना भी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन नहीं है? अगर परमेश्वर ने मुझे गिरफ्तार होने दिया, तो यह मेरी एक परीक्षा होगी। मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहने और यह कसम खाने की जरूरत है कि मैं मर जाना पसंद करूँगी लेकिन यहूदा नहीं बनूँगी, न परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करूँगी।” इसलिए मैंने प्रार्थना की, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर, तुम पर मेरी आस्था बहुत ही कम है। मैं कायरता में नहीं जीना चाहती। कृपया, मुझे आस्था और शक्ति दो। मैं खुद को तुम्हारे हाथों में सौंपने, तुम्हारे आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने और जल्द से जल्द भेंटें हटाने को तैयार हूँ।”

उसके बाद, मैं भेंटें हटाने के लिए पहले भंडार घर गई। मैं वहाँ पहले एक बार ही गई थी और मुझे सटीक घर या माला याद नहीं था। मुझे अभिरक्षक के लौटने का बाहर इंतजार करना था। लेकिन आस-पास की एक बहन कुछ महीने पहले गिरफ्तार हो गई थी, और पुलिस हाल ही में भाई-बहनों पर चुपके से निगरानी कर रही थी। मुझे डर था कि अगर मैं वहाँ ज्यादा देर रुकी तो मैं पहचान ली जाऊँगी, इसलिए मैंने ज्यादा देर इंतजार करने की हिम्मत नहीं की। जैसे ही मैं निकलने वाली थी, अभिरक्षक राशन-सब्जी खरीदकर वापस आ गई। उस दोपहर, हमने सफलतापूर्वक वहाँ से भेंटें हटा दीं। उसके ठीक बाद, मैं दूसरे अभिरक्षकों के बारे में पूछने के लिए बहन शिन चेंग को ढूँढ़ने गई। मेरे अंदर जाते ही, उसने डरते हुए कहा, “मुझे गिरफ्तार कर पाँच दिनों तक हिरासत में रखा गया था। मुझे कल रात ही रिहा किया गया है। झाओ हुई अपने जानने वाले हर भाई-बहन के साथ गद्दारी कर चुका है। परमेश्वर के वचनों की किताबें तुरंत हटानी होंगी!” मैंने सोचा, “शिन चेंग अभी-अभी रिहा हुई है। क्या पुलिस चुपके से उसके घर पर नजर रख रही है? क्या मैं देख ली जाऊँगी?” मैं हड़बड़ा गई और डर गई और कुछ मिनट बात करने के बाद जल्दी से चली गई। पूरे रास्ते डर से मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं सोचती रही, “क्या मैं पहले ही देख ली गई हूँ? मैं कल रात किताबें हटाने नहीं जाऊँगी। मैं इसे सँभालने के लिए दूसरे भाई-बहनों से कहूँगी।” अगले दिन मेरा दिल लगातार बेचैन था। मैं जानती थी कि झाओ हुई उन सभी घरों में जा चुका है जहाँ किताबें रखी थीं, और किताबें तुरंत हटानी जरूरी थीं। उस समय यह करने के लिए कोई और उपयुक्त नहीं था : यह काम मुझे ही सँभालना था। मैंने उन सब भाई-बहनों के बारे में सोचा, जिनका बड़े लाल अजगर द्वारा पीछा किया जा रहा था और जिन्हें वांछितों की सूची में डाल दिया था, लेकिन जो कलीसिया का कार्य करने के लिए अभी भी परमेश्वर पर निर्भर करते थे। गिरफ्तार होने पर भी वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रहने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल पाए थे। जबकि मैं गिरफ्तार तक नहीं हुई थी और सिर्फ इसलिए कायर होकर पीछे हट रही थी कि माहौल शत्रुतापूर्ण था। मैं उनसे बहुत पीछे थी। मुझे शर्मिंदगी और अपराध-बोध हुआ। फिर मुझे दो दिन पहले सभा में पढ़े गए परमेश्वर के वचन याद आए : “कुछ कलीसियाओं के इर्द-गिर्द शत्रुतापूर्ण वातावरण है जिसमें लोगों को अक्सर गिरफ्तार कर लिया जाता है और इस वजह से इस बात की बड़ी संभावना रहती है कि जिन घरों में भेंटें सुरक्षित रखी गई हों उन स्थानों का विश्वासघात कर भेद बता दिया जाए और यहाँ बड़ा लाल अजगर छापे मार ले और तलाशी ले ले—भेंटें किसी भी समय बुरे राक्षसों द्वारा लूटी जा सकती हैं। क्या ऐसे स्थान भेंटें रखने के लिए उपयुक्त हैं? (नहीं।) ऐसे में अगर वे पहले से ही वहाँ रखी हैं तो क्या करें? उन्हें तुरंत किसी दूसरी जगह भेज दो। ... इस स्थिति का सामना करते समय अगुआओं और कार्यकर्ताओं को स्पष्ट समझ होनी चाहिए, ‘जिन स्थानों पर भेंटें रखी जा रही हैं उनमें से एक स्थान उपयुक्त नहीं है। वातावरण बहुत खतरनाक है और आसपास के क्षेत्र में कई भाई-बहनों को गिरफ्तार किया गया है, उनका पीछा किया गया है या उन्हें निगरानी में रखा गया है। हमें भेंटों को वहाँ से निकालने का कोई तरीका सोचना होगा। उन्हें वहीं छोड़कर छिनने का इंतजार करने से बेहतर कदम होगा अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान पर ले जाना।’ जब कोई स्थिति अभी-अभी उत्पन्न हुई हो और वे ताड़ लें कि भेंटें खतरे में है तो उन्हें तुरंत हटा देना चाहिए, ताकि उन्हें बड़े लाल अजगर, बुरे दानव के कब्जे में जाने और हड़पने से बचाया जा सके। भेंटों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसी भी तरह की गड़बड़ी या चूक से बचने का यही एकमात्र तरीका है। यह वह काम है जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को करना चाहिए। जैसे ही खतरे का थोड़ा-सा भी संकेत मिले, जैसे ही किसी को गिरफ्तार किया जाए, जैसे ही कोई स्थिति उत्पन्न हो, अगुआओं और कार्यकर्ताओं को सबसे पहले सोचना चाहिए कि क्या भेंटें सुरक्षित हैं, क्या वे दुष्ट लोगों के हाथों में पड़ सकती हैं या दुष्ट लोग उन पर कब्जा कर सकते हैं, या बुरे राक्षस छीनकर ले जा सकते हैं और क्या भेंटों को कोई नुकसान हुआ है। उन्हें भेंटों की सुरक्षा के कदम तुरंत उठाने चाहिए। यह अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है। कुछ अगुआ और कार्यकर्ता कह सकते हैं, ‘ये काम करने में हमें जोखिम उठाना होगा। क्या ऐसा हो सकता है कि हम ऐसा न करें? क्या ऐसा नहीं है कि हमारी पहली प्राथमिकता लोग हैं, यानी भेंटों को प्राथमिकता देना आवश्यक नहीं है, लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?’ तुम उनके सवाल के बारे में क्या सोचते हो? क्या इन लोगों में मानवता है? (नहीं।) भेंटों की अच्छी तरह से सुरक्षा करना, उनका अच्छी तरह से प्रबंधन करना और उनकी अच्छी तरह से देखभाल करना—ये ऐसी जिम्मेदारियाँ हैं जिन्हें किसी भी अच्छे प्रबंधक को पूरा करना चाहिए। अधिक गंभीर शब्दों में, यह काम इस लायक है कि अपने जीवन का बलिदान भी करना पड़े तो कर दो और यह वह काम है जो तुम्हें करना चाहिए। यह तुम्हारी जिम्मेदारी है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (12))। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि अब जब एक यहूदा ने भंडार घरों के ठिकानों की सूचना दुश्मन को दे दी है, तो भेंटें और परमेश्वर के वचनों की किताबें किसी भी समय सीसीपी द्वारा जब्त की जा सकती हैं। उन्हें तुरंत हटाना था, और यह मेरा परम कर्तव्य था। मैंने अक्सर भाई-बहनों के साथ महत्वपूर्ण क्षणों में कलीसिया के हितों की रक्षा करने के बारे में संगति की थी, लेकिन जब यह माहौल मेरे सामने आया तो मेरा पहला विचार खुद को बचाने का था। मैं यह काम दूसरों पर डालना चाहती थी और किसी भगोड़ी की तरह छिप जाना चाहती थी। क्या यह परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं था? परमेश्वर की भेंटों और उसके वचनों की किताबों की रक्षा करना एक ऐसी जिम्मेदारी और दायित्व है जिसे परमेश्वर के हर विश्वासी को पूरा करना चाहिए। अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के लिए मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहना था और फौरन परमेश्वर की भेंटों को हटाना था और उनकी रक्षा करनी थी। मैं चाहे गिरफ्तार होऊँ या न होऊँ और मुझे चाहे जिस माहौल का अनुभव करना पड़े, मैं परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करूँगी।

बाद में, मैंने विचार किया, “जब मैं खतरनाक माहौल में होती हूँ तो हमेशा अपने दैहिक हितों के बारे में क्यों सोचती हूँ? इसका मूल कारण क्या है?” विचार करते हुए मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “मसीह-विरोधी बेहद स्वार्थी और घिनौने होते हैं। उनमें परमेश्वर के प्रति सच्ची आस्था नहीं होती, परमेश्वर के प्रति निष्ठा तो बिल्कुल नहीं होती; जब उनके सामने कोई मसला आता है तो वे केवल अपना बचाव और अपनी सुरक्षा करते हैं। उनके लिए अपनी सुरक्षा से ज्यादा जरूरी और कुछ नहीं है। अगर वे जिंदा रह सकें और गिरफ्तार न हों तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि कलीसिया के काम को कितना नुकसान हुआ है। ये लोग बेहद स्वार्थी हैं, वे भाई-बहनों के बारे में या कलीसिया के काम के बारे में बिल्कुल नहीं सोचते, सिर्फ अपनी सुरक्षा के बारे में सोचते हैं। वे मसीह-विरोधी हैं। तो ऐसी चीजें जब उन लोगों के साथ घटती हैं जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं और परमेश्वर में सच्ची आस्था रखते हैं तो वे इन्हें कैसे सँभालते हैं? वे जो करते हैं वह मसीह-विरोधियों के काम से किस तरह अलग है? (जब ऐसी चीजें उन लोगों के साथ घटती हैं जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं तो वे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करने, परमेश्वर के चढ़ावे को नुकसान से बचाने के लिए हर तरीके के बारे में सोचेंगे और वे नुकसान को कम करने के लिए अगुआओं और कार्यकर्ताओं और भाई-बहनों के लिए जरूरी व्यवस्थाएँ भी करेंगे। जबकि मसीह-विरोधी सबसे पहले यह सुनिश्चित करते हैं कि वे सुरक्षित रहें। वे कलीसिया के कार्य या परमेश्वर के चुने हुए लोगों की सुरक्षा के बारे में चिंता नहीं करते और जब कलीसिया को गिरफ्तारियों का सामना करना पड़ता है तो इससे कलीसिया के कार्य को नुकसान होता है।) मसीह-विरोधी कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के चढ़ावे को छोड़ देते हैं और वे गिरफ्तारी के बाद की स्थिति सँभालने के लिए लोगों की व्यवस्था नहीं करते। यह बड़े लाल अजगर को परमेश्वर के चढ़ावे और उसके चुने हुए लोगों को अपने कब्जे में लेने की अनुमति देने के समान है। क्या यह परमेश्वर के चढ़ावे और उसके चुने हुए लोगों के साथ परोक्ष विश्वासघात नहीं है? जब वे लोग जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं, स्पष्ट रूप से जानते हैं कि परिवेश खतरनाक है, तब भी वे गिरफ्तारी के बाद का कार्य सँभालने का जोखिम उठाते हैं और खुद वहाँ से निकलने से पहले वे परमेश्वर के घर को होने वाले नुकसान को न्यूनतम कर देते हैं। वे अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं देते। मुझे बताओ, बड़े लाल अजगर के इस दुष्ट राष्ट्र में कौन यह सुनिश्चित कर सकता है कि परमेश्वर में विश्वास करने और कर्तव्य करने में कोई भी खतरा न हो? चाहे व्यक्ति कोई भी कर्तव्य निभाए, उसमें कुछ जोखिम तो होता ही है—लेकिन कर्तव्य का निर्वहन परमेश्वर द्वारा सौंपा गया आदेश है और परमेश्वर का अनुसरण करते हुए व्यक्ति को अपना कर्तव्य निभाने का जोखिम उठाना ही चाहिए। इसमें व्यक्ति को बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए और अपनी सुरक्षा के इंतजाम करने की भी आवश्यकता होती है, लेकिन उसे अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को पहला स्थान नहीं देना चाहिए। उसे पहले परमेश्वर के इरादों पर विचार करना चाहिए, उसके घर के कार्य और सुसमाचार के प्रचार को सबसे ऊपर रखना चाहिए। परमेश्वर ने तुम्हें जो आदेश सौंपा है, उसे पूरा करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है और यह सबसे पहले आता है। मसीह-विरोधी अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं; उनका मानना है कि किसी और चीज का उनसे कोई लेना-देना नहीं है। जब किसी दूसरे के साथ कुछ होता है तो वे परवाह नहीं करते, चाहे वह कोई भी हो। जब तक खुद मसीह-विरोधियों के साथ कुछ बुरा नहीं होता, तब तक वे आराम से बैठे रहते हैं। वे निष्ठारहित होते हैं, जो मसीह-विरोधियों के प्रकृति सार से निर्धारित होता है। ... मसीह-विरोधी परमेश्वर के प्रति कोई निष्ठा नहीं दिखाते। जब उन्हें काम सौंपा जाता है तो वे इसे बहुत खुशी से स्वीकार लेते हैं और कुछ अच्छी घोषणाएँ करते हैं, मगर जब खतरा आता है तो वे सबसे तेजी से भागते हैं; सबसे पहले भागने वाले, सबसे पहले बचकर निकलने वाले वही होते हैं। इससे पता चलता है कि उनका स्वार्थ और घिनौनापन बहुत गंभीर है। उन्हें जिम्मेदारी या निष्ठा का कोई एहसास नहीं है। जब किसी समस्या का सामना करना पड़ता है तो वे केवल भागना और छिपना जानते हैं, और वे सिर्फ खुद को बचाने के बारे में सोचते हैं, कभी अपनी जिम्मेदारियों या कर्तव्यों पर विचार नहीं करते। अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा की खातिर मसीह-विरोधी लगातार अपनी स्वार्थी और घिनौनी प्रकृति दिखाते हैं। वे परमेश्वर के घर के काम या अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता नहीं देते। वे परमेश्वर के घर के हितों को तो और भी कम प्राथमिकता देते हैं। इसके बजाय, वे अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग दो))। “परमेश्वर के प्रति निष्ठावान लोगों और बिना निष्ठा वाले लोगों के काम करने के तरीके की प्रकृति में अंतर होता है। जब दोनों का सामना ऐसे मामलों से होता है जिनमें खतरा शामिल है तो निष्ठावान लोग कार्य व्यवस्थाओं को लागू करने के लिए बुद्धि और तरीकों का इस्तेमाल करके खतरे का सामना करने और अपना काम करने में सक्षम होते हैं। लेकिन खतरा हो या न हो, मसीह-विरोधी ठोस काम नहीं करते और न ही वे कभी कार्य व्यवस्थाओं को लागू करते हैं। यही अंतर है। ... उनमें निष्ठा की कमी होती है, वे स्वार्थी और घिनौने होते हैं और हर चीज में अपनी सुरक्षा के बारे में सोचते हैं। वे कभी भी परमेश्वर के घर की कार्य व्यवस्थाओं को लागू करने या परमेश्वर के घर के कार्य की प्रगति के बारे में नहीं पूछते और उन्हें इन चीजों की परवाह नहीं होती। उन्होंने अपनी निष्ठा प्रस्तुत नहीं की है और वे अपनी निष्ठा नहीं दिखाते हैं। उनके लिए इन मामलों के संबंध में खानापूर्ति कर लेना ही बहुत है; वे इसे काम करना मानते हैं। अगर जोखिम छोटा है तो वे न चाहते हुए थोड़ा-बहुत काम कर सकते हैं। लेकिन अगर जोखिम बड़ा है और उनके पकड़े जाने की संभावना है तो फिर चाहे काम कितना भी जरूरी क्यों न हो, वे इसे नहीं करेंगे। यही मसीह-विरोधियों का सार है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग दो))। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि जो लोग परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं वे अपने ऊपर खतरा आने पर व्यक्तिगत लाभ या हानि पर विचार न करने में सक्षम होते हैं। जब वे देखते हैं कि भेंटें खतरे में हैं तो वे उनकी रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डाल देंगे। वे मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति वफादार रहते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करते हैं। लेकिन मसीह-विरोधियों में बेहद स्वार्थी और विश्वासघाती प्रकृति होती है। खतरनाक माहौल में वे केवल अपनी सुरक्षा का विचार करते हैं और अपने कर्तव्य के प्रति उनमें कोई जिम्मेदारी की भावना नहीं होती। क्या मेरा व्यवहार ठीक एक मसीह-विरोधी जैसा नहीं था? मैं पता लगा चुकी थी कि झाओ हुई यहूदा बन गया है और बहुत-से अगुआओं, कार्यकर्ताओं और भाई-बहनों से गद्दारी कर चुका है, इसलिए वे घर खतरे में थे जहाँ भेंटें रखी थीं। भेंटें तुरंत हटानी थीं। लेकिन उस महत्वपूर्ण क्षण में, मेरा पहला विचार अपनी सुरक्षा, अपनी संभावनाओं और अपने लिए एक रास्ते का था। मैं एक कायर कछुए की तरह अपने कवच में सिमट जाना चाहती थी। मैं बहुत स्वार्थी और नीच थी! अगर मेरी स्वार्थपरता और गैर-जिम्मेदारी के कारण भेंटें बड़े लाल अजगर के हाथ लग जातीं, तो मैं उस यहूदा से कैसे जरा-सी भी अलग होती जो अपने पक्ष के साथ विश्वासघात कर अपनी खाल बचाता है? मैंने “देर से दी गई मेरी गवाही” में भाई झोंग के बारे में सोचा, जिसने परमेश्वर के वचनों की किताबें हटाने और अपने कर्तव्य पर अडिग रहने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। और अनुभवजन्य गवाही वीडियो “खतरनाक परिवेश में एक विकल्प” में नायिका ने बाद की स्थिति को सँभालने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल दी। भले ही वह कमजोर और डरी हुई थी, उसने अपने भ्रष्ट स्वभाव को सुलझाने के लिए सत्य खोजा और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा के लिए अपनी जान देने को तैयार थी। उन दोनों ने परमेश्वर के लिए सुंदर और शानदार गवाहियाँ दीं। यह सोचकर, मुझे बहुत शर्मिंदगी महसूस हुई और मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर, कलीसिया में बहुत-से भाई-बहन गिरफ्तार हो चुके हैं और बाद की स्थिति को तुरंत सँभालना होगा। लेकिन मैं गिरफ्तार होने से डरती हूँ और बस इस माहौल से बचना चाहती हूँ। मैं बहुत स्वार्थी और मानवताविहीन हूँ! परमेश्वर, मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ। बाद की स्थिति को अच्छी तरह सँभालने के लिए मैं तुम पर निर्भर करूँगी।”

मैंने यह भी विचार किया, “जब भी कुछ होता है तो मैं हमेशा डर के मारे पीछे क्यों हटती रहती हूँ?” मुख्य कारण था मेरा मृत्यु से भय; मैंने इसका अर्थ सही में नहीं समझा था। फिर मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “प्रभु यीशु के उन शिष्यों की मौत कैसे हुई? उनमें ऐसे शिष्य थे जिन्हें पत्थरों से मार डाला गया, घोड़े से बाँध कर घसीटा गया, सूली पर उलटा लटका दिया गया, पाँच घोड़ों से खिंचवाकर उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए—विभिन्न रूपों की मौत उन पर टूटी। उनकी मृत्यु का कारण क्या था? क्या ऐसा है कि उन्होंने कुछ गलत काम किया और फिर उन्हें कानून के जरिए सजा दी गई? नहीं। उन्होंने प्रभु के सुसमाचार का प्रसार किया, लेकिन दुनिया के लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया और इसके बजाय उनकी निंदा की, उन्हें पीटा और उन्हें कोसा, यहाँ तक कि उन्हें मार डाला—इस तरह वे शहीद हुए। आओ, हम उन शहीदों के अंतिम परिणाम या उनके कर्मों पर परमेश्वर के फैसले के बारे में बात न करें, बल्कि यह पूछें : जब वे शहीद अंत तक पहुँचे, तो क्या उनके जीवन के अंत के तरीके मानवीय धारणाओं के अनुरूप थे? (नहीं, वे नहीं थे।) मानवीय धारणाओं के परिप्रेक्ष्य से, उन शहीदों ने परमेश्वर के कार्य का प्रसार करने के लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाई, लेकिन अंततः शैतान द्वारा उन्हें गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाकर मार डाला गया। यह मानवीय धारणाओं के अनुरूप नहीं है। हालाँकि, ये चीजें ठीक वही हैं जो उन पर बीतीं—यह वही है जिसकी परमेश्वर ने अनुमति दी। इसमें कौन-सा सत्य खोजा जा सकता है? क्या परमेश्वर का उन्हें इस तरह मरने देना उसका शाप और निंदा थी या यह उसकी व्यवस्था थी, उसका आशीष था? यह दोनों में से कुछ भी नहीं था। यह क्या था? उन शहीदों की मौतों के बारे में सोचकर लोगों को दुख होता है, फिर भी ये वास्तव में तथ्य हैं। परमेश्वर में विश्वास करने वालों के इस तरह मरने के लिए क्या स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए? जब हम इस विषय का उल्लेख करते हैं, तो तुम लोग खुद को उनकी जगह पर रखते हो, तो क्या तुम लोग अपने दिलों में परेशान और थोड़ा-सा छिपा हुआ दर्द महसूस करते हो? तुम सोचते हो, ‘इन लोगों ने परमेश्वर के सुसमाचार का प्रसार करने का अपना कर्तव्य निभाया, इन्हें अच्छा इंसान माना जाना चाहिए, तो फिर उनका अंत, और उनका परिणाम ऐसा कैसे हो सकता है?’ वास्तव में, उनके शरीर इसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुए और चल बसे; यह मानव संसार से प्रस्थान का उनका अपना तरीका था, तो भी इसका यह अर्थ नहीं था कि उनका परिणाम भी वैसा ही था। उनके निधन और प्रस्थान का तरीका चाहे जो भी रहा हो या यह चाहे जैसे भी हुआ हो, लेकिन परमेश्वर ने उन जीवनों के, उन सृजित प्राणियों के अंतिम परिणाम इस तरह निर्धारित नहीं किए थे। यह ऐसी बात है जो तुम्हें स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए। इसके विपरीत, यह सटीक तौर पर वह तरीका था जिससे उन्होंने इस संसार की घोर निंदा की और परमेश्वर के कर्मों की गवाही दी। इन सृजित प्राणियों ने अपने सर्वाधिक बहुमूल्य जीवन का उपयोग किया—उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षण का उपयोग—परमेश्वर के कर्मों की गवाही देने के लिए किया, परमेश्वर के महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए किया और शैतान तथा इस संसार के समक्ष यह घोषणा करने के लिए किया कि परमेश्वर के कर्म सही हैं, प्रभु यीशु परमेश्वर है, वह प्रभु है और परमेश्वर का देहधारी शरीर है। यहाँ तक कि अपने जीवन के बिल्कुल अंतिम क्षण तक उन्होंने प्रभु यीशु का नाम कभी नहीं नकारा। क्या यह इस संसार को दोषी ठहराने का एक रूप नहीं था? उन्होंने अपने जीवन का उपयोग संसार के समक्ष यह घोषणा करने, मनुष्यों के सामने यह साबित करने के लिए किया कि प्रभु यीशु प्रभु है, प्रभु यीशु मसीह है, वह परमेश्वर का देहधारी है, कि उसने समस्त मानवजाति के छुटकारे के लिए जो कार्य किया वही मानवजाति को जीवित रख पाया है—यह सच्चाई कभी बदलने वाली नहीं है। जो लोग प्रभु यीशु के सुसमाचार का प्रसार करने के लिए शहीद हुए, उन्होंने किस सीमा तक अपना कर्तव्य निभाया? क्या यह अंतिम सीमा तक किया गया था? यह अंतिम सीमा कैसे परिलक्षित होती थी? (उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया।) यह सही है, उन्होंने अपने जीवन से कीमत चुकाई। परिवार, सम्पदा, और इस जीवन की भौतिक वस्तुएँ, सभी बाहरी चीजें हैं; स्वयं से संबंधित एकमात्र चीज जीवन है। प्रत्येक जीवित व्यक्ति के लिए जीवन सबसे अधिक सँजोने योग्य है, सबसे बहुमूल्य है और संयोग से ये लोग मानवजाति के प्रति परमेश्वर के प्रेम की पुष्टि और गवाही के रूप में अपनी सबसे बहुमूल्य वस्तु अर्पित कर सके। अपनी मृत्यु तक उन्होंने परमेश्वर के नाम को नहीं नकारा, न ही परमेश्वर के कार्य को नकारा, और उन्होंने जीवन के अपने अंतिम क्षणों का उपयोग इस तथ्य के अस्तित्व की गवाही देने के लिए किया—क्या यह गवाही का सर्वोच्च रूप नहीं है? यह अपना कर्तव्य निभाने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा है; अपना उत्तरदायित्व इसी तरह पूरा किया जाता है।” “अगर जब तुमसे तुम्हारा जीवन छीना जा रहा हो, तुम शांतचित्त हो, इच्छुक हो और बिना किसी शिकायत के समर्पण करते हो, तुम्हें लगता है कि तुमने अंत तक अपनी जिम्मेदारियाँ, दायित्व और अपना कर्तव्य पूरा किया है और तुम्हारा दिल आनंदित और शांत है—अगर तुम्हारी मृत्यु इस तरह होती है—तो परमेश्वर की निगाह में तुम मरे ही नहीं हो। बल्कि, तुम दूसरे लोक में और दूसरे रूप में रह रहे हो। केवल यही हुआ है कि तुम्हारा जीने का तरीका बदल गया है—तुम वास्तव में मरे नहीं हो। मनुष्यों की नजर में, ‘यह व्यक्ति इतनी कम उम्र में चल बसा, कितने दुख की बात है!’ मगर परमेश्वर की नजर में तुम न तो मरे हो, न ही कष्ट भोगने गए हो; बल्कि तुम आशीष का आनंद लेने गए हो और परमेश्वर के करीब आए हो। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक सृजित प्राणी के रूप में तुम पहले ही परमेश्वर की नजरों में अपना कर्तव्य निभाने में मानक स्तर तक पहुँच चुके हो, अब तुम्हारा कर्तव्य पूरा हो गया है और परमेश्वर को अब सृजित प्राणियों के बीच इस कर्तव्य को निभाने के लिए तुम्हारी आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर के लिए, तुम्हारे ‘जाने’ को ‘जाना’ नहीं कहा जाता, बल्कि इसे ‘ले जाया जाना,’ ‘वापस ले जाया जाना,’ या ‘आगे बढ़ाया जाना’ कहा जाता है और यह एक अच्छी बात है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सुसमाचार का प्रचार करना वह कर्तव्य है जिसे निभाना सभी विश्वासियों का दायित्व है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि परमेश्वर का आदेश पूरा करने के लिए अपना जीवन दे देना एक सार्थक और मूल्यवान मृत्यु है, जिसे परमेश्वर याद रखता है। भले ही देह मर जाती है, पर आत्मा परमेश्वर के पास लौट जाती है। यह पूरे इतिहास के दौरान के उन संतों जैसा है जिन्हें प्रभु का सुसमाचार फैलाने के कारण उत्पीड़ित किया गया था। कुछ को पाँच घोड़ों से खिंचवाकर अंग भंग कर दिया गया, कुछ को मरते दम तक घोड़ों के पीछे घसीटा गया, कुछ की पत्थर मार-मारकर जान ले ली गई और दूसरों को सूली पर चढ़ा दिया गया। उन्होंने परमेश्वर के कर्मों और उसके महान सामर्थ्य की गवाही देने के लिए अपने कीमती जीवन का इस्तेमाल किया। भले ही उनके शरीर मर गए, पर उनकी आत्माएँ परमेश्वर के पास लौट गईं और इन्होंने उसकी स्वीकृति प्राप्त की। लेकिन मैं यातना दे-देकर मारी जाने से भयाक्रांत थी, इसलिए मैंने खुद को बचाने के लिए अपने कर्तव्य से इनकार कर दिया। यह परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। इस तरह डरपोक और कायरता से जीना व्यर्थ और अर्थहीन है; यह एक चलती-फिरती लाश होने जैसा है। अगर मेरे समय पर न हटाने के कारण भेंटें पुलिस द्वारा जब्त कर ली जातीं, तो यह मुझ पर एक शाश्वत अपराध और दाग होता, और मैं परमेश्वर के दंड और श्राप की हकदार होती। यह समझकर, मैं अपनी सभी चिंताओं और शंकाओं को छोड़कर अपना जीवन और मृत्यु परमेश्वर के हाथों में सौंपने को तैयार थी। अगर परमेश्वर ने मुझे गिरफ्तार होने दिया, तो मैं उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करूँगी और अपनी गवाही में अडिग रहने के लिए उस पर निर्भर रहूँगी। उसके बाद, जब मैंने किताबें हटाईं, तो मुझे अभी भी चिंताएँ और शंकाएँ थीं, लेकिन मैंने अपने दिल में प्रार्थना की और परमेश्वर की ओर देखा और अब कायर होकर पीछे नहीं हटी। जब मैं बाहर निकली तो मैंने अपना भेष बदल लिया और निगरानी कैमरों से बचने की पूरी कोशिश की। परमेश्वर की अगुआई में, उस कलीसिया के तीनों भंडार घरों से भेंटें और परमेश्वर के वचनों की किताबें सुरक्षित हटा दी गईं।

इस बार बाद की स्थिति को सँभालने के जरिए मुझे अपने स्वार्थपूर्ण और नीच शैतानी स्वभाव की कुछ समझ मिली। मुझे मृत्यु के अर्थ के बारे में भी थोड़ी और समझ मिली और मुझे अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने और अपने कर्तव्य पर अडिग रहने का संकल्प मिला। मैंने इस मामले में परमेश्वर की बुद्धि भी देखी कि वह लोगों को बेनकाब करने और उन्हें पूर्ण बनाने की सेवा प्रदान करने में बड़े लाल अजगर का उपयोग करता है। परमेश्वर का धन्यवाद!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

लेने से देना अधिक धन्य है

हैरी, स्पेनकुछ साल पहले कलीसिया अगुआओं ने मुझे वीडियो बनाने के काम में लगाया था। उन्होंने यह भी कहा कि अभी वीडियो बनाने वाले लोगों की कमी...

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें