मैं समझती हूँ कि मैं बहुत ही स्वार्थी हूँ

15 अप्रैल, 2026

यान झेन, चीन

अप्रैल 2024 में मैं जिला अगुआ चुनी गई और उस समय मैं बहुत दबाव महसूस कर रही थी। मुझे लगा कि इस कर्तव्य की जिम्मेदारी बहुत भारी थी, इसमें बहुत मुश्किलें आएँगी और मुझे बहुत चिंता करनी होगी और बड़ी कीमत चुकानी होगी। लेकिन मुझे एहसास हुआ कि यह कर्तव्य मुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह था और मुझे सिर्फ अपने दैहिक हितों के बारे में नहीं सोचना चाहिए, इसलिए मैंने खुशी-खुशी इसे स्वीकार कर लिया। चूँकि मैं इस कर्तव्य में नई थी, इसलिए मुझे सौंपा गया काम अपेक्षाकृत हल्का था और मुझे केवल पाठ-आधारित कार्य और कलीसियाई जीवन की जिम्मेदारी मिली थी। अपने खाली समय में मैं वीडियो भी देख सकती थी और भजन भी सुन सकती थी। मुझे लगा कि इस तरह से अपना कर्तव्य करना काफी अच्छा है। जल्द ही मेरे साथ सहयोग करने वाली एक बहन को वास्तविक कार्य न करने के कारण बरखास्त कर दिया गया, इसलिए मैंने कलीसिया की स्वच्छता का वह कार्य सँभाल लिया जिसकी वह प्रभारी थी। कार्य सँभालने के दौरान ही मुझे एहसास हुआ कि स्वच्छता कार्य में बहुत सारे मसले थे, स्वच्छता सामग्री को व्यवस्थित करने के लिए पर्याप्त लोग नहीं थे और समीक्षा के लिए स्वच्छता सामग्री का एक बड़ा ढेर लग गया था। मुझे लगा कि मेरे काम का बोझ एकदम से बहुत बढ़ चुका था और मेरी दैनिक कार्यसूची ठसाठस भरी हुई थी।

एक दिन जब मैं अपने काम निपटा रही थी तो मेरी सहयोगी बहन च्यू यान ने कहा, “सुसमाचार कार्य में मुश्किलें आ गई हैं और नतीजों में भी काफी गिरावट आई है। हमें मिलकर इसका हल निकालने के लिए चर्चा करनी होगी।” उनकी बातचीत सुनकर मुझे वैसे ही मसले याद आ गए जो मैंने पहले कलीसिया अगुआ रहते हुए देखे थे। जब भाई-बहन सुसमाचार प्रचार में मुश्किलों का सामना करते थे तो अगुआ और कार्यकर्ता परमेश्वर के इरादों या सुसमाचार प्रचार के सत्यों पर संगति नहीं करते थे; वे बस प्रगति के लिए जोर देते रहते थे। सुसमाचार कार्य में खराब नतीजे आने का यही मुख्य कारण था। मैं इस मसले के बारे में खुलकर बोलना चाहती थी, लेकिन फिर मैंने सोचा, “जिस स्वच्छता कार्य के लिए मैं जिम्मेदार हूँ उसमें भी बहुत सारे मसले हैं। मेरा दिमाग हर दिन निरंतर व्यस्त रहता है। इसलिए अगर मैं सुसमाचार कार्य में भी शामिल हो गई तो क्या यह मेरे लिए अतिरिक्त मेहनत नहीं होगी? मैं इतनी अतिरिक्त ऊर्जा कहाँ से लाऊँगी?” इसलिए मुझे लगा कि मुझे बस उस कार्य पर ध्यान देना चाहिए जिसके लिए मैं जिम्मेदार हूँ। यह सोचकर मैंने कुछ नहीं कहा और बस अपने काम में लगी रही। च्यू यान और ली युए ने देर तक चर्चा की पर कोई हल नहीं निकाल पाईं, इसलिए च्यू यान ने मुझसे पूछा कि क्या मेरे पास कोई अच्छा सुझाव है। मैंने मन में सोचा, “मैंने अभी अपने काम ही खत्म नहीं किए हैं। अगर मैं सुसमाचार कार्य की चर्चा में शामिल हो गई तो क्या इससे उस कार्य में देरी नहीं हो जाएगी जो मेरे हाथ में है?” इसलिए मैंने इनकार कर दिया और कहा, “तुम दोनों ही चर्चा कर लो। मेरे पास अभी बहुत से जरूरी काम पड़े हैं।” ली युए ने मेरा रवैया देखा और सख्ती से मुझसे कहा, “मसले पहचानने की हर किसी की क्षमता सीमित होती है। काम की मुश्किलों को हल करने के लिए सबका मिलकर चर्चा करना जरूरी है। तुम गैर-जिम्मेदारी दिखा रही हो!” बहन के टोकने पर मुझे आत्मग्लानि महसूस हुई, मैं सोचने लगी कि मैंने वाकई बहुत स्वार्थ दिखाया था। तब जाकर मैंने अपना काम रोका और चर्चा में शामिल हुई। मैंने उन समस्याओं के बारे में भी बात की जो मैंने देखी थीं और जल्द ही हमने एक हल निकाल लिया।

कुछ दिनों बाद ली युए और च्यू यान सिंचनकर्ताओं को विकसित करने के मुद्दे पर चर्चा कर रही थीं। वे कह रही थीं कि कुछ कलीसिया अगुआ लोगों को विकसित करने पर ध्यान नहीं देते हैं, जिससे कलीसिया में सिंचनकर्ताओं की कमी हो गई है, इसका मतलब है कि नए लोगों को समय पर सिंचन नहीं मिल पाता और नए लोगों के सिंचन कार्य में गंभीर रूप से बाधा आती है। उन्होंने कहा कि हमें इस बारे में संगति करने के लिए कलीसिया अगुआओं को पत्र लिखने की जरूरत है। उन्होंने मुझसे इस समस्या को हल करने की चर्चा में शामिल होने को कहा लेकिन मैंने सोचा, “यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो झटपट सुलझाई जा सके। इन मुद्दों में बहुत समय और दिमागी ऊर्जा लगेगी और इस पर चर्चा करने से उस कार्य में देरी होगी जो मैं कर रही हूँ। बाद में अगर काम जमा हो गया तो उसे निपटाने में मुझे अतिरिक्त समय लगाना पड़ेगा। वैसे भी सिंचन कार्य मेरी जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए समस्या सुलझाने से मुझे कोई श्रेय नहीं मिलेगा। मैं अपना समय और ऊर्जा लगाऊँगी और इससे मेरे अपने कार्य में देरी होगी तो इसका क्या फायदा?” मैंने लापरवाह जवाब दिया : “मैं इन मसलों को खूब अच्छे से समझती नहीं हूँ और कोई अच्छी सलाह नहीं दे सकती हूँ। तुम लोग पहले चर्चा करके पत्र लिख लो और लिख लेने के बाद हम मिलकर इसकी समीक्षा करेंगे।” मेरी यह बात सुनकर बहनें कुछ नहीं बोलीं और इसलिए उन दोनों के पास खुद ही इस मामले पर चर्चा करने के सिवाय कोई और चारा नहीं था। बाद में च्यू यान ने पत्र लिखना समाप्त किया और हमें सुझाव देने के लिए कहा। मैंने उस पर संक्षिप्त निगाह डाली और सोचा कि कुछ हिस्सों में जोड़ने और सुधार करने की जरूरत है, लेकिन मैं उसे सुधारने में मेहनत नहीं करना चाहती थी, इसलिए मैंने उसे कुछ मसले बस संक्षेप में बता दिए। मेरी टिप्पणियाँ सुनने के बाद च्यू यान अभी भी यह नहीं जानती थी कि कैसे चीजें जोड़नी हैं और उसने अजीब ढंग से कहा, “मैं संवाद पत्र लिखने में उतनी अच्छी नहीं हूँ और मुझे संशोधन भी कठिन लगते हैं तो क्या तुम इसमें संशोधन करने और जोड़ने में मदद कर सकती हो? इस तरह काम में देरी नहीं होगी।” लेकिन मुझे यह बहुत झंझट का काम लगा और मैं जोर देती रही कि वही इसमें संशोधन करे। मुझे ये तमाम बहाने बनाते देखकर उसने आखिरकार मेरी आलोचना की, “तुमने कल चर्चा में भाग नहीं लिया और अब जब पत्र लिखा जा चुका है तो तुम इसे सुधारने में भी मदद नहीं कर रही हो। कलीसिया का काम एक सामूहिक प्रयास है और सबकी जिम्मेदारी साझा है लेकिन तुम सिर्फ अपने काम के बोझ की परवाह करती हो। तुम बहुत निहायत स्वार्थी और घिनौनी हो!” जब मैंने उसे यह कहते सुना तो मुझे वास्तव में अपने साथ अन्याय महसूस हुआ और मैं उन बहनों के बारे में नकारात्मक दृष्टिकोण बनाने लगी, मुझे लग रहा था कि वे मेरी मुश्किलों को बिल्कुल भी नहीं समझती हैं। मैंने सोचा “मैं यह कर्तव्य थोड़े ही समय से कर रही हूँ और मेरे पास पहले से ही हर दिन करने के लिए बहुत काम है। अब तुम चाहती हो कि मैं तुम्हारे जिम्मे वाले कार्य पर अतिरिक्त समय खपाऊँ और जब तुम्हारे कार्य में नतीजे मिलें तो श्रेय तुम्हें मिल जाए। मैं तो बस पर्दे के पीछे रहूँगी और इसमें मेरे लिए कतई कुछ नहीं होगा। मेरा अपने कार्य का भी ढेर लग जाएगा और इसे निपटाने के लिए भी मुझे अतिरिक्त समय और ऊर्जा खपानी होगी। यह मेरे लिए बिल्कुल भी सार्थक नहीं है!” लेकिन बहन को लाचार देखकर मैं बेमन से मान गई और पत्र संशोधित कर दिया। लेकिन मैंने बहुत दमित महसूस किया और मुझे लगा कि यह कर्तव्य बहुत मुश्किल है। मुझे न केवल अपनी जिम्मेदारियों का ध्यान रखना था, बल्कि बहनों के कार्य को भी देखना था और मैं अब यह कर्तव्य करना ही नहीं चाहती थी। उस दौरान मैं अपना कर्तव्य एक सुन्न और जड़ दशा में कर रही थी, मुझे पवित्र आत्मा का कोई मार्गदर्शन महसूस नहीं हो रहा था और हर दिन मैं बस यंत्र की तरह अपना कर्तव्य किए जा रही थी। अपनी पीड़ा में मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और खोजा, “हे परमेश्वर मैं अपने कर्तव्य के मसलों से बहुत दबाव महसूस कर रही हूँ, लेकिन मुझे कुल मिलाकर पूरे कार्य में भी हिस्सा लेना पड़ता है और मेरा दिल प्रतिरोध महसूस करता है। मैं जानती हूँ कि मेरी दशा गलत है, लेकिन मैं बस समर्पण नहीं कर पा रही हूँ। हे परमेश्वर, मेरा मार्गदर्शन करो ताकि मैं सत्य खोज सकूँ और तुम्हारा इरादा समझ सकूँ।”

मैंने भक्ति के दौरान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने तुरंत मेरे मन की गाँठ खोल दी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करते हो, तो तुम्हें यह मानना होगा कि जो चीजें हर दिन घटित होती हैं, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, वे यूँ ही नहीं होती हैं। ऐसा नहीं है कि कोई जानबूझकर तुम पर सख्त हो रहा है या तुम पर निशाना साध रहा है; यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और आयोजित है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से सबक सीखना चाहिए)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि मेरे जीवन में रोज जो लोग, घटनाएँ और चीजें प्रकट होती हैं वे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का हिस्सा हैं और मुझे सबक सीखने और अपने भ्रष्ट स्वभाव को जानने के लिए परमेश्वर के सामने खुद को शांत करना था। लेकिन अब जब बहनों ने मुझे पूरे काम में हिस्सा लेने के लिए कहा तो मुझे लगा कि वे मेरी मुश्किलों को नहीं समझती हैं। मैं एक ऐसी दशा में जी रही थी जिसमें मैं लोगों और चीजों पर अटक जा रही थी और मुझमें बिल्कुल भी समर्पण नहीं था। मुझे खुद को एक तरफ रखना था, सत्य खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आना था और आत्म-चिंतन करना था।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपनी समस्या के बारे में कुछ समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “मसीह-विरोधी चाहे जिस भी कार्य के लिए जिम्मेदार हों, वे कभी परमेश्वर के घर के हितों पर विचार नहीं करते। वे केवल इस बात पर विचार करते हैं कि कहीं उनके हित तो प्रभावित नहीं हो रहे हैं और वे केवल अपने सामने के उस छोटे-से काम के बारे में सोचते हैं, जिससे उन्हें फायदा होता है। उनकी नजर में, कलीसिया का प्राथमिक कार्य बस वही है जिसे वे अपने खाली समय में करते हैं। वे उसे बिल्कुल भी गंभीरता से नहीं लेते। वे केवल तभी हिलते हैं जब उन्हें काम करने के लिए कोंचा जाता है, केवल वही करते हैं जो वे करना पसंद करते हैं और केवल वही कार्य करते हैं जो उनके अपने सामर्थ्य और रुतबे को कायम रखने के लिए होता है। उनकी नजर में परमेश्वर के घर द्वारा व्यवस्थित कोई भी कार्य, सुसमाचार फैलाने का कार्य और परमेश्वर के चुने हुए लोगों का जीवन प्रवेश महत्वपूर्ण नहीं हैं। चाहे अन्य लोगों को अपने काम में जो भी कठिनाइयाँ आ रही हों, उन्होंने जिन भी मुद्दों को पहचाना और रिपोर्ट किया हो, उनके शब्द कितने भी ईमानदार हों, मसीह-विरोधी उन पर कोई ध्यान नहीं देते, वे उनमें शामिल नहीं होते, मानो इन मामलों से उनका कोई लेना-देना ही न हो। कलीसिया के काम में उभरने वाली समस्याएँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, वे पूरी तरह से उदासीन रहते हैं। अगर कोई समस्या उनके ठीक सामने रख दी जाए, तब भी वे उससे लापरवाही से ही निपटते हैं। केवल जब ऊपरवाला सीधे उनकी काट-छाँट करता है और उन्हें किसी समस्या को सुलझाने का आदेश देता है, तभी वे बेमन से थोड़ा-सा वास्तविक कार्य करेंगे और ऊपरवाले को दिखाने के लिए दिखावा करेंगे। इसके बाद, वे खुद को अपने ही मामलों में व्यस्त रखना जारी रखेंगे। जब कलीसिया के कार्य की या समग्र स्थिति से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों की बात आती है, तो वे इनमें से किसी भी चीज से सरोकार नहीं रखते हैं और इन्हें अनदेखा कर देते हैं, और यहाँ तक कि समस्याएँ पता चलने पर भी वे उन्हें नहीं सँभालते हैं। चाहे दूसरे कोई भी मुद्दा उठाएँ, वे अनमने ढंग से जवाब देते हैं और टालमटोल करते हैं, बड़ी अनिच्छा से ही मुद्दों से निपटते हैं। क्या यह स्वार्थपरता और नीचता की अभिव्यक्ति नहीं है?(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक चार : मसीह-विरोधियों के चरित्र और उनके स्वभाव सार का सारांश (भाग एक))। “यदि कोई परमेश्वर में विश्वास करता है लेकिन उसके वचनों पर ध्यान नहीं देता, सत्य को स्वीकार नहीं करता, या उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं को समर्पित नहीं होता; यदि वे केवल कुछ अच्छे व्यवहार प्रदर्शित करते हैं, लेकिन शरीर के खिलाफ विद्रोह करने में असमर्थ होते हैं और अपने हितों या अहंकार का बिल्कुल त्याग नहीं करते; यद्यपि दिखावे के लिए वे अपना कर्तव्य कर रहे हैं, लेकिन अगर वे अभी भी अपने शैतानी स्वभावों से जीते हैं और उन्होंने अपने शैतानी फलसफों और अस्तित्व में रहने के तरीकों को जरा-सा भी नहीं छोड़ा है या बदला है तो यह संभवतः परमेश्वर में विश्वास करना कैसे है? यह धर्म में विश्वास करना है। ऐसे लोग बाहरी तौर पर चीजों को त्यागते हैं और खुद को खपाते हैं, लेकिन जिस रास्ते पर वे चलते हैं उसे देखें और वे जो कुछ भी करते हैं उसकी उत्पत्ति और मकसद को देखें तो वे इन्हें परमेश्वर के वचनों या सत्य पर आधारित नहीं करते; इसके बजाय, वे अपनी धारणाओं और कल्पनाओं, अपनी व्यक्तिपरक मान्यताओं और अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के अनुसार काम करना जारी रखते हैं। शैतान के फलसफे और स्वभाव अभी भी उनके अस्तित्व और कृत्यों के आधार बने रहते हैं। उन मामलों में जिनका सत्य वे नहीं समझते, वे उसकी तलाश भी नहीं करते; उन मामलों में जिनकी सच्चाई वे समझते हैं, वे उसका अभ्यास नहीं करते, न तो वे परमेश्वर को महान मानकर उसका सम्मान करते हैं, न ही सत्य को सँजोते हैं। भले ही वे मुँह से और नाम के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं और परमेश्वर को स्वीकारते हैं और भले ही वे अपना कर्तव्य करने और परमेश्वर का अनुसरण करने में समर्थ दिख सकते हैं पर वे अब भी अपनी कथनी और करनी में अपने शैतानी स्वभावों के अनुसार ही जीते हैं। अविश्वासियों की तरह वे भी किसी बदलाव का अनुभव नहीं करते। वे जो कहते और करते हैं उसमें भ्रष्ट स्वभावों के खुलासे ही होते हैं। तुम उन्हें परमेश्वर के वचनों का अभ्यास या अनुभव करते नहीं देखोगे, सभी चीजों में उनके सत्य की खोज करने और उसके प्रति समर्पित होने की अभिव्यक्ति देखना तो दूर की बात है। अपने कृत्यों में, वे पहले अपना हित देखते हैं, और पहले अपनी इच्छाओं और इरादे को संतुष्ट करते हैं। क्या ये लोग परमेश्वर का अनुसरण करने वाले लोग हैं? (नहीं।) ... उन्होंने कितने ही बरस परमेश्वर में विश्वास क्यों न किया हो, वे परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध नहीं बना पाते; वे चाहे कुछ भी करें या उनके साथ कुछ भी घटे, वे सबसे पहले यह सोचते हैं : ‘मैं फलां-फलां तरीके से कार्य करना चाहता हूँ। कौन-सा तरीका मेरे हित में होगा और कौन-सा तरीका नहीं होगा? अगर मैंने फलाँ-फलाँ चीज की तो क्या हो सकता है?’ ये वे चीजें हैं जो वे सबसे पहले सोचते हैं। वे इस पर कोई विचार नहीं करते कि किस तरह का अभ्यास परमेश्वर को महिमा देने और उसकी गवाही देने का काम करेगा, या परमेश्वर के इरादों को पूरा करेगा, न ही वे प्रार्थना करते और खोजते हैं कि परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं और उसके वचन क्या कहते हैं। वे कभी भी परमेश्वर के इरादे या अपेक्षाएँ जानने पर या परमेश्वर को संतुष्ट करने वाला अभ्यास का तरीका जानने पर ध्यान नहीं देते। भले ही वे कभी-कभी परमेश्वर के सम्मुख प्रार्थना करें और उसके साथ संगति करें, पर वे मात्र खुद से बात कर रहे होते हैं, न कि ईमानदारी से सत्य की खोज करते हैं। जब वे परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं और उसके वचन पढ़ते हैं, तो वे इन्हें अपने वास्तविक जीवन के मामलों से जोड़कर नहीं देखते। तो, परमेश्वर द्वारा खड़े किए गए परिवेश में वे उसकी संप्रभुता, व्यवस्थाओं और आयोजनों से कैसे पेश आते हैं? जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं होतीं तो वे अपने दिलों में उनका प्रतिरोध करते हैं और उनसे बचने की कोशिश करते हैं। जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जिनमें उनके हित शामिल होते हैं तो वे अपना दिमाग खपाते हैं और अपने हितों की रक्षा के लिए हर संभव तरीके के बारे में सोचते हैं—भले ही वे कोई लाभ न उठा सकें, लेकिन वे अपने हितों को नुकसान नहीं होने दे सकते। वे परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। क्या यह परमेश्वर में विश्वास करना है? क्या ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ कोई नाता होता है? नहीं, नहीं होता। वे एक नीच, कुत्सित, अड़ियल और कुरूप तरीके से जीते हैं। न सिर्फ उनका परमेश्वर के साथ कोई नाता नहीं होता है, बल्कि वे हर मौके पर परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के खिलाफ जाते हैं। वे बार-बार कहते हैं, ‘परमेश्वर मेरी जिंदगी की हर चीज पर संप्रभुता रखे और नियंत्रण करे। मैं परमेश्वर को सिंहासन पर बिठाने और उसे अपने दिल पर राज और हुकूमत करने देने के लिए तैयार हूँ। मैं परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण के लिए तैयार हूँ।’ हालाँकि, जब वे ऐसी चीजों का सामना करते हैं जो उनके हितों को नुकसान पहुँचा सकती हैं तो वे समर्पण नहीं कर पाते। परमेश्वर ने जिस स्थिति का इंतजाम किया है, उसमें सत्य खोजने के बजाय वे उस स्थिति को पलटना या उससे भागना चाहते हैं। वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना नहीं चाहते; वे अपनी ही इच्छा के अनुसार चीजें करना चाहते हैं और उनके हितों पर जरा-भी आंच नहीं आनी चाहिए। वे परमेश्वर के इरादों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं, और सिर्फ खुद के हितों और खुद के हालात के बारे में और अपनी मनोदशा और भावनाओं के बारे में सोचते हैं। क्या यह परमेश्वर में विश्वास रखना हुआ? (नहीं।)” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, धर्म में विश्वास रखने या धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने मात्र से किसी को नहीं बचाया जा सकता)

परमेश्वर के वचन बहुत स्पष्ट हैं। जो व्यक्ति परमेश्वर में सचमुच विश्वास करता है वह अपनी धारणाओं से मेल न खाने वाली चीजों का सामना करते समय सत्य खोज सकता है और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है। अगर अपनी धारणाओं से मेल न बैठने वाली चीजों का सामना करते समय कोई व्यक्ति बिल्कुल भी सत्य नहीं खोजता है और वह केवल अपने हितों पर विचार करता है और अपने लिए बाहर निकलने के रास्ते ढूँढ़ता है तो वह परमेश्वर का सच्चा विश्वासी नहीं है और परमेश्वर उसका अनुमोदन नहीं करता है। मसीह-विरोधी ठीक इसी तरह के व्यक्ति होते हैं। वे अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के घर के हितों पर कभी विचार नहीं करते और वे केवल वही करते हैं जो उन्हें प्रसिद्धि, लाभ या रुतबे के संबंध में फायदा पहुँचाता है। अगर किसी चीज़ से उन्हें फायदा नहीं होता तो भले ही वे कोई समस्या देखें या दूसरे उनसे मदद माँगें, मसीह-विरोधी आँखें मूँद लेते हैं और अनसुना कर देते हैं। वे पूरी तरह से कठोर दिल, निर्दयी, स्वार्थी, नीच और मानवता की कमी वाले होते हैं। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन का अनुभव करने पर मुझे शर्मिंदगी और लज्जा महसूस हुई। मेरी शिकायतें, मेरा प्रतिरोध और मेरी अवज्ञा सब कितने अविवेकपूर्ण थे। मुझे ख्याल आया कि मैं कैसे बहुत सारे सालों से परमेश्वर में विश्वास करती आई हूँ। यूँ तो मैंने अपना परिवार और पेशा छोड़ दिया था और परमेश्वर में सचमुच विश्वास करती हुई दिखती थी, लेकिन अपने कर्तव्यों में मेरे सभी विचार और सोच मेरे अपने फायदे के लिए थे और मैंने कलीसिया के कार्य की बिल्कुल भी रक्षा नहीं की। मैं कैसे परमेश्वर के घर की सदस्य थी? जब मेरी बहनों ने सुसमाचार कार्य में मसलों पर चर्चा की और मिलकर समाधान खोजना चाहा, तब यूँ तो मैं कुछ विशिष्ट समस्याओं को समझती थी, पर मुझे डर था कि अगर मैं बोलूँगी तो मुझे चर्चा में हिस्सा लेना पड़ेगा जिससे मेरे अपने कार्य में देरी होगी, इसलिए मैंने काम में व्यस्त होने का बहाना बनाकर हिस्सा लेने से मना कर दिया। जब कलीसिया में सिंचनकर्ताओं की कमी थी और लोगों को प्रशिक्षित करने के महत्व के बारे में संगति का एक अत्यावश्यक पत्र अगुआओं को भेजा जाना था तो मैं अपने काम का बोझ बढ़ाने से डर गई और मुझे लगा कि अगर मैं इसे अच्छी तरह से कर भी देती हूँ तो मुझे इसका श्रेय नहीं मिलेगा, इसलिए मैंने बस एक लापरवाह जवाब दिया और इसमें शामिल होना नहीं चाहा। जब बहन ने पत्र लिखा और इसे जाँचने के लिए मुझसे कहा तो मैंने मसले देख लिए लेकिन उन्हें सुधारने में समय नहीं लगाना चाहा। इन कामों के लिए ऐसा नहीं था कि मैं समस्याएँ नहीं देख सकती थी या उन्हें हल करना नहीं जानती थी, बल्कि मैं बहुत स्वार्थी और नीच थी और मुझे केवल अपने हितों की चिंता थी और अगर किसी चीज़ से मेरी प्रतिष्ठा या रुतबे को फायदा नहीं होता तो मैं उसे नहीं करना चाहती थी। मेरे दिल में परमेश्वर के लिए किस तरह से कोई जगह थी? ऐसे व्यवहार के चलते, जब बहन ने स्वार्थी और नीच होने के लिए मेरी काट-छाँट की तो भी मुझे लगा कि मेरे साथ अन्याय हुआ है और मैं इस कर्तव्य से बचना और इसे छोड़ना चाहती थी। मैं सचमुच कितनी विवेकहीन थी! खासकर जब मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “वे परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास नहीं करते, बल्कि केवल अपनी इच्छाओं को पूरा करने का प्रयास करते हैं। क्या यह परमेश्वर में विश्वास करना है? क्या ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ कोई नाता होता है? नहीं, नहीं होता,” मैं थोड़ी-सी द्रवित हो गई। मुझे परमेश्वर में विश्वास करते हुए बहुत साल हो चुके थे, मैं परमेश्वर के इतने सारे वचन खा और पी चुकी थी और परमेश्वर के इतने सारे अनुग्रहों और आशीषों का आनंद ले चुकी थी, लेकिन जब मैंने सुसमाचार कार्य और सिंचन कार्य जैसे प्रमुख क्षेत्रों में समस्याएँ उत्पन्न होते देखीं तो मैंने बस उन्हें अनदेखा कर दिया। मैं खुद को परमेश्वर में विश्वासी कैसे कह सकती थी? मैंने तो अपनी मेहनत में भी निष्ठा नहीं दिखाई थी! इन बातों का एहसास होने के बाद ही मैंने देखा कि मेरा भ्रष्ट स्वभाव कितना गंभीर था और मुझे थोड़ा डर लगा। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं देखती हूँ कि मेरी दशा सचमुच खतरनाक है। मैं पूरी तरह से स्वार्थी और विद्रोही रही हूँ! कृपया मुझे प्रबुद्ध करो और मार्गदर्शन दो ताकि मैं सचमुच अपने भ्रष्ट स्वभाव को जान सकूँ।”

एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े और अपने प्रकृति सार की थोड़ी-सी समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद व्यक्ति अपने जमीर और विवेक खो देता है। शैतान उसका दिल पूरी तरह से गुमराह कर देता है और वह शैतान से आने वाले ऐसे बहुत-से विचारों और दृष्टिकोणों को और साथ ही बुरी प्रवृत्तियों से आने वाली कुछ कहावतों और मतों को भी स्वीकार लेता है। जब चीजें इस हद तक पहुँच जाती हैं तब उसके जमीर और विवेक पूरी तरह से भ्रष्ट हो जाते हैं और बिगड़ जाते हैं—यह कहा जा सकता है कि इस समय उसके जमीर और विवेक पूरी तरह से खो गए हैं। प्रदर्शित यह होता है कि उसका चरित्र बहुत ही खराब और बुरा है। यानी उसने सकारात्मक चीजें स्वीकारने से पहले ही अपने दिल में शैतान से प्राप्त कई भ्रामक बातें स्वीकार ली हैं। इन चीजों ने उसकी मानवता को बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया है जिसके नतीजतन उसकी मानवता बहुत ही खराब हो चुकी है। उदाहरण के लिए, जब वह दुनिया से ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे और बाकियों को शैतान ले जाए’ वाला शैतानी विचार और दृष्टिकोण स्वीकार लेता है तब क्या उसका जमीर सुधरेगा, जस का तस रहेगा या बिगड़ जाएगा? (वह बिगड़ जाएगा।) और इस बिगड़ने की विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? (वह जो भी करता है उसमें सिर्फ अपने ही स्वार्थों का ध्यान रखता है।) वह अपने खुद के मकसद और स्वार्थों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। वह दूसरों को धोखा दे सकता है, उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है और ऐसा कुछ भी कर सकता है जो नैतिकता और जमीर के खिलाफ जाता हो। वह ऐसा जितना ज्यादा करता है, उसके क्रियाकलाप उतने ही बेदर्द होते जाते हैं, उसके दिल का अँधेरा उतना ही गहराता जाता है, उसमें जमीर की भावना उतनी ही कम होती जाती है और उसमें मानवता उतनी ही कम बाकी रह जाती है। अपने खुद के स्वार्थों के लिए वे किसी को भी ठगेंगे और धोखा देंगे...। क्या कारण है कि वे किसी को भी धोखा दे सकते हैं? इसका मूल कारण क्या है? इसका कारण यह है कि उन्होंने शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार लिया है और वे शैतान के विचारों और दृष्टिकोणों के वर्चस्व के तहत कार्य करते हैं। आखिरकार उनकी मानवता के जमीर और विवेक अब और काम नहीं करते हैं; यानी मानवता में जो मूलभूत चीजें होनी चाहिए वे पूरी तरह से काम करना बंद कर देती हैं, वे शैतान के बुरे विचारों द्वारा पूरी तरह से दूषित और नियंत्रित हो जाते हैं। दूषित और नियंत्रित होने की प्रक्रिया उनके द्वारा इन विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकारने की प्रक्रिया है और यकीनन यह उनके भ्रष्ट होने की भी प्रक्रिया है(वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (10))। परमेश्वर के वचनों ने उजागर किया कि कुल कार्य में हिस्सा न लेने की मेरी अनिच्छा का मूल मसला यह था कि मैं शैतान के जहर से प्रभावित थी। मैं सांसारिक आचरण के ऐसे शैतानी फलसफों के अनुसार जी रही थी, जैसे : “अपना काम करो, दूसरों के मामले में दखल न दो” और “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए”। मैं बेहद स्वार्थी, खुदगर्ज़ और मानवता से रहित हो गई थी और मैं अपने हर काम को इस आधार पर आँकती थी कि उससे मुझे फायदा होता है या नहीं। जो चीज़ें मेरी प्रतिष्ठा और रुतबे को फायदा पहुँचाती थीं उनमें मैं मेहनत करती थी लेकिन जो कुछ भी मुझे फायदा नहीं पहुँचाता था उसे मैं अनदेखा कर देती थी। जब दूसरे मेरी मदद माँगते या मुझे याद दिलाते तब भी मैं इन चीज़ों पर ध्यान नहीं देती थी और मैं तो यह भी स्वाभाविक रूप से सोचती थी कि अगर कोई चीज़ मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है तो भले ही कोई समस्या हो उसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है और मेरे पास उसे अनदेखा करने का हर कारण है। ऐसे विचारों और दृष्टिकोणों के प्रभाव में मैंने सुसमाचार कार्य की अनदेखी की और जब बहनों ने मेरी मदद माँगी तो भी मैंने अनसुना कर दिया। जब सुसमाचार कार्य में बाधा आ रही थी तब भी मैं हिस्सा नहीं लेना चाहती थी भले ही मेरे पास इसे हल करने के कुछ तरीके थे। जब कलीसिया में सिंचनकर्ताओं की कमी का असर सिंचन कार्य पर पड़ने लगा था तो मुझे अपने कार्य में देरी होने का डर था, इसलिए मैं बहनों के साथ मिलकर समस्या का समाधान नहीं करना चाहती थी और भले ही इससे सिंचन कार्य में देरी हुई, मुझे बिल्कुल भी अपराध-बोध नहीं हुआ। जब बहन ने मेरे स्वार्थीपन को इंगित किया तो भी मैंने यह मानने से इनकार कर दिया, उल्टे बहस की और प्रतिरोधी महसूस किया और मुझे अपने स्वार्थीपन और नीचता के कारण परमेश्वर के घर के हितों को कायम रखने में अपनी विफलता के लिए रत्तीभर भी शर्म महसूस नहीं हुई। मैं शैतान के जहरों के अनुसार जीती थी और परमेश्वर के घर के हितों की बिल्कुल भी रक्षा नहीं करती थी। मेरी अंतरात्मा और विवेक सुन्न हो गए थे। अतिरिक्त चिंताओं और बोझ से बचने के लिए मैंने परमेश्वर के इरादों और कलीसिया के हितों की पूरी तरह से अवहेलना की। मैं जिस तरीके से अपने कर्तव्य के साथ पेश आती थी वह वास्तव में इसका नकार था और यह परमेश्वर के साथ विश्वासघात था! इन चीजों का एहसास होने पर मुझे आखिरकार अपने स्वार्थी और नीच भ्रष्ट स्वभाव से नफरत महसूस हुई।

मैंने एक भक्ति के दौरान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अभ्यास का एक मार्ग पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपने कर्तव्य को निभाने वाले सभी लोगों के लिए, चाहे सत्य को लेकर उनकी समझ कितनी भी उथली या गहरी क्यों न हो, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का सबसे सरल अभ्यास यह है कि हर मोड़ पर परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचा जाए, अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं, व्यक्तिगत मंशाओं, उद्देश्यों, इज्जत और रुतबे का त्याग किया जाए और परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखा जाए—कम से कम इतना तो उन्हें करना ही चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने वाला कोई व्यक्ति अगर इतना भी नहीं कर सकता, तो उस व्यक्ति को कर्तव्य निभाने वाला कैसे कहा जा सकता है? यह अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। तुम्हें पहले परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और कलीसिया के कार्य का ध्यान रखना चाहिए। इन चीजों को पहले स्थान पर रखना चाहिए; उसके बाद ही तुम अपने रुतबे की स्थिरता या दूसरे लोग तुम्‍हारे बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता कर सकते हो। इसे दो चरणों में बाँटो, थोड़ा-सा समझौता कर लो—क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि इससे चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं? यदि तुम कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हें महसूस होने लगेगा कि परमेश्वर को संतुष्ट करना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा, यदि तुम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकते हो; अपने दायित्वों और कर्तव्य को पूरा कर सकते हो; अपनी स्वार्थी इच्छाओं, मंशाओं और उद्देश्यों को एक तरफ रख सकते हो; परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो; और परमेश्वर के घर के हितों, कलीसिया के कार्य और उस कर्तव्य को जिसे तुम्हें निभाना चाहिए, सबसे पहले रख सकते हो, तो कुछ समय तक इस तरह अनुभव करने के बाद, तुम्हें महसूस होगा कि इस तरह से आचरण करना अच्छा है, लोगों को ईमानदारी और स्पष्टवादिता से जीना चाहिए और उन्हें एक डरपोक, घिनौना, नीच अस्तित्व नहीं जीना चाहिए, बल्कि उन्हें ईमानदार और न्यायसंगत होना चाहिए। तुम्हें महसूस होगा कि यही वह छवि है जिसे व्यक्ति को जीना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को तुष्‍ट करने की तुम्‍हारी इच्छा घटती चली जाएगी(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं समझ गई कि जब मेरे कर्तव्य और व्यक्तिगत हितों में टकराव होता है तो मुझे हमेशा परमेश्वर के घर के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। यही वह रवैया है जो एक ऐसे व्यक्ति का होना चाहिए जो अपने कर्तव्य के प्रति समर्पित हो। यूँ तो हमारी जिम्मेदारियाँ बँटी हुई थीं, लेकिन जब बहनों के काम में मसले होते थे तो मुझे कलीसिया के पूरे कार्य में प्राथमिकता तय करनी चाहिए थी। सुसमाचार का प्रचार, नए लोगों का सिंचन और कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों का चुनाव जैसी चीजें कलीसिया के महत्वपूर्ण काम हैं और अगर समस्याएँ पैदा हों और समय पर हल न की जाएँ तो इससे कार्य में देरी होगी। भले ही मेरे पास बहुत काम था मुझे प्राथमिकताओं में भेद करना था। अगर मैं अपने समय का बेहतर इस्तेमाल करती तो मेरे काम में बहुत ज़्यादा देरी नहीं होती। हालाँकि कभी-कभी पूरे काम के लिए चर्चाओं और निर्णय लेने में हिस्सा लेने के लिए ज़्यादा समय और मेहनत की ज़रूरत होती थी लेकिन वास्तविक खोज और चर्चा के माध्यम से मैंने अनजाने में ही धीरे-धीरे कुछ सिद्धांत भली-भाँति समझ लिए। यह मेरे लिए खुद को बेहतर बनाने का एक तरीका भी था। यह मेरे लिए वास्तव में पीड़ा सहने की चीज नहीं थी, बल्कि वास्तव में कोई लाभप्रद चीज थी। अपना दृष्टिकोण गलत होने के कारण मैं थकी-माँदी महसूस किया करती थी, लेकिन जब मेरा दृष्टिकोण बदल गया तो मुझे अब यह महसूस नहीं होता था कि मैं पीड़ा सह रही हूँ।

एक दिन मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े और अपना कर्तव्य निभाते समय अभ्यास कैसे करना है इसकी एक अधिक स्पष्ट समझ हासिल की। परमेश्वर कहता है : “जिस तरह से लोग परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभाते हैं, वह अविश्वासियों के बीच काम किए जाने के ढंग से पूरी तरह अलग है। उनमें क्या अंतर है? भाई-बहन मिलकर परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं और आत्मा में जुड़े होते हैं। वे एक-दूसरे के साथ मिलजुलकर रहने में सक्षम होते हैं और एक-दूसरे के साथ अपने अंतरतम के विचार साझा करते हैं। वे सरलता से और खुलकर एक-दूसरे के साथ सत्य की संगति करने, परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने और एक-दूसरे की मदद करने में सक्षम होते हैं। जिस किसी को भी कठिनाइयाँ होती हैं, वे मामला हल करने के लिए एक-साथ सत्य खोजते हैं, एक आंतरिक एकता प्राप्त करते हैं और सत्य और परमेश्वर के सामने समर्पण करने में सक्षम होते हैं। अविश्वासी अलग होते हैं। वे अपने इरादे छिपाकर रखते हैं, दूसरों के सामने खुलकर बात नहीं करते, एक-दूसरे से सतर्क रहते हैं, यहाँ तक कि एक-दूसरे के खिलाफ साजिश भी रचते हैं और एक-दूसरे से होड़ भी लगाते हैं। अंततः, वे नाराज होकर संबंध तोड़ लेते हैं और अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सामंजस्‍यपूर्ण सहयोग के बारे में)। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्यों में अच्छे परिणाम पाने के लिए हमें एक मन और एक हृदय से सहयोग करना चाहिए। मुझे अपनी स्वार्थी इच्छाओं को दरकिनार करना चाहिए और कलीसिया के कार्य में प्राथमिकता तय करनी चाहिए और चाहे किसी के भी काम में समस्याएँ आएँ, हमें मिलकर समाधान खोजने चाहिए, ताकि हम अधिक आसानी से पवित्र आत्मा का कार्य पा सकें और अपने कर्तव्यों की दक्षता बढ़ा सकें। बिल्कुल वैसा ही जैसा प्रभु यीशु ने कहा है : “फिर मैं तुम से कहता हूँ, यदि तुम में से दो जन पृथ्वी पर किसी बात के लिए एक मन होकर उसे माँगें, तो वह मेरे पिता की ओर से जो स्वर्ग में है, उनके लिए हो जाएगी(मत्ती 18:19)। हर किसी में कमियाँ होती हैं और कुछ मामलों में समझ, क्षमता या स्पष्टता की कमी होती है और कोई भी कार्य अकेले एक व्यक्ति द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता है। हमें सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करने और हर व्यक्ति की ताकत और कौशल को सामने लाने की ज़रूरत है। केवल इसी तरह से हम अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभा सकते हैं। कलीसिया का कार्य एक सामूहिक प्रयास है और चाहे कार्य की किसी भी मद में समस्याएँ आएँ, उन्हें हल करने के लिए सबको सहयोग करने की जरूरत है। यह समझकर मैंने अब पूरे काम में हिस्सा लेने में कोई प्रतिरोध महसूस नहीं किया। बाद में अपने कर्तव्य करते समय हम सभी ने सामंजस्यपूर्ण सहयोग पर ध्यान केंद्रित किया और जब हमें काम में ऐसी बातें मिलीं जिनके बारे में हम स्पष्ट नहीं थे या समझ नहीं पा रहे थे तो हमने सक्रिय रूप से उन्हें चर्चा और संवाद के लिए सामने रखा। इस तरह के वास्तविक सहयोग के माध्यम से हमने समस्याओं के बारे में अधिक व्यापक दृष्टिकोण प्राप्त किया, मैंने अपने कर्तव्य में कहीं कम दबाव महसूस किया और समस्याएँ भी ज़्यादा तेज़ी से हल की जा सकती थीं।

एक-दो हफ्तों के बाद सुसमाचार कार्य के परिणाम अभी भी अच्छे नहीं थे, इसलिए हम संगति और विश्लेषण के लिए एक साथ इकट्ठा होना चाहते थे। मैंने सोचा, “सुसमाचार कार्य के मसले बस थोड़े-से समय में हल नहीं किए जा सकते हैं। हमें हर कलीसिया की कार्य रिपोर्ट की समीक्षा करनी होगी और फिर भाई-बहनों को सुसमाचार प्रचार में आने वाली समस्याओं और कठिनाइयों को समझना होगा ताकि उन्हें हल किया जा सके। इसमें बहुत समय लगेगा। लेकिन मुझे अभी भी कई पत्रों का जवाब देना है और सुसमाचार कार्य पर चर्चा करने से मेरे अपने कामों में देरी होगी।” इन सब बातों को सोचकर मैं हिस्सा लेने में कुछ अनिच्छुक महसूस करने लगी। उसी क्षण मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से स्वार्थीपन प्रकट कर रही हूँ। इसलिए मैं परमेश्वर के वचनों की ओर मुड़ी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “काम चाहे कितना भी बड़ा या छोटा हो, चाहे तुम्हें वह कार्य कोई भी सौंपे, चाहे परमेश्वर का घर तुम्हें वह कार्य सौंपे या कलीसिया का अगुआ या कार्यकर्ता उसे तुम्हें सौंपे, तुम्हारा यह रवैया होना चाहिए : ‘चूँकि यह कर्तव्य मुझे सौंपा गया है, इसलिए यह परमेश्वर द्वारा ऊँचा उठाया जाना और अनुग्रह है। मुझे इसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार अच्छी तरह से करना चाहिए। औसत काबिलियत होने के बावजूद, मैं यह जिम्मेदारी लेने और इसे अच्छी तरह से निभाने के लिए अपना सब-कुछ झोंकने को तैयार हूँ। अगर मैंने खराब काम किया, तो मुझे उसके लिए जिम्मेदार होना चाहिए और अगर मैंने अच्छा काम किया, तो वह मेरे लिए श्रेय की बात नहीं होगी। मुझे यही करना चाहिए।’ मैं यह क्यों कहता हूँ कि व्यक्ति अपने कर्तव्य को कैसे लेता है, यह सिद्धांत का मामला है? अगर तुम में वास्तव में जिम्मेदारी की भावना है और तुम एक जिम्मेदार व्यक्ति हो, तो तुम कलीसिया के कार्य की जिम्मेदारी उठा सकोगे और वह कर्तव्य पूरा कर सकोगे, जो तुम्हें करना चाहिए(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (8))। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि एक मानक-स्तर के अगुआ में सबसे पहले जिम्मेदारी की भावना होनी चाहिए और उसे परमेश्वर के घर के हितों की प्राथमिकता तय करनी ही चाहिए। यूँ तो यह काम मुख्य रूप से मेरी सहयोगी की जिम्मेदारी थी, लेकिन इसका सरोकार इस बात से था कि क्या कलीसिया का सुसमाचार कार्य सुचारु रूप से आगे बढ़ सकता है। एक अगुआ के रूप में मैं इसके लिए आंशिक रूप से ज़िम्मेदार थी और मैं सिर्फ अपने हितों पर विचार नहीं कर सकती थी—यह पूरी तरह से मानवता की कमी होती। मुझे ठीक से प्राथमिकता तय करनी थी और अपने हितों को एक तरफ रखना था। मुझे एहसास हुआ कि मेरे अपने काम वास्तव में टाले जा सकते थे और इसलिए मैंने इस विश्लेषण और चर्चा में भाग लेने की पहल की। चर्चा में मैंने उन कुछ क्षेत्रों में अपनी बातें जोड़ीं जिन पर दूसरी बहनों ने स्पष्ट रूप से संगति नहीं की थी और सहयोग की प्रक्रिया में मैंने परमेश्वर का मार्गदर्शन देखा। मैंने समस्याओं को हल करने के कुछ तरीके और रास्ते भी ढूँढ़े और मुझे अपने दिल में बड़ी सुकून की भावना महसूस हुई।

इस तरह के प्रकाशन का अनुभव करके मैंने अपने स्वार्थी और नीच शैतानी स्वभाव के बारे में कुछ विवेकशीलता हासिल की। अतीत में मुझे नहीं लगता था कि स्वार्थीपन कोई गंभीर समस्या है लेकिन अब परमेश्वर के वचनों के खुलासे के माध्यम से मैं स्पष्ट रूप से देखती हूँ कि जब लोग अपने स्वार्थी और नीच भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार जीते हैं तो वे अधिकाधिक मानवता रहित और अंतरात्मा और विवेक में अभावग्रस्त हो जाते हैं और वे अपने कर्तव्यों में अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं करेंगे। केवल परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीकर, सत्य का अभ्यास करके और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करके ही व्यक्ति मानव के समान जी सकता है। केवल तभी व्यक्ति अपने दिल में सच्ची शांति और सुकून पा सकता है। परमेश्वर का धन्यवाद कि उसने मुझे ये समझ और लाभ पाने दिए!

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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