तुम्हारा कर्तव्य तुम्हारा करियर नहीं है

24 जनवरी, 2022

चेंग नुओ, फ्रांस

पिछले साल मुझे दो कलीसियाओं के लिए नये सदस्यों के काम की जिम्मेदारी मिली थी। कभी-कभी लोगों को हमारी कलीसियाओं से दूसरी जगह कर्तव्य निभाने के लिए भेजना ज़रूरी होता है। पहले तो मुझे सहयोग करने में खुशी होती थी और मैं फौरन लोगों की सिफारिश कर देती थी। मगर कुछ समय बाद, मुझे एहसास हुआ कि अच्छे लोगों को दूसरी जगह भेज देने से अपना काम ठीक से करना मुश्किल हो जाता है। मुझे डर था कि मेरा प्रदर्शन खराब हो जाएगा, और अपने काम में अच्छे नतीजे नहीं देने पर अगुआ मुझे बर्खास्त कर देंगे, और फिर मेरा रुतबा खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए मैं पहले की तरह लोगों को दूसरी जगह भेजने को तैयार नहीं थी। कुछ ही समय बाद, मैंने देखा कि एक नई विश्वासी, बहन रन्ना में अच्छी काबिलियत है और वो अपने अनुसरण में तत्पर है, वो परमेश्वर के वचन पढ़ती है और कलीसिया के वीडियो देखती है, हमेशा मुझसे सत्य पर अमल करने और इसकी वास्तविकता में प्रवेश करने से जुड़े सवाल पूछती रहती है। मैं जानती थी कि हमारी कलीसिया को सिंचन टीम की अगुआ की ज़रूरत है और मुझे फौरन उस बहन को इस जिम्मेदारी के लिए तैयार करना चाहिए, इसलिए मैंने उसकी काफी मदद की, ताकि वो ज़्यादा से ज़्यादा सत्य को समझकर यह जिम्मेदारी निभाने के काबिल बन सके। मैं सिर्फ नये विश्वासियों का सिंचन ही नहीं करती थी बल्कि सोचती थी कि ऐसा करने से अच्छे नतीजे हासिल होंगे और लोग मुझे सचमुच काबिल समझेंगे—यह दोनों हाथों में लड्डू होने जैसा होगा। फिर एक दिन एक अगुआ ने मुझे बताया कि दूसरी कलीसिया को सिंचन कार्य के लिये किसी की ज़रूरत है, चूंकि बहन रन्ना अच्छा काम कर रही हैं और दूसरों के लिये प्रेरणा बनी हैं, इसलिए उसे दूसरी कलीसिया में जाकर वह जिम्मेदारी निभानी चाहिए। यह सुनकर मैं बहुत परेशान हो गई, सोचने लगी कि मैं उसे सिंचन टीम की अगुआ बनाने के लिये तैयार कर रही थी, और फिर दूसरी कलीसिया अकेली ऐसी कलीसिया नहीं है जिसे लोगों की ज़रूरत हो। मैं इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। कुछ दिनों बाद, अगुआ दोबारा बहन रन्ना को ट्रांसफर करने का सुझाव लेकर आईं, उनका कहना था कि उसमें काबिलियत है और उसे ज़्यादा जिम्मेदारी लेने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। मेरा प्रतिरोध और बढ़ गया, मैंने सोचा, "आप उसे ऐसे ही लेकर जाना चाहती हैं? अगर हमारी कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचता रहा, तो मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा।" इसलिए मैंने कहा, "मैं सोच रही थी कि उसे यहीं रखकर अगुआ के पद के लिए तैयार करना चाहिए।" मैं जानती थी कि दूसरी कलीसिया में और भी नये सदस्य हैं, उन्हें भी सिंचन कार्य की बहुत ज़रूरत है। मुझे सीधे-सीधे यह कहने की हिम्मत नहीं हुई कि मैं उसे जाने नहीं दूँगी, मगर मेरा मन गुस्से से भरा था और बहुत बुरा लग रहा था, मैं इस बात को स्वीकार नहीं पाई। कुछ ही दिन पहले, अगुआ ने हमारी कलीसिया से दो टीम अगुआओं को दूसरी जगह भेज दिया था, तो मैं लगातार खाली जगहों को भरने और नये लोगों को तैयार करने में जुटी जुटी हुई थी, और सबसे बड़ी बात, अच्छे उम्मीदवार ढूंढना मुश्किल था। अगर मैंने अच्छे नतीजे हासिल नहीं किये, तो मुझे खुद को अच्छा दिखाने का मौका कभी नहीं मिलेगा। मुझे लगा जैसे अब मैं वो कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगी, मेरा मन बहुत दुखी रहने लगा। मुझे लगा मेरे साथ गलत हुआ है, मैं अपने आँसू नहीं रोक पाई। मेरी ऐसी हालत देखकर, अगुआ ने परमेश्वर की इच्छा और अपेक्षाओं के बारे में मेरे साथ सहभागिता की, मगर मुझे कुछ भी समझ नहीं आया। बाद में, उन्होंने कहा कि इस तरह बर्ताव करके मैं कलीसिया के काम में रुकावट डाल रही हूँ, मगर मैं इसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं कर पाई। मैंने सोचा, "मगर क्या मैंने ऐसा हमारी कलीसिया के काम को ध्यान में रखकर नहीं किया? अगर आपको लगता है मैं रुकावट बन रही हूँ, तो आप ये कर सकती हैं। मुझे निकाल दीजिए, फिर मैं कोई समस्या खड़ी नहीं करूंगी।" इस तरह सोचने पर मुझे बुरा लगा, तो मैंने प्रार्थना की, "परमेश्वर, अभी जो कुछ हो रहा है, मैं उसके प्रति समर्पित नहीं हो सकती। मुझे लगता है मेरे साथ गलत हुआ है। मुझे राह दिखाओ ताकि मैं समझ सकूँ कि मुझमें क्या कमी है।"

उस समय, मैंने विचार किया, जब अगुआ को सामान्य बदलाव करने की ज़रूरत थी, तब ऐसा क्यों था कि दूसरे लोगों को इससे कोई दिक्कत नहीं थी, मगर मुझे बड़ी समस्या थी। मुझे इसका सामना करना था। मैंने अंदर से इस बात का बहुत प्रतिरोध किया, ऐसा एक या दो बार नहीं हुआ कि मैंने इस तरह का बर्ताव किया हो। मेरे लिये समर्पण कर पाना इतना मुश्किल क्यों था? फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश याद आया। "कर्तव्य तुम लोगों द्वारा प्रबंधित नहीं है—यह तुम्हारा अपना कार्यक्षेत्र या तुम्हारी अपनी रचना भी नहीं है। इसकी बजाय, यह परमेश्वर का कार्य है। परमेश्वर के कार्य के लिए तुम लोगों के सहयोग की आवश्यकता है, जो तुम लोगों के कर्तव्य को उत्पन्न करता है। परमेश्वर के कार्य का वह हिस्सा जिसमें मनुष्य को अवश्य सहयोग करना चाहिए वह है उसका कर्तव्य। कर्तव्य परमेश्वर के कार्य का एक हिस्सा है—यह तुम्हारा कार्यक्षेत्र नहीं है, तुम्हारा घरेलू मामला नहीं है, और न ही यह तुम्हारा व्यक्तिगत मामला है। चाहे तुम्हारा कर्तव्य आंतरिक या बाहरी मामलों से निपटना हो, यह परमेश्वर के घर का कार्य है, यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना के एक हिस्से का निर्माण करता है, और यही वह आदेश है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है। यह तुम लोगों का व्यक्तिगत कारोबार नहीं है। तो फिर तुम्हें अपने कर्तव्य का निर्वहन कैसे करना चाहिए? इसलिए तुम मनमाने ढंग से अपना कर्तव्य निर्वहन नहीं कर सकते" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'सत्य-सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया जा सकता है')। "कर्तव्य आखिर है क्या? क्या यह कहना उचित है कि जब तुम्हें कोई कर्तव्य दे दिया जाता है, तो वह कर्तव्य तुम्हारा व्यक्तिगत व्यवसाय बन जाता है? कुछ लोग कहते हैं, 'जब मुझे कोई कर्तव्य दे दिया गया है, तो क्या वह मेरा अपना व्यवसाय नहीं बन गया है? मेरा कर्तव्य मेरा प्रभार है, और जिसका प्रभार मुझे दिया गया है, क्या वह मेरा निजी व्यवसाय नहीं है? यदि मैं अपने कर्तव्य को अपने व्यवसाय की तरह करता हूँ, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं उसे ठीक से करूँगा? अगर मैं उसे अपना व्यवसाय न समझूँ, तो क्या मैं उसे अच्छी तरह से करूँगा?' ये बातें सही हैं या गलत? ये गलत हैं; ये सत्य के विपरीत हैं। कर्तव्य तुम्हारा निजी व्यवसाय नहीं है, वह परमेश्वर के कार्य का हिस्सा है, और उसे तुम्हें परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार ही करना चाहिए, तब तुम अपना कर्तव्य एक स्वीकार्य मानक के अनुसार निभाओगे। यदि तुम उसे अपने नजरिये से, अपनी अपेक्षाओं के अनुसार, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार करोगे, तो वह मानक के अनुरूप नहीं होगा; यह तुम्हारा कर्तव्य निभाना नहीं है, क्योंकि तुम जो काम कर रहे हो वह काम परमेश्वर के प्रबंधन के दायरे में नहीं आता, वह परमेश्वर के घर का कार्य नहीं है; तुम अपनी दुकान चला रहे हो, और इसलिए परमेश्वर उसे याद नहीं रखता" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'सत्य-सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया जा सकता है')। मुझे एहसास हुआ कि हमारा कर्तव्य हमारा करियर नहीं है। यह मेरी नौकरी नहीं है। यह परमेश्वर का आदेश है, इसलिए इसे परमेश्वर और उसके घर की अपेक्षाओं के अनुसार किया जाना चाहिए। यह अपनी इच्छाओं और योजनाओं के आधार पर, मनमर्जी से नहीं किया जाना चाहिये। देखने में तो ऐसा लग सकता है कि मैं बहुत काम कर रही हूँ, मगर ये कर्तव्य निभाना नहीं है। यह अपना उद्यम चलाना और परमेश्वर का विरोध करना है। वैसे देखा जाये तो, जब भी मुझे किसी की सिफारिश करने के लिए कहा गया, मुझे यही डर लगा कि अगर मैंने कलीसिया से काबिल सदस्यों को जाने दिया, तो हमारी कलीसियाओं को अच्छे नतीजे नहीं मिलेंगे, और मैं अपना पद भी गँवा सकती हूँ। मैं लोगों को दूसरी जगह नहीं भेजना चाहती थी, ताकि अपनी इज़्ज़त और रुतबे को बचा सकूँ। सैद्धांतिक तौर पर तो मैं जानती थी कि मेरा कर्तव्य परमेश्वर का दिया हुआ है और यह मेरी जिम्मेदारी है, मगर व्यावहारिक तौर पर मैंने इसे अपना कारोबार, अपनी नौकरी जैसा समझ लिया। चूंकि मुझे यह काम सौंपा गया था, तो मुझे लगा यह मेरा कारोबार है और आखिरी फैसला मेरा ही होगा। मैं सिर्फ तभी लोगों को दूसरी जगह भेजने को तैयार थी, जब उसका असर मेरे काम पर न पड़ता हो, मगर जब भी ऐसा हुआ, तो मैंने इसमें अपनी टाँग अड़ा दी। फिर जब मुझे पता चला, बहन रन्ना को दूसरी जगह भेजा जा रहा है, तो मैं निराश हो गई और उसे जाने नहीं देना चाहती थी। मुझे लगा मेरे साथ बहुत गलत हुआ है, मैं तो कर्तव्य निभाना बंद करके अपनी नाराज़गी दिखाना चाहती थी। यह कर्तव्य निभाना कैसे हुआ? मैं साफ तौर पर परमेश्वर के घर का काम बिगाड़ रही थी, उसमें रुकावट डाल रही थी। मैं परमेश्वर के घर के हितों को कायम रखने या परमेश्वर को संतुष्ट करने की नहीं बल्कि खुद के लिये साजिश रचने की कोशिश कर रही थी, अपने कर्तव्य को अपनी इज़्ज़त और रुतबे के लिए काम करने के मौके के तौर पर इस्तेमाल कर रही थी। मैं यह सब सिर्फ अपने लिये कर रही थी। इस तरह मैं चाहे कितना भी काम करूं, परमेश्वर कभी इसकी सराहना नहीं करेगा। परमेश्वर ने मुझे वो काम दिया और वह परमेश्वर के घर के लिए था। जब भी किसी कलीसिया को लोगों की ज़रूरत हो, तो मुझे तत्परता से सहयोग करना चाहिये। मैं स्वार्थी बनकर, सिर्फ अपने बारे में नहीं सोच सकती।

अगले दिन एक सभा में एक अगुआ ने ज़िक्र किया कि भाई-बहनों के साथ ही दूसरे लोगों का सिंचन करना भी कलीसिया अगुआओं का काम है, ताकि हर कोई अपनी काबिलियत के हिसाब से कर्तव्य निभा सके। यह सुनना जैसे एक सपने से जाग उठना था। उनकी बात सही थी। भाई-बहनों का सिंचन करना और उन्हें सही काम ढूंढने में मदद करना भी मेरे काम का हिस्सा था। मगर जब भी परमेश्वर के घर को किसी की ज़रूरत थी, भले ही मैंने मना करने की हिम्मत नहीं की, मगर मेरे दिल में संघर्ष चलता था, और मैं नकारने के बहाने बनाती थी। ये तो अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। मैं तो उस भूमिका में अपनी जिम्मेदारियां भी नहीं उठा रही थी, फिर भी बहुत संतुष्ट लग रही थी। मैं आत्मचिंतन करने के बजाय, कलीसिया के काम के रास्ते में आकर खड़ी हो गई। क्या मैं कलीसिया के काम में रुकावट नहीं बन रही थी, जैसा कि उस बहन ने कहा था? मुझे याद आया जब मैंने पहली बार काम की जिम्मेदारी संभाली थी, मैं परमेश्वर के घर के सुसमाचार कार्य में सिर्फ अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाना चाहती थी। मगर मैं एक अड़चन, एक रुकावट बन गई थी। इस पर मुझे थोड़ा पछतावा हुआ और मैं परमेश्वर के सामने पश्चाताप करना चाहती थी।

कुछ दिनों बाद, एक अगुआ ने सुसमाचार टीम के कुछ सदस्यों को दूसरी कलीसिया में भेजने को कहते हुए मुझे संदेश भेजा। इस संदेश को पढ़कर मैं बिल्कुल शांत रही, मैंने देखा कि परमेश्वर ने मुझे सत्य पर अमल करने का मौका देने के लिए यह व्यवस्था की है। मगर जब मैं टीम के सदस्यों का मूल्यांकन कर रही थी, तो उनसे अलग होने को लेकर थोड़ी झिझक महसूस हुई, मैंने सोचा क्या मुझे वाकई दो सबसे अच्छी बहनों को जाने देना चाहिये या फिर मैं थोड़ी कम काबिल दो बहनों को भेज सकती हूँ? ऐसा सोचने पर, मुझे एहसास हुआ कि मैं स्वार्थी बनकर दोबारा वही गलती करने जा रही थी। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, "धोखेबाज और दुष्ट लोगों के दिल अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं, योजनाओं और षड्यंत्रों से भरे होते हैं। क्या इन चीजों को अलग रख पाना आसान है? (नहीं।) इसमें कुशलता यह है कि इन चीजों को अलग न रख पाने के बावजूद तुम अपने कर्तव्य का निर्वाह अच्छे से करो। असल में यह मुश्किल नहीं है : तुम्हें बस दोनों में अंतर करना आना चाहिए। यदि कोई काम परमेश्वर के घर से संबंधित है, और वह विशेष महत्व का है, तो उसे तुम्हें टालना नहीं चाहिए, उसमें गलतियाँ नहीं करनी चाहिए, परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए और न ही परमेश्वर के घर के काम में बाधा डालनी चाहिए। यही वह सिद्धांत है, जिसका तुम्हें पालन करना चाहिए। यदि परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान नहीं पहुँचता, लेकिन तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं की थोड़ी-बहुत पूर्ति हो जाती है, तो तुम्हें उसे स्वीकार कर लेना चाहिए, और परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचानी चाहिए, जो कि सीमा-रेखा होगी। यदि तुम अपनी क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं और अहंकार की तुष्टि के लिए परमेश्वर के घर के काम में कोई गड़बड़ी करते हो, तो तुम्हारे लिए अंतिम परिणाम क्या होगा? तुम्हें बदल दिया जाएगा और शायद हटा ही दिया जाए। तुम परमेश्वर के स्वभाव को नाराज कर बैठोगे, और शायद तुम्हें और अवसर न मिलें। परमेश्वर लोगों को जो अवसर देता है, उनकी एक सीमा होती है। परमेश्वर लोगों को उनकी परीक्षा लेने के कितने अवसर देता है? यह उनके सार के अनुसार तय किया जाता है। यदि तुम प्राप्त अवसरों का भरपूर सदुपयोग करते हो, और अपने गौरव और अहंकार से पहले परमेश्वर के घर के काम को पूरा करने को अधिक महत्व दे पाते हो, तो तुम्हारी मानसिकता सही है" ("अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन" में 'सत्य-सिद्धांतों की खोज करके ही अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया जा सकता है')। अगुआ ने ऐसी व्यवस्था इसलिए की थी क्योंकि परमेश्वर के घर के कार्य को इसकी ज़रूरत थी, जबकि मैं अपने नाम और रुतबे को बचाने की खातिर उस पर कायम नहीं रह सकी। मुझे हमेशा यह डर लगा रहा कि अगर टीम के सबसे अच्छे सदस्यों को दूसरी जगह भेज दिया गया, तो हमारी कलीसिया के काम को नुकसान होगा और मुझे बर्खास्त कर दिया जाएगा। अगर कोई परमेश्वर के घर के हितों को कायम रखता है और परमेश्वर की इच्छा का ख्याल रखता है, तो उसे भला कौन निकालेगा? कोई नहीं। जो स्वार्थी और नीच है, जो टीम के अच्छे सदस्यों को जाने देने से मना करता है, जिससे परमेश्वर के घर के कार्य और उसके हितों पर बुरा असर पड़ता है, उसे ही बर्खास्त करके हटाया जाएगा। अगर मैंने उन बहनों को रोककर रख लिया, तब भी यह ज़रूरी नहीं है कि हमारी कलीसियाएं अच्छा काम करेंगी। मेरी मंशाएं गलत थीं। अगर मैं अपने नाम और पद को बचाने में लगी रहती, तो मुझे पवित्र आत्मा का कार्य हासिल नहीं हो पाता, फिर मैं परमेश्वर की आशीष के बिना अपने काम में अच्छे नतीजे कैसे दे पाती? इन विचारों से मेरे मन को सुकून मिला और मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से कहा, "परमेश्वर, मैं सत्य का अभ्यास करके आपको संतुष्ट करना चाहती हूँ, अब मैं अपने नाम और रुतबे को बचाने के पीछे नहीं भागूँगी।" उसके बाद, मैंने सुसमाचार टीम के उन दो सदस्यों की सिफारिश कर दी जिनका प्रदर्शन सबसे अच्छा था। इस पर अमल करने के बाद मुझे वाकई बहुत सुकून मिला। इस तरह मेरे मन का बोझ भी उतर गया।

इस अनुभव के बाद मैंने सोचा कि मैं थोड़ी बदल गई हूँ, मगर मुझे हैरानी हुई जब कुछ ही दिनों बाद मुझे पूरी तरह से उजागर कर दिया गया। एक दिन एक अगुआ ने कहा कि सिंचन टीम के कुछ और सदस्यों को दूसरी जगह भेजना है जिसके लिए मेरी सहमति चाहिए, क्योंकि हमारी कलीसियाओं में बहुत से नये दोभाषिया सदस्य मौजूद थे। जब मैं उनके बारे में छानबीन की तो पता चला कि मुझे तकरीबन ऐसे हर दोभाषिया सदस्य को उनके हवाले करना होगा जिसके पास काबिलियत है। मुझे फिर से अपने पद और रुतबे की चिंता होने लगी। मुझे डर था कि अगर वे लोग छोड़कर चले गये तो हमारी कलीसिया के सुसमाचार के काम पर असर पड़ना तय है या शायद ये काम ठीक से न हो पाये। उस दिन शाम को अगुआ ने हालात की जानकारी लेने के लिए मुझे संदेश भेजा। मैं काफी उलझन में पड़ गई। उनके बताये हर नाम के लिए, मैंने बस एक शब्द का जवाब दिया : "हाँ," "ठीक है।" जब उन्होंने विस्तार से जानकारी माँगी, तो मैं कुछ भी नहीं कहना चाहती थी। मैंने सोचा, "पहली बात तो ये कि मैं इन लोगों को आपके हवाले करना ही नहीं चाहती थी, मगर आप सवाल पूछे जा रही हैं। आप अच्छे काम करने वालों को हमारी कलीसियाओं से निकालकर इन्हें वीरान बना रही हैं। मैं अपना काम कैसे कर पाऊँगी?" मैं बहुत उलझन में थी, इसलिए समर्पण नहीं कर पाई।

फिर एक सभा में, मैंने परमेश्वर के वचनों के पाठ का एक वीडियो देखा जिससे मुझे अपनी भ्रष्टता को समझने में मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "मसीह-विरोधियों के स्वार्थ और उनकी नीचता का सार प्रत्यक्ष रूप से स्पष्ट है; यह पहलू विशेष रूप से सुस्पष्ट होता है। जब तुम उनके साथ सहभागिता करते हो, तब जो कुछ भी उनके रुतबे और उनकी प्रतिष्ठा से संबंधित नहीं होता, उसमें उन्हें कोई रूचि नहीं होती, वे उसकी परवाह नहीं करते, और ऐसा लगता है मानो इन चीजों का उनसे कोई संबंध ही न हो। वे कभी भी अपने भीतर के सत्य को खोजने और परमेश्वर की इच्छा को समझने का प्रयास नहीं करते, चीजों को बड़े पैमाने पर देखने और परमेश्वर के घर के काम के बारे में सोचने की बात तो छोड़ ही दो। परमेश्वर के घर के कार्य के दायरे में, काम की मांग के अनुसार कुछ लोगों को इधर से उधर करना आवश्यक होता है। उदाहरण के लिए, कोई अगुआ समूह के कार्य का प्रभारी है, और उस समूह के एक सदस्य को अपना कर्तव्य निभाने के लिए परमेश्वर के घर के कार्य की खातिर दूसरे समूह में स्थानांतरित करना आवश्यक है। तो सामान्य मानवीय समझ के अनुसार, इसे कैसे संभाला जाना चाहिए? परिस्थितियों के अनुसार, उस अगुआ को उस जगह को भरने के लिए किसी और को खोजना चाहिए। जैसे ही कोई उपयुक्त व्यक्ति मिल जाए, मूल व्यक्ति को जाने देना कर देना चाहिए और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए जहाँ उसकी जरूरत हो, वहाँ जाने की उसे अनुमति दी जानी चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों की अपनी कोई वैयक्तिकता नहीं होती, बल्कि वे परमेश्वर के घर का एक भाग होते हैं। परमेश्वर के घर की जिस परियोजना को उनकी जरूरत हो, उन्हें वहीं जाना चाहिए, जब तक कि सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए उन्हें बिना तैयारी के स्थानांतरित न कर दिया जाए। यदि यह सामान्य स्थानांतरण है जो कि सिद्धांत के अनुसार है, तो किसी भी अगुआ को इसे रोकने का अधिकार नहीं होता। क्या तुम लोग कहोगे कि ऐसा भी कोई कार्य होता है जो परमेश्वर के घर का कार्य नहीं होता? क्या कोई ऐसा कार्य होता है जिसमें परमेश्वर की प्रबंधन योजना का विस्तार शामिल नहीं होता? यह सब परमेश्वर के घर का ही कार्य होता है, हर कार्य समान होता है, और उसमें कोई 'तेरा' और 'मेरा' नहीं होता। ... परमेश्वर का घर अपने कर्मियों का केंद्रीय रूप से और सिद्धांत के अनुसार समन्वय करता है। इसका किसी अगुआ, टीम के प्रमुख या व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं होता। सभी को सिद्धांत के अनुसार कार्य करना चाहिए; यह परमेश्वर के घर का नियम होता है। और इसलिए जो लोग परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का पालन नहीं करते हैं, जो हमेशा अपने हितों और अपनी ही स्थिति के लिए षडयंत्र और साजिश करते रहते हैं, क्या वे स्वार्थी और नीच नहीं होते? वे भाइयों और बहनों का उपयोग करते हैं, वे इन सक्षम लोगों का फायदा उठाते हैं, ताकि वे लोग उनकी ओर से काम करें, कार्य कुशलता बनाने में उनकी मदद करें, और इस तरह वे अपनी स्थिति को मजबूत करते हैं। यही उनका लक्ष्य होता है। बाहरी तौर पर देखा जाए, अगर तुम करीब से न देखो, तो ऐसा व्यक्ति बहुत जिम्मेदार लगता है। अविश्वासी लोग उसे विशिष्ट व्यक्ति, उस्ताद मानते हैं, और कहते हैं कि जब प्रतिभा को रोके रखने की बात आती है, तो उनके पास बहुत क्षमता और कुछ चालें होती हैं। अविश्वासियों के बीच यह ईर्ष्या का एक कारण होता है, यह एक ऐसी चीज है जिसकी लोग चाह रखते हैं, यह बेशकीमती होती है—लेकिन परमेश्वर का घर ठीक इसके विपरीत होता है: परमेश्वर के घर में, इसकी निंदा की जाती है। परमेश्वर के घर के व्यापक कार्य के बारे में न सोचकर, केवल अपने रुतबे के बारे में ही सोचना, और—परमेश्वर के घर के हितों के प्रति इसकी लागत और कलीसिया के काम को होने वाले नुकसान के बारे में कोई पश्चाताप न रखकर—अपनी ही हैसियत को सुनिश्चित करना: क्या यह स्वार्थी और नीच होना नहीं है? जब ऐसी स्थिति आए, तो कम से कम तुम्हें अपने विवेक से सोचना चाहिए : 'ये सभी परमेश्वर के घर के लोग हैं, ये कोई मेरी निजी संपत्ति नहीं हैं। मैं भी परमेश्वर के घर का सदस्य हूँ। मुझे परमेश्वर के घर को लोगों को स्थानांतरित करने से रोकने का क्या अधिकार है? मुझे केवल अपने समूह के काम पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय परमेश्वर के घर के समग्र हितों पर विचार करना चाहिए।' जिन लोगों में विवेक और तर्कशीलता होती है, उन लोगों के विचार ऐसे ही होने चाहिए, और जो परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, उनके अंदर ऐसी ही समझ होनी चाहिए; तभी परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं का पालन करना संभव है। जब सत्ता दुष्ट लोगों के हाथ में होती है, तो उनके अंदर ऐसा विवेक और समझ नहीं होती, और वे परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं का बिलकुल पालन नहीं करते। यह किस तरह की 'चीज' है? परमेश्वर के घर में उनकी हिम्मत इतनी बढ़ जाती है कि वे विनाशकारी हो जाते हैं, यहाँ तक कि वे अपने मनसूबों से बाज नहीं आते; ऐसे लोग मानवता से बिलकुल शून्य होते हैं, दुष्ट होते हैं। मसीह-विरोधी इसी प्रकार के लोग हुआ करते हैं। वे हमेशा परमेश्वर के घर के काम को, भाइयों और बहनों को, यहाँ तक कि परमेश्वर के घर की संपत्ति को—अपने अधीन सभी चीजों को—निजी संपत्ति के रूप में ही देखते हैं; यह उन पर होता है कि इन चीजों को कैसे वितरित करें, स्थानांतरित करें और उपयोग में लें। जब वे चीजें उनके हाथों में आ जाती हैं, तो ऐसा लगता है कि वे शैतान के कब्जे में हैं, और परमेश्वर के घर को हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं होती, किसी को भी उन्हें छूने की अनुमति नहीं होती। अपने क्षेत्र में, वे बड़ी तोप चीज होते हैं, वे ही सबसे बड़े होते हैं, और जो कोई भी वहाँ जाता है, उसे उनके आदेशों और व्यवस्थाओं का पालन करना होता है, और उनसे इशारा लेना होता है। यह मसीह-विरोधी के चरित्र के स्वार्थ और नीचता का प्रकटन होता है" ("मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'प्रकरण चार : मसीह-विरोधियों के चरित्र और उनके स्वभाव के सार का सारांश (भाग एक)')। परमेश्वर के वचनों ने मेरी मनोदशा को उजागर कर दिया। भाई-बहनों को अपने काबू में रखने और उन्हें परमेश्वर के घर के हवाले न करने की चाह स्वार्थी और नीच थी, मैं एक मसीह विरोधी जैसा स्वभाव दिखा रही थी। जब भी अगुआ किसी को हमारी कलीसियाओं से दूसरी जगह भेजना चाहते तो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था और मैं ऐसा नहीं करना चाहती थी। मैं गुस्से में आ जाती थी और लगता था कि मेरे साथ बहुत गलत हो रहा है। मैं इससे सहमत नहीं हो पाती थी, जब तक कि अगुआ मेरे साथ सहभागिता करके मेरी सोच को नहीं बदलते थे और मुझे अच्छी बातें नहीं बताते थे। मैं ऐसी अगुआ थी जिसे परमेश्वर ने बेनकाब कर दिया हो, मैं अपनी जिम्मेदारी वाली कलीसियाओं से लोगों को दूसरी जगह भेजने में अपनी मनमर्जी चाहती थी। जब लोगों की ज़रूरत होती, तो वे मेरे कहने पर ही जाते, वरना नहीं जाते। मेरी मंज़ूरी के बिना कोई भी नहीं जा सकता था। मैं कलीसियाओं को मजबूती से अपने काबू में रखे हुए थी, हर चीज़ पर अपना हुक्म चलाती थी। मानो कलीसियाओं पर मसीह का नहीं, मेरा राज हो। मानो मेरे तैयार किए नए सदस्य मेरी बपौती हों। उन्होंने अपने कर्तव्य में जो भी हासिल किया मैं उसका इस्तेमाल करना चाहती थी, ताकि अपने पद पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकूँ। उनकी उपलब्धियों का इस्तेमाल मैं अपने पद को मजबूत रखने के लिए करना चाहती थी। ये तो सरासर बेशर्मी थी! ये परमेश्वर की कलीसियाएं हैं और यह परमेश्वर के घर का काम है, मगर मैं तानाशाह जैसा बर्ताव कर रही थी, यहां अपना राज्य कायम करना चाहती थी। क्या मैं परमेश्वर का विरोध करने वाले मसीह विरोधी के मार्ग पर नहीं चल रही थी? इसने मुझे धार्मिक जगत के याजक-वर्ग के बारे में भी सोचने पर मजबूर किया। उन्हें पता है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया यह गवाही देती है कि प्रभु लौट आया है, और उसने बहुत से सत्य व्यक्त किये हैं, मगर उन्हें डर है कि इन सत्यों को जानने के बाद, उनसे जुड़े लोग सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करने लगेंगे, जिससे उनका रुतबा, इज़्ज़त और आजीविका खतरे में पड़ जाएगी, इसलिए वे उन्हें सच्चे मार्ग से दूर रखने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। वे सिरे से कहते हैं कि भेड़ें उनकी हैं और वे उन्हें परमेश्वर की वाणी सुनने और उसका अनुसरण नहीं करने देंगे। वे विश्वासियों को अपनी निजी संपत्ति समझ बैठते हैं, उनको कसकर अपने काबू में रखते हैं और उनके लिए परमेश्वर से लड़ते हैं। वे अंत के दिनों में उजागर किये गए दुष्ट सेवक और मसीह विरोधी हैं। मेरी गतिविधियां उन पादरियों और एल्डरों की गतिविधियों के सार से भला अलग कैसे थीं? मैं अपने पद और इज़्ज़त को बनाये रखने के लिए दूसरों को काबू में कर रही थी। मैं जानती थी, अगर मैंने पश्चाताप नहीं किया, तो परमेश्वर मसीह विरोधियों के साथ मुझे भी धिक्कारेगा और दंड देगा। परमेश्वर के चुने हुए लोग परमेश्वर के होते हैं, किसी इंसान के नहीं। अगर परमेश्वर के घर का कर्तव्य निभाने के लिए किसी की ज़रूरत होती है तो उसे ज़रूरत के मुताबिक दूसरी जगह भेजा जा सकता है। मुझे किसी को अपने प्रबंधन वाली कलीसिया में रोककर रखने का कोई अधिकार नहीं था। परमेश्वर के घर के काम के लिए लोगों को तैयार करना मेरा कर्तव्य है और अगुआओं द्वारा लोगों को दूसरी जगह भेजा जाना बिल्कुल सामान्य बात है। इसमें मेरी राय मांगना मुझे सम्मान देना है और इससे आपसी सहयोग बेहतर होता है। मेरी सहमति के बिना भी सीधे किसी को दूसरी जगह भेजा जा सकता है। मुझे लोगों को अपने काबू में रखने का कोई अधिकार नहीं है। मुझे पता था कि मैं इस तरह स्वार्थी बनकर नहीं जी सकती थी, परमेश्वर ने मुझे साँसें दी हैं, तो मैं किस चीज़ के लिये लड़ रही हूँ? हो सकता है कि परमेश्वर के घर में मेरा कोई बड़ा योगदान न हो, मगर कम से कम मुझे उसके काम में तो दखल नहीं देना चाहिए। मुझे परमेश्वर के घर के काम को फायदा पहुँचाने के लिए और भी मेहनत करनी चाहिए।

उसके बाद, ज़रूरत पड़ने पर, मैंने लोगों को दूसरी जगह भेजने में खुशी-खुशी मदद की और अपने फायदे के बारे में सोचना बंद कर दिया। एक बार, जिस बहन को मैंने दूसरी कलीसिया में भेजा था उसने मुझे यह कहते हुए एक संदेश भेजा कि वहां उसे सुसमाचार के प्रचार के प्रशिक्षण से बहुत फायदा हुआ है। मुझे खुशी के साथ-साथ शर्मिंदगी भी हुई। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि उनका विकास हुआ है, वे राज्य के सुसमाचार को फैलाने में अपने हिस्से का योगदान दे सकते हैं। मैं शर्मिंदा थी क्योंकि अगर मैं कोई रुकावट पैदा किये बिना अपनी इच्छा से लोगों को भेजती, तो उन्हें पहले ही प्रशिक्षित कर दिया गया होता और वे अच्छे कर्म कर रहे होते। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की कि अब मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव के साथ नहीं जीना चाहती, बल्कि अच्छे उम्मीदवारों की सिफारिश करना, सुसमाचार के काम में योगदान देना और अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ।

परमेश्वर की ओर से एक आशीर्वाद—पाप से बचने और बिना आंसू और दर्द के एक सुंदर जीवन जीने का मौका पाने के लिए प्रभु की वापसी का स्वागत करना। क्या आप अपने परिवार के साथ यह आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं?

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