"जो पुत्र पर विश्वास करता है, अनन्त जीवन उसका है" इसका सच में क्या अर्थ है?
अंत के दिनों में, प्रभु यीशु देहधारण करके लौट आए हैं और सत्य के करोड़ों वचनों को व्यक्त किया है, और “परमेश्वर के घर से न्याय का कार्य” किया...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
अब, धार्मिक दुनिया में प्रभु पर विश्वास करने वाले बहुत-से लोग उसका स्वागत करने के लिए तरस रहे हैं और सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल कर रहे हैं। उन्होंने सुना है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया गवाही देती है कि प्रभु यीशु पहले ही लौट आया है और अंत के दिनों में सत्य व्यक्त कर रहा है और न्याय का कार्य कर रहा है, इसलिए प्रभु की वापसी का इंतजार करने में सबसे अहम बात उसकी वाणी सुनने का प्रयास करना है। उन्हें लगता है कि यह प्रभु के वचनों के अनुरूप है, लेकिन वे अभी भी उलझन में हैं और सोचते हैं, “चूँकि लोग प्रभु को एक बादल पर उतरते हुए देखेंगे, तो फिर अभी भी उसकी वाणी सुनना क्यों जरूरी है?” आइए इस सवाल पर संगति करें। प्रभु यीशु ने भविष्यवाणी की थी कि प्रभु की वापसी दो तरीकों से होगी : एक है मनुष्य के पुत्र के रूप में गुप्त रूप से उतरना और दूसरा है सार्वजनिक रूप से एक बादल पर उतरना। अगर प्रभु को अंत के दिनों में केवल बादल पर ही उतरना होता, तो लोगों को प्रभु का स्वागत करने के लिए परमेश्वर की वाणी सुनने की जरूरत नहीं होती। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रभु के सार्वजनिक रूप से बादल पर उतरने का प्रभाव बहुत विशाल होगा—सचमुच धरती हिला देने वाला और प्रतापी—और लोग इसे सीधे देख सकेंगे—उन्हें प्रभु का स्वागत करने के लिए परमेश्वर की वाणी सुनने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन धार्मिक दुनिया के ज्यादातर लोगों में समझने की क्षमता नहीं है। वे प्रभु को बादल पर उतरते देखने के विचार पर ही अड़े रहते हैं, यह सोचते हैं कि बस अपनी आँखों से प्रभु को बादल पर उतरते देखकर ही वे उसका स्वागत कर पाएँगे। इसलिए, जो लोग यह मानते हैं कि प्रभु बादल पर उतरेगा, वे परमेश्वर की वाणी सुनने पर ध्यान नहीं देते। अभी पूरी धार्मिक दुनिया में यही स्थिति है। वे सभी प्रभु के बादल पर उतरने का इंतजार कर रहे हैं और कोई भी परमेश्वर की वाणी सुनने का प्रयास नहीं कर रहा है। प्रभु का स्वागत करने के बारे में ऐसी मानसिकता रखने के परिणामों की कल्पना भी नहीं की जा सकती! बाइबल में, प्रभु यीशु द्वारा अपनी वापसी के बारे में कुछ भविष्यवाणियाँ दी गई हैं : “देख, मैं चोर के समान आता हूँ” (प्रकाशितवाक्य 16:15)। “इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारा प्रभु किस दिन आएगा” (मत्ती 24:42)। “उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत और न पुत्र, परन्तु केवल पिता” (मत्ती 24:36)। जब सच्चे अर्थों में समझने की क्षमता रखने वाले लोग प्रभु यीशु की वापसी के बारे में इन भविष्यवाणियों को देखेंगे, तो वे विचार करेंगे : प्रभु निश्चित रूप से मनुष्य के पुत्र के रूप में लौटेगा, पर जब वह आएगा तो हम मनुष्य के पुत्र का स्वागत कैसे करेंगे? हम कैसे जानेंगे कि प्रभु आ गया है? प्रभु यीशु ने ये वचन कहे थे : “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:27)। ऐसे में, मनुष्य के पुत्र के आगमन का स्वागत करने के लिए आपको परमेश्वर की वाणी सुनने की तैयारी करनी चाहिए। तो आपको परमेश्वर की वाणी सुनने की तैयारी कैसे करनी चाहिए? अगर बात प्रभु को बादल पर उतरते देखने की होती, तो क्या फिर भी तैयारी करने की जरूरत होती? कोई भी प्रभु को बादल पर उतरते हुए देख और महसूस कर सकता है; इसके लिए तैयारी करने की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन परमेश्वर की वाणी सुनने के लिए, आपको सतर्क और तैयार रहना होगा—आपको सतर्क और तैयार रहने की जरूरत है क्योंकि कोई नहीं जानता कि परमेश्वर कब आएगा। इसके अलावा, प्रभु मनुष्य के पुत्र के रूप में लौटता है—लोग उसे सिर्फ देखकर नहीं पहचान सकते। इसलिए, प्रभु यीशु के वचनों से हम देख सकते हैं कि बादल पर उतरने वाले प्रभु का स्वागत करना आसान है, लेकिन मनुष्य के पुत्र के प्रकटन का स्वागत करने के लिए, हमें परमेश्वर की वाणी ध्यान से सुनने की जरूरत है। इसमें मुश्किल है और इसलिए हमें सतर्क और तैयार रहना चाहिए। तो आइए इस बारे में और बात करें कि हमें सतर्क और तैयार क्यों रहना चाहिए। प्रभु यीशु ने कहा था : “जैसा नूह के दिनों में हुआ था, वैसा ही मनुष्य के पुत्र के दिनों में भी होगा। जिस दिन तक नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उनमें विवाह होते थे। तब जल-प्रलय ने आकर उन सब को नष्ट किया” (लूका 17:26-27)। यह देखा जा सकता है कि मनुष्य के पुत्र के उतरने की परिस्थितियाँ बिल्कुल नूह के समय जैसी होंगी : लोग खाने, पीने, शादी करने और विवाह में दिए जाने में लगे होंगे। बेशक, ये परिस्थितियाँ विनाशों से पहले की हैं। विनाश से पहले की इन परिस्थितियों को बहुत आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है, क्योंकि विनाशों से पहले मानवजाति बहुत दुष्ट होती है—सभी खाने-पीने, मौज-मस्ती करने और शादी-ब्याह और पुनर्विवाह करने की बुरी प्रवृत्तियों के बीच जी रहे होते हैं। लेकिन विनाशों के दौरान, क्या खाने-पीने और शादी-ब्याह और पुनर्विवाह करने की ये बुरी प्रवृत्तियाँ अभी भी मौजूद रहेंगी? वे बहुत पहले ही गायब हो चुकी होंगी। जब भयंकर महामारी आई, तो न जाने कितने लोग मारे गए? शहर सुनसान हो गए और गाँव भी सुनसान हो गए। खाने-पीने और शादी-ब्याह और पुनर्विवाह करने की प्रवृत्ति बस गायब हो गई, इसलिए यह स्पष्ट है कि नूह के दिनों जैसे दिन बीत चुके हैं। जो लोग विनाशों से पहले प्रभु का स्वागत करने में नाकाम रहे, वे सभी उनमें फँस गए और केवल वे लोग जिन्होंने परमेश्वर की वाणी सुनी और अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को स्वीकार किया, उन्हें परमेश्वर के सामने उठा लिया गया, ताकि वे स्वर्ग के राज्य के भोज में शामिल हों, परमेश्वर का न्याय स्वीकार करने और शुद्ध किए जाने के लिए परमेश्वर के सामने उठा लिया गया; वे सभी परमेश्वर के प्रकटन और कार्य की गवाही देते हैं। ये लोग विनाशों से पहले परमेश्वर द्वारा बनाए गए विजेताओं का समूह हैं।
अब हम सभी साफ तौर पर देख सकते हैं कि मनुष्य का पुत्र विनाशों से पहले गुप्त रूप से उतरकर आता है, जबकि वह महाविनाशों के समाप्त होने के बाद ही सार्वजनिक रूप से बादल पर उतरेगा। मनुष्य के पुत्र के गुप्त रूप से उतरने और महाविनाशों के समाप्त होने के बाद उसके सार्वजनिक रूप से उतरने का समय और परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं : एक विनाशों से पहले होता है और दूसरा विनाशों के बाद होता है। विनाशों से पहले उतरना मनुष्य के पुत्र का सत्य व्यक्त करने और परमेश्वर के घर से शुरू होने वाला न्याय का कार्य करने के लिए आना है। ठीक उसी तरह जैसे प्रभु यीशु प्रकट हुआ और उसने कार्य किया, परमेश्वर मनुष्य को बचाने का कार्य करने के लिए देह धारण करता है। महाविनाशों के समाप्त होने के बाद, मनुष्य का पुत्र अपना रूप बदलेगा और सार्वजनिक रूप से बादल पर उतरेगा। उस समय, मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य समाप्त हो चुका होगा, शैतान के सभी राज्य नष्ट हो चुके होंगे और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले अविश्वासी और धार्मिक दुनिया के सभी लोग मूलतः नष्ट हो चुके होंगे। इसलिए, जब प्रभु सार्वजनिक रूप से बादल पर उतरेगा, तो वह अच्छे को इनाम और बुरे को सजा देगा। भले ही मनुष्य के पुत्र के प्रकटन और कार्य को स्वीकार न करने वालों में से कुछ लोग प्रभु को सार्वजनिक रूप से बादल पर उतरते देखने के लिए जीवित बच भी जाएँ, फिर भी वे सजा के भागीदार होंगे। जब वह समय आएगा, तो वे रोएँगे और दाँत पीसेंगे और सीधे नरक में जाएँगे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर स्पष्ट रूप से कहता है : “ब्रह्मांड के भीतर मनुष्यों में से वे सभी जो दानवों के हैं पूर्णतया नष्ट कर दिए जाएँगे। वे सभी जो शैतान की आराधना करते हैं वे मेरी जलती हुई आग के बीच गिर पड़ेंगे—अर्थात् उनको छोड़कर जो अभी धारा के अन्तर्गत हैं, शेष सभी को राख में बदल दिया जाएगा” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 26)। इन वचनों को कैसे समझा जाना चाहिए? इनका मतलब है कि अगर आप विनाशों में जीवित बचना चाहते हैं, तो आपको अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार करना होगा। जो लोग परमेश्वर के न्याय के कार्य को स्वीकार नहीं करते, वे सभी नष्ट हो जाएँगे और जो लोग केवल प्रभु के बादल पर उतरने का इंतजार करते हैं, वे सभी नष्ट होने के लिए लक्षित होंगे। इसलिए, प्रभु का स्वागत करने को लेकर परमेश्वर का इरादा यह है कि तुम बुद्धिमान कुंवारियाँ बनो, जो मनुष्य के पुत्र के प्रकटन का स्वागत करने में सक्षम हों। जो लोग मनुष्य के पुत्र के प्रकटन का स्वागत करते हैं, वे धन्य हैं; यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत आशीष है। लेकिन जो लोग प्रभु का स्वागत करने से पहले उसे बादल पर उतरते देखने पर जोर देते हैं, वे सभी सबसे मूर्ख कुंवारियाँ हैं, क्योंकि जब वे प्रभु को बादल पर उतरते देखेंगे, तो यह परमेश्वर का आशीष नहीं होगा; यह इस बात का संकेत है कि उन्हें सजा मिलेगी। इसलिए, अगर तुम प्रभु का स्वागत करना चाहते हो, तो सबसे अहम बात मनुष्य के पुत्र के प्रकटन और कार्य का स्वागत करना है। केवल यही परमेश्वर के इरादे के अनुरूप है।
अब सभी को यह समझ लेना चाहिए कि मनुष्य के पुत्र का स्वागत करने के लिए, तुम्हें परमेश्वर की वाणी सुनने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि बाहर से, मनुष्य का पुत्र बस एक साधारण व्यक्ति है, बिल्कुल प्रभु यीशु की तरह; एकमात्र अंतर यह है कि वह सत्य व्यक्त कर सकता है और परमेश्वर का कार्य कर सकता है। अगर तुम देहधारी मनुष्य के पुत्र को पहचानना चाहते हो, तो तुम्हें जानना होगा कि परमेश्वर की वाणी कैसे सुनें। तो तुम परमेश्वर की वाणी सुनने में सक्षम कैसे हो सकते हो? सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें पता होना चाहिए कि सत्य क्या है। भले ही तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते समय सत्य को न समझो, जब तक तुम अपने दिल में यह महसूस कर सकते हो कि वे सत्य हैं और यह निश्चित कर सकते हो कि वे सत्य हैं, तो इतना ही काफी है। अगर तुम नहीं जानते कि सत्य क्या है और परमेश्वर के वचन पढ़ते समय तुम्हें अपने दिल में कुछ भी महसूस नहीं होता है, तो तुम परमेश्वर की वाणी सुनने में असमर्थ होगे। अब, दुनिया भर में इतने सारे लोगों ने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया है। जब उन्होंने पहली बार सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़े थे, तो उन्हें भी सत्य समझ में नहीं आया था, लेकिन वे सभी महसूस कर सकते थे कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है और ये सभी सत्य हैं और इसलिए उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को स्वीकार कर लिया। जो लोग परमेश्वर की वाणी सुन सकते हैं, वे सबसे अधिक धन्य हैं; यह परमेश्वर द्वारा उन्हें दिया गया आशीष है। जैसे ही परमेश्वर के वचन कहे जाते हैं, परमेश्वर की भेड़ों को अपने दिलों में एक एहसास होता है; वे महसूस कर सकती हैं कि इन वचनों में बहुत बड़ा अधिकार है और ये सत्य हैं। परमेश्वर की वाणी सुनने में सक्षम होने के लिए वे किस पर निर्भर करती हैं? वे अपनी आत्मा के अंतर्ज्ञान पर निर्भर करती हैं। उनकी आत्मा का अंतर्ज्ञान यह एहसास है कि इन वचनों में बहुत बड़ा अधिकार है, ये वचन बहुत गहरे हैं, ये वचन परमेश्वर की ओर से आए हैं और कोई भी इंसान इन्हें कभी नहीं बोल सकता। इसके अलावा, इन वचनों को पढ़ने पर, वे निश्चित हो सकती हैं कि ये सत्य हैं और वे महसूस करती हैं कि केवल सत्य में ही अधिकार और सामर्थ्य होता है। ऐसे लोग सत्य के वचन सुनकर कुछ महसूस करते हैं। इसलिए, परमेश्वर की वाणी सुनने की क्षमता तुम्हारी आत्मा के एहसास, यानी अंतर्ज्ञान पर आधारित है। प्रभु यीशु ने कहा था : “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:27)। “परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की वाणी सुनती हैं,” यह कथन हमें यह नहीं बताता है कि परमेश्वर की भेड़ों ने निश्चित रूप से कुछ सालों तक परमेश्वर के वचनों का अनुभव किया है, उनके पास जीवन का अनुभव है और परमेश्वर का कुछ सच्चा ज्ञान है, इससे पहले कि वे परमेश्वर की वाणी सुन सकें। बल्कि यह हमें बताता है कि जो परमेश्वर की भेड़ें हैं, वे स्वाभाविक रूप से परमेश्वर की वाणी सुन लेंगी। यह परमेश्वर की भेड़ों में पाई जाने वाली एक सहज-वृत्ति है; जिन लोगों में आध्यात्मिक समझ होती है, उनमें यह सहज-वृत्ति होती है। जिनमें यह सहज-वृत्ति होती है, वे परमेश्वर की भेड़ें हैं और जिनमें यह नहीं होती, वे परमेश्वर की भेड़ें नहीं हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने अब इतने सारे सत्य व्यक्त किए हैं, फिर भी धार्मिक दुनिया में इतने सारे लोग अभी भी उसका प्रतिरोध और निंदा कर रहे हैं। ये लोग परमेश्वर की भेड़ें नहीं हैं। वे मूर्ख कुंवारियाँ हैं जो पहले ही अंधकार में गिर चुकी हैं। वे मसीह-विरोधी, दानव और शैतान हैं।
तो तुम परमेश्वर की वाणी कैसे सुन सकते हो? तुम्हें खोजने और जाँच-पड़ताल करने की जरूरत है। सबसे पहले, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हें यह पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि परमेश्वर के वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है। इसके अलावा, तुम्हें यह पहचानना होगा कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, ये सत्य किसी भी इंसान के पास नहीं हैं, और कोई भी इंसान इन्हें नहीं बोल सकता, चाहे उसने कितने भी सालों तक परमेश्वर पर विश्वास क्यों न किया हो। परमेश्वर के सभी वचन सत्य हैं। सत्य एक सकारात्मक चीज है। सत्य मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं से बिल्कुल अलग है और यह मनुष्य के विचारों और सिद्धांतों से भी बिल्कुल अलग है। परमेश्वर के वचन परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के स्वभाव और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, उन्हें दर्शाते हैं और केवल परमेश्वर ही उन्हें व्यक्त कर सकता है। एक और बात यह है कि परमेश्वर के वचन बाइबल के रहस्यों से और साथ ही परमेश्वर के कार्य के विभिन्न रहस्यों से भी पर्दा हटा सकते हैं। कोई भी इंसान इन रहस्यों से पर्दा नहीं हटा सकता, न ही पवित्रात्मा इन रहस्यों को मनुष्य पर प्रकट करेगा; केवल परमेश्वर ही इनसे पर्दा हटा सकता है। परमेश्वर की वाणी सुनने में, तुम्हें मुख्य रूप से इन्हीं पहलुओं पर ध्यान देना होगा। अगर तुम परमेश्वर की वाणी सुनने में सक्षम हो और कम से कम यह निश्चित कर सकते हो कि जो इन सत्यों को व्यक्त कर रहा है उसे परमेश्वर द्वारा भेजा गया है, तो तुम कम से कम परमेश्वर का प्रतिरोध और निंदा नहीं करोगे। इसके अलावा, अगर तुम निश्चित हो सकते हो कि ये सत्य केवल देहधारी परमेश्वर द्वारा ही व्यक्त किए जा सकते हैं, तो यह और भी अच्छा है और तुम प्रभु का स्वागत कर चुके होगे।
आइए इस बारे में और बात करें कि जब प्रभु यीशु ने हमें सतर्क और तैयार रहने के लिए कहा था तो उसका क्या मतलब था। कम से कम तीन चीजें हैं जिनके लिए हमें सतर्क और तैयार रहना चाहिए। पहली यह है कि जब मनुष्य का पुत्र आता है तो हम यह कैसे तय करें कि वह देहधारी परमेश्वर और अंत के दिनों का मसीह है। अगर तुम सतर्क और तैयार नहीं हो, तो तुम प्रभु का स्वागत नहीं कर पाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंत के दिनों में लोगों को गुमराह करने के लिए झूठे मसीह प्रकट होते हैं—जिनके पास सत्य नहीं है वे झूठे मसीहों द्वारा आसानी से गुमराह हो जाते हैं। ठीक वैसे ही जैसे प्रभु यीशु ने कहा था : “उस समय यदि कोई तुम से कहे, ‘देखो, मसीह यहाँ है!’ या ‘वहाँ है!’ तो विश्वास न करना। क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्ता उत्पन्न हो जाएंगे, और बड़े संकेत और आश्चर्यजनक कार्य दिखाएंगे; ताकि अगर संभव हो तो वे चुने हुए लोगों को ही गुमराह कर दें” (मत्ती 24:23-24)। अगर तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम झूठे मसीहों द्वारा गुमराह होने के खतरे में हो। अगर तुम सतर्क और तैयार नहीं हो, तो यह खतरनाक है; अगर तुम सच्चे मसीह का स्वागत करने से चूक जाते हो और इसके बजाय किसी झूठे मसीह द्वारा गुमराह हो जाते हो, तो अंत में तुम्हें सजा मिलेगी। इसलिए, प्रभु की वापसी का स्वागत करने में, अगर तुम सतर्क नहीं हो, तो गलत रास्ते पर जाना और झूठे मसीहों द्वारा गुमराह होना बहुत आसान है। यह पहली बात है जिसके लिए तुम्हें सतर्क रहना चाहिए। दूसरी बात जिसके लिए तुम्हें सतर्क रहना चाहिए वह यह है कि अगर तुम सत्य को नहीं जानते और सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम धार्मिक पादरियों और धार्मिक दुनिया के विभिन्न पाखंडों और भ्रांतियों द्वारा गुमराह हो सकते हो। कुछ लोगों को सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सुनने में काफी अच्छे लगते हैं, लेकिन वे सोचते हैं, “सच्चे मार्ग की जाँच-पड़ताल करते समय, मुझे अपने पादरी की सहमति लेनी चाहिए। मुझे अपने पादरी को यह परखने देना चाहिए कि यह मार्ग सच्चा है या झूठा। इस तरह, कुछ भी गलत नहीं हो सकता।” लेकिन जैसे ही वे अपने पादरी से पूछते हैं, पादरी कुछ पाखंड और भ्रांतियाँ उगल देता है और वे गुमराह हो जाते हैं और सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सभी वचनों को नकार देते हैं। इस स्थिति में, अगर वे किसी ऐसे व्यक्ति से मिलते हैं जो सत्य को समझता है और उनके साथ सत्य की संगति करता है और वे सच्चे मार्ग और झूठे मार्गों के बीच भेद पहचानना सीख जाते हैं और अंततः सच्चे मार्ग को पहचान लेते हैं, सत्य को स्वीकार कर लेते हैं और धार्मिक दुनिया के चंगुल में वापस नहीं फँसते हैं, तो वे धन्य हैं। लेकिन अगर वे बुरे लोगों से या ऐसे बेतुके लोगों से मिलते हैं जिनमें आध्यात्मिक समझ की कमी होती है और ये लोग भी कुछ पाखंड और भ्रांतियाँ उगल देते हैं, तो वे गुमराह हो जाएँगे। इसलिए, अगर तुम प्रभु का स्वागत करने में सतर्क नहीं हो, तो तुम्हारे गुमराह होने का खतरा है। अगर तुम बाइबल की भविष्यवाणियों को नहीं समझते हो, तो काम नहीं चलेगा, अगर तुममें सत्य का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है या अगर तुम्हारी काबिलियत खराब है; अगर नकारात्मक लोग तुम्हें लगातार बाधित करते हैं, तो बिल्कुल भी काम नहीं चलेगा। यह दूसरी बात है जिसके लिए तुम्हें सतर्क रहना चाहिए। तीसरी बात जिसके लिए तुम्हें सतर्क रहना चाहिए वह यह है कि अगर तुम्हारे पास सत्य नहीं है तो मसीह के बारे में धारणाएँ विकसित होना आसान है। उदाहरण के लिए, जब कुछ लोग देखते हैं कि मसीह में सामान्य मानवता है और वह बाहर से बिल्कुल भी अलौकिक नहीं है, तो वे धारणाएँ बना लेते हैं। वे सोचते हैं, “जब प्रभु यीशु आया था, तो उसने संकेत दिए थे और चमत्कार किए थे। अंत के दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर कोई संकेत क्यों नहीं देता और कोई चमत्कार क्यों नहीं करता? अगर वह संकेत नहीं देता है और चमत्कार नहीं करता है, तो क्या वह सच में स्वयं परमेश्वर है?” वे नहीं जानते कि अंत के दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर न्याय का कार्य करने के लिए सत्य व्यक्त करता है और उसने विजेताओं का एक समूह बनाया है। यह सबसे बड़ा संकेत और चमत्कार है और यह साबित करने के लिए काफी है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही देहधारी परमेश्वर और अंत के दिनों का मसीह है। एक और उदाहरण लें, कुछ लोग आपदाएँ आने पर नकारात्मक हो जाते हैं, यह सोचते हुए कि अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर सच्चा परमेश्वर होता, तो उसे उनकी रक्षा करनी चाहिए। उनके लिए यह धारणा रखना खतरनाक है, क्योंकि वे परमेश्वर से विश्वासघात कर सकते हैं! तुम देखो, जो लोग सत्य को नहीं समझते हैं वे हमेशा मसीह के बारे में धारणाएँ बना लेते हैं—ऐसे काफी लोग हैं। यह तीसरी बात है जिसके लिए तुम्हें सतर्क रहने की जरूरत है। अंत के दिनों के मसीह का स्वागत करने के लिए, तुम्हें सतर्क रहना चाहिए और तेल तैयार करना चाहिए, यह मुख्य रूप से इन्हीं तीन बातों को दर्शाता है। इन तीन बातों के प्रति सतर्क रहे बिना, भले ही तुम अंत के दिनों के मसीह को स्वीकार कर लो, तो भी किसी आपदा या प्रलोभन का सामना होने पर या फिर कोई नकारात्मक प्रचार या पादरियों की गुमराह करने वाली बातें सुनने पर, तुम्हारे लिए अडिग रहना मुश्किल होगा।
प्रभु का स्वागत करने में सतर्क और तैयार रहना बहुत महत्वपूर्ण है! सतर्क और तैयार रहे बिना, गुमराह होना बहुत आसान है और बचाए जाने का अपना अवसर गँवाना बहुत आसान है। बहुत से लोग न केवल सतर्क और तैयार रहने में नाकाम रहते हैं, बल्कि वे जरा भी खोज या जाँच-पड़ताल नहीं करते हैं। वे हमेशा अपने पादरियों की सुनते हैं और हमेशा बाइबल में जवाब ढूँढ़ते हैं। ऐसे लोग किसी भी तरह प्रभु का स्वागत नहीं कर सकते। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “चूँकि हम परमेश्वर के पदचिह्नों की खोज कर रहे हैं, इसलिए हमारा दायित्व बनता है कि हम परमेश्वर के इरादों, उसके वचनों और कथनों की खोज करें। ऐसा इसलिए क्योंकि जहाँ कहीं भी परमेश्वर द्वारा बोले गए नए वचन हैं, वहाँ परमेश्वर की वाणी है और जहाँ कहीं भी परमेश्वर के पदचिह्न हैं, वहाँ परमेश्वर के कर्म हैं; जहाँ कहीं भी परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, वहाँ परमेश्वर प्रकट होता है, और जहाँ कहीं भी परमेश्वर प्रकट होता है, वहाँ सत्य, मार्ग और जीवन विद्यमान होता है। परमेश्वर के पदचिह्नों की तलाश में तुम लोगों ने इन वचनों की अनदेखी कर दी है कि ‘परमेश्वर ही सत्य, मार्ग और जीवन है।’ और इसलिए, बहुत-से लोग सत्य को प्राप्त करके भी यह नहीं मानते कि उन्हें परमेश्वर के पदचिह्न मिल गए हैं और वे परमेश्वर के प्रकटन को तो बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते। कितनी गंभीर ग़लती है!” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 1 : परमेश्वर के प्रकटन ने एक नए युग का सूत्रपात किया है)।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
अंत के दिनों में, प्रभु यीशु देहधारण करके लौट आए हैं और सत्य के करोड़ों वचनों को व्यक्त किया है, और “परमेश्वर के घर से न्याय का कार्य” किया...
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